मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

‘नदारद मानसून के बीच बगीचा लहलहाने की चुनौती’

‘नदारद मानसून के बीच बगीचा लहलहाने की चुनौती’

तमाम अटकलों, कयासों, अंतर्विरोधों व टकरावों के बावजूद निर्विरोध तरीके से भाजपा की कमान अमित शाह के हाथ में आ गयी है। लेकिन असली चुनौती की शुरूआत तो अब होनेवाली है। ना सिर्फ शाह के लिये बल्कि भाजपा के लिये भी। बेशक संगठन को नयी शक्ल देने के मामले में शाह कतई जल्दबाजी में नहीं दिख रहे हों। लेकिन अधिक देर करने का विकल्प भी उनके पास नहीं है। अब तक तो एक तरफ सत्ता का हनीमून चल रहा था और दूसरी तरफ संगठन का संचालन भी वैकल्पिक व कार्यवाहक तरीके से करने के बावजूद कोई खास परेशानी नहीं आ रही थी। लिहाजा सांगठनिक स्तर पर भी काफी प्रयोग हुए और सैद्धांतिक व वैचारिक मसलों पर भी जमकर ढ़ील ली गयी। मगर इस तरह से तो अब संगठन कतई नहीं चल सकता। सच तो यही है कि मौजूदा हालातों में पार्टी ना तो उस विस्तार को कायम रख पा रही है जो उसे लोकसभा चुनाव में हासिल हुई थी और ना ही सरकार के कामकाज की जानकारी जमीन तक पहुंचाने की जिम्मेवारी का अपेक्षित तरीके से समुचित निर्वहन करने में कामयाब हो रही है। वर्ना प्रधानमंत्री को सरकार के कामकाज का प्रचार प्रसार करने के लिये अपने केन्द्रीय मंत्रियों से ढि़ंढ़ोरची का काम लेने के लिये हर्गिज मजबूर नहीं होना पड़ता। वैसे सरकार के स्तर पर तो काफी काम हो रहा है लेकिन समस्या है कि अव्वल तो काम की रफ्तार संतोषजनक नहीं है और दूसरे जितना काम हो भी रहा है उसका प्रचार-प्रसार करने में पार्टी नाकाम साबित हो रही है। कहने को तो ग्यारह करोड़ की सदस्य संख्या के साथ भाजपा ना सिर्फ भारत की बल्कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर अपनी पहचान कायम कर चुकी है। लेकिन इस कागजी हैसियत का जमीन पर कोई लाभ होता हुआ नहीं दिख रहा है। तभी तो बिहार में जहां भाजपा ने मोबाइल पर मिस्डकाॅल के माध्यम से 90 लाख से भी अधिक लोगों को अपना सदस्य बनाने में कामयाबी हासिल की वहां विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज 92,85,574 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। यानि संगठन के मोर्चे पर गड़बडि़यां स्पष्ट दिख रही हैं। वैसे भी शीर्ष नेताओं की स्थापित टोली के सत्ता के संचालन में व्यस्त हो जाने से पार्टी का कामकाज ऐसे लोगों के हाथों में आ गया है जो अब तक अपनी दक्षता, कुशलता व जनप्रियता साबित करने में असमर्थ रहे हैं। हालांकि इस कमी को पाटने के लिये मध्य प्रदेश से कैलाश विजयवर्गीय व संघ से राम माधव सरीखे संगठन के संचालन का लंबा अनुभव रखनेवाले नेताओं को राष्ट्रीय राजनीति में अवश्य लाया गया है लेकिन इतने भर से बात बनती हुई नहीं दिख रही है। आलम यह है कि सतही तौर पर समूचा संगठन सिर्फ शाह में ही समाहित होकर रह गया है जिसके नतीजे में इस दफा ना तो संघ को उनका कोई विकल्प मिला और ना ही बगावत की हद तक आक्रामक तेवरोंवाले मार्गदर्शकों के हिमायतियों की टोली किसी अन्य चेहरे को शाह के मुकाबले खड़ा करने में कामयाब हो पायी। लेकिन सूत्रों की मानें तो शाह के नाम पर स्वस्ति देने के क्रम में ही संघ ने यह बता दिया है कि संगठन का मौजूदा स्वरूप उसे कतई स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में शाह के नये सिपहसालारों की टोली में अब आमूलचूल परिवर्तन होना तय ही है। खास तौर से जनाधारवाले क्षत्रपों, महिलाओं व युवाओं को तरजीह देकर भविष्य के लिये पार्टी की नयी पीढ़ी के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। महिलाओं को संगठन में तरजीह देने के मामले में अभी तक पार्टी में महासचिव व उपाध्यक्ष के पद पर सिर्फ एक-एक महिलाओं को ही स्थान मिला हुआ है। जबकि बिहार में नितीश ने शराबबंदी करके और नौकरियों में 35 फीसदी आरक्षण देकर महिलाओं की गोलबंदी करने की पहल कर दी है। साथ ही उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु तक में महिला नेत्रियों के साथ ही पार्टी का सीधा चुनावी दंगल होनेवाला है और जम्मू कश्मीर में सहयोगी दल की महिला मुख्यमंत्री के साथ ही सत्ता की साझेदारी करनी है। इसके अलावा राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस सरीखे ऐसे दल के साथ आर-पार का मुकाबला करना है जिसकी बागडोर महिला के हाथ में ही है। ऐसे में संगठन में शीर्ष स्तर पर महिलाओं को तरजीह देने के अलावा वैसे भी पार्टी के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हालांकि बदलाव की इस तरह की आवश्यकताओं से आरएसएस भी वाकिफ है और संगठन के शीर्ष रणनीतिकार व शुभचिंतक भी। लेकिन जरूरत है उस खुशफहमी से उबरने की जिसके नशे ने ना सिर्फ दिल्ली व बिहार में पार्टी का बेड़ा गर्क कर दिया है बल्कि सरकार की छवि भी इस कदर बिगाड़ दी है कि महज बीस माह के भीतर ही जमीनी स्तर पर मोदी लहर से पनपा जनता के विश्वास व भरोसे का मानसून पूरी तरह नदारद हो गया है। लिहाजा अब सियासत के खेत में सत्ता का बगीचा उगाने के लिये पार्टी को खुद ही कुआं खोदकर भरोसे का पानी इकट्ठा करना होगा। वर्ना मानसूनी बारिश के भरोसे रहकर महज मेहनत का दिखावा, कागजी बुआई और जुबानी जुम्बिश की सिंचाई का नतीजा फिर उन्हीं काटों की पैदावार के तौर पर सामने आ सकता है जो ना सिर्फ बिहार और दिल्ली में नमूदार हो चुका है बल्कि आगामी दिनों में होनेवाले पांच राज्यों के चुनावों में जगजाहिर हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    @ नवकांत ठाकुर

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