शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

‘सियासत में सुरक्षा बनाम सुरक्षा की सियासत’

‘सियासत में सुरक्षा बनाम सुरक्षा की सियासत’

सियासत में सुरक्षा की बात हो या सुरक्षा के सियासत की। यह मसला तो सदाबहार है। कभी किसी की सुरक्षा में कटौती हो जाये तो सियासत शुरू। कभी संघ प्रमुख मोहन भागवत सरीखे लोगों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाये तो उस पर भी सियासत। सुरक्षा घेरा सियासी सवालों का सबब बनता ही रहता है। यह मसला निर्धारित अंतराल पर देश के अलग-अलग कोनों से इतनी दफा उठता रहता है कि अब इसे आम तौर पर कोई भी ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता। सुरक्षा के मसले पर जब भी हायतौबा मचती है तो मान लिया जाता है कि यह सियासत चमकाने की ही कोशिश है। लेकिन असली मुश्किल तब पेश आती है जब सियासत में मौजूद खतरों के मद्देनजर सुरक्षा को स्वीकार करने के बजाय बड़े नेतागण अपनी सियासी जरूरतों को पूरा करने के लिये सुरक्षा घेरे के प्रति बेपरवाही बरतना शुरू कर देते हैं। इस मामले में सबसे पहला नाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ही आता है जो सबसे अधिक खतरे में होने के बावजूद सुरक्षा घेरे को तोड़ने का रिकार्ड बनाने की ओर अग्रसर हैं। आज भले ही समूचे देश को मायूस करते हुए सियाचीन के शेर लांस नायक हनुमनथप्पा कोप्पड़ ने चिरनिद्र को अंगीकार कर लिया है, लेकिन छह दिनों तक बर्फ की 25 फीट मोटी परत के नीचे से दबे रहने के बाद भी उनके जिन्दा निकल आने और दिल्ली स्थित सेना के आरआर अस्पताल में उन्हें दाखिल कराये जाने की खबर प्रधानमंत्री को जैसी ही पता चली तो वे फौरन वहां जाने के लिये लपक लिये। जितनी शीघ्रता से उन्होंने वहां की दौड़ लगायी उतने कम समय में ना तो रास्ते को महफूज करना संभव था और ना ही उनके रूट को परंपरागत तरीके से अभेद्य बनाया जा सकता था। लेकिन सुरक्षा के प्रति लापरवाही की पराकाष्ठा का मुजाहिरा करते हुए वे दनदनाते हुए हनुमनथप्पा को देखने के लिये निकल पड़े। यह तो गनीमत रही कि सुरक्षा काफिला उनका अनुसरण कर रहा था और उनकी यात्रा निर्विघ्न समाप्त हो गयी वर्ना ऐसी लापरवाही का क्या अंजाम हो सकता है इससे शायद ही कोई अनजान हो। खैर, यह तो महज बानगी ही है मोदी द्वारा सुरक्षा घेरे के प्रति बेपरवाही बरते जाने की। अलबत्ता उनकी ऐसी हरकतें तो तभी से जारी हैं जब वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पूरे देश में धुंआधार चुनाव प्रचार कर रहे थे। उन दिनों पटना के गांधी मैदान में हुई जनसभा को संबोधित करने के लिये उन्होंने जिस तरह से तमाम सुरक्षा सलाहों की अनदेखी करते हुए लगातार हो रहे बम धमाके के बीच ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे को पहली दफा खुलकर बुलंद करने की पहल की थी, उसके साक्षी रहे लोगों को आज भी जब उस दिन का मंजर याद आता है तो उनके रौंगटे खड़े हो जाते हैं। तब से लेकर अब तक मोदी ने सुरक्षा से खिलवाड़ करने का सिलसिला लगातार जारी रखा हुआ है। भाजपा मुख्यालय में आयोजित हुए दीपावली मिलन के पिछले दो आयोजनों में पत्रकारों को अपने साथ सेल्फी खींचने का मौका देने के लिये वे जिस कदर खचाखच भरे पंडाल में भीड़ के बीच कूद पड़ते हैं उसका नतीजा किस कदर खतरनाक हो सकता है यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है। स्वतंत्रता दिवस के समारोह से लेकर गणतंत्रता दिवस की परेड तक के आयोजन में लोगों से हाथ मिलाने, बच्चों को दुलारने और आम लोगों को अपनत्व का एहसास कराने के लिये सुरक्षा घेरे को तोड़कर भीड़ के करीब चले जाना इनका शगल बन गया है। भले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल सार्वजनिक तौर पर उनसे ऐसा नहीं करने की लाख अपील करते फिरें लेकिन इनकी कानों पर जूं तक नहीं रेंगती है। विदेश यात्रा से लौटने के क्रम में सड़क पर मौजूद समर्थकों से अचानक गाड़ी रोककर मिलना-जुलना, विदेश दौरे में भी आस्ट्रेलिया से लेकर खाड़ी तक में अपना संबोधन सुनने आये लोगों से हाथ मिलाने पहुंच जाना, संसद की कैंटीन के खाने का स्वाद लेने के लिये अचानक वहां आ धमकना, प्रधानमंत्री के तौर पर सियाचीन जाने की योजना को सुरक्षा तंत्र से अंतिम समय तक छिपाये रखना और रन फाॅर युनिटी सरीखे सार्वजनिक दौड़ के आयोजन में भीड़ का हिस्सा बनने की कोशिश करना इनकी पहचान बनती जा रही है। अब इसके लिये सुरक्षा व खुफिया तंत्र हलकान होता है तो होता रहे, इनकी बला से। इन्होंने तो मानो सुरक्षा की परवाह नहीं करने की कसम खा रखी है। वैसे मोदी अकेले नहीं हैं जो सुरक्षा घेरे से बेपरवाह होकर अक्सर भीड़ का हिस्सा बन जाना पसंद करते हों। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो आवश्यक सुरक्षा लेने से ही इनकार कर देते हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को भी अपनी सुरक्षा में तैनात दस्ते को चकमा देकर चंपत हो जाने में महारथ हासिल है। अब इन नेताओं को कौन समझाये कि सुरक्षा सलाहों की अनदेखी के नतीजे में ही देश को ना सिर्फ महात्मा गांधी की हत्या का दंश भुगतना पड़ा बल्कि अगर इंदिरा गांधी ने अपनी निजी सुरक्षा में फेरबदल करने और राजीव गांधी ने भीड़ से निर्धारित दूरी बनाकर रहने की ठोस खुफिया सलाहों को मान लिया होता तो उनसे असमय जुदाई का दुख देश को नहीं भुगतना पड़ता। खैर, सियासत में लोगों से मिलने-जुलने और उन्हें अपनेपन का एहसास कराने की भी अपनी अहमियत है लेकिन इसके लिये सुरक्षा से खिलवाड़ किये जाने को कैसे जायज ठहराया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

‘विरोधी के हमलों से अपना हित साधने की सियासत’

‘विरोधी के हमलों से अपना हित साधने की सियासत’

निराली है राजनीति और निराला है इसका रंग-ढ़ंग। इसमें हर चमकनेवाली चीज सोना नहीं होती और आंखों से देखा हुआ भी हमेशा सच नहीं होता। होता कुछ और है, दिखता कुछ और। यहां विरोधियों का हमला हमेशा अहितकर नहीं होता, बल्कि अपना हित साधने के लिये विरोधी के हमले को भी हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की पुरानी परंपरा रही है। लेकिन बाहर से दिखनेवाले सियासी खेल की अंदरूनी हकीकत अक्सर बनावटी प्रपंच के पर्दे में पहले भी दबी रह जाती थी और आज भी अधिकांश मामलों की असली रामकहानी अनजानी ही रह जाती है। मसलन गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल की बिटिया को सूबे की सरकार द्वारा करोड़ों की जमीन कौडि़यों की कीमत पर आवंटित कर दिये जाने के मामले को ही देखें तो सतही तौर यही दिखता है कि इस कथित घपलेबाजी की जानकारियां विरोधी दलों ने पाताल तोड़कर निकाली हैं। लेकिन मौजूदा कालखंड के सियासी समीकरणों से तो यही लगता है कि ना तो विरोधियों को इस मामले की जानकारी हासिल करने के लिये कोई पातालतोड़ मेहनत करनी पड़ी होगी और ना ही इसके संभावित असर से उन्हें सीधे तौर पर कोई फायदा मिलना है। अलबत्ता अगर यह वार सटीक बैठा तो शुचिता व पारदर्शिता को ही अपनी पूंजी बतानेवाली आनंदीबेन को नैतिक आधार पर कोई कड़ा फैसला लेना पड़ सकता है जिसका सीधा लाभ उनकी पार्टी को ही मिलेगा। अलबत्ता विपक्ष का हित तो इसमें निहित है कि आनंदीबेन ही अगले साल होनेवाले सूबे के विधानसभा चुनाव की कमान संभालें ताकि उनकी उस बढ़ती अलोकप्रियता का फायदा उठाया जा सके जिसने पिछले दिनों स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा का बेड़ा गर्क कर दिया। ऐसे में अगर मौजूदा हंगामे के बीच वे स्वयं ही उच्च नैतिक मानदंडों का अनुपालन करते हुए पद छोड़ने का फैसला कर लें तो उनके प्रति पनपनेवाली सहानुभूति की लहर भी भाजपा के लिये फायदेमंद हो जाएगी और सत्ता में बदलाव करने की मौजूदा आवश्यकता भी पूर्ण हो जाएगी। दूसरी संभावना यह भी है कि चुंकि जमीन आवंटन का फैसला मोदी की सरकार ने किया था लिहाजा आनंदीबेन विरोधी स्वरों को शांत करने का कोई ठोस कदम उठाकर अपनी सत्ता सुरक्षित भी कर सकती हैं। लेकिन ऐसे में अगर सूबे का चुनाव परिणाम नकारात्मक रहा तो उसका ठीकरा आनंदीबंन पर ही फूटेगा, मोदी-शाह की जोड़ी पर इसकी कोई जिम्मेवारी नहीं होगी। यानि जब इस पूरे हंगामे का सीधा फायदा हर हालत में भाजपा के मौजूदा शीर्ष नेतृत्व को ही मिलना है तब इन अटकलों को कैसे नकारा जा सकता है कि इस आग का जलावन अंदर से ही निकला है जिसमें विपक्ष ने तो सिर्फ अपने विरोध की माचिस ही सुलगायी है। खैर, विरोधियों के हंगामे का अपने फायदे के लिये इस्तेमाल करने की अटकलें तब भी लगीं जब छत्तीसगढ़ की राजनीति में अजित जोगी को निपटाने के लिये सीटों की सौदेबाजी का सबूत सार्वजनिक हुआ और चिक्की खरीद घोटाले के मामले को लेकर सूबे की सबसे तगड़े जनाधारवाली नेत्री पंकजा मुंडे पर आरोपों की बरसात हुई। लेकिन दिलचस्प तथ्य है कि ऐसे तमाम मामलों के पीछे की अंदरूनी कहानी अव्वल तो कभी सामने ही नहीं आ पाती है और अगर किसी को कुछ उड़ती-फिरती भनक मिल भी जाये तो उसे गल्प-कल्प कहकर हंसी में उड़ा दिया जाता है। खैर, सियासत में विरोधियों के हंगामे का अपने मनमुताबिक इस्तेमाल की परंपरा आज की नहीं है। सियासत के चतुर-सुजान खिलाड़ी अक्सर इस दांव का इस्तेमाल करते रहे हैं। मसलन इराक युद्ध के दौरान जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर मित्र राष्ट्रों की ओर से इस बात का दबाव बनाया गया कि वे भारतीय फौज को जंग में हिस्सेदारी निभाने का निर्देश दें तो इस समस्या का समाधान उन्होंने वामपंथी विरोधियों को अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़क पर उतार कर निकाला था। उन्हें करना सिर्फ इतना पड़ा कि वामदलों के कुछ शीर्ष नेताओं को उन्होंने चाय पर चर्चा के लिये बुलाया और बातों ही बातों में धीरे से यह सुर्रा छोड़ दिया कि भारतीय फौज की इराक युद्ध में हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिये मित्र राष्ट्रों की ओर से पड़ रहे दबाव पर विचार करना आवश्यक हो गया है। वाजपेयी की जुबान से यह सुनते ही वामपंथी भड़क उठे और चाय की चर्चा को जुबानी जंग में तब्दील कर दी। वामपंथी नेताओं की टोली बुरी तरह भड़क उठी जबकि वे चिरपरिचित मुस्कान के साथ चुपचाप चाय चुस्कियां लेते रहे। आखिर में अपने प्याले की पूरी चाय निपटाने के बाद चर्चा को विराम देते हुए वाजपेयी ने काॅमरेडों को सिर्फ यही कहा कि प्रधानमंत्री निवास के प्रांगण में चीखने-चिल्लाने के बजाय अगर वे संसद से सड़क तक अपनी आवाज बुलंद करें तो कुछ बात भी बने। इसके बाद जो हुआ वह इतिहास बन गया। समूचे देश में इराक पर हुए अमेरिकी हमले के खिलाफ इस कदर व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुआ कि उसकी खबर सुनने के बाद मित्र राष्ट्रों के किसी भी राष्ट्राध्यक्ष की इतनी हिम्मत ही नहीं हुई कि वह दोबारा वाजपेयी से भारतीय फौज को इराक भेजने की बात कहने की जुर्रत भी कर सके। यानि सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। खैर, विरोधियों की लाठी से अपने गले में पड़े सांप को हटाने की राजनीति का पारदर्शिता व नैतिकता से भले ही कोई वास्ता ना हो लेकिन गोपनीयता के साथ सियासी समीकरणों को दुरूस्त करने की इन्हीं कूटनीतियों का नाम तो राजनीति है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

‘फिर कलेवर बदलने की जुगत में है जादूगर’

‘फिर कलेवर बदलने की जुगत में है जादूगर’


मौजूदा सियासी दौर के सबसे सफल जादूगर का खिताब तो निर्विवाद रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ही मिल सकता है। भले अभी उनकी जादूगरी की चमक कुछ फीकी दिख रही हो लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनको सीधी टक्कर देने की हैसियत तो आज भी किसी की नहीं है। ऐसे में इन्हें यह सहूलियत तो हासिल ही है कि ये अभी आराम से अपनी छवि को संवार सकें, निखार सकें। वैसे भी जब अभी से यह पता चल चुका है कि मौजूदा दौर में कायम हो रही छवि दूरगामी तौर पर भारी नुकसान का सबब बन सकती है तो क्यों ना अभी से उससे पीछा छुड़ाने की शुरूआत कर दी जाए। नेक काम में विलंब करने से कोई फायदा तो होना नहीं है। शायद यही वजह है कि मोदी ने अपनी छवि बदलने का अभियान अविलंब आरंभ कर देने का मन बना लिया है। दरअसल उनकी छवि इन दिनों ऐसी गढ़ दी गयी है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के शब्दों में कहें तो उनकी अगुवाई में ‘सूट-बूट की सरकार’ चल रही है जिसका देश के आम मेहनतकश लोगों के हितों से कोई लेना देना ही नहीं है। उनका मन देश में कम और विदेश में ही अधिक रमता है। किसानों से उन्हें ऐसी चिढ़ है कि खेती की जमीन उद्योगपतियों को देने के लिये वे भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन करने के लिये संसद से सहमति लेने में नाकाम रहते हैं तो मनमाने तौर पर अध्यादेश जारी करके मनमानी नीति लागू करने से भी परहेज नहीं बरतते हैं। देश के दो तिहाई लोग भले ही फटेहाली, तंगहाली व भुखमरी का सामना कर रहे हों लेकिन वे लखटकिया सूट पहनकर इतराने से भी संकोच नहीं करते हैं। उन्हें ना तो दलितों की फिक्र है, ना मजदूरों की, ना किसानों की, ना अल्पसंख्यकों की और ना ही महिलाओं की। वे तो मस्त हैं अपनी मस्ती में। व्यस्त हैं सत्तासुख की बस्ती में। यही छवि गढ़ने में उनके तमाम विरोधी तभी से जुटे हुए हैं जबसे उन्होंने सत्ता की बागडोर संभाली है। कहावत है कि किसी झूठ को जितनी दफा दोहराया जाये, उसके सच होने का संदेह उतना ही मजबूत होता चला जाता है। तभी तो विरोधियों द्वारा बनायी गयी इस नकारात्मक छवि ने उनके उस जादू को जमीन पर पटक दिया है जिसके दम पर उन्होंने लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत दिलाया था। नतीजन दिल्ली से लेकर बिहार तक में उनका जादू विफल हो गया और पार्टी औंधे मुंह गिरी। हालांकि इससे राष्ट्रीय राजनीति में उनके वजूद व वकार की मजबूती में तो कोई कमी नहीं आयी है और हालिया सर्वे यही बताते हैं कि अगर आज भी लोकसभा का चुनाव कराया जाये तो मोदी को टक्कर देने की स्थिति में कोई नहीं है। लेकिन दिल्ली और बिहार से लेकर विभिन्न सूबों के स्थानीय निकायों के चुनावों में भी हासिल हो रही सिलसिलेवार शिकस्त ने उस दूरगामी खतरे की ओर तो इशारा कर ही दिया है कि अगर मोदी की मौजूदा छवि में सुधार नहीं किया गया तो इसका दूरगामी असर बेहद नकारात्मक साबित हो सकता है। तभी तो मोदी ने बिना देरी किये अभी से अपनी छवि बदलने की कवायदें शुरू कर दी हैं। ‘कल करे सो आज कर, आज करे सो अब’ की तर्ज पर। वैसे अपनी बदलने में मोदी को हासिल महारथ से तो सब वाकिफ ही हैं। जब पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव थे तो उनकी छवि बेहद मासूम, मेहनती व शर्मीले सांगठनिक नेता की थी जो ना तो मीडिया से अधिक सरोकार रखता हो और ना आम जनता में जनाधार बनाने का ख्वाहिशमंद हो। बाद में जब गुजरात भेजे गये तो उनकी छवि बेहद शातिर, जोड़-तोड़ में माहिर, अपने हित को सर्वोपरि रखने और विरोधी को कतई बर्दाश्त नहीं करनेवाले नेता की बन गयी। यहां तक कि 2002 के दंगों के बाद तो वे कट्टर हिन्दूवादी तानाशाह के तौर पर पहचाने जाने लगे जिन्हें नरभक्षी तक बता दिया गया। जब प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल हुए तो उस कट्टरवादी छवि से किनारा करते हुए सौम्यता, सरलता, सादगी, मिलनसारिता और समरसता का लबादा ओढ़ लिया। बाद में ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे और अंत्योदय के इरादे के साथ सर्वप्रिय जननेता की छवि बनाने की कोशिश तो की लेकिन इस बार एकजुट विरोधियों ने उनकी छवि को तहस-नहस कर दिया। लेकिन अब एक बार फिर वे अपनी छवि बदलने की योजना में जुट रहे हैं। शुरूआत हो रही है किसान हितैषी रंग को गाढ़ा करने से। इसके लिये सिर्फ 28 फरवरी को यूपी के रूहेलखंड इलाके में ही नहीं बल्कि 18 को मध्यप्रदेश में, 21 को उड़ीसा स्थित बड़गढ़ में और 27 को कर्नाटक में भी व्यापक किसान महारैली करने जा रहे हैं। इसमें बखान होगा ‘स्वाइल हेल्थकार्ड’ के पांच करोड़ लाभार्थियों को मिले लाभ का, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना का, आपदा राहत के नियमों की ढ़ील का और फसल बीमा योजना का। सूत्रों की मानें तो अब उनकी विदेश यात्राएं भी बेहद आवश्यक होने पर ही होंगी और चुनावी कार्यक्रमों में भी वे अग्रिम मोर्चे से दूर रहेंगे। ऐसी और भी कई तब्दीलियों और नयेपन का मुजाहिरा वे खुद भी करेंगे, उनकी सरकार भी करेगी और संगठन भी। लेकिन विरोधियों द्वारा आजमाये जा रहे दुष्प्रचार के हथियार में आस्तीन के सांपों के जहर का इस्तेमाल अनवरत जारी रहने का नतीजा छवि सुधारने की सकारात्मक कोशिशों पर तो अपना असर डालेगा ही। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर     

