सोमवार, 14 मार्च 2016

‘आधी आबादी के हितों की सियासी पैरोकारी’

‘आधी आबादी के हितों की सियासी पैरोकारी’

चुनावी राजनीति का प्राणवायु तो वोट ही है। लिहाजा राजनीति का वोट केन्द्रित होना लाजिमी ही है। तभी तो राजनीतिज्ञों की हर कथनी और करनी को वोटों के समीकरण से जोड़कर देखे जाने की पुरानी परंपरा रही है। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि हर राजनीतिक दल को मतदाताओं के जिस वर्ग से समर्थन हासिल होने की उम्मीद दिखती है वह उधर ही लुढ़क जाता है। इसके लिये कभी तुष्टिकरण का सहारा लिया जाता है तो कभी एक को निशाने पर रखकर दुसरे को लुभाने की तरकीब आजमायी जाती है। इसी वोटकेन्द्रित राजनीति के कारण विचारधाराएं भी स्थापित होती हैं और सिद्धांत भी। तभी तो कल तक ‘तिलक तराजू और तलवार को जूते चार’ मारने का आह्वान करनेवालों को जब समझ आता है कि सीमित मतदातावर्ग के सहारे असीमित लक्ष्य हासिल कर पाना संभव नहीं है तो वे अपने सिद्धांतों में तब्दीली करके ‘हाथी’ को गणेश व ब्रह्मा, विष्णु, महेश का प्रतीक बताने से भी परहेज नहीं करते हैं। कोई देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक होने की बात करता है तो कोई बहुसंख्यकवाद की राजनीति को नये आयाम तक पहुंचाने की कोशिशों में जुटा दिखता है। यहां दोस्ती भी वोट के लिये होती है और दुश्मनी भी। कभी दुश्मनों के बीच दोस्ती का दिखावा होता है तो कभी दोस्तों के बीच दुश्मनी का। हालांकि अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक और अगड़े-पिछड़े की सियासी धुरी अपनी जगह बदस्तूर कायम है लेकिन लंबे समय से जारी खींचतान के कारण इसमें इतना अधिक घालमेल हो गया है कि अब इसके आकर्षण व चमक में पहलेवाली बात नहीं दिख रही। अब तो पुराने समीकरणों को नये हालातों में प्रभावी तौर पर लागू करना भी बेहद मुश्किल हो चला है। अब ना तो भाजपा पहले जैसी अछूत या मनुवादी है और ना ही राष्ट्रीय राजनीति में अल्पसंख्यक मतों का एकमुश्त ध्रुवीकरण संभव हो पा रहा है। दलित व आदिवासी समाज में भी क्षेत्रीय व सूबाई स्तर पर भारी बिखराव का माहौल है। ऐसे में इन दिनों एक नया प्रयोग उस आधी आबादी को अपने साथ जोड़ने का चल रहा है जिस पर सांप्रदायिक व भावनात्मक सियासी शगूफों का असर सबसे कम होता है और जो खामोशी से मतदान करके पूरा खेल बदल देने की कूवत रखती है। आधी आबादी के वोट की ताकत का एहसास सबसे मजबूत तरीके से पहले मध्य प्रदेश में व बाद में बिहार में सबको हो चुका है। यहां तक कि ओडिशा की स्थायी सरकार को भी इसी आधी आबादी के मजबूत समर्थन से ताकत मिलती रही है। यही वजह है कि इन दिनों महिलाओं का दिल जीतकर उनको अपने पक्ष में लामबंद करने की होड़ सी चल पड़ी है। सूबाई स्तर पर देखें तो महिलाओं का दिल जीतने के लिये बिहार में शराबबंदी का ऐलान करने से लेकर नकली शराब बनानेवालों के लिये मौत की सजा तक का प्रावधान किया जा रहा है। आलम यह है कि कोई सूबा बेटियों को सायकिल बांट रहा है, कोई लैपटाॅप तो कोई वजीफा। कोई लाडली लक्ष्मी योजना चलाकर हर बेटी को लखपती बना रहा है तो कहीं बेटी के जन्म के शगुन से लेकर कन्यादान तक का खर्च वहन करने में भी सरकार सहायक बन रही है। कहीं वृद्ध माताओं को तीर्थाटन कराने की योजनाएं संचालित हो रही हैं तो कहीं राज्य परिवहन की बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा का कूपन बांटा जा रहा है। आलम यह है कि हर प्रदेश का सत्ताधारी दल खुद को सबसे बड़ा महिला हितैषी साबित करने की होड़ में है। स्थानीय चुनावों में महिलाओं के लिये आरक्षण का इंतजाम करने की बात हो या नौकरियों में महिलाओं को प्राथमिकता देने की। हर सरकार बढ़-चढ़कर महिला सशक्तिकरण की राह पर अग्रसर है। यहां तक कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान बताते हैं कि वे अपने सूबे की सभी महिलाओं के भाई हैं और खुद को मामा कहकर संबोधित किया जाना ही पसंद करते हैं। यानि समग्रता में देखें तो देश की आधी आबादी इन दिनों वोट बैंक की राजनीति का नया केन्द्र बनकर सामने आयी है जिसका सहयोग व समर्थन हासिल करने की कोशिशों में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। इसमें दिलचस्प बात यह है कि परंपरागत सियासी हथकंडों व भावनात्मक शगूफों से महिलाओं को बरगलाना संभव नहीं होने के कारण सबोंको अब इन्हें सीधा फायदा पहुंचाने की योजनाएं भी लागू करनी पड़ रही हैं और विकास व सुशासन की राह पर आगे भी बढ़ना पड़ रहा है। तभी तो केन्द्र सरकार के तमाम विभागों ने भी महिलाओं को केन्द्र में रखकर नयी-नयी योजनाओं को जमीन पर उतारना आरंभ कर दिया है। मसलन चूल्हे की कीमत पर गैस का कनेक्शन देने की बात हो या महिला बैंक का विस्तार करने की, सुकन्या समृद्धि योजना का विस्तार करने की, महिला को ही परिवार के मुखिया की मान्यता देने की या महिलाओं को ट्रेन में सीट बदलने की सहूलियत देने की। यहां तक कि विधायिका में आरक्षण देने की कटिबद्धता भी अब स्पष्ट दिख रही है। बहरहाल, वोट बैंक के तौर पर महिलाओं को एक अलग नजरिये से देखे जाने की इस नयी परंपरा से मौजूदा पितृसत्तात्मक समाज को यह तो समझ ही जाना चाहिये कि आगामी दिनों में इस वोट बैंक पर कब्जे का सियासी संघर्ष लगातार तेज होनेवाला है जिसके नतीजे में महिला आरक्षण का विरोध करने के बहाने मुलायम सिंह यादव सरीखे नेताओं द्वारा दी जाती रही दलीलें अब कतई स्वीकार्य नहीं हो सकती हैं। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

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