शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

भले देर से आये लेकिन दुरूस्त आएगी, आपदा आयी है तो राहत भी आएगी

‘आफत की आमद और राहत का तोहफा’

नवकांत ठाकुर
आफत-आपदा जब भी आती है। जहां भी आती है। उसके साथ जुड़ी होती है राहत की खबर भी। या यूं कहें कि आपदा आयी है तो राहत भी आएगी ही। भले देर से आये लेकिन दुरूस्त आएगी। यह फार्मूला सिर्फ प्राकृतिक आपदा पर ही लागू नहीं होता, सियासी आफत में भी अक्सर ऐसा ही होता है। मसलन इन दिनों देश के जिन शीर्ष नेताओं पर सबसे जबर्दस्त सियासी आफत आयी हुई है उनमें हेराल्ड केस में फंसे गांधी परिवार से लेकर डीडीसीए घोटाले के आरोपों में उलझे अरूण जेटली भी शामिल हैं। साथ ही आपदाग्रस्त नेताओं की सूची में विधानसभा सीट की सौदेबाजी से लेकर राशन घोटाले सरीखे तमाम आरोपों की मार झेल रहे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी हैं और ‘गाली कप्तान को तो गाली भी कप्तान को’ सरीखी दलीलों के तहत दिल्ली के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में भी पार्टी की लुटिया डुबोने के लिये जिम्मेवार माने जा रहे अमित शाह भी। हालांकि इन नेताओं पर आयी सियासी आफत की खबरें तो लगातार सुर्खियों में बनी ही हुई हैं। लेकिन आफत के कारण उन्हें हासिल हो रही राहत के बारे में बहुत कम चर्चा हो रही है। बिल्कुल ना के बराबर। जबकि हकीकत तो यह है कि सियासी आफत के मुकाबले उन राहतों की अहमियत भी कतई कम नहीं है जो इस आफत के कारण ही इन नेताओं को मयस्सर हो रही हैं। मसलन हेराल्ड के मुकदमे में उलझने के बाद से सोनिया व राहुल को जितनी सिरदर्दियों का सामना करना पड़ रहा है वह जगजाहिर ही है। लेकिन इस परेशानी के कारण जमीनी स्तर पर उन्हें व उनकी पार्टी को कितना फायदा मिल रहा है इसकी झलक गुजरात व मध्यप्रदेश के बाद आज सामने आये छत्तीसगढ़ के स्थानीय निकायों के चुनावी नतीजों में भी देखा जा सकता है जहां तीसरे कार्यकाल के बाद अब भाजपा की चूलें हिलती हुई दिखने लगी हैं। तीनों ही सूबों में भाजपा का यह लगातार तीसरा कार्यकाल है। अपनी तरफ से उसने कांग्रेस मुक्त भारत अभियान की शुरूआत यहीं से की थी। लेकिन हालिया दिनों में हुए इन सूबों के स्थानीय निकाय के चुनावों में कांग्रेस ने जिस मजबूती के साथ अपना झंडा गाड़ा है और भाजपा का सफाया होने की शुरूआत हुई है उसमें हेराल्ड केस सरीखे उन मामलों की भूमिका को हर्गिज नकारा नहीं जा सकता है जिसके सामने आने के बाद से गांधी परिवार के प्रति सहानुभूति के बयार की धीमी मगर मजबूत शुरूआत का वातावरण बनने लगा है। ऐसी ही राहत की खबर वित्तमंत्री जेटली के लिये भी है जिनका नाम डीडीसीए के मामले में उछलने के कारण केन्द्रीय मंत्रिमंडल से उनको हटाये जाने की जोरदार मांग उठ रही है। सूत्र बताते हैं कि मकर संक्रांति के बाद केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की पूरी योजना तैयार हो गयी थी और इसमें जेटली से सूचना व प्रसारण मंत्रालय वापस ले लिये जाने की तैयारी थी जिस पर वे वित्त मंत्रालय की व्यस्तताओं के कारण कथित तौर पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। लेकिन डीडीसीए के मामले के तूल पकड़ने के बाद अब जेटली के कार्यभार के साथ छेड़छाड़ की संभावना भी समाप्त हो गयी है क्योंकि ऐसा करने से यही संदेश प्रसारित होगा कि डीडीसीए के आरोपों में फंसने के कारण ही उनके पर कतरे गये हैं। इसी प्रकार आफत के साथ राहत की खबर रमन सिंह के लिये भी आयी है जिनसे छत्तीसगढ़ की एकछत्र सूबेदारी छिनने की संभावना काफी प्रबल दिख रही थी और उन्हें संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में केन्द्र की राजनीति में लाने की योजना बनायी जा रही थी। लेकिन अचानक ही विधानसभा सीट फिक्सिंग के विवाद में उनके दामाद की कथित भूमिका के कारण सीधे तौर पर उनका नाम जुड़ने और चुनाव आयोग द्वारा पूरे मामले की जांच शुरू कर दिये जाने के बाद अब उनके कार्यभार में भी बदलाव की संभावनाएं सिरे से समाप्त हो गयी हैं। खैर, आफत के साथ सबसे बड़ी राहत भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को ही मिलती दिख रही है जिन्हें बिहार की हार का जिम्मेवार मानते हुए संघ व संगठन के भीतर यह बहस जोर पकड़ने लगी थी कि क्यों ना राष्ट्रीय राजनीति से उनकी छुट्टी कर दी जाये और गुजरात की राजनीति में वापस भेज दिया जाये। अगर ऐसा होता तो शाह के लिये इससे अधिक दुर्भाग्य की बात कुछ और नहीं हो सकती थी क्योंकि इतिहास में औपचारिक तौर पर भाजपा अध्यक्ष के रूप में उनका नाम भी नहीं जुड़ पाता। अभी तो वे राजनाथ सिंह के बचे हुए कार्यकाल को ही पूरा कर रहे हैं, उनका अपना औपचारिक स्वतंत्र कार्यकाल तो शुरू भी नहीं हुआ है। लेकिन भला हो आगामी दिनों में होने जा रहे उन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का जिसमें पार्टी के लिये हार का वरण करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं हैं। हार के इस सिलसिले को सामने देखकर वे लोग कतई अध्यक्ष पद की जिम्मेवारी उठाने का हौसला नहीं दिखा रहे हैं जिनको संघ व संगठन से लेकर सरकार तक का विश्वास हासिल है। लिहाजा सिलसिलेवार पराजय की आफत ने शाह के लिये अध्यक्ष पद पर बरकरार रहने की राहत मुहैया करा दी है। खैर, आफत के कारण मिलनेवाली इन राहत की खबरों के बीच इस तथ्य की अनदेखी हर्गिज नहीं की जानी चाहिये कि ऐसी राहतें तात्कालिक ही होती हैं और आफत टलते ही राहत का सिलसिला समाप्त होने का जोखिम हमेशा बना रहता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    

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