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

‘नदारद मानसून के बीच बगीचा लहलहाने की चुनौती’

‘नदारद मानसून के बीच बगीचा लहलहाने की चुनौती’

तमाम अटकलों, कयासों, अंतर्विरोधों व टकरावों के बावजूद निर्विरोध तरीके से भाजपा की कमान अमित शाह के हाथ में आ गयी है। लेकिन असली चुनौती की शुरूआत तो अब होनेवाली है। ना सिर्फ शाह के लिये बल्कि भाजपा के लिये भी। बेशक संगठन को नयी शक्ल देने के मामले में शाह कतई जल्दबाजी में नहीं दिख रहे हों। लेकिन अधिक देर करने का विकल्प भी उनके पास नहीं है। अब तक तो एक तरफ सत्ता का हनीमून चल रहा था और दूसरी तरफ संगठन का संचालन भी वैकल्पिक व कार्यवाहक तरीके से करने के बावजूद कोई खास परेशानी नहीं आ रही थी। लिहाजा सांगठनिक स्तर पर भी काफी प्रयोग हुए और सैद्धांतिक व वैचारिक मसलों पर भी जमकर ढ़ील ली गयी। मगर इस तरह से तो अब संगठन कतई नहीं चल सकता। सच तो यही है कि मौजूदा हालातों में पार्टी ना तो उस विस्तार को कायम रख पा रही है जो उसे लोकसभा चुनाव में हासिल हुई थी और ना ही सरकार के कामकाज की जानकारी जमीन तक पहुंचाने की जिम्मेवारी का अपेक्षित तरीके से समुचित निर्वहन करने में कामयाब हो रही है। वर्ना प्रधानमंत्री को सरकार के कामकाज का प्रचार प्रसार करने के लिये अपने केन्द्रीय मंत्रियों से ढि़ंढ़ोरची का काम लेने के लिये हर्गिज मजबूर नहीं होना पड़ता। वैसे सरकार के स्तर पर तो काफी काम हो रहा है लेकिन समस्या है कि अव्वल तो काम की रफ्तार संतोषजनक नहीं है और दूसरे जितना काम हो भी रहा है उसका प्रचार-प्रसार करने में पार्टी नाकाम साबित हो रही है। कहने को तो ग्यारह करोड़ की सदस्य संख्या के साथ भाजपा ना सिर्फ भारत की बल्कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर अपनी पहचान कायम कर चुकी है। लेकिन इस कागजी हैसियत का जमीन पर कोई लाभ होता हुआ नहीं दिख रहा है। तभी तो बिहार में जहां भाजपा ने मोबाइल पर मिस्डकाॅल के माध्यम से 90 लाख से भी अधिक लोगों को अपना सदस्य बनाने में कामयाबी हासिल की वहां विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज 92,85,574 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। यानि संगठन के मोर्चे पर गड़बडि़यां स्पष्ट दिख रही हैं। वैसे भी शीर्ष नेताओं की स्थापित टोली के सत्ता के संचालन में व्यस्त हो जाने से पार्टी का कामकाज ऐसे लोगों के हाथों में आ गया है जो अब तक अपनी दक्षता, कुशलता व जनप्रियता साबित करने में असमर्थ रहे हैं। हालांकि इस कमी को पाटने के लिये मध्य प्रदेश से कैलाश विजयवर्गीय व संघ से राम माधव सरीखे संगठन के संचालन का लंबा अनुभव रखनेवाले नेताओं को राष्ट्रीय राजनीति में अवश्य लाया गया है लेकिन इतने भर से बात बनती हुई नहीं दिख रही है। आलम यह है कि सतही तौर पर समूचा संगठन सिर्फ शाह में ही समाहित होकर रह गया है जिसके नतीजे में इस दफा ना तो संघ को उनका कोई विकल्प मिला और ना ही बगावत की हद तक आक्रामक तेवरोंवाले मार्गदर्शकों के हिमायतियों की टोली किसी अन्य चेहरे को शाह के मुकाबले खड़ा करने में कामयाब हो पायी। लेकिन सूत्रों की मानें तो शाह के नाम पर स्वस्ति देने के क्रम में ही संघ ने यह बता दिया है कि संगठन का मौजूदा स्वरूप उसे कतई स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में शाह के नये सिपहसालारों की टोली में अब आमूलचूल परिवर्तन होना तय ही है। खास तौर से जनाधारवाले क्षत्रपों, महिलाओं व युवाओं को तरजीह देकर भविष्य के लिये पार्टी की नयी पीढ़ी के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। महिलाओं को संगठन में तरजीह देने के मामले में अभी तक पार्टी में महासचिव व उपाध्यक्ष के पद पर सिर्फ एक-एक महिलाओं को ही स्थान मिला हुआ है। जबकि बिहार में नितीश ने शराबबंदी करके और नौकरियों में 35 फीसदी आरक्षण देकर महिलाओं की गोलबंदी करने की पहल कर दी है। साथ ही उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु तक में महिला नेत्रियों के साथ ही पार्टी का सीधा चुनावी दंगल होनेवाला है और जम्मू कश्मीर में सहयोगी दल की महिला मुख्यमंत्री के साथ ही सत्ता की साझेदारी करनी है। इसके अलावा राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस सरीखे ऐसे दल के साथ आर-पार का मुकाबला करना है जिसकी बागडोर महिला के हाथ में ही है। ऐसे में संगठन में शीर्ष स्तर पर महिलाओं को तरजीह देने के अलावा वैसे भी पार्टी के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हालांकि बदलाव की इस तरह की आवश्यकताओं से आरएसएस भी वाकिफ है और संगठन के शीर्ष रणनीतिकार व शुभचिंतक भी। लेकिन जरूरत है उस खुशफहमी से उबरने की जिसके नशे ने ना सिर्फ दिल्ली व बिहार में पार्टी का बेड़ा गर्क कर दिया है बल्कि सरकार की छवि भी इस कदर बिगाड़ दी है कि महज बीस माह के भीतर ही जमीनी स्तर पर मोदी लहर से पनपा जनता के विश्वास व भरोसे का मानसून पूरी तरह नदारद हो गया है। लिहाजा अब सियासत के खेत में सत्ता का बगीचा उगाने के लिये पार्टी को खुद ही कुआं खोदकर भरोसे का पानी इकट्ठा करना होगा। वर्ना मानसूनी बारिश के भरोसे रहकर महज मेहनत का दिखावा, कागजी बुआई और जुबानी जुम्बिश की सिंचाई का नतीजा फिर उन्हीं काटों की पैदावार के तौर पर सामने आ सकता है जो ना सिर्फ बिहार और दिल्ली में नमूदार हो चुका है बल्कि आगामी दिनों में होनेवाले पांच राज्यों के चुनावों में जगजाहिर हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    @ नवकांत ठाकुर

शनिवार, 30 जनवरी 2016

‘उम्मीदों के संसार को बदलावों की दरकार’

‘उम्मीदों के संसार को बदलावों की दरकार’

लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने दम पर बहुमत मिला। ऐसी लहर चली भाजपा की, जिसमें सभी बह गये। कुछ का तो नामोनिशान ही बाकी नहीं बचा और कुछ बचे भी तो ऐसी लुंजपुंज हालत में कि लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल करने लायक सीटें भी नहीं पा सके। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव आज भी यह मानते हैं कि अगर उन्हें तनिक भी इस बात का एहसास होता कि उनके दल की ऐसी दुर्गति होगी तो वे हर्गिज लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ते। बिहार में नितीश ने शिकस्त से शर्मसार होकर सूबेदारी छोड़ दी। कांग्रेस के युवराज अज्ञातवास पर चले गये। राकांपा सुप्रीमो शरद पवार ने सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया। आलम यह रहा कि तकरीबन आधे दर्जन सूबों में तो किसी गैरभाजपाई दल का खाता भी नहीं खुला। जाहिर है कि अगर जनता ने ढ़ाई दशक के बाद किसी एक दल को पूरा बहुमत सौंपने का फैसला किया तो उसके पीछे असीमित आशाएं व अपरिमित अपेक्षाएं भी जुड़ी थीं। लोगों को यकीन था कि अगर कांग्रेस को जड़ से उखाड़कर भाजपा को सत्ता में लाया जाए तो तमाम समस्याएं छू-मंतर हो जाएंगी। दरअसल रामराज आने की उम्मीद और अच्छे दिनों की आस पर यूं ही विश्वास नहीं किया गया था बल्कि इसे भाजपा ने भी भरपूर हवा दी थी। नरेन्द्र मोदी के तौर पर छप्पन ईंच का सीना रखनेवाले स्वघोषित ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ को प्रधानसेवक के तौर पर प्रस्तुत किया गया। थोक के भाव में वायदे किये गये, कुछ कर दिखाने के इरादे जताए गये। 60 सालों की खाई को पाटने के लिये 60 महीने का मौका मांगा गया। अच्छे दिन लाने की आस बंधाई गयी। एक भारत श्रेष्ठ भारत के निर्माण का भरोसा दिया गया। यूं लग रहा था कि मोदी की ताजपोशी होते ही तुलसीदास की परिकल्पना का ऐसा रामराज आ जाएगा जिसमें ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज में काहु न व्यापा।’ खैर, अब जबकि मोदी सरकार के मौजूदा कार्यकाल का बीस महीना यानि एक-तिहाई वक्त बीत चुका है। ऐसे में पलटकर यह देखा जाना स्वाभाविक ही है कि मोदी को मसीहा मानने के नतीजे में क्या खोया और क्या पाया। इस खोने-पाने का हिसाब लगाने के क्रम में भले ही अच्छे दिन नहीं आ पाने की निराशा साफ झलक रही हो लेकिन अभी ऐसी स्थिति भी नहीं हुई है कि लोग सीताराम येचुरी से सहमत होकर यह कहने लगें कि ‘कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन।’ यानि उम्मीद की डोर कमजोर जरूर हुई है लेकिन टूटी नहीं है। डोर के कमजोर होने की निशानी दिल्ली में भी दिखी है और बिहार में भी। साथ ही विभिन्न सूबों में हुए स्थानीय निकायों के चुनाव में भी हासिल हुई सिलसिलेवार हार ने भाजपा को जमीनी हकीकतों के प्रति खबरदार ही किया है कि कुछ तो गड़बड़ है जिसे सुधारने की जरूरत है। वैसे भी जिस तरह गाड़ी चल रही है उसमें अभी से सर्वे बताने लगे हैं कि अगर अभी चुनाव हुए तो राजग को तीन दर्जन सीटों का नुकसान हो सकता है। यह हाल है बीस महीने के बाद, अगर स्थितियां ऐसी ही रहीं तो अगले 40 महीने के बाद की स्थिति क्या होगी वह तो राम ही जाने। खैर, हकीकत तो यही है कि कहने को 26 केबिनेट मंत्री, 13 स्वतंत्र प्रभारवाले राज्यमंत्री और 26 राज्यमंत्रियों की फौज प्रधानमंत्री मोदी का सत्ता के संचालन में सहयोग कर रही है। लेकिन कामकाज का अधिकांश बोझ मोदी के कांधों पर ही दिख रहा है। मामला विदेश का हो या घरेलू शांति-सुरक्षा का, महंगाई की मार हो या घटती पैदावार, मामला रेल-खेल-तेल या धर्मधकेल का ही क्यों ना हो। बोलबाला ‘हर हर मोदी घर घर मोदी’ का ही दिखता है। हालांकि इसकी असली वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन इस सच को भी तो झुठलाया नहीं जा सकता है कि जब विदेश के मामलों को खुद मोदी ही पूरी दिलचस्पी से निपटाने में यकीन रखते हैं तो सुषमा स्वराज सरीखी संगठन की सबसे अनुभवी व लोकप्रिय नेत्री को इस विभाग में जाया क्यों किया जा रहा है? जब वित्त विभाग की सिरदर्दी से ही अरूण जेटली को चैन नहीं मिल रहा तो सूचना-प्रसारण का अतिरिक्त बोझ उन पर क्यों डाला गया है जिसके नतीजे में इस विभाग से सरोकार रखनेवाले तमाम संबंधित पक्ष बुरी तरह त्रस्त हो रहे हैं। जब संसद में समन्वय बनाने के बजाय वेंकैया नायडू खुद ही आक्रमण का नेतृत्व करने की नीति अपना रहे हों तो यह पता करना लाजिमी तौर पर मुश्किल हो जाता है कि उन्हें संसद को चलाने के लिये संसदीय कार्यमंत्री बनाया गया है या विपक्ष को रोजाना नये गतिरोध का बहाना देने के लिये? जब किसानों की आत्महत्या का सिलसिला रोकने में नाकामी ही हाथ आ रही है तो नवगठित महत्वाकांक्षी कृषक कल्याण मंत्रालय को कृषिमंत्री राधामोहन सिंह के पास अतिरिक्त प्रभार के तौर पर पासंग बनाकर क्यों छोड़ा गया है? जब स्किल इंडिया का पूरा अभियान प्रधानमंत्री ही संचालित करते दिख रहे हैं तो राजीव प्रताप रूढ़ी को इसके लिये स्वतंत्र प्रभार देने की जरूरत ही क्या है? खैर, इस तरह के सवाल बहुत से हैं। लेकिन जवाब जहां से आना है वहां फिलहाल मौन की ही स्थिति है। हालांकि यह मौन अब अधिक लंबा नहीं खिंच सकता। वर्ना दो-तिहाई कार्यअवधि बीतने के बाद स्थितियां जितनी बिगड़ी हुई दिख रही हैं उसमें दिन दूनी और रात चैगुनी गति से इजाफा होना तय ही है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर

सोमवार, 25 जनवरी 2016

चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर कर देखो ना....

