आखिरकार चले ही गए अटलजी। लंबे समय से जीवन और मृत्यु के बीच पेंडुलम की तरह झूलते हुए वे खुद इस बात को महसूस नहीं कर पा रहे थे कि वे हैं भी या नहीं। कल्पना की जा सकती है किसी व्यक्ति की ऐसी स्थिति को जिसे इस कदर विस्मृति हो गयी हो कि यह भी याद ना रहे कि वह कौन है, कहां है और क्यों है। कब खाया, क्या खाया और खाया भी या नहीं। यहां तक कि शरीर में कोई संवेदना ही ना बचे, दुख-सुख से परे हो जाये। जिसका जीवन महज चिकित्सकीय प्रयासों व कृत्रिम जीवन रक्षक यंत्रों के सहारे सांसों के आवागमन का एक सिलसिला भर बन कर रह जाये उसका क्या रहना और क्या चले जाना। सच तो यह है कि सिर्फ चिकित्सकीय तौर पर अटलजी हमारे बीच से चले गये हैं वर्ना जा तो वे काफी पहले ही चुके थे। उनके जाने की शुरूआत तो तभी हो गयी थी जब उन्होंने स्वेच्छा से सक्रिय राजनीति और सार्वजनिक जीवन से खुद को अलग-विलग कर लिया था। खुद ही मना कर दिया था संसद की सदस्यता लेने से। लेकिन यह अटलजी का ही जीवट था जो तकरीबन एक दशक तक मौत के साथ उनका अनवरत संघर्ष जारी रहा। इस बीच कई ऐसे मौके आए जब लगा कि वे नहीं बच पाएंगे। मगर हर बार वे मौत को मात देते रहे। परन्तु इस धरा धाम पर मृत्यु ही अकाट्य सत्य है। जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है। इसी सनातन व्यवस्था को अंगीकार करते हुए अटलजी ने भी अपना नश्वर शरीर त्याग दिया। यह भरोसा दिलाते हुए कि- ‘मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौट कर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?’ हालांकि उनका रहना भी ना रहने जैसा हो गया था लेकिन कम से कम एक भरोसा था उनके होने का। लेकिन अब वह भरोसा भी समाप्त हो गया। अटलजी का जाना वाकई ऐसा है जैसे सिर से अभिभावक का साया उठ जाना। वे हर भारतवासी के अपने अटल थे जिन्होंने अपने वचन व कर्म से हर किसी को कहीं ना कहीं छुआ भी और उसमें बदलाव भी किया। आज जितनी भी विकास की परियोजनाएं संचालित हो रही हैं उनकी नींव में अटलजी के हाथों से डाला गया एक ना एक पत्थर अवश्य मौजूद है। उन्होंने विपक्ष में रहते हुए तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार के आग्रह पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में ऐसे जटिल समय में भारत का पक्ष रखने की जिम्मेवारी सफलता से निभाई जब पाकिस्तान ने उस मंच पर कश्मीर के मुद्दे को उठाने का दुस्साहस किया था। बाद में सत्ता की बागडोर संभालने पर परमाणु बम का विस्फोट कर दुनिया में भारत को एक नयी पहचान और प्रतिष्ठा दिलाने वाले, अपने कार्यकाल में भारत को एक बड़ी आर्थिक और सामरिक ताकत बनाने वाले, उत्तर-दक्षिण से लेकर पूरब-पश्चिम तक राष्ट्रीय राजमार्गों, ग्रामीण सड़कों का जाल बिछाने की शुरूआत करनेवाले, शिक्षा का अधिकार दिलानेवाले, बाढ़-सुखाड़ का पूर्ण समाधान करने के लिये नदियों को जोड़ने और मोबाइल क्रांति से लोगों को जोड़ने वाले, विचारधारा पर अडिग किन्तु विरोधियों का भी सम्मान करने वाले, संयुक्त राष्ट्र तक में हिन्दी और हिन्दुस्तान का डंका बजानेवाले अटल जी का चले जाना वाकई अपूरणीय क्षति है। यानि कोई ऐसा आयाम या इंसान नहीं है जिसे अटलजी के जाने से फर्क ना पड़ा हो। फर्क उस भाजपा को पड़ा है, जिसका ना सिर्फ उन्होंने बीज बोया बल्कि उसे दो सांसदों से आगे बढ़ाते हुए ऐसा स्वरूप दिया कि कांग्रेस के विरोध वाली तीन गैरकांग्रेसी सरकार का नेतृत्व उन्होंने खुद भी किया और आज पूरे बहुमत के साथ भाजपा केन्द्र से लेकर तकरीबन बीस राज्यों में सत्तारूढ़ है। फर्क उस भारत को पड़ा है, जिसकी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये उन्होंने अपने जीवन का क्षण-क्षण और देह का कण-कण समर्पित कर दिया। फर्क देशवासियों को पड़ा है, जिसके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने की दिशा में ऐसी पदचाप बनाई जिस पर चलते हुए भाजपा की तमाम सरकारें जनकल्याण के ध्येय के साथ आगे बढ़ रही हैं। फर्क लोकतांत्रिक मूल्यों को पड़ा है, जिसकी राह पकड़ कर उन्होंने 24 दलों को अपने साथ जोड़कर पूरे कार्यकाल की सरकार चलाई। फर्क उन मूल्यों को पड़ा है, जिसका पूरी श्रद्धा के साथ अनुपालन करते हुए उन्होंने यह कहते हुए महज एक वोट की कमी के कारण अपनी सरकार गिर जाने दी कि वे जोड़-तोड़ और जुगाड़ से प्राप्त होनेवाली सत्ता को चिमटे से छूना भी गवारा नहीं कर सकते। फर्क उस विपक्ष को पड़ा है, जिसके लिये अटलजी के कार्यालय व निवास के ही नहीं बल्कि दिल के दरवाजे भी हमेशा खुले रहते थे। फर्क धर्मनिरपेक्षता के उस सिद्धांत को पड़ा है, जिस पर गुजरात में आघात होने पर उन्होंने रूंधे गले और भारी मन से कहा था कि अब वे विश्व को अपना चेहरा कैसे दिखा पाएंगे। फर्क उस मां सरस्वती को पड़ा है, जिसकी साधना उन्होंने आपातकाल के दौरान जेल में भी जारी रखी और कविता की पूरी किताब सलाखों के पीछे रह कर लिख डाली। लेकिन वास्तव में अगर किसी को फर्क नहीं पड़ा है तो वे अकेले व इकलौते अटलजी खुद ही हैं। ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया की तर्ज पर वाकई उन्हें व्यक्तिगत तौर पर अपने जाने से कोई फर्क नहीं पड़ा है। बल्कि देखा जाये तो उनका जाना वास्तव में उनकी मुक्ति ही है। अब वे मुक्त हो गए हैं अपनी तमाम शारीरिक व्याधियों व पीड़ाओं से। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
शनिवार, 18 अगस्त 2018
शुक्रवार, 10 अगस्त 2018
‘गुंथे फूल सबके मन भाए, बिखरे हुए करें हाय-हाय’
