शनिवार, 30 अप्रैल 2016

लोग हर मोड़ पर रूक-रूक के संभलते क्यों हैं....

‘हर मोड़ पर नयी राह पकड़ना नहीं अच्छा’


मशहूर शायर राहत इन्दौरी साहब द्वारा उठाये गये इस सवाल का सटीक जवाब आज तक शायद ही किसी को मिल पाया हो कि ‘लोग हर मोड़ पर रूक-रूक के संभलते क्यों हैं, इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं।’ यह सवाल इसलिये प्रासंगिक है क्योंकि आम तौर पर लोग स्वामी विवेकानंद की उस सीख का अनुसरण करना गवारा नहीं करते जिसमें उन्होंने एक बार लक्ष्य तय कर लेने के बाद तब तक चैन से नहीं बैठने की बात कही थी जब तक वह पूरी तरह हासिल ना हो जाये। लेकिन सवाल सिर्फ इतना ही नहीं है कि लक्ष्य तय कर लेने के बाद उसे हासिल करने की दिशा में सरपट भागने के बजाय लोग हर मोड़ पर अटकते, ठिठकते, सहमते व संभलते हुए क्यों दिखाई पड़ते हैं। अलबत्ता वे कम से कम तयशुदा लक्ष्य की ओर डरते-डरते भी सधे कदमों से संभलते हुए आगे तो बढ़ते रहते हैं। यहां सवाल तो उनका है जो हर नये मोड़ पर नयी राह पकड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं। उस पर तुर्रा यह कि लक्ष्य तो तय ही है, फिर इस बात से क्या फर्क पड़ता कि राह कौन सी चुनी जा रही है। अब ऐसी दलीलों को सरासर थेथरोलाॅजी ना कहें तो और क्या कहें। वैसे भी हर राह से एक ही मंजिल पर पहुंचने की बात आध्यात्मिक लिहाज से तो ठीक है मगर दुनियावी मामलों में इसे कैसे सही माना जा सकता है। बल्कि यह तो भटकाव की स्थिति है जो इन दिनों भारत की विदेश नीति में स्पष्ट दिख रही है। खास तौर से चीन व पाकिस्तान सरीखे पड़ोसी देशों के साथ अमल में लायी जा रही नीतियों पर गौर करें तो इसमें अटकाव, भटकाव व हर मोड़ पर अप्रत्याशित बदलाव की स्थिति साफ तौर पर महसूस की जा सकती है। मिसाल के तौर पर पठानकोट में हुए आतंकी हमले का मामला सामने आने के बाद पाकिस्तान से विदेश सचिव स्तर की वार्ता स्थगित करने के पीछे तर्क दिया गया कि बातचीत तभी संभव है जब सीमापार से इस मामले में कुछ ठोस कार्रवाई होती हुई दिखे। इस घुड़की का असर हुआ कि पाकिस्तान ने ना सिर्फ मामले की जांच शुरू कराई बल्कि कई अन्य लोगों के साथ उस मसूद अजहर को भी उसने नजरबंद किया जो पठानकोट में हुए आतंकी हमले का असली सूत्रधार है। लेकिन पाकिस्तान की इन पहलकदमियों के बावजूद इधर से संतोष नहीं जताया गया और वार्ता प्रक्रिया स्थगित ही रही। लेकिन अब जबकि पठानकोट मामले में पाकिस्तान पूरी तरह अपने वायदों से मुकर गया है और अनौपचारिक तौर पर इस वाकये को हमारी ही खुराफात साबित करने पर आमादा दिख रहा है इसके बावजूद अचानक विदेश सचिव स्तर की वार्ता कराके नई दिल्ली क्या संदेश देना चाह रही है यह समझ से परे ही है। अगर वार्ता प्रक्रिया को जारी रखना था तो पठानकोट मामले की आग में पूर्व निर्धारित बातचीत को होम ही नहीं करते। और अगर बातचीत बंद करके पाकिस्तान को कुछ ठोस कदम उठाने के लिये मजबूर करने की नीति अपनायी गयी तो कम से कम तब तक तो इस नीति पर टिके रहते जब तक वह हमारी एनआईए को पठानकोट मामले की जांच के लिये अपनी सरहद में दाखिल होने की इजाजत नहीं दे देता, उसकी जेआईटी की रिपोर्ट सकारात्मक नहीं दिखती, और अपनी अदालत में वह इस मामले को मजबूती से पेश करता हुआ दिखाई नहीं पड़ता। अलबत्ता हार्ट आॅफ एशिया समिट में हिस्सा लेने के लिये आए पाकिस्तानी विदेश सचिव अहमद चैधरी के साथ अचानक ही अप्रत्याशित तरीके से हुई हमारे विदेश सचिव एस जयशंकर की दो घंटे लंबी चली वार्ता का नतीजा यह है कि पाकिस्तान कश्मीर का राग आलाप रहा है और हम आतंकवाद का रोना रो रहे हैं। दोनों की अपनी ढ़फली है और अपना अलग राग है जिसमें कहीं कोई तालमेल ही नहीं है। अब हालत यह है कि हमारी सरकार यह बताने की हालत में ही नहीं है कि उसने वार्ता प्रक्रिया बहाल करने के लिये पाकिस्तान के समक्ष जो शर्तें रखी थीं उसका क्या हुआ। यानि हुआ यूं कि वार्ता करनी है सो कर ली। महज दिखावे की बेमानी खानापूर्ति। जिससे फायदा तो कुछ नहीं हुआ अलबत्ता नुकसान यह हुआ कि वार्ता प्रक्रिया स्थगित करके पाकिस्तान पर जो दबाव बनाया गया था वह पूरी तरह मटियामेट हो गया। नीतियों में भटकाव की ऐसी ही स्थिति चीन के मामले में भी देखी जा रही है जिसे उसकी ही भाषा में जवाब देने के लिये पहले तो उसके वांक्षित अपराधी व उइगुर नेता डोलकुन इशा को भारत आने का वीजा प्रदान किये जाने की खबर को खूब प्रचारित प्रकाशित किया गया और बाद में जब कांग्रेस ने भी इशा को वीजा दिये जाने का समर्थन करने की पहल की तो अचानक ही उसका वीजा रद्द कर दिया गया। यानि हर नये मोड़ पर नयी राह अपनाने की जो नीति पाकिस्तान के साथ अपनायी गयी उसी का अनुसरण चीन के मामले में भी किया गया। अब भटकाव के इस राह की मंजिल कैसी होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। खैर, इन मामलों के मद्देनजर तो हरिवंश राय बच्चन की यही पंक्तियां सही राह बताती हुई महसूस हो रही हैं कि ‘राह पकड़ तू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला।’ वर्ना इस तरह अंधेरे में अटकते-भटकते हुए गलती से भी कोई गलती हो गयी तो बचने की कोई राह नहीं बचेगी। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ नवकांत ठाकुर Navkant Thakur

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

‘भुनाने के लिये दाने के जुगाड़ की जद्दोजहद’

‘भुनाने के लिये दाने के जुगाड़ की जद्दोजहद’


‘घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने’ के कटाक्षीय मुहावरे से तो सभी वाकिफ हैं। लेकिन यह सामाजिक मुहावरा सियासत में कोई मायने नहीं रखता। यहां तो भुनाने अक्सर वही निकलता है जिसके पास दाने होते ही नहीं और जिसके पास वास्तव में दाने होते हैं वह उसे तत्काल ही भुना लेने की गलती कभी नहीं करता। मसलन इन दिनों भुनाने के लिये तो नीतीश कुमार से लेकर राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल ही नहीं बल्कि सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव भी कतार में हैं लेकिन ना उनके पल्ले दाने दिख रहे हैं और ना ही वर्ष 2019 तक इनके पास इतना दाना जमा हो पाने की फिलहाल कोई उम्मीद नजर आ रही है जिसके दम पर ये अपने पल्ले के दाने की बदौलत प्रधानमंत्री का पद हासिल करने में कामयाब हो सकें। कायदे से देखा जाये तो केन्द्र में जब से नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा की सरकार बनी है तबसे ही मोदी के विकल्प की तलाश में तमाम गैरभाजपाई ताकतें विभिन्न फार्मूलों को टटोलने में जुटी हुई हैं। दरअसल यह सबको मालूम है कि लोकसभा चुनाव में पड़े कुल वोटों में से महज 32 फीसदी की हिस्सेदारी के दम पर ही भाजपा ने अपने दम पर बहुमत की सरकार बनायी है। यानि भाजपा की जीत में निर्णायक भूमिका निभाई गैरभाजपाई वोटों के जबर्दस्त बिखराव ने। लिहाजा सबका यह मानना है कि अगर अगले चुनाव में इस बिखराव को टालने में कामयाबी मिल गयी तो भाजपा को आसानी से धूल चटाई जा सकती है। इसी सोच का नतीजा रहा कि गैरभाजपाई ताकतों को एकजुट करने का पहला प्रयास जनता परिवार के बिखरे कुनबे को जोड़ने की कोशिश के तौर पर किया गया। इस प्रयास में पिछले साल सपा, राजद, जदयू, जद एस व इनेलो ने आपस में विलय करने और नयी पार्टी का मुखिया मुलायम सिंह यादव को बनाने पर सैद्धांतिक सहमति भी कायम कर ली। लेकिन अव्वल तो सपा के भीतर ही नये सिरे से पार्टी बनाने पर सहमति नहीं बन पायी और बाकी कसर बिहार के चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर हुई तकरार ने पूरी कर दी। लिहाजा जनता परिवार के एकीकरण का विचार गर्त में चला गया। इस बीच बिहार के चुनाव में महागठजोड़ बनाकर गैरभाजपाई वोटों को एकजुट करने का जो प्रयोग किया गया उसका परिणाम उम्मीदों से काफी बेहतर रहा। लिहाजा कांग्रेस ने इसी प्रयोग को अन्य सूबों में भी आगे बढ़ाते हुए राहुल गांधी की खुल्लमखुल्ला असहमति के बावजूद पश्चिम बंगाल में वामदलों के साथ और तमिलनाडु में द्रमुक के साथ चुनावी गठजोड़ किया है। इस गठजोड़ का ही नतीजा है कि दोनों ही सूबों में कांग्रेस के लिये सम्मानजनक स्थिति उत्पन्न हुई है और अस्तित्व के संकट से जूझ रहे वामदलों को भी नये सिरे से प्राणवायु नसीब हुई है। यानि गैरभाजपाई वोटों का बिखराव रोकने का हर वह प्रयोग अब तक पूरी तरह सफल रहा है जिसमें तमाम ताकतें निजी आत्मसम्मान से ऊपर उठकर व आपसी असहमतियों को पीछे छोड़कर एकजुट हो पायी हैं। जबकि जम्मू कश्मीर, हरियाणा व महाराष्ट्र में ऐसा नहीं हो पाने के कारण भाजपा को सत्ता हथियाने का मौका मिल गया और अब असम में भी इसी वजह से उसकी स्थिति काफी मजबूत बतायी जा रही है। यानि भाजपा को रोकने के लिये तमाम गैरभाजपाई ताकतों को एकजुट तो होना ही पड़ेगा। लेकिन सवाल है कि इस एकजुटता का फार्मूला क्या होगा और इसका नेतृत्व किसके हाथों में रहेगा। इसी सवाल पर आकर यह पूरा विचार पंचर हो जा रहा है। अभी नीतीश ने संघ मुक्त भारत के नारे का जो प्रयोग किया है उसमें दम तो दिख रहा है क्योंकि इससे अव्वल तो सनातन भाजपा विरोधी माने जानेवाले अल्पसंख्यक समुदाय को एकजुट किया जा सकता है और दूसरे समाज को संघ के कट्टरवाद और बाकियों के समरसतावाद के बीच विभाजित कर भाजपा की राह रोकी जा सकती है। लेकिन संघ मुक्त भारत के नारे को आगे करने पर भाजपा इसे स्वाभाविक तौर पर राष्ट्रवाद से जोड़ेगी। लिहाजा आखिरकार यह प्रयोग अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक की शक्ल ले सकता है और इस बिसात पर भाजपा को पछाड़ना नामुमकिन की हद तक मुश्किल होगा। दूसरी ओर मसला है कि गैरभाजपाई मोर्चे की कमान पर नीतीश की मजबूत पकड़ कैसे बन सकती है जब बिहार की कुल 40 में से 16-17 सीटें ही उनकी पार्टी को लड़ने के लिये दी जाएंगी। साथ ही गैरभाजपाई मोर्चे पर अपना स्वाभाविक एकाधिकार छोड़ना कांग्रेस को कतई गवारा नहीं हो सकता है और राहुल के अलावा किसी अन्य को वह प्रधानमंत्री पद का दावेदार हर्गिज स्वीकार नहीं कर सकती है। लेकिन मसला है कि कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ना ना तो सपा को कबूल हो सकता है और ना बीजद, अन्नाद्रमुक, तृणमूल कांग्रेस या फिर राकांपा सरीखे दलों को। क्योंकि इन सभी दलों में त्रिशंकु संसद गठिन होने की हालत में अपने नेता को प्रधानमंत्री बनवाने का सपना लंबे अर्से से पल रहा है। बहरहाल, जहां चाह हो वहां राह निकल ही आती है लिहाजा ऐसा संभव ही नहीं है कि राष्ट्रव्यापी गैरभाजपाई गठजोड़ के गठन की कोशिशों पर विराम लग जाये। अलबत्ता जनता परिवार के एककीरण का विचार ध्वस्त होने के बाद अभी तो इस दिशा में यह दूसरा ही प्रयास शुरू हुआ है। यह सिलसिला तो अभी कई मोड़, जोड़-तोड़ व गठजोड़ से गुजरनेवाला है। जिसके सकारात्मक भविष्य की फिलहाल तो सिर्फ उम्मीद ही की जा सकती है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर Navkant Thakur

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

‘सियासत के शीर्ष पर संवेदना का सूखा’

‘सियासत के शीर्ष पर संवेदना का सूखा’