‘दिल को देखो, चेहरा ना देखो’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात तो यही है कि ‘चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर कर देखो ना, मौसम पल में बदल जाएगा, पत्थर दिल भी पिघल जाएगा, मेरी मोहब्बत में है ऐसा असर, देखो ना...।’ उनकी पार्टी भाजपा भी लोगों को यही आगाह कर रही है कि ‘दिल को देखो चेहरा ना देखो, चेहरे ने लाखों को लूटा, दिल सच्चा और चेहरा झूठा।’ लेकिन मसला है कि अव्वल तो दिल चीरकर दिखाना मुमकिन नहीं है और दूसरे दिल में उतरकर किसी की अंदरूनी मंशा का मुआयना करने की फुर्सत भी किसी के पास नहीं है। सबकी अपनी जिन्दगी है, परेशानियां हैं, दुश्वारियां हैं, सपने हैं, उलझने हैं। कौन जहमत उठाए चेहरे के रंग का दिल की तस्वीर से मिलान करने की। यहां तो जो दिखता है वही बिकता है। दिखने और बिकने का वह गणित ही तो है जिससे चवन्नी के चिप्स और अठन्नी के काले-पीले शीतलपेय को दस-बीस रूपये का बाजार भाव मिल जाता है। अब कोई लाख समझाये कि ‘ठंडा मतलब टाॅयलेट क्लीनर’ लेकिन किसे फुर्सत है समझने की। यहां तो चट पैसा और झट तरावट का फार्मूला ही चाहिये सबको। भले ही उसकी अंदरूनी असलियत कितनी भी नुकसानदेह क्यों ना हो। ऐसी ही तस्वीर सियासत में भी दिखती है। यहां भी सबको तुरंत के मामले का फौरन से पेश्तर ही नतीजा चाहिये। भले ही बाद में जो भी सच सामने आए। सच सामने आने तक तो शुरूआती तस्वीर के तहत ही पूरा तिया-पांचा हो चुका होता है। मसलन दिल्ली का चुनाव हुआ तो यहां के दो-चार गिरजाघरों में असामाजिक तत्वों द्वारा की गयी चोरी-चकारी व तोड़फोड़ की वारदातों को ऐसा रंग दिया गया मानो इसाई समुदाय की स्थिति इराक व सीरिया के यजीदियों सरीखी हो गयी हो। मामले की गूंज विदेशों तक सुनाई पड़ी। केन्द्र की सरकार गुहार ही लगाती रह गयी कि मामले की तहकीकात हो जाने के बाद ही कोई राय कायम की जाये। मगर सच सामने आने तक सब्र रखने की समझाइश बेअसर रही और तुरत-फुरत में सामने दिख रही तस्वीर के नतीजे में केन्द्र में स्थापित सत्ताधारियों के अरमानों पर एक नवजात सियासी दल का झाड़ू फिर गया। सूबे के सत्तर की सत्ता में महज तीन तिनके ही बचे, बाकी सबका सफाया हो गया। ऐसा ही मामला बिहार चुनाव के दौरान भी दिखा जब बीफ के विवाद में असहिष्णुता का तड़का लगाकर सम्मानवापसी का जोरदार अभियान चलाया गया जिसका नतीजा वही हुआ जो दिल्ली में पहले ही दिख चुका था। भले ही बाद में पता चला हो कि ना बीफ के विवाद में कोई दम था और ना ही इसाईयों पर कोई संकट है। लेकिन यह सच सामने आने तक तो पूरा सियासी खेल समाप्त हो चुका था। अब फिर से ऐसी ही तस्वीर बन रही है दलितों के उत्पीड़न और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर अतिक्रमण को लेकर। भले ही इसके पीछे का सच कुछ भी हो लेकिन मौजूदा तस्वीर के तहत उठ रहे सवालों ने सियासत में चटख रंग तो भर ही दिया है। शायद ही कोई इस हकीकत की तह में जाना चाहता हो कि आखिर रोहित वेमुला ने क्यों व किन हालातों में आत्महत्या की। सबकी ख्वाहिश है कि इस मामले को दलितों व गैरदलित बहुसंख्यकों के टकराव का रंग देकर आगामी दिनों में होने जा रहे पांच राज्यों के चुनावों में इसकी छटा बिखेरी जाये। वैसे भी मामले की जांच के लिये बने न्यायिक आयोग को अपनी रिपोर्ट देने के लिये तीन माह का वक्त दिया गया है। यानि जब तक अंदरूनी सच सामने आएगा तब तक सतही तस्वीर के तहत इसका सियासी दोहन हो चुका होगा। इसी प्रकार अलीगढ़ मुस्लिम विश्विविद्यालय को दारूल उलूम देवबंद सरीखी स्वायत्तता व स्वरूप दिलाने की लड़ाई के बीच भी यह सवाल सतह के नीचे दफन दिख रहा है कि आखिर देवबंद से एएमयू की तुलना कैसे की जा सकती है। बकौल एमजे अकबर, देवबंद ने आज तक सरकार से एक पैसा अनुदान नहीं लिया, वह समुदाय के सहयोग से शिक्षा का प्रसार व अपना विस्तार करता है। जबकि एएमयू अंग्रेजों के जमाने से ही सरकारी अनुदान पर आश्रित है। जाहिर है कि जनता की गाढ़ी कमाई से संचालित संस्थान को जब तमाम दबावों के बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार से लेकर लालबहादुर शाष्त्री व इंदिरा गांधी तक की सरकार ने संसद में अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने से साफ इनकार कर दिया था तब मौजूदा सरकार किस आधार पर इसकी स्थिति में बदलाव की मांग स्वीकार कर सकती है। लेकिन पहले जो हुआ वह कहां तक जायज था अथवा संवैधानिक नजरिये से क्या होना उचित है, इस पर अदालत द्वारा सामने लाये जानेवाले सच का सब्र से इंतजार करना शायद ही किसी को गवारा हो। अलबत्ता तस्वीर तो यही दिखायी जाएगी कि मौजूदा सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों का हक मारा जा रहा है। यानि तह में उतरकर अंदरूनी हकीकत को परखने की फुर्सत मतदाताओं को शायद ही मिल सके। लेकिन मसला यह है कि सियासी तुफान में आरोप-प्रत्यारोप की बौछार से अटे-पटे चेहरे को देखकर ही स्वस्ति देने व खारिज करने की जो परंपरा चल निकली है उससे सियासी दलों को तो जो फायदा-नुकसान होना है वह होता रहेगा, लेकिन सब्र के साथ सच को जानने-समझने की समझदारी दिखाने के बजाय आनन-फानन में जारी तमाशे के तहत संवेदना, भावुकता व पूर्वाग्रह के आधार पर मतदान करने का निर्णायक नुकसान तो देश व समाज को ही झेलना पड़ेगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर

सोमवार, 18 जनवरी 2016

‘इहां कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं, जे तरजनी देखि मरि जाहीं’

‘इहां कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं, जे तरजनी देखि मरि जाहीं’

लक्षमण ने तो त्रेतायुग में ही परशुराम के सामने यह घोषणा कर दी थी कि समूचे हिन्दुस्तान में कोई भी कुम्हड़े की उस बतिया सरीखा सुकुमार, कमजोर या डरपोक नहीं है जो तर्जनी उंगली के इशारे से घबरा कर ही अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दे। इसके बावजूद भी पता नहीं क्यों यहां एक दूसरे को धमकाने-डराने की परंपरा सी चली आ रही है। जिसे देखो वही दूसरे को धमकाता दिख रहा है। घरवाले भी एक दूसरे को डराने में लगे हुए हैं और बाहरवाले भी। यहां तक कि सरहद के उस पार से भी धमकाने का सिलसिला जारी है। कभी परवेज मुशर्रफ यह बताकर डराने की कोशिश करते हैं कि पाकिस्तान ने परमाणु बमों का जखीरा शबेबारात के लिये तैयार नहीं किया है तो कभी लश्करे तैयबा का मुखिया हाफिज सईद पाकिस्तान के मिसाइलों की रेंज बताकर धमकाने की कोशिश कर है। अब कोई तो पूछे इनसे कि आपके मुल्क की मिसाइल कहां तक जा सकती है या आपके मुल्क ने परमाणु हथियार किस लिये बनाये हैं, यह तो खुल के बताया जाये तभी पता लगेगा। वर्ना आप शबेबारात में इसका जुलूस निकालो या आतंकवादियों से इसकी हिफाजत करने के लिये अपना दिवाला निकालो इससे किसी को क्या मतलब। रहा सवाल हिन्दुस्तान का तो, इसे जब दुनिया की सबसे बड़ी खुराफाती सैन्य ताकतों में शुमार होनेवाला चीन नहीं डरा पा रहा, तो आपका मुल्क तो वैसे भी हालिया जारी विश्व के दस सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकतों की सूची में गिनने लायक भी नहीं माना गया है। खैर, कहने का तात्पर्य यह है कि वास्तविकता की पूरी जानकारी होने के बावजूद अगर पाकिस्तान की सामरिक औकात के बारे में बड़बोला बयान देकर भारत को डराने-धमकाने का प्रयास किया जा रहा है तो इसकी वजह को तो टटोलना ही पड़ेगा। यह देखना पड़ेगा कि आखिर भारत के साथ ऐसी भाषा में बात करने की हिमाकत क्यों की जा रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी बात करनेवाले यह समझ रहे हैं कि चुंकि हमारे यहां विरोधियों के साथ इसी भाषा में संवाद किया जाता है लिहाजा वे भी हमें उसी भाषा में अपनी बात संप्रेषित करने का प्रयास कर रहे हैं। अगर सरहद पार के लोग ऐसा समझ रहे हैं तो इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। बल्कि वे ऐसा ना समझें तो ही गलत होगा। क्योंकि जब हमारे मुल्क के हैदराबादी सियासी सूरमा यह कहते नजर आते हों कि महज आधे घंटे के लिये पुलिस हटा ली जाये तो देश के 24 करोड़ अल्पसंख्यक तमाम बहुसंख्यकों को सही पाठ पढ़ा देंगे तो पड़ोसी मुल्क के लोग आखिर क्या समझेंगे हमारी भाषा के बारे में? जहां समर्थकों को रामजादा और विरोधियों को हरामजादा बताया जाता हो, जहां एक को सबक सिखाने में कामयाब रहने के बाद दूसरे के ‘दंगल’ में मंगल करने का खुल्लमखुल्ला ऐलान किया जाता हो, जहां सांप्रदायिक नरसंहारों को ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ का नाम दिये जाने की परंपरा हो, जहां बड़ा पेड़ गिरने पर धरती कांपने और कार के नीचे आकर कुचल जानेवाले पिल्ले का उदाहरण देकर अपनी बात रखी जाती हो, जहां विरोधियों के लिये नपुंसक शब्द का इस्तेमाल करने से लेकर प्रधानमंत्री तक को सनकी व पागल बताने से परहेज नहीं बरता जाता हो, जहां सरकार गिराने व बनाने के लिये पड़ोसी मुल्क की खुफिया एजेंसी से सार्वजनिक तौर पर मदद मांगी जाती हो, जहां जननी-जन्मभूमि को डायन बताया जाता हो, जहां सांप्रदायिक आग में सियासी रोटी सेंकने की परंपरा बन गयी हो, और सबसे बड़ी बात यह कि जहां का निजाम ही इस तरह की हरकतें करता हो वहां के बारे में बाहरी लोगों की क्या धारणा बनेगी इसका आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। कहने को तो हमारे मुल्क में कानून इतना सख्त है कि किसी को पंद्रह मिनट तक लगातार घूरने के लिये भी दंड का प्रावधान है, लेकिन यह कितना लागू हो पाता है इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि उदाहरण के तौर पर याद दिलाये जा रहे उक्त कुछ बड़े बयानों पर भी किसी को कोई सजा नहीं सुनायी गयी है। सजा की बात या कानून लागू हो पाने हकीकतों से हटकर भी देखें तो यह जरूरी तो नहीं है कि केवल उतना ही कहने व करने से परहेज बरता जाये जितने के लिये संवैधानिक तौर पर सजा का प्रावधान हो। कुछ परिवार की और कुछ परिवेश की मर्यादा भी होती है और परंपरा भी। लेकिन जहां भाषा में मर्यादा और परंपरा का निम्नतम स्तर लगातार गोते लगाने का रिकार्ड कायम करता दिख रहा हो वहां के विरोधी भी तो वैसी ही भाषा में अपनी बात रखेंगे। वर्ना उनके नजरिये से शायद हम उनकी बात समझ ही ना सकें। अगर ऐसा नहीं होता को बुद्धिजीवियों का एक बड़ा अभिजात्य वर्ग ना तो हाफिज सईद के समकक्ष प्रवीण तोगडि़या को खड़ा करने की जुर्रत करता और ना ही परवेज मुशर्रफ का लहजा हैदराबाद के सियासी सूरमा के सुर से मेल खाता हुआ दिखाई देता। बहरहाल, दुश्मन की गोली का जवाब तो हमारी ओर से गोला दागकर दिया जा सकता है लेकिन उसे बोली में भी परास्त करने की जो प्रतिस्पर्धा घरेलू सियासी मैदान में चल रही है उसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है। तहजीब का तकाजा तो यह है कि ‘हम दुश्मन से भी तू-तड़ाक ना करें, सिर्फ उसे नजरों में गिरा दें।’ ना सिर्फ सबकी नजर में बल्कि उसे उसकी नजर में भी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   नवकांत ठाकुर

शनिवार, 16 जनवरी 2016

‘सत्ता की व्यस्तता में संवेदना की शून्यता’

‘सत्ता की व्यस्तता में संवेदना की शून्यता’

सत्ता की ऊंचाई और संवेदना की गहराई के बीच आकाश-पाताल का अंतर तो होता ही है। लेकिन अपेक्षा भी तो उससे ही की जाती है जो शिखर पर होता है। उम्मीद की जाती है कि वह सबकी सुनेगा, सबकी अपेक्षाएं पूरी करेगा। जो जितनी ऊंचाई पर होता है उससे अपेक्षाएं भी उतनी ही ज्यादा की जाती हैं। लेकिन सत्ता की भी अपनी व्यस्तता है। उससे सभी जुड़े होते हैं तो उसे भी सबका सोचना होता है। सबके लिये कुछ ना कुछ करना होता है। हमेशा इस उधेड़बुन में जुटे रहना होता है ताकि वे अपेक्षाएं पूरी की जा सकें जो उससे लोगों ने लगा रखी हैं। लेकिन इस रस्साकशी में सबसे दुखद होता है शिखर पर संवेदना की कमी का एहसास होना। इस बारे में अटल विहारी वाजपेयी ने ठीक ही लिखा है कि ‘ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है, जमती है सिर्फ बर्फ, जो कफन की तरह सफेद और, मौत की तरह ठंडी होती है, खेलती खिलखिलाती नदी, जिसका रूप धारण कर, अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।’ यानि दूसरे शब्दों में कहें तो सत्ता के शिखर पर सियासत के लिये आवश्यक प्राणवायु कही जानेवाली संवेदना का घोर अभाव होता है। सत्ता की इस संवेदनहीनता का खामियाजा अक्सर सियासत में भुगतना पड़ता है जिसका दूसरा नाम ही ‘एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर’ है। इतिहास गवाह है कि सत्ता और सियासत के बीच संवेदना के संतुलन की डोर जितनी कमजोर रही, उसका खामियाजा भी उतना ही बड़ा भुगतना पड़ा है। लेकिन पीढि़यां बदलने में भले ही देर नहीं लगती हो लेकिन परंपराओं को बदलना हमेशा से बेहद मुश्किल रहा है। एक बार कोई परंपरा स्थापित हो जाये तो पीढि़यों तक उसके अनुसरण का सिलसिला चलता रहता है। यही बात सत्ता के शिखर पर संवेदना की शून्यता से भी जुड़ी है। हालांकि सियासत के लिये तो संवेदना के हथियार का इस्तेमाल हमेशा किया जाता है लेकिन सत्ता के शिखर से संवेदना की धारा बड़ी मुश्किल से निकलती है। निकलती भी है तो अक्सर सियासत का संतुलन साधने की आवश्यकता को ही पूरा करने के लिये। अगर सियासी जरूरत ना हो तो संवेदना की बरसाती नदी अक्सर विलुप्त ही रहती है। मिसाल के तौर पर मौजूदा दौर की ही बात करें तो सत्ता की व्यस्तता ने संवेदनहीनता को इस स्तर पर ला दिया है कि जिस बनारस की धरती ने प्रधानमंत्री को संसद में पहुंचाया है वहीं से तीन दफा सांसद चुने जा चुके शंकर प्रसाद जायसवाल का निधन हुए दस दिन का वक्त गुजर चुका है लेकिन अब तक ना तो प्रधानमंत्री ने संवेदना व्यक्त करने की औपचारिकता निभायी है और ना ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर पार्टी के किसी भी बड़े नेता ने अपने इस साथी के शोक-संतप्त परिवार के लिये दिलासे के दो शब्द कहे हैं। जाहिर है कि जहां अपने पुराने साथियों के लिये ही संवेदना की सरिता सूख चुकी हो वहां इस बात की आस करना तो व्यर्थ ही है कि जम्मू-कश्मीर में जिसे अपने समर्थन से पार्टी ने मुख्यमंत्री बनाया था उसके इलाज के दौरान नहीं तो उसके निधन के बाद ही सही, अपनी संवेदना जताने के लिये पार्टी के अध्यक्ष या सरकार के शीर्ष संचालक जम्मू-कश्मीर जाने की जहमत उठाएंगे। उन्हें न जाना था और ना वे गये। बस भेज दिया नितिन गडकरी के तौर पर अपना एक प्रतिनिधि, सईद परिवार को सांत्वना देने के लिये। अब इन दोनों मामलों को संवेदहीनता की पराकाष्ठा ना कहें तो और क्या कहें। पठानकोट पर हुए आतंकी हमले के प्रति प्रधानमंत्री की चुप्पी को कूटनीतिक मानते हुए कुछ देर के लिये उसकी अनदेखी भी की जा सकती है लेकिन जायसवाल के निधन की अनदेखी को तो अनदेखा नहीं किया जा सकता है। जिस जायसवाल ने काशी की धरती पर तीन बार कमल खिलाया, कभी विवादों में नहीं घिरे, भाजपा को वैश्य वर्ग का मजबूत आधार दिया, और बदले में कभी कुछ नहीं चाहा, कुछ नहीं मांगा। उनके निधन पर भी संगठन व सरकार की संवेदना ना जगे। यहां तक कि बनारस का सांसद होने की हैसियत से भी अपने पूर्ववर्ती अग्रज के प्रति संवेदना का प्रकटीकरण ना हो तो इसे संवदेनहीनता की पराकाष्ठा ही तो कहा जाएगा। इसी प्रकार जिस मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ जुड़कर पहली दफा भाजपा ने कश्मीर में सत्ता का स्वाद चखा, जिन्होंने तमाम विरोधों व मतभेदों को दरकिनार कर, कांग्रेस के बिना शर्त समर्थन को ठुकराकर, अपनी सोच व विचारधारा से समझौता करते हुए भविष्य की चिंता किये बगैर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनायी, वे दिल्ली के एम्स में मृत्यु शैया पर पड़े हों और भाजपा अध्यक्ष या प्रधानमंत्री के पास उन्हें देखने की भी फुर्सत ना हो और उनकी मौत के बाद उनके शोक संतप्त परिवार को वे ढ़ाढ़स बंधाने भी ना जाये तो इसे संवेदनहीनता की पराकाष्ठा के अलावा और क्या नाम दिया जा सकता है। हालांकि इसे सत्ता की बेपरवाही भी कह सकते हैं और व्यस्तता या लाचारी भी। खैर, ना तो जासयसवाल के गुजरने से बनारस में फिलहाल भाजपा की सेहत पर कोई फर्क पड़नेवाला है और ना मुफ्ती के निधन से जम्मू-कश्मीर के सियासी समीकरण में कोई बदलाव आता दिख रहा है। लिहाजा क्या फर्क पड़ता है संवेदना जतायें या ना जतायें। लेकिन, फर्क तो पड़ता है। तत्काल ही सत्ता पर भले ही फर्क ना पड़े लेकिन सियासत पर संवेदनहीनता के मुजाहिरे का दूरगामी नकारात्मक असर पड़ता ही है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  ( @ नवकांत ठाकुर )