अनेकता में एकता की जो अवधारणा है उसमें विवधता के बावजूद खूबसूरती में तभी इजाफा होता है जब एकता के धागे में तमाम तरह के फूल परस्पर मजबूती से गुंथे-जुड़े हों। वर्ना बिखरे हुए फूलों की पंखुड़ियां तो न्यौछावर करने के काम ही आती हैं। हालांकि माला बनने के क्रम में भी फूलों की स्वतंत्र सत्ता बरकरार ही रहती है लेकिन अलग-अलग रंग, रूप व गंध का होने के बावजूद जिन फूलों ने सहमति व विश्वास के धागे में बंधना स्वीकार कर लिया हो उनकी ही माला के तौर पर पूछ होती है। राजनीतिक व सामाजिक स्तर पर भी तमाम जातियों व उपजातियों में बंटे होने के बावजूद जिन वर्गों ने परस्पर एकता की डोर को जितनी मजबूती से थामना स्वीकार किया उनकी उतनी ही अधिक कद्र होती है। लेकिन जो आत्ममुग्धता के दायरे से निकल कर दूसरे को अपनाने और किसी अन्य के साथ जुड़ने के लिये आगे नहीं आते उन्हें कोई नहीं पूछता। वे हाशिये पर रहते हुए दूसरों की खुशी व तरक्की को देखकर आहें ही भरते रह जाते हैं। ऐसा ही हो रहा है इन दिनों उन अगड़ी जातियों के साथ जो इस सप्ताह संसद में ओबीसी और अनुसूचित जातियों व जनजातियों के कल्याण के लिये बनाए गए कानूनों को देख कर जल-भुन व कुढ़ रहे हैं। हालांकि सोशल मीडिया पर जलन के धुएं का फैलाव देख कर व विवशता भरी गुहार सुनकर एकबारगी किसी का भी दिल पसीज सकता है। लेकिन व्यावहारिक तौर पर देखा जाये तो अपनी इस दशा व मौजूदा हालातों के लिये ये किसी और को कतई जिम्मेवार नहीं ठहरा सकते। आज अगर पिछड़ों और दलितों के हितों की रक्षा के लिये तमाम राजनीतिक दल एक साथ आगे आए हैं और हर कोई इन्हें लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है तो इसकी कई वजहों में से एक बड़ा कारण इनकी वह एकता है जो सभी राजनीतिक दलों को ललचाता भी है और डराता भी है। बेशक दलित, आदिवासी और पिछड़े ही नहीं बल्कि मुसलमान भी अंदरूनी तौर पर तमाम उपजातियों व फिरकों में बंटे हुए हों लेकिन बात जब जाति के स्वाभिमान की आती है तो ये सभी एकजुट हो जाते हैं। ऐसी एकजुटता अगड़ों यानि कथित सवर्णों में कहीं नहीं दिखती। आदिवासी समाज जब सड़क पर उतरता है तब वह संथाल, गोंड, मुंडा, माहली, बोडो, मीणा, खासी, सहरिया, गरासिया, उरांव, बिरहोर या मावची वगैरह के रूप में अलग-पृथक नहीं दिखता बल्कि समग्रता में आदिवासी शक्ति दिखाई पड़ती है। इसी प्रकार विभिन्न अनुसूचित जातियों के बीच आपस में सामाजिक स्तर पर तमाम दूरियों के बावजूद हक व अधिकारों पर अतिक्रमण की नौबत आने पर 16.6 फीसदी दलित आबादी एकजुट नजर आती है। लेकिन अगड़ों की बात करें तो इनके बीच शायद ही कभी ऐसी एकजुटता दिखती हो। सभी अगड़ी जातियों के एकजुट होने की बात तो बहुत दूर की है अलबत्ता ये आपस में भी एक-दूसरे के साथ मिल जुलकर आगे आने के लिये सहमत नहीं होते। खुद को अगड़ों का अगुवा कहनेवाले ब्राह्मणों की ही बात करें तो इनमें कोई गौड़ है तो कोई द्रविड़। गौड़ में भी कान्यकुब्ज, शाकलद्वीपीय, मैथिल, सरयूपाणी, सारस्वत, चितपावन, झिझौतिया, गालव, अनाविल व महियाल सरीखे दर्जनों प्रकार के ब्राह्मण हैं। इतना ही नहीं बल्कि आगे इनमें भी कई भेद, विभेद, मतभेद और विच्छेद हैं। मैथिल ब्राह्मण की बात करें तो इनमें कोई श्रोत्रिय है तो कोई भलमानुस, कोई जयवार तो कोई करमहे, सुगरगणे वगैरह। अंतिम संस्कार करानेवाले महाब्राह्मण वैसे ही समाज से अलग-विलग रहते हैं। लेकिन बाकियों में भी कोई किसी को अपने बराबर का नहीं मानता। सब एक-दूसरे से ऊपर ही हैं और बेहतर में भी बेहतरीन हैं। आत्ममुग्धता की यही स्थिति राजपूतों की भी है और कायस्थों व भूमिहारों में भी। नतीजन कुल 23.4 फीसदी आबादी के बावजूद आरक्षण के लाभ से अलग-थलग पड़ी अगड़ी जातियों के हितों की रक्षा की बात कहीं नहीं सुनी जाती। नतीजन इस वर्ग के बीच असंतोष, तकलीफ और काफी हद तक जलन व आक्रोश का भाव पैदा होना स्वाभाविक ही है। फिलहाल इनके दुख की वजह है कि संसद से ओबीसी और एससी-एसटी को तो अधिकतम सम्मान और अधिकार मिल रहा है, लेकिन इन्हें कोई टके का भाव भी नहीं दे रहा। ना सत्ता पक्ष और ना ही विपक्ष। ओबीसी आयोग बनाने के लिए भी संसद में आम सहमति बन जाती है और एससी-एसटी उत्पीड़न निरोधक कानून को कठोर करने के मामले में भी संसद में सर्वसम्मति का माहौल बन जाता है। लेकिन अगड़ों के लिये अलग से कुछ करना किसी को जरूरी महसूस नहीं होता। ऐसे में सवाल है कि आखिर अगड़ों को ऐसी नौबत क्यों झेलनी पड़ रही है? हालांकि कहने को कोई कुछ भी कहे लेकिन सच यही है कि इस नौबत की जड़ें अतीत में उतनी गहराई तक नहीं धंसी हैं जितनी वर्तमान के साथ जुड़ी हुई हैं। जिन परिस्थितियों के कारण दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिये विशेष संवैधानिक व्यवस्था की गई थी वे व्यावहारिक स्तर पर भले ही कुछ हद तक बदली हों लेकिन सैद्धांतिक, वैचारिक, मानसिक व सामाजिक स्तर पर यथावत बरकरार हैं। लिहाजा जब तक अगड़ों में श्रेष्ठता व विशिष्ठता का अहंकार, आपसी भेद-विभेद व मतभेद और बाकियों के प्रति दुर्भावना का भाव बरकरार रहेगा तब तक इनके लिये हाशिये से ऊपर उठना और सियासी स्तर पर कद्र व विशेष पूछ हासिल कर पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल ही बना रहेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर
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मंगलवार, 7 अगस्त 2018
जोरदार प्रहार के लिये दमदार मुद्दे की दरकार
