सरपट भगदड़ की होड़
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है कि ‘सुर नर मुनि सब कै यह रीती, स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।’ साथ ही उन्होंने यह भी बताया है कि ‘भय बिनु होय न प्रीति।’ यानि प्रीति, मित्रता या एकजुटता के लिये आवश्यक है कि परस्पर स्वार्थ भी हो और भय भी। दोनों हो तो सर्वोत्तम अथवा कम से कम कोई एक तो हो। लेकिन जहां दोनों का ही अभाव हो वहां कैसे टिकेगी मित्रता और कैसे दिखेगी एकजुटता। वहां तो टकराव होगा, टूट होगी और बिखराव होगा। ठीक वैसे ही जैसा कांग्रेस में शुरू होता दिख रहा है। कभी अरूणाचल के विधायक बगावत कर रहे हैं तो कभी उत्तराखंड के। कभी त्रिपुरा के विधायक दल में फूट पड़ती है तो कभी मणिपुर के विधायक दल की एकता दरकती है। कभी छत्तीसगढ़ में जोगी परिवार पार्टी से अपना नाता तोड़ता दिख रहा है तो कभी महाराष्ट्र में गुरूदास कामथ सरीखे शीर्ष छत्रप संगठन को अलविदा कहते दिख रहे हैं। यह सिर्फ सूबाई स्तर पर ही नहीं हो रहा बल्कि केन्द्रीय स्तर पर भी असंतुष्टों की कतार लगातार लंबी होती दिख रही है और इस बात की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की एक भी मनमानी पहल अब पार्टी में भारी विस्फोट का सबब बन सकती है। गनीमत है कि इस विस्फोटक परिस्थिति से पार्टी का शीर्ष नेतृत्व यानि गांधी परिवार भी अच्छी तरह परिचित है। तभी तो हर शिकस्त के बाद सर्जरी की बात तो होती है लेकिन यह बात महज बतकही बनकर रह जाती है। आखिर सर्जरी करें तो कैसे? राहुल को आगे लाये तो बुजुर्ग नाराज। प्रियंका को आगे लाये तो अब तक की सारी मेहनत पानी में। सोनिया को ही बरकरार रखते हुए राहुल को हाशिये पर भेजें तो भविष्य अंधकारमय। इसके अलावा अन्य कोई विकल्प ही नहीं है जिस पर विचार भी किया जा सके। ऐसे में आखिर करें तो क्या करें? यही वजह है कि कहने-सुनने में तो हमेशा ही कई हवा-हवाई बातें आती रहती हैं, लेकिन वास्तविकता में जो जैसे चल रहा है उसे यथावत चलने दिया जा रहा है। इसमें मसला है कि चल तो सब कुछ रहा है, मगर उल्टी दिशा में। बढ़ना था आसमान की ओर जबकि जा रहे हैं पाताल की गर्त में। संगठन के सिमटने की रफ्तार दिन दूनी रात चौगुनी होती जा रही है। कहीं से कोई सहारा मिलता नहीं दिख रहा। पार्टी की पकड़ देश के महज पांच फीसदी भू-भाग पर सिमट कर रह गयी है। ऐसे में स्वाभाविक है कि शीर्ष नेतृत्व का भय आखिर किसी को हो भी तो क्यों। यानि भय के आधार पर फिलहाल पार्टी में एकजुटता की उम्मीद करना व्यर्थ ही है। अब बचा स्वार्थ का आधार। तो इस पहलू को टटोलें तो जिसकी उम्मीदें कायम हैं वह टिका हुआ है पार्टी में और जिसकी उम्मीदों पर पूर्णविराम लग रहा है वह अपना रास्ता अलग कर ले रहा है। छत्तीसगढ़ में अगर जोगी परिवार ने पार्टी को अलविदा कहने की पहलकदमी की है तो उसकी साफ सी वजह है कि पार्टी ने अमित जोगी को पहले ही बाहर का दरवाजा दिखा दिया था जबकि अजीत जोगी को भी पार्टी से बाहर निकालने की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। यानि जोगी परिवार समझ गया कि अब हाथ का साथ पकड़े रहने से उसका कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं होनेवाला। तो वे चल पड़े अपने रास्ते। इसी प्रकार उत्तराखंड में भी जब विजय बहुगुणा को राज्यसभा की सीट नहीं मिली और सूबे की सत्ता से भी उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका गया तो उन्होंने भी तमाम संगी-साथियों के साथ पार्टी का दामन छोड़कर अपनी राहें अलग कर लेना ही बेहतर समझा। यही सिलसिला महाराष्ट्र में भी दिख रहा है जहां राज्यसभा की सीट पर गुरूदास कामथ की दावेदारी की अनदेखी करते हुए उनके धुर विरोधी माने जानेवाले पी चिदंबरम को उच्च सदन का टिकट दे दिया गया। साथ ही संगठन में भी उनकी कोई पूछ नहीं रही और रही सही कसर राहुल के युवा प्रेम में आगे बढ़ाये जा रहे संजय निरूपम की बातों व हरकतों ने पूरी कर दी। लिहाजा अब कामथ भले ही पार्टी छोड़ने के अपने फैसले के पीछे हजारों दलीलें गिना रहे हों लेकिन सच तो यही है कि संगठन से स्वार्थपूर्ति का हर दरवाजा बंद हो जाने के बाद उनके पास यह कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा। ऐसी ही नौबत दिख रही है उत्तर-पूर्वी सूबों में भी जहां भाजपा के बढ़ते कदमों और कांग्रेस के समाप्त होते जनाधार ने पार्टी से स्वार्थसिद्ध होने की संभावनाएं बेहद क्षीण कर दी हैं। इसी का नतीजा है कि उधर भी पार्टी में भारी भगदड़ का माहौल दिख रहा है और अब त्रिपुरा और अरूणाचल में भी असम की स्याही से नया इतिहास लिखे जाने की संभावना प्रबल दिख रही है। इन समस्याओं से निजात पाने का उपाय तलाशने के लिये राहुल भले ही मार्गदर्शक मंडल बनाने की बात कह रहे हों लेकिन जिसे भी मार्गदर्शक बनाया जाएगा उसके भविष्य पर तो ताला ही लगेगा। ऐसे में वह पार्टी में कब तक टिकेगा इसकी कल्पना की जा सकती है। लिहाजा जरूरत है शीर्ष स्तर पर सर्जरी की और भविष्य की चुनौतियों के मद्देनजर ठोस पहलकदमी की। वर्ना भगदड़ के सिलसिले की यह शुरूआत पार्टी को कहां ले जाएगी यह शायद ही किसी को अलग से बताने की जरूरत हो। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
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