सोमवार, 11 जनवरी 2016

"वापसी की दिशा में पहलकदमी, यानि लौट के बुद्धू घर को आये"

‘पुरानी डगर पर आ रहा है लौट कर वापस मुसाफिर’

मशहूर शायर जांनिसार अख्तर साहब अपनी एक रूबाई में बताते हैं कि ‘वो शाम को घर लौट कर आएंगे तो फिर, चाहेंगे कि सब भूलकर उनमें खो जाऊं, जब उन्हें जागना है मैं भी जागूं, जब नींद उन्हें आए तो मैं भी सो जाऊं।’ कायदे से तो यह रूबाई किसी भी सामान्य गृहणी के मनोभाव को अभिव्यक्त करती हुई दिखाई पड़ती है लेकिन मौजूदा सियासी माहौल के मद्देनजर ये पंक्तियां उन मतदाताओं की मनोदशा को भी परिलक्षित करती हुई नजर आती हैं जिनका सहयोग व समर्थन हासिल करना भाजपा का लक्ष्य रहा है। हालांकि हर राजनीतिक पार्टी का लक्ष्य रहता है समाज के सभी तबके-फिरके का अधिकतम समर्थन हासिल करना। जिसके लिये कभी विचारधारा का आधार लिया जाता है तो कभी परंपरा का। लेकिन इस मामले में भाजपा शायद इकलौती ऐसी पार्टी है जो शुरूआत से ही यह तय नहीं कर पायी है कि आखिर उसे किस राह पर निर्णायक रूप से आगे बढ़ना है। कभी तो वह कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादिता का लबादा ओढ़े हुए दिखती है और कभी सामाजिक समरसता की बातें करके उन लोगों को रिझाने में मशगूल हो जाती है जो संघ परिवार की इस राजनीतिक शाखा पर कतई भरोसा नहीं कर सकते। जनसंघ से टूटकर अलग होने के बाद लंबे समय तक तो गैरकांग्रेसवाद की पतवार थामकर ही इसने अपनी सियासी नैया को दिशा दी और बाद में मंडल को थाम लिया। लेकिन कमंडल की कूटनीति के तहत जब संघियों की कोशिशों से मंदिर मसले का दावानल भड़का तब जाकर पार्टी को अपना अलग ईंधन नसीब हुआ और मंडल को कमंडल के नीचे दबाया जा सका। लेकिन राम के नाम पर अपना वजूद बड़ा करने और चैबीस दलों का ईंट-रोड़ा जोड़कर राजग के नाम से सत्ता का कुनबा खड़ा करने के बाद उसे एहसास हुआ कि केवल राम का नाम ही सत्ता पर एकाधिकार हासिल करने के लिये काफी नहीं है और अगर अपने दम पर बहुमत चाहिये तो समाज के उस तबके को भी अपने साथ जोड़ना होगा जिसे किसी भी कीमत पर भगवा रंग में रंगना गवारा नहीं है। तभी संघ के शीर्ष सैद्धांतिक मसलों को हाशिये पर डालने के साथ ही अटल हिमायत यात्रा भी निकाली गयी और बड़े पैमाने पर दाढ़ी-टोपीधारकों का सम्मेलन भी कराया गया। लेकिन ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम। 2004 में चैबे से छब्बे बनने के चक्कर में दुबे बनकर दुबकने के मजबूर होना पड़ा। हालांकि पार्टी के शीर्ष रणबांकुरों ने हार नहीं मानी और संघ की सलाहियतों को दरकिनार करते हुए धर्मनिरपेक्षता का प्रमाणपत्र हासिल करने के लिये जिन्ना की मजार तक दौड़ लगायी गयी। पर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात निकला। यानि 2009 का मौका भी हाथ से फिसल गया। अब बारी थी 2014 की। पुराने अनुभवों से इतना तो पता ही था कि ना तो अकेले कमंडल में सत्ता समा सकती है और ना ही मंडल में। साथ ही कट्टर धर्मनिरपेक्षतावादी मतदाताओं से समर्थन की आस लगाना भी बेकार ही था। लिहाजा निकाला गया ऐसा फार्मूला जिसके तहत मतदाताओं के सामने मोदी सरीखे कट्टर हिन्दूराष्ट्रवादी का चेहरा और उनकी जात-बिरादरी का घालमेल करके मंडल-कमंडल का मिश्रण पेश कर दिया गया। मोदी का चेहरा आगे था लिहाजा ना जय श्रीराम के नारे की अलग से जरूरत थी और ना ही किसी अन्य वैचारिक-सैद्धांतिक प्रतिबद्धता को दर्शाने की। रही-सही कसर विरोधियों के बिखराव और कांग्रेस के प्रति जारी जनाक्रोश ने पूरी कर दी। नतीजन समग्रता में महज 32 फीसदी वोट पाकर पार्टी ने अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल कर लिया जबकि 68 फसदी वोट पाकर भी बाकियों को बाबाजी का ठुल्लू ही मिला। लेकिन इस गड़बड़झाले के बाद की तस्वीर में जिन्होंने मोदी को हिन्दू राष्ट्रवाद का पर्याय मानकर मतदान किया था वे ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे से बिदक गये और जिन बिरादरीवालों ने मोदी में अपना मसीहा देखा उनकी आस रेल-तेल से लेकर दाल के सवाल में उलझकर दम तोड़ गयी। दलितों-पिछड़ों की तुलना कुत्ते से किये जाने और आरक्षण व्यवस्था में बदलाव का संकेत मिलने के बाद तो बिरादरीवालों की रही-सही आस भी समाप्त हो गयी। नतीजन दिल्ली में दर्द मिला और बिहार में तो बंटाधार ही हो गया। बहुसंख्यकवाद की सियासत का फार्मूला इस कदर फेल हुआ कि अगड़े-पिछड़ों ने एक साथ नकार दिया। ऐसे में अब नये सिरे से स्थापित फार्मूले को अमल में लाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है वर्ना परंपरागत मतदाताओं का भी मोहभंग होने की नौबत आयी तो अर्श से गिरने के बाद फर्श भी शायद ही नसीब हो। तभी तो जांची-परखी कमंडल की चिमनी को बयानों की फुंकनी से सुलगाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। साथ ही गंगा को भी सूबों के सहयोग से नहीं बल्कि अपने दम पर अविरल-निर्मल करने के अलावा गैया को कसाई से बचाने की जुगत भी भिड़ाई जा रही है। वैसे भी विकास और सुशासन के बंबू पर सत्ता का तंबू ताने रखने के प्रयोग की हवा तो मोदी द्वारा गोद लिये गये आदर्श गांव जयापुर में ही निकल गयी जहां अकल्पनीय विकास की धारा बहाने के बावजूद भाजपा को मतदाताओं ने ठेंगा दिखा दिया। यानि अब मजबूरी तो है पुरानी विचारधारा पर लौटने की, लेकिन अपेक्षा है कि कोई इसके लिये ताना भी ना मारे। कोई ये ना कहे कि लौट के बुद्धू घर को आये। तभी तो वापसी की दिशा में पहलकदमी तो हो रही है मगर बेहद फूंक-फूंककर, संभल-संभलकर। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

‘है अगर हसरते दीदार तो सब्र रख, उस बेवफा का नकाब खिसकेगा जरूर’

‘माहौल घिर गया है बेसब्र आंधियों से’

नवकांत ठाकुर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित बुलंदशहर के बनवारीपुर-घंघरावाली में पैदा हुए पिछली सदी के शायर पुरूषोत्तम प्रतीक कहते हैं कि ‘क्यों लाल हो रहा है ये आसमान देखो, धरती नहीं रहेगी यूं बेजुबान देखो, माहौल घिर गया है बेसब्र आंधियों से, बरबाद हो ना जाये अपना जहान देखो।’ वाकई इन दिनों देश का सियासी-सामाजिक माहौल बेहद ही बेसब्र दिख रहा है। अक्षय कुमार कह रहे हैं कि अब पाकिस्तान में घुसकर दुश्मनों को मारने का वक्त आ गया है। विपक्षी दल पूछ रहे हैं कि कहां गया वह छप्पन इंच का सीना और कहां गयी वह बातें जो उन्होंने मुंबई पर हुए हमले के बाद कही थीं। यानि पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के हिमायती सभी दिख रहे हैं। लेकिन शासन व्यवस्था खामोश है। खामोशी भी ऐसी कि हर बात पर प्रधानमंत्री की फौरी प्रतिक्रिया उगलनेवाला ट्विटर हैंडल भी पठानकोट के मसले पर मौन है। जाहिर है कि यह खामोशी बहुतों को बहुत खल रही है, और खले भी क्यों ना। आखिर जब पहले से पता चल चुका था कि आतंकी हमारी सरहद में दाखिल हो चुके हैं और उनके निशाने पर पठानकोट का एयरबेस है, इसके बाद भी उन्हें समय रहते रोकना-दबोचना तो दूर बल्कि तयशुदा मंजिल के चाक-चैबंद किले में दाखिल होने से रोक पाना भी संभव नहीं हो सका तो यह सब जानने के बाद किसे निराशा नहीं होगी। यह निराशा और बढ़ जाती है जब याद आता है कि आतंकियों से जारी मुठभेड़ के बारे में देश की आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेवारी संभालनेवाले गृहमंत्री भी इस कदर अंधेरे में थे कि उधर लड़ाई जारी थी और इधर वे आॅपरेशन समाप्ति का ऐलान कर रहे थे। प्रधानमंत्री कर्नाटक में व्यस्त थे और संचालन की कमान संभालनेवाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जुबान पर ताला था। हर तरफ बेचैनी थी, अफरातफरी थी और खामोश मुर्दानी थी। सामने आ रहे थे सिर्फ आतंकियों से लोहा ले रहे जवानों की शहादत के आंकड़े। उस पर तुर्रा यह कि बकौल गुहमंत्री, हम मुंहतोड़ जवाब देंगे। अब सवाल है कि तोड़ क्यों नहीं रहे मुंह, रोका किसने है, किस बात का इंतजार है? पूछा जा रहा है कि आखिर कब तक हम ही पीडि़त बने रहेंगे, कसमसाकर और छटपटाकर हर बार की तरह ना सिर्फ इस बार बल्कि भविष्य में भी विवश होकर बैठे रहना और पड़ोस से जारी परोक्ष युद्ध में एकतरफा तौर पर हर दर्द, जख्म और पीड़ा को सहन करते रहना ही हमारी नियति है क्या? पड़ोसी के टुकड़ों पर पलनेवाले रूबिया का अपहरण करें या जहाज को कंधार ले जाकर बंधक बनायें। हम तो सिर्फ समझौते की शर्तों के सामने झुकते ही आये हैं। हमला संसद पर हो, मुंबई में, पठानकोट में हो या कहीं और। हम हर बार सिर्फ जुबानी तैश-तेवर दिखा सकते हैं या बहुत हुआ तो पड़ोसी के साथ जारी शांति वार्ता को एकतरफा तौर पर बंद कर सकते हैं। इससे अधिक कभी कुछ हो पाने की मिसाल तो इतिहास में नदारद ही है। ऐसे में अब अगर इस दफा देश में आक्रोश है, गुस्सा है और कुछ कर गुजरने की चाहत है तो इसे कोई गलत कैसे कह सकता है। खैर, देश की इस भावना को गलत तो वह सरकार भी नहीं कह रही है जिससे उम्मीदें तो बहुत हैं लोगों को लेकिन अपेक्षाओं पर वह खरी नहीं उतर पा रही है। लेकिन इन तमाम निराशाओं के बीच कुछ बातें ऐसी भी हैं जिनसे उम्मीद जगती है पाकिस्तान के साथ अच्छे दिन आने की, संबंध सुधरने की, कुछ अच्छा होने की। मसलन इस दफा पहली बार पाकिस्तान ने यह स्वीकार किया है कि पठानकोट के हमलावर उसकी सरहद से ही घुसे थे। पहली बार उसने भारत में हुई आतंकी वारदात की तत्काल निंदा-भर्तस्ना की है। पहली बार उसने भरोसा दिलाया है कि जांच करके असली दोषियों को सजा दिलाने में वह हमारा सहायक बनेगा। पहली बार भारत में हुए आतंकी हमले के लिये अमेरिका सहित विश्व समुदाय ने पाकिस्तान पर उंगली उठायी है और उससे मामले को अंजाम तक पहुचाने की अपेक्षा प्रकट की है। साथ ही पहली बार कश्मीर और आतंकवाद को अलग करते हुए वह ऊफा में इस बात के लिये सहमत हुआ है कि आतंक पर अलग से पहले चर्चा होगी और कश्मीर सरीखे बाकी अन्य सभी मसलों पर अलग से सहमति व सहयोग की राह तलाशी जाएगी। यानि समग्रता में देखें तो मौजूदा सरकार ने पड़ोसी मुल्क के साथ इतना राब्ता तो कायम कर ही लिया है कि पठानकोट हमले के बाद भी दोनो तरफ के सियासी हुक्मरानों की परस्पर तल्ख बयानबाजी की परंपरा कुछ पीछे छूट गयी है और दोनों मिलजुल कर कुछ करते हुए दिखने के ख्वाहिशमंद नजर आ रहे हैं। यानि सही दिशा में एक शुरूआत होती हुई तो दिख रही है लेकिन निःसंदेह उलझन काफी जटिल है, पुरानी है। लिहाजा इसे सुलझाने का रास्ता भी लंबा और दुर्गम ही होगा जो हर कदम पर सख्त इम्तिहान भी लेगा लेकिन दोनों को अपने क्रोध, उन्माद और भावनाओं पर संयम रखना ही होगा। इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। बाकी विकल्प सिर्फ छलावा है, नजरों का धोखा है और दोनों के लिये आत्महंता डगर है जिस पर आगे बढ़ने का कोई मतलब ही नहीं है। यानि, पड़ोसी को सही राह पर लाने के लिये कोई भी कीमत चुकाने का खम ठोंकनेवालों को यही कहना मुनासिब होगा कि, ‘है अगर हसरते दीदार तो सब्र रख, उस बेवफा का नकाब खिसकेगा जरूर।’ ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’    

सोमवार, 4 जनवरी 2016

‘कछुए की मानिंद सिमट ना जाये फिर ये सिलसिला’

‘कछुए की मानिंद सिमट ना जाये फिर ये सिलसिला’