सूखे को लेकर इन दिनों जिस तरह से सियासी पारा उफान पर चल रहा है उसमें संवेदना की नदारदगी वाकई शर्मसार करनेवाली है। खास तौर से जब सर्वोच्च अदालत भी यह स्वीकार कर चुकी है कि देश के कुल 256 जिले भीषण सूखे की चपेट में हैं और हमारी एक चैथाई आबादी पानी की बूंद-बूंद के लिये तरस रही है ऐसे में सियासी श्रेय लेने के लिये मची होड़ के बीच माननीय राजनेताओं द्वारा की जा रही बेसिर-पैर की बातों व ऊटपटांग हरकतों से तो सूखा पीडि़तों के जख्मों पर मरहम की बजाय मिर्च ही लग रही है। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा का आलम यह है कि जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया सूखे का जायजा लेने के लिये निकलते हैं तो हजारों लीटर पानी सिर्फ इस वजह से सड़क पर उडेल दिया जाता है ताकि उनकी कार को घूल के गुबार से दो-चार ना होना पड़े और जब महाराष्ट्र की ग्रामीण विकास व जल संरक्षणमंत्री पंकजा मुंडे सूखाग्रस्त इलाकों के दौरे पर निकलती हैं तो पीडि़तों के दर्द मंे सहभागी बनने के बजाय वहां अपनी सेल्फी निकालने में मशगूल हो जाती हैं ताकि उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करके यह जता सकें कि जमीनी स्तर पर वे किस कदर सक्रिय हैं। उस पर तुर्रा यह कि सिद्धारमैया तो कम से कम पूरे मामले की जांच कराये जाने की बात भी कहते हैं लेकिन पंकजा दलील देती हैं कि पूरे इलाके मेें जब उन्हें सिर्फ एक बांध में पानी की पतली सी धारा बहती हुई नजर आयी तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो रेगिस्तान में अमृत का झरना बह रहा हो और उसी खुशी की यादें संजोने के लिये वे सेल्फी लेने से खुद को रोक नहीं पायीं। अब ऐसी दलीलों को संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ना कहें तो और क्या कहें। इसी प्रकार जब कर्नाटक के नवनियुक्त भाजपा अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा सूखे का जमीनी जायजा लेने के क्रम में भी अपनी निजी सहूलियत को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एक करोड़ की आलीशान कार से ही सफर पर निकलते हों बूंद-बूंद के लिये तरस रही प्यासी पथराई आंखें उनसे अपनत्व भरी संवेदना की आस लगाएं भी तो कैसे? सूखे की मार से कराह रहे लोगों के बीच संवेदना का संचार हो भी तो कैसे जब प्यासी धरती के फटे कलेजे को आसमान से निहारने के लिये निकले महाराष्ट्र के राजस्वमंत्री एकनाथ खड़से के उड़नखटोले को घूल से बचाने के लिये हेलीपैड पर दस हजार लीटर पानी की फुहार डाली जा रही हो। इसमें कोढ़ में काज सरीखी असहनीय चुभन तो तब महसूस होती है जब येदियुरप्पा सरीखे नेता एक करोड़ की कार के इस्तेमाल को जायज ठहराने के लिये कभी अपनी सुरक्षा का हवाला देते हैं तो कभी वह कार अपनी होने से इनकार करते हुए इसे मित्र से किराये पर लिया हुआ बताते हैं। लोगों को ऐसी ही चुभन खड़से की बातों से भी महसूस हुई होगी जब उन्होंने कहा कि जिस तरह से उनके हेलीपैड पर धूल उड़ रही थी उसे देखते हुए यह मानना बेहद मुश्किल है कि इस पर दस हजार लीटर पानी की फुहार डाली गयी होगी। ऐसी दलील सुनकर लोग यह उम्मीद तो करेंगे ही काश खड़से साहब लगे हाथों यह भी बता ही देते कि जब उन्हें यह पता चला कि उनके लिये हेलीपैड तैयार किया जा रहा है तब उन्हें इस पर कितना पानी खर्च होने की उम्मीद थी। खैर, सूखे को लेकर मची सियासी श्रेय बटोरने की होड़ में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के मकसद से बेतुकी बयानबाजी करने में तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी और उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को औपचारिक तौर पर यह प्रस्ताव भेज दिया कि अगर वे चाहें तो सूखे से निपटने के लिये उनके सूबे को दिल्ली से पानी की आपूर्ति करायी जा सकती है। शायद इसी को कहते हैं कि घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने। इनका अपना सूबा तो पानी के लिये हरियाणा और यूपी पर निर्भर है जहां से पानी की पर्याप्त व निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित कराना हमेशा से टेढ़ी खीर रही है। हाल ही में जाट आरक्षण के लिये हुए आंदोलन के बाद जब कुछ दिनों के लिये हरियाणा से पानी की आपूर्ति बाधित हुई तब दिल्ली में कैसा कोहराम मचा था यह सर्वविदित ही है। यहां तक कि पानी के लिये जारी पंजाब व हरियाणा की जंग में कूदते हुए जब इन्होंने आगामी चुनाव में राजनीतिक लाभ बटोरने के मकसद से पंजाब के पक्ष में बयानबाजी की थी उसके बाद हरियाणा से मिली पानी रोकने की धमकी से ही इनकी सरकार के पेट का पानी डोल उठा था। ऐसे में जब ये सूखे की सियासत में कूदते हुए श्रेय बटोरने की कोशिशों के तहत समुद्री कछारवाले सूबे के दूर-दराज के इलाकों को पानी भेजने का प्रस्ताव भेजने की पहल करते हैं तब यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि सूखा पीडि़तों के प्रति इनके मन में कितनी संवेदना है और कहीं ये सूखे की त्रासदी झेल रहे लोगों के साथ भद्दा मजाक तो नहीं कर रहे हैं। खैर, माना कि सियासत का संवेदना से सीधे तौर पर कोई लेना-देना नहीं होता है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनभावना की निर्णायकता तो जगजाहिर ही है। लिहाजा जनवेदना के प्रति समर्पण व सहानुभूति का प्रदर्शन करने के क्रम में जनसरोकार से जुड़े मसले पर इस कदर लापरवाही का मुजाहिरा करने की भारी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’

‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’


वाकई बड़ा ही अजब है पाकिस्तान और गजब है उसकी नीति। खास तौर से भारत के प्रति उसका जो व्यवहार है उसके तो कहने ही क्या। लगता तो ऐसा है मानो उसने तय कर रखा है कि भारत के साथ उसे रिश्तों को बेहतर करना ही नहीं है। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता है कि भारत की ओर से बार-बार दोस्ती का हाथ बढ़ाए जाने और उसकी पिछली गलतियों को सुपुर्दे खाक किये जाने के बावजूद वह अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आए। नई दिल्ली में सरकार किसी भी पार्टी की क्यों ना हो, इस्लामाबाद के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशें लगातार जारी रहीं। हर बार उसकी गलतियों को भुलाने की कोशिश की गयी। इस उम्मीद में कि कभी तो हालात सुधरेंगे। कभी तो पाकिस्तान अपनी गलतियों से सबक लेगा और उसे दोबारा नहीं दोहराने की कसम लेगा। लेकिन नहीं, हर बार इधर से दोस्ती की कोशिश हुई और उधर से पीठ में छुरा घोंपा गया। अलबत्ता अब तो उसने अपना पूरा ईमान-धरम गिरवी रखकर उस चीन के साथ भारत के खिलाफ खुल्लम-खुल्ला गठजोड़ कर लिया है जिसका इतिहास ही नहीं है कि वह कभी किसी का सगा साबित हुआ हो। खैर सगा तो पाकिस्तान भी कभी किसी का नहीं हुआ बल्कि जिसने भी उसे सगा समझने की गलती की उसके हिस्से में दगा ही आयी। चाहे वह अफगानिस्तान हो या अमेरिका। लेकिन दूसरों को दगा देकर अगर पाकिस्तान ने अपना ही भला कर लिया होता तो बात कुछ और होती। यहां तो दूसरों को गिराने के लिये खोदे गये गड्ढ़े में हर बार वह खुद भी गिरा, चोटिल हुआ, लहुलुहान हुआ, बंग के रूप में अंग भंग का सामना किया, नाकाम मुल्क के तौर पर बदनाम हुआ लेकिन इससे कोई सबक नहीं लिया। तभी तो गुलाम कश्मीर के हड़पे हुए इलाके के काफी बड़े हिस्से को तस्तरी में परोसकर चीन के हवाले करने से लेकर अपने बंदरगाहों पर चीन को अपनी बादशाहत स्थापित करने के लिये आमंत्रित करने से भी उसने परहेज नहीं बरता है। और बदले में उसे केवल यह चाहिये कि किसी भी तरह से चीन कुछ ऐसा करे ताकि भारत को खून के आंसू रोने के लिये मजबूर किया जा सके। अब ऐसी बेवकूफी भरी विदेशनीति के नाते भले ही उसे पठानकोट हमले के मुख्य सूत्रधार मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रतिबंध झेलने से बचाने में फौरी कामयाबी मिल गयी हो या फिर भारत को परमाणु आपूर्तिकता देशों के समूह में शामिल होने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा हो, लेकिन हकीकत यही है कि चीन के साथ दोस्ती के लिये पाकिस्तान की ओर से जो कीमत चुकाई जा रही है वह उसे ही महंगी पड़नेवाली है। खैर, उसे कुछ भी महंगा पड़े या सस्ता, उससे हमें लेना एक ना देना दो। लेकिन जिस बात से हमारा सीधे तौर पर लेना-देना है वह है अपनी अंदरूनी समस्याओं को हमारे मत्थे मढ़ने की पाकिस्तान की कोशिशें। इस मामले में उसकी स्पष्ट नीति उल्टा चोर कोतवाल को डांटे सरीखी ही है। तभी तो पठानकोट के मामले को भारत की ही खुराफात साबित करने की कोशिशों के बीच उसने अपनी अंदरूनी समस्याओं के लिये भी भारत को ही जिम्मेवार बताने की साजिशें शुरू कर दी हैं। पाक अधिकृत गुलाम कश्मीर में आजादी की आवाज उठे या फिर बलूचिस्तान में दमन की इंतहा कर रही पाकिस्तानी फौज के जुल्मो-सितम से चीख-पुकार मचे। सबमें उसे भारत की ही भूमिका दिखाई देती है। यहां तक कि उसकी खुराफाती हरकतों व नापाक शैतानियों से तंग आकर खुद को शांत व मर्यादित रखने के लिये भारत तात्कालिक तौर पर भी गुफ्तगू के लिये बनाए अपने ही झरोखे पर झीना सा पर्दा डालने की कोशिश करे तो वह उसे नाकाबिले बर्दाश्त हो जाता है। अब संयुक्त राष्ट्र संघ में नियुक्त अपनी स्थायी प्रतिनिधि मलीहा लोधी को आगे करके उसने ढ़ोल बजाना शुरू कर दिया है भारत के साथ उसके रिश्ते इसलिये नहीं सुधर रहे हैं क्योंकि नई दिल्ली से समग्र बातचीत के लिये पहलकदमी नहीं की जा रही है। जाहिर है कि इससे बड़ा झूठ तो कुछ हो नहीं सकता। अलबत्ता यह सारी दुनियां जान चुकी है कि पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सुधारने के लिये भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री ने भी तमाम अंदरूनी आलोचनाओं के बावजूद किस कदर बढ़-चढ़कर अपना हाथ ही आगे नहीं बढ़ाया है बल्कि नवाज की नातिन को आशिर्वाद देने के बहाने खुद को ही आगे कर लिया है। इसके बाद भी अगर पाक के सनातन खुराफाती रवैये में कोई कमी नहीं आ रही है तो आखिरकार हिन्दुस्तानी निजाम को अब इस बात पर विचार करना ही होगा कि कोतवाल को घुड़की देकर खुद को बचाये रखने की चोर की बदमाशी को कब तक बर्दाश्त किया जाए। ये जब चाहे आतंकियों की घुसपैठ करा दे, सरहद पर गोलीबारी शुरू कर दे, विश्वमंच पर हमें बदनाम करता फिरे, हर कीमत अदा करके भी चीन के हाथों हमारा दिल दुखाने की साजिश रचता रहे, हमारे अंदरूनी बौद्धिक विवादों में टांग अड़ाने की कोशिश करे, हमारे मासूम मछुआरों को पकड़कर उन पर जासूसी का इल्जाम लगाये, अलगाववादियों के कांधे पर बंदूक रखकर हमारी अंदरूनी शांति व सामाजिक सौहार्द्र को निशाना बनाए और विश्वशांति के लिये खतरा बने आईएसआईएस को हमारे खिलाफ इस्तेमाल करने की नीति पर आगे बढ़ता दिखे तो ऐसे पड़ोसी के साथ रिश्ते निबाहने के लिये परंपरा की लीक से हटकर कुछ अलग लेकिन असरकारी नीति तो अपनानी ही पड़ेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

‘उठी हुई उंगली के पीछे छिपा हुआ चेहरा’

‘उठी हुई उंगली के पीछे छिपा हुआ चेहरा’


इन दिनों जिसे देखिये वही दूसरों पर उंगली उठाता हुआ दिख रहा है। सबकी उंगलियां एक दूसरे की ओर हैं। चारों तरफ उंगली ही उंगली। चेहरा तो किसी का दिख ही नहीं रहा। ऐसे में यह समझ पाना बेहद मुश्किल हो चला है कि उंगलियों के पीछे चेहरा छिप जा रहा है या चेहरा छिपाने के लिये ही उंगली उठाई जा रही है। मामला कोलकाता में हुए ओवरब्रिज हादसे का हो या पठानकोट में हुए आतंकी हमले की पड़ताल के लिये भारत आयी पाकिस्तानी जांच टीम का। या फिर कृष्णा गोदावरी बेसिन में भारी भरकम निवेश व कुप्रबंधन के कारण गुजरात के सरकारी खजाने को लगी चपत से लेकर पनामा पेपर्स लीक का मसला ही क्यों ना हो। सतह पर सुलगते दिख रहे तमाम ज्वलंत मामलों में सामने सिर्फ उंगलियां ही दिख रही हैं, जो सभी एक दूसरे की ओर उठाये घूम रहे हैं। हालांकि अपनी खामियों, गलतियों व कमियों को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं करना और दूसरों के हर काम की पूरी शिद्दत से नुक्ताचीनी करना तो सियासत का स्वभाव ही होता है, लेकिन उंगलियां उठाने के क्रम में इन दिनों अपने अधिकार व कर्तव्य क्षेत्र की सीमारेखा का सम्मान करना भी जरूरी नहीं समझा जा रहा है। मिसाल के तौर पर पठानकोट मामले की जांच के लिये भारत आयी पाकिस्तान की जेआईटी के मामले को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व उनके करीबी सिपहसालारों ने प्रधानमंत्री के प्रति जिस भाषा व अलंकारों का उपयोग किया है उसे उंगली उठाने के बहाने अपना चेहरा छिपाने की कवायद ना कहें तो और क्या कहें। कहां तो पड़ोसी सूबे हरियाणा से पीने का पानी मांगना भी इनके लिये दुरूह हो रहा है और कहां ये सीधा भारत-पाकिस्तान के रिश्तों का विश्लेषण करने में जुटे हुए हैं। मुफ्त वाईफाई व बेहतरीन सार्वजनिक परिवहन सेवा देने सरीखे अपने मुख्य चुनावी वायदे को तो ये शायद ही कभी याद करते हों लेकिन वर्ष 2012 में सोने पर एक्साइज लगाने का भाजपा द्वारा किया गया विरोध इन्हें बखूबी याद है। इनके मुताबिक पाकिस्तानी जांच दल को पठानकोट जाने की इजाजत देकर प्रधानमंत्री ने भारतमाता की पीठ में छुरा घोंप दिया है लेकिन पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट पर भरोसा करने के क्रम में भारतीय मीडिया द्वारा प्रचारित-प्रसारित तथ्यों को खारिज करके ये किन तत्वों का मनोबल बढ़ा रहे हैं इस पर तो इन्होंने कभी विचार भी नहीं किया होगा। जाहिर है कि दिल्ली के विकास की अपनी जिम्मेवारी निभाने से ज्यादा केन्द्र सरकार पर गरजने-बरसने में अपनी ऊर्जा खपाने के पीछे कहीं ना कहीं इनकी उंगली उठाने की आड़ में अपना चेहरा छिपाने की रणनीति ही छिपी हुई है। यही हालत कांग्रेस की भी है और भाजपा की भी। गुजरात में केजी बेसिन के मामले में बरती गयी वित्तीय व नीतिगत अनियमितताओं को लेकर सामने आयी कैग रिपोर्ट के बारे में भाजपा से कुछ पूछा जाये तो वह यह कहते हुए सीधे कांग्रेस पर उंगली उठा देती है कि जिसने दस साल के कार्यकाल में सरकारी खजाने का 15 लाख करोड़ रूपया हजम कर लिया हो उसे भ्रष्टाचार के बारे में कोई सवाल करने का नैतिक अधिकार ही नहीं है। दूसरी ओर असम में 15 साल के शासनकाल का हिसाब देने के बजाय कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व केन्द्र सरकार की नाकामियां गिनाकर ही चुनावी भवसागर पार कर लेने में जुटा हुआ है। हालांकि कांग्रेस तो अपने साठ साल के राष्ट्रव्यापी शासन का हिसाब-किताब देना भी गवारा नहीं करती अलबत्ता हर सवाल के जवाब में भाजपा की ओर उंगली उठाकर अपना चेहरा छिपाने से उसे कतई गुरेज नहीं है। खैर, विरोधियों पर उंगली उठाकर अपना चेहरा छिपाने में तो ममता बनर्जी भी कम उस्ताद नहीं हैं जिन्होंने कोलकाता में हुए फ्लाईओवर हादसे की पूरी जिम्मेवारी वामदलों की पूर्ववर्ती सरकार पर थोप दी है। लेकिन वे यह बताना जरूरी नहीं समझती कि जब उन्हें ‘परिवर्तन’ के लिये जनता का समर्थन मिला था तो पिछली सरकार द्वारा उपकृत की गयी कंपनी को ही इनका भी वरदहस्त क्यों मिलता रहा और जब रेल मंत्रालय इनकी मुट्ठी में था तब काली सूची में शामिल इसी कंपनी को बारामुला-उधमपुर में रेल टनल बनाने का ठेका क्यों दे दिया गया। जाहिर है कि हर सवाल के जवाब में उंगली उठाने की कोशिशें वास्तव में अपना चेहरा बचाने की रणनीति का ही हिस्सा रहती हैं। तभी तो पनामा पेपर्स के मामले में सीधे तौर पर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कराने के बजाय भाजपा यह याद दिला रही है कि उसके सभी सांसदों ने जब संसद के दोनों सदनों में अपना कोई विदेशी खाता नहीं होने का शपथपत्र दाखिल किया तो कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार ने इसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं ली और बकौल संबित पात्रा, सोनिया की आलमारी खुल जाये तो पूरा कालाधन बिखरा नजर आएगा। जाहिर है कि ऐसी दलीलों का तो कोई जवाब हो भी नहीं सकता है। लेकिन मसला है कि अपना चेहरा छिपाने के लिये दूसरों पर उंगली उठाने की रणनीति अगर सियासी सफलता की गारंटी दिला सकती तो ना भाजपा की बिहार में बुरी गत होती और ना ही एक के बाद एक विभिन्न कांग्रेसशासित सूबों में आंतरिक विद्रोह का बवंडर उठता। खैर, आम मतदाताओं के सामने दूसरों की गलतियां परोसकर अपनी कमियां छिपाने की रणनीति का कभी-कभार तात्कालिक लाभ अवश्य मिल सकता है बशर्ते बाद में ढ़ोल की पोल खुलने पर होनेवाले नुकसान की भरपाई करने का जोखिम उठाने के लिये तैयार रहा जाए। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

‘जमीनी के कांधों पर जमीन की जिम्मेवारी’

