‘गैर कहें तो है गाली पर अपनों की है कव्वाली?’
नवकांत ठाकुर
सियासत के रंग भी निराले हैं। विरोधी अगर कुछ कहे तो वह हो जाती है गाली। लेकिन वही बात अपने साथी व समर्थक कहें तो वह हो जाती है सुरीली कव्वाली। मसलन विरोधी दलों द्वारा कांग्रेसी सांसदों के सदन से निलंबन को लोकतंत्र की हत्या बताये जाने से बिफरे सत्तापक्ष द्वारा कांग्रेस को याद दिलाया जा रहा था कि उसने अपने शासनकाल में कितने सांसदों को कब-कब निलंबित किया और किस तरह देश पर आपातकाल लागू करके उसने लोकतंत्र की हत्या की। दलील दी गयी कि पिछले ग्यारह दिनों से सदन में जारी भारी कोहराम के मद्देनजर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा था। लेकिन अब जबकि विपक्षी सांसदों के निलंबन पर भाजपा के ही शत्रुघ्न सिन्हा सरीखे सांसदों ने दुख व तकलीफ जताने की पहल की है तो सरकार के सुर पूरी तरह बदले हुए दिख रहे हैं। पहले तो शत्रुघ्न के बयान पर केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यह कहते हुए चुप्पी साध ली कि उन्होंने आजतक ना तो कभी शत्रुघ्न के किसी बयान पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर की है और ना भी वे अब ऐसा करने की सोच सकते हैं। लेकिन संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू से जब इस बारे में प्रतिक्रिया मांगी गयी तो उनका सुर पूरी तरह बदला हुआ था। वेंकैया ने शत्रुघ्न के बयान को जायज करार देते हुए यहां तक कह दिया कि विपक्षी सांसदों के निलंबन से न सिर्फ वे बल्कि समूचा सत्ताधारी खेमा दुखी है। वेंकैया के मुताबिक सदन में विपक्ष की अपनी अलग अहमियत है और उसे दरकिनार करके संसद को सुचारू ढ़ंग से संचालित करने के बारे में सोचना भी उचित नहीं है। खैर, अब सवाल यह है कि समूचे विपक्षी खेमे की ओर से कही जानेवाली जो बात सरकार को गैरवाजिब व नागवार गुजर रही है वही अगर सत्ता पक्ष के सांसद कह रहे हों तो वह जायज कैसे हो सकती है। कायदे से तो जायज बात जायज और नाजायज बात नाजायज ही होनी चाहिये। भले वह बात किसी की भी जुबान से क्यों ना निकले। लेकिन सियासत का दस्तूर ही ऐसा है कि अपने लोगों की बात हमेशा सही ही महसूस होती है। तभी तो भूमि अधिग्रहण विधेयक में किये जानेवाले बदलावों के विरोध में समूचे विपक्ष द्वारा संसद से लेकर सड़क किया जानेवाला हंगामा सरकार की नजर में विकास विरोधी सोच का परिचायक था लेकिन वही बात जब भारतीय मजदूर संघ सरीखे सहोदर संगठनों से लेकर अकाली दल व शिवसेना सरीखे साथी दलों ने दुहराई तो सरकार को दुबारा इस मसले पर पुनर्विचार करने के लिये मजबूर होना पड़ा। अब इस विधेयक में तमाम उन बातों को जोड़ने के लिये सरकार सहमत दिख रही है जिसकी मांग समूचा विपक्ष शुरू ही से करता आ रहा है लेकिन सरकार यह मानने के लिये कतई तैयार नहीं है कि विधेयक के प्रारूप में बदलाव की बुनियाद विपक्ष के पुरजोर विरोध के कारण तैयार हुई है। सत्तापक्ष की दलील है कि विपक्ष तो विकास को बाधित करने के लिये विधेयक में किये जा रहे बदलावों का विरोध कर रहा था जबकि उसके अपने सहोदरों, समर्थकों व सहयोगियों ने जो बदलाव सुझाए हैं उसे इसलिये माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने विधेयक पर सर्वानुमति बनाने के लिये ऐसा करने की सलाह दी थी। यानि विपक्ष की दलीलें तो सरकार को गाली सरीखी महसूस हो रही थीं लेकिन वही बात जब अपनों ने कही तो वह सत्तापक्ष के लिये कव्वाली सरीखी सुरीली बन गयी। तभी तो संयुक्त संसदीय समिति द्वारा विधेयक में सुझाये गये बदलावों को स्वीकार करने की राह पर आगे बढ़ रही सरकार ने इन बदलावों का श्रेय विपक्ष को देने के बजाय अपने साथियों को देने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। खैर, ऐसी ही तस्वीर सरकार के शीर्ष रणनीतिकारों के रवैये को लेकर की गयी टिप्पणियों के मसले पर भी देखी गयी जब जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने सरकार पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा अमल में लायी गयी आमसहमति व सबको साथ लेकर चलने की नीति से भटकने का आरोप लगाया तो सत्तापक्ष की त्यौरियां चढ़ गयीं लेकिन वही बात जब भाजपा के वरिष्ठतम मार्गदर्शक लालकृष्ण आडवाणी ने कही तो सबको सांप सूंघ गया। आडवाणी की बात पर औपचारिक तौर पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की पहल तो किसी ने नहीं की अलबत्ता अनौपचारिक तौर पर यही बताया गया कि आडवाणी ने सरकार का अभिभावक होने के नाते जो बात कही है उसमें स्नेह व सहानुभूति ही छिपी हुई है। यानि शरद कोई बात कहें तो वह गाली और वही बात आडवाणी दोहराएं तो कव्वाली? ऐसे कई मामले है जो यह बता रहे हैं कि विरोधियों की बातों को सकारात्मक नजरिये से सुनना व गुनना कतई गवारा नहीं किया जा रहा है। साथ ही अपनों की बातों में कुछ भी नकारात्मक महसूस नहीं किया जा रहा है। जाहिर है कि विरोधियों की गाली जब अपनों की जुबानी कव्वाली सुनाई दे रही हो तो लाजिमी तौर पर इसके पीछे वह सियासी मजबूरी ही छिपी हुई है जिसके तहत अपनों की बातों पर नकारात्मक प्रतिक्रिया देने पर भारी फजीहत व छीछालेदर होने की संभावना काफी प्रबल हो जाती है। लेकिन सवाल यह है कि विपक्ष के प्रति इस कदर अविश्वास, नकारात्मकता व पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहकर सबको साथ लेकर चलने का जो दिखावा किया जा रहा है उसकी अंदरूनी हकीकत को कैसे व कब तक छिपाया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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