शुक्रवार, 9 मार्च 2018

‘दो-दो काटे शून्य, साथ मिले तो बाईस’

‘दो-दो काटे शून्य, साथ मिले तो बाईस’

राजनीति का गणित अलग ही होता है। हर नए समीकरण के साथ इसके परिणाम का आंकड़ा घटता-बढ़ता रहता है। सामान्य गणितीय समीकरण में तो दो और दो हमेशा चार ही होता है। लेकिन राजनीति के आंकड़े इस हद तक अप्रत्याशित होते हैं कि दो और दो को आंखें मूंद कर कतई चार नहीं माना जा सकता। वह शून्य भी हो सकता है, तीन भी, पांच भी और बाईस भी। कई बार जोड़ने के लिए रखे गए दो और दो परस्पर एक दूसरे को काट कर शून्य भी बना देते हैं और कई बार दो और दो एक साथ मिलकर बाईस भी बन जाते हैं। हालांकि कोई भी सियासी गठजोड़ अक्सर दो और दो मिलकर बाईस बनने की उम्मीदों के साथ ही किया जाता है। लेकिन यूपी का राजनीतिक समीकरण जहां एक ओर भाजपा और अपना दल के गठजोड़ को लोकसभा चुनाव में आंकड़ों का ताज पहना देता है वहीं विधानसभा के चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठजोड़ को सियासी शून्य की ओर धकेल देता है। इसलिये किसी भी गठजोड़ के भविष्य को लेकर निर्णायक तौर पर तो पहले से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन दो स्वतंत्र दलों के मिलन पर होने वाले रासायनिक समीकरण को पुरानी प्रक्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के आधार पर परखकर उसके भावी प्रदर्शन का मोटा-मोटी खाका तो खींचा ही जा सकता है। इस लिहाज से देखा जाए तो गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट के लिए होने जा रहे उपचुनाव में बसपा ने सपा को अपना जो प्रायोगित समर्थन दिया है उसका अंजाम वैसा ही होने की उम्मीद अधिक दिख रही है जैसा विधानसभा के चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठजोड़ का हुआ था। एक जैसा नतीजा आने की संभावना के पीछे इसकी वजहें भी एक जैसी ही हैं। मसलन जमीनी स्तर पर शीर्ष सपा नेता मुलायम सिंह यादव की पहचान गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति के चैम्पियन की थी। लेकिन भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए सपा ने उसी कांग्रेस का हाथ थाम लिया जिसके खिलाफ उसके कार्यकर्ता दशकों से संघर्ष करते आए थे। नतीजन इस बेमेल गठजोड़ का नतीजा यह हुआ कि सपा और कांग्रेस के मतदाताओं ने अपने शीर्ष नेतृत्व के फैसले से निराश होकर भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो जाना ही बेहतर समझा। परिणाम यह हुआ कि सपा सैंतालीस पर और कांग्रेस महज सात सीटों पर सिमट कर रह गई। अब लोकसभा उपचुनाव में भी परिस्थितियां वैसी ही दिख रही हैं। सपा और बसपा के बीच वर्ष 1995 से ही शीर्ष स्तर पर संवादहीनता, कटुता और जमीनी स्तर पर सीधी दुश्मनी का माहौल रहा है। ऐसे में अब अगर बसपा सुप्रीमो ने कथित सौदेबाजी के तहत एक राज्यसभा सीट के एवज में दो लोकसभा सीट पर समर्थन की बात कही है तो इसे जमीनी स्तर पर कार्यरूप देने के लिए दोनों दलों के उन मतदाताओं को एक मंच पर आना होगा जिनके लिए दशकों पुरानी रंजिश को एक झटके में भुला पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो सकता है। ऐसे में अगर अपने शीर्ष नेतृत्व के निर्देश से निराश होकर मतदाताओं का काफी बड़ा वर्ग भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो जाए तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं कहा जाएगा। इसके अलावा सपा और कांग्रेस के एक मंच पर आने से उनका अवसरवादी चेहरा ही सामने आया था जिसे विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने स्वीकार नहीं किया। उसी प्रकार बसपा भी कल तक हर मामले में जिस सपा को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी उसके समर्थन में अचानक बहनजी का खुलकर मैदान में आ जाना मतदाताओं को किस हद तक स्वीकार्य होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। रहा सवाल जातीय समीकरण का तो इसमें भी सपा और बसपा का गठजोड़ उसी प्रकार बेमेल दिख रहा है जिस प्रकार सपा और कांग्रेस की दोस्ती बेमेल साबित हुई थी। इस उपचुनाव में सपा के परंपरागत यादव और मुस्लिम मतदाता को मजबूती देने के लिए अपने दलित वोट को उसके साथ जोड़ने की बहनजी की कवायद का यह परिणाम भी सामने आ सकता है कि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के खिलाफ हिन्दू वोटर लामबंद हो जाएं। ऐसे में अगर चुनाव ने स्वाभाविक तौर पर सांप्रदायिक रंग पकड़ा तो बहनजी का दलित और सपा का यादव वोटबैंक किस हद तक उनके साथ जुड़ा रह पाएगा यह कहना भी मुश्किल है। वैसे भी बहनजी के परंपरागत मतदाताओं से अब तक सपा के दोनों परंपरागत समर्थक वर्ग की कभी नहीं बनी। जब भी कहीं सांप्रदायिक मामले सामने आए तो जमीनी टकराव अक्सर दलितों और मुस्लिमों के बीच ही हुआ है। जमीनी स्तर पर उनके बीच इतनी गहरी और चैड़ी खाई बनी हुई है जिसे अचानक किए गए एक फैसले से पूरी तरह पाट पाना कतई संभव नहीं हो सकता है। ऐसे में बहनजी ने भाजपा के बढ़ते प्रसार व जनाधार को देखते हुए अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए सायकिल की सावारी के विकल्प को प्रायोगिक तौर पर आजमाने की जो पहलकदमी की है उसकी राहें फिलहाल तो कतई आसान नहीं दिख रही हैं। लेकिन सियासत खेल ही है असीमित संभावनाओं का। लिहाजा चुनावी नतीजा सामने आने से पहले निर्णायक तौर पर किसी नतीजे पर पहुंच जाना उचित नहीं होगा। इसलिए बेहतर यही होगा कि इस गठजोड़ के प्रदर्शन का इंतजार कर लिया जाए ताकि मतदाताओं के मूड का भी पता चल सके और आगामी दिनों के संभावित समीकरणों की तस्वीर भी साफ हो जाए। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर  #Navkant_Thakur

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