‘जमीनी के कांधों पर जमीन की जिम्मेवारी’


जमीन की समझ उसे ही हो सकती है जो जमीन से जुड़ा रहा हो। लिहाजा जमीन जोतने व जोड़ने की जिम्मेवारी जमीन से जुड़े जमीनी नेताओं को सौंपने की भाजपा में जो नयी परंपरा शुरू हुई है उसका जमीनी स्तर पर सकारात्मक असर दिखने की संभावना को कतई नकारा नहीं जा सकता है। वास्तव में जबसे पार्टी के संस्थापकों और उनके द्वारा आगे लाये गये दूसरी पीढ़ी के नेताओं का संगठन पर वर्चस्व कमजोर पड़ा है तबसे संगठन में बदलाव की बेहद दिलचस्प बयार बहती हुई दिख रही है। खास तौर से पार्टी का नेतृत्व नरेन्द्र मोदी व अमित शाह के रूप में ऐसी जोड़ी के हाथों में आने के बाद से (जो ना तो किसी से उपकृत है और ना किसी पूर्वाग्रह या गुटबाजी से प्रेरित) पार्टी में अहम पदों की जिम्मेवारी सौंपे जाने की अहर्ता व अपेक्षित योग्यता की कसौटी ही मानो बदल गयी है। ना परंपराओं की परवाह की जा रही है और ना ही वर्जनाओं की। ना सिफारिश के आधार पर फैसले हो रहे हैं और ना ही विरोध की परवाह की जा रही है। अगर वर्जनाओं की परवाह या परंपराओं का अनुपालन होता तो ना तो आदिवासी बहुल झारखंड का मुख्यमंत्री गैरआदिवासी रघुवर दास को बनाया जाता और ना जाटबहुल हरियाणा की सूबेदारी गैरजाट मनोहरलाल खट्टर को दी जाती। यहां तक कि पार्टी के तमाम पुराने व स्थापित चेहरों को दरकिनार कर सर्वानंद सोनोवाल को असम का अध्यक्ष व मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के मामले में भी ना तो सांगठनिक संतुलन की परवाह की गयी और ना परंपरागत सियासी लकीर का अनुसरण किया गया। हालांकि दिल्ली में आयातित नेत्री किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद के दावेदारी की जिम्मेवारी सौंपने का मामला भी कुछ ऐसा ही था जिसका पार्टी को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। लेकिन उस एक हार से अपने लिये अपनी नयी लकीर खींचने के मौजूदा निजाम के दृढ़ निश्चय पर कोई असर नहीं पड़ा है। तभी तो आज एक बार फिर पांच राज्यों में नियुक्त किये गये नये प्रदेश अध्यक्षों की सूची में तीन नाम ऐसे हैं जो वाकई नये निजाम की नयी सोच की ओर स्पष्ट इशारा करते हैं। उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य, पंजाब में विजय सांपला और तेलंगाना में डाॅ के लक्षमण को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेवारी सौंपने के फैसले से स्पष्ट है कि तमाम ऐसे स्थापित चेहरे जो जोड़तोड़, गुटबाजी व गणेश परिक्रमा के बूते विभिन्न स्तरों पर पार्टी में लंबे समय से जमे हुए थे उनकी जगह अब ऐसे चेहरों को तरजीह दी जा रही है जो ‘नेकी कर और दरिया में डाल’ की नीति के मुताबिक संगठन की सेवा में लगे रहे हैं। उन्हें ख्वाहिश भले रही हो पार्टी से कुछ पाने की लेकिन उम्मीद तो कतई नहीं थी कि कुछ मिल पाएगा। ऐसे लोगों को जब अचानक मुख्यधारा में शीर्ष पर बिठाने की नीति पर अमल किया जाने लगा तो स्वाभाविक तौर पर यह आरोप तो लगना ही है कि मोदी-शाह की जोड़ी पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये पुराने स्थापितों की अनदेखी करते हुए संगठन में मनमाने परिवर्तन कर रही है ताकि किसी भी मामले में किसी भी स्तर से कभी कोई विरोध या असहमति का स्वर सामने आने की गुंजाइश ही ना रहे। जाहिर तौर पर सियासी समीकरणों की कसौटी पर परखने के बाद इस तरह के आरोपों को सिरे से तो कतई खारिज नहीं किया जा सकता है लेकिन इन फैसलों को एक अलग नजरिये से देखा जाये तो भले ही पिछड़ों-दलितों को साधने के लिये इन्हें आगे आने का मौका दिया गया हो या फिर इन्हें गुटनिरपेक्ष रहने का प्रतिफल मिल रहा हो। सच तो यही है कि मतदाताओं को अंत्योदय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता समझाने में पार्टी को इस सांगठनिक अंत्योदय से निश्चित ही काफी लाभ मिलेगा। दरअसल ये वो लोग हैं जिन्होंने संघ परिवार व भाजपा संगठन के लिये अपना सबकुछ अर्पित करने से लेकर पार्टी के लिये खुद को भी समर्पित कर दिया, लेकिन बदले में कुछ पाने के लिये ना तो कभी गुटबाजी की और ना किसी की गणेश परिक्रमा करना गवारा किया। इसीका नतीजा रहा कि जब फूलपुर संसदीय सीट से भाजपा के शीर्ष नेताओं की एक टोली स्वर्गीय लालबहादुर शाष्त्री के नवासे व पार्टी के राष्ट्रीय सचिव सिद्धार्थनाथ सिंह को उम्मीदवार बनाना चाह रही थी और बाकी टोलियां इसके विरोध में जुटी थीं तब टकराव टालने के लिये फूलपुर स्थित सिराथू विधानसभा सीट पर सपा की लहर के बावजूद मजबूती से कमल खिला चुके केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी का टिकट दे दिया गया। हालांकि मौर्य कोई आसमान से टपके नेता नहीं थे बल्कि पिछड़े समाज व बेहद गरीब परिवार से आनेवाले मौर्य संघ परिवार से बचपन से ही जुड़े हुए थे और लंबे समय तक विहिप के पूर्णकालिक प्रांत संगठन मंत्री रहने के अलावा पार्टी की यूपी इकाई में भी कई महत्वपूर्ण जिम्मेवारियां संभाल चुके थे। लेकिन उन्हें असली प्रतिफल मिला उस एकला चलो की गुटनिरपेक्ष राजनीति का जिसने उन्हें भी अचंभित करते हुए पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है क्योंकि इस पद के लिये लंबी मगजमारी व खींचतान के बाद भी किसी एक नाम पर आम सहमति नहीं बन रही थी। खैर, मौर्य सरीखे नेताओं का नाम भले ही आम लोगों के नजरिये से अधिक आकर्षक ना हो लेकिन जमीन संवारने के लिये जमीनी नेताओं को आगे लाना पार्टी के लिये दूरगामी तौर पर अवश्य फायदेमंद साबित हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

दूसरों की गलतियां परोसकर अपनी कमियां छिपाने की रणनीति

‘उठी हुई उंगली के पीछे छिपा हुआ चेहरा’


इन दिनों जिसे देखिये वही दूसरों पर उंगली उठाता हुआ दिख रहा है। सबकी उंगलियां एक दूसरे की ओर हैं। चारों तरफ उंगली ही उंगली। चेहरा तो किसी का दिख ही नहीं रहा। ऐसे में यह समझ पाना बेहद मुश्किल हो चला है कि उंगलियों के पीछे चेहरा छिप जा रहा है या चेहरा छिपाने के लिये ही उंगली उठाई जा रही है। मामला कोलकाता में हुए ओवरब्रिज हादसे का हो या पठानकोट में हुए आतंकी हमले की पड़ताल के लिये भारत आयी पाकिस्तानी जांच टीम का। या फिर कृष्णा गोदावरी बेसिन में भारी भरकम निवेश व कुप्रबंधन के कारण गुजरात के सरकारी खजाने को लगी चपत से लेकर पनामा पेपर्स लीक का मसला ही क्यों ना हो। सतह पर सुलगते दिख रहे तमाम ज्वलंत मामलों में सामने सिर्फ उंगलियां ही दिख रही हैं, जो सभी एक दूसरे की ओर उठाये घूम रहे हैं। हालांकि अपनी खामियों, गलतियों व कमियों को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं करना और दूसरों के हर काम की पूरी शिद्दत से नुक्ताचीनी करना तो सियासत का स्वभाव ही होता है, लेकिन उंगलियां उठाने के क्रम में इन दिनों अपने अधिकार व कर्तव्य क्षेत्र की सीमारेखा का सम्मान करना भी जरूरी नहीं समझा जा रहा है। मिसाल के तौर पर पठानकोट मामले की जांच के लिये भारत आयी पाकिस्तान की जेआईटी के मामले को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व उनके करीबी सिपहसालारों ने प्रधानमंत्री के प्रति जिस भाषा व अलंकारों का उपयोग किया है उसे उंगली उठाने के बहाने अपना चेहरा छिपाने की कवायद ना कहें तो और क्या कहें। कहां तो पड़ोसी सूबे हरियाणा से पीने का पानी मांगना भी इनके लिये दुरूह हो रहा है और कहां ये सीधा भारत-पाकिस्तान के रिश्तों का विश्लेषण करने में जुटे हुए हैं। मुफ्त वाईफाई व बेहतरीन सार्वजनिक परिवहन सेवा देने सरीखे अपने मुख्य चुनावी वायदे को तो ये शायद ही कभी याद करते हों लेकिन वर्ष 2012 में सोने पर एक्साइज लगाने का भाजपा द्वारा किया गया विरोध इन्हें बखूबी याद है। इनके मुताबिक पाकिस्तानी जांच दल को पठानकोट जाने की इजाजत देकर प्रधानमंत्री ने भारतमाता की पीठ में छुरा घोंप दिया है लेकिन पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट पर भरोसा करने के क्रम में भारतीय मीडिया द्वारा प्रचारित-प्रसारित तथ्यों को खारिज करके ये किन तत्वों का मनोबल बढ़ा रहे हैं इस पर तो इन्होंने कभी विचार भी नहीं किया होगा। जाहिर है कि दिल्ली के विकास की अपनी जिम्मेवारी निभाने से ज्यादा केन्द्र सरकार पर गरजने-बरसने में अपनी ऊर्जा खपाने के पीछे कहीं ना कहीं इनकी उंगली उठाने की आड़ में अपना चेहरा छिपाने की रणनीति ही छिपी हुई है। यही हालत कांग्रेस की भी है और भाजपा की भी। गुजरात में केजी बेसिन के मामले में बरती गयी वित्तीय व नीतिगत अनियमितताओं को लेकर सामने आयी कैग रिपोर्ट के बारे में भाजपा से कुछ पूछा जाये तो वह यह कहते हुए सीधे कांग्रेस पर उंगली उठा देती है कि जिसने दस साल के कार्यकाल में सरकारी खजाने का 15 लाख करोड़ रूपया हजम कर लिया हो उसे भ्रष्टाचार के बारे में कोई सवाल करने का नैतिक अधिकार ही नहीं है। दूसरी ओर असम में 15 साल के शासनकाल का हिसाब देने के बजाय कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व केन्द्र सरकार की नाकामियां गिनाकर ही चुनावी भवसागर पार कर लेने में जुटा हुआ है। हालांकि कांग्रेस तो अपने साठ साल के राष्ट्रव्यापी शासन का हिसाब-किताब देना भी गवारा नहीं करती अलबत्ता हर सवाल के जवाब में भाजपा की ओर उंगली उठाकर अपना चेहरा छिपाने से उसे कतई गुरेज नहीं है। खैर, विरोधियों पर उंगली उठाकर अपना चेहरा छिपाने में तो ममता बनर्जी भी कम उस्ताद नहीं हैं जिन्होंने कोलकाता में हुए फ्लाईओवर हादसे की पूरी जिम्मेवारी वामदलों की पूर्ववर्ती सरकार पर थोप दी है। लेकिन वे यह बताना जरूरी नहीं समझती कि जब उन्हें ‘परिवर्तन’ के लिये जनता का समर्थन मिला था तो पिछली सरकार द्वारा उपकृत की गयी कंपनी को ही इनका भी वरदहस्त क्यों मिलता रहा और जब रेल मंत्रालय इनकी मुट्ठी में था तब काली सूची में शामिल इसी कंपनी को बारामुला-उधमपुर में रेल टनल बनाने का ठेका क्यों दे दिया गया। जाहिर है कि हर सवाल के जवाब में उंगली उठाने की कोशिशें वास्तव में अपना चेहरा बचाने की रणनीति का ही हिस्सा रहती हैं। तभी तो पनामा पेपर्स के मामले में सीधे तौर पर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कराने के बजाय भाजपा यह याद दिला रही है कि उसके सभी सांसदों ने जब संसद के दोनों सदनों में अपना कोई विदेशी खाता नहीं होने का शपथपत्र दाखिल किया तो कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार ने इसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं ली और बकौल संबित पात्रा, सोनिया की आलमारी खुल जाये तो पूरा कालाधन बिखरा नजर आएगा। जाहिर है कि ऐसी दलीलों का तो कोई जवाब हो भी नहीं सकता है। लेकिन मसला है कि अपना चेहरा छिपाने के लिये दूसरों पर उंगली उठाने की रणनीति अगर सियासी सफलता की गारंटी दिला सकती तो ना भाजपा की बिहार में बुरी गत होती और ना ही एक के बाद एक विभिन्न कांग्रेसशासित सूबों में आंतरिक विद्रोह का बवंडर उठता। खैर, आम मतदाताओं के सामने दूसरों की गलतियां परोसकर अपनी कमियां छिपाने की रणनीति का कभी-कभार तात्कालिक लाभ अवश्य मिल सकता है बशर्ते बाद में ढ़ोल की पोल खुलने पर होनेवाले नुकसान की भरपाई करने का जोखिम उठाने के लिये तैयार रहा जाए। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

गुरुवार, 31 मार्च 2016

‘नाच ना जाने आंगन टेढ़ा’

‘नाच ना जाने आंगन टेढ़ा’

