शनिवार, 26 मार्च 2016

दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें ....

‘दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें’

वाकई इन दिनों भाजपा सहित संघ परिवार के तमाम अनुषांगिक संगठनों से जुड़े लोगों के मन में साहिर साहब का यही सवाल सुलग रहा है कि ‘दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें, तुमको ना हो खयाल तो हम क्या जवाब दें।’ यह सवाल लाजिमी भी है। क्योंकि लोग तो पूछेंगे कि विपक्ष में रहने के दौरान जो बड़ी-बड़ी बातें की जा रही थीं उन्हें सत्ता में आने के बाद क्यों भुला दिया गया। बातें सिद्धांतों की, विचारों की और सुनहरे सपनों की। कहते हैं कि भाजपा अलग ही मिट्टी-पानी की पार्टी है जो सत्ता की बजाय सिद्धांतों की सियासत करती है। लिहाजा सत्ता पर पूरी बहुमत से कब्जा हो जाने के बाद सिद्धांतों से किनारा किये जाने पर सवाल तो उठेंगे ही। कहां गये वो सिद्धांत जो कहते थे कि देश में एक भी बांग्लादेशी घुसपैठिये को रहने-बसने की इजाजत नहीं दी जाएगी। कहां गयी वह सोच जो समूचे देश के लिये ‘एक प्रधान, एक विधान और एक निशान’ की बात कहती थी। बातें तो गऊ रक्षा की भी की जाती थी और भव्य राममंदिर की भी। लेकिन अब तमाम बातें खुले में रखे कपूर की मानिंद गायब दिख रही हैं। कहने को तो असम के लिये जारी किये गये विजन डाक्यूमेंट में एक बार फिर भाजपा ने दोहराया है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को हर्गिज देश की सरहद में दाखिल नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि अब जबकि केन्द्र की सत्ता संभाले हुए पार्टी को तकरीबन दो साल का वक्त होने जा रहा है तो वह कितने बांग्लादेशियों को असम से खदेड़ कर सरहद के उस पार भेजने में कामयाब हुई है? तरूण गोगोई के शब्दों में जवाब तो सिफर ही है, यानि निल बटा सन्नाटा। ऐसे में अगर पार्टी के ताजा वायदे को विरोधियों द्वारा ‘नये जुमले’ का नाम दिया जा रहा है तो इसमें गलत ही क्या है? कहने को तो अमित शाह ने केवल प्रधानमंत्री के उस वायदे को ही चुनावी जुमला बताया था जिसमें उन्होंने विदेशों में जमा भारतीयों का कालाधन वापस आ जाने के नतीजे में हर किसी के हिस्से में 17 लाख रूपया आने की बात कही थी। लेकिन हकीकत तो यही है कि चुनावी जुमला सिर्फ वही नहीं था। अलबत्ता लच्छेदार भाषा में की गयी संघ परिवार के विचारों व मूलभूत सिद्धांतों से जुड़ी तमाम बातें भी अब जुमलेबाजी सरीखी ही महसूस हो रही हैं। तभी तो पिछले हफ्ते हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रखर राष्ट्रवाद के अलावा उन तमाम मसलों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गयी जो भाजपा की पहचान से जुड़े मुद्दे माने जाते रहे हैं। ना गऊरक्षा की कोई बात हुई और ना ही धारा 370 की। राममंदिर और समान नागरिक संहिता का मसला तो हाशिये पर भी नहीं रहा। उस पर तुर्रा यह कि कार्यकारिणी का औपचारिक समापन करते हुए प्रधानमंत्री ने ‘विकास, विकास और विकास’ के एजेंडे पर ही ध्यान केन्द्रित रखने का निर्देश देते हुए कार्यकर्ताओं को सख्त लहजे में समझा दिया कि वे व्यर्थ के मुद्दों में हर्गिज ना उलझें। अब प्रधानमंत्री ने किन मुद्दों को व्यर्थ बताया यह समझाने में तो गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी उलझकर रह गये। लेकिन अगर जीतेन्द्र सिंह द्वारा धारा 370 का मुद्दा उठाये जाने पर उन्हें चुप करा दिया जाता हो और साक्षी महाराज द्वारा वर्ष 2019 से पूर्व ही अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो जाने का एलान किये जाने पर पार्टी नेतृत्व असहज हो जाता हो तो यह समझने में शायद ही किसी को मुश्किल पेश आएगी कि प्रधानमंत्री ने किन मसलों को व्यर्थ बताने की कोशिश की है। सच तो यह है कि खुद को ‘बीफ भक्षक’ बतानेवाले मंत्रीपद पर शोभायमान हैं और गौमांस को प्रतिबंधित किये जाने की मांग करनेवाले गौभक्तों की टोली को गुजरात के राजकोट में सामूहिक आत्महत्या करने के लिये विवश होना पड़ा है। अलबत्ता अपने मूलभूत सिद्धांतों में शामिल प्रखर राष्ट्रवाद के मसले का झंडा आगे रखते हुए ‘भारत माता की जय’ का नारा अवश्य गुलंद किया जा रहा है लेकिन ना कश्मीर में पाकिस्तान का झंडा लहरानेवाली आसिया अंद्राबी पर कोई सख्ती हो रही है और ना ही 370 की कट्टर समर्थक पीडीपी के साथ साझेदारी की सरकार बनाने में कोई संकोच महसूस किया जा रहा है। बल्कि कश्मीर में कदम रखते ही शायद ‘राष्ट्रवाद’ का मसला भी वैसे ही व्यर्थ हो जा रहा है जैसे केरल व नागालैंड सरीखे सूबों में गऊ रक्षा का मुद्दा। अलबत्ता पूरा जोर है ना सिर्फ सत्ता पर अपनी पकड़ को सलामत रखने पर बल्कि अनछुए इलाकों में अपना विस्तार करने पर भी। ऐसे में वैचारिक व सैद्धांतिक मसले अगर व्यर्थ लग रहे हैं तो यह काफी हद तक वैसा ही है जैसे सवर्णों के वोट को अपनी बपौती जागीर समझकर दलितों व पिछड़ों को लुभाने के लिये पूरी ऊर्जा झोंक दिया जाना। अब इसका नतीजा अगर बिहार जैसा ही रहा तो मुश्किल हो भी सकती है लेकिन फिलहाल तो पार्टी को वैसा कुछ होता हुआ दिख नहीं रहा। लिहाजा सैद्धांतिक मसलों पर जुमलेबाजी की भी जरूरत नहीं समझी जा रही है। लेकिन पेंच उन लाखों भाजपाई कार्यकर्ताओं व स्वयंसेवकों के सामने फंसा हुआ है जो इन तमाम मसलों पर पूछे जानेवाले सवालों का कुछ भी जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं और खुद ही यह सवाल करते हुए महसूस हो रहे हैं कि ‘दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें.....?’ ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

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