‘‘सब्र...., आखिर कब तक....???’’
एक बार फिर सुंजवां में वही हुआ जो पहले पठानकोट और उड़ी में हो चुका था। सरहद पार कर आतंकी आए और उन्होंने आर्मी कैंप पर धावा बोल दिया। अंदर घुसकर तबाही मचाने की कोशिश की और ऐसी जगह पोजीशन लेकर बैठ गए जहां से लंबे समय तक सुरक्षा बलों को छकाया जा सके। वैसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें मार डालने में हमारे सुरक्षा बल हर बार कामयाब हो जाते हैं। अलबत्ता फर्क इस बात से पड़ता है कि उनसे निपटने में हमारे फौजियों को भी जान से हाथ धोना पड़ता है और सरहद के भीतर उन्हें शांतिकाल में शहादत देने के लिए विवश होना पड़ता है। इस वारदात को अंजाम देने के लिए उस तारीख का चयन किया जाना संकेतों में बहुत कुछ बता रहा है जिस दिन पांच साल पूर्व संसद हमले के आरोपी अफजल गुरू को फांसी दी गई थी। ऐसे में हमले के लिए आज की तारीख का चयन करने के पीछे की सोच और मकसद को भी समझने की जरूरत है। जिस वारदात को पाकिस्तानी आतंकी मनचाहे समय व तारीख पर अंजाम देने में सक्षम हैं उस हरकत को तो मौका मिलते ही कभी भी अंजाम दिया जा सकता था। फिर इसके लिए इस तारीख का चयन करने की आखिर क्या जरूरत थी? वास्तव में देखा जाए तो अफजल गुरू का मामला बेहद ही विचित्र है। कहीं ना कहीं उसको महिमामंडित करने का काम हमारी सियासत ने भी किया है और प्रचार के भूखे उन बुद्धिजीवियों ने भी जिनकी नजर में धर्मनिरपेक्ष होने के लिए मुस्लिम परस्त और हिन्दू विरोधी होना निहायत ही आवश्यक है। कहीं ना कहीं अफजल के बारे में यह मान लिया गया कि उसे देश के अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल है और इसी वजह से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसे फांसी पर चढ़ाए जाने का आदेश दे दिये जाने के बावजूद पहले तो सालों तक आदेश के अनुपालन को व्यवस्थागत पेंचो-खम में बुरी तरह उलझा कर रखा गया और बाद में जब उसे फांसी से बचाने का आरोप लगने पर तत्कालीन संप्रग सरकार की छवि खराब होने लगी तब कहीं जाकर उसे लटकाने की पहल की गई। लेकिन दूसरी ओर अफजल के कई प्रबुद्ध और नामचीन बुद्धिजीवी हिमायतियों ने उसे फांसी के फंदे से बचाने के लिए अंतिम समय तक अपनी कोशिशें जारी रखीं और इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय को ऐतिहासिक तरीके से रात के दो बजे सुनवाई करनी पड़ी। यहां तक कि अफजल को हीरो बनाने का प्रयास उसे फांसी दिए जाने के बाद भी जारी रहा और उसकी फांसी के बाद कई दिनों तक कश्मीर घाटी सुलगती रही, कफ्र्यू लगाना पड़ा और विरोध प्रदर्शनों में कई मौतें भी हुईं। अफजल के महिमामंडन का यह सिलसिला आज भी जारी है और जेएनयू जैसे संस्थान में ‘तुम कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’ का नारा बुलंद होता रहता है और ऐसा करने वालों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए देश के कई बड़े राजनेता व बुद्धिजीवी सामने आते रहते हैं। बेहद स्वाभाविक है कि भारत के भीतर अफजल को लेकर होने वाली इन गतिविधियों पर पाकिस्तान की भी पैनी निगाहें लगी रही हैं जो पैदा होने के बाद से ही भारत के टुकड़े करने के लिए मरा जा रहा है। ऐसे में अफजल की बरसी के मौके को आतंक के शोलों से सजाने का मौका भला वह कैसे चुक सकता था वह भी तब जबकि उसे लगता है कि सोपोर के मूल निवासी अफजल के लिए ना सिर्फ कश्मीर घाटी में बल्कि देश की काफी बड़ी जमात के दिलों में भी भारी हमदर्दी है। पाक का यह नापाक अंदाजा कितना गलत है इसकी मिसाल तो अफजल के बेटे ने ही यह कह कर दे दी है कि वह हर्गिज अपने बाप की तरह भारत विरोधी नहीं हो सकता है। इसके बावजूद पाकिस्तान यह दुस्साहस दिखा रहा है कि भारत के भीतर आतंकियों को घुसाकर एक ओर दहशत का माहौल बनाया जाए, भारतीय सुरक्षा व्यवस्था को अधिकतम नुकसान पहुंचाया जाए और अफजल के कथित हमदर्दों को दोबारा जगाया जाए। ऐसे में लाजिमी है कि अब सब्र दिखाने का कोई मतलब नहीं रह गया है। बल्कि हमारे सब्र को अब अगर वह हमारी कमजोरी समझ ले तो इसमें उसकी कोई गलती नहीं होगी, क्योंकि भारत के आम लोगों को भी सब्र के इस प्रदर्शन से राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमजोरी का ही एहसास हो रहा है। आज ही सीरिया में इजरायल के एक एफ-16 विमान को ईरान ने गिराया तो बदले में इजरायल ने सीरिया के 16 ठिकानों को भारी बमबारी से ध्वस्त कर दिया। वह भी इसलिए क्योंकि सीरिया से लगती इजरायल की सीमा के भीतर एक ईरान निर्मित द्रोण घुस आया था जिसका संचालन सीरिया की जमीन से हो रहा था। उसी संचालन केन्द्र को ध्वस्त करने के लिए भेजे गए एफ-16 पर हमला किए जाने से चिढ़ कर इजरायल ने सीरिया के 16 महत्वपूर्ण सामरिक ठिकानों को जमींदोज कर दिया। स्वाभाविक है कि इस कड़े सबक के बाद सीरिया और ईरान की हिम्मत ही नहीं होगी कि वह इजरायल की ओर आंख उठा कर देखने की जुर्रत भी करे। काश इजरायल से दोस्ती के एवज में ऐसी हिम्मत, मर्दानगी और इच्छा शक्ति भी हमारी सरकार उससे थोड़ी देर के लिए उधार ले पाती तो पूरी तस्वीर का रूख चुटकियों में बदला जा सकता था। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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