पहले अरूणाचल प्रदेश फिर उत्तराखंड और अब मणिपुर। कतार में हिमाचल भी है और कर्नाटक भी। कहने को तो ये सभी अलग प्रदेश हैं लेकिन इन सभी कांग्रेसशासित सूबों की अंदरूनी कहानी काफी हद तक एक सी ही है। हर जगह नेतृत्व के खिलाफ बगावत की चिंगारी अंदर से ही उभरती दिख रही है। बहुत मुमकिन है कि उस चिंगारी को बाहर से हवा दी जा रही होगी। लेकिन आग जब अंदर से ही सुलग रही हो तो बाहरवालों को क्या दोष देना। बाहरवाले तो चाहेंगे ही कि घर टूटे ताकि उन्हें मलाई काटने का मौका मिल सके। इसी का नाम तो सियासत है, जिसमें इन दिनों कांग्रेस की स्थिति काफी हद तक दयनीय हो चली है। अरूणाचल में भी अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल कांग्रेसी विधायकों ने ही बजाया और उत्तराखंड में भी उसकी ही पुनरावृति हुई। अब मणिपुर भी उसी राह पर बढ़ता दिख रहा है। लेकिन कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व यह जताने में जुटा हुआ है मानो उसकी सरकारों को असंवैधानिक तरीके से सियासी विद्वेष की भावना के तहत अपदस्थ करने की कोशिश की जा रही है ताकि कांग्रेसमुक्त भारत के सपने को साकार किया जा सके। ऐसे में लाख टके का सवाल है कि आखिर दूसरों को दोष देने के बजाय आत्मचिंतन क्यों नहीं किया जा रहा? इस दिशा में विचार क्यों नहीं हो रहा कि एक के बाद हर सूबे में पार्टी के अपने ही विधायक बगावत की राह पकड़ने के लिये क्यों मजबूर हो रहे हैं। हालांकि ऐसे मामलों में राजनीतिक लाभ के लिये संवेदना की सियासत करना मजबूरी भी है और इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। लेकिन बंद दरवाजे के भीतर अगर बीमारी की पहचान करके उसका समुचित इलाज तलाशने की कोशिश नहीं की गयी तो यही नासूर जो उत्तराखंड के बाद अब मणिपुर में पनपता दिख रहा है वह आगे चलकर कर्नाटक को भी चपेट में ले सकता है और बाकी अन्य चार उन सूबों को भी जहां कांग्रेस की सरकार है। दरअसल पार्टी के भीतर जब एक ओर शीर्ष व कनिष्ठ स्तर के बीच संवादहीनता की स्थिति बन जाये और दूसरी ओर शीर्षतम स्तर पर वर्चस्व के टकराव व नीतिगत मसलों पर विरोधाभासी फरमान जारी होने की परंपरा शुरू हो जाये तो संगठन में टूट-फूट, बिखराव व टकराव की स्थिति उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। जब अरूणाचल प्रदेश में पार्टी के विधायक दल में टूट की स्थिति बनी तो मामले को सुलझाने व बातचीत करके सुलह-सहमति की राह तलाशने के बजाय अगर पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्रपति के पास जाकर सरकार बचाने की गुहार लगाने लगे तो लाजिमी है कि बागियों के पास संगठन से विद्रोह करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचेगा। यही मामला उत्तराखंड में भी देखा गया जहां बागियों को मनाने या उनकी बात सुनने की भी जहमत भी नहीं उठायी गयी और बहुमत का विश्वास खो चुके मुख्यमंत्री को सरकार बचाने के लिये कुछ भी कर गुजरने की पूरी छूट दे दी गयी। तभी तो वह स्टिंग भी सामने आया जिसमें सरकार बचाने के लिये रावत साहब अपने ही दल के विधायकों की बोली लगाते नजर आये। अब ऐसा ही कुछ मणिपुर में भी हो रहा है जहां कांग्रेस के 47 में से 25 विधायकों ने मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के खिलाफ  बगावत का बिगुल बजा दिया है और उन्हें पद से हटाने की मांग पर अड़ गये हैं। जाहिर तौर पर वहां भी इबोबी के खिलाफ मोर्चा खोलनेवालों की वैसी ही कुछ मांग है जैसी अरूणाचल व उत्तराखंड के बागियों की थी। वहां भी तो पहले पार्टी के भीतर ही इंसाफ मांगने की कोशिश हुई और मुख्यमंत्री की मनमानी नीतियों के खिलाफ आलाकमान के सामने गुहार लगाने का प्रयास किया गया। लेकिन जब ना तो शीर्ष नेतृत्व से कोई तवज्जो मिली और ना ही सूबे की सियासत में सुधार होने की गुंजाइश बची तब थक-हारकर बागियों को आर-पार की निर्णायक लड़ाई छेड़ने के लिये विवश होना पड़ा। ऐसे में इतना तो स्पष्ट है कि अगर एक के बाद तमाम प्रदेशों में स्थापित नेतृत्व के खिलाफ विरोध व विद्रोह का दावानल एक सरीखा ही सुलग रहा है और उसका इलाज करने में भी हर जगह एक ही रणनीति अपनाई जा रही है तो निश्चित तौर पर संगठन में शीर्ष स्तर पर कुछ तो गड़बड़ है जिसे या तो समझा नहीं जा रहा है या फिर समझने के बावजूद नहीं समझने का प्रयास किया जा रहा है। अगर शीर्ष स्तर पर मामले को संभालने का शिद्दत से प्रयास होता तो कोई कारण ही नहीं है कि हरक सिंह रावत व विजय बहुगुणा सरीखे ऐसे नेताओं को अपनी ही पार्टी से अलग होकर अनिश्चितता की सियासी राह पर आगे बढ़ना पड़ता जिन्होंने सूबे में पार्टी को स्थापित करने के लिये अपनी पूरी उम्र खपा दी। ऐसे में आवश्यकता तो यह है कि बागियों को दुश्मन मानने के बजाय उनकी समस्याओं को समझा जाये, उनकी परेशानियों को दूर किया जाये और संगठन में समन्वय, सहभागिता व सहचर्य का माहौल मजबूत किया जाये। लेकिन विचित्र बात है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व सांगठनिक स्तर पर सामने आ रही अंदरूनी समस्याओं का ठीकरा विरोधियों पर फोड़कर खुद को दीन-हीन दिखाने व लोगों की संवेदना हासिल करने की रणनीति पर अमल करता दिख रहा है। जबकि सच तो यह है कि दूसरों को दोषी ठहराकर आंगन को ही टेढ़ा बताने से दूरगामी तौर पर कुछ भी हासिल नहीं होनेवाला है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

शनिवार, 26 मार्च 2016

दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें ....

‘दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें’

वाकई इन दिनों भाजपा सहित संघ परिवार के तमाम अनुषांगिक संगठनों से जुड़े लोगों के मन में साहिर साहब का यही सवाल सुलग रहा है कि ‘दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें, तुमको ना हो खयाल तो हम क्या जवाब दें।’ यह सवाल लाजिमी भी है। क्योंकि लोग तो पूछेंगे कि विपक्ष में रहने के दौरान जो बड़ी-बड़ी बातें की जा रही थीं उन्हें सत्ता में आने के बाद क्यों भुला दिया गया। बातें सिद्धांतों की, विचारों की और सुनहरे सपनों की। कहते हैं कि भाजपा अलग ही मिट्टी-पानी की पार्टी है जो सत्ता की बजाय सिद्धांतों की सियासत करती है। लिहाजा सत्ता पर पूरी बहुमत से कब्जा हो जाने के बाद सिद्धांतों से किनारा किये जाने पर सवाल तो उठेंगे ही। कहां गये वो सिद्धांत जो कहते थे कि देश में एक भी बांग्लादेशी घुसपैठिये को रहने-बसने की इजाजत नहीं दी जाएगी। कहां गयी वह सोच जो समूचे देश के लिये ‘एक प्रधान, एक विधान और एक निशान’ की बात कहती थी। बातें तो गऊ रक्षा की भी की जाती थी और भव्य राममंदिर की भी। लेकिन अब तमाम बातें खुले में रखे कपूर की मानिंद गायब दिख रही हैं। कहने को तो असम के लिये जारी किये गये विजन डाक्यूमेंट में एक बार फिर भाजपा ने दोहराया है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को हर्गिज देश की सरहद में दाखिल नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि अब जबकि केन्द्र की सत्ता संभाले हुए पार्टी को तकरीबन दो साल का वक्त होने जा रहा है तो वह कितने बांग्लादेशियों को असम से खदेड़ कर सरहद के उस पार भेजने में कामयाब हुई है? तरूण गोगोई के शब्दों में जवाब तो सिफर ही है, यानि निल बटा सन्नाटा। ऐसे में अगर पार्टी के ताजा वायदे को विरोधियों द्वारा ‘नये जुमले’ का नाम दिया जा रहा है तो इसमें गलत ही क्या है? कहने को तो अमित शाह ने केवल प्रधानमंत्री के उस वायदे को ही चुनावी जुमला बताया था जिसमें उन्होंने विदेशों में जमा भारतीयों का कालाधन वापस आ जाने के नतीजे में हर किसी के हिस्से में 17 लाख रूपया आने की बात कही थी। लेकिन हकीकत तो यही है कि चुनावी जुमला सिर्फ वही नहीं था। अलबत्ता लच्छेदार भाषा में की गयी संघ परिवार के विचारों व मूलभूत सिद्धांतों से जुड़ी तमाम बातें भी अब जुमलेबाजी सरीखी ही महसूस हो रही हैं। तभी तो पिछले हफ्ते हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रखर राष्ट्रवाद के अलावा उन तमाम मसलों पर पूरी तरह चुप्पी साध ली गयी जो भाजपा की पहचान से जुड़े मुद्दे माने जाते रहे हैं। ना गऊरक्षा की कोई बात हुई और ना ही धारा 370 की। राममंदिर और समान नागरिक संहिता का मसला तो हाशिये पर भी नहीं रहा। उस पर तुर्रा यह कि कार्यकारिणी का औपचारिक समापन करते हुए प्रधानमंत्री ने ‘विकास, विकास और विकास’ के एजेंडे पर ही ध्यान केन्द्रित रखने का निर्देश देते हुए कार्यकर्ताओं को सख्त लहजे में समझा दिया कि वे व्यर्थ के मुद्दों में हर्गिज ना उलझें। अब प्रधानमंत्री ने किन मुद्दों को व्यर्थ बताया यह समझाने में तो गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी उलझकर रह गये। लेकिन अगर जीतेन्द्र सिंह द्वारा धारा 370 का मुद्दा उठाये जाने पर उन्हें चुप करा दिया जाता हो और साक्षी महाराज द्वारा वर्ष 2019 से पूर्व ही अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो जाने का एलान किये जाने पर पार्टी नेतृत्व असहज हो जाता हो तो यह समझने में शायद ही किसी को मुश्किल पेश आएगी कि प्रधानमंत्री ने किन मसलों को व्यर्थ बताने की कोशिश की है। सच तो यह है कि खुद को ‘बीफ भक्षक’ बतानेवाले मंत्रीपद पर शोभायमान हैं और गौमांस को प्रतिबंधित किये जाने की मांग करनेवाले गौभक्तों की टोली को गुजरात के राजकोट में सामूहिक आत्महत्या करने के लिये विवश होना पड़ा है। अलबत्ता अपने मूलभूत सिद्धांतों में शामिल प्रखर राष्ट्रवाद के मसले का झंडा आगे रखते हुए ‘भारत माता की जय’ का नारा अवश्य गुलंद किया जा रहा है लेकिन ना कश्मीर में पाकिस्तान का झंडा लहरानेवाली आसिया अंद्राबी पर कोई सख्ती हो रही है और ना ही 370 की कट्टर समर्थक पीडीपी के साथ साझेदारी की सरकार बनाने में कोई संकोच महसूस किया जा रहा है। बल्कि कश्मीर में कदम रखते ही शायद ‘राष्ट्रवाद’ का मसला भी वैसे ही व्यर्थ हो जा रहा है जैसे केरल व नागालैंड सरीखे सूबों में गऊ रक्षा का मुद्दा। अलबत्ता पूरा जोर है ना सिर्फ सत्ता पर अपनी पकड़ को सलामत रखने पर बल्कि अनछुए इलाकों में अपना विस्तार करने पर भी। ऐसे में वैचारिक व सैद्धांतिक मसले अगर व्यर्थ लग रहे हैं तो यह काफी हद तक वैसा ही है जैसे सवर्णों के वोट को अपनी बपौती जागीर समझकर दलितों व पिछड़ों को लुभाने के लिये पूरी ऊर्जा झोंक दिया जाना। अब इसका नतीजा अगर बिहार जैसा ही रहा तो मुश्किल हो भी सकती है लेकिन फिलहाल तो पार्टी को वैसा कुछ होता हुआ दिख नहीं रहा। लिहाजा सैद्धांतिक मसलों पर जुमलेबाजी की भी जरूरत नहीं समझी जा रही है। लेकिन पेंच उन लाखों भाजपाई कार्यकर्ताओं व स्वयंसेवकों के सामने फंसा हुआ है जो इन तमाम मसलों पर पूछे जानेवाले सवालों का कुछ भी जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं और खुद ही यह सवाल करते हुए महसूस हो रहे हैं कि ‘दुनियां करे सवाल तो हम क्या जवाब दें.....?’ ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

‘सियासी समीकरणों पर हावी जिद का जुनून’

‘सियासी समीकरणों पर हावी जिद का जुनून’

किसी भी लक्ष्य को हासिल करने की पहली सीढ़ी होती है जुनून की हद तक जिद ठानना। लेकिन जिद ठानने से पहले आवश्यक है लक्ष्य का निर्धारण। लक्ष्य ऐसा हो जिसकी शुचिता, प्रामाणिकता, वैद्यता व सर्वस्वीकार्यता भी हो। तभी उसे हासिल करने की राह में कोई अकेला भी निकले तो उसके पीछे लोग जुड़ते हैं और कारवां बनता व बढ़ता चला जाता है। लेकिन अगर लक्ष्य ही ऐसा हो जो नैतिकता, वैधानिकता व व्यवहार्यता की कसौटी पर खरा ना उतरे तो ऐसे लक्ष्य के निर्धारकों के साथी, सहयोगी व समर्थक अधिक दिनों तक एकजुट नहीं रह पाते। नतीजन ऐसे लक्ष्य को हासिल करने के लिये ठानी गयी जिद के कारण भले ही आरंभिक व तात्कालिक तौर पर चैतरफा परेशानियों, समस्याओं व अव्यवस्थाओं का बोलबाला दिखाई दे लेकिन गुजरते वक्त के साथ ऐसे मसलों की जिद लगातार कमजोर होकर आखिरकार अपना अस्तित्व ही खो देती है। यहां तक कि कई बार जिद ठाननेवाले भी अपने लक्ष्य से ना सिर्फ विमुख हो जाते हैं बल्कि अपने ही द्वारा तय किये गये लक्ष्य का कड़ा विरोध करने से परहेज नहीं बरतते हैं। पिछले कुछ दशकों में ही ऐसे कई उदाहरण सामने आये हैं जब पहले तो किसी गलत मसले पर जुनून की हद तक जिद ठानी गयी लेकिन बाद में उस लक्ष्य की कमियों व खामियों से अवगत होने के बाद तयशुदा लक्ष्य की विपरीत दिशा में पहलकदमी करने से परहेज नहीं बरता गया। मसलन जब राजीव सरकार ने कामकाज के कम्प्यूटरीकरण की नींव रखी तो तमाम विरोधी दलों, गैरराजनीतिक संगठनों व सामाजिक संस्थाओं की ओर से इसका भारी विरोध किया गया। दलील दी जा रही थी कि जब इंसानों का काम कम्प्यूटर करने लगेगा तो इंसान क्या करेंगे। लेकिन अब ये हालत है कि कम्प्यूटर का विरोध करनेवाले ही डिजिटल इंडिया के सबसे बड़े पैरोकार बने हुए हैं। यही हालत हुई जब कांग्रेसनीत संप्रग की पिछली सरकार ने सरकारी सब्सिडी का लाभ आधार को आधार बनाकर ही लोगों को दिये जाने का प्रस्ताव रखा। तब तो लोगों की निजता का अधिकार छिन जाने का हौव्वा खड़ा करके ऐसी हाय तौबा मचायी गयी कि आधार को कानूनी व संवैधानिक स्वीकार्यता मिलना भी संभव नहीं हो सका। लेकिन उस दौरान आधार का सबसे प्रबल विरोध करनेवालों की टोली जब सत्ता में आयी तो उसे अपनी सोच बदलनी पड़ी। अब तो वे आधार के इतने प्रबल पैरोकार बनकर सामने आये हैं कि जब उन्हें लगा कि इसके विधेयक को राज्यसभा से पारित कराने में परेशानी हो सकती है तो संसदीय व्यवस्था का सहारा लेकर इन्होंने इसे ‘मनी बिल’ की शक्ल में लोकसभा में पेश कर दिया क्योंकि किसी भी ‘मनी बिल’ को अटकाने, लटकाने, खारिज करने या उसमें संशोधन करने का राज्यसभा को अधिकार ही नहीं है। यानि समग्रता में देखें तो अगर लक्ष्य जनलोकपाल लागू कराने सरीखा हो तो एक सामान्य नौकरशाह के पीछे भी समूचा देश खड़ा हो जाता है और एक ऐसी राजनीतिक पार्टी पैदा होती है जो अपने गठन के डेढ़ साल के भीतर ही 96 फीसदी सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली प्रदेश की सत्ता पर कब्जा कर लेती है। लेकिन अगर लक्ष्य हो सोने पर एक फीसदी एक्साइज ड्यूटी के बजटीय प्रस्ताव को खारिज कराने का तो तत्कालीन विपक्ष की गलत सोच के कारण स्वर्णकारी की आड़ में कालेधन को छिपाने का कारोबार करनेवालों को वर्ष 2012 में भले ही इस मामले में कामयाबी मिल गयी हो लेकिन इस दफा तो काले को सफेद करनेवालों को निराशा ही हाथ आनेवाली है। भले ही उन्होंने आड़ ले रखी हो आम स्वर्णकारों के हितों की लेकिन चुंकि इस व्यवस्था का ना तो ग्राहकों पर कोई असर पड़ना है और ना ही सामान्य मेहनतकश स्वर्णकारों पर। अलबत्ता इससे सोने के पूरे साम्राज्य की जन्म-कुंण्डली सरकार के सामने खुलकर आ जाने के कारण इसमें जारी गोरखधंधे पर नकेल कस जाएगी और कालाधन खपाने का यह रास्ता बंद हो जाएगा लिहाजा शुरूआत में जिन व्यापारी संगठनों ने स्वर्णकारों के आंदोलन को अपना समर्थन दिया था, वे भी अब लगातार पीछे हटते दिख रहे हैं। खैर, जुनून की हद तक ऐसी ही जिद का नजारा दिख रहा है ‘भारत माता की जय’ कहलवाने और गर्दन पर छुरी होने के बावजूद यह नहीं कहने को लेकर। इसमें कायदे से देखें तो अव्वल तो किसी भी भारतवासी की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाना ही बेमानी है और दूसरे इतनी स्वतंत्रता तो सबको मिलनी ही चाहिये कि वह चाहे तो अपने देश के मानचित्र में मां की छवि देखे अथवा अपने महबूब की। अगर किसी का मजहब खुदा के अलावा किसी और का वंदन-पूजन करने की इजाजत नहीं देता तो इसे सम्मानपूर्वक स्वीकार करके उसके दिल से निकली ‘जय हिंद’ और ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ की बुलंद व पुरकशिश आवाज को ही पर्याप्त क्यों ना मान लिया जाये। लेकिन जिद है, तो है। खैर, राजनीतिक लाभ के लिये ठानी जानेवाली ऐसी जिद भले ही तात्कालिक तौर पर स्थापित सियासी समीकरणों पर भारी पड़ जाये लेकिन आखिरकार भारी अफरातफरी के बाद जब इसकी हकीकत सामने आती है तो इसके आधारहीन लक्ष्य का कोई अस्तित्व ही नहीं बचता है। बल्कि ऐसे में शर्मसार होना पड़ता है उन्हें जो बिना आगे-पीछे की हकीकत को पहचाने ही बेतुकी जिद ठान बैठते हैं। लेकिन भले ही बाद में सब कुछ सही हो जाये और पूरे मामले को भुला दिया जाये लेकिन इससे होनेवाले तात्कालिक नुकसान की भरपायी तो नामुमकिन ही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 
@नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