नवकांत ठाकुर
पठानकोट के एयर बेस पर हुए आतंकी हमले के बाद चारों तरफ आक्रोश है, उबाल है। हर किसी की जुबान पर बस यही सवाल है। अब क्या होगा इसके बाद? क्या दशकों से कछुआ चाल से चल रही दोस्ती व विश्वासबहाली की कोशिशों पर फिर विराम लग जाएगा। वार्ता का कछुआ फिर बंदूक की गर्जना से घबराकर खुद को अपने खोल में सिकोड़ लेगा, समेट लेगा। फिर इधर से यही सुर सुनाई देगा कि बोली और गोली को एक साथ स्वीकार नहीं किया जा सकता और जवाब में उधर से वही घिसी-पिटी आवाज आएगी कि सबकुछ इधर का ही किया-धरा है, उसे नाहक बदनाम करने के लिये। अब तक की परंपरा तो ऐसी ही रही है। बातचीत के माध्यम से सुलह-सफाई की गंभीर कोशिशें शुरू होते ही हर बार सीमापार से ऐसी वारदातों को अंजाम दे दिया जाता है जिससे पूरी प्रक्रिया खटाई में पड़ जाती है। मसलन वाजपेयी की लाहौर यात्रा के बाद हई कारगिल की लड़ाई ने वार्ता प्रक्रिया को सिरे से ध्वस्त कर दिया। उसके बाद कश्मीर मसले को निर्णायक मुकाम तक पहुंचाने की मनमोहन की कोशिशों पर मुंबई के हमले ने बट्टा लगा दिया। यहां तक कि मौजूदा मोदी सरकार द्वारा ऊफा में की गयी वार्ता प्रक्रिया बहाल करने की पहली कोशिश को कश्मीरी अलगाववादियों के प्रेम में पड़कर पड़ोसी मुल्क के सियासी हुक्मरानों ने ही पलीता लगा दिया। और हद तो यह है कि अब नवाज को जन्मदिन के तोहफे के तौर पर अपनी दोस्ती से नवाजने लाहौर जा पहुंचे मोदी को बदले में पठानकोट की घटना से पीठ पर वार सहने के लिये मजबूर होना पड़ा है। लिहाजा परंपरा व दस्तूर के मुताबिक एक बार फिर वार्ता की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना पैदा होना लाजिमी ही है। वह भी तब जबकि फिदायीन हमलावरों की टोली द्वारा हमले से ऐन पहले पाकिस्तानी आकाओं व रिश्तेदारों से की गयी बातचीत रिकार्ड की जा चुकी है और यह जानकारी भी सार्वजनिक हो गयी है कि पिछले महीने आईएसआई ने लश्करे तैयबा, जैशे मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन और बब्बर खालसा सरीखे आतंकी संगठनों के साथ मिल-बैठकर भारत में बड़े हमले को अंजाम देने की साजिश रची थी। यानि इस बात में तो शक की गुंजाइश भी नहीं है कि इस पूरी वारदात की पटकथा सरहद के उस पार से लिखी गयी और आत्मघाती हमलावरों का जत्था भी उधर से ही आया था। लिहाजा यह भी तय है कि पाकिस्तानी सेना, वहां के प्रशासन और आईएसआई ने भी इस वारदात को अंजाम देनेवालों की मदद अवश्य की होगी। लेकिन सवाल है कि जब यह पहले से पता था कि आतंकी संगठनों के साथ मिल-बैठकर आईएसआई किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक में है तो फिर बड़ा दिन के मौके पर नवाज से मिलने व उनके साथ निजी रिश्तों की शुरूआत के बहाने दोनों मुल्कों के बीच विश्वास बहाली की मजबूत पहलकदमी क्यों की गयी? क्या सोच कर की गयी? खैर, इसका जवाब ना तो मिला है और ना मिलने की उम्मीद है। लिहाजा जब जुबानी जवाब ना मिल रहा हो तो क्रिया की प्रतिक्रिया से कुछ जानने-समझने की कोशिश करना ही बेहतर होगा। और प्रतिक्रिया यह है कि जिस वक्त पठानकोट में आतंकी हमला होने की पुख्ता जानकारी मिलने के बाद एनएसजी को वहां भेजने की तैयारी चल रही थी, ऐन उसी वक्त दोनों मुल्कों के बीच परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची भी साझा हो रही थी और एक-दूसरे के मुल्कों में कैद मछुआरों व आम नागरिकों की लिस्ट का भी आदान-प्रदान हो रहा था। इसी प्रकार हमले की सूचना सार्वजनिक होने के बाद गृहमंत्री व प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री सहित विभिन्न केन्द्रीय मंत्री भी यही बता रहे थे कि जो ताकतें यह नहीं चाहती हैं कि दोनों मुल्कों के बीच अमन व दोस्ती कायम हो वे ही इस तरह की शरारतों के द्वारा वार्ता की गाड़ी को पटरी से उतारने का प्रयास कर रही हैं जिसका मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। यानि इन प्रतिक्रियाओं से इतना तो साफ है कि अब भारत की सरकार ने पाकिस्तान की सेना, उसकी आईएसआई और उसके आतंकी शुभचिंतकों की खुदमुख्तारी को भी समझ लिया है और वहां के सियासी हुक्मरानों की बेचारगी व लाचारगी को भी महसूस कर लिया है। लिहाजा सियासी हुक्मरानों के साथ बातचीत, दोस्ती व विश्वास बहाली की कोशिशों पर वहां की बाकी खुदमुख्तार ताकतों की साजिशों का साया पड़ने देना अब शायद ही गवारा किया जाए। यानि, उम्मीद तो यही है कि बातचीत अपनी जगह जारी रहेगी जबकि सेना को सेना से जवाब मिलेगा और आईएसआई की खुराफातों को हमारी खुफिया संस्थाएं व पुलिस प्रशासन के द्वारा नाकाम किया जाएगा। लेकिन पाकिस्तान के शुभचिंतक आतंकी संगठनों को कैसे मुंहतोड़ जवाब दिया जाए इसका खाका तैयार करना शायद अभी बाकी ही है। खैर, पाकिस्तानी सेना, आईएसआई और हमारी ओर के भी कुछ गद्दारों की पुश्तपनाही का लाभ उठाते हुए सरहद के उस पार से अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देनेवाले इन तत्वों को इनके अंजाम तक पहुंचाने का मार्ग तो तलाशना ही होगा लेकिन इस बहुआयामी कूटनीति के बीच अब असली परख होनी है दोनों मुल्कों के सियासी हुक्मरानों के बीच बने उस कथित निजी व मजबूत तालमेल की जिसके नतीजे में ही पहली बार पाकिस्तानी विदेश विभाग ने ना सिर्फ पठानकोट के वारदात की कड़े शब्दों में निंदा की है बल्कि आतंक के खिलाफ जारी लड़ाई में भरपूर मदद का भरोसा भी दिलाया है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

भले देर से आये लेकिन दुरूस्त आएगी, आपदा आयी है तो राहत भी आएगी

‘आफत की आमद और राहत का तोहफा’

नवकांत ठाकुर
आफत-आपदा जब भी आती है। जहां भी आती है। उसके साथ जुड़ी होती है राहत की खबर भी। या यूं कहें कि आपदा आयी है तो राहत भी आएगी ही। भले देर से आये लेकिन दुरूस्त आएगी। यह फार्मूला सिर्फ प्राकृतिक आपदा पर ही लागू नहीं होता, सियासी आफत में भी अक्सर ऐसा ही होता है। मसलन इन दिनों देश के जिन शीर्ष नेताओं पर सबसे जबर्दस्त सियासी आफत आयी हुई है उनमें हेराल्ड केस में फंसे गांधी परिवार से लेकर डीडीसीए घोटाले के आरोपों में उलझे अरूण जेटली भी शामिल हैं। साथ ही आपदाग्रस्त नेताओं की सूची में विधानसभा सीट की सौदेबाजी से लेकर राशन घोटाले सरीखे तमाम आरोपों की मार झेल रहे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी हैं और ‘गाली कप्तान को तो गाली भी कप्तान को’ सरीखी दलीलों के तहत दिल्ली के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में भी पार्टी की लुटिया डुबोने के लिये जिम्मेवार माने जा रहे अमित शाह भी। हालांकि इन नेताओं पर आयी सियासी आफत की खबरें तो लगातार सुर्खियों में बनी ही हुई हैं। लेकिन आफत के कारण उन्हें हासिल हो रही राहत के बारे में बहुत कम चर्चा हो रही है। बिल्कुल ना के बराबर। जबकि हकीकत तो यह है कि सियासी आफत के मुकाबले उन राहतों की अहमियत भी कतई कम नहीं है जो इस आफत के कारण ही इन नेताओं को मयस्सर हो रही हैं। मसलन हेराल्ड के मुकदमे में उलझने के बाद से सोनिया व राहुल को जितनी सिरदर्दियों का सामना करना पड़ रहा है वह जगजाहिर ही है। लेकिन इस परेशानी के कारण जमीनी स्तर पर उन्हें व उनकी पार्टी को कितना फायदा मिल रहा है इसकी झलक गुजरात व मध्यप्रदेश के बाद आज सामने आये छत्तीसगढ़ के स्थानीय निकायों के चुनावी नतीजों में भी देखा जा सकता है जहां तीसरे कार्यकाल के बाद अब भाजपा की चूलें हिलती हुई दिखने लगी हैं। तीनों ही सूबों में भाजपा का यह लगातार तीसरा कार्यकाल है। अपनी तरफ से उसने कांग्रेस मुक्त भारत अभियान की शुरूआत यहीं से की थी। लेकिन हालिया दिनों में हुए इन सूबों के स्थानीय निकाय के चुनावों में कांग्रेस ने जिस मजबूती के साथ अपना झंडा गाड़ा है और भाजपा का सफाया होने की शुरूआत हुई है उसमें हेराल्ड केस सरीखे उन मामलों की भूमिका को हर्गिज नकारा नहीं जा सकता है जिसके सामने आने के बाद से गांधी परिवार के प्रति सहानुभूति के बयार की धीमी मगर मजबूत शुरूआत का वातावरण बनने लगा है। ऐसी ही राहत की खबर वित्तमंत्री जेटली के लिये भी है जिनका नाम डीडीसीए के मामले में उछलने के कारण केन्द्रीय मंत्रिमंडल से उनको हटाये जाने की जोरदार मांग उठ रही है। सूत्र बताते हैं कि मकर संक्रांति के बाद केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की पूरी योजना तैयार हो गयी थी और इसमें जेटली से सूचना व प्रसारण मंत्रालय वापस ले लिये जाने की तैयारी थी जिस पर वे वित्त मंत्रालय की व्यस्तताओं के कारण कथित तौर पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। लेकिन डीडीसीए के मामले के तूल पकड़ने के बाद अब जेटली के कार्यभार के साथ छेड़छाड़ की संभावना भी समाप्त हो गयी है क्योंकि ऐसा करने से यही संदेश प्रसारित होगा कि डीडीसीए के आरोपों में फंसने के कारण ही उनके पर कतरे गये हैं। इसी प्रकार आफत के साथ राहत की खबर रमन सिंह के लिये भी आयी है जिनसे छत्तीसगढ़ की एकछत्र सूबेदारी छिनने की संभावना काफी प्रबल दिख रही थी और उन्हें संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में केन्द्र की राजनीति में लाने की योजना बनायी जा रही थी। लेकिन अचानक ही विधानसभा सीट फिक्सिंग के विवाद में उनके दामाद की कथित भूमिका के कारण सीधे तौर पर उनका नाम जुड़ने और चुनाव आयोग द्वारा पूरे मामले की जांच शुरू कर दिये जाने के बाद अब उनके कार्यभार में भी बदलाव की संभावनाएं सिरे से समाप्त हो गयी हैं। खैर, आफत के साथ सबसे बड़ी राहत भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को ही मिलती दिख रही है जिन्हें बिहार की हार का जिम्मेवार मानते हुए संघ व संगठन के भीतर यह बहस जोर पकड़ने लगी थी कि क्यों ना राष्ट्रीय राजनीति से उनकी छुट्टी कर दी जाये और गुजरात की राजनीति में वापस भेज दिया जाये। अगर ऐसा होता तो शाह के लिये इससे अधिक दुर्भाग्य की बात कुछ और नहीं हो सकती थी क्योंकि इतिहास में औपचारिक तौर पर भाजपा अध्यक्ष के रूप में उनका नाम भी नहीं जुड़ पाता। अभी तो वे राजनाथ सिंह के बचे हुए कार्यकाल को ही पूरा कर रहे हैं, उनका अपना औपचारिक स्वतंत्र कार्यकाल तो शुरू भी नहीं हुआ है। लेकिन भला हो आगामी दिनों में होने जा रहे उन पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का जिसमें पार्टी के लिये हार का वरण करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं हैं। हार के इस सिलसिले को सामने देखकर वे लोग कतई अध्यक्ष पद की जिम्मेवारी उठाने का हौसला नहीं दिखा रहे हैं जिनको संघ व संगठन से लेकर सरकार तक का विश्वास हासिल है। लिहाजा सिलसिलेवार पराजय की आफत ने शाह के लिये अध्यक्ष पद पर बरकरार रहने की राहत मुहैया करा दी है। खैर, आफत के कारण मिलनेवाली इन राहत की खबरों के बीच इस तथ्य की अनदेखी हर्गिज नहीं की जानी चाहिये कि ऐसी राहतें तात्कालिक ही होती हैं और आफत टलते ही राहत का सिलसिला समाप्त होने का जोखिम हमेशा बना रहता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

‘पड़ोसी के साथ रिश्ते में पर्देदारी पर हंगामा’

‘पड़ोसी के साथ रिश्ते में पर्देदारी पर हंगामा’

नवकांत ठाकुर
प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान की सरजमीं पर कदम क्या रखा, हंगामे की पोटली खुल गयी। हर तरफ हंगामा, हर तरफ गुस्सा। आक्रोश इधर भी है और उधर भी। अलबत्ता उधर तो हाफिज सईद सरीखे अमन के दुश्मन हंगामा मचा रहे हैं जबकि इधर बवाल काटनेवाले वे हैं जिनके शख्सियत की पाकीजगी पर कतई सुबहा नहीं किया जा सकता है। चाहे कांग्रेस हो या शिवसेना, यशवंत सिन्हा हों या केसी त्यागी। या फिर दिल्ली में सत्तारूढ़ एएपी ही क्यों ना हो। हर कोई प्रधानमंत्री के पाकिस्तान दौरे से बौखलाहट में है। इनके शब्द भले ही अलग हों लेकिन भाव यही है कि नरेन्द्र मोदी क्यों गये पाकिस्तान? जरूरत क्या थी वहां जाने की। दोनों मुल्कों के रिश्तों में ऐसी कौन सी तब्दीली आ गयी है जिससे बात इस हद तक पहुंच गयी कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधायी देने और उनकी नातिन की शादी से पहले मेंहदी के रस्म में शरीक होकर उसे शुभकामनाएं देने के लिये देशहित को हाशिये के हवाले करते हुए देश व विपक्ष को विश्वास में लिये बिना ही मोदी अचानक काबुल से लौटते हुए पाकिस्तान में उतर गये। मोदी के इस दौरे का विरोध करनेवालों को मलाल इस बात का है कि आखिर निजी रिश्ता निभाने के लिये पाकिस्तान की करतूतों को क्यों भुला दिया गया। मोदी कैसे भूल गये पंजाब की आग को, आतंक के झाग को, खून भरे फाग को, संसद हमले के दाग को, मुंबई के दुर्भाग्य को और गुलाम कश्मीर के भाग को। हेमराज के परिजनों की आस को, देश के विश्वास को, हजारों बेगुनाह मकतूलों के संत्रास को और पाक की नापाकियत के एहसास को भुलाकर अचानक मोदी का पाकिस्तान पहुंच जाना इस तरफ बहुतों को अखर रहा है। जाहिर है कि मोदी की इस यात्रा का विरोध इसलिये तो कतई नहीं किया जा रहा है क्योंकि उनकी राष्ट्रभक्ति पर किसी को कोई संदेह है। बल्कि किसी को आशंका यह भी नहीं है कि देशहित को अलग करके दोस्ती के लिये वे कोई ऐसा समझौता कर गुजरेंगे जिससे देश को जरा भी ठगे जाने का एहसास हो। लेकिन सवाल है पाकिस्तान की नापाक नीयत का और उसकी विश्वासघाती नीतियों का जिसके जाल में इससे पहले के हमारे कई प्रधानमंत्री फंस चुके हैं और देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। वाजपेयी बस लेकर लाहौर गये लेकिन वापसी में झेलना पड़ा कारगिल का युद्ध। मनमोहन सिंह ने सुलह की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहा तो शर्मअल शेख के समझौते में बलूचिस्तान में धधक रही अलगाववाद की आग का गुनहगार बताने की कोशिश हुई भारत को। जब मनमोहन कश्मीर मसला हल करने के करीब पहुंचे तो मुंबई पर ऐसा भीषण हमला कर दिया जिसकी चिंगारी ने गुफ्तगू के सहारे सुलह की गफलत को भस्म कर दिया। खैर, इस हकीकत को तो कतई भुलाया नहीं जा सकता है कि जितने जख्म हमें पाकिस्तान ने दिये हैं उतना किसी ने नहीं दिया। बल्कि यूं कहें तो ज्यादा सही होगा कि हमारे तमाम जख्मों, बाहरी परेशानियों, समस्याओं व सिरदर्दियों का गुनहगार इकलौता पाकिस्तान ही है। दूसरी ओर पाक की नापाकियत का सबब ना सिर्फ कश्मीर है बल्कि बांग्लादेश भी है जिसे विश्व मानचित्र पर खुदमुख्तार वजूद देने के लिये पाकिस्तान को तोड़ दिया गया। साथ ही बलूचिस्तान की आग के लिये भी वह हमें ही जिम्मेवार समझता है। यहां तक कि एक विफल राष्ट्र होने के लिये भी उसकी नजर में हम ही गुनहगार हैं और हमारे कारण ही उसे चीन और अमेरिका से लेकर विभिन्न इस्लामिक मुल्कों की खैरात का मोहताज बनना पड़ा है। यानि जख्मों से कलेजा छलनी इधर भी है और उधर भी है। उस पर तुर्रा यह कि हमारी मौजूदा सरकार ने एक ओर उसकी आतंकपरस्ती को दुनिया में बेनकाब कर दिया है जिससे वैश्विक मदद की इमदाद आधे से भी कम रह गयी है और दूसरी ओर सरहद पर उसकी फौज जम्हाई भी ले तो उसके मंुह में बारूद भर दिया जा रहा है। यहां तक कि हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने उसके लिये इतनी सिरदर्दी का सामना इकट्ठा करवा दिया है कि उसकी खुराफाती आईएसआई को अपने मसले सुलझाने से ही फुर्सत नहीं मिल रही। साथ ही कश्मीरी अलगाववादियों को औकात में रहने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है। बातचीत का दरवाजा हमारी मर्जी से खुल भी रहा है और बंद भी हो रहा है। उसकी कोई शर्त स्वीकार नहीं की जा रही और आर्थिक गतिविधियां भी ऐसी हैं जिसमें भारत के हित को ही तरजीह दी जा रही है। यानि उसकी चैतरफा घेराबंदी का काम तो पूरा हो चुका है जिसमें फंसकर वह कसमसा भी रहा है और छटपटा भी रहा है। लेकिन कोई रास्ता तो खोलना ही पड़ेगा जिससे दोस्ती के लिये आवश्यक विश्वास बहाली कायम हो सके। वह रास्ता भी सियासी ही हो सकता है। उसकी सेना, आतंकी शुभचिंतकों या आईएसआई से तो बातचीत के हिमायती हम हो ही नहीं सकते। लिहाजा क्या बुरा है कि दोनों मुल्कों के शीर्ष नेता परस्पर दोस्ती का रिश्ता कायम करें और उनके रिश्ते इस हद तक सहज हों कि मेलजोल में सरहद की दीवार आड़े ना आये। वैसे भी ढि़ढ़ोरा पीटकर औपचारिक बातचीत की कोशिशों के अंजाम का इतिहास तो सर्वविदित ही है। क्यों ना टेढ़ी उंगली के बजाय एक बार सीधी उंगली से भी घी निकालने की कोशिश करें। वह भी खामोशी से, चुपके-चुपके। ताकि इन कोशिशों को किसी की नजर ना लगे। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

