‘पक गयी हैं आदतें.... आदत बुरी बला’
नवकांत ठाकुर
हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ गजलकार दुष्यंत कुमार ने आदतों को आधार बनाकर क्या खूब लिखा है कि ‘पक गयी हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं, पत्थरों में चीख हर्गिज कारगर होगी नहीं, सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत, हर किसी के पास तो ऐसी नजर होगी नहीं।’ वाकई पकी हुई आदतों को बदल पाना अक्सर नामुमकिन हो जाता है। यूं तो जीवन के हर क्षेत्र में पकी हुई आदतें अक्सर पगबाधा का ही काम करती हैं लेकिन सियासत की राहों में मौके की नजाकत व परिस्थितियों की मांग के मुताबिक आदतों में आवश्यक तब्दीली नहीं लाने का नतीजा अक्सर अनुमान से भी अधिक नकारात्मक हो जाता है। तभी तो आदतों में सुधार का प्रयास तो अक्सर सभी करते ही रहते हैं। लेकिन आदत तो आदत ठहरी। जो आसानी से बदल जाये वह आदत ही क्यों कहलाये। यह आदत ही तो है कि अन्ना आंदोलन की उपज माने जानेवाले अरविंद केजरीवाल केन्द्र सरकार से अपनी मांगें मनवाने के लिये मुख्यमंत्री पद पर रहने के बावजूद खुली सड़क पर लंबे वक्त तक धरना देने से खुद को रोक नहीं पाते हैं। कांग्रेस भी सत्ता में रहे या ना रहे लेकिन कांग्रेसियों की सत्ता की हनक कभी नहीं जाती। संसद में जो भी काम होगा वह उनकी मर्जी से होगा, वर्ना नहीं होगा। कोई भी विधेयक तभी पारित होगा जब वह कांग्रेस को पसंद आ जाये, वर्ना संसद को बाधित कर दिया जाएगा। उसके शीर्षनेता मनमाने तरीके से सदन में बोलेंगे, नहीं बोलेंगे। कोई कुछ नहीं बोल सकता। किसी भी सरकारी विभाग में कांग्रेसी नेताओं के सिफारिशी पत्रों की आवक में आज भी कोई कमी नहीं आयी है। आलम यह है कि सत्ताधारी दल होने के बावजूद भाजपा के नेताओं द्वारा भेजे गये सिफारिशी पत्रों से किसी को लाभ मिले या ना मिले लेकिन कांग्रेस के नेताओं का सिफारिशी पत्र बदस्तूर कारगर साबित हो रहा है। यानि समग्रता में कहा जाये तो सत्ता की आदत है कांग्रेस और कांग्रेस की आदत है सत्ता। कार्यपालिका आज भी कांग्रेस को जितनी तरजीह व स्वीकार्यता देती है उतनी शायद ही कभी भाजपा सरीखे किसी अन्य सत्ताधारी दल को मयस्सर हो सके। जाहिर है कि कार्यपालिका भी अपनी इस आदत से ही मजबूर है वर्ना कायदे से उसका दलगत राजनीति से लेना-देना क्या? खैर, आदत के हाथों मजबूर तो भाजपा भी है। विपक्ष में रहने के दौरान किये जानेवाले बर्ताव को ही सत्ता में आने के बाद भी जारी रखने को आदत ना कहें तो और क्या कहें? तभी तो असहिष्णुता के मसले पर लोकसभा में हुई चर्चा के दौरान जब मोहम्मद सलीम ने एक राष्ट्रीय पत्रिका में छपे आलेख का हवाला देते हुए राजनाथ सिंह पर कुछ ऐसी बात कहने की तोहमत लगा दी जो उन्होंने कभी कही ही नहीं थी तो इससे आहत होकर राजनाथ ने विपक्षी नेता के अंदाज में सलीम को धमका दिया कि अगर वे अपनी उस बात को वापस नहीं लेंगे तो पूरी भाजपा सदन से वाॅकआउट कर जाएगी। इसी प्रकार हर हफ्ते-दस दिन पर कांग्रेसी नेताओं से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर भाजपा द्वारा संवाददाता सम्मेलन आयोजित करने की परंपरा बदस्तूर जारी है मानो वह आज भी विपक्ष में रहने के कारण भ्रष्टाचारियों का कुछ भी बिगाड़ पाने के प्रति विवश ही हो। संसद में बोलने का मौका पाकर सांसदों से लेकर केन्द्रीय मंत्री भी इस कदर उत्साहित हो जाते हैं मानो वे आज भी विपक्ष में ही हों। तभी तो विभिन्न मसलों को लेकर संसद में हंगामे का शोर जितना सत्तापक्ष की कुर्सियों से गूंजता है उतनी आवाजें विपक्ष के खेमे से भी नहीं निकलती हैं। इसी प्रकार लोकसभा में मंत्री के बयान पर सवाल-जवाब करने की व्यवस्था व परंपरा नहीं रहने के बावजूद मौजूदा सरकार के मंत्री हर सांसद के सभी सवालों का विस्तार से जवाब देने के लिये हमेशा लालायित दिखते हैं। भले इससे नियम टूटे या परंपरा, मगर आदत नहीं छूटनी चाहिये, हमेशा व हर मसले पर बोलते रहने की। यहां तक कि प्रधानमंत्री भी विपक्षी नेता की मानिंद खुलकर बोलने के लिये इस कदर विख्यात हो गये हैं कि राजनीतिक गलियारे में इन दिनों यह मजाक चल निकला है कि पहले के प्रधानमंत्री थे जो शुरू ही नहीं होते थे और एक यह हैं जो रूकते ही नहीं हैं। खैर, यह तो हुई मजाक की बात जो मजाक है भी और शायद नहीं भी। लेकिन गंभीर बात तो यह है कि जनसंघ के दिनों से ही लगातार विपक्ष में रहने की आदत ने भाजपा के अधिकांश वरिष्ठ-कनिष्ठ नेताओं को ऐसा बना दिया है कि उनसे सत्ताधारियों सरीखे सोच व बर्ताव की झलक भी नहीं मिल रही है। नतीजन निचले स्तर के नेता-कार्यकर्ता अपनी ही सरकार की आलोचना करने से परहेज नहीं बरतते हैं जबकि संगठन को सत्ता हासिल होने जाने के बावजूद शीर्ष नेताओं का कार्यकर्ताओं व समर्थकों के साथ पुराना बर्ताव ही बदस्तूर जारी है और संघ से लेकर संगठन तक से जुड़े लोगों की तमाम अपेक्षाएं विवशता के प्रदर्शन की आड़ में की जा रही उपेक्षा की भेंट चढ़ जा रही हैं। नतीजन, सत्ता, संघ व संगठन की तिकड़ी तिराहे पर आमने-सामने दिख रही है जिसका नकारात्मक परिणाम दिल्ली व बिहार के विधानसभा चुनाव से लेकर गुजरात के स्थानीय निकायों में दिख ही चुका है और हर स्तर पर पुरानी आदतों से ही चिपके रहने का नतीजा आगे भी ऐसा ही सामने आने से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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