सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

‘विरोधी के हमलों से अपना हित साधने की सियासत’

‘विरोधी के हमलों से अपना हित साधने की सियासत’

निराली है राजनीति और निराला है इसका रंग-ढ़ंग। इसमें हर चमकनेवाली चीज सोना नहीं होती और आंखों से देखा हुआ भी हमेशा सच नहीं होता। होता कुछ और है, दिखता कुछ और। यहां विरोधियों का हमला हमेशा अहितकर नहीं होता, बल्कि अपना हित साधने के लिये विरोधी के हमले को भी हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की पुरानी परंपरा रही है। लेकिन बाहर से दिखनेवाले सियासी खेल की अंदरूनी हकीकत अक्सर बनावटी प्रपंच के पर्दे में पहले भी दबी रह जाती थी और आज भी अधिकांश मामलों की असली रामकहानी अनजानी ही रह जाती है। मसलन गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल की बिटिया को सूबे की सरकार द्वारा करोड़ों की जमीन कौडि़यों की कीमत पर आवंटित कर दिये जाने के मामले को ही देखें तो सतही तौर यही दिखता है कि इस कथित घपलेबाजी की जानकारियां विरोधी दलों ने पाताल तोड़कर निकाली हैं। लेकिन मौजूदा कालखंड के सियासी समीकरणों से तो यही लगता है कि ना तो विरोधियों को इस मामले की जानकारी हासिल करने के लिये कोई पातालतोड़ मेहनत करनी पड़ी होगी और ना ही इसके संभावित असर से उन्हें सीधे तौर पर कोई फायदा मिलना है। अलबत्ता अगर यह वार सटीक बैठा तो शुचिता व पारदर्शिता को ही अपनी पूंजी बतानेवाली आनंदीबेन को नैतिक आधार पर कोई कड़ा फैसला लेना पड़ सकता है जिसका सीधा लाभ उनकी पार्टी को ही मिलेगा। अलबत्ता विपक्ष का हित तो इसमें निहित है कि आनंदीबेन ही अगले साल होनेवाले सूबे के विधानसभा चुनाव की कमान संभालें ताकि उनकी उस बढ़ती अलोकप्रियता का फायदा उठाया जा सके जिसने पिछले दिनों स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा का बेड़ा गर्क कर दिया। ऐसे में अगर मौजूदा हंगामे के बीच वे स्वयं ही उच्च नैतिक मानदंडों का अनुपालन करते हुए पद छोड़ने का फैसला कर लें तो उनके प्रति पनपनेवाली सहानुभूति की लहर भी भाजपा के लिये फायदेमंद हो जाएगी और सत्ता में बदलाव करने की मौजूदा आवश्यकता भी पूर्ण हो जाएगी। दूसरी संभावना यह भी है कि चुंकि जमीन आवंटन का फैसला मोदी की सरकार ने किया था लिहाजा आनंदीबेन विरोधी स्वरों को शांत करने का कोई ठोस कदम उठाकर अपनी सत्ता सुरक्षित भी कर सकती हैं। लेकिन ऐसे में अगर सूबे का चुनाव परिणाम नकारात्मक रहा तो उसका ठीकरा आनंदीबंन पर ही फूटेगा, मोदी-शाह की जोड़ी पर इसकी कोई जिम्मेवारी नहीं होगी। यानि जब इस पूरे हंगामे का सीधा फायदा हर हालत में भाजपा के मौजूदा शीर्ष नेतृत्व को ही मिलना है तब इन अटकलों को कैसे नकारा जा सकता है कि इस आग का जलावन अंदर से ही निकला है जिसमें विपक्ष ने तो सिर्फ अपने विरोध की माचिस ही सुलगायी है। खैर, विरोधियों के हंगामे का अपने फायदे के लिये इस्तेमाल करने की अटकलें तब भी लगीं जब छत्तीसगढ़ की राजनीति में अजित जोगी को निपटाने के लिये सीटों की सौदेबाजी का सबूत सार्वजनिक हुआ और चिक्की खरीद घोटाले के मामले को लेकर सूबे की सबसे तगड़े जनाधारवाली नेत्री पंकजा मुंडे पर आरोपों की बरसात हुई। लेकिन दिलचस्प तथ्य है कि ऐसे तमाम मामलों के पीछे की अंदरूनी कहानी अव्वल तो कभी सामने ही नहीं आ पाती है और अगर किसी को कुछ उड़ती-फिरती भनक मिल भी जाये तो उसे गल्प-कल्प कहकर हंसी में उड़ा दिया जाता है। खैर, सियासत में विरोधियों के हंगामे का अपने मनमुताबिक इस्तेमाल की परंपरा आज की नहीं है। सियासत के चतुर-सुजान खिलाड़ी अक्सर इस दांव का इस्तेमाल करते रहे हैं। मसलन इराक युद्ध के दौरान जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर मित्र राष्ट्रों की ओर से इस बात का दबाव बनाया गया कि वे भारतीय फौज को जंग में हिस्सेदारी निभाने का निर्देश दें तो इस समस्या का समाधान उन्होंने वामपंथी विरोधियों को अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़क पर उतार कर निकाला था। उन्हें करना सिर्फ इतना पड़ा कि वामदलों के कुछ शीर्ष नेताओं को उन्होंने चाय पर चर्चा के लिये बुलाया और बातों ही बातों में धीरे से यह सुर्रा छोड़ दिया कि भारतीय फौज की इराक युद्ध में हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिये मित्र राष्ट्रों की ओर से पड़ रहे दबाव पर विचार करना आवश्यक हो गया है। वाजपेयी की जुबान से यह सुनते ही वामपंथी भड़क उठे और चाय की चर्चा को जुबानी जंग में तब्दील कर दी। वामपंथी नेताओं की टोली बुरी तरह भड़क उठी जबकि वे चिरपरिचित मुस्कान के साथ चुपचाप चाय चुस्कियां लेते रहे। आखिर में अपने प्याले की पूरी चाय निपटाने के बाद चर्चा को विराम देते हुए वाजपेयी ने काॅमरेडों को सिर्फ यही कहा कि प्रधानमंत्री निवास के प्रांगण में चीखने-चिल्लाने के बजाय अगर वे संसद से सड़क तक अपनी आवाज बुलंद करें तो कुछ बात भी बने। इसके बाद जो हुआ वह इतिहास बन गया। समूचे देश में इराक पर हुए अमेरिकी हमले के खिलाफ इस कदर व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुआ कि उसकी खबर सुनने के बाद मित्र राष्ट्रों के किसी भी राष्ट्राध्यक्ष की इतनी हिम्मत ही नहीं हुई कि वह दोबारा वाजपेयी से भारतीय फौज को इराक भेजने की बात कहने की जुर्रत भी कर सके। यानि सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। खैर, विरोधियों की लाठी से अपने गले में पड़े सांप को हटाने की राजनीति का पारदर्शिता व नैतिकता से भले ही कोई वास्ता ना हो लेकिन गोपनीयता के साथ सियासी समीकरणों को दुरूस्त करने की इन्हीं कूटनीतियों का नाम तो राजनीति है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर

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