सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

‘काश जनता को दे सुनाई, सफाई और दुहाई’

नवकांत ठाकुर
अपने चरम की ओर अग्रसर हो रहे बिहार के चुनाव की ताजा तस्वीर का सबसे अनोखा पहलू है सफाई और दुहाई का। मान्यता यही है कि रक्षात्मक अवस्था को अंगीकार कर लेनेवाले खेमे से ही सफाई और दुहाई का स्वर सबसे अधिक मुखर होकर निकलता है। लेकिन बिहार में सफाई और दुहाई भी सबसे अधिक उसी भगवा खेमे से निकल रही है जो अति आक्रामक तेवर और कलेवर के साथ पूरे चुनाव अभियान में पिला हुआ है। एक ओर तो यह खेमा ऐसी अति आक्रामकता का परिचय दे रहा है कि बिहार में उसे जीत नसीब नहीं हुई तो मानो अनर्थ हो जाएगा। तभी तो इस खेमे के चारों घटक दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों ने अपने पूरे राष्ट्रीय संगठन, लाव-लश्कर व दल-बल के साथ पिछले एक महीने से पटना में ही अपना डेरा जमाया हुआ है और पूरा चुनाव निपटने तक वे सभी वहीं डटे रहनेवाले हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री से लेकर तमाम राजग शासित सूबों के मुख्यमंत्रियों को ही नहीं बल्कि केन्द्र सरकार के भी तमाम शीर्ष संचालकों व मंत्रियों से लेकर सांसदों को भी बिहार में पूरी तरह झोंक दिया गया है। रही सही कसर पूरी करने के लिये सिनेमाई सितारों को भी जमीन पर उतारने में कोताही नहीं बरती जा रही है। आलम यह है कि दिल्ली के सियासी गलियारों में सत्ता पक्ष इस कदर नदारद दिख रहा है मानों राष्ट्रीय राजनीति की ही नहीं बल्कि देश की राजनीतिक राजधानी की भी विस्तारित शाखा पटना में स्थापित हो गयी हो। भगवा खेमे की ओर से ऐसी आक्रामकता का मुजाहिरा किया जा रहा है कि तमाम सियासी गतिविधियां बिहार से शुरू होकर बिहार पर समाप्त हो जा रही हैं। बिहार ही ओढ़ना, बिहार ही बिछाना। बिहार ही सुनना, बिहार ही सुनाना। बिहार से बाहर कुछ दिख ही नहीं रहा। ऐसे में कायदे से तो विरोधी पक्ष की बोलती बंद हो जानी चाहिये थी। उसकी बातें नक्कारखाने में बजनेवाली तूती की मानिंद गुम होकर रह जानी चाहिये थी। उसकी बातों पर तो किसी का कान या ध्यान टिकना ही नहीं चाहिये था। लेकिन हो रहा है बिल्कुल उल्टा। सवाल उठा रहे हैं विरोधी और जवाब देने में गड़बड़ हो रही है भगवा खेमे को। पूरी ऊर्जा सफाई और दुहाई देने में ही खप जा रही है। हालांकि चुनाव अभियान की शुरूआत में तो राजग विरोधी महागठबंधन ही सफाई पेश करता दिख रहा था। लेकिन यह स्थिति तब तक थी जब तक आरोप-प्रत्यारोपों की जुबानी गेंदबाजी विकास और सुशासन के पिच पर हो रही थी। शुरूआती कुछ ओवरों के बाद जैसे ही पिच का मिजाज बदला और विकास व सुशासन की नमी सूखने के बाद मर्यादा की परत टूटते ही निजी आक्षेपों के अलावा जातिगत व सांप्रदायिक सियासत की धूल उड़नी आरंभ हुई वैसे ही सफाई व दुहाई की रक्षात्मक बैटिंग करके अपना विकेट बचाये रखना भगवा खेमे की मजबूरी बनती चली गयी। आखिरकार नौबत यहां तक आ पहुंची है कि महंगाई का मसला उठने पर भी सफाई आती है भगवा खेमे से कि नितीश सरकार की नीतियों के कारण ही दाल महंगी हुई है। दुहाई यह कि केन्द्र करे भी तो क्या करे। लेकिन लगे हाथों जब नहले पर दहले के तौर पर पूछ लिया जाता है कि बाकी सूबों में भी दाल महंगी क्यों है तो  समूचा भगवा खेमा सारा काम छोड़कर बस सफाई और दुहाई देने में जुट जाता है। मसला कुछ भी क्यों ना हो, सफाई और दुहाई भगवा खेमे से ही सुनाई देती है। आरक्षण पर संघ प्रमुख के बयान से उपजे विवाद पर सफाई, प्रधानमंत्री के डीएनएवाले बयान पर सफाई, केन्द्रीय मंत्री द्वारा दलित की तुलना कुत्ते से किये जाने के विवाद पर सफाई, सूबे में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित नहीं करने के मसले पर सफाई, पटना में प्रधानमंत्री व पार्टी अध्यक्ष की होर्डिंग हटाये जाने पर सफाई, प्रधानमंत्री की रैलियों में कटौती किये जाने पर सफाई, गौमांस के मसले पर अनवरत जारी बतकहियों पर सफाई, गैरमराठी भाषियों के प्रति महाराष्ट्र सरकार की नीतियों पर सफाई, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास करने के इल्जामों पर सफाई, भाजपाशासित राज्यों में मौजूद कमियों व खामियों पर सफाई, कालेधन के सवाल पर सफाई, हरित व गुलाबी क्रांति के बवाल पर सफाई। मौजूदा दौर की समस्याओं पर सफाई, अच्छे दिन के वायदों पर सफाई। सत्ता के संचालन की रीति पर सफाई, कथित विफल विदेशनीति पर सफाई। हर बात पर दुहाई, बात बात पर सफाई। अब तो हालत यह हो चली है कि भगवा खेमे से निकलनेवाली अधिकांश बातें दुहाई से आरंभ होकर सफाई पर ही समाप्त हो रही हैं। लेकिन मसला यह है कि अभी तो सूबे की महज एक तिहाई सीटों पर ही मतदान पूरा हुआ है, दो-तिहाई सीटों की अग्निपरीक्षा बाकी ही है। तीन चरणों का मतदान बाकी है। यानि अभी तो असली काम बाकी है। सीमांचल-मिथिलांचल में मोदी लहर की निष्क्रियता की चुनौती से निपटना है। दलित वोटों के अपने ठेकेदारों की अहम की लड़ाई को सुलटाना है। जनता को विरोधियों के खिलाफ भड़काना है। बिहार में परिवर्तन के लिये जनोन्माद पनपाना है। अपनी जरूरत जनता को जतानी है, विरोधियों की कमियां व खामियां लोगों को बतानी है। जाहिर है कि चुनाव अभियान के असली चरम का दौर अभी बाकी ही है। ऐसे में सफाई और दुहाई में उलझने के बजाय विरोधियों पर पूरी ऊर्जा के साथ चढ़ाई करने में बरती जा रही कोताही का नतीजा बेहद नकारात्मक भी साबित हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

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