‘जाके प्रभु दारूण दुख देहीं, वाकी मति पहिले हर लेहीं’

‘मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना’

नवकांत ठाकुर
कहते हैं कि ‘जाके प्रभु दारूण दुख देहीं, वाकी मति पहिले हर लेहीं।’ तभी तो बुरा वक्त आने पर खुद से ही ऐसी गलतियां होनी शुरू हो जाती हैं जिसका परिणाम बेहद ही नकारात्मक निकलता है। मिसाल के तौर पर इन दिनों अपनों से लेकर परायों तक के निशाने पर आये दिख रहे अरूण जेटली सरीखे मौजूदा दौर के चाणक्य कहे जानेवाले नेता ने भी विपरीत व असहज स्थिति में उलझने के बाद एक के बाद लगातार इतनी गलतियां कर दी हैं कि इसे अपने पैर पर खुद कुल्हारी मारना ही माना जाएगा। बीते कई सालों से जिन आरोपों के पुलिंदे को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हुए कीर्ति आजाद द्वारा लगातार किये जा रहे हमलों से जेटली का बाल भी बांका नहीं हो रहा था उन्ही आरोपों की चंद चिंदियां अरविंद केजरीवाल के दल एएपी द्वारा सार्वजनिक तौर पर उड़ाये जाने के बाद से ही परिस्थितियों ने ऐसी पलटी मारी है कि अब सियासी हलकों में उनकी इमानदारी व शुचिता पर गंभीर सवालिया निशान लगने शुरू हो गये हैं। कोई उनके खिलाफ लगाये जा रहे आरोपों की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराये जाने की मांग कर रहा है तो कोई उन्हें निर्दोष साबित होने तक अपने पद का परित्याग करने की सलाह दे रहा है। एएपी ने दिल्ली की सत्ता का इस्तेमाल करते हुए आरोपों की जांच के लिये आयोग गठित कर दिया है वहीं दूसरी ओर बकौल प्रधानमंत्री, कांग्रेस ने इस मसले को तूल देकर सरकार की छवि पर भ्रष्टाचार की कालिख चस्पां करने का अभियान छेड़ दिया है। इसमें संगठन व सरकार ने औपचारिक तौर पर जेटली के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करने में कोई कोताही नहीं बरती है और संसद के शीतसत्र का अवसान होने के फौरन बाद ही कीर्ति को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिये संगठन से निलंबित करते हुए उन्हें चैदह दिनों के भीतर इस बात का जवाब देने के लिये कहा गया है कि क्यों ना उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया जाये। यानि संगठन ने कीर्ति पर सख्ती की तलवार चला दी है और जेटली ने भी खुद पर भ्रष्टाचार की कालिख उछालनेवालों पर दस करोड़ रूपये की मानहानि का दावा अदालत में दायर कर दिया है। जाहिर है कि इन तथ्यों के नजरिये से देखा जाये तो ना सिर्फ सरकार से लेकर संगठन तक ने जेटली के पक्ष में मजबूत किलेबंदी कर दी है बल्कि विरोधियों को अदालत में घसीटकर जेटली ने अपनी नैतिक व व्यावहारिक शुचिता प्रमाणित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन मसला यह है कि सियासत सिर्फ तथ्यों पर निर्भर नहीं होती। इसमें छवि का बड़ा महत्व होता है। मोदी सरीखे नेता अपने पूरे चुनावी अभियान में एक बार भी जयश्रीराम का नारा नहीं लगाने के बावजूद हिन्दू हृदय सम्राट माने जाते हैं जबकि राम मंदिर आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभानेवाले लालकृष्ण आडवाणी को 2009 के लोकसभा चुनाव में बहुसंख्यकों ने सिरे से नकार देना ही बेहतर समझा। मौजूदा मामले में भी जब तक जेटली ने खुद पर लग रहे आरोपों को गंभीरता से नहीं लिया तब तक कीर्ति के आरोप भी बासी लग रहे थे और ‘मारो और भागो’ की सियासत करनेवाले केजरीवाल को भी इस मामले में अधिक गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। लेकिन जैसे ही जेटली ने जुलूस के साथ जाकर आरोप लगानेवालों पर अदालत में मानहानि का दावा किया वैसे ही यह पूरा मामला समूचे देश में चर्चा का विषय बन गया। यहां तक कि भाजपा संगठन के भीतर भी इस मामले के उछलने से कईयों का दिल बाग-बाग हो गया। तभी तो जब संसद में जेटली के खिलाफ औपचारिक तौर पर अपनी बात रखने के लिये कीर्ति ने शून्यकाल में अपने दिल की बात कहने के हक का इस्तेमाल किया तो उस दौरान पार्टी के किसी सांसद ने दिखावे के लिये भी उनको रोकना या टोकना जरूरी नहीं समझा। अब आलम यह है कि जेटली की नैतिकता, शुचिता व इमानदारी पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। कोई भी यह मानने के लिये तैयार नहीं है कि उनके डीडीसीए का अध्यक्ष रहते हुए 140 करोड़ की लागत से तैयार हुए विश्वस्तरीय फिरोजशाह कोटला स्टेडियम के निर्माण में कोई घपला-घोटाला नहीं हुआ है। यानि तथ्यों के आधार पर जेटली भले ही खुद को मजबूत मान रहे हों लेकिन उनकी छवि पर तो बट्टा लगा ही है। अब बाकी मुद्दे गौण हैं और जेटली की शुचिता पर राष्ट्रीय बहस जारी है। पार्टी में भी अब यह बहस तो शुरू होगी ही कि क्या किसी नेता पर सिर्फ इसलिये उंगली नहीं उठायी जा सकती क्योंकि वह अपने दल का है? राष्ट्रहित को तरजीह देते हुए उसके खिलाफ उपलब्ध भ्रष्टाचार से जुड़े तथ्यों को सार्वजनिक करने पर अगर पार्टी से निलंबन व निष्कासन का सामना करना पड़े तो ‘राष्ट्र प्रथम, संगठन दोयम और स्वयं निम्नतम’ के नारे का दिखावा क्यों? यानि इस मामले में जितने भी कदम उठाये गये उनका असर अब यह हुआ है कि अव्वल तो भ्रष्टाचार में जेटली की संलिप्तता का मसला हर खासोआम की जुबान पर चढ़ गया है और दूसरे संगठन में वैचारिक व सैद्धांतिक स्तर पर नयी बहस व टकराव की स्थिति पैदा हो गयी है। दूसरे शब्दों में कहें तो कीर्ति को संगठन से भले ही निकाल दिया जाये लेकिन संगठन व सरकार की छवि पर लगा दाग अब लगातार पुख्ता ही होता जाएगा और जेटली के लिये स्थितियां दिनोंदिन असहज ही होती चली जाएंगी। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

‘आशियाने में आग लग रही घर के चिराग से’



‘आशियाने में आग लग रही घर के चिराग से’

जिन चिरागों पर दारोमदार हो घर में उजाले का वे ही अगर आशियाना खाक करने पर आमादा हो जाएं तो बाकी घरवालों को कितनी परेशानियों, समस्याओं व जगहंसाइ का सामना करना पड़ सकता है यह शायद ही किसी को अलग से समझाने की जरूरत पड़े। खास तौर से सियासत में चिराग ही अगर आशियाने में आग लगाने का जुगाड़ ढूंढ़ने लगे फिर तो कहना ही क्या। हालांकि आशियाने को खाक करके अपने वजूद और वकार में नयी बुलंदी लाने की रणनीति के तहत अगर चिराग ने बागी तेवर अपनाया हो फिर तो एक बार के लिये उसके प्रति सहानुभूति भी जतायी जा सकती है या फिर उसके नजरिये से भी पूरे माजरे को समझने का प्रयास किया सकता है। लेकिन बिना किसी फायदे के बेवजह चिराग भड़क उठे और आशियाने को लीलने के लिये तत्पर हो जाये तो ऐसे चिरागों को क्या कहा जाये। इसमें एक तथ्य यह भी है कि चिरागों की ज्वलनशीलता तो सबको झेलनी पड़ती है लेकिन आशियाना वही खाक होता है जिसमें आग के भड़कने का सामान भी हो। मिसाल के तौर पर बिहार में अपने ही खेमे को खाक करने पर आमादा चिरागों की कमी ना राजग में थी और ना ही महागठबंधन में। लेकिन महागठबंधन के बागी चिराग अपनी आग में खुद ही स्वाहा हो गये जिसने आशियाने की रौनक में इजाफा ही किया जबकि राजग के खुराफाती चिरागों को अपने पक्ष के अरमानों को जला डालने में जो कामयाबी मिली उसमें आशियाने की अंदरूनी कमियों, खामियों व गलतियों ने बारूद का काम किया। नतीजन अपनी रौशनी में खुद भी पूरी तरह नहा पाने की क्षमता नहीं रखनेवाले चिरागों ने खेमे में मौजूद बारूद का इस्तेमाल करके सूबे में राजग के तमाम अरमानों को सिरे से खाक कर दिया। कहने का तात्पर्य यह कि कोई भी चिराग तब तक आशियाने को खाक करने में कामयाब नहीं हो सकता जब तक घर में रखे किसी ज्वलनशील सामान के साथ उसका तालमेल ना हो। तभी तो भाजपा के चिरागों ने अपने ही आशियाने को खाक करने के लिये दिल्ली में सत्तारूढ़ एएपी को जो चिंगारी मुहैया करायी है उससे संगठन की सेहत पर कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। अलबत्ता चिराग की नीयत अवश्य बेनकाब हो गयी है जिसकी सफाई देने के लिये उसे संगठन की ओर से समन भेज दिया गया है। दरअसल वाकया है पार्टी के चाणक्य कहे जानेवाले केन्द्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली से जुड़ा हुआ। उनकी निजी हैसियत और रसूख से तो पार्टी के कई चिराग हमेशा से जलते रहे हैं लेकिन उनके खिलाफ कोई ठोस मुद्दा तलाशने में अब तक किसी को कामयाबी नहीं मिल पायी है। लेकिन कहते हैं कि जैसे भूखे को चांद में भी रोटी ही नजर आती है और प्यासे को रेत के सेहरा में भी समुंदर का भरम हो जाता है वैसे ही उनके खिलाफ शिद्दत से कोई ठोस मामला तलाशनेवालों की डीडीसीए के अध्यक्ष के तौर पर वर्ष 1999 से 2013 तक उनके द्वारा निभायी गयी जिम्मेवारियों पर नजर पड़ी तो इसी दौरान उनकी अगुवाई में 141 करोड़ की भारी भरकम लागत से निर्मित फिरोजशाह कोटला स्टेडियम में इन बागियों को फर्जीवाड़ा नजर आने लगा। वे यह मान बैठे कि अगर इमानदारी की हिस्सेदारी के हिसाब से उसमें दस फीसदी रकम भी इधर-उधर हुई होगी तो 14-15 करोड़ के घपले-घोटाले का बोझ तो जेटली के कांधे पर आ ही जाएगा। सूत्र बताते हैं कि इसी खुराफाती सोच के साथ इन बागी चिरागों ने कांग्रेसनीत संप्रग के दूसरे कार्यकाल में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को यह बताकर जेटली के खिलाफ भड़का दिया कि उनके दामाद राॅबर्ट वाड्रा के खिलाफ हो रहे हमलों का संचालन जेटली ही कर रहे हैं। जाहिर है कि ऐसी बात जानने के बाद सोनिया का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और बागियों की पौ-बारह हो गयी। सरकार ने डीडीसीए के अध्यक्ष के तौर पर जेटली के पूरे कार्यकाल की जांच का जिम्मा ‘सीरियस फ्राॅड इन्वेस्टिगेशन आॅफिस’ यानि एसएफआईओ को दे दिया। उसने पूरी जांच-पड़ताल के बाद ना सिर्फ जेटली को क्लीन चिट दे दी बल्कि उनके कार्यकाल के दौरान डीडीसीए में कुछ भी घपला-घोटाला होने से उसने साफ इनकार कर दिया। खैर, इस जांच रिपोर्ट के बाद कांग्रेस ने तो इस मामले में गलत जानकारी देनेवाले बागियों से किनारा कर लिया लेकिन अब इन्हें अरविंद केजरीवाल के तौर पर नया विस्फोटक मिल गया जिसने भाजपा से निजी दुश्मनी पाल ली है। बागियों ने कानूनी तौर पर पिट चुके इसी मसले की फाइलें केजरीवाल को दे दी जिसे एएपी ने हाथों-हाथ लपकते हुए जेटली की छवि खराब करने की जंग छेड़ दी। एएपी को उम्मीद तो यही थी कि भाजपा से बुरी तरह चिढ़ी बैठी कांग्रेस सरीखी पार्टियां इस जंग में उसका सहयोग अवश्य करेंगी लेकिन पूरे मामले की हकीकतों से पहले ही अवगत हो चुकी कांग्रेस ने इसे संसद में उठाना भी जरूरी नहीं समझा। लिहाजा एक बार फिर बागी चिरागों के अरमान धरे रह जाने की उम्मीद ही प्रबल दिख रही है। खैर, सियासत में प्रतिद्वन्द्विता को तो गलत नहीं कहा जा सकता है लेकिन इस टकराव में आशियाना ही ध्वस्त करने पर आमादा हो जानेवालों को इतना तो याद रखना ही चाहिये कि जिस चारदीवारी ने बाहरी तूफानों से महफूज रखकर उनके अस्तित्व को आकार, आधार और विस्तार दिया है, उसके झरोखे का एक पर्दा भी जल जाने की सूरत में इनके अपने वजूद का क्या होगा? ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    @नवकांत ठाकुर

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

‘बेसबब तो नहीं हैं मजहबी मजदूरों की अंगड़ाइयां’

‘बेसबब तो नहीं हैं मजहबी मजदूरों की अंगड़ाइयां’

