बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

‘फिर कलेवर बदलने की जुगत में है जादूगर’

‘फिर कलेवर बदलने की जुगत में है जादूगर’


मौजूदा सियासी दौर के सबसे सफल जादूगर का खिताब तो निर्विवाद रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ही मिल सकता है। भले अभी उनकी जादूगरी की चमक कुछ फीकी दिख रही हो लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनको सीधी टक्कर देने की हैसियत तो आज भी किसी की नहीं है। ऐसे में इन्हें यह सहूलियत तो हासिल ही है कि ये अभी आराम से अपनी छवि को संवार सकें, निखार सकें। वैसे भी जब अभी से यह पता चल चुका है कि मौजूदा दौर में कायम हो रही छवि दूरगामी तौर पर भारी नुकसान का सबब बन सकती है तो क्यों ना अभी से उससे पीछा छुड़ाने की शुरूआत कर दी जाए। नेक काम में विलंब करने से कोई फायदा तो होना नहीं है। शायद यही वजह है कि मोदी ने अपनी छवि बदलने का अभियान अविलंब आरंभ कर देने का मन बना लिया है। दरअसल उनकी छवि इन दिनों ऐसी गढ़ दी गयी है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के शब्दों में कहें तो उनकी अगुवाई में ‘सूट-बूट की सरकार’ चल रही है जिसका देश के आम मेहनतकश लोगों के हितों से कोई लेना देना ही नहीं है। उनका मन देश में कम और विदेश में ही अधिक रमता है। किसानों से उन्हें ऐसी चिढ़ है कि खेती की जमीन उद्योगपतियों को देने के लिये वे भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन करने के लिये संसद से सहमति लेने में नाकाम रहते हैं तो मनमाने तौर पर अध्यादेश जारी करके मनमानी नीति लागू करने से भी परहेज नहीं बरतते हैं। देश के दो तिहाई लोग भले ही फटेहाली, तंगहाली व भुखमरी का सामना कर रहे हों लेकिन वे लखटकिया सूट पहनकर इतराने से भी संकोच नहीं करते हैं। उन्हें ना तो दलितों की फिक्र है, ना मजदूरों की, ना किसानों की, ना अल्पसंख्यकों की और ना ही महिलाओं की। वे तो मस्त हैं अपनी मस्ती में। व्यस्त हैं सत्तासुख की बस्ती में। यही छवि गढ़ने में उनके तमाम विरोधी तभी से जुटे हुए हैं जबसे उन्होंने सत्ता की बागडोर संभाली है। कहावत है कि किसी झूठ को जितनी दफा दोहराया जाये, उसके सच होने का संदेह उतना ही मजबूत होता चला जाता है। तभी तो विरोधियों द्वारा बनायी गयी इस नकारात्मक छवि ने उनके उस जादू को जमीन पर पटक दिया है जिसके दम पर उन्होंने लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत दिलाया था। नतीजन दिल्ली से लेकर बिहार तक में उनका जादू विफल हो गया और पार्टी औंधे मुंह गिरी। हालांकि इससे राष्ट्रीय राजनीति में उनके वजूद व वकार की मजबूती में तो कोई कमी नहीं आयी है और हालिया सर्वे यही बताते हैं कि अगर आज भी लोकसभा का चुनाव कराया जाये तो मोदी को टक्कर देने की स्थिति में कोई नहीं है। लेकिन दिल्ली और बिहार से लेकर विभिन्न सूबों के स्थानीय निकायों के चुनावों में भी हासिल हो रही सिलसिलेवार शिकस्त ने उस दूरगामी खतरे की ओर तो इशारा कर ही दिया है कि अगर मोदी की मौजूदा छवि में सुधार नहीं किया गया तो इसका दूरगामी असर बेहद नकारात्मक साबित हो सकता है। तभी तो मोदी ने बिना देरी किये अभी से अपनी छवि बदलने की कवायदें शुरू कर दी हैं। ‘कल करे सो आज कर, आज करे सो अब’ की तर्ज पर। वैसे अपनी बदलने में मोदी को हासिल महारथ से तो सब वाकिफ ही हैं। जब पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव थे तो उनकी छवि बेहद मासूम, मेहनती व शर्मीले सांगठनिक नेता की थी जो ना तो मीडिया से अधिक सरोकार रखता हो और ना आम जनता में जनाधार बनाने का ख्वाहिशमंद हो। बाद में जब गुजरात भेजे गये तो उनकी छवि बेहद शातिर, जोड़-तोड़ में माहिर, अपने हित को सर्वोपरि रखने और विरोधी को कतई बर्दाश्त नहीं करनेवाले नेता की बन गयी। यहां तक कि 2002 के दंगों के बाद तो वे कट्टर हिन्दूवादी तानाशाह के तौर पर पहचाने जाने लगे जिन्हें नरभक्षी तक बता दिया गया। जब प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल हुए तो उस कट्टरवादी छवि से किनारा करते हुए सौम्यता, सरलता, सादगी, मिलनसारिता और समरसता का लबादा ओढ़ लिया। बाद में ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे और अंत्योदय के इरादे के साथ सर्वप्रिय जननेता की छवि बनाने की कोशिश तो की लेकिन इस बार एकजुट विरोधियों ने उनकी छवि को तहस-नहस कर दिया। लेकिन अब एक बार फिर वे अपनी छवि बदलने की योजना में जुट रहे हैं। शुरूआत हो रही है किसान हितैषी रंग को गाढ़ा करने से। इसके लिये सिर्फ 28 फरवरी को यूपी के रूहेलखंड इलाके में ही नहीं बल्कि 18 को मध्यप्रदेश में, 21 को उड़ीसा स्थित बड़गढ़ में और 27 को कर्नाटक में भी व्यापक किसान महारैली करने जा रहे हैं। इसमें बखान होगा ‘स्वाइल हेल्थकार्ड’ के पांच करोड़ लाभार्थियों को मिले लाभ का, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना का, आपदा राहत के नियमों की ढ़ील का और फसल बीमा योजना का। सूत्रों की मानें तो अब उनकी विदेश यात्राएं भी बेहद आवश्यक होने पर ही होंगी और चुनावी कार्यक्रमों में भी वे अग्रिम मोर्चे से दूर रहेंगे। ऐसी और भी कई तब्दीलियों और नयेपन का मुजाहिरा वे खुद भी करेंगे, उनकी सरकार भी करेगी और संगठन भी। लेकिन विरोधियों द्वारा आजमाये जा रहे दुष्प्रचार के हथियार में आस्तीन के सांपों के जहर का इस्तेमाल अनवरत जारी रहने का नतीजा छवि सुधारने की सकारात्मक कोशिशों पर तो अपना असर डालेगा ही। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर     

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