सोमवार, 11 सितंबर 2017

‘हर तरफ अन्धी सियासत है, बताओ क्या करें’



‘हर तरफ अन्धी सियासत है, बताओ क्या करें’

उत्तर प्रदेश की पश्चिमी सरहद पर स्थित गाजियाबाद के रहनेवाले कवि योगेन्द्र दत्त शर्मा लिखते हैं कि, ‘हर तरफ अन्धी सियासत है, बताओ क्या करें? रेहन में पूरी रियासत है, बताओ क्या करें? झुण्ड पागल हाथियों का, रौंदता है शहर को, और अंकुश में महावत है, बताओ क्या करें?’ वाकई यह अंधी सियासत ही तो है। वर्ना एक महिला की हत्या के ऐसे मामले को रातों-रात इतना तूल दिए जाने की कोई दूसरी वजह समझ में नहीं आती जो एक खास विचारधारा के पक्ष में पत्रकारिता करती रही हो और इस काम में मर्यादा की लक्षमण रेखा लांघने के नतीजे में मानहानि के मामले में दोषी पाए जाने के बाद जमानत पर चल रही हो। यह सही है कि हत्या की कोई भी वारदात पूरी मानवता और सभ्य समाज के लिए किसी कलंक से कम नहीं है। लेकिन किसी हत्या के मामले को अपने हित में तूल देकर विरोधी विचारधारा या संगठन को सीधे तौर पर दोषी बता देना कैसे जायज माना जा सकता है। दरअसल पूरे मामले के असली घटनाक्रम पर गौर करें तो बेंगलुरु में वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने उनके घर में घुसकर उन्हें गोली मार दी। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक 55 वर्षीय गौरी कार से अपने घर लौटी थी। जब वह गेट खोल रही थीं तभी मोटरसाइकिल सवार अज्ञात हमलावरों ने उन पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं। इनमें से दो गोलियां उनके सीने में और एक माथे पर लगी जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। अब सवाल है कि इस हत्याकांड का मुख्य दोषी कौन है? निश्चित तौर पर मामले का पहला मुख्य दोषी तो उन पर गोलियां बरसाने वाला हत्यारा ही है। लेकिन उससे जरा भी कम दोषी प्रदेश की पुलिस व्यवस्था नहीं है जो अपने नागरिक की रक्षा कर पाने में अक्षम साबित हुई है। नागरिक भी ऐसा जो सरकार और नक्सलियों के बीच कड़ी का काम कर रहा हो। लेकिन ना तो किसी को इस बात की परवाह है कि वास्तव में इस हत्या को किसने अंजाम दिया और ना ही प्रदेश की कानून व्यवस्था पर उंगली उठाने की जहमत उठाई गई है। अलबत्ता इस हत्याकांड को ऐसे तरीके से परोसा जा रहा है मानो देश में स्वतंत्र आवाज उठानेवालों के लिए अब कोई जगह नहीं बची है और भारत में पत्रकारों को जान के लाले पड़े हुए हैं। बताने की कोशिश की जा रही है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी या राष्ट्रवादी विचारधारा की सरकार के कार्यकाल में विरोधी विचारों के लिए कोई जगह नहीं बची है और गौरी की हत्या इसी वजह से की गई क्योंकि अव्वल वह पत्रकार थी और दूसरे वह दक्षिणपंथी विचारधारा का मुखर होकर विरोध करती थी। क्योंकि वह एक खास विचारधारा से जुड़ी हुई थी इसी वजह से उसकी हत्या कर दी गई। अब सवाल यह है कि जब अब तक यही नहीं पता चल पाया है कि उसकी हत्या क्यों और किसने की तब सीधे यह फैसला सुना दिए जाने को कैसे जायज ठहराया जा सकता है कि गौरी को इसलिए मार डाला गया है क्योंकि वह पत्रकार थी और उसकी लेखनी दक्षिणपंथी विचारधारा के खिलाफ आग उगलती रहती थी। लेकिन दुर्भाग्य से इस मामले को तटस्थता व निष्पक्षता के साथ समग्रता में देखने व समझने की ना तो कोशिश की जा रही है और ना ही किसी को समझने की इजाजत दी जा रही है। आलम यह है कि प्रदेश सरकार ने भी इस मामले को सियासी तौर पर भुनाने के लिए गौरी को राजकीय सम्मान के साथ दफनाने की पहल कर दी और कांग्रेस व वामपंथियों से लेकर तमाम भाजपा विरोधी राजनीतिक ताकतों ने इस मामले को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया। इसके अलावा मीडिया के एक वर्ग ने भी इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया और मानवाधिकारों पर नजर रखने वाली एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने भी इस हत्या पर चिंता जताते हुए यहां तक कह दिया कि यह घटना भारत में अभिव्यक्ति की आजादी की स्थिति के बारे में चिंता पैदा करती है। रही सही कसर अमेरिकी दूतावास ने औपचारिक तौर पर यह बयान जारी करके पूरी कर दी कि भारत में अमेरिकी मिशन, भारत व दुनिया भर में प्रेस की आजादी के समर्थकों के साथ मिलकर बेंगलुरु में सम्मानित पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की निंदा करता है। यानि एक तरह से देखा जाए तो सबने यह मान लिया है कि गौरी की हत्या व्यवस्था व सत्ता विरोधी आवाज को दबाने के मकसद से की गई है। किसी को यह जानने की अब जरूरत ही नहीं है कि वास्तव में यह हत्या क्यों हुई? सबको चिंता सिर्फ इस बात की दिख रही है कि किसी भी तरह इस हत्याकांड की आड़ लेकर मोदी सरकार पर दबाव बनाया जाए और उसे तानाशाह साबित कर दिया जाए। निश्चित तौर पर यह स्थिति बेहद खतरनाक है क्योंकि पूरे मामले का खुलासा होने और हत्यारों के पकड़े जाने से पहले ही अपने सुविधानुसार मामले को अलग रंग देने और इसका यथासंभव दोहन करने की कोशिश की परंपरा भविष्य में दोधारी तलवार की तरह किसकी गर्दन पर कब गिरेगी इसके बारे में दावे से कोई कुछ नहीं कह सकता है। राजनीतिक नफा-नुकसान के तहत इल्हाम के आधार पर हकीकत को तोड़ने-मरोड़ने की परंपरा भविष्य के लिए बेहद खतरनाक संकेत दे रही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

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