‘आरक्षण की आग पर राजनीति की रोटी’
कहते हैं कि ‘भीड़ तमाशा करे या भीड़ तमाशाई हो, दांव पर हर हाल में इंसानियत ही होती है।’ वास्तव में इन्हीं पंक्तियों को चरितार्थ किया है हरियाणा में जाट आरक्षण की मांग को लेकर हुए आंदोलन ने। हालांकि यह मांग कहां तक जायज है अथवा किस हद तक आवश्यक है, इस पर अलग से बहस हो सकती है। लेकिन आरक्षण के लिये आंदोलन को ऐसा रूप देना जिसमें पूरा सूबा जल उठे, बीस हजार करोड़ से भी अधिक की निजी व सरकारी संपत्ति स्वाहा हो जाये, दर्जनों लोग झटके में हलाल हो जाएं, हजारों लोग शारीरिक व आर्थिक तौर पर अपंग-अपाहिज हो जाएं, दुकानें लूटी जाएं, मकानों को जलाया जाए, सार्वजनिक संपत्तियों व सुविधाओं का होलिका दहन हो, कानून-व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया जाए और पानी, बिजली व सड़क से लेकर रेलमार्ग को भी ध्वस्त व क्षतिग्रस्त कर दिया जाए, इसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है? हालांकि सवाल यह भी है कि एक नेताविहीन स्वतःस्फूर्त जनाक्रोश की ऐसी वीभत्स अभिव्यक्ति केवल आरक्षण की मांग को लेकर हुई इसे इसे कैसे मान लिया जाये। वैसे भी इस हिंसक, वीभत्स व अमानवीय आंदोलन के कारण चैतरफा बदनामी झेल रहा जाट समुदाय अगर आंदोलन के इस स्वरूप को सही बताने की हिम्मत नहीं दिखा रहा है तो निश्चित ही इसमें कुछ तो ऐसा छिपा हुआ अवश्य है जिसे जाट आरक्षण के आंदोलन की आड़ में दबाया-छिपाया जा रहा है। खैर, चुंकि मामला जाट आरक्षण की मांग से जुडा हुआ है तो इस लिहाज से देखें तो हकीकत यही है कि देश के आठ राज्यों में मौजूद जाटों की आबादी को अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में तो स्थान मिला लेकिन इस सूची में शामिल अन्य जातियों की तरह उन्हें आरक्षण व्यवस्था का पूरा लाभ नहीं मिल सका। खास तौर से मंडल आयोग की जिस रिपोर्ट के तहत केन्द्र की मौजूदा आरक्षण व्यवस्था संचालित हो रही है उसमें ओबीसी के तहत जाटों को मान्यता ही नहीं मिली हुई है। उस सूची में जाट के बजाय जाति का नाम दर्ज है ‘चिल्ला जाट’, जिसका कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं है। दूसरी ओर हरियाणा की पूर्ववर्ती भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में जाटों को विशेष पिछड़ा वर्ग का दर्जा देते हुए उनके लिये सूबे में दस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था तो कर दी लेकिन इस प्रक्रिया में संवैधानिक व कानूनी व्यवस्थाओं का अनुपालन नहीं किया गया और पिछड़ावर्ग आयोग की सहमति नहीं ली गयी जिसके नतीजे में अदालत ने इस व्यवस्था पर रोक लगा दी। यानि समग्रता में देखा जाये तो जाटों के साथ अन्याय तो हुआ ही है। लेकिन सवाल है कि यह अन्याय किया किसने? भाजपा इसके लिये कांग्रेस को दोषी बताती है जबकि कांग्रेस का कहना है कि अगर अदालत में भाजपा की मौजूदा सरकार ने हुड्डा सरकार द्वारा लागू की गयी आरक्षण व्यवस्था का मजबूती से समर्थन किया होता तो उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं होना पड़ता। खैर, अब तो भाजपा भी जाटों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिये कटिबद्ध दिख रही है और इसके लिये पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने वेंकैया नायडू की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति भी बना दी है। लेकिन सियासत यहां भी जारी है। वर्ना आरक्षण का विधेयक जब सरकार को सदन में लाना है तो इसके लिये समिति का गठन पार्टी के स्तर पर क्यों किया गया? साथ ही इस पांच सदस्यीय समिति में हरियाणा के जाट नेताओं के बजाय उत्तर प्रदेश के नेताओं को तरजीह क्यों दी गयी। यानि इतना तो साफ है कि जाटों को आरक्षण देकर भाजपा इसका राजनीतिक लाभ भी उठाना चाहती है। खास तौर से यूपी के विधानसभा चुनाव में जहां पश्चिमी जनपदों में जाटों का समर्थन ही निर्णायक होता है। लिहाजा कांग्रेस का यह आरोप तो विचारणीय ही है कि जाटों के आंदोलन को भाजपा ने ही अपने राजनीतिक लाभ के लिये भड़काया। लेकिन अगर पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा के सलाहकार रहे प्रो. वीरेन्द्र सिंह की बातचीत के आॅडियो टेप में जरा भी सच्चाई है तो इसमें शक की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती है कि इस पूरे आंदोलन की पटकथा कांग्रेसियों ने ही लिखी थी। वैसे भी यह सर्वविदित तथ्य है कि अगर भाजपा के खिलाफ जाट समुदाय आंदोलन की राह पकड़ता है तो इसका सीधा लाभ कांग्रेस व उसके सहयोगी दलों को ही मिलेगा। यानि इस आंदोलन के कारण भारी बदनामी झेल रहे जाटों को आरक्षण का कब, कैसे व कितना लाभ मिलेगा यह तो अभी कोई नहीं बता सकता लेकिन इसमें शायद ही किसी को कोई शक हो कि इस आंदोलन का सियासी लाभ कांग्रेस के खाते में भी जा सकता है और भाजपा के भी। खैर, इस पूरे मामले का एक सुखद पहलू यह भी है कि जाटों ने अब यह बेहतर समझ लिया है कि अपने राजनीतिक लाभ के लिये सियासी दलों ने उनके आंदोलन को ऐसा स्वरूप दे दिया जिसमें इंसानियत की भावना के लिये कोई जगह ही नहीं बची। तभी तो हुड्डा को उनके अपने गृहक्षेत्र में ही भूमिगत होने के लिये मजबूर होना पड़ा है और मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को भी हर जगह हूटिंग झेलनी पड़ रही है। लेकिन अब सांप के गुजर जाने के बाद लकीर पीटने का फायदा ही क्या। जो होना था वह तो हो ही गया और अपने पीछे ऐसी गहरी कालिख छोड़ गया है जिसे अपने दामन से छुड़ाना जाटों के लिये कतई आसान नहीं होगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
@ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur
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