केन्द्र की मोदी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिये विपक्ष की बेचैनी किसी से छिपी ने नहीं है। इसके लिये समूचा विपक्ष कुछ भी कर गुजरने के लिये सैद्धांतिक तौर पर पूरी तरह तैयार हो चुका है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी वापस ले ली है तो प्रदेश स्तर पर यूपी में सबसे बड़ा विपक्षी दल होने के बावजूद सपा ने महागठबंधन के लिये कुर्बानी देते हुए अपनी तुलना में बसपा को अधिक सीटें देने की स्वीकृति का संकेत दे दिया है। बिहार में राजद ने सभी गैर-भाजपाई ताकतों को महागठबंधन में सम्मानजनक तरीके से समाहित करने के लिये तमाम खिड़की-दरवाजे खोल दिये हैं तो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के महागठबंधन में शामिल होने का प्रस्ताव लेकर ममता बनर्जी दिल्ली में कांग्रेस के शीर्ष संचालक परिवार सदस्यों से एकांत में बातचीत कर चुकी हैं। सुदूर दक्षिण में द्रमुक के साथ कांग्रेस के तालमेल की रूपरेखा पहले ही तैयार हो चुकी है जबकि जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस भी महागठजोड़ का हिस्सा बनने के लिये पहले से तैयार है। कर्नाटक में जद-एस की नाराजगी को दूर करते हुए कांग्रेस ने उसे किसी भी मसले पर सीधा केन्द्रीय नेतृत्व से संवाद कायम करने की मंजूरी दे दी है और आंध्र प्रदेश व तेलंगाना से लेकर महाराष्ट्र तक में भाजपानीत राजग के खिलाफ दिख रहे तमाम दलों को एकजुट होकर चुनाव लड़ने के लिये मनाया-समझाया जा रहा है। यानि बीते लोकसभा चुनाव में विपक्षी वोटों के बिखराव के कारण महज 32 फीसदी वोट पाकर ही संसद में अपने दम पर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा हासिल कर लेने वाली भाजपा की चैतरफा घेरेबंदी करके यह सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है कि भाजपा को नकारने के लिये पड़नेवाला एक भी वोट विपक्ष के बिखराव के कारण बर्बाद ना हो सके। इस तरह 2019 के आम चुनाव की रणभूमि के लिये व्यूह रचना की निर्णायक रूपरेखा तैयार कर ली गयी है। लेकिन सवाल है कि महारथियों के व्यूह को धारदार व मारक हथियारों से लैस किये बिना सत्ता पक्ष पर जोरदार प्रहार करके उसे परास्त करने की योजना को कैसे सफल किया जा सकता है। इस लिहाज से देखा जाये तो सरकार पर जोरदार प्रहार करने के लिये दमदार मुद्दों के हथियार का चयन करने के मकसद से हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के नतीजे से कोई उत्साहजनक वातावरण नहीं बन पा रहा है। हालांकि समान विचारधारा वाले तमाम दलों को अपने साथ मजबूती से जोड़ने के लिये कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद का लाॅलीपाॅप अपने दरवाजे के बाहर अवश्य लटका दिया है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ा गैर-भाजपाई दल होने के नाते महागठबंधन की धुरी की भूमिका तो कांग्रेस को ही निभानी होगी। क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर प्रसार की बात करें तो कांग्रेस के अलावा बाकी सभी पार्टियों की पहुंच क्षेत्रीय व सूबाई स्तर तक ही सिमटी हुई है। लिहाजा चुंकि राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन बनाकर भाजपा के खिलाफ मजबूत घेराबंदी तैयार करने की जिम्मेवारी कांग्रेस के ही कांधों पर है तो फिर ऐसे मुद्दों के हथियारों का चयन भी उसे ही करना होगा जिसका राष्ट्रव्यापी प्रयोग कर पाना संभव हो। हालांकि इस जिम्मेवारी को निभाते हुए कार्यसमिति की दूसरी बैठक में कांग्रेस ने जिन मुद्दों का चयन किया है उनमें असम के नागरिकता रजिस्टर से 40 लाख लोगों का नाम नदारद होना, फ्रांस से राफेल जहाजों की खरीद में हुआ भ्रष्टाचार, बैंकों में हुई धोखाधड़ी और बढ़ती बेरोजगारी का मसला मुख्य रूप से शामिल है। लेकिन इनमें से एक की भी मारकता ऐसी नहीं दिख रही है जो भाजपा की विश्वसनीयता व स्वीकार्यता के कवच में छेद कर उसके मर्मस्थल को भेदने में सक्षम हो। बल्कि खतरा तो यह है कि कांग्रेस द्वारा चयनित मुद्दों के तमाम हथियार कहीं भाजपा के कवच से टकराकर उल्टा बुमरैंग करके विपक्ष को ही आहत व घायल ना कर दें। मसलन असम के नागरिकता रजिस्टर का मसला भाजपा ने ही विपक्ष को थमाया है लिहाजा विपक्ष जितना इस मुद्दे को तूल देगा उतना ही इससे भाजपा को राष्ट्रीय स्तर फायदा मिलेगा क्योंकि इससे कट्टर राष्ट्रवादी सोच जुड़ी हुई है जिसका प्रसार भाजपा के लिये बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है। इसी प्रकार बैंकों में धोखाधड़ी के आंकड़े भी कांग्रेस के ही खिलाफ हैं क्योंकि पूरा एनपीए घोटाला उसके ही कार्यकाल में हुआ। राफेल के मामले में भी गोपनीयता करार वर्ष 2008 में तत्कालीन रक्षामंत्री एके एंटनी ने किया था जिसके लागू रहते हुए इस पर उठनेवाले तमाम सवालों से भाजपा के पक्ष में जनसंवेदना का निर्माण हो सकता है। रहा सवाल रोजगार का तो इसको लेकर सत्तापक्ष या विपक्ष कुछ भी कहे लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि यह सनातन समस्या है जिसका राजनीतिक स्तर पर पूर्ण निदान नहीं हो पाने की बात सर्वविदित है। यानि समग्रता में देखा जाये तो कांग्रेस ने जिन मुद्दों का चयन किया है उनकी जड़ें या तो उसके ही कार्यकाल की नाकामियों से जुड़ी हैं अथवा मोदी सरकार ने ही उपहार के तौर पर ये मुद्दे उसे सुलभ कराए हैं। ऐसे में यह विश्वास करना तो बेहद मुश्किल है कि इन मुद्दों से मोदी सरकार की स्वीकार्यता या लोकप्रियता में रत्ती भर भी कमी आ पाएगी अलबत्ता यह देखना अवश्य दिलचस्प होगा कि अगर वाकई विपक्ष ने इन्हीं मुद्दों से सरकार पर प्रहार करने की पहल की तो इसके पलटवार का विपक्ष की सेहत पर क्या असर पड़ेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर
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शनिवार, 4 अगस्त 2018
