शुक्रवार, 18 मार्च 2016

‘सियासी समीकरणों पर हावी जिद का जुनून’

‘सियासी समीकरणों पर हावी जिद का जुनून’

किसी भी लक्ष्य को हासिल करने की पहली सीढ़ी होती है जुनून की हद तक जिद ठानना। लेकिन जिद ठानने से पहले आवश्यक है लक्ष्य का निर्धारण। लक्ष्य ऐसा हो जिसकी शुचिता, प्रामाणिकता, वैद्यता व सर्वस्वीकार्यता भी हो। तभी उसे हासिल करने की राह में कोई अकेला भी निकले तो उसके पीछे लोग जुड़ते हैं और कारवां बनता व बढ़ता चला जाता है। लेकिन अगर लक्ष्य ही ऐसा हो जो नैतिकता, वैधानिकता व व्यवहार्यता की कसौटी पर खरा ना उतरे तो ऐसे लक्ष्य के निर्धारकों के साथी, सहयोगी व समर्थक अधिक दिनों तक एकजुट नहीं रह पाते। नतीजन ऐसे लक्ष्य को हासिल करने के लिये ठानी गयी जिद के कारण भले ही आरंभिक व तात्कालिक तौर पर चैतरफा परेशानियों, समस्याओं व अव्यवस्थाओं का बोलबाला दिखाई दे लेकिन गुजरते वक्त के साथ ऐसे मसलों की जिद लगातार कमजोर होकर आखिरकार अपना अस्तित्व ही खो देती है। यहां तक कि कई बार जिद ठाननेवाले भी अपने लक्ष्य से ना सिर्फ विमुख हो जाते हैं बल्कि अपने ही द्वारा तय किये गये लक्ष्य का कड़ा विरोध करने से परहेज नहीं बरतते हैं। पिछले कुछ दशकों में ही ऐसे कई उदाहरण सामने आये हैं जब पहले तो किसी गलत मसले पर जुनून की हद तक जिद ठानी गयी लेकिन बाद में उस लक्ष्य की कमियों व खामियों से अवगत होने के बाद तयशुदा लक्ष्य की विपरीत दिशा में पहलकदमी करने से परहेज नहीं बरता गया। मसलन जब राजीव सरकार ने कामकाज के कम्प्यूटरीकरण की नींव रखी तो तमाम विरोधी दलों, गैरराजनीतिक संगठनों व सामाजिक संस्थाओं की ओर से इसका भारी विरोध किया गया। दलील दी जा रही थी कि जब इंसानों का काम कम्प्यूटर करने लगेगा तो इंसान क्या करेंगे। लेकिन अब ये हालत है कि कम्प्यूटर का विरोध करनेवाले ही डिजिटल इंडिया के सबसे बड़े पैरोकार बने हुए हैं। यही हालत हुई जब कांग्रेसनीत संप्रग की पिछली सरकार ने सरकारी सब्सिडी का लाभ आधार को आधार बनाकर ही लोगों को दिये जाने का प्रस्ताव रखा। तब तो लोगों की निजता का अधिकार छिन जाने का हौव्वा खड़ा करके ऐसी हाय तौबा मचायी गयी कि आधार को कानूनी व संवैधानिक स्वीकार्यता मिलना भी संभव नहीं हो सका। लेकिन उस दौरान आधार का सबसे प्रबल विरोध करनेवालों की टोली जब सत्ता में आयी तो उसे अपनी सोच बदलनी पड़ी। अब तो वे आधार के इतने प्रबल पैरोकार बनकर सामने आये हैं कि जब उन्हें लगा कि इसके विधेयक को राज्यसभा से पारित कराने में परेशानी हो सकती है तो संसदीय व्यवस्था का सहारा लेकर इन्होंने इसे ‘मनी बिल’ की शक्ल में लोकसभा में पेश कर दिया क्योंकि किसी भी ‘मनी बिल’ को अटकाने, लटकाने, खारिज करने या उसमें संशोधन करने का राज्यसभा को अधिकार ही नहीं है। यानि समग्रता में देखें तो अगर लक्ष्य जनलोकपाल लागू कराने सरीखा हो तो एक सामान्य नौकरशाह के पीछे भी समूचा देश खड़ा हो जाता है और एक ऐसी राजनीतिक पार्टी पैदा होती है जो अपने गठन के डेढ़ साल के भीतर ही 96 फीसदी सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली प्रदेश की सत्ता पर कब्जा कर लेती है। लेकिन अगर लक्ष्य हो सोने पर एक फीसदी एक्साइज ड्यूटी के बजटीय प्रस्ताव को खारिज कराने का तो तत्कालीन विपक्ष की गलत सोच के कारण स्वर्णकारी की आड़ में कालेधन को छिपाने का कारोबार करनेवालों को वर्ष 2012 में भले ही इस मामले में कामयाबी मिल गयी हो लेकिन इस दफा तो काले को सफेद करनेवालों को निराशा ही हाथ आनेवाली है। भले ही उन्होंने आड़ ले रखी हो आम स्वर्णकारों के हितों की लेकिन चुंकि इस व्यवस्था का ना तो ग्राहकों पर कोई असर पड़ना है और ना ही सामान्य मेहनतकश स्वर्णकारों पर। अलबत्ता इससे सोने के पूरे साम्राज्य की जन्म-कुंण्डली सरकार के सामने खुलकर आ जाने के कारण इसमें जारी गोरखधंधे पर नकेल कस जाएगी और कालाधन खपाने का यह रास्ता बंद हो जाएगा लिहाजा शुरूआत में जिन व्यापारी संगठनों ने स्वर्णकारों के आंदोलन को अपना समर्थन दिया था, वे भी अब लगातार पीछे हटते दिख रहे हैं। खैर, जुनून की हद तक ऐसी ही जिद का नजारा दिख रहा है ‘भारत माता की जय’ कहलवाने और गर्दन पर छुरी होने के बावजूद यह नहीं कहने को लेकर। इसमें कायदे से देखें तो अव्वल तो किसी भी भारतवासी की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाना ही बेमानी है और दूसरे इतनी स्वतंत्रता तो सबको मिलनी ही चाहिये कि वह चाहे तो अपने देश के मानचित्र में मां की छवि देखे अथवा अपने महबूब की। अगर किसी का मजहब खुदा के अलावा किसी और का वंदन-पूजन करने की इजाजत नहीं देता तो इसे सम्मानपूर्वक स्वीकार करके उसके दिल से निकली ‘जय हिंद’ और ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ की बुलंद व पुरकशिश आवाज को ही पर्याप्त क्यों ना मान लिया जाये। लेकिन जिद है, तो है। खैर, राजनीतिक लाभ के लिये ठानी जानेवाली ऐसी जिद भले ही तात्कालिक तौर पर स्थापित सियासी समीकरणों पर भारी पड़ जाये लेकिन आखिरकार भारी अफरातफरी के बाद जब इसकी हकीकत सामने आती है तो इसके आधारहीन लक्ष्य का कोई अस्तित्व ही नहीं बचता है। बल्कि ऐसे में शर्मसार होना पड़ता है उन्हें जो बिना आगे-पीछे की हकीकत को पहचाने ही बेतुकी जिद ठान बैठते हैं। लेकिन भले ही बाद में सब कुछ सही हो जाये और पूरे मामले को भुला दिया जाये लेकिन इससे होनेवाले तात्कालिक नुकसान की भरपायी तो नामुमकिन ही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 
@नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

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