गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

‘सतह पर आने के बाद जड़ों की तलाश’


जिस दरख्त को वक्त की आंधी ने अर्श से फर्श पर पटक दिया हो उसके पास दो ही विकल्प बचते हैं। या तो वह दोबारा हिम्मत, ऊर्जा और जोश को एकत्र कर दोबारा खड़े होने के लिए कमर कसे या फिर जड़ों को कमजोर करनेवाली कमियां, खामियां और बीमारियां दुरूस्त करे ताकि मजबूत जड़ों के सहारे आसमान छूने के सफर की मजबूत शुरूआत की जा सके। इस लिहाज से देखें तो भारतीय राजनीति में कांग्रेस को इतना बुरा वक्त पहले कभी नहीं देखना पड़ा जैसा मौजूदा दौर में भुगतना पड़ रहा है। दशकों तक पूरे देश की पंचायतों, स्थानीय निकायों व प्रदेशों से लेकर पार्लियामेंट तक में जिस कांग्रेस की तूती बोलती थी उसकी अधोगति का आलम यह है कि इस समय उसकी झोली में सिर्फ तीन राज्य (पंजाब, कर्नाटक व मिजोरम) और एक केन्द्र शासित प्रदेश पुदुचेरी ही शेष है। प्रादेशिक स्तर पर गौर करें तो देश के सबसे ताकतवर सियासी सूबे उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कांग्रेस के पास इतने विधायक भी नहीं हैं कि एक अदद राज्यसभा की सीट पर पार्टी अपना कब्जा जमा सके। पंजाब को छोड़ दें तो पूरे उत्तर व मध्य भारत में कांग्रेस का सफाया हो चुका है और दक्षिण में भी उसकी हालत महज उपस्थिति दर्ज कराने भर की ही बची है जबकि मिजोरम पर शासन के नाते नाम भर को पूर्वोत्तर में कांग्रेस का एक पांव जमा हुआ है। अलबत्ता देश के पश्चिमी सूबों में सत्ता से बेदखल होने के बावजूद मजबूत विपक्ष के नाते पार्टी ने गिनाने भर को अपनी मजबूत पकड़ अवश्य बरकरार रखी हुई है। यानि समग्रता में देखें तो पार्टी ऐसी स्थिति में पहुंच चुकी है जहां से अगर वह नहीं संभल पायी तो कांग्रेस का नाम सिर्फ किताबों में ही सिमट कर रह जाएगा। यही वजह है कि कर्नाटक के चुनाव को लेकर कांग्रेस भी जान और मान रही है कि यह उसके अस्तित्व की लड़ाई है। लेकिन कहते हैं कि राजनीति असीमित संभावनाओं को संभव कर दिखाने का ऐसा खेल है जिसमें किसी भी संभावना को किसी भी वक्त कतई खारिज नहीं किया जा सकता है। इसी आस और उम्मीद से कांग्रेस ने भी एक नयी शुरूआत करके अगले साल होने जा रहे लोकसभा चुनाव के महासंग्राम में एक बार फिर विजय पताका लहराने के लिए कमर कसना शुरू कर दिया है। हालांकि पार्टी की जो मौजूदा दुर्दशा दिख रही है काफी हद तक वैसे ही जनविरोध का सामना इसे तब भी करना पड़ा था जब आपातकाल के बाद के दौर में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को मतदाताओं ने खारिज कर दिया था। लेकिन उस दौर में प्रादेशिक स्तर पर मौजूद विश्वसनीयता व मजबूती की बदौलत कांग्रेस अपने बुरे वक्त से बहुत ही जल्दी उबर गई थी। लेकिन इस बार जो बुरा वक्त आया उसमें पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को संभलने के लिए प्रदेशिक स्तर से भी सहायता नहीं मिल पाई और केन्द्र में पार्टी के हाथों से सत्ता फिसलने के बाद जमीनी स्तर पर पर भी पार्टी की कमर टूट गई। लेकिन अब इतिहास से सीख लेते हुए कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से खड़े होने के लिए प्रादेशिक समीकरणों को साधने को प्राथमिकता देने की राह पकड़ी है। दरअसल प्रादेशिक स्तर पर पार्टी के बिखरने की सबसे बड़ी वजह अंदरूनी गुटबाजी और चरण-वंदन की परंपरा रही जिसके कारण नए नेतृत्व को उभरने का मौका नहीं मिल सका और पुराने नेतृत्व की खो चुकी धार व फीकी पड़ चुकी चमक का खामियाजा संगठन को शिकस्त के रूप में भुगतना पड़ा। ऐसा ही राजस्थान में भी हुआ और मध्य प्रदेश में भी। छत्तीसगढ़, हिमाचल, उत्तराखंड और महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक तक में पार्टी की पतली हालत की वजह कमोबेश एक जैसी ही रही। लेकिन राहुल गांधी द्वारा प्रादेशिक स्तर पर संगठन की समस्यों को सुलझाने और विभिन्न गुटों का तुष्टीकरण करने बजाय सबको किसी एक का नेतृत्व स्वीकारने के लिए मनाने-समझाने का ही नतीजा रहा कि पंजाब में पार्टी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने में सफलता मिल सकी और गुजरात में भी भाजपा को सौ सीटों के भीतर सिमटने के लिए विवश होना पड़ा। गुजरात और पंजाब में कामयाबी के बाद अब अन्य प्रदेशों में भी पार्टी को इसी तरीके से दोबारा अपने पांव पर खड़ा करने की कोशिश शुरू हो गई है। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने संगठन महामंत्री के पद पर जनार्दन द्विवेदी के स्थान पर अशोक गहलोत की नियुक्ति की है ताकि केन्द्रीय संगठन को प्रादेशिक भावना के अनुरूप गढ़ा जाए और प्रदेश इकाई के मतभेदों को दूर करके एक सशक्त, मजबूत, भरोसेमंद और युवा स्थानीय चेहरे को सर्वसम्मति से आगे बढ़ाने की राह आसान हो सके। यही फार्मूला जल्दी ही उत्तर प्रदेश में भी आजमाया जाएगा और मध्य प्रदेश में भी। दरअसल बीते दिनों दिल्ली में हुए कांग्रेस महाधिवेशन में मुख्य मंच को पूरे वक्त खाली रखकर केन्द्रीय नेतृत्व को भी प्रादेशिक नेतृत्व के साथ पंक्तिबद्ध करके बिठाकर स्पष्ट संकेत दे दिया गया है कि पार्टी दिल्ली के दिशा-निर्देशों से संचालित नहीं होगी बल्कि जमीन से उठनेवाली हवा ही पार्टी की दशा-दिशा और रीति-नीति तय करेगी। ऐसे में स्वाभाविक है कि जब केन्द्र में प्रदेश की भावना का ध्यान रखा जाएगा तो स्वाभाविक तौर पर प्रदेश से पार्टी के लिए शुभ समाचार ही समाने आएगा और सत्ता का सूखा समाप्त होने की संभावना बनते देर नहीं लगेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

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