‘समीकरणों की सिद्धांतों से सियासी भिड़ंत’
सियासत की राहों से गुजर कर सत्ता की मंजिल तक पहुंचने के लिये सिद्धांतों की भी उतनी ही जरूरत पड़ती है जितनी समीकरणों की। सिर्फ सिद्धांत के दम पर अगर सियासत को आगे बढ़ाना संभव होता तो महज एक वोट की कमी के कारण लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को हार का सामना नहीं करना पड़ता। लेकिन वह लोग ही और थे जो सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए समीकरणों के सहारे हासिल होनेवाले सियासी लाभ को ठुकरा दिया करते थे। सामान्य तौर पर सियासत में सिद्धांतों और समीकरणों के बीच संतुलित तालमेल से ही आगे बढ़ने की राह निकलती हुई देखी गई है। व्यावहारिकता में ना तो सिर्फ सिद्धांतों से सियासत को आगे बढ़ाना संभव हो सकता है और ना ही सिर्फ समीकरणों के दम पर। बल्कि सियासत के लिये दोनों को एक दूसरे का पूरक कहना ही उचित होगा। लेकिन मसला है कि इन दिनों सिद्धांत और समीकरण आमने-सामने आ गए हैं। जो सिद्धांतों के सहारे आगे बढ़ना चाहते हैं उनका समीकरण गड़बड़ हो रहा है और जिनके हाथों में समीकरण की लाठी है उनकी राहों में सिद्धांतों का उजाला नदारद है। एक पक्ष सिद्धांत के लिये समीकरण की परवाह नहीं करना चाहता जबकि दूसरा पक्ष समीकरण साधने के लिये अपने सिद्धांतों की बलि देने से भी संकोच नहीं कर रहा है। हालांकि दोनों को अपनी राहें सत्ता की मंजिल की ओर ही जाती हुई दिख रही हैं लेकिन ऐसा तो संभव ही नहीं है कि दोनों को एक साथ बहुमत का आंकड़ा हासिल हो जाए। लिहाजा अंतिम फैसला तो जनता-जनार्दन को ही करना होगा कि सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले को अपना आशीर्वाद दिया जाए या समीकरण के सांझा चूल्हे पर सियासी रोटी सेंकने वालों को तरजीह दी जाए। लेकिन जनता का फैसला तो चुनाव के बाद ही आयेगा। फिलहाल तो तात्कालिक नफा-नुकसान के मुताबिक भविष्य का आकलन करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। इस लिहाजा से देखें तो सिद्धांतों को ताक पर रख कर समीकरणों के सहारे सियासी सफलता हासिल करने के प्रयासों को बीते कुछ सालों में जनता ने बुरी तरह नकारा ही है। जब उत्तर प्रदेश में दशकों से गैर-कांग्रेसवाद की राजनति करनेवाली सपा ने विधानसभा चुनाव में समीकरणों को साधने के लिये सिद्धांतों की बलि चढ़ाकर कांग्रेस का हाथ थामने की पहल की तो जनता ने दोनों को सिरे से खारिज कर दिया। जब धुर सैद्धांतिक विरोधी पीडीपी को गले लगाकर भाजपा ने सिद्धांतों को ताक पर रखकर समीकरणों के सहारे जम्मू-कश्मीर की सत्ता हथियाने की पहल की तो एक के बाद एक होनेवाले उप-चुनावों में भगवा खेमे को सिलसिलेवार हार का सामना करना पड़ा। बिहार में नीतीश कुमान ने अपने द्वारा गढ़े गए सिद्धांतों से ही पलटी मारते हुए जब महा-गठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ दोबारा जुड़ने की पहल की तो उसके बाद से जमीनी स्तर पर उनकी पकड़ लगातार कमजोर ही होती जा रही है और अपनी सरकार होते हुए भी उप-चुनावों के मंझधार में राजग की लुटिया डूबती हुई दिख रही है। लेकिन जब धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के धागे से महा-गठजोड़ के समीकरण की गांठ बांधकर यूपी में विरोधियों ने भाजपा को चुनौती दी तो मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में भी कमल मुरझा गया। इन कुछ मिसालों के संकेतों को समग्रता में समझने की कोशिश करें तो सिद्धांतों के लिये समीकरण को ताक पर रखना उतना नुकसानदायक नहीं रहता है जितना समीकरण साधने के लिये सिद्धांतों से मुंह मोड़ना। तभी तो भाजपा ने समीकरण की परवाह किये बगैर सिद्धांतों की राह पर आगे बढ़ना ही मुनासिब समझा है जबकि कांग्रेस समीकरण के लिये अपने सिद्धांतों से समझौते का विकल्प आजमाना बेहतर समझ रही है। खास तौर से असम में तैयार किये जा रहे राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानि एनआरसी के मामले में भाजपा ने राजग के समीकरणों की परवाह किये बगैर अपने पूर्वनिर्धारित सिद्धांतों की राह पर आगे बढ़ना ही बेहतर समझा है। वर्ना भाजपा को भी बेहतर पता है कि इस मसले को तूल दिये जाने से जदयू, लोजपा, रालोसपा व अन्नाद्रमुक सरीखे उसके वे सहयोगी खासे खफा हो सकते हैं जिन्होंने सियासी लाभ के लिये मौके की नजाकत के मुताबिक खुद को ढ़ालते हुए राजग में साझेदारी करना स्वीकार किया है और वक्त बदलते ही उन्हें पलटने में जरा भी देर नहीं लगेगी। यानि राजग में टूट व बिखराव की संभावना को समझते हुए भी भाजपा ने अवैध घुसपैठियों के खिलाफ संघर्ष के सिद्धांत पर कायम रहना बेहतर समझा है। दूसरी ओर एनआरसी के मसले पर कांग्रेस के रूख की बात करें तो विगत में उसका इतिहास भी अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर खदेड़े जाने के पक्ष में ही रहा है लेकिन सियासी समीकरणों को साधने और अल्पसंख्यक व भाजपा विरोधी वोटों का राष्ट्रीय स्तर पर ध्रुवीकरण करने के लिये महा-गठजोड़ कायम करने की आवश्यकता के मद्देनजर उसने फिलहाल अपने पुराने सिद्धांत से दूरी बना लेना ही बेहतर समझा है। हालांकि कांग्रेस अपने इस कदम को धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता और सामंजस्य के सिद्धांतों के प्रति मजबूत निष्ठा के सिद्धांतों पर अपनी अडिगता के तौर पर अवश्य प्रस्तुत करेगी ताकि सिद्धांतों पर कायम रहने का भरम भी बना रहे और समीकरणों को साधने में भी सफलता मिल जाए। लेकिन वास्तव में देखा जाये तो यह टकराव सीधे तौर पर सिद्धांतों और समीकरणों के बीच ही होगा। जिसमें अब हवाएं ही करेंगी रौशनी का फैसला, जिस दिए में जान होगी वह जला रह जाएगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर
