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शनिवार, 4 अगस्त 2018

‘समीकरणों की सिद्धांतों से सियासी भिड़ंत’

सियासत की राहों से गुजर कर सत्ता की मंजिल तक पहुंचने के लिये सिद्धांतों की भी उतनी ही जरूरत पड़ती है जितनी समीकरणों की। सिर्फ सिद्धांत के दम पर अगर सियासत को आगे बढ़ाना संभव होता तो महज एक वोट की कमी के कारण लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को हार का सामना नहीं करना पड़ता। लेकिन वह लोग ही और थे जो सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए समीकरणों के सहारे हासिल होनेवाले सियासी लाभ को ठुकरा दिया करते थे। सामान्य तौर पर सियासत में सिद्धांतों और समीकरणों के बीच संतुलित तालमेल से ही आगे बढ़ने की राह निकलती हुई देखी गई है। व्यावहारिकता में ना तो सिर्फ सिद्धांतों से सियासत को आगे बढ़ाना संभव हो सकता है और ना ही सिर्फ समीकरणों के दम पर। बल्कि सियासत के लिये दोनों को एक दूसरे का पूरक कहना ही उचित होगा। लेकिन मसला है कि इन दिनों सिद्धांत और समीकरण आमने-सामने आ गए हैं। जो सिद्धांतों के सहारे आगे बढ़ना चाहते हैं उनका समीकरण गड़बड़ हो रहा है और जिनके हाथों में समीकरण की लाठी है उनकी राहों में सिद्धांतों का उजाला नदारद है। एक पक्ष सिद्धांत के लिये समीकरण की परवाह नहीं करना चाहता जबकि दूसरा पक्ष समीकरण साधने के लिये अपने सिद्धांतों की बलि देने से भी संकोच नहीं कर रहा है। हालांकि दोनों को अपनी राहें सत्ता की मंजिल की ओर ही जाती हुई दिख रही हैं लेकिन ऐसा तो संभव ही नहीं है कि दोनों को एक साथ बहुमत का आंकड़ा हासिल हो जाए। लिहाजा अंतिम फैसला तो जनता-जनार्दन को ही करना होगा कि सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले को अपना आशीर्वाद दिया जाए या समीकरण के सांझा चूल्हे पर सियासी रोटी सेंकने वालों को तरजीह दी जाए। लेकिन जनता का फैसला तो चुनाव के बाद ही आयेगा। फिलहाल तो तात्कालिक नफा-नुकसान के मुताबिक भविष्य का आकलन करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। इस लिहाजा से देखें तो सिद्धांतों को ताक पर रख कर समीकरणों के सहारे सियासी सफलता हासिल करने के प्रयासों को बीते कुछ सालों में जनता ने बुरी तरह नकारा ही है। जब उत्तर प्रदेश में दशकों से गैर-कांग्रेसवाद की राजनति करनेवाली सपा ने विधानसभा चुनाव में समीकरणों को साधने के लिये सिद्धांतों की बलि चढ़ाकर कांग्रेस का हाथ थामने की पहल की तो जनता ने दोनों को सिरे से खारिज कर दिया। जब धुर सैद्धांतिक विरोधी पीडीपी को गले लगाकर भाजपा ने सिद्धांतों को ताक पर रखकर समीकरणों के सहारे जम्मू-कश्मीर की सत्ता हथियाने की पहल की तो एक के बाद एक होनेवाले उप-चुनावों में भगवा खेमे को सिलसिलेवार हार का सामना करना पड़ा। बिहार में नीतीश कुमान ने अपने द्वारा गढ़े गए सिद्धांतों से ही पलटी मारते हुए जब महा-गठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ दोबारा जुड़ने की पहल की तो उसके बाद से जमीनी स्तर पर उनकी पकड़ लगातार कमजोर ही होती जा रही है और अपनी सरकार होते हुए भी उप-चुनावों के मंझधार में राजग की लुटिया डूबती हुई दिख रही है। लेकिन जब धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के धागे से महा-गठजोड़ के समीकरण की गांठ बांधकर यूपी में विरोधियों ने भाजपा को चुनौती दी तो मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में भी कमल मुरझा गया। इन कुछ मिसालों के संकेतों को समग्रता में समझने की कोशिश करें तो सिद्धांतों के लिये समीकरण को ताक पर रखना उतना नुकसानदायक नहीं रहता है जितना समीकरण साधने के लिये सिद्धांतों से मुंह मोड़ना। तभी तो भाजपा ने समीकरण की परवाह किये बगैर सिद्धांतों की राह पर आगे बढ़ना ही मुनासिब समझा है जबकि कांग्रेस समीकरण के लिये अपने सिद्धांतों से समझौते का विकल्प आजमाना बेहतर समझ रही है। खास तौर से असम में तैयार किये जा रहे राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानि एनआरसी के मामले में भाजपा ने राजग के समीकरणों की परवाह किये बगैर अपने पूर्वनिर्धारित सिद्धांतों की राह पर आगे बढ़ना ही बेहतर समझा है। वर्ना भाजपा को भी बेहतर पता है कि इस मसले को तूल दिये जाने से जदयू, लोजपा, रालोसपा व अन्नाद्रमुक सरीखे उसके वे सहयोगी खासे खफा हो सकते हैं जिन्होंने सियासी लाभ के लिये मौके की नजाकत के मुताबिक खुद को ढ़ालते हुए राजग में साझेदारी करना स्वीकार किया है और वक्त बदलते ही उन्हें पलटने में जरा भी देर नहीं लगेगी। यानि राजग में टूट व बिखराव की संभावना को समझते हुए भी भाजपा ने अवैध घुसपैठियों के खिलाफ संघर्ष के सिद्धांत पर कायम रहना बेहतर समझा है। दूसरी ओर एनआरसी के मसले पर कांग्रेस के रूख की बात करें तो विगत में उसका इतिहास भी अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर खदेड़े जाने के पक्ष में ही रहा है लेकिन सियासी समीकरणों को साधने और अल्पसंख्यक व भाजपा विरोधी वोटों का राष्ट्रीय स्तर पर ध्रुवीकरण करने के लिये महा-गठजोड़ कायम करने की आवश्यकता के मद्देनजर उसने फिलहाल अपने पुराने सिद्धांत से दूरी बना लेना ही बेहतर समझा है। हालांकि कांग्रेस अपने इस कदम को धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता और सामंजस्य के सिद्धांतों के प्रति मजबूत निष्ठा के सिद्धांतों पर अपनी अडिगता के तौर पर अवश्य प्रस्तुत करेगी ताकि सिद्धांतों पर कायम रहने का भरम भी बना रहे और समीकरणों को साधने में भी सफलता मिल जाए। लेकिन वास्तव में देखा जाये तो यह टकराव सीधे तौर पर सिद्धांतों और समीकरणों के बीच ही होगा। जिसमें अब हवाएं ही करेंगी रौशनी का फैसला, जिस दिए में जान होगी वह जला रह जाएगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर

