बुधवार, 6 जून 2018

‘‘डरे हुए हैं डराने वाले...’’

अक्सर यह देखा गया है कि जो दूसरों को डराने की कोशिश करता है वह भीतर से खुद ही डरा हुआ होता है। जो डरा हुआ नहीं होगा उसे दूसरे को डराने की जरूरत ही क्या है। लिहाजा अगर कोई किसी को डराने की कोशिश करता हुआ दिखाई दे तो आंखें मूंद कर यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि अपने डर को छिपाने के लिये ही दूसरे को डराने का प्रयास किया जा रहा है। डर के इसी मनोविज्ञान के कारण आक्रमण को ही बचाव के सबसे कारगर हथियार के तौर पर मान्यता मिली हुई है। लिहाजा सत्य को समझने व परखने के लिये आवश्यक है कि सतह पर चल रही गतिविधियों को यथा रूप में स्वीकार करने के बजाय गहराई में उतर कर मामले की असली वजह को जाना जाये और उसके बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जाये। देश की मौजूदा राजनीतिक गतिविधियों को अगर इस नजरिये से देखें तो सतह की तस्वीर राजग की सेहत व एकजुटता के लिहाज से बेहद ही खराब दिखाई पड़ रही है। आलम यह है कि राजग के मौजूदा स्वरूप में निर्णायक भूमिका निभा रहे दलों ने इन दिनों भाजपा को धमकाने-डराने का अभियान सरीखा छेड़ दिया है। शिवसेना ताल ठोंक कर अकेले दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है जबकि जदयू ने भी भाजपा की रीति-नीति से अलग रूख प्रदर्शित करना आरंभ कर दिया है। यूपी में ओमप्रकाश राजभर के सुर भी असहमति दर्शा रहे हैं और रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा भी अंदरूनी तौर पर भाजपा से भरे बैठे हैं। लेकिन सवाल है कि आखिर यह सब हो क्यों रहा है। कहने को भले ही शिवसेना मोदी सरकार पर मतदाताओं से किये गये वायदे तोड़ने और मूल वैचारिक सिद्धांतों को छोड़ने का आरोप लगा रही हो जबकि जदयू द्वारा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने का राग आलापा जा रहा हो लेकिन गहराई से परखा जाये तो यह सब दिखावा अपने डर को छिपाने के लिये ही किया जा रहा है। ऐसी ही आड़ लेकर बीते दिनों टीडीपी भी राजग से अलग हुई थी। वह भी तब जबकि टीडीपी की मांग के अनुरूप आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का कागजी सर्टीफिकेट भले ही नहीं दिया गया लेकिन जहां तक विशेष राज्य के तौर पर योजनाओं की सौगात देने की बात है तो उसमें केन्द्र ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इसके बावजूद अगर टीडीपी ने राजग से अलग होने का फैसला किया तो इसकी मुख्य वजह स्थानीय राजनीति में अपनी ढ़ीली पड़ती पकड़ और अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच अस्वीकार्यता का डर ही था। यही हाल महाराष्ट्र में शिवसेना का है जो आज भी यह स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं है कि अब उसकी औकात इतनी बड़ी नहीं बची है कि वह सूबे में सबसे अधिक सीटों पर दावा कर सके या प्रदेश में राजग की कमान अपने हाथों में रख सके। यही वजह है कि उसने सीटों पर तालमेल नहीं होने के कारण ही महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव भी भाजपा से अलग होकर लड़ा था और अब लोकसभा चुनाव भी अपने दम पर लड़ने की बात कह रही है। हालांकि आज भी शिवसेना को कहीं ना कहीं यह उम्मीद है कि दबाव में आने पर भाजपा उसका वर्चस्व अवश्य स्वीकार कर लेगी और महाराष्ट्र की राजनीति में उसे बड़े भाई के तौर पर दोबारा स्वीकार करके उसे अपने से अधिक सीटें अवश्य देगी। इसी उम्मीद में उसने आज तक राजग का दामन नहीं छोड़ा है और प्रदेश से लेकर केन्द्र तक में वह भाजपा के साथ सत्ता में साझेदारी कर रही है। भाजपा भी यही उम्मीद जता रही है कि चुनाव से पहले शिवसेना को साथ मिल कर चुनाव लड़ने के लिये अवश्य मना लिया जाएगा। ऐसे में स्पष्ट है कि शिवसेना द्वारा भाजपा को उकसाने और धमकाने की जो कोशिशें हो रही हैं उसकी असली वजह प्रदेश की राजनीति में कमजोर पड़ने का डर ही है। इसी प्रकार बिहार में राजग के मौजूदा स्वरूप में अपनी भूमिका सुनिश्चित करने के लिये ही नीतीश कुमार भी भाजपा के खिलाफ सख्त तेवर दिखा रहे हैं वर्ना व्यावहारिक या सैद्धांतिक तौर पर जदयू का राजग से कोई मतभेद नहीं है। दरअसल बीते लोकसभा चुनाव में जब महागठबंधन में शामिल होकर जदयू ने राजग के खिलाफ चुनाव लड़ा तब राजग को बिहार की कुल 40 में से 31 सीटें मिली थीं जिसमें भाजपा को 22, पासवान की लोजपा को छह और कुशवाहा की आरएलएसपी को तीन सीटों पर जीत मिली थी। ऐसे में जदयू को डर सता रहा है कि इस बार राजग में उसके लिये शेष नौ सीटें ही बचेंगी जिस पर पिछली बार राजग को हार का सामना करना पड़ा था। यही हाल रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा का भी है जिन्हें डर है कि जदयू के लिये उन्हें अपनी जीती हुई सीटों की कुर्बानी देनी पड़ सकती है। हालांकि भाजपा स्पष्ट कर चुकी है कि सीटों का तालमेल करने के दौरान सहयोगियों को कतई बलि का बकरा नहीं बनाया जाएगा और जीत के समीकरण की जरूरत के मुताबिक वह भी अपनी जीती हुई सीटों का मोह छोड़ने में कतई संकोच नहीं करेगी। लेकिन इस स्पष्टीकरण से उसके सहयोगियों का डर दूर नहीं हो पा रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अपने डर को छिपाए रखकर उसका इलाज करने के लिये भाजपा को डराने की रणनीति का क्या नतीजा निकलता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

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