सोमवार, 30 जुलाई 2018
‘मजबूत व्यवस्था में पिसता मजबूर आदमी’
राजधानी दिल्ली सिर्फ एक शहर या महानगर नहीं है। यह मिनी भारत भी है। देश का शायद ही कोई ऐसा जिला-जनपद होगा जहां के लोग दिल्ली में ना रहते हों। जाहिर है कि जहां पूरे भारत के लोग रहते हैं वहां देश के हर कोने की सभ्यता, संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान और बोल-वचन ही नहीं बल्कि समूचे देश में जमीनी स्तर पर मौजूद गुण-अवगुण और (सु या कु) व्यवस्था के भी दर्शन होंगे ही। लेकिन होता यह है कि गुण का प्रसार तो बाद में होता है अवगुण अपने पांव काफी तेजी से फैला लेता है। पूरे तालाब को गंदा करने के लिये सिर्फ एक सड़ी हुई मछली ही काफी होती है और समूचे गुलिस्तान को विरान करने के लिये एक ही उल्लू काफी होता है। लेकिन यहां तो समूचे देश का गुण कम और दुर्गुण अधिक आ गया है। तभी तो दिल्ली का दामन दिनों-दिन इस कदर दागदार और तार-तार होता जा रहा है कि अब यह कहने में भी शर्म आने लगी है कि यह दिलवालों की दिल्ली है। सच पूछा जाये तो अब दिल्ली की व्यवस्था के संचालकों में दिल नाम की कोई चीज चिराग लेकर ढूंढ़ने से भी बमुश्किल ही मिल पाती है। देश के बाकी हिस्सों में हालात शायद ही इतने बुरे हों जितने दिल्ली में हैं। यहां आदमी की सुविधा के लिये व्यवस्था नहीं है बल्कि सुविधा के साथ व्यवस्था के संचालन में सहभागी बनना आदमी की विवशता है। यहां आदमी के लिये व्यवस्था नहीं बदलती बल्कि व्यवस्था के मुताबिक आदमी को ढ़लना-बदलना पड़ता है। यहां आदमी की किसी समस्या के लिये व्यवस्था कतई जिम्मेवार नहीं होती, अलबत्ता व्यवस्था की समस्याओं के लिये आदमी को जिम्मेवार अवश्य बताया जाता है। यहां बिना उफ किये चुपचाप व्यवस्था को सहते-ढ़ोते रहना आदमी की अनिवार्य जिम्मेवारी है। हालांकि जो लोग दिल्ली की इस हकीकत से वाकिफ नहीं हैं उनके लिये ये बातें अचरज का सबब हो सकती हैं लेकिन यहां आदमी और व्यवस्था के बीच का रिश्ता महीनों या वर्षों नहीं बल्कि दशकों से ऐसा ही चला आ रहा है। यहां व्यवस्था मजबूत है और आदमी मजबूर। तभी तो एक नीम-पागल मां और दरिद्र रिक्शाचालक पिता की तीन बेटियां भूख से दम तोड़ देती हैं लेकिन इसके लिये पूरी व्यवस्था के किसी भी अंग की जिम्मेवारी तय नहीं होती। हालांकि मौत भूख से हुई है तो राजनीति भी होगी ही। तभी उंगली भी उठ रही है और दोषारोपण भी हो रहा है। कांग्रेस ने केन्द्र की भाजपा और दिल्ली की आप सरकार को जिम्मेवार बताया है। भाजपा, कांग्रेस के शासन में हुए ‘खुल्ला खेल फर्रूखाबादी’ और आप सरकार के नाराकरापन को जिम्मेवार बता रही है। उधर आप सरकार व्यवस्था के सिर पर मामले की जिम्मेवारी का ठीकरा फोड़ रही है। रही व्यवस्था की बात तो उसका तर्क है कि बीते कई सालों से उसके पास कोटा ही खाली नहीं है कि नया राशन कार्ड बन सके। यानि भूख से हुई तीन मासूम बहनों की मौत की शर्मनाक घटना के लिये यहां कोई जिम्मेवार नहीं है। वह भी तब जबकि साल 2013 में संसद ने खाद्य सुरक्षा कानून पारित किया तो लगा कि अब देश में कोई भूखा नहीं सोएगा। सबको भर पेट भोजना अवश्य मिलेगा। लेकिन इस कानून को यहां की व्यवस्था ने इस तरह लागू किया कि भूखे तक तो रोटी पहुंची नहीं अलबत्ता राशन पाने का हक उन्हें मिला जिनके लिये यह राहत नहीं मुनाफा है। व्यवस्था को चढ़ावा चढ़ाने के एवज में हासिल मुनाफा। वैसे बिना चढ़ावे के प्रसाद मिले भी तो कैसे? क्योंकि जिन नियम-कायदों के तहत 15 लाख परिवारों के राशन कार्ड बनाए गए उसमें शर्त रखी गई कि एक लाख सालाना से अधिक आमदनी वाले परिवारों को राशन नहीं दिया जा सकता। साथ ही एक अनिवार्य शर्त थी कि कार्ड उनका ही बनेगा जिनके पास रिहाइश का प्रमाण भी उपलब्ध हो। यानि नियम ऐसा जिसे बिना चढ़ावे के पूरा नहीं किया जा सकता। वर्ना जिसके पास दिल्ली में रिहाइश का प्रमाण पत्र होगा उसकी आमदनी सिर्फ एक लाख सालाना कैसे हो सकती है और जिसकी कमाई सिर्फ एक लाख होगी वह दिल्ली जैसे शहर में परिवार कैसे पाल सकेगा। इस झोल की पोल तब खुली जब राशन वितरण के लिये बायोमैट्रिक व्यवस्था लागू की गई। तब कुल चार लाख कार्डधारक ऐसे गायब हुए कि उनका कुछ अता-पता ही नहीं चला। इनमें डेढ़ लाख कार्डधारक तो ऐसे थे जिन्होंने सालाना 25 हजार की आमदनी दर्शाकर वह अंत्योदय कार्ड हासिल कर लिया जिसमें सामान्य राशन कार्ड के मुकाबले काफी अधिक सरकारी सुविधाएं मिलती हैं। लेकिन इन कार्डों को निरस्त करने की जहमत नहीं उठाई गई क्योंकि दिल्ली की गरीब हितैषी सरकार के संचालकों ने इसमें अड़ंगा लगा दिया। नतीजन जिस मंडावली में तीन बहनों की भूख से मौत हुई है वहां कोटा खाली नहीं होने के कारण वर्ष 2015 से अब तक एक भी नया राशन कार्ड बनाया ही नहीं गया है। यही स्थिति समूची दिल्ली की है। अब ऐसे में अगर कोई पूछे कि इस पूरी अव्यवस्था की जिम्मेवारी किसकी है तो शायद ही इसका कोई जिम्मेवार साबित हो सके। लिहाजा जब भूख से तीन बच्चियों की मौत की खबर सुर्खियों में आती है तो दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री इसका ठीकरा व्यवस्था पर फोड़ते हैं। वैसे एक मिनट के लिये उनकी बात मान भी ली जाए तो सवाल उठता है कि अगर ऐसी व्यवस्था के भरोसे रहना है तो फिर सरकार की क्या जरूरत है? ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर
गुरुवार, 26 जुलाई 2018
बहुत कठिन है डगर ‘संप्रग’ की....
