‘कौन रोता है किसी और की खातिर ऐ दोस्त.....’
इन दिनों देश का सियासी माहौल ऐसा दिख रहा है मानो हर तरफ आंसुओं की बाढ़ आयी हुई हो। सरकार हो या विपक्ष, सभी टेसुए बहा रहे हैं। यहां तक कि सियासी दलों के गैरसियासी मुखौटों की आंखों से भी आंसुओं की बरसात हो रही है और सामाजिक सरोकारवाले संगठनों की आखें भी सुर्ख पनीली दिख रही हैं। आलम यह है कि ऐसा कोई ढ़ूंढ़े से नहीं मिल रहा जिसके सीने में आग और आंखों में नमी ना हो। जिसकी निगाहों से देखें तो मौजूदा व्यवस्था व हालातों में कहीं कोई कमी ना हो। सरकार अपनी किस्मत को रो रही है और विपक्ष रो रहा है सरकार की करतूतों पर। बाकियों को देश व देशवासियों की बदहाली खाए जा रही है। हमेशा की तरह सबकी सोच यही है कि उसके अलावा बाकी सभी देश को रसातल में गर्क करने पर आमादा हैं। एक वही है जिसने बचाया हुआ है, देश व समाज को टूटने से, डूबने से और लुटने से। कोई भी यह मानने के लिये तैयार नहीं कि वह अपने हित और अपने फायदे के लिये रो रहा है। अलबत्ता स्यापा हर तरफ देशहित का ही हो रहा है। सरकार का गम है कि उसे ऐसे विपक्ष को झेलना पड़ रहा है जो किसी भी मामले में कतई सहयोग करके राजी नहीं है। नतीजन देश के विकास की गाड़ी राज्यसभा की दहलीज से निकल ही नहीं पा रही है। यानि देश की उन सभी समस्याओं को लेकर सरकार रो रही है जिसे वह हल तो कर सकती है लेकिन उसे ऐसा करने नहीं दिया जा रहा है। अब सवाल है कि लोकसभा की लड़ाई के वक्त तो यह बताया ही नहीं था कि जितने वायदे किये जा रहे हैं वे सभी शर्तों के अधीन हैं। शर्त राज्यसभा में बहुमत की, विपक्ष के सहयोग की और विधानसभाओं के चुनाव में जीत की। तब तो ऐसी हवा बांधी थी मानो इनकी सरकार बनी नहीं कि तमाम समस्याएं उड़न-छू। लेकिन जादूई वायदों को जमीन पर उतारने में नाकाम रहने की तोहमत लगने की शुरूआत होने के साथ ही देश के नाम पर रोना-पीटना शुरू कर दिया गया है। दूसरी ओर विपक्ष रो रहा है सरकार की मनमानी पर और उसकी जनविरोधी नीतियों पर। दलील यह कि इससे देश के आम लोगों का जीना दुश्वार हो रहा है और देशहित से जुड़े मसले कमजोर पड़ रहे हैं। सरकार को कोसने और आम लोगों की बदहाली का रोना रोने के क्रम में अपने आंसुओं की बाढ़ में ये उन यादों को जलसमाधि देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं कि अपने राज में इन्होंने देश को किस तरह का ‘रामराज’ दिया था। खैर, अब तो कन्हैया भी कह रहा है कि उसे देश से नहीं बल्कि देश के लिये आजादी चाहिये। आजादी चाहिये भूख से, गरीबी से, बदहाली से, बेबसी से, असमानता से और भेदभाव से। वह भी देश के लिये ही अपना सीना कूट रहा है और आम लोगों की भीषण पीड़ा के संताप में जार-जार रो रहा है। कन्हैया द्वारा जिस सोच व तेवरों का मुजाहिरा किया जा रहा है उससे तो ऐसा ही लग रहा है कि पिछली सरकारों के कार्यकाल में देश का भारी विकास हो रहा था जिसे मौजूदा सरकार ने विनाश की कगार पर पहुंचा दिया है। अब ऐसी सोचवालों को विस्तार से यह तो बताना ही चाहिये कि पिछली सरकार के वक्त उन्हें क्या-क्या सहूलियतें हासिल थीं जो अब नहीं है। लेकिन अपनी सहूलियत बताना जब किसी और को गवारा नहीं हो रहा तो वही क्यों बताये। देश में आजादी सिर्फ अभिव्यक्ति की तो है नहीं, असहज सवालों के जवाब में चुप्पी साधने की भी तो स्वतंत्रता है ही जिसका सबसे बेहतर उपयोग पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हमेशा से करते रहे हैं। खैर, सीना तो सर्राफ भी कूट रहे हैं। वजह है सोने की खरीद-बिक्री पर एक फीसदी एक्साइज ड्यूटी लगा दिया जाना। उन्हें गम है उस आम आदमी के दर्द का जो एक्साईज ड्यूटी बढ़ने के कारण गहने की कीमतों में होनेवाली वृद्धि का शिकार बनेगा। जाहिर है उन्हें रोना तो आएगा ही। लेकिन असली हकीकत यही होती तो कहना ही क्या था। अलबत्ता सच तो यह है कि एक्साइज आयद हो जाने के बाद अब उन्हें यह सच सरकार से साझा करना पड़ेगा कि कब, कहां से कितना सोना आया और गया। यानि सोने की पूरी जन्मकुण्डली होगी सरकार के हाथ में जिस पर कालेधन का काला टीका लगाकर खुद को टैक्स की मार से बचाने की कोई राह ही नहीं बचेगी। इसी प्रकार मनसे सुप्रीमो राज ठाकरे को चिंता है वोट बैंक बचाने की, जबकि रोना रो रहे हैं मराठियों के हितों का और फरमान जारी कर रहें हैं कि गैरमराठियों के आॅटो-टैक्सी को सरेराह फूंक दिया जाये। यानि समग्रता में देखें तो हर रोता हुआ चेहरा यही जता रहा है कि वह अपने लिये नहीं बल्कि देश के लिये रो रहा है। हाय रे देश, हाय रे देशहित। पूरी हाय-हाय देश के लिये। यह हाय-हाय भी ऐसी जिसे दिख कर किसी का भी दिल पिघल जाए, कलेजा कांप जाए, रूदालियों की भी रूलाई फूट पड़े। लेकिन काश इन आंसुओं, स्यापों व चित्कारों की हकीकत वही होती जो दूर से दिखती है। वह नहीं होती जिसे साहिर लुधियानवी के शब्दों में कहें तो ‘कौन रोता है किसी और की खातिर ऐ दोस्त, सबको अपनी ही किसी बात पर रोना आया।’ ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur
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