‘मित्रता की मिठास में अविश्वास का जहर’
नवकांत ठाकुर
यूं तो हर रिश्ते की बुनियाद विश्वास पर ही टिकी होती है लेकिन मित्रता के मामले में विश्वास की भूमिका कुछ अधिक ही होती है। खून के रिश्तों में कितनी ही दुश्मनी क्यों ना हो जाये लेकिन रक्तसंबंधों में बदलाव नहीं हो सकता। जिसके साथ जो संबंध है वह हमेशा रहेगा ही। भले रिश्ते में मिठास रहे या खटास। लेकिन मित्रता का रिश्ता सिर्फ विश्वास पर ही टिका होता है। विश्वास जितना मजबूत होगा मित्रता भी उतनी ही अटूट होगी। विश्वास की बुनियाद हिलते ही यह रिश्ता सिरे से समाप्त हो जाता है। इन दिनों विश्वास का यही संकट दिख रहा है भारत और नेपाल की मित्रता में। कहने को तो दोनों अलग देश हैं लेकिन बेटी-रोटी का है। भारत से लगती नेपाल की 1700 किलोमीटर लंबी सरहद के दोनों ओर के बाशिंदों को आज तक शायद ही यह महसूस हुआ हो कि इस पार या उस पार में कोई अंतर है। वैसे भी नेपाल को दुनिया के साथ को जोड़ने की कड़ी भी भारत ही है। नेपाल को नमक-तेल से लेकर तमाम जरूरी सामानों की उपलब्धता भारत से ही होती है। भारत में सरकार किसी भी दल या गठबंधन की क्यों ना हो लेकिन नेपाल व नेपालियों को हमेशा हर मामले में अपने अटूट हिस्से सरीखा ही सम्मान व स्थान दिया गया। लेकिन लगता है कि हमारी इस मित्रता पर किसी की बुरी नजर पड़ गयी है। तभी तो नेपाल के संविधान निर्माताओं ने वहां कुछ ऐसी व्यवस्थाएं लागू करने की पहल कर दी है जिसके नतीजे में हर उस नेपाली के हक व अख्तियार में कटौती हो गयी है जिसने भारत के साथ रोटी-बेटी का राब्ता कायम किया हुआ है। हालांकि भारत ने आज तक ना तो कभी नेपाल की संप्रभुता या अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश की है और ना ही भारत की नीतियां ऐसा करने की इजाजत देती हैं। बल्कि भारत तो हमेशा ही नेपाल की एकता, अखंडता व संप्रभुता के रक्षक के तौर पर खड़ा रहा है। लेकिन मसला है कि जब भारत से बहू ब्याह कर लाने पर उसे अगर सात साल तक नागरिकता देने से भी नेपाल का नया संविधान इनकार कर रहा हो तो उसे बेहतरीन व्यवस्था बताकर उसका स्वागत कैसे किया जा सकता है। तभी तो भारत ने नेपाल की इस नयी पहल का सिर्फ संज्ञान लेते हुए इस पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से परहेज बरत लिया है। लेकिन भारत की यह चुप्पी भी नेपाल को सहन नहीं हो रही। वह इसे नकारात्मक समझ रहा है। अब उसे कौन समझाये कि उसके अंदरूनी मामलों को अच्छा या बुरा कहनेवाले हम होते ही कौन हैं। अगर उसने इस पर सलाह मांगी होती तो शायद परिस्थितियां ऐसी नहीं होती कि पूरे तराई इलाके में संविधान को जलाया जा रहा होता या तमाम मैदानी बाशिंदे आंदोलन पर उतारू होते। लेकिन नेपाल के नये संविधान के निर्माण में भारत की भूमिका सिर्फ इतनी ही है कि उसे लोकतांत्रिक व्यवस्था व एक लिखित संविधान लागू करने के लिये इस तरफ से हमेशा प्रोत्साहित किया जाता रहा है। खैर, नेपाल के नेताओं को पता नहीं मित्रता की मिठास का जायका बदलने के लिये चीन का कौन सा स्वाद रास आ गया है कि वे इन दिनों अपने दोनों बड़े पड़ोसियों के साथ बराबर का संतुलन साधने का राग आलापने लगे हैं। जाहिर तौर पर यह चीन की ही खुराफात है कि उसने नेपाल में यह भ्रम फैला दिया है कि नये संविधान का विरोध करने के लिये तराई के मधेसियों को भारत ही भड़का रहा है और मधेसी आंदोलन के कारण ठप्प पड़ी ट्रकों की आवाजाही वास्तव में भारत द्वारा की गयी आर्थिक नाकेबंदी का नतीजा है। भारत के प्रति फैलाये गये भ्रम का ही नतीजा है कि नेपाल में 42 भारतीय टीवी चैनलों का प्रसारण प्रतिबंधित कर दिया गया है और सिनेमाघरों में हिन्दी फिल्म दिखाने पर भी रोक लगायी जा रही है। इसके पीछे वजह बतायी जा रही है भारत की उस कथित नीति को जिससे नेपाल की एकता, अखंडता व संप्रभुता को खतरा उत्पन्न हो रहा है। अब इस बेसिर-पैर की गलतफहमी पर क्या कहा जा सकता है। लेकिन मसला है कि इस मामले में चुप भी नहीं बैठा जा सकता क्योंकि भारत व नेपाल के बीच गलतफहमी का बीज बोकर चीन अपनी जड़ें जमाने में जुट गया है। जाहिर है कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। ना सिर्फ भारत के लिये बल्कि इससे कहीं अधिक नेपाल के लिये जिसकी सत्ता का संचालन कर रहे नेताओं को चीन की चालबाजियां या तो समझ नहीं आ रहीं या वे जानबूझकर नासमझी का ढ़ोंग कर रहे हैं। तभी तो वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हा को खुले तौर पर प्रधानमंत्री से यह अपील करनी पड़ी है कि वे नेपाल के मसले की अनदेखी ना करें और दोनों देशों के रिश्तों की प्रगाढ़ता में कमी आने से पहले ही नेपाल में व्याप्त भ्रम, गफलत व गलतफहमी को दूर करने की ठोस पहल करें। हालांकि नेपाल की नियति आज उसे जिस मोड़ पर ले आयी है उसके लिये पूरी तरह उसकी अपनी नीतियां ही जिम्मेवार हैं लेकिन कोई दुश्मन अगर हमारे सगे भाई को भड़का रहा हो और उसे गलत राह पर ले जा रहा हो तो अपने मासूम भाई को उसके हाल पर छोड़कर सिर्फ ‘तेल देखो और तेल की धार देखो’ की नीति पर अमल किये जाने को कैसे उचित कहा जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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