कहने को भले ही अगली लोकसभा का गठन होने में दस महीने का वक्त बाकी हो लेकिन तमाम राजनीतिक दलों ने अभी से चुनावी बिसात पर अपनी गोटियां जमाने का काम युद्धस्तर पर आरंभ कर दिया है। जाहिर है कि कांग्रेस भी इसमें पीछे रहने का जोखिम नहीं उठा सकती है। लेकिन मसला है कि अब तक अमल में लायी जा रही रणनीतियां व कूटनीतियां जिस तरह से विफल होती दिख रही हैं उसके बाद अब नए सिरे से परिस्थितियों को अपने मन मुताबिक ढ़ालना और मोदी सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विकल्प प्रस्तुत करना बेहद मुश्किल हो गया है। आलम यह है कि अव्वल तो अपने दम पर चुनावी भवसागर में उतरने पर डूबने का खतरा स्पष्ट दिख रहा है और दूसरे जिन छोटे-बड़े दलों को समेट-गूंथ कर संप्रग की नैया के निर्माण की योजना बनाई गई थी वह योजना भी परवान नहीं चढ़ पा रही है। ऐसे में अब अंतिम उपाय के तौर पर नैया के खिवैया का पद रिक्त रखने के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं बचा है ताकि पद प्राप्ति के लोभ में सभी संगी-साथी मजबूती से आपस में जुड़े रहें और भाजपा के अन्य विरोधियों को भी यही लोभ-मोह दिखाकर संप्रग के साए तले एकत्र होने के लिये सहमत किया जा सके। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने तय किया है कि वह प्रधानमंत्री पद के लिये अपनी दावेदारी की जिद पर नहीं अड़ेगी बल्कि नेतृत्व के मसले पर अब आमसहमति से ही अंतिम फैसला किया जाएगा। हालांकि सच तो यही है कि कांग्रेस ने बड़े दिल या बड़प्पन का प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस ने यह फैसला नहीं किया है। बल्कि यह काफी हद तक ऐसा ही त्याग है जैसा वर्ष 2004 में सोनिया गांधी ने संप्रग को बहुमत मिलने के बाद प्रधानमंत्री पद का परित्याग करके किया था। उस वक्त प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने से परहेज बरतना सोनिया की मजबूरी थी और मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी छोड़ना कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की विवशता है। तब स्वीकार्यता आड़े आयी थी और अब संप्रग के पुनर्गठन की चुनौती है। वर्ना राहुल के नेतृत्व को गैर-भाजपाई विपक्ष के अधिकांश दला़ें ने काफी हद तक नकार दिया है। राहुल का चेहरा आगे करके चुनाव लड़ने की कांग्रेस की जिद के कारण ही अब तक संप्रग के एकीकरण की राह तैयार नहीं हो पाई है। इसी जिद के कारण विपक्षी खेमे के अधिकांश ऐसे दलों ने कांग्रेस से दूरी बढ़ानी शुरू कर दी जो वर्ष 2004-2014 के दौरान लगातार कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के साझीदार व समर्थक रहे थे और आज भी भाजपा के साथ उनका कोई तालमेल नहीं है। लेकिन संप्रग की नैया का राहुल को खिवैया बनाने की कांग्रेस की जिद ने गठजोड़ के पुराने घटक व समर्थक दलों के आपसी तालमेल व परस्पर विश्वास को अंदरूनी तौर पर इतना कमजोर कर दिया कि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर पूरे दिन चली चर्चा के बाद देर रात हुए मतदान के दौरान कांग्रेस से अलग दिखने की कोशिशों के तहत ही शरद पवार की राकांपा और चंद्रशेखर राव की टीआरएस ने मतदान की प्रक्रिया में शिरकत करने से ही परहेज बरत लिया। दरअसल कांग्रेस के हाथों में समूचे विपक्ष का नेतृत्व सौंपने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सहमति का माहौल बनता नहीं दिख रहा है। महाराष्ट्र की एनसीपी, तमिलनाडु की अन्ना द्रमुक, ओडिशा की बीजद, तेलंगाना की टीआरएस और आंध्र प्रदेश की टीडीपी सरीखी स्थानीय स्तर पर बेहद ताकतवर समझी जानेवाली उन पार्टियों को अपने साथ जोड़कर राष्ट्रव्यापी महा-गठजोड़ बनाना भी कांग्रेस के लिये बड़ी चुनौती बन गयी है जो किसी भी सूरत में भाजपानीत राजग के साथ चुनावपूर्व गठजोड़ कायम नहीं कर सकते। यहां तक कि उत्तर प्रदेश और बिहार में महा-गठजोड़ का प्रयोग पूरी तरह सफल रहने के बावजूद एक ओर बसपा सुप्रीमो मायावती ने ऐलान कर दिया है कि सम्मानजनक संख्या में सीटें मिलने पर ही वे साझेदारी में चुनाव लड़ने का प्रस्ताव स्वीकार करेंगी और दूसरी ओर बिहार में राजद के शीर्ष संचालक कहे जानेवाले तेजस्वी यादव ने भी बता दिया है कि विपक्ष में प्रधानमंत्री पद के लिये राहुल के अलावा और भी चेहरे उपलब्ध हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। इसके अलावा कर्नाटक में भी कुमारस्वामी द्वारा सार्वजनिक तौर पर आंसू बहाये जाने, गठबंधन की सरकार चलाने में पेश आ रही परेशानियों की तुलना जहर के घूंट से किये जाने और एचडी देवेगौड़ा द्वारा चुनाव पूर्व गठजोड़ को अव्यावहारिक बताये जाने के बाद यह संभावना बेहद कम दिख रही है कि वहां संप्रग की सरकार होने के बावजूद लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ कोई मजबूत महा-गठजोड़ आकार ले पाएगा। यानि कांग्रेस को अब मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात व पंजाब सरीखे उस सूबों में अपने बलबूते पर ही कोई करिश्मा कर दिखाना होगा जहां उसकी भाजपा से सीधी टक्कर होने वाली है और तीसरी ताकत के लिये कोई जगह ही नहीं है। ऐसे में देश की मौजूदा सियासी तस्वीर को समग्रता में समझने की कोशिश करें तो अगले चुनाव में विपक्षी महा-गठजोड़ बनाकर गैर-भाजपाई वोटों का राष्ट्रीय स्तर पर बिखराव रोकने की तमाम कोशिशें नाकाम होती दिख रही हैं। ऐसी सूरत में होगा यह कि जिन सीटों पर भाजपा का मुकाबला किसी गैर-कांग्रेसी दल से होगा वहां ना चाहते हुए भी कांग्रेस ही भाजपा को लाभ पहुंचाएगी क्योंकि ऐसी सीटों पर गैर-भाजपाई वोटों में कांग्रेस के कारण ही बिखराव होगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर
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सोमवार, 23 जुलाई 2018
‘नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या...???’