सोमवार, 24 जुलाई 2017

‘दो नावों में एक पांव पर सियासी संतुलन’

‘दो नावों में एक पांव पर सियासी संतुलन’

बेशक आम तौर पर माना जाता हो कि, ‘समझ समझ के समझ को समझो, समझ समझना भी एक समझ है।’ लेकिन सियासत में समझ को समझ से समझने की कोशिश में अक्सर कुछ भी समझ पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। तभी तो बिहार में नीतीश कुमार की सियासी पैंतरेबाजी को वे लालू यादव भी नहीं समझ पा रहे जिनकी समझ पर कोई नासमझ भी संदेह नहीं कर सकता। लिहाजा जब लालू की समझदानी में नीतीश की कारस्तानी नहीं समा रही तो लालू के लाल कौन से ऐसे लालबुझक्कड़ हैं? तभी तो तेजप्रताप ने बेलाग लहजे में यह स्वीकार कर लिया कि नीतीश को सिर्फ नीतीश ही समझ सकते हैं। वाकई ऐसी सियासत को कोई क्या समझे जिसमें नरेन्द्र मोदी के साथ अपनी तस्वीर प्रकाशित होने भर से बिदककर राजग का बरसों पुराना याराना एक झटके में तोड़ लिया जाए और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को रात्रि भोज पर निमंत्रित करने के बाद खिलाने से इनकार करके बुरी तरह जलील किया जाए। लेकिन जब वही मोदी प्रधानमंत्री बन जाएं तो नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक के तमाम ऐसे मसलों पर उनकी सार्वजनिक सराहना की जाए जिसकी समूचे विपक्ष द्वारा कड़ी आलोचना की जा रही हो। यहां तक कि विपक्षी महागठजोड़ के चुनावी प्रयोग का चेहरा बनने के बाद विपक्षी एकता के लिए बुलाई जानेवाली तमाम बैठकों से खुद को दूर रखा जाए और विपक्ष द्वारा घोषित राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को समर्थन देने से भी इनकार कर दिया जाए, लेकिन किसी भी बैठक में शिरकत करने के लिए जब भी मोदी का बुलावा आए तो नंगे पांव दौड़ लिया जाए। ऐसे में कोई कैसे समझ सकता है कि आखिर नीतीश वास्तव में किसके साथ हैं? कांग्रेसनीत धर्मनिरपेक्षतावादी विपक्ष के साथ या भाजपानीत राष्ट्रवादी सत्तापक्ष के साथ। इसी प्रकार यूपी में जिस भाजपा के हाथों सपा को शर्मनाक शिकस्त का सामना करना पड़ा हो उसके साथ सपा के शीर्ष संचालक परिवार का बर्ताव कांग्रेसियों की हलक के नीचे नहीं उतर रहा। एक तरफ तो यूपी में सबसे कट्टर भाजपा विरोधी की छवि सपा ने ही हथियाई हुई है और दूसरी तरफ मोदी के साथ कनफुसकी भी मुलायम ही करते हैं और अखिलेश ऐलान करते हैं कि योगी सरकार के प्रदर्शन को आंकने के लिए सब्र के साथ इंतजार किया जाए। यहां तक कि शिवपाल खुलेआम यह ऐलान करते हैं कि सपा नेतृत्व का फैसला चाहे जो भी हो लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में उनके विधायकों की टोली भाजपा के प्रत्याशी के पक्ष में ही मतदान करेगी। उस पर तुर्रा यह