नवकांत ठाकुर
मुनव्वर राणा साहब का कहना है कि ‘हां इजाजत है अगर कोई कहानी और है, इन कटोरों में अभी थोड़ा सा पानी और है, मजहबी मजदूर सब बैठे हैं इन्हें कुछ काम दो, इक इमारत शहर में काफी पुरानी और है।’ वाकई मजहबी मजदूरों की फौज इन दिनों खाली बैठी हुई ही नजर आ रही है। हालांकि इसका यह कतई मतलब नहीं है कि अब कोई पुरानी इमारत बची ही नहीं है या इन मजदूरों का हौसला पस्त हो गया है। ना तो इमारतें खत्म हुई हैं और ना ही मजहबी मजदूरों की नीति या नीयत में कोई अंतर आया है। अलबत्ता सन्92 के मजदूरों का जोश, जीवट और जुनून तो आज भी बदस्तूर बरकरार है। ये तो आज भी इस इंतजार में हैं कि दुबारा इन्हें कुछ काम मिले। लेकिन मसला यह है कि अब वे ना तो बंधुआ मजदूरी करना चाहते हैं और ना ही मनरेगा की माफिक न्यूनतम मजदूरी लेकर अपने उस काम को अंजाम देने के लिये तैयार हैं जिसमें वे सिद्धहस्त हैं, प्रवीण हैं, कुशल हैं। बल्कि अब उनकी महत्वाकांक्षा अधिकतम मजदूरी का पक्का वायदा लेने के बाद ही उस काम को हाथ में लेने की है जिससे इनकी नजर में ठेकेदार को असीमित मुनाफा होना पूरी तरह तय है। दरअसल इनके पिछले काम का परिणाम भले ही आशा से अधिक फलदायक रहा हो लेकिन इसका पूरा प्रतिफल उन्हें नहीं मिला जिन्होंने मैदान में उतर कर मजदूरी की। अपना खून पसीना बहाकर पुरानी इमारत को जमींदोज किया। बल्कि इसका फायदा तो वास्तव में उन ठेकेदारों के हिस्से में ही आया जिन्होंने सियासी निशाना साधने के लिये मजदूरों के कांधे का इस्तेमाल किया। मजदूर तो मुगालते में ही रह गये जबकि मलाई के कटोरे पर ठेकेदारों का कब्जा हो गया। हालांकि कुछ मजदूरों को सांत्वना पुरस्कार के तौर पर कुछ पारितोषिक अवश्य मिला लेकिन वह भी कुछ गिने-चुने अकुशल, अर्धकुशल व सहायक मजदूरों के हिस्से में ही आया। असली कारीगरों को तो ‘बाबाजी का ठुल्लु’ ही मिला। खैर, उस दौर के अधिकांश अगली पांत के कारीगर या तो परलोक सिधार चुके हैं या फिर सिधारने की कतार में खड़े हैं। जबकि ठेकेदारों की तीसरी पीढ़ी भी अब तक उनकी कारीगरी के एवज में हासिल मलाई को जमकर मथ रही है और मूल से अधिक हो चुके ब्याज के दम पर मौज मार रही है। लिहाजा तत्कालीन कारीगरों के जो सहायक अब पूरी तरह तप-पककर सबल-प्रबल हो चुके हैं उन्हें शिद्दत से यह मलाल होना लाजिमी ही है कि काश उस ब्याज में उन्हें भी कुछ हिस्सा मिल पाता। इसके अलावा तत्कालीन वरिष्ठ कारीगरों की दूसरी पीढ़ी भी अब नये काम की तलाश में शिद्दत से जुटी हुई है ताकि पिछली बार की कसर भी अबकी बार ही निकाल ली जाये। साथ ही अब मजहबी मजदूरों की एक नयी फौज भी तैयार हो चुकी है जो पिछले ठेके के दौरान या तो नाबालिग थी या फिर बेहद पिछली कतार में रहकर जिसने नगण्य सी भूमिका निभाई थी। दूसरी ओर मुनाफे की मलाई पर कब्जा जमा लेनेवालों की तीसरी पीढ़ी सतही तौर पर तो विरासत में हासिल मूल और अपने दम पर कमाये उसके ब्याज से जमकर मौज उड़ाती दिख रही है लेकिन अंदरूनी हकीकत यही है कि उस काम का परिणाम अब दिनों-दिन विलुप्त व विस्मृत होता जा रहा है। नतीजन अब किसी नये काम को हाथ में लेना तीसरी पीढ़ी की मजबूरी बनती जा रही है। वैसे भी बुजुर्गों के काम-काज व रीति-नीति को अमल में लाने के अलावा इनकी ना तो कोई दूसरी पहचान है ना गति। लिहाजा नया काम तो ये भी हाथ लेना चाहते हैं ताकि एक बार फिर नये सिरे से सियासी पूंजी जमा की जाये और लंबे अर्से तक उसका आनंद लिया जाये। लेकिन मसला यह है कि इस काम को जमीनी स्तर पर अंजाम देने में सिद्धहस्त मजदूरों व कारीगरों की फौज अब अपनी पुरानी पीढ़ी की गलतियां नहीं दोहराना चाहती। तभी तो उसने सन्92 में खुदी नींव पर नयी इमारत तामीर कराने से लेकर काशी व ब्रज तक की पुरानी इमारतों की ओर इशारा करते हुए मुजफ्फरनगर और दादरी में अपनी अंगड़ाई की झलक भले दिखा दी हो लेकिन नए ठेके के एवज में मिलनेवाली मजदूरी व संभावित सियासी सफलता की मलाई में से अपनी अधिकतम हिस्सेदारी पहले से तय कर लेना चाहती है। जाहिर है कि ठेकेदारों को मजदूरों व कारीगरों का यह अडि़यल रवैया कतई रास नहीं आ सकता है लिहाजा उनके प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार के दिखावे का सिलसिला लगातार जारी है। खैर, मजदूरों व कारीगरों की अंगड़ाई और उसके प्रति ठेकेदारों के उपेक्षाभाव को तो वास्तव में दिखावा मानना ही उचित होगा क्योंकि अंग, बंग व कलिंग से लेकर द्वारिका क्षेत्र तक ही नहीं बल्कि दक्षिण व उत्तर-पूर्व में भी इन ठेकेदारों की नैया का कहीं कोई ऐसा खिवैया नहीं है जो उसे सत्ता के बंदरगाह तक सफलतापूर्वक पहुंचाने में समर्थ हो। तभी तो ठेकेदारों व मजदूरों का एकजुट होकर अपने परंपरागत धंधे को नये मुकाम तक ले जाना तय माना जा रहा है। लेकिन त्वरित सफलता का नया फार्मूला तलाश रहे इन मजहबी ठेकेदारों व मजदूरों से अदम गोंडवी के शब्दों में इतनी इल्तिजा तो की ही जा सकती है कि, ‘हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेडि़ये, अपनी कुर्सी के लिये जज्बात को मत छेडि़ये, हैं कहां हिटलर हलाकू जार या चंगेज खां, मिट गये सब कौम की औकात को मत छेडि़ये।’ ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

शनिवार, 12 दिसंबर 2015

‘ये समझदारों की दुनियां है विरोधाभास की’

‘ये समझदारों की दुनियां है विरोधाभास की’

नवकांत ठाकुर
कबीर परंपरा के कवि माने जानेवाले रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोंडवी साहब की मानें तो ‘मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की, ये समझदारों की दुनियां है विरोधाभास की, आप कहते हैं जिसे इस देश का स्वर्णिम अतीत, वो कहानी है महज प्रतिशोध की संत्रास की।’ वाकई राजतंत्र हो या लोकतंत्र, सियासत का इतिहास अक्सर प्रतिशोध की स्याही से ही लिखा जाता है। यानि सियासत को प्रतिशोध से अलग करके देख पाना बेहद ही मुश्किल है। तभी तो मौजूदा दौर में भी जिन सियासी सरगर्मियों ने संसद से सड़क तक कोहराम मचाया हुआ है उसकी असली वजह प्रतिशोध को ही बताया जा रहा है। प्रतिशोध यानि बदला, रिवेंज, इंतकाम। चुंकि सियासत में इंतकाम की परंपरा हमेशा से चली आ रही है लिहाजा अगर खुद की गलतियों के कारण भी कुछ खामियाजा भुगतना पड़ रहा हो तो उसे विरोधी पक्ष के बदले की कार्रवाई बताकर खुद के लिये जन सहानुभूति अर्जित करने का प्रयास करना बेहद आसान हो जाता है। तभी तो मौजूदा दौर का मजेदार तथ्य यह है कि भले ही सभी पक्ष इस बात पर एकमत हों कि सियासी दाल में प्रतिशोध की आंच से ही उबाल आया हुआ है लेकिन कोई भी पक्ष यह स्वीकार करने के लिये कतई तैयार नहीं है कि बदले की कार्रवाई उसकी ओर से की जा रही है। कांग्रेस की मानें तो सत्ताधारी भाजपा की ओर से उसके शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ राजनीतिक द्वेष के तहत बदले की कार्रवाई की जा रही है जबकि भाजपा की मानें तो लोकसभा चुनाव में मिली शिकस्त का बदला लेने के लिये ही कांग्रेस किसी भी सूरत में देश को उन्नति की राह पर आगे नहीं बढ़ने देना चाह रही है। इसी प्रकार सपा का कहना है कि उत्तर प्रदेश की सरकार को विकास व जनहित का काम करने से रोकने के लिये केन्द्र की ओर से मिलनेवाली मदद में लगातार कटौती की जा रही है जबकि केन्द्र की मानें तो अपने लिये सहानुभूति अर्जित करने के मकसद से ही सूबे की सपा सरकार बेवहज रोना-गाना कर रही है। इसी प्रकार पी चिदंबरम इस बात की चुनौती दे रहे हैं कि भाजपा को जो भी बदला लेना हो वह सीधा उनसे ले, उनके बेटे को 2जी घोटाले के मामले में ना फंसाए जबकि ममता बनर्जी का कहना है कि अगर हिम्मत है तो केन्द्र के इशारों पर काम कर रही सीबीआई उसे पकड़ के दिखाए। अरविंद केजरीवाल दावा करते हैं कि दिल्ली में मिली हार से बौखलायी भाजपा अब केन्द्र की ताकत का इस्तेमाल करके सूबे की जनता का जीना दुश्वार कर रही है जबकि तमाम गैरभाजपायी दल इस बात पर एकमत हैं कि मौजूदा केन्द्र सरकार आरएसएस की विचारधारा के विरोधियों को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। दूसरी ओर भाजपा की दलील है कि उसे लोकसभा में मिला हुआ बहुमत विरोधियों को हजम नहीं हो रहा है जिसके कारण उसके खिलाफ चैतरफा असहिष्णुता दिखायी जा रही है और राजनीतिक बदले के तहत उसकी तमाम महत्वाकांक्षी योजनाओं को किसी ना किसी बहाने से राज्यसभा की दहलीज के भीतर ही दफन कर दिया जा रहा है। यानि समग्रता में देखें तो इस समय हर पक्ष खुद को निरीह, मासूम व निर्दोष बताते हुए विरोधी पक्ष पर अपने खिलाफ साजिश रचने का इल्जाम लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। अपनी नजर में सभी बेहद भोले-भाले और सीधे-सादे हैं। कांग्रेसी इतने भोले कि अदालत के समन को भी प्रधानमंत्री कार्यालय की साजिश मानकर संसद का चक्का जाम कर देते हैं। अब कौन इनसे पूछे कि इसमें सरकार या संसद क्या कर सकती है। इसी प्रकार सत्तापक्ष भी इतना मासूम है कि संसद में शांति का माहौल ना बन रहा हो और उसके द्वारा प्रस्तावित विधेयकों को बाकियों का समर्थन नहीं मिल रहा हो तो वह इसे विरोधियों द्वारा प्रतिशोध की भावना के तहत किया जा रहा विरोध मान बैठता है। अब इन्हें कौन याद दिलाये कि जब ये निचले सदन में लोकसभा की बहुमत का लाभ लेकर वहां अपनी मनमानी करेंगे तो विरोधी पक्ष भी इन्हें राज्यसभा में मनमाना जवाब देगा ही। वैसे भी सदन में शांति व सहमति कायम करने की जिम्मेवारी तो इनकी ही है जिसके लिये अव्वल तो गंभीर प्रयास होता नहीं दिखता और अगर कभी पानी नाक से ऊपर उठने के बाद कुछ हाथ-पैर मारा भी जाता है तो देर से हुई इस क्रिया पर नकारात्मक प्रतिक्रिया ही सामने आती है। खैर, अपनी कमियां, खामियां और गलतियां स्वीकारना किसी को गवारा नहीं है। सबको शिकायत है कि विरोधी पक्ष उसके खिलाफ राजनीतिक बदले की भावना के तहत कार्रवाई कर रहा है। हर जगह बदले का ही बोलबाला है। आलम यह है कि किसी को जुकाम भी आये तो नजला विरोधियों पर ही गिरता है। ऐसे में आम लोगों की स्थिति वाकई बड़ी विचित्र हो चली है। किसको वह सही माने और किसको गलत। विपक्ष संसद ना चलने दे तो भी नुकसान देश का ही और सरकार अगर मनमानी करे तो उसका खामियाजा भी देश को ही उठाना पड़ेगा। यानि पक्ष-विपक्ष की चक्की में पिस रहा है देश और देश की असली समस्याएं हाशिये पर पड़ी अपनी अनदेखी का रोना रो रही हैं। ऐसे में देश के आम लोगों के दिल की आवाज भी अदम गोंडवी साहब के इस शेर में ही छिपी हुई महसूस हो रही है कि ‘सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिये, गर्म रखें कब तलक नारों से दस्तरखान को।’ ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

‘इधर जाऊं, उधर जाऊं या किधर जाऊं’

‘इधर जाऊं, उधर जाऊं या किधर जाऊं’

नवकांत ठाकुर

यूं तो शकील बदांयुनी साहब ने ‘पालकी’ के लिये लिखा था कि ‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं, बड़ी मुश्किल में हूं अब किधर जाऊं।’ लेकिन मौजूदा सियासी माहौल में ये शब्द भाजपा की अंदरूनी हालत को ही बयां करते हुए महसूस होते हैं। वाकई भाजपा के लिये यह तय करना बेहद मुश्किल दिख रहा है कि वह इधर जाए, उधर जाए या किधर जाए। खास तौर से सांगठनिक स्तर पर सर्वसम्मति से आगे की दिशा निर्धारित करना फिलहाल उसके लिये नामुमकिन की हद तक मुश्किल ही दिख रहा है। हालांकि हार-जीत का सिलसिला तो सियासत में चलता ही रहता है लेकिन अगर पुरस्कार के लिये जीत को पैमाना बनाया जाएगा तो हार के लिये जिम्मेवारी भी तय करनी ही होगी। इससे बचा नहीं जा सकता। हालांकि अभीतक हार के लिये पार्टी में किसी को जिम्मेवार ठहराने की परंपरा नहीं रही है लेकिन परंपरा तो यह भी नहीं थी कि जीत को सामूहिक उपलब्धि मानने के बजाय किसी एक को इसका महानायक बताते हुए उसे विशेष तौर पर पुरस्कृत किया जाये। पहले तो हार भी सामूहिक होती थी और जीत भी। लेकिन इस दफा ऐसा नहीं हुआ। अलबत्ता यूपी का चुनाव प्रभारी रहते हुए सूबे में पार्टी को चमत्कारी परिणाम दिलानेवाले अमित शाह को लोकसभा चुनाव में हासिल जीत का महानायक करार दे दिया गया और पुरस्कार के तौर पर उनके हाथों में पूरे संगठन की कमान दे दी गयी। इससे जाहिर तो यही हुआ कि जीत सिर्फ शाह और मोदी की जोड़ी के कारण ही हासिल हुई है। लेकिन अब जबकि दिल्ली के बाद ना सिर्फ बिहार बल्कि गुजरात के स्थानीय निकायों में भी पार्टी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है तब सामूहिक नेतृत्व पर जिम्मेवारी डालकर किसी एक को इसके लिये दोषी ठहराने से परहेज बरता जा रहा है। जाहिर है कि ऐसे में सांगठनिक स्तर पर असंतोष का वातावरण तो बनेगा ही। बकौल शत्रुघ्न सिन्हा, अगर ताली कप्तान के हिस्से में आती है तो गाली भी कप्तान के ही हिस्से में आनी चाहिये। यानि अब मसला कप्तान पर आकर ठहर गया है। हालांकि दिलचस्प तथ्य यह है कि अभी अध्यक्ष के तौर पर शाह का अपना कार्यकाल आरंभ ही नहीं हुआ है। वे तो संगठन की जिम्मेवारी से मुक्त करके सत्ता के मोर्चे पर तैनात किये गये राजनाथ सिंह के बचे-खुचे कार्यकाल को पूरा कर रहे हैं जो कि अगले महीने समाप्त होने जा रहा है। लिहाजा नये अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर संगठन में उत्सुकता, मगजमारी, प्रतिस्पर्धा व खींचतान का वातावरण बनना लाजिमी ही है। तभी तो इस मसले पर संगठन में तीन अलग-अलग धाराएं स्पष्ट दिख रही हैं। एक धारा शाह को ही इस पद पर बरकरार रखने की वकालत कर रही है जबकि दूसरी धारा किसी ऐसे को अध्यक्ष बनाने की सलाह दे रही है जिसका राष्ट्रीय राजनीति में अपना ठोस वकार-वजूद भी हो। साथ ही एक तीसरी धारा ऐसी भी है जो गुजरात में लगातार बिगड़ रहे सियासी समीकरण को संभालने के लिये शाह को वहां भेजने की जरूरत तो स्वीकार कर रहा है लेकिन पार्टी के नये अध्यक्ष के तौर पर वह किसी कद्दावर व आक्रामक नेता की नियुक्ति किये जाने के पक्ष में नहीं है। अलबत्ता इसकी मांग है कि अध्यक्ष के पद पर श्याम जाजू सरीखे ऐसे व्यक्तित्व की ताजपोशी की जाये जो ना सिर्फ सत्ता के शीर्ष संचालकों का भरोसेमंद हो बल्कि संगठन को सरकार की बी-टीम के तौर पर आगे ले जाये और किसी भी मसले पर सरकार से टकराव के बारे में सोचने की भी जहमत ना उठाए। जाहिर है कि जब तीन अलग धाराएं बह रही हैं तो उनमें आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा भी होगी। तभी तो सतही तौर पर अध्यक्ष पद की होड़ में अकेले दौड़ते दिख रहे शाह को अंदरूनी रूप से बेहद कड़ी प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ रही है। सूत्रों की मानें तो इसमें शाह को सबसे कड़ी टक्कर फिलहाल नितिन गडकरी से मिल रही है जिन्हें राजनीतिक साजिश के तहत ऐसे मामले में फंसाकर लोकसभा चुनाव की तैयारियों के आगाज के वक्त ही पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ने के लिये मजबूर किया गया जिसका बाद में कोई आधार ही नहीं मिला। पड़ताल में पूरा मामला हवा-हवाई ही पाया गया। अब इसका प्रायश्चित करते हुए अगर संघ की ओर से उन्हें दुबारा पार्टी की कमान सौंपने की कोशिश की जाती है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात ही नहीं है। वैसे भी 2009 के चुनाव में पार्टी को मिली करारी हार के बाद अपने तीन साल के कार्यकाल में गडकरी ने संगठन को इतना मजबूत कर दिया था कि 2014 के चुनाव में भाजपा को अपने दम पर हासिल बहुमत में उनके योगदान को कतई भुलाया नहीं जा सकता है। साथ ही उनमें ना सिर्फ संगठन को मोदी सरकार के समतुल्य खड़ा करने की क्षमता है बल्कि हार के अनवरत सिलसिले से संगठन को उबारने की कुशलता व दक्षता का भी वे अपने कार्यकाल में सफल व चमत्कारी मुजाहिरा कर चुके हैं जिसके दम पर लोकसभा चुनाव से काफी पहले ही राज्यसभा में तत्कालीन विपक्ष को बहुमत हासिल हो गया था। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि सत्ता की सुख-सुविधा छोड़कर संगठन की सिरदर्दी ओढ़ना उन्हें गवारा तो हो। वह भी तब जबकि आगामी दिनों में होने जा रहे तकरीबन आठ राज्यों के चुनाव में संभावित सिलसिलेवार हार से बच पाना पार्टी के लिये नामुमकिन की हद तक मुश्किल दिख रहा है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