अमरोहा में जन्मे उर्दू के महान शायर जाॅन एलिया भले ही हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में रह-बस गए लेकिन उनकी कलम से एक ऐसी गजल निकली जो पूरी तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के दिल की आवाज बनने के काबिल है। जाॅन लिखते हैं कि- ‘‘उम्र गुजरेगी इम्तहान में क्या? अब भी हूं मै तेरी अमान में क्या? मेरी हर बात बेअसर ही रही, नुक्स है कुछ मेरे बयान में क्या? मुझको तो कोई टोकता भी नहीं, यही होता है खानदान मे क्या? बोलते क्यो नहीं मेरे अपने, आबले पड़ गये जबान में क्या?’’ राहुल वाकई बीते लंबे समय से इसी मसले से जूझ रहे हैं। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता कि कोई जान-बूझकर ऐसी बातें और हरकतें करे जिससे उसकी किरकिरी हो, फजीहत हो। लिहाजा लग यही रहा है कि अव्वल तो राहुल को यह पता नहीं चल रहा कि उनसे क्या गलती हो रही है और दूसरे जिन लोगों पर फीडबैक पहुंचाने और सही सलाह देने की जिम्मेवारी है वे अपने कर्तव्य को इमानदारी से अंजाम नहीं दे रहे हैं। नतीजन उनकी जायज व वाजिब बातें भी उनकी हरकतों व गलतियों के बोझ तले दम तोड़ रही हैं। ऐसी ही तस्वीर दिखी लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भी। यूं तो राहुल ने कितना सच बोला और किस हद तक झूठ का सहारा लिया इस पर अलग से बहस हो सकती है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि उनका भाषण काफी नपा-तुला, ओजस्वी, आक्रामक और धारदार था। अपने संबोधन को भावनात्मक रूप देते हुए युवाओं, महिलाओं, दलितों व अल्पसंख्यकों को संदेश देने में भी वे सफल रहे। मोदी सरकार की रीति-नीति पर प्रहार करते हुए यह साबित करने की कोशिश भी कामयाब रही कि किस तरह सरकार चुनिंदा उद्योगपतियों को भरपूर लाभ पहुंचाने के लिये आम लोगों की जेब से पैसा निचोड़ रही है। यानि कुल मिलाकर उनका भाषण ठीक वैसा ही था जिसकी मुख्य विपक्षी दल के शीर्ष नेता से अपेक्षा रहती है। लेकिन पूरा गुड़ गोबर हो गया उनकी हरकतों से। उन्होंने कुछ ऐसी हरकतें कर दीं जिसे कतई मर्यादित, संसदीय, अपेक्षित या अनुकरणीय नहीं कह सकते। तभी उनका भाषण हाशिये पर रह गया और हरकतों के कारण उनकी जमकर आलोचना हो रही है। पहली गलती यह हुई कि जब उन्होंने राफेल विमान सौदे को लेकर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पर गलतबयानी का आरोप लगाया तब अपनी सफाई देने के लिये तुरंत निर्मला खड़ी हुईं लेकिन राहुल ने उन्हें बोलने का मौका ना देते हुए अपना भाषण लगातार जारी रखा। जबकि परंपरा है कि अगर संसद में कोई मंत्री कुछ कहने के लिये खड़ा होता है तो उस समय बोल रहा सदस्य तत्काल चुप होकर बैठ जाता है। लेकिन राहुल ने ऐसा नहीं किया। हालांकि इसके लिये लोकसभा अध्यक्षा ने राहुल को सभ्य भाषा में मर्यादा और परंपरा की याद भी दिलाई लेकिन राहुल की कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। इसके बाद दूसरी गलती उन्होंने अकाली दल की सांसद व केन्द्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के बारे यह कहके कर दी कि भाषण में व्यवधान के दौरान जब सदन की कार्रवाई कुछ मिनटों के लिये स्थगित हुई तब वे उनकी ओर मुस्कुराते हुए देख रही थीं। जाहिर है कि किसी महिला के लिये ऐसी बात कहना हर लिहाज से बेहद गलत व अमर्यादित आचरण ही कहा जाएगा। तभी बिफरते हुए हरसिमरत ने उनसे पूछ लिया कि आज वे कौन सा नशा करके आए हैं? इसके बाद सबसे बड़ी गलती राहुल ने प्रधानमंत्री मोदी के गले लगने के बहाने उनके गले पड़कर की। गले लगना तो तब कहेंगे जब दो लोग एक साथ गले मिलने के लिये अपनी बांहें फैलाएं। लेकिन जब किसी बैठे हुए आदमी के पास जाकर कोई अचानक उसके गले में बांहों का फंदा डालकर उससे चिपट जाए तो इसे गले पड़ना कहा जाएगा। वैसे भी संसद के भीतर इस तरह के आचरण को कतई सामान्य, शिष्ट या संसदीय नहीं माना जा सकता। तभी इसके लिये लोकसभा अध्यक्षा की ओर कड़ी बात भी कही गई और हरसिमरत को भी यह कहने का मौका मिल गया कि यह मुन्नाभाई का मंच नहीं है जहां पप्पी-झप्पी डाली जाए। राहुल की इस हरकत को राजनाथ सिंह ने भी चिपको आंदोलन का नाम देकर चुटकी लेने में कसर नहीं छोड़ी। लेकिन सबसे आखिर में राहुल ने बेहद ही बचकाने तरीके से आंख मारकर यह जताने की जो कोशिश की कि मानो ऐसी हरकतें करके उन्होंने कोई बड़ा मैदान मार लिया हो वह सबसे अफसोसनाक था। इसका सीधा सा मतलब है कि उन्हें अपनी हरकतों का कोई अफसोस नहीं है और वे कतई यह नहीं मान सकते हैं कि उनसे कोई गलती हुई है। हालांकि लोकसभा अध्यक्षा ने बाद में राहुल को अपने बेटे जैसा बताते हुए उनकी गलतियों को बचपना समझ कर अनदेखा करने की पहल अवश्य की लेकिन यह बचपना था, मासूमियत थी, सरासर बदमाशी या आत्ममुग्धता की निशानी? आत्ममुग्धता इसलिये क्योंकि तमाम गलतियों के बाद राहुल की जुबान से साॅरी का एक छोटा सा औपचारिक अल्फाज भी नहीं निकला। बल्कि वे अपनी हरकतों पर अभीभूत होकर अपने पक्ष के सांसदों की ओर देखकर आंख मारते नजर आए। इस पूरे प्रकरण से हुआ यह है कि विरोधियों द्वारा उनकी पप्पू की जो छवि बनायी जाती रही है उसे इन्होंने खुद ही पूरी मजबूती से स्वीकार व अंगीकार कर लिया है जिसके लिये सिर्फ अफसोस ही जताया जा सकता है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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गुरुवार, 19 जुलाई 2018
‘विश्वास को परखने के लिए अविश्वास का प्रस्ताव’
