साझी विरासत के बहाने सियासी विरासत की चिंता
सियासत में होना और दिखना अमूमन अलग ही रहता है। होता कुछ और है, दिखता कुछ और। दिख तो यह रहा है कि राष्ट्रीय राजनीति में विकल्पहीनता के निर्वात ने दिनों-दिन क्षीण व दीन-हीन होते जा रहे विपक्षी दलों को इतना आकुल-व्याकुल कर दिया है कि वे आपसी मतभेदों को भुलाकर किसी भी बहाने एकजुट हो जाने के लिए बुरी तरह बेचैन हो उठे हैं। इस बेचैनी का ही नतीजा है कि बिना किसी चेहरे और बिना ठोस एजेंडे के ही तमाम भाजपा विरोधी ताकतें उस साझी विरासत को बचाने के बहाने एकजुट होने का प्रयास कर रही हैं जिसमें उनका कुछ भी साझा नहीं है। ना तो सैद्धांतिक तौर पर उनकी कोई आपसी साझेदारी रही है और ना ही व्यावहारिक तौर पर ऐसा कुछ दिखाई दे रहा है जो उनके बीच साझा हो। अलबत्ता मौजूदा समस्याएं अवश्य ही सबकी साझा हैं जिसे तथाकथित विरासत की चाशनी में लपेटकर आम लोगों को ऐसी कहानी सुनाने का प्रयास किया गया है जिसका कोई आदि-अंत ही नहीं है। मौजूदा शासक वर्ग के खिलाफ एकजुट होकर आंदोलन करने के लिए भले ही देश ही साझी विरासत को बचाने की आड़ ली जा रही हो लेकिन दीवार के पीछे की हकीकत को टटोलने से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि यह आंदोलन वास्तव में अपनी सियासी विरासत को बचाने के लिए छेड़ा जा रहा है। चुंकि सियासी विरासत को बचाने की समस्या साझी है इसलिए आंदोलन भी साझेदारी में ही करना होगा। वर्ना सियासी विरासत के समाप्त होने का सिलसिला अगर यूं ही चलता रहा तो जल्दी ही सबकी झोली खाली हो जाने वाली है और वे चाहकर भी अपने उत्तराधिकारियों के लिए कोई विरासत नहीं छोड़ पाएंगे। यानि साझी विरासत को बचाने का आंदोलन बाहर से जितना विस्तृत, व्यापक व विशाल दिखाई पड़ता है, वह अंदरूनी तौर पर उतना ही संकुचित, सीमित व साजिशपूर्ण है। यहां तक कि जिस शरद यादव ने साझी विरासत को बचाने के आंदोलन को खड़ा करने का बीड़ा उठाया है उनके मन में भी देश की साझी विरासत की कितनी चिंता है इसके बारे में उनके निकट सहयोगी भी दावे से कुछ नहीं कह सकते। अलबत्ता अपनी सियासी विरासत को बचाने और उसे अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए वे कितने बेचैन हैं इसकी फुसफुसाहट अवश्य सुनाई देने लगी है। बताया जा रहा है कि साझी विरासत को बचाने की आड़ लेकर वे जिस विपक्षी एकता का ताना-बाना बुन रहे हैं उसके पीछे की कहानी पुत्रमोह से ही जुड़ी हुई है। खास तौर से बिहार में जदयू के राजग के जुड़ जाने की आड़ लेकर वे जिस नाराजगी का इजहार कर रहे हैं उसकी असली वजह उनका पुत्रमोह ही है। वर्ना जिस जदयू को उन्होंने खुद ही स्थापित किया हो उसको तोड़ने के लिए वे उस कांग्रेस से शक्ति हर्गिज नहीं लेते जिसका विरोध करके ही उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान कायम की है। लेकिन बताया जाता है शरद अब अपने बेटे शांतनु बुंदेला को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं। शांतनु ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और लंदन यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री हासिल की है और पिछले लोकसभा चुनाव में जब शरद यादव मधेपुरा से चुनाव लड़ रहे थे तब शांतनु ने ही उनके चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी। हालांकि शरद ने अब तक अपनी सियासी विरासत शांतनु को सौंपने की अंदरूनी मंशा को सार्वजनिक नहीं किया है लेकिन जदयू के शीर्ष स्तर से मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने नीतीश कुमार को इसके लिए मनाने, रिझाने व समझाने की तमाम कोशिशें करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन नीतीश ने उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया था जिसके बाद से ही वे नीतीश से नाराज चल रहे हैं और जदयू के साथ वैसा लगाव-जुडाव महसूस नहीं कर पा रहे हैं जो उनसे अपेक्षित है। वे हर हालत में अपने बेटे के लिए मधेपुरा लोकसभा की वही सीट सुरक्षित कराना चाहते हैं जहां से वे संसद के लिए चुने जाते रहे हैं। बेशक पैदाइशी तौर पर शरद का बिहार से कोई नाता-रिश्ता ना हो लेकिन मधेपुरा को उन्होंने अपनी चुनावी कर्मस्थली बनाया हुआ है और इस बात का पूरा पुख्ता इंतजाम भी कर चुके हैं कि वहां उन्हें अब कोई बाहरी बताने की हिम्मत नहीं कर सकता है। जाहिर है कि उस सीट को वे अपने बेटे के बजाय किसी और के लिए छोड़ना कतई गवारा नहीं कर सकते हैं जबकि जदयू में रहते हुए अपनी मनचाही कर पाना उनके लिए नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो चला है। लेकिन पुत्रमोह की पट्टी आंखों पर पड़ जाए तो सियासी डगर का सफर किधर मुड़ जाए यह कोई नहीं जानता। भले इसके लिए कुछ भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े। तभी तो सियासी विरासत को आगे बढ़ाने के एवज में अब शरद भी वैसी ही कीमत चुकाने की राह पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं जो गांधी, यादव और चौटाला सरीखे कई परिवार अदा कर रहे हैं। इन सभी परिवारों की समस्याएं साझी हैं और भाजपा के रूप में इनकी समस्याओं की जड़ भी साझा ही है लिहाजा साझी विरासत को बचाने के आंदोलन की आड़ लेकर इनके एक मंच में जुटने को कतई अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता है। लेकिन साझी विरासत के बंबू पर सियासी विरासत का तंबू तो तब खड़ा होगा जब इनके साझा एजेंडे की जमीन पर आम लोगों को यकीन हो पाएगा। जिसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं दिख रही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur
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जवाब देंहटाएंPerfect Bahoot Badhiya
जवाब देंहटाएंGood...
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