कि बकौल शिवपाल, उन्हें ऐसा करने के लिए मुलायम ने ही कहा है। अब ऐसे में सपा की सियासत को समझना कांग्रेस के लिए मुहाल होना स्वाभाविक ही है। हालांकि यह अगल बात है कि नीतीश की राजनीति राजद को और सपा की सियासत कांग्रेस को किस प्रकार की दिखाई दे रही है। लेकिन एक आम आदमी की नजर से देखा जाए तो बिहार में जदयू और यूपी में सपा की राजनीति ‘दो नावों पर एक पांव’ वाली ही है। औपचारिक व सैद्धांतिक तौर पर तो ये दोनों दल कांग्रेसनीत विपक्ष के साथ ही जुड़े हुए हैं। बिहार में कांग्रेस व राजद के दम पर ही नीतीश की सरकार चल रही है और यूपी की राजनीति में वापसी करने के लिए सपा भी कांग्रेस व बसपा को अपने साथ जोड़ कर आगे बढ़ने की रणनीति को ही अमली जामा पहनाने में जुटी हुई है। इसके बावजूद अगर ये दोनों दल भाजपानीत राजग के साथ अंदरूनी तौर पर परस्पर समझदारी से सहयोग का गठजोड़ कायम रखना चाहते हैं तो इसका निहितार्थ समझने के लिए इन दोनों दलों की जमीनी समस्याओं व सिरदर्दियों पर नजर डालना बेहद आवश्यक है। जदयू की बात करें तो बेशक वहां सरकार का चेहरा नीतीश को बनाया गया हो लेकिन साझेदारी के तहत सत्ता की मलाई में हिस्सेदारी बंटा रहे राजद व कांग्रेस की करतूतों ने ही नीतीश को इस कदर मजबूर कर दिया है कि वे इन दोनों पर नकेल डालने के लिए इनके साझे दुश्मन के साथ दोस्ती का दिखावा करें। नीतीश सरकार बदनाम हुई शिक्षा व्यवस्था चैपट होने को लेकर लेकिन उस विभाग पर कांग्रेस का कब्जा है। सूबे की स्वास्थ्य व्यवस्था को चैपट करने की कारस्तानी कर रहे हैं लालू के लाल। रही-सही कसर लालू परिवार की अकूत संपत्ति का मामला सामने आने के नतीजे में लगे भ्रष्टाचार के दाग ने पूरी कर दी। लेकिन नीतीश की मजबूरी है कि वे चाह कर भी किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। लिहाजा विवश होकर वे विपक्ष की नाव से अपना एक पांव बाहर निकाल कर भविष्य की सुरक्षा का इंतजाम ना करें तो और क्या करें। इसी प्रकार जब सपा सरकार के कार्यकाल में हुए कारनामों का बखान अपनी चुनावी सभाओं में खुद प्रधानमंत्री मोदी कर चुके हों तो अब सरकार बनने के बाद उसकी बखिया उधेड़ा जाना तो तय ही है। ऐसे में विपक्ष की नाव पर निर्भर होकर डूबने की प्रतीक्षा करने से तो बेहतर ही है कि एक पांव बढ़ाकर सरकार से मनुहार करते हुए गुहार लगाई जाए कि बखिया उधेड़ने की कार्रवाई में यथासंभव बचाव की गुंजाइश रखी जाए। लेकिन अपनी ही उत्पादित समस्या से बचाव के लिए दो नाव पर एक साथ पांव रखनेवालों को यह भी याद रखना चाहिए कि दो नाव के सवार का ना तो कभी बेड़ा पार हुआ है और ना हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #navkantthakur