एक बार फिर संसद में सरकार के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया है। भारतीय संसद के इतिहास का पहला अविश्वास प्रस्ताव वर्ष 1963 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार के खिलाफ लाया गया था और अंतिम बार वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को अविश्वास के प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। उसके डेढ़ दशक बाद यह 27वीं बार है जब भारतीय संसद अविश्वास प्रस्ताव की साक्षी बनने जा रही है। इसमें दिलचस्प बात यह है कि अब तक केवल एक ही बार ऐसा मौका आया जब अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में अधिक वोट पड़ जाने के कारण सरकार को सत्ता से हटना पड़ा। वर्ना तमाम अविश्वास प्रस्तावों का इतिहास असफलता का ही रहा है। इस बार भी कोई नया इतिहास लिखे जाने की उम्मीद ना तो विपक्ष को है और ना ही सत्ता पक्ष को। भले ही श्रीमती सोनिया गांधी ने सवालिया लहजे में पूछा हो कि कौन कहता है कि उनके पास संख्याबल नहीं है। लेकिन उन्हें भी बेहतर पता है कि चिराग लेकर ढ़ूंढ़ने से भी शायद ही कोई मिले जो यह स्वीकार करे कि लोकसभा में विपक्ष के पास मोदी सरकार को धूल चटाने के लिये आवश्यक संख्याबल उपलब्ध है। उधर सरकार की ओर से अनंत कुमार ने खम ठोंकते हुए कह दिया है कि शुक्रवार को सुबह ग्यारह बजे से आरंभ होने जा रहे अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के बाद शाम छह बजे जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपना जवाब प्रस्तुत करेंगे तो उसके बाद होने वाले मत विभाजन में निश्चित ही विपक्षी खेमे से भी सरकार के पक्ष में काफी वोट पड़ेंगे। यानि विपक्ष की कोशिश है सत्ता पक्ष में सेंध लगाने की और सरकार का दावा है कि वह विपक्षी एकता की कलई खोल देगी। लेकिन इन दावों की गहराई से पड़ताल करें तो वास्तव में यह कहने भर का ही अविश्वास प्रस्ताव नजर आ रहा है बल्कि इसके पीछे अपने विश्वास को मजबूत करने का प्रयास ही छिपा हुआ दिख रहा है। विपक्ष का अपना अलग विश्वास है और सत्ता पक्ष का अपना अलग। आखिर सरकार ने मानसून सत्र के पहले ही दिन अविश्वास प्रस्ताव को स्वीकार करने की जो पहल की है वह केवल अपने संख्याबल के विश्वास को परखने के लिये हर्गिज नहीं की है। मोदी सरकार के शीर्ष संचालकों को तो यह पहले से ही पता है कि इस समय लोकसभा के कुल 534 में से 273 सांसद भाजपा के ही हैं और राजग के घटक दलों के संख्याबल को भी जोड़ लिया जाए तो आंकड़ा 314 तक पहुंच जाता है। यानि सरकार के पास पूर्ण बहुमत के लिये आवश्यक संख्या से काफी अधिक सांसदों का समर्थन उपलब्ध है। इसके बाद भी अगर सरकार ने संसद के बीते सत्र में टीडीपी की भारी मांग के बावजूद उसे संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने का मौका नहीं दिया और इस सत्र के पहले ही दिन उसकी मांग को एक ही झटके में स्वीकार कर लिया है तो इसके पीछे निश्चित ही गहरी कूटनीति छिपी हुई है। दूसरी ओर विपक्ष भी अपनी ताकत से कतई अनभिज्ञ नहीं है। तभी तो सपा के प्रधान महासचिव रामगोपाल यादव ने बेलाग लहजे में कहा है कि विपक्ष के पास भले ही सरकार गिराने के लिये आवश्यक नंबर नहीं है लेकिन इस अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा से सरकार को सवालों के कठघरे में खड़ा करने की सुविधा मिलेगी और सवालों का जवाब देने से सरकार बच नहीं पाएगी। यानि विपक्ष का मकसद भी अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से सरकार गिराना नहीं बल्कि अपनी बात को दूर तक पहुंचाना है जबकि सरकार का मकसद भी विपक्ष से अपना बचाव करना नहीं है बल्कि अविश्वास प्रस्ताव को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करके विपक्ष को ऐसी चोट पहुंचाना है जिससे वह आगामी चुनावों तक हर्गिज संभल ना सके। दरअसल यह लड़ाई अपनी जीत सुनिश्चित करने की नहीं बल्कि अपने उस विश्वास को मजबूत करने की है जिसके तहत हर पक्ष आगामी चुनावों का ताना-बाना बुन रहा है। कांग्रेस की कोशिश है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एक ऐसा महा-गठजोड़ तैयार किया जाये ताकि भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोक कर मोदी सरकार की वापसी की संभावनाओं पर विराम लगाया जा सके। दूसरी ओर सरकार की कोशिश है कि महा-गठजोड़ के प्रयास को प्रायोगिक स्तर पर ही इस कदर कमजोर कर दिया जाए कि विपक्षियों के बीच साथ मिल कर चुनाव लड़ने के लिये आवश्यक आपसी विश्वास की जमीन ही खिसक जाए। इसी प्रकार विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के माध्यम से अपने तमाम आरोपों को देश के समक्ष रखने और संसद के रिकार्ड में दर्ज कराने में कामयाबी मिलेगी जबकि सरकार को सहूलियत होगी कि वह अपने चार साल के कामकाज का पूरा हिसाब किताब संसद के माध्यम से जनता जनार्दन के समक्ष प्रस्तुत कर सके। इसके अलावा विपक्ष का प्रयास होगा कि सत्ता पक्ष में सेंध लगाकर भाजपा के समर्थकों व संगी-साथियों की तादाद में कमी लाए और देश को यह बताए कि राजग की एकता व मजबूती का दावा किस कदर खोखला है जबकि सरकार का प्रयास होगा कि वह विपक्षी खेमे में सेंध लगाकर विरोधियों के आत्मबल को इस कदर कमजोर कर दे कि वे अपनी जीत के विश्वास के प्रति आश्वस्त होकर चुनाव लड़ने की स्थिति में ही ना आ सकें। यानि समग्रता में देखें तो इस अविश्वास प्रस्ताव का मतलब कुछ और है, मकसद कुछ और। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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सोमवार, 16 जुलाई 2018
‘बड़े की जगह पर बेहतर का चयन’
क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर और अभिनेत्री रेखा के अलावा देश की सबसे अमीर महिलाओं में गिनी जानेवाली अनु आगा