‘इधर जाऊं, उधर जाऊं या किधर जाऊं’
नवकांत ठाकुर
यूं तो शकील बदांयुनी साहब ने ‘पालकी’ के लिये लिखा था कि ‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं, बड़ी मुश्किल में हूं अब किधर जाऊं।’ लेकिन मौजूदा सियासी माहौल में ये शब्द भाजपा की अंदरूनी हालत को ही बयां करते हुए महसूस होते हैं। वाकई भाजपा के लिये यह तय करना बेहद मुश्किल दिख रहा है कि वह इधर जाए, उधर जाए या किधर जाए। खास तौर से सांगठनिक स्तर पर सर्वसम्मति से आगे की दिशा निर्धारित करना फिलहाल उसके लिये नामुमकिन की हद तक मुश्किल ही दिख रहा है। हालांकि हार-जीत का सिलसिला तो सियासत में चलता ही रहता है लेकिन अगर पुरस्कार के लिये जीत को पैमाना बनाया जाएगा तो हार के लिये जिम्मेवारी भी तय करनी ही होगी। इससे बचा नहीं जा सकता। हालांकि अभीतक हार के लिये पार्टी में किसी को जिम्मेवार ठहराने की परंपरा नहीं रही है लेकिन परंपरा तो यह भी नहीं थी कि जीत को सामूहिक उपलब्धि मानने के बजाय किसी एक को इसका महानायक बताते हुए उसे विशेष तौर पर पुरस्कृत किया जाये। पहले तो हार भी सामूहिक होती थी और जीत भी। लेकिन इस दफा ऐसा नहीं हुआ। अलबत्ता यूपी का चुनाव प्रभारी रहते हुए सूबे में पार्टी को चमत्कारी परिणाम दिलानेवाले अमित शाह को लोकसभा चुनाव में हासिल जीत का महानायक करार दे दिया गया और पुरस्कार के तौर पर उनके हाथों में पूरे संगठन की कमान दे दी गयी। इससे जाहिर तो यही हुआ कि जीत सिर्फ शाह और मोदी की जोड़ी के कारण ही हासिल हुई है। लेकिन अब जबकि दिल्ली के बाद ना सिर्फ बिहार बल्कि गुजरात के स्थानीय निकायों में भी पार्टी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है तब सामूहिक नेतृत्व पर जिम्मेवारी डालकर किसी एक को इसके लिये दोषी ठहराने से परहेज बरता जा रहा है। जाहिर है कि ऐसे में सांगठनिक स्तर पर असंतोष का वातावरण तो बनेगा ही। बकौल शत्रुघ्न सिन्हा, अगर ताली कप्तान के हिस्से में आती है तो गाली भी कप्तान के ही हिस्से में आनी चाहिये। यानि अब मसला कप्तान पर आकर ठहर गया है। हालांकि दिलचस्प तथ्य यह है कि अभी अध्यक्ष के तौर पर शाह का अपना कार्यकाल आरंभ ही नहीं हुआ है। वे तो संगठन की जिम्मेवारी से मुक्त करके सत्ता के मोर्चे पर तैनात किये गये राजनाथ सिंह के बचे-खुचे कार्यकाल को पूरा कर रहे हैं जो कि अगले महीने समाप्त होने जा रहा है। लिहाजा नये अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर संगठन में उत्सुकता, मगजमारी, प्रतिस्पर्धा व खींचतान का वातावरण बनना लाजिमी ही है। तभी तो इस मसले पर संगठन में तीन अलग-अलग धाराएं स्पष्ट दिख रही हैं। एक धारा शाह को ही इस पद पर बरकरार रखने की वकालत कर रही है जबकि दूसरी धारा किसी ऐसे को अध्यक्ष बनाने की सलाह दे रही है जिसका राष्ट्रीय राजनीति में अपना ठोस वकार-वजूद भी हो। साथ ही एक तीसरी धारा ऐसी भी है जो गुजरात में लगातार बिगड़ रहे सियासी समीकरण को संभालने के लिये शाह को वहां भेजने की जरूरत तो स्वीकार कर रहा है लेकिन पार्टी के नये अध्यक्ष के तौर पर वह किसी कद्दावर व आक्रामक नेता की नियुक्ति किये जाने के पक्ष में नहीं है। अलबत्ता इसकी मांग है कि अध्यक्ष के पद पर श्याम जाजू सरीखे ऐसे व्यक्तित्व की ताजपोशी की जाये जो ना सिर्फ सत्ता के शीर्ष संचालकों का भरोसेमंद हो बल्कि संगठन को सरकार की बी-टीम के तौर पर आगे ले जाये और किसी भी मसले पर सरकार से टकराव के बारे में सोचने की भी जहमत ना उठाए। जाहिर है कि जब तीन अलग धाराएं बह रही हैं तो उनमें आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा भी होगी। तभी तो सतही तौर पर अध्यक्ष पद की होड़ में अकेले दौड़ते दिख रहे शाह को अंदरूनी रूप से बेहद कड़ी प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ रही है। सूत्रों की मानें तो इसमें शाह को सबसे कड़ी टक्कर फिलहाल नितिन गडकरी से मिल रही है जिन्हें राजनीतिक साजिश के तहत ऐसे मामले में फंसाकर लोकसभा चुनाव की तैयारियों के आगाज के वक्त ही पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ने के लिये मजबूर किया गया जिसका बाद में कोई आधार ही नहीं मिला। पड़ताल में पूरा मामला हवा-हवाई ही पाया गया। अब इसका प्रायश्चित करते हुए अगर संघ की ओर से उन्हें दुबारा पार्टी की कमान सौंपने की कोशिश की जाती है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात ही नहीं है। वैसे भी 2009 के चुनाव में पार्टी को मिली करारी हार के बाद अपने तीन साल के कार्यकाल में गडकरी ने संगठन को इतना मजबूत कर दिया था कि 2014 के चुनाव में भाजपा को अपने दम पर हासिल बहुमत में उनके योगदान को कतई भुलाया नहीं जा सकता है। साथ ही उनमें ना सिर्फ संगठन को मोदी सरकार के समतुल्य खड़ा करने की क्षमता है बल्कि हार के अनवरत सिलसिले से संगठन को उबारने की कुशलता व दक्षता का भी वे अपने कार्यकाल में सफल व चमत्कारी मुजाहिरा कर चुके हैं जिसके दम पर लोकसभा चुनाव से काफी पहले ही राज्यसभा में तत्कालीन विपक्ष को बहुमत हासिल हो गया था। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि सत्ता की सुख-सुविधा छोड़कर संगठन की सिरदर्दी ओढ़ना उन्हें गवारा तो हो। वह भी तब जबकि आगामी दिनों में होने जा रहे तकरीबन आठ राज्यों के चुनाव में संभावित सिलसिलेवार हार से बच पाना पार्टी के लिये नामुमकिन की हद तक मुश्किल दिख रहा है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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