सोमवार, 14 मार्च 2016

‘आधी आबादी के हितों की सियासी पैरोकारी’

‘आधी आबादी के हितों की सियासी पैरोकारी’

चुनावी राजनीति का प्राणवायु तो वोट ही है। लिहाजा राजनीति का वोट केन्द्रित होना लाजिमी ही है। तभी तो राजनीतिज्ञों की हर कथनी और करनी को वोटों के समीकरण से जोड़कर देखे जाने की पुरानी परंपरा रही है। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि हर राजनीतिक दल को मतदाताओं के जिस वर्ग से समर्थन हासिल होने की उम्मीद दिखती है वह उधर ही लुढ़क जाता है। इसके लिये कभी तुष्टिकरण का सहारा लिया जाता है तो कभी एक को निशाने पर रखकर दुसरे को लुभाने की तरकीब आजमायी जाती है। इसी वोटकेन्द्रित राजनीति के कारण विचारधाराएं भी स्थापित होती हैं और सिद्धांत भी। तभी तो कल तक ‘तिलक तराजू और तलवार को जूते चार’ मारने का आह्वान करनेवालों को जब समझ आता है कि सीमित मतदातावर्ग के सहारे असीमित लक्ष्य हासिल कर पाना संभव नहीं है तो वे अपने सिद्धांतों में तब्दीली करके ‘हाथी’ को गणेश व ब्रह्मा, विष्णु, महेश का प्रतीक बताने से भी परहेज नहीं करते हैं। कोई देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक होने की बात करता है तो कोई बहुसंख्यकवाद की राजनीति को नये आयाम तक पहुंचाने की कोशिशों में जुटा दिखता है। यहां दोस्ती भी वोट के लिये होती है और दुश्मनी भी। कभी दुश्मनों के बीच दोस्ती का दिखावा होता है तो कभी दोस्तों के बीच दुश्मनी का। हालांकि अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक और अगड़े-पिछड़े की सियासी धुरी अपनी जगह बदस्तूर कायम है लेकिन लंबे समय से जारी खींचतान के कारण इसमें इतना अधिक घालमेल हो गया है कि अब इसके आकर्षण व चमक में पहलेवाली बात नहीं दिख रही। अब तो पुराने समीकरणों को नये हालातों में प्रभावी तौर पर लागू करना भी बेहद मुश्किल हो चला है। अब ना तो भाजपा पहले जैसी अछूत या मनुवादी है और ना ही राष्ट्रीय राजनीति में अल्पसंख्यक मतों का एकमुश्त ध्रुवीकरण संभव हो पा रहा है। दलित व आदिवासी समाज में भी क्षेत्रीय व सूबाई स्तर पर भारी बिखराव का माहौल है। ऐसे में इन दिनों एक नया प्रयोग उस आधी आबादी को अपने साथ जोड़ने का चल रहा है जिस पर सांप्रदायिक व भावनात्मक सियासी शगूफों का असर सबसे कम होता है और जो खामोशी से मतदान करके पूरा खेल बदल देने की कूवत रखती है। आधी आबादी के वोट की ताकत का एहसास सबसे मजबूत तरीके से पहले मध्य प्रदेश में व बाद में बिहार में सबको हो चुका है। यहां तक कि ओडिशा की स्थायी सरकार को भी इसी आधी आबादी के मजबूत समर्थन से ताकत मिलती रही है। यही वजह है कि इन दिनों महिलाओं का दिल जीतकर उनको अपने पक्ष में लामबंद करने की होड़ सी चल पड़ी है। सूबाई स्तर पर देखें तो महिलाओं का दिल जीतने के लिये बिहार में शराबबंदी का ऐलान करने से लेकर नकली शराब बनानेवालों के लिये मौत की सजा तक का प्रावधान किया जा रहा है। आलम यह है कि कोई सूबा बेटियों को सायकिल बांट रहा है, कोई लैपटाॅप तो कोई वजीफा। कोई लाडली लक्ष्मी योजना चलाकर हर बेटी को लखपती बना रहा है तो कहीं बेटी के जन्म के शगुन से लेकर कन्यादान तक का खर्च वहन करने में भी सरकार सहायक बन रही है। कहीं वृद्ध माताओं को तीर्थाटन कराने की योजनाएं संचालित हो रही हैं तो कहीं राज्य परिवहन की बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा का कूपन बांटा जा रहा है। आलम यह है कि हर प्रदेश का सत्ताधारी दल खुद को सबसे बड़ा महिला हितैषी साबित करने की होड़ में है। स्थानीय चुनावों में महिलाओं के लिये आरक्षण का इंतजाम करने की बात हो या नौकरियों में महिलाओं को प्राथमिकता देने की। हर सरकार बढ़-चढ़कर महिला सशक्तिकरण की राह पर अग्रसर है। यहां तक कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान बताते हैं कि वे अपने सूबे की सभी महिलाओं के भाई हैं और खुद को मामा कहकर संबोधित किया जाना ही पसंद करते हैं। यानि समग्रता में देखें तो देश की आधी आबादी इन दिनों वोट बैंक की राजनीति का नया केन्द्र बनकर सामने आयी है जिसका सहयोग व समर्थन हासिल करने की कोशिशों में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। इसमें दिलचस्प बात यह है कि परंपरागत सियासी हथकंडों व भावनात्मक शगूफों से महिलाओं को बरगलाना संभव नहीं होने के कारण सबोंको अब इन्हें सीधा फायदा पहुंचाने की योजनाएं भी लागू करनी पड़ रही हैं और विकास व सुशासन की राह पर आगे भी बढ़ना पड़ रहा है। तभी तो केन्द्र सरकार के तमाम विभागों ने भी महिलाओं को केन्द्र में रखकर नयी-नयी योजनाओं को जमीन पर उतारना आरंभ कर दिया है। मसलन चूल्हे की कीमत पर गैस का कनेक्शन देने की बात हो या महिला बैंक का विस्तार करने की, सुकन्या समृद्धि योजना का विस्तार करने की, महिला को ही परिवार के मुखिया की मान्यता देने की या महिलाओं को ट्रेन में सीट बदलने की सहूलियत देने की। यहां तक कि विधायिका में आरक्षण देने की कटिबद्धता भी अब स्पष्ट दिख रही है। बहरहाल, वोट बैंक के तौर पर महिलाओं को एक अलग नजरिये से देखे जाने की इस नयी परंपरा से मौजूदा पितृसत्तात्मक समाज को यह तो समझ ही जाना चाहिये कि आगामी दिनों में इस वोट बैंक पर कब्जे का सियासी संघर्ष लगातार तेज होनेवाला है जिसके नतीजे में महिला आरक्षण का विरोध करने के बहाने मुलायम सिंह यादव सरीखे नेताओं द्वारा दी जाती रही दलीलें अब कतई स्वीकार्य नहीं हो सकती हैं। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

‘कौन रोता है किसी और की खातिर ऐ दोस्त.....’

‘कौन रोता है किसी और की खातिर ऐ दोस्त.....’

इन दिनों देश का सियासी माहौल ऐसा दिख रहा है मानो हर तरफ आंसुओं की बाढ़ आयी हुई हो। सरकार हो या विपक्ष, सभी टेसुए बहा रहे हैं। यहां तक कि सियासी दलों के गैरसियासी मुखौटों की आंखों से भी आंसुओं की बरसात हो रही है और सामाजिक सरोकारवाले संगठनों की आखें भी सुर्ख पनीली दिख रही हैं। आलम यह है कि ऐसा कोई ढ़ूंढ़े से नहीं मिल रहा जिसके सीने में आग और आंखों में नमी ना हो। जिसकी निगाहों से देखें तो मौजूदा व्यवस्था व हालातों में कहीं कोई कमी ना हो। सरकार अपनी किस्मत को रो रही है और विपक्ष रो रहा है सरकार की करतूतों पर। बाकियों को देश व देशवासियों की बदहाली खाए जा रही है। हमेशा की तरह सबकी सोच यही है कि उसके अलावा बाकी सभी देश को रसातल में गर्क करने पर आमादा हैं। एक वही है जिसने बचाया हुआ है, देश व समाज को टूटने से, डूबने से और लुटने से। कोई भी यह मानने के लिये तैयार नहीं कि वह अपने हित और अपने फायदे के लिये रो रहा है। अलबत्ता स्यापा हर तरफ देशहित का ही हो रहा है। सरकार का गम है कि उसे ऐसे विपक्ष को झेलना पड़ रहा है जो किसी भी मामले में कतई सहयोग करके राजी नहीं है। नतीजन देश के विकास की गाड़ी राज्यसभा की दहलीज से निकल ही नहीं पा रही है। यानि देश की उन सभी समस्याओं को लेकर सरकार रो रही है जिसे वह हल तो कर सकती है लेकिन उसे ऐसा करने नहीं दिया जा रहा है। अब सवाल है कि लोकसभा की लड़ाई के वक्त तो यह बताया ही नहीं था कि जितने वायदे किये जा रहे हैं वे सभी शर्तों के अधीन हैं। शर्त राज्यसभा में बहुमत की, विपक्ष के सहयोग की और विधानसभाओं के चुनाव में जीत की। तब तो ऐसी हवा बांधी थी मानो इनकी सरकार बनी नहीं कि तमाम समस्याएं उड़न-छू। लेकिन जादूई वायदों को जमीन पर उतारने में नाकाम रहने की तोहमत लगने की शुरूआत होने के साथ ही देश के नाम पर रोना-पीटना शुरू कर दिया गया है। दूसरी ओर विपक्ष रो रहा है सरकार की मनमानी पर और उसकी जनविरोधी नीतियों पर। दलील यह कि इससे देश के आम लोगों का जीना दुश्वार हो रहा है और देशहित से जुड़े मसले कमजोर पड़ रहे हैं। सरकार को कोसने और आम लोगों की बदहाली का रोना रोने के क्रम में अपने आंसुओं की बाढ़ में ये उन यादों को जलसमाधि देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं कि अपने राज में इन्होंने देश को किस तरह का ‘रामराज’ दिया था। खैर, अब तो कन्हैया भी कह रहा है कि उसे देश से नहीं बल्कि देश के लिये आजादी चाहिये। आजादी चाहिये भूख से, गरीबी से, बदहाली से, बेबसी से, असमानता से और भेदभाव से। वह भी देश के लिये ही अपना सीना कूट रहा है और आम लोगों की भीषण पीड़ा के संताप में जार-जार रो रहा है। कन्हैया द्वारा जिस सोच व तेवरों का मुजाहिरा किया जा रहा है उससे तो ऐसा ही लग रहा है कि पिछली सरकारों के कार्यकाल में देश का भारी विकास हो रहा था जिसे मौजूदा सरकार ने विनाश की कगार पर पहुंचा दिया है। अब ऐसी सोचवालों को विस्तार से यह तो बताना ही चाहिये कि पिछली सरकार के वक्त उन्हें क्या-क्या सहूलियतें हासिल थीं जो अब नहीं है। लेकिन अपनी सहूलियत बताना जब किसी और को गवारा नहीं हो रहा तो वही क्यों बताये। देश में आजादी सिर्फ अभिव्यक्ति की तो है नहीं, असहज सवालों के जवाब में चुप्पी साधने की भी तो स्वतंत्रता है ही जिसका सबसे बेहतर उपयोग पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हमेशा से करते रहे हैं। खैर,  सीना तो सर्राफ भी कूट रहे हैं। वजह है सोने की खरीद-बिक्री पर एक फीसदी एक्साइज ड्यूटी लगा दिया जाना। उन्हें गम है उस आम आदमी के दर्द का जो एक्साईज ड्यूटी बढ़ने के कारण गहने की कीमतों में होनेवाली वृद्धि का शिकार बनेगा। जाहिर है उन्हें रोना तो आएगा ही। लेकिन असली हकीकत यही होती तो कहना ही क्या था। अलबत्ता सच तो यह है कि एक्साइज आयद हो जाने के बाद अब उन्हें यह सच सरकार से साझा करना पड़ेगा कि कब, कहां से कितना सोना आया और गया। यानि सोने की पूरी जन्मकुण्डली होगी सरकार के हाथ में जिस पर कालेधन का काला टीका लगाकर खुद को टैक्स की मार से बचाने की कोई राह ही नहीं बचेगी। इसी प्रकार मनसे सुप्रीमो राज ठाकरे को चिंता है वोट बैंक बचाने की, जबकि रोना रो रहे हैं मराठियों के हितों का और फरमान जारी कर रहें हैं कि गैरमराठियों के आॅटो-टैक्सी को सरेराह फूंक दिया जाये। यानि समग्रता में देखें तो हर रोता हुआ चेहरा यही जता रहा है कि वह अपने लिये नहीं बल्कि देश के लिये रो रहा है। हाय रे देश, हाय रे देशहित। पूरी हाय-हाय देश के लिये। यह हाय-हाय भी ऐसी जिसे दिख कर किसी का भी दिल पिघल जाए, कलेजा कांप जाए, रूदालियों की भी रूलाई फूट पड़े। लेकिन काश इन आंसुओं, स्यापों व चित्कारों की हकीकत वही होती जो दूर से दिखती है। वह नहीं होती जिसे साहिर लुधियानवी के शब्दों में कहें तो ‘कौन रोता है किसी और की खातिर ऐ दोस्त, सबको अपनी ही किसी बात पर रोना आया।’ ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

बुधवार, 2 मार्च 2016

भीड़ तमाशा करे या भीड़ तमाशाई हो.....

‘आरक्षण की आग पर राजनीति की रोटी’