‘पक गयी हैं आदतें.... आदत बुरी बला’

नवकांत ठाकुर
हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ गजलकार दुष्यंत कुमार ने आदतों को आधार बनाकर क्या खूब लिखा है कि ‘पक गयी हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं, पत्थरों में चीख हर्गिज कारगर होगी नहीं, सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत, हर किसी के पास तो ऐसी नजर होगी नहीं।’ वाकई पकी हुई आदतों को बदल पाना अक्सर नामुमकिन हो जाता है। यूं तो जीवन के हर क्षेत्र में पकी हुई आदतें अक्सर पगबाधा का ही काम करती हैं लेकिन सियासत की राहों में मौके की नजाकत व परिस्थितियों की मांग के मुताबिक आदतों में आवश्यक तब्दीली नहीं लाने का नतीजा अक्सर अनुमान से भी अधिक नकारात्मक हो जाता है। तभी तो आदतों में सुधार का प्रयास तो अक्सर सभी करते ही रहते हैं। लेकिन आदत तो आदत ठहरी। जो आसानी से बदल जाये वह आदत ही क्यों कहलाये। यह आदत ही तो है कि अन्ना आंदोलन की उपज माने जानेवाले अरविंद केजरीवाल केन्द्र सरकार से अपनी मांगें मनवाने के लिये मुख्यमंत्री पद पर रहने के बावजूद खुली सड़क पर लंबे वक्त तक धरना देने से खुद को रोक नहीं पाते हैं। कांग्रेस भी सत्ता में रहे या ना रहे लेकिन कांग्रेसियों की सत्ता की हनक कभी नहीं जाती। संसद में जो भी काम होगा वह उनकी मर्जी से होगा, वर्ना नहीं होगा। कोई भी विधेयक तभी पारित होगा जब वह कांग्रेस को पसंद आ जाये, वर्ना संसद को बाधित कर दिया जाएगा। उसके शीर्षनेता मनमाने तरीके से सदन में बोलेंगे, नहीं बोलेंगे। कोई कुछ नहीं बोल सकता। किसी भी सरकारी विभाग में कांग्रेसी नेताओं के सिफारिशी पत्रों की आवक में आज भी कोई कमी नहीं आयी है। आलम यह है कि सत्ताधारी दल होने के बावजूद भाजपा के नेताओं द्वारा भेजे गये सिफारिशी पत्रों से किसी को लाभ मिले या ना मिले लेकिन कांग्रेस के नेताओं का सिफारिशी पत्र बदस्तूर कारगर साबित हो रहा है। यानि समग्रता में कहा जाये तो सत्ता की आदत है कांग्रेस और कांग्रेस की आदत है सत्ता। कार्यपालिका आज भी कांग्रेस को जितनी तरजीह व स्वीकार्यता देती है उतनी शायद ही कभी भाजपा सरीखे किसी अन्य सत्ताधारी दल को मयस्सर हो सके। जाहिर है कि कार्यपालिका भी अपनी इस आदत से ही मजबूर है वर्ना कायदे से उसका दलगत राजनीति से लेना-देना क्या? खैर, आदत के हाथों मजबूर तो भाजपा भी है। विपक्ष में रहने के दौरान किये जानेवाले बर्ताव को ही सत्ता में आने के बाद भी जारी रखने को आदत ना कहें तो और क्या कहें? तभी तो असहिष्णुता के मसले पर लोकसभा में हुई चर्चा के दौरान जब मोहम्मद सलीम ने एक राष्ट्रीय पत्रिका में छपे आलेख का हवाला देते हुए राजनाथ सिंह पर कुछ ऐसी बात कहने की तोहमत लगा दी जो उन्होंने कभी कही ही नहीं थी तो इससे आहत होकर राजनाथ ने विपक्षी नेता के अंदाज में सलीम को धमका दिया कि अगर वे अपनी उस बात को वापस नहीं लेंगे तो पूरी भाजपा सदन से वाॅकआउट कर जाएगी। इसी प्रकार हर हफ्ते-दस दिन पर कांग्रेसी नेताओं से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर भाजपा द्वारा संवाददाता सम्मेलन आयोजित करने की परंपरा बदस्तूर जारी है मानो वह आज भी विपक्ष में रहने के कारण भ्रष्टाचारियों का कुछ भी बिगाड़ पाने के प्रति विवश ही हो। संसद में बोलने का मौका पाकर सांसदों से लेकर केन्द्रीय मंत्री भी इस कदर उत्साहित हो जाते हैं मानो वे आज भी विपक्ष में ही हों। तभी तो विभिन्न मसलों को लेकर संसद में हंगामे का शोर जितना सत्तापक्ष की कुर्सियों से गूंजता है उतनी आवाजें विपक्ष के खेमे से भी नहीं निकलती हैं। इसी प्रकार लोकसभा में मंत्री के बयान पर सवाल-जवाब करने की व्यवस्था व परंपरा नहीं रहने के बावजूद मौजूदा सरकार के मंत्री हर सांसद के सभी सवालों का विस्तार से जवाब देने के लिये हमेशा लालायित दिखते हैं। भले इससे नियम टूटे या परंपरा, मगर आदत नहीं छूटनी चाहिये, हमेशा व हर मसले पर बोलते रहने की। यहां तक कि प्रधानमंत्री भी विपक्षी नेता की मानिंद खुलकर बोलने के लिये इस कदर विख्यात हो गये हैं कि राजनीतिक गलियारे में इन दिनों यह मजाक चल निकला है कि पहले के प्रधानमंत्री थे जो शुरू ही नहीं होते थे और एक यह हैं जो रूकते ही नहीं हैं। खैर, यह तो हुई मजाक की बात जो मजाक है भी और शायद नहीं भी। लेकिन गंभीर बात तो यह है कि जनसंघ के दिनों से ही लगातार विपक्ष में रहने की आदत ने भाजपा के अधिकांश वरिष्ठ-कनिष्ठ नेताओं को ऐसा बना दिया है कि उनसे सत्ताधारियों सरीखे सोच व बर्ताव की झलक भी नहीं मिल रही है। नतीजन निचले स्तर के नेता-कार्यकर्ता अपनी ही सरकार की आलोचना करने से परहेज नहीं बरतते हैं जबकि संगठन को सत्ता हासिल होने जाने के बावजूद शीर्ष नेताओं का कार्यकर्ताओं व समर्थकों के साथ पुराना बर्ताव ही बदस्तूर जारी है और संघ से लेकर संगठन तक से जुड़े लोगों की तमाम अपेक्षाएं विवशता के प्रदर्शन की आड़ में की जा रही उपेक्षा की भेंट चढ़ जा रही हैं। नतीजन, सत्ता, संघ व संगठन की तिकड़ी तिराहे पर आमने-सामने दिख रही है जिसका नकारात्मक परिणाम दिल्ली व बिहार के विधानसभा चुनाव से लेकर गुजरात के स्थानीय निकायों में दिख ही चुका है और हर स्तर पर पुरानी आदतों से ही चिपके रहने का नतीजा आगे भी ऐसा ही सामने आने से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

‘गले क्या मिले, गले ही पड़ गये’

नवकांत ठाकुर
बशीर बद्र साहब फरमाते हैं कि ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नये मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।’ यानि तपाक से किसी के भी गले लग जाने की फितरत वालों से जहां आम तौर पर लोग हाथ मिलाना भी मुनासिब नहीं समझते हों वहां अगर कोई गले लगने के बहाने किसी के गले पड़ जाये तो सामने वाले की स्थिति कितनी विचित्र हो सकती है इसकी सबसे बेहतरीन व ताजा मिसाल अरविंद केजरीवाल ही हैं। कहां तो ये यह सोचकर बिहार गये थे कि प्रादेशिक व राष्ट्रीय स्तर पर कायम हो रही गैरभाजपावादी सियासी मोर्चाबंदी में हिस्सेदारी करेंगे, अल्पसंख्यक समुदाय के स्थापित हितैषियों संग मंच साझा करके अपने वोटबैंक का भरोसा बरकरार रखेंगे, सूबाई स्तर पर सहयोगियों की तादाद में इजाफा करके राष्ट्रीय राजनीति में अपना वजूद-वकार मजबूत करेंगे, भाजपा विरोधी अभियान में बोली से सियासी गोली दागनेवाली टोली से मिल रहे अनवरत सहयोग के लिये उसका शुक्रिया अदा करेंगे और दिल्ली की अपनी सरकार को हल्के में नहीं लेने की केन्द्र को नसीहत भी देंगे। यानि अरमान तो बहुत पाले थे केजरीवाल ने लेकिन हुआ यूं कि लालू के साथ मंच पर गलबहियां करके ऐसे फंसे कि ना इधर के बचे ना उधर के रहे। भगवा खेमे ने उस गलबहियां की बड़ी-बड़ी तस्वीरों का बैनर-पोस्टर लगवाकर केजरीवाल की भ्रष्टाचार विरोधी साख पर सवालिया निशान लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेस ने भी मौके पर चैका ठोंकते हुए उनकी भ्रष्टाचार विरोधी सियासत को दिखावा साबित करना शुरू कर दिया। रही सही कसर पूरी करते हुए अन्ना आंदोलन के वे पुराने साथी भी जमकर जहर उगलने में जुट गये जिन्हें दिल्ली की सियासत पर केजरीवाल का कब्जा होने के बाद से सिर्फ रूसवाई की हाथ आयी है।  जाहिर है कि अपनी साख पर हो रहे इस चैतरफा हमले का माकूल जवाब तो इन्हें देना ही था। लेकिन जवाब देने की हड़बड़ी में वे यह कहकर और भी ज्यादा गड़बड़ी कर बैठे कि वे तो सिर्फ गैरभाजपाई गठजोड़ के प्रति समर्थन व्यक्त करने बिहार गये थे अलबत्ता लालू ने ही ना सिर्फ उन्हें गले लगा लिया बल्कि सियासी लड़ाई में एकजुटता दिखाने के लिये अपने साथ हाथ भी उठवा लिया जबकि वे तो लालू से हाथ भी नहीं मिलाना चाहते थे। अब ऐसी बात सुनकर इनके प्रति लालू का मन खट्टा होना तो स्वाभाविक ही है। नतीजन इनकी हालत यही हो गयी है कि ‘ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के रहे।’ इस पर चुटकी लेते हुए अन्ना ने भी कह दिया है कि वह तो अच्छा हुआ कि केजरीवाल से उनका नाता पहले ही टूट गया वर्ना लालू के साथ इनकी गलबहियांवाली तस्वीर से उनकी साख पर भी बट्टा लग जाता। यानि देश की मौजूदा सियासी तस्वीर में एक बार फिर केजरीवाल पूरी तरह अकेले पड़ गये हैं। हालांकि लालू से इनका गले मिलना या लालू का इनके गले पड़ना, बात वही है कि चाकू तरबूज पर गिरे या तरबूज चाकू पर। गलबहियां प्रकरण में नुकसान केजरीवाल का ही होना था जो हुआ भी। हालांकि लालू के साथ गलबहियां की तस्वीर प्रचारित-प्रकाशित होने के कारण उठे तूफान को वे यह कहकर भी रफा-दफा कर सकते थे कि लालू की बिटिया और मुलायम सिंह यादव के पौत्र की शादी में शिरकत करते हुए नरेन्द्र मोदी ने जो शिष्टाचार निभाया वही दस्तूर निभाने के लिये ये भी लालू से गले मिल लिये। लेकिन विरोधियों की चैतरफा घेरेबंदी से बौखलाकर लालू के साथ अपनी वैचारिक, सैद्धांतिक व राजनीतिक दूरी का प्रदर्शन करने के क्रम में इन्होंने ऐसी बात कह दी जिसके नतीजे में हुए नुकसान को तो विध्वंस का नाम देना ही ज्यादा सही होगा। दूसरी ओर लालू ने केजरीवाल के साथ जैसी राजनीति की है वह तो सीधे तौर पर कूटनीतिक साजिश ही मानी जाएगी जिसके तहत दिल्ली में कांग्रेस की फसल काटनेवाले केजरीवाल की सैद्धांतिक व वैचारिक जड़ पर प्रहार करके उन्होंने राहुल गांधी का दिल जीतने की रणनीति बनायी थी। सूत्र बताते हैं कि अपने दोनों बेटों को सूबाई स्तर पर सियासत में स्थापित करने के बाद अब वे लोकसभा चुनाव में गच्चा खा चुकी अपनी बिटिया को कांग्रेस के सहयोग से राष्ट्रीय राजनीति में दाखिल कराने का ख्वाब बुन रहे हैं। जाहिर तौर पर अपनी कूटनीति में लालू पूरी तरह कामयाब रहे हैं जबकि केजरीवाल को इसका भारी नुकसान झेलना पड़ा है। खैर, समग्रता में देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम से यह तो साबित हो ही गया है कि लगातार दो दफा दिल्ली के मतदाताओं का विश्वास जीतने में कामयाब रहने के बावजूद कूटनीतिक सियासत की शह-मात के खेल में केजरीवाल आज भी पूरी तरह कच्चे ही हैं। बहरहाल लालू से दूरी दिखाने के चक्कर में अपेक्षित व परंपरागत सियासी जुमला उछालने के बजाय सख्त बयान देकर केजरीवाल ने अपने समर्थकों को यह संदेश तो दे ही दिया है कि अगर सियासी तौर पर कभी कोई गलती हो जाये तो उस पर लीपापोती करने के बजाय साफ तौर पर सच को स्वीकारने में कतई हिचक नहीं दिखायी जानी चाहिये। हालांकि ऐसी सियासत से स्वाभाविक तौर पर तात्कालिक नुकसान, परेशानी व जगहंसाई अवश्य झेलनी पड़ती है लेकिन दूरगामी तौर पर इससे ना सिर्फ अपने समर्थकों के विश्वास को बरकरार रखा जा सकता है बल्कि विरोधियों की तमाम साजिशों से बच निकलकर अपनी ठोस छवि की चमक में इजाफा भी किया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’