शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

‘आशियाने में आग लग रही घर के चिराग से’



‘आशियाने में आग लग रही घर के चिराग से’

जिन चिरागों पर दारोमदार हो घर में उजाले का वे ही अगर आशियाना खाक करने पर आमादा हो जाएं तो बाकी घरवालों को कितनी परेशानियों, समस्याओं व जगहंसाइ का सामना करना पड़ सकता है यह शायद ही किसी को अलग से समझाने की जरूरत पड़े। खास तौर से सियासत में चिराग ही अगर आशियाने में आग लगाने का जुगाड़ ढूंढ़ने लगे फिर तो कहना ही क्या। हालांकि आशियाने को खाक करके अपने वजूद और वकार में नयी बुलंदी लाने की रणनीति के तहत अगर चिराग ने बागी तेवर अपनाया हो फिर तो एक बार के लिये उसके प्रति सहानुभूति भी जतायी जा सकती है या फिर उसके नजरिये से भी पूरे माजरे को समझने का प्रयास किया सकता है। लेकिन बिना किसी फायदे के बेवजह चिराग भड़क उठे और आशियाने को लीलने के लिये तत्पर हो जाये तो ऐसे चिरागों को क्या कहा जाये। इसमें एक तथ्य यह भी है कि चिरागों की ज्वलनशीलता तो सबको झेलनी पड़ती है लेकिन आशियाना वही खाक होता है जिसमें आग के भड़कने का सामान भी हो। मिसाल के तौर पर बिहार में अपने ही खेमे को खाक करने पर आमादा चिरागों की कमी ना राजग में थी और ना ही महागठबंधन में। लेकिन महागठबंधन के बागी चिराग अपनी आग में खुद ही स्वाहा हो गये जिसने आशियाने की रौनक में इजाफा ही किया जबकि राजग के खुराफाती चिरागों को अपने पक्ष के अरमानों को जला डालने में जो कामयाबी मिली उसमें आशियाने की अंदरूनी कमियों, खामियों व गलतियों ने बारूद का काम किया। नतीजन अपनी रौशनी में खुद भी पूरी तरह नहा पाने की क्षमता नहीं रखनेवाले चिरागों ने खेमे में मौजूद बारूद का इस्तेमाल करके सूबे में राजग के तमाम अरमानों को सिरे से खाक कर दिया। कहने का तात्पर्य यह कि कोई भी चिराग तब तक आशियाने को खाक करने में कामयाब नहीं हो सकता जब तक घर में रखे किसी ज्वलनशील सामान के साथ उसका तालमेल ना हो। तभी तो भाजपा के चिरागों ने अपने ही आशियाने को खाक करने के लिये दिल्ली में सत्तारूढ़ एएपी को जो चिंगारी मुहैया करायी है उससे संगठन की सेहत पर कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। अलबत्ता चिराग की नीयत अवश्य बेनकाब हो गयी है जिसकी सफाई देने के लिये उसे संगठन की ओर से समन भेज दिया गया है। दरअसल वाकया है पार्टी के चाणक्य कहे जानेवाले केन्द्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली से जुड़ा हुआ। उनकी निजी हैसियत और रसूख से तो पार्टी के कई चिराग हमेशा से जलते रहे हैं लेकिन उनके खिलाफ कोई ठोस मुद्दा तलाशने में अब तक किसी को कामयाबी नहीं मिल पायी है। लेकिन कहते हैं कि जैसे भूखे को चांद में भी रोटी ही नजर आती है और प्यासे को रेत के सेहरा में भी समुंदर का भरम हो जाता है वैसे ही उनके खिलाफ शिद्दत से कोई ठोस मामला तलाशनेवालों की डीडीसीए के अध्यक्ष के तौर पर वर्ष 1999 से 2013 तक उनके द्वारा निभायी गयी जिम्मेवारियों पर नजर पड़ी तो इसी दौरान उनकी अगुवाई में 141 करोड़ की भारी भरकम लागत से निर्मित फिरोजशाह कोटला स्टेडियम में इन बागियों को फर्जीवाड़ा नजर आने लगा। वे यह मान बैठे कि अगर इमानदारी की हिस्सेदारी के हिसाब से उसमें दस फीसदी रकम भी इधर-उधर हुई होगी तो 14-15 करोड़ के घपले-घोटाले का बोझ तो जेटली के कांधे पर आ ही जाएगा। सूत्र बताते हैं कि इसी खुराफाती सोच के साथ इन बागी चिरागों ने कांग्रेसनीत संप्रग के दूसरे कार्यकाल में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को यह बताकर जेटली के खिलाफ भड़का दिया कि उनके दामाद राॅबर्ट वाड्रा के खिलाफ हो रहे हमलों का संचालन जेटली ही कर रहे हैं। जाहिर है कि ऐसी बात जानने के बाद सोनिया का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और बागियों की पौ-बारह हो गयी। सरकार ने डीडीसीए के अध्यक्ष के तौर पर जेटली के पूरे कार्यकाल की जांच का जिम्मा ‘सीरियस फ्राॅड इन्वेस्टिगेशन आॅफिस’ यानि एसएफआईओ को दे दिया। उसने पूरी जांच-पड़ताल के बाद ना सिर्फ जेटली को क्लीन चिट दे दी बल्कि उनके कार्यकाल के दौरान डीडीसीए में कुछ भी घपला-घोटाला होने से उसने साफ इनकार कर दिया। खैर, इस जांच रिपोर्ट के बाद कांग्रेस ने तो इस मामले में गलत जानकारी देनेवाले बागियों से किनारा कर लिया लेकिन अब इन्हें अरविंद केजरीवाल के तौर पर नया विस्फोटक मिल गया जिसने भाजपा से निजी दुश्मनी पाल ली है। बागियों ने कानूनी तौर पर पिट चुके इसी मसले की फाइलें केजरीवाल को दे दी जिसे एएपी ने हाथों-हाथ लपकते हुए जेटली की छवि खराब करने की जंग छेड़ दी। एएपी को उम्मीद तो यही थी कि भाजपा से बुरी तरह चिढ़ी बैठी कांग्रेस सरीखी पार्टियां इस जंग में उसका सहयोग अवश्य करेंगी लेकिन पूरे मामले की हकीकतों से पहले ही अवगत हो चुकी कांग्रेस ने इसे संसद में उठाना भी जरूरी नहीं समझा। लिहाजा एक बार फिर बागी चिरागों के अरमान धरे रह जाने की उम्मीद ही प्रबल दिख रही है। खैर, सियासत में प्रतिद्वन्द्विता को तो गलत नहीं कहा जा सकता है लेकिन इस टकराव में आशियाना ही ध्वस्त करने पर आमादा हो जानेवालों को इतना तो याद रखना ही चाहिये कि जिस चारदीवारी ने बाहरी तूफानों से महफूज रखकर उनके अस्तित्व को आकार, आधार और विस्तार दिया है, उसके झरोखे का एक पर्दा भी जल जाने की सूरत में इनके अपने वजूद का क्या होगा? ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    @नवकांत ठाकुर

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