कहते हैं कि ‘भीड़ तमाशा करे या भीड़ तमाशाई हो, दांव पर हर हाल में इंसानियत ही होती है।’ वास्तव में इन्हीं पंक्तियों को चरितार्थ किया है हरियाणा में जाट आरक्षण की मांग को लेकर हुए आंदोलन ने। हालांकि यह मांग कहां तक जायज है अथवा किस हद तक आवश्यक है, इस पर अलग से बहस हो सकती है। लेकिन आरक्षण के लिये आंदोलन को ऐसा रूप देना जिसमें पूरा सूबा जल उठे, बीस हजार करोड़ से भी अधिक की निजी व सरकारी संपत्ति स्वाहा हो जाये, दर्जनों लोग झटके में हलाल हो जाएं, हजारों लोग शारीरिक व आर्थिक तौर पर अपंग-अपाहिज हो जाएं, दुकानें लूटी जाएं, मकानों को जलाया जाए, सार्वजनिक संपत्तियों व सुविधाओं का होलिका दहन हो, कानून-व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया जाए और पानी, बिजली व सड़क से लेकर रेलमार्ग को भी ध्वस्त व क्षतिग्रस्त कर दिया जाए, इसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है? हालांकि सवाल यह भी है कि एक नेताविहीन स्वतःस्फूर्त जनाक्रोश की ऐसी वीभत्स अभिव्यक्ति केवल आरक्षण की मांग को लेकर हुई इसे इसे कैसे मान लिया जाये। वैसे भी इस हिंसक, वीभत्स व अमानवीय आंदोलन के कारण चैतरफा बदनामी झेल रहा जाट समुदाय अगर आंदोलन के इस स्वरूप को सही बताने की हिम्मत नहीं दिखा रहा है तो निश्चित ही इसमें कुछ तो ऐसा छिपा हुआ अवश्य है जिसे जाट आरक्षण के आंदोलन की आड़ में दबाया-छिपाया जा रहा है। खैर, चुंकि मामला जाट आरक्षण की मांग से जुडा हुआ है तो इस लिहाज से देखें तो हकीकत यही है कि देश के आठ राज्यों में मौजूद जाटों की आबादी को अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में तो स्थान मिला लेकिन इस सूची में शामिल अन्य जातियों की तरह उन्हें आरक्षण व्यवस्था का पूरा लाभ नहीं मिल सका। खास तौर से मंडल आयोग की जिस रिपोर्ट के तहत केन्द्र की मौजूदा आरक्षण व्यवस्था संचालित हो रही है उसमें ओबीसी के तहत जाटों को मान्यता ही नहीं मिली हुई है। उस सूची में जाट के बजाय जाति का नाम दर्ज है ‘चिल्ला जाट’, जिसका कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं है। दूसरी ओर हरियाणा की पूर्ववर्ती भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में जाटों को विशेष पिछड़ा वर्ग का दर्जा देते हुए उनके लिये सूबे में दस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था तो कर दी लेकिन इस प्रक्रिया में संवैधानिक व कानूनी व्यवस्थाओं का अनुपालन नहीं किया गया और पिछड़ावर्ग आयोग की सहमति नहीं ली गयी जिसके नतीजे में अदालत ने इस व्यवस्था पर रोक लगा दी। यानि समग्रता में देखा जाये तो जाटों के साथ अन्याय तो हुआ ही है। लेकिन सवाल है कि यह अन्याय किया किसने? भाजपा इसके लिये कांग्रेस को दोषी बताती है जबकि कांग्रेस का कहना है कि अगर अदालत में भाजपा की मौजूदा सरकार ने हुड्डा सरकार द्वारा लागू की गयी आरक्षण व्यवस्था का मजबूती से समर्थन किया होता तो उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं होना पड़ता। खैर, अब तो भाजपा भी जाटों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिये कटिबद्ध दिख रही है और इसके लिये पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने वेंकैया नायडू की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति भी बना दी है। लेकिन सियासत यहां भी जारी है। वर्ना आरक्षण का विधेयक जब सरकार को सदन में लाना है तो इसके लिये समिति का गठन पार्टी के स्तर पर क्यों किया गया? साथ ही इस पांच सदस्यीय समिति में हरियाणा के जाट नेताओं के बजाय उत्तर प्रदेश के नेताओं को तरजीह क्यों दी गयी। यानि इतना तो साफ है कि जाटों को आरक्षण देकर भाजपा इसका राजनीतिक लाभ भी उठाना चाहती है। खास तौर से यूपी के विधानसभा चुनाव में जहां पश्चिमी जनपदों में जाटों का समर्थन ही निर्णायक होता है। लिहाजा कांग्रेस का यह आरोप तो विचारणीय ही है कि जाटों के आंदोलन को भाजपा ने ही अपने राजनीतिक लाभ के लिये भड़काया। लेकिन अगर पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा के सलाहकार रहे प्रो. वीरेन्द्र सिंह की बातचीत के आॅडियो टेप में जरा भी सच्चाई है तो इसमें शक की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती है कि इस पूरे आंदोलन की पटकथा कांग्रेसियों ने ही लिखी थी। वैसे भी यह सर्वविदित तथ्य है कि अगर भाजपा के खिलाफ जाट समुदाय आंदोलन की राह पकड़ता है तो इसका सीधा लाभ कांग्रेस व उसके सहयोगी दलों को ही मिलेगा। यानि इस आंदोलन के कारण भारी बदनामी झेल रहे जाटों को आरक्षण का कब, कैसे व कितना लाभ मिलेगा यह तो अभी कोई नहीं बता सकता लेकिन इसमें शायद ही किसी को कोई शक हो कि इस आंदोलन का सियासी लाभ कांग्रेस के खाते में भी जा सकता है और भाजपा के भी। खैर, इस पूरे मामले का एक सुखद पहलू यह भी है कि जाटों ने अब यह बेहतर समझ लिया है कि अपने राजनीतिक लाभ के लिये सियासी दलों ने उनके आंदोलन को ऐसा स्वरूप दे दिया जिसमें इंसानियत की भावना के लिये कोई जगह ही नहीं बची। तभी तो हुड्डा को उनके अपने गृहक्षेत्र में ही भूमिगत होने के लिये मजबूर होना पड़ा है और मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को भी हर जगह हूटिंग झेलनी पड़ रही है। लेकिन अब सांप के गुजर जाने के बाद लकीर पीटने का फायदा ही क्या। जो होना था वह तो हो ही गया और अपने पीछे ऐसी गहरी कालिख छोड़ गया है जिसे अपने दामन से छुड़ाना जाटों के लिये कतई आसान नहीं होगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 
नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

‘सियासत में सुरक्षा बनाम सुरक्षा की सियासत’

‘सियासत में सुरक्षा बनाम सुरक्षा की सियासत’

सियासत में सुरक्षा की बात हो या सुरक्षा के सियासत की। यह मसला तो सदाबहार है। कभी किसी की सुरक्षा में कटौती हो जाये तो सियासत शुरू। कभी संघ प्रमुख मोहन भागवत सरीखे लोगों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाये तो उस पर भी सियासत। सुरक्षा घेरा सियासी सवालों का सबब बनता ही रहता है। यह मसला निर्धारित अंतराल पर देश के अलग-अलग कोनों से इतनी दफा उठता रहता है कि अब इसे आम तौर पर कोई भी ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता। सुरक्षा के मसले पर जब भी हायतौबा मचती है तो मान लिया जाता है कि यह सियासत चमकाने की ही कोशिश है। लेकिन असली मुश्किल तब पेश आती है जब सियासत में मौजूद खतरों के मद्देनजर सुरक्षा को स्वीकार करने के बजाय बड़े नेतागण अपनी सियासी जरूरतों को पूरा करने के लिये सुरक्षा घेरे के प्रति बेपरवाही बरतना शुरू कर देते हैं। इस मामले में सबसे पहला नाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ही आता है जो सबसे अधिक खतरे में होने के बावजूद सुरक्षा घेरे को तोड़ने का रिकार्ड बनाने की ओर अग्रसर हैं। आज भले ही समूचे देश को मायूस करते हुए सियाचीन के शेर लांस नायक हनुमनथप्पा कोप्पड़ ने चिरनिद्र को अंगीकार कर लिया है, लेकिन छह दिनों तक बर्फ की 25 फीट मोटी परत के नीचे से दबे रहने के बाद भी उनके जिन्दा निकल आने और दिल्ली स्थित सेना के आरआर अस्पताल में उन्हें दाखिल कराये जाने की खबर प्रधानमंत्री को जैसी ही पता चली तो वे फौरन वहां जाने के लिये लपक लिये। जितनी शीघ्रता से उन्होंने वहां की दौड़ लगायी उतने कम समय में ना तो रास्ते को महफूज करना संभव था और ना ही उनके रूट को परंपरागत तरीके से अभेद्य बनाया जा सकता था। लेकिन सुरक्षा के प्रति लापरवाही की पराकाष्ठा का मुजाहिरा करते हुए वे दनदनाते हुए हनुमनथप्पा को देखने के लिये निकल पड़े। यह तो गनीमत रही कि सुरक्षा काफिला उनका अनुसरण कर रहा था और उनकी यात्रा निर्विघ्न समाप्त हो गयी वर्ना ऐसी लापरवाही का क्या अंजाम हो सकता है इससे शायद ही कोई अनजान हो। खैर, यह तो महज बानगी ही है मोदी द्वारा सुरक्षा घेरे के प्रति बेपरवाही बरते जाने की। अलबत्ता उनकी ऐसी हरकतें तो तभी से जारी हैं जब वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पूरे देश में धुंआधार चुनाव प्रचार कर रहे थे। उन दिनों पटना के गांधी मैदान में हुई जनसभा को संबोधित करने के लिये उन्होंने जिस तरह से तमाम सुरक्षा सलाहों की अनदेखी करते हुए लगातार हो रहे बम धमाके के बीच ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे को पहली दफा खुलकर बुलंद करने की पहल की थी, उसके साक्षी रहे लोगों को आज भी जब उस दिन का मंजर याद आता है तो उनके रौंगटे खड़े हो जाते हैं। तब से लेकर अब तक मोदी ने सुरक्षा से खिलवाड़ करने का सिलसिला लगातार जारी रखा हुआ है। भाजपा मुख्यालय में आयोजित हुए दीपावली मिलन के पिछले दो आयोजनों में पत्रकारों को अपने साथ सेल्फी खींचने का मौका देने के लिये वे जिस कदर खचाखच भरे पंडाल में भीड़ के बीच कूद पड़ते हैं उसका नतीजा किस कदर खतरनाक हो सकता है यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है। स्वतंत्रता दिवस के समारोह से लेकर गणतंत्रता दिवस की परेड तक के आयोजन में लोगों से हाथ मिलाने, बच्चों को दुलारने और आम लोगों को अपनत्व का एहसास कराने के लिये सुरक्षा घेरे को तोड़कर भीड़ के करीब चले जाना इनका शगल बन गया है। भले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल सार्वजनिक तौर पर उनसे ऐसा नहीं करने की लाख अपील करते फिरें लेकिन इनकी कानों पर जूं तक नहीं रेंगती है। विदेश यात्रा से लौटने के क्रम में सड़क पर मौजूद समर्थकों से अचानक गाड़ी रोककर मिलना-जुलना, विदेश दौरे में भी आस्ट्रेलिया से लेकर खाड़ी तक में अपना संबोधन सुनने आये लोगों से हाथ मिलाने पहुंच जाना, संसद की कैंटीन के खाने का स्वाद लेने के लिये अचानक वहां आ धमकना, प्रधानमंत्री के तौर पर सियाचीन जाने की योजना को सुरक्षा तंत्र से अंतिम समय तक छिपाये रखना और रन फाॅर युनिटी सरीखे सार्वजनिक दौड़ के आयोजन में भीड़ का हिस्सा बनने की कोशिश करना इनकी पहचान बनती जा रही है। अब इसके लिये सुरक्षा व खुफिया तंत्र हलकान होता है तो होता रहे, इनकी बला से। इन्होंने तो मानो सुरक्षा की परवाह नहीं करने की कसम खा रखी है। वैसे मोदी अकेले नहीं हैं जो सुरक्षा घेरे से बेपरवाह होकर अक्सर भीड़ का हिस्सा बन जाना पसंद करते हों। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो आवश्यक सुरक्षा लेने से ही इनकार कर देते हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को भी अपनी सुरक्षा में तैनात दस्ते को चकमा देकर चंपत हो जाने में महारथ हासिल है। अब इन नेताओं को कौन समझाये कि सुरक्षा सलाहों की अनदेखी के नतीजे में ही देश को ना सिर्फ महात्मा गांधी की हत्या का दंश भुगतना पड़ा बल्कि अगर इंदिरा गांधी ने अपनी निजी सुरक्षा में फेरबदल करने और राजीव गांधी ने भीड़ से निर्धारित दूरी बनाकर रहने की ठोस खुफिया सलाहों को मान लिया होता तो उनसे असमय जुदाई का दुख देश को नहीं भुगतना पड़ता। खैर, सियासत में लोगों से मिलने-जुलने और उन्हें अपनेपन का एहसास कराने की भी अपनी अहमियत है लेकिन इसके लिये सुरक्षा से खिलवाड़ किये जाने को कैसे जायज ठहराया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

‘विरोधी के हमलों से अपना हित साधने की सियासत’

‘विरोधी के हमलों से अपना हित साधने की सियासत’

निराली है राजनीति और निराला है इसका रंग-ढ़ंग। इसमें हर चमकनेवाली चीज सोना नहीं होती और आंखों से देखा हुआ भी हमेशा सच नहीं होता। होता कुछ और है, दिखता कुछ और। यहां विरोधियों का हमला हमेशा अहितकर नहीं होता, बल्कि अपना हित साधने के लिये विरोधी के हमले को भी हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की पुरानी परंपरा रही है। लेकिन बाहर से दिखनेवाले सियासी खेल की अंदरूनी हकीकत अक्सर बनावटी प्रपंच के पर्दे में पहले भी दबी रह जाती थी और आज भी अधिकांश मामलों की असली रामकहानी अनजानी ही रह जाती है। मसलन गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल की बिटिया को सूबे की सरकार द्वारा करोड़ों की जमीन कौडि़यों की कीमत पर आवंटित कर दिये जाने के मामले को ही देखें तो सतही तौर यही दिखता है कि इस कथित घपलेबाजी की जानकारियां विरोधी दलों ने पाताल तोड़कर निकाली हैं। लेकिन मौजूदा कालखंड के सियासी समीकरणों से तो यही लगता है कि ना तो विरोधियों को इस मामले की जानकारी हासिल करने के लिये कोई पातालतोड़ मेहनत करनी पड़ी होगी और ना ही इसके संभावित असर से उन्हें सीधे तौर पर कोई फायदा मिलना है। अलबत्ता अगर यह वार सटीक बैठा तो शुचिता व पारदर्शिता को ही अपनी पूंजी बतानेवाली आनंदीबेन को नैतिक आधार पर कोई कड़ा फैसला लेना पड़ सकता है जिसका सीधा लाभ उनकी पार्टी को ही मिलेगा। अलबत्ता विपक्ष का हित तो इसमें निहित है कि आनंदीबेन ही अगले साल होनेवाले सूबे के विधानसभा चुनाव की कमान संभालें ताकि उनकी उस बढ़ती अलोकप्रियता का फायदा उठाया जा सके जिसने पिछले दिनों स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा का बेड़ा गर्क कर दिया। ऐसे में अगर मौजूदा हंगामे के बीच वे स्वयं ही उच्च नैतिक मानदंडों का अनुपालन करते हुए पद छोड़ने का फैसला कर लें तो उनके प्रति पनपनेवाली सहानुभूति की लहर भी भाजपा के लिये फायदेमंद हो जाएगी और सत्ता में बदलाव करने की मौजूदा आवश्यकता भी पूर्ण हो जाएगी। दूसरी संभावना यह भी है कि चुंकि जमीन आवंटन का फैसला मोदी की सरकार ने किया था लिहाजा आनंदीबेन विरोधी स्वरों को शांत करने का कोई ठोस कदम उठाकर अपनी सत्ता सुरक्षित भी कर सकती हैं। लेकिन ऐसे में अगर सूबे का चुनाव परिणाम नकारात्मक रहा तो उसका ठीकरा आनंदीबंन पर ही फूटेगा, मोदी-शाह की जोड़ी पर इसकी कोई जिम्मेवारी नहीं होगी। यानि जब इस पूरे हंगामे का सीधा फायदा हर हालत में भाजपा के मौजूदा शीर्ष नेतृत्व को ही मिलना है तब इन अटकलों को कैसे नकारा जा सकता है कि इस आग का जलावन अंदर से ही निकला है जिसमें विपक्ष ने तो सिर्फ अपने विरोध की माचिस ही सुलगायी है। खैर, विरोधियों के हंगामे का अपने फायदे के लिये इस्तेमाल करने की अटकलें तब भी लगीं जब छत्तीसगढ़ की राजनीति में अजित जोगी को निपटाने के लिये सीटों की सौदेबाजी का सबूत सार्वजनिक हुआ और चिक्की खरीद घोटाले के मामले को लेकर सूबे की सबसे तगड़े जनाधारवाली नेत्री पंकजा मुंडे पर आरोपों की बरसात हुई। लेकिन दिलचस्प तथ्य है कि ऐसे तमाम मामलों के पीछे की अंदरूनी कहानी अव्वल तो कभी सामने ही नहीं आ पाती है और अगर किसी को कुछ उड़ती-फिरती भनक मिल भी जाये तो उसे गल्प-कल्प कहकर हंसी में उड़ा दिया जाता है। खैर, सियासत में विरोधियों के हंगामे का अपने मनमुताबिक इस्तेमाल की परंपरा आज की नहीं है। सियासत के चतुर-सुजान खिलाड़ी अक्सर इस दांव का इस्तेमाल करते रहे हैं। मसलन इराक युद्ध के दौरान जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर मित्र राष्ट्रों की ओर से इस बात का दबाव बनाया गया कि वे भारतीय फौज को जंग में हिस्सेदारी निभाने का निर्देश दें तो इस समस्या का समाधान उन्होंने वामपंथी विरोधियों को अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़क पर उतार कर निकाला था। उन्हें करना सिर्फ इतना पड़ा कि वामदलों के कुछ शीर्ष नेताओं को उन्होंने चाय पर चर्चा के लिये बुलाया और बातों ही बातों में धीरे से यह सुर्रा छोड़ दिया कि भारतीय फौज की इराक युद्ध में हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिये मित्र राष्ट्रों की ओर से पड़ रहे दबाव पर विचार करना आवश्यक हो गया है। वाजपेयी की जुबान से यह सुनते ही वामपंथी भड़क उठे और चाय की चर्चा को जुबानी जंग में तब्दील कर दी। वामपंथी नेताओं की टोली बुरी तरह भड़क उठी जबकि वे चिरपरिचित मुस्कान के साथ चुपचाप चाय चुस्कियां लेते रहे। आखिर में अपने प्याले की पूरी चाय निपटाने के बाद चर्चा को विराम देते हुए वाजपेयी ने काॅमरेडों को सिर्फ यही कहा कि प्रधानमंत्री निवास के प्रांगण में चीखने-चिल्लाने के बजाय अगर वे संसद से सड़क तक अपनी आवाज बुलंद करें तो कुछ बात भी बने। इसके बाद जो हुआ वह इतिहास बन गया। समूचे देश में इराक पर हुए अमेरिकी हमले के खिलाफ इस कदर व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुआ कि उसकी खबर सुनने के बाद मित्र राष्ट्रों के किसी भी राष्ट्राध्यक्ष की इतनी हिम्मत ही नहीं हुई कि वह दोबारा वाजपेयी से भारतीय फौज को इराक भेजने की बात कहने की जुर्रत भी कर सके। यानि सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। खैर, विरोधियों की लाठी से अपने गले में पड़े सांप को हटाने की राजनीति का पारदर्शिता व नैतिकता से भले ही कोई वास्ता ना हो लेकिन गोपनीयता के साथ सियासी समीकरणों को दुरूस्त करने की इन्हीं कूटनीतियों का नाम तो राजनीति है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

