‘इहां कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं, जे तरजनी देखि मरि जाहीं’
लक्षमण ने तो त्रेतायुग में ही परशुराम के सामने यह घोषणा कर दी थी कि समूचे हिन्दुस्तान में कोई भी कुम्हड़े की उस बतिया सरीखा सुकुमार, कमजोर या डरपोक नहीं है जो तर्जनी उंगली के इशारे से घबरा कर ही अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दे। इसके बावजूद भी पता नहीं क्यों यहां एक दूसरे को धमकाने-डराने की परंपरा सी चली आ रही है। जिसे देखो वही दूसरे को धमकाता दिख रहा है। घरवाले भी एक दूसरे को डराने में लगे हुए हैं और बाहरवाले भी। यहां तक कि सरहद के उस पार से भी धमकाने का सिलसिला जारी है। कभी परवेज मुशर्रफ यह बताकर डराने की कोशिश करते हैं कि पाकिस्तान ने परमाणु बमों का जखीरा शबेबारात के लिये तैयार नहीं किया है तो कभी लश्करे तैयबा का मुखिया हाफिज सईद पाकिस्तान के मिसाइलों की रेंज बताकर धमकाने की कोशिश कर है। अब कोई तो पूछे इनसे कि आपके मुल्क की मिसाइल कहां तक जा सकती है या आपके मुल्क ने परमाणु हथियार किस लिये बनाये हैं, यह तो खुल के बताया जाये तभी पता लगेगा। वर्ना आप शबेबारात में इसका जुलूस निकालो या आतंकवादियों से इसकी हिफाजत करने के लिये अपना दिवाला निकालो इससे किसी को क्या मतलब। रहा सवाल हिन्दुस्तान का तो, इसे जब दुनिया की सबसे बड़ी खुराफाती सैन्य ताकतों में शुमार होनेवाला चीन नहीं डरा पा रहा, तो आपका मुल्क तो वैसे भी हालिया जारी विश्व के दस सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकतों की सूची में गिनने लायक भी नहीं माना गया है। खैर, कहने का तात्पर्य यह है कि वास्तविकता की पूरी जानकारी होने के बावजूद अगर पाकिस्तान की सामरिक औकात के बारे में बड़बोला बयान देकर भारत को डराने-धमकाने का प्रयास किया जा रहा है तो इसकी वजह को तो टटोलना ही पड़ेगा। यह देखना पड़ेगा कि आखिर भारत के साथ ऐसी भाषा में बात करने की हिमाकत क्यों की जा रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी बात करनेवाले यह समझ रहे हैं कि चुंकि हमारे यहां विरोधियों के साथ इसी भाषा में संवाद किया जाता है लिहाजा वे भी हमें उसी भाषा में अपनी बात संप्रेषित करने का प्रयास कर रहे हैं। अगर सरहद पार के लोग ऐसा समझ रहे हैं तो इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। बल्कि वे ऐसा ना समझें तो ही गलत होगा। क्योंकि जब हमारे मुल्क के हैदराबादी सियासी सूरमा यह कहते नजर आते हों कि महज आधे घंटे के लिये पुलिस हटा ली जाये तो देश के 24 करोड़ अल्पसंख्यक तमाम बहुसंख्यकों को सही पाठ पढ़ा देंगे तो पड़ोसी मुल्क के लोग आखिर क्या समझेंगे हमारी भाषा के बारे में? जहां समर्थकों को रामजादा और विरोधियों को हरामजादा बताया जाता हो, जहां एक को सबक सिखाने में कामयाब रहने के बाद दूसरे के ‘दंगल’ में मंगल करने का खुल्लमखुल्ला ऐलान किया जाता हो, जहां सांप्रदायिक नरसंहारों को ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ का नाम दिये जाने की परंपरा हो, जहां बड़ा पेड़ गिरने पर धरती कांपने और कार के नीचे आकर कुचल जानेवाले पिल्ले का उदाहरण देकर अपनी बात रखी जाती हो, जहां विरोधियों के लिये नपुंसक शब्द का इस्तेमाल करने से लेकर प्रधानमंत्री तक को सनकी व पागल बताने से परहेज नहीं बरता जाता हो, जहां सरकार गिराने व बनाने के लिये पड़ोसी मुल्क की खुफिया एजेंसी से सार्वजनिक तौर पर मदद मांगी जाती हो, जहां जननी-जन्मभूमि को डायन बताया जाता हो, जहां सांप्रदायिक आग में सियासी रोटी सेंकने की परंपरा बन गयी हो, और सबसे बड़ी बात यह कि जहां का निजाम ही इस तरह की हरकतें करता हो वहां के बारे में बाहरी लोगों की क्या धारणा बनेगी इसका आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। कहने को तो हमारे मुल्क में कानून इतना सख्त है कि किसी को पंद्रह मिनट तक लगातार घूरने के लिये भी दंड का प्रावधान है, लेकिन यह कितना लागू हो पाता है इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि उदाहरण के तौर पर याद दिलाये जा रहे उक्त कुछ बड़े बयानों पर भी किसी को कोई सजा नहीं सुनायी गयी है। सजा की बात या कानून लागू हो पाने हकीकतों से हटकर भी देखें तो यह जरूरी तो नहीं है कि केवल उतना ही कहने व करने से परहेज बरता जाये जितने के लिये संवैधानिक तौर पर सजा का प्रावधान हो। कुछ परिवार की और कुछ परिवेश की मर्यादा भी होती है और परंपरा भी। लेकिन जहां भाषा में मर्यादा और परंपरा का निम्नतम स्तर लगातार गोते लगाने का रिकार्ड कायम करता दिख रहा हो वहां के विरोधी भी तो वैसी ही भाषा में अपनी बात रखेंगे। वर्ना उनके नजरिये से शायद हम उनकी बात समझ ही ना सकें। अगर ऐसा नहीं होता को बुद्धिजीवियों का एक बड़ा अभिजात्य वर्ग ना तो हाफिज सईद के समकक्ष प्रवीण तोगडि़या को खड़ा करने की जुर्रत करता और ना ही परवेज मुशर्रफ का लहजा हैदराबाद के सियासी सूरमा के सुर से मेल खाता हुआ दिखाई देता। बहरहाल, दुश्मन की गोली का जवाब तो हमारी ओर से गोला दागकर दिया जा सकता है लेकिन उसे बोली में भी परास्त करने की जो प्रतिस्पर्धा घरेलू सियासी मैदान में चल रही है उसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है। तहजीब का तकाजा तो यह है कि ‘हम दुश्मन से भी तू-तड़ाक ना करें, सिर्फ उसे नजरों में गिरा दें।’ ना सिर्फ सबकी नजर में बल्कि उसे उसकी नजर में भी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर
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