‘विरासत की सियासत में काबिलियत की जरूरत’
‘पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भले ही अलग-अलग पार्टियों की जीत हुई हो लेकिन हार तो हर जगह कांग्रेस की ही हुई है।’ यह कहते हुए फूले नहीं समा रहे हैं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह। अब शाह की यह बात कांग्रेस को भले ही जले पर नमक सरीखी जलन व चुभन दे रही हो लेकिन बात में दम तो है ही। कायदे से देखा जाये तो मौजूदा हार को स्वीकार करते हुए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने एक बार की हार से दुनियां समाप्त नहीं होने की जो दलील दी है इसके अलावा वे कह भी क्या सकती हैं? पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं को यह दिलासा दिया जाना भी स्वाभाविक है कि आनेवाला भविष्य कांग्रेस का ही है और जल्दी ही पार्टी की जीत का सिलसिला फिर शुरू हो जाएगा। लेकिन मसला है कि अगर हार के कारणों पर विचार करते हुए मौजूदा चुनौतियों व जरूरतों के प्रति बदस्तूर शुतुमुर्गी रवैया अपनाने का सिलसिला जारी रखा जाएगा तो पार्टी की गाड़ी जीत की पटरी पर लौटेगी कैसे? इसके लिये आवश्यकता तो है अपनी कमजोरियों को पहचानने और उसमें सुधार लाने की। लेकिन इस दिशा में गंभीरता से विचार करने से यथावत परहेज बरते जाने का मतलब तो यही है कि बीमारी का एहसास तो सबको है लेकिन उसे स्वीकार करके उसमें सुधार करने की हिम्मत किसी में नहीं है। खास तौर से कट्टर कांग्रेसियों की जमात भले इस सच को स्वीकार करने की जहमत नहीं उठा रही हो लेकिन हकीकत यही है कि कांग्रेस में जब से राहुल गांधी का युग आरंभ हुआ है तब से पार्टी की सफलता का ग्राफ लगातार ढ़लान पर ही लुढ़कता जा रहा है। यहां तक कि पिछले दो सालों में हुए ग्यारह राज्यों के विधानसभा चुनावों में अपने कब्जेवाले छह राज्य कांग्रेस को गंवाने पड़े हैं और फिलहाल इसके पास कर्नाटक के अलावा कुछ गिने-चुने पर्वतीय सूबे ही बचे हुए हैं। खैर, इस सच को तो कतई नहीं झुठलाया जा सकता है कि विरासत में सियासत की सर्वोच्च कुर्सी तो मिल सकती है लेकिन उसकी हिफाजत करने की काबिलियत किसी को भी विरासत में नहीं मिलती है। वह तो खुद के अनुभव से ही आती है। लिहाजा अनुभवों से सबक लेने की जरूरत कांग्रेस में अगर किसी को है तो सिर्फ राहुल गांधी को ही है। क्योंकि सोनिया की सियासी काबिलियत तो जगजाहिर है। ये वही सोनिया हैं जिन्होंने नब्बे के दशक में डूबने के कगार पर खड़ी कांग्रेस की कमान संभालने के बाद अपनी योग्यता, क्षमता व कुशलता के दम पर ना सिर्फ केन्द्र में लगातार दस सालों तक संप्रग की सरकार चलवायी बल्कि देश के सत्रह राज्यों में पार्टी को शानदार सफलता दिलायी। इसी प्रकार कांग्रेस के शीर्ष रणनीतिकारों में शुमार होनेवाले पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने भी अपनी योग्यता व क्षमता साबित करने की चुनौती नहीं है क्योंकि ये उन्हीं नेताओं की जमात है जो इंदिरा व राजीव से लेकर सोनिया तक जमाने में भी कांग्रेस का परचम लहराने में निर्णायक भूमिका निभाती रही है। जबकि राहुल की बात करें तो उनके सामने चुनौती है खुद को साबित करने की। क्योंकि अब सवाल उनके चाल-चलन से लेकर आचरण तक पर भी उठने लगे हैं। डूसू अध्यक्ष व कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव रह चुकीं अलका लांबा को यह कहते हुए कांग्रेस का हाथ छोड़कर एएपी का झाड़ू थामना पड़ा कि दो वर्षों में राहुल ने एक बार भी उन्हें मुलाकात का समय नहीं दिया। ऐसा ही इल्जाम असम में भाजपा की जीत के नायक रहे हेमंत विश्वशर्मा भी लगा रहे हैं कि कांग्रेस में रहते हुए सूबे की समस्याओं को लेकर जब वे राहुल से मिलने गये तो पूरी बैठक के दौरान राहुल लगातार अपने कुत्ते के साथ ही खेलते रहे। हेमंत के मुताबिक पार्टी के जमीनी नेताओं व कार्यकर्ताओं के साथ राहुल का व्यवहार ऐसा रहता है जैसा किसी घमंडी मालिक का अपने निरीह नौकर के साथ होता है। इसी प्रकार उत्तराखंड के बागी कांग्रेसी विधायकों का भी कहना है कि अगर राहुल ने उन्हें मिल-बैठकर मसले को सुलझाने को मौका दिया होता तो उन्हें पार्टी छोड़ने के लिये हर्गिज मजबूर नहीं होना पड़ता। हालांकि ऐसी बातें वे लोग कर रहे हैं जो पार्टी छोड़कर जा चुके हैं। लेकिन इससे अलग भी देखें तो राहुल जब चाहे बिना किसी को बताये छुट्टी मनाने के लिये अज्ञात स्थान पर चले जाते हैं। संसद में भी उनकी भूमिका युवराज सरीखी ही रहती है, मतदाताओं के प्रतिनिधि की छवि उनमें शायद ही किसी को कभी दिखी हो। तभी तो शशि थरूर को भी संकेतों में यह कहना पड़ा है कि ‘पार्ट टाईम पॉलिटिक्स’ करके मौजूदा चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता बल्कि पांच साल तक लगातार जमीन पर पसीना बहाने के बाद ही चुनावी सफलता का प्रतिफल पाने की कल्पना की जा सकती है। बहरहाल, सच तो यही है कि आज भले ही पार्टी के भीतर से कोई मुखर होकर राहुल के चाल, चलन व आचरण में बदलाव की जरूरत पर एक शब्द भी नहीं बोल रहा हो लेकिन समय की मांग तो यही है कि उन्हें खुद में बदलाव लाना ही होगा। विरासत की सियासत को वे जिस आसान, सहज व मनमाने ढंग से संचालित करने की कोशिश कर रहे हैं उसमें उन्हें तब्दीली लानी ही होगी वर्ना कांग्रेस की दुर्गति का सिलसिला अभी और भी आगे तक जारी रहने की संभावना को कतई नकारा नहीं जा सकता है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
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