‘फिर कलेवर बदलने की जुगत में है जादूगर’

‘फिर कलेवर बदलने की जुगत में है जादूगर’


मौजूदा सियासी दौर के सबसे सफल जादूगर का खिताब तो निर्विवाद रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ही मिल सकता है। भले अभी उनकी जादूगरी की चमक कुछ फीकी दिख रही हो लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनको सीधी टक्कर देने की हैसियत तो आज भी किसी की नहीं है। ऐसे में इन्हें यह सहूलियत तो हासिल ही है कि ये अभी आराम से अपनी छवि को संवार सकें, निखार सकें। वैसे भी जब अभी से यह पता चल चुका है कि मौजूदा दौर में कायम हो रही छवि दूरगामी तौर पर भारी नुकसान का सबब बन सकती है तो क्यों ना अभी से उससे पीछा छुड़ाने की शुरूआत कर दी जाए। नेक काम में विलंब करने से कोई फायदा तो होना नहीं है। शायद यही वजह है कि मोदी ने अपनी छवि बदलने का अभियान अविलंब आरंभ कर देने का मन बना लिया है। दरअसल उनकी छवि इन दिनों ऐसी गढ़ दी गयी है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के शब्दों में कहें तो उनकी अगुवाई में ‘सूट-बूट की सरकार’ चल रही है जिसका देश के आम मेहनतकश लोगों के हितों से कोई लेना देना ही नहीं है। उनका मन देश में कम और विदेश में ही अधिक रमता है। किसानों से उन्हें ऐसी चिढ़ है कि खेती की जमीन उद्योगपतियों को देने के लिये वे भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन करने के लिये संसद से सहमति लेने में नाकाम रहते हैं तो मनमाने तौर पर अध्यादेश जारी करके मनमानी नीति लागू करने से भी परहेज नहीं बरतते हैं। देश के दो तिहाई लोग भले ही फटेहाली, तंगहाली व भुखमरी का सामना कर रहे हों लेकिन वे लखटकिया सूट पहनकर इतराने से भी संकोच नहीं करते हैं। उन्हें ना तो दलितों की फिक्र है, ना मजदूरों की, ना किसानों की, ना अल्पसंख्यकों की और ना ही महिलाओं की। वे तो मस्त हैं अपनी मस्ती में। व्यस्त हैं सत्तासुख की बस्ती में। यही छवि गढ़ने में उनके तमाम विरोधी तभी से जुटे हुए हैं जबसे उन्होंने सत्ता की बागडोर संभाली है। कहावत है कि किसी झूठ को जितनी दफा दोहराया जाये, उसके सच होने का संदेह उतना ही मजबूत होता चला जाता है। तभी तो विरोधियों द्वारा बनायी गयी इस नकारात्मक छवि ने उनके उस जादू को जमीन पर पटक दिया है जिसके दम पर उन्होंने लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत दिलाया था। नतीजन दिल्ली से लेकर बिहार तक में उनका जादू विफल हो गया और पार्टी औंधे मुंह गिरी। हालांकि इससे राष्ट्रीय राजनीति में उनके वजूद व वकार की मजबूती में तो कोई कमी नहीं आयी है और हालिया सर्वे यही बताते हैं कि अगर आज भी लोकसभा का चुनाव कराया जाये तो मोदी को टक्कर देने की स्थिति में कोई नहीं है। लेकिन दिल्ली और बिहार से लेकर विभिन्न सूबों के स्थानीय निकायों के चुनावों में भी हासिल हो रही सिलसिलेवार शिकस्त ने उस दूरगामी खतरे की ओर तो इशारा कर ही दिया है कि अगर मोदी की मौजूदा छवि में सुधार नहीं किया गया तो इसका दूरगामी असर बेहद नकारात्मक साबित हो सकता है। तभी तो मोदी ने बिना देरी किये अभी से अपनी छवि बदलने की कवायदें शुरू कर दी हैं। ‘कल करे सो आज कर, आज करे सो अब’ की तर्ज पर। वैसे अपनी बदलने में मोदी को हासिल महारथ से तो सब वाकिफ ही हैं। जब पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव थे तो उनकी छवि बेहद मासूम, मेहनती व शर्मीले सांगठनिक नेता की थी जो ना तो मीडिया से अधिक सरोकार रखता हो और ना आम जनता में जनाधार बनाने का ख्वाहिशमंद हो। बाद में जब गुजरात भेजे गये तो उनकी छवि बेहद शातिर, जोड़-तोड़ में माहिर, अपने हित को सर्वोपरि रखने और विरोधी को कतई बर्दाश्त नहीं करनेवाले नेता की बन गयी। यहां तक कि 2002 के दंगों के बाद तो वे कट्टर हिन्दूवादी तानाशाह के तौर पर पहचाने जाने लगे जिन्हें नरभक्षी तक बता दिया गया। जब प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल हुए तो उस कट्टरवादी छवि से किनारा करते हुए सौम्यता, सरलता, सादगी, मिलनसारिता और समरसता का लबादा ओढ़ लिया। बाद में ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे और अंत्योदय के इरादे के साथ सर्वप्रिय जननेता की छवि बनाने की कोशिश तो की लेकिन इस बार एकजुट विरोधियों ने उनकी छवि को तहस-नहस कर दिया। लेकिन अब एक बार फिर वे अपनी छवि बदलने की योजना में जुट रहे हैं। शुरूआत हो रही है किसान हितैषी रंग को गाढ़ा करने से। इसके लिये सिर्फ 28 फरवरी को यूपी के रूहेलखंड इलाके में ही नहीं बल्कि 18 को मध्यप्रदेश में, 21 को उड़ीसा स्थित बड़गढ़ में और 27 को कर्नाटक में भी व्यापक किसान महारैली करने जा रहे हैं। इसमें बखान होगा ‘स्वाइल हेल्थकार्ड’ के पांच करोड़ लाभार्थियों को मिले लाभ का, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना का, आपदा राहत के नियमों की ढ़ील का और फसल बीमा योजना का। सूत्रों की मानें तो अब उनकी विदेश यात्राएं भी बेहद आवश्यक होने पर ही होंगी और चुनावी कार्यक्रमों में भी वे अग्रिम मोर्चे से दूर रहेंगे। ऐसी और भी कई तब्दीलियों और नयेपन का मुजाहिरा वे खुद भी करेंगे, उनकी सरकार भी करेगी और संगठन भी। लेकिन विरोधियों द्वारा आजमाये जा रहे दुष्प्रचार के हथियार में आस्तीन के सांपों के जहर का इस्तेमाल अनवरत जारी रहने का नतीजा छवि सुधारने की सकारात्मक कोशिशों पर तो अपना असर डालेगा ही। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर     

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

‘नदारद मानसून के बीच बगीचा लहलहाने की चुनौती’

‘नदारद मानसून के बीच बगीचा लहलहाने की चुनौती’

तमाम अटकलों, कयासों, अंतर्विरोधों व टकरावों के बावजूद निर्विरोध तरीके से भाजपा की कमान अमित शाह के हाथ में आ गयी है। लेकिन असली चुनौती की शुरूआत तो अब होनेवाली है। ना सिर्फ शाह के लिये बल्कि भाजपा के लिये भी। बेशक संगठन को नयी शक्ल देने के मामले में शाह कतई जल्दबाजी में नहीं दिख रहे हों। लेकिन अधिक देर करने का विकल्प भी उनके पास नहीं है। अब तक तो एक तरफ सत्ता का हनीमून चल रहा था और दूसरी तरफ संगठन का संचालन भी वैकल्पिक व कार्यवाहक तरीके से करने के बावजूद कोई खास परेशानी नहीं आ रही थी। लिहाजा सांगठनिक स्तर पर भी काफी प्रयोग हुए और सैद्धांतिक व वैचारिक मसलों पर भी जमकर ढ़ील ली गयी। मगर इस तरह से तो अब संगठन कतई नहीं चल सकता। सच तो यही है कि मौजूदा हालातों में पार्टी ना तो उस विस्तार को कायम रख पा रही है जो उसे लोकसभा चुनाव में हासिल हुई थी और ना ही सरकार के कामकाज की जानकारी जमीन तक पहुंचाने की जिम्मेवारी का अपेक्षित तरीके से समुचित निर्वहन करने में कामयाब हो रही है। वर्ना प्रधानमंत्री को सरकार के कामकाज का प्रचार प्रसार करने के लिये अपने केन्द्रीय मंत्रियों से ढि़ंढ़ोरची का काम लेने के लिये हर्गिज मजबूर नहीं होना पड़ता। वैसे सरकार के स्तर पर तो काफी काम हो रहा है लेकिन समस्या है कि अव्वल तो काम की रफ्तार संतोषजनक नहीं है और दूसरे जितना काम हो भी रहा है उसका प्रचार-प्रसार करने में पार्टी नाकाम साबित हो रही है। कहने को तो ग्यारह करोड़ की सदस्य संख्या के साथ भाजपा ना सिर्फ भारत की बल्कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर अपनी पहचान कायम कर चुकी है। लेकिन इस कागजी हैसियत का जमीन पर कोई लाभ होता हुआ नहीं दिख रहा है। तभी तो बिहार में जहां भाजपा ने मोबाइल पर मिस्डकाॅल के माध्यम से 90 लाख से भी अधिक लोगों को अपना सदस्य बनाने में कामयाबी हासिल की वहां विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज 92,85,574 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। यानि संगठन के मोर्चे पर गड़बडि़यां स्पष्ट दिख रही हैं। वैसे भी शीर्ष नेताओं की स्थापित टोली के सत्ता के संचालन में व्यस्त हो जाने से पार्टी का कामकाज ऐसे लोगों के हाथों में आ गया है जो अब तक अपनी दक्षता, कुशलता व जनप्रियता साबित करने में असमर्थ रहे हैं। हालांकि इस कमी को पाटने के लिये मध्य प्रदेश से कैलाश विजयवर्गीय व संघ से राम माधव सरीखे संगठन के संचालन का लंबा अनुभव रखनेवाले नेताओं को राष्ट्रीय राजनीति में अवश्य लाया गया है लेकिन इतने भर से बात बनती हुई नहीं दिख रही है। आलम यह है कि सतही तौर पर समूचा संगठन सिर्फ शाह में ही समाहित होकर रह गया है जिसके नतीजे में इस दफा ना तो संघ को उनका कोई विकल्प मिला और ना ही बगावत की हद तक आक्रामक तेवरोंवाले मार्गदर्शकों के हिमायतियों की टोली किसी अन्य चेहरे को शाह के मुकाबले खड़ा करने में कामयाब हो पायी। लेकिन सूत्रों की मानें तो शाह के नाम पर स्वस्ति देने के क्रम में ही संघ ने यह बता दिया है कि संगठन का मौजूदा स्वरूप उसे कतई स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में शाह के नये सिपहसालारों की टोली में अब आमूलचूल परिवर्तन होना तय ही है। खास तौर से जनाधारवाले क्षत्रपों, महिलाओं व युवाओं को तरजीह देकर भविष्य के लिये पार्टी की नयी पीढ़ी के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। महिलाओं को संगठन में तरजीह देने के मामले में अभी तक पार्टी में महासचिव व उपाध्यक्ष के पद पर सिर्फ एक-एक महिलाओं को ही स्थान मिला हुआ है। जबकि बिहार में नितीश ने शराबबंदी करके और नौकरियों में 35 फीसदी आरक्षण देकर महिलाओं की गोलबंदी करने की पहल कर दी है। साथ ही उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु तक में महिला नेत्रियों के साथ ही पार्टी का सीधा चुनावी दंगल होनेवाला है और जम्मू कश्मीर में सहयोगी दल की महिला मुख्यमंत्री के साथ ही सत्ता की साझेदारी करनी है। इसके अलावा राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस सरीखे ऐसे दल के साथ आर-पार का मुकाबला करना है जिसकी बागडोर महिला के हाथ में ही है। ऐसे में संगठन में शीर्ष स्तर पर महिलाओं को तरजीह देने के अलावा वैसे भी पार्टी के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हालांकि बदलाव की इस तरह की आवश्यकताओं से आरएसएस भी वाकिफ है और संगठन के शीर्ष रणनीतिकार व शुभचिंतक भी। लेकिन जरूरत है उस खुशफहमी से उबरने की जिसके नशे ने ना सिर्फ दिल्ली व बिहार में पार्टी का बेड़ा गर्क कर दिया है बल्कि सरकार की छवि भी इस कदर बिगाड़ दी है कि महज बीस माह के भीतर ही जमीनी स्तर पर मोदी लहर से पनपा जनता के विश्वास व भरोसे का मानसून पूरी तरह नदारद हो गया है। लिहाजा अब सियासत के खेत में सत्ता का बगीचा उगाने के लिये पार्टी को खुद ही कुआं खोदकर भरोसे का पानी इकट्ठा करना होगा। वर्ना मानसूनी बारिश के भरोसे रहकर महज मेहनत का दिखावा, कागजी बुआई और जुबानी जुम्बिश की सिंचाई का नतीजा फिर उन्हीं काटों की पैदावार के तौर पर सामने आ सकता है जो ना सिर्फ बिहार और दिल्ली में नमूदार हो चुका है बल्कि आगामी दिनों में होनेवाले पांच राज्यों के चुनावों में जगजाहिर हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    @ नवकांत ठाकुर

शनिवार, 30 जनवरी 2016

‘उम्मीदों के संसार को बदलावों की दरकार’

‘उम्मीदों के संसार को बदलावों की दरकार’

लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने दम पर बहुमत मिला। ऐसी लहर चली भाजपा की, जिसमें सभी बह गये। कुछ का तो नामोनिशान ही बाकी नहीं बचा और कुछ बचे भी तो ऐसी लुंजपुंज हालत में कि लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल करने लायक सीटें भी नहीं पा सके। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव आज भी यह मानते हैं कि अगर उन्हें तनिक भी इस बात का एहसास होता कि उनके दल की ऐसी दुर्गति होगी तो वे हर्गिज लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ते। बिहार में नितीश ने शिकस्त से शर्मसार होकर सूबेदारी छोड़ दी। कांग्रेस के युवराज अज्ञातवास पर चले गये। राकांपा सुप्रीमो शरद पवार ने सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया। आलम यह रहा कि तकरीबन आधे दर्जन सूबों में तो किसी गैरभाजपाई दल का खाता भी नहीं खुला। जाहिर है कि अगर जनता ने ढ़ाई दशक के बाद किसी एक दल को पूरा बहुमत सौंपने का फैसला किया तो उसके पीछे असीमित आशाएं व अपरिमित अपेक्षाएं भी जुड़ी थीं। लोगों को यकीन था कि अगर कांग्रेस को जड़ से उखाड़कर भाजपा को सत्ता में लाया जाए तो तमाम समस्याएं छू-मंतर हो जाएंगी। दरअसल रामराज आने की उम्मीद और अच्छे दिनों की आस पर यूं ही विश्वास नहीं किया गया था बल्कि इसे भाजपा ने भी भरपूर हवा दी थी। नरेन्द्र मोदी के तौर पर छप्पन ईंच का सीना रखनेवाले स्वघोषित ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ को प्रधानसेवक के तौर पर प्रस्तुत किया गया। थोक के भाव में वायदे किये गये, कुछ कर दिखाने के इरादे जताए गये। 60 सालों की खाई को पाटने के लिये 60 महीने का मौका मांगा गया। अच्छे दिन लाने की आस बंधाई गयी। एक भारत श्रेष्ठ भारत के निर्माण का भरोसा दिया गया। यूं लग रहा था कि मोदी की ताजपोशी होते ही तुलसीदास की परिकल्पना का ऐसा रामराज आ जाएगा जिसमें ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज में काहु न व्यापा।’ खैर, अब जबकि मोदी सरकार के मौजूदा कार्यकाल का बीस महीना यानि एक-तिहाई वक्त बीत चुका है। ऐसे में पलटकर यह देखा जाना स्वाभाविक ही है कि मोदी को मसीहा मानने के नतीजे में क्या खोया और क्या पाया। इस खोने-पाने का हिसाब लगाने के क्रम में भले ही अच्छे दिन नहीं आ पाने की निराशा साफ झलक रही हो लेकिन अभी ऐसी स्थिति भी नहीं हुई है कि लोग सीताराम येचुरी से सहमत होकर यह कहने लगें कि ‘कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन।’ यानि उम्मीद की डोर कमजोर जरूर हुई है लेकिन टूटी नहीं है। डोर के कमजोर होने की निशानी दिल्ली में भी दिखी है और बिहार में भी। साथ ही विभिन्न सूबों में हुए स्थानीय निकायों के चुनाव में भी हासिल हुई सिलसिलेवार हार ने भाजपा को जमीनी हकीकतों के प्रति खबरदार ही किया है कि कुछ तो गड़बड़ है जिसे सुधारने की जरूरत है। वैसे भी जिस तरह गाड़ी चल रही है उसमें अभी से सर्वे बताने लगे हैं कि अगर अभी चुनाव हुए तो राजग को तीन दर्जन सीटों का नुकसान हो सकता है। यह हाल है बीस महीने के बाद, अगर स्थितियां ऐसी ही रहीं तो अगले 40 महीने के बाद की स्थिति क्या होगी वह तो राम ही जाने। खैर, हकीकत तो यही है कि कहने को 26 केबिनेट मंत्री, 13 स्वतंत्र प्रभारवाले राज्यमंत्री और 26 राज्यमंत्रियों की फौज प्रधानमंत्री मोदी का सत्ता के संचालन में सहयोग कर रही है। लेकिन कामकाज का अधिकांश बोझ मोदी के कांधों पर ही दिख रहा है। मामला विदेश का हो या घरेलू शांति-सुरक्षा का, महंगाई की मार हो या घटती पैदावार, मामला रेल-खेल-तेल या धर्मधकेल का ही क्यों ना हो। बोलबाला ‘हर हर मोदी घर घर मोदी’ का ही दिखता है। हालांकि इसकी असली वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन इस सच को भी तो झुठलाया नहीं जा सकता है कि जब विदेश के मामलों को खुद मोदी ही पूरी दिलचस्पी से निपटाने में यकीन रखते हैं तो सुषमा स्वराज सरीखी संगठन की सबसे अनुभवी व लोकप्रिय नेत्री को इस विभाग में जाया क्यों किया जा रहा है? जब वित्त विभाग की सिरदर्दी से ही अरूण जेटली को चैन नहीं मिल रहा तो सूचना-प्रसारण का अतिरिक्त बोझ उन पर क्यों डाला गया है जिसके नतीजे में इस विभाग से सरोकार रखनेवाले तमाम संबंधित पक्ष बुरी तरह त्रस्त हो रहे हैं। जब संसद में समन्वय बनाने के बजाय वेंकैया नायडू खुद ही आक्रमण का नेतृत्व करने की नीति अपना रहे हों तो यह पता करना लाजिमी तौर पर मुश्किल हो जाता है कि उन्हें संसद को चलाने के लिये संसदीय कार्यमंत्री बनाया गया है या विपक्ष को रोजाना नये गतिरोध का बहाना देने के लिये? जब किसानों की आत्महत्या का सिलसिला रोकने में नाकामी ही हाथ आ रही है तो नवगठित महत्वाकांक्षी कृषक कल्याण मंत्रालय को कृषिमंत्री राधामोहन सिंह के पास अतिरिक्त प्रभार के तौर पर पासंग बनाकर क्यों छोड़ा गया है? जब स्किल इंडिया का पूरा अभियान प्रधानमंत्री ही संचालित करते दिख रहे हैं तो राजीव प्रताप रूढ़ी को इसके लिये स्वतंत्र प्रभार देने की जरूरत ही क्या है? खैर, इस तरह के सवाल बहुत से हैं। लेकिन जवाब जहां से आना है वहां फिलहाल मौन की ही स्थिति है। हालांकि यह मौन अब अधिक लंबा नहीं खिंच सकता। वर्ना दो-तिहाई कार्यअवधि बीतने के बाद स्थितियां जितनी बिगड़ी हुई दिख रही हैं उसमें दिन दूनी और रात चैगुनी गति से इजाफा होना तय ही है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर

सोमवार, 25 जनवरी 2016

चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर कर देखो ना....

‘दिल को देखो, चेहरा ना देखो’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात तो यही है कि ‘चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर कर देखो ना, मौसम पल में बदल जाएगा, पत्थर दिल भी पिघल जाएगा, मेरी मोहब्बत में है ऐसा असर, देखो ना...।’ उनकी पार्टी भाजपा भी लोगों को यही आगाह कर रही है कि ‘दिल को देखो चेहरा ना देखो, चेहरे ने लाखों को लूटा, दिल सच्चा और चेहरा झूठा।’ लेकिन मसला है कि अव्वल तो दिल चीरकर दिखाना मुमकिन नहीं है और दूसरे दिल में उतरकर किसी की अंदरूनी मंशा का मुआयना करने की फुर्सत भी किसी के पास नहीं है। सबकी अपनी जिन्दगी है, परेशानियां हैं, दुश्वारियां हैं, सपने हैं, उलझने हैं। कौन जहमत उठाए चेहरे के रंग का दिल की तस्वीर से मिलान करने की। यहां तो जो दिखता है वही बिकता है। दिखने और बिकने का वह गणित ही तो है जिससे चवन्नी के चिप्स और अठन्नी के काले-पीले शीतलपेय को दस-बीस रूपये का बाजार भाव मिल जाता है। अब कोई लाख समझाये कि ‘ठंडा मतलब टाॅयलेट क्लीनर’ लेकिन किसे फुर्सत है समझने की। यहां तो चट पैसा और झट तरावट का फार्मूला ही चाहिये सबको। भले ही उसकी अंदरूनी असलियत कितनी भी नुकसानदेह क्यों ना हो। ऐसी ही तस्वीर सियासत में भी दिखती है। यहां भी सबको तुरंत के मामले का फौरन से पेश्तर ही नतीजा चाहिये। भले ही बाद में जो भी सच सामने आए। सच सामने आने तक तो शुरूआती तस्वीर के तहत ही पूरा तिया-पांचा हो चुका होता है। मसलन दिल्ली का चुनाव हुआ तो यहां के दो-चार गिरजाघरों में असामाजिक तत्वों द्वारा की गयी चोरी-चकारी व तोड़फोड़ की वारदातों को ऐसा रंग दिया गया मानो इसाई समुदाय की स्थिति इराक व सीरिया के यजीदियों सरीखी हो गयी हो। मामले की गूंज विदेशों तक सुनाई पड़ी। केन्द्र की सरकार गुहार ही लगाती रह गयी कि मामले की तहकीकात हो जाने के बाद ही कोई राय कायम की जाये। मगर सच सामने आने तक सब्र रखने की समझाइश बेअसर रही और तुरत-फुरत में सामने दिख रही तस्वीर के नतीजे में केन्द्र में स्थापित सत्ताधारियों के अरमानों पर एक नवजात सियासी दल का झाड़ू फिर गया। सूबे के सत्तर की सत्ता में महज तीन तिनके ही बचे, बाकी सबका सफाया हो गया। ऐसा ही मामला बिहार चुनाव के दौरान भी दिखा जब बीफ के विवाद में असहिष्णुता का तड़का लगाकर सम्मानवापसी का जोरदार अभियान चलाया गया जिसका नतीजा वही हुआ जो दिल्ली में पहले ही दिख चुका था। भले ही बाद में पता चला हो कि ना बीफ के विवाद में कोई दम था और ना ही इसाईयों पर कोई संकट है। लेकिन यह सच सामने आने तक तो पूरा सियासी खेल समाप्त हो चुका था। अब फिर से ऐसी ही तस्वीर बन रही है दलितों के उत्पीड़न और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर अतिक्रमण को लेकर। भले ही इसके पीछे का सच कुछ भी हो लेकिन मौजूदा तस्वीर के तहत उठ रहे सवालों ने सियासत में चटख रंग तो भर ही दिया है। शायद ही कोई इस हकीकत की तह में जाना चाहता हो कि आखिर रोहित वेमुला ने क्यों व किन हालातों में आत्महत्या की। सबकी ख्वाहिश है कि इस मामले को दलितों व गैरदलित बहुसंख्यकों के टकराव का रंग देकर आगामी दिनों में होने जा रहे पांच राज्यों के चुनावों में इसकी छटा बिखेरी जाये। वैसे भी मामले की जांच के लिये बने न्यायिक आयोग को अपनी रिपोर्ट देने के लिये तीन माह का वक्त दिया गया है। यानि जब तक अंदरूनी सच सामने आएगा तब तक सतही तस्वीर के तहत इसका सियासी दोहन हो चुका होगा। इसी प्रकार अलीगढ़ मुस्लिम विश्विविद्यालय को दारूल उलूम देवबंद सरीखी स्वायत्तता व स्वरूप दिलाने की लड़ाई के बीच भी यह सवाल सतह के नीचे दफन दिख रहा है कि आखिर देवबंद से एएमयू की तुलना कैसे की जा सकती है। बकौल एमजे अकबर, देवबंद ने आज तक सरकार से एक पैसा अनुदान नहीं लिया, वह समुदाय के सहयोग से शिक्षा का प्रसार व अपना विस्तार करता है। जबकि एएमयू अंग्रेजों के जमाने से ही सरकारी अनुदान पर आश्रित है। जाहिर है कि जनता की गाढ़ी कमाई से संचालित संस्थान को जब तमाम दबावों के बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार से लेकर लालबहादुर शाष्त्री व इंदिरा गांधी तक की सरकार ने संसद में अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने से साफ इनकार कर दिया था तब मौजूदा सरकार किस आधार पर इसकी स्थिति में बदलाव की मांग स्वीकार कर सकती है। लेकिन पहले जो हुआ वह कहां तक जायज था अथवा संवैधानिक नजरिये से क्या होना उचित है, इस पर अदालत द्वारा सामने लाये जानेवाले सच का सब्र से इंतजार करना शायद ही किसी को गवारा हो। अलबत्ता तस्वीर तो यही दिखायी जाएगी कि मौजूदा सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों का हक मारा जा रहा है। यानि तह में उतरकर अंदरूनी हकीकत को परखने की फुर्सत मतदाताओं को शायद ही मिल सके। लेकिन मसला यह है कि सियासी तुफान में आरोप-प्रत्यारोप की बौछार से अटे-पटे चेहरे को देखकर ही स्वस्ति देने व खारिज करने की जो परंपरा चल निकली है उससे सियासी दलों को तो जो फायदा-नुकसान होना है वह होता रहेगा, लेकिन सब्र के साथ सच को जानने-समझने की समझदारी दिखाने के बजाय आनन-फानन में जारी तमाशे के तहत संवेदना, भावुकता व पूर्वाग्रह के आधार पर मतदान करने का निर्णायक नुकसान तो देश व समाज को ही झेलना पड़ेगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर

सोमवार, 18 जनवरी 2016

‘इहां कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं, जे तरजनी देखि मरि जाहीं’

‘इहां कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं, जे तरजनी देखि मरि जाहीं’

लक्षमण ने तो त्रेतायुग में ही परशुराम के सामने यह घोषणा कर दी थी कि समूचे हिन्दुस्तान में कोई भी कुम्हड़े की उस बतिया सरीखा सुकुमार, कमजोर या डरपोक नहीं है जो तर्जनी उंगली के इशारे से घबरा कर ही अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दे। इसके बावजूद भी पता नहीं क्यों यहां एक दूसरे को धमकाने-डराने की परंपरा सी चली आ रही है। जिसे देखो वही दूसरे को धमकाता दिख रहा है। घरवाले भी एक दूसरे को डराने में लगे हुए हैं और बाहरवाले भी। यहां तक कि सरहद के उस पार से भी धमकाने का सिलसिला जारी है। कभी परवेज मुशर्रफ यह बताकर डराने की कोशिश करते हैं कि पाकिस्तान ने परमाणु बमों का जखीरा शबेबारात के लिये तैयार नहीं किया है तो कभी लश्करे तैयबा का मुखिया हाफिज सईद पाकिस्तान के मिसाइलों की रेंज बताकर धमकाने की कोशिश कर है। अब कोई तो पूछे इनसे कि आपके मुल्क की मिसाइल कहां तक जा सकती है या आपके मुल्क ने परमाणु हथियार किस लिये बनाये हैं, यह तो खुल के बताया जाये तभी पता लगेगा। वर्ना आप शबेबारात में इसका जुलूस निकालो या आतंकवादियों से इसकी हिफाजत करने के लिये अपना दिवाला निकालो इससे किसी को क्या मतलब। रहा सवाल हिन्दुस्तान का तो, इसे जब दुनिया की सबसे बड़ी खुराफाती सैन्य ताकतों में शुमार होनेवाला चीन नहीं डरा पा रहा, तो आपका मुल्क तो वैसे भी हालिया जारी विश्व के दस सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकतों की सूची में गिनने लायक भी नहीं माना गया है। खैर, कहने का तात्पर्य यह है कि वास्तविकता की पूरी जानकारी होने के बावजूद अगर पाकिस्तान की सामरिक औकात के बारे में बड़बोला बयान देकर भारत को डराने-धमकाने का प्रयास किया जा रहा है तो इसकी वजह को तो टटोलना ही पड़ेगा। यह देखना पड़ेगा कि आखिर भारत के साथ ऐसी भाषा में बात करने की हिमाकत क्यों की जा रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी बात करनेवाले यह समझ रहे हैं कि चुंकि हमारे यहां विरोधियों के साथ इसी भाषा में संवाद किया जाता है लिहाजा वे भी हमें उसी भाषा में अपनी बात संप्रेषित करने का प्रयास कर रहे हैं। अगर सरहद पार के लोग ऐसा समझ रहे हैं तो इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। बल्कि वे ऐसा ना समझें तो ही गलत होगा। क्योंकि जब हमारे मुल्क के हैदराबादी सियासी सूरमा यह कहते नजर आते हों कि महज आधे घंटे के लिये पुलिस हटा ली जाये तो देश के 24 करोड़ अल्पसंख्यक तमाम बहुसंख्यकों को सही पाठ पढ़ा देंगे तो पड़ोसी मुल्क के लोग आखिर क्या समझेंगे हमारी भाषा के बारे में? जहां समर्थकों को रामजादा और विरोधियों को हरामजादा बताया जाता हो, जहां एक को सबक सिखाने में कामयाब रहने के बाद दूसरे के ‘दंगल’ में मंगल करने का खुल्लमखुल्ला ऐलान किया जाता हो, जहां सांप्रदायिक नरसंहारों को ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ का नाम दिये जाने की परंपरा हो, जहां बड़ा पेड़ गिरने पर धरती कांपने और कार के नीचे आकर कुचल जानेवाले पिल्ले का उदाहरण देकर अपनी बात रखी जाती हो, जहां विरोधियों के लिये नपुंसक शब्द का इस्तेमाल करने से लेकर प्रधानमंत्री तक को सनकी व पागल बताने से परहेज नहीं बरता जाता हो, जहां सरकार गिराने व बनाने के लिये पड़ोसी मुल्क की खुफिया एजेंसी से सार्वजनिक तौर पर मदद मांगी जाती हो, जहां जननी-जन्मभूमि को डायन बताया जाता हो, जहां सांप्रदायिक आग में सियासी रोटी सेंकने की परंपरा बन गयी हो, और सबसे बड़ी बात यह कि जहां का निजाम ही इस तरह की हरकतें करता हो वहां के बारे में बाहरी लोगों की क्या धारणा बनेगी इसका आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। कहने को तो हमारे मुल्क में कानून इतना सख्त है कि किसी को पंद्रह मिनट तक लगातार घूरने के लिये भी दंड का प्रावधान है, लेकिन यह कितना लागू हो पाता है इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि उदाहरण के तौर पर याद दिलाये जा रहे उक्त कुछ बड़े बयानों पर भी किसी को कोई सजा नहीं सुनायी गयी है। सजा की बात या कानून लागू हो पाने हकीकतों से हटकर भी देखें तो यह जरूरी तो नहीं है कि केवल उतना ही कहने व करने से परहेज बरता जाये जितने के लिये संवैधानिक तौर पर सजा का प्रावधान हो। कुछ परिवार की और कुछ परिवेश की मर्यादा भी होती है और परंपरा भी। लेकिन जहां भाषा में मर्यादा और परंपरा का निम्नतम स्तर लगातार गोते लगाने का रिकार्ड कायम करता दिख रहा हो वहां के विरोधी भी तो वैसी ही भाषा में अपनी बात रखेंगे। वर्ना उनके नजरिये से शायद हम उनकी बात समझ ही ना सकें। अगर ऐसा नहीं होता को बुद्धिजीवियों का एक बड़ा अभिजात्य वर्ग ना तो हाफिज सईद के समकक्ष प्रवीण तोगडि़या को खड़ा करने की जुर्रत करता और ना ही परवेज मुशर्रफ का लहजा हैदराबाद के सियासी सूरमा के सुर से मेल खाता हुआ दिखाई देता। बहरहाल, दुश्मन की गोली का जवाब तो हमारी ओर से गोला दागकर दिया जा सकता है लेकिन उसे बोली में भी परास्त करने की जो प्रतिस्पर्धा घरेलू सियासी मैदान में चल रही है उसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है। तहजीब का तकाजा तो यह है कि ‘हम दुश्मन से भी तू-तड़ाक ना करें, सिर्फ उसे नजरों में गिरा दें।’ ना सिर्फ सबकी नजर में बल्कि उसे उसकी नजर में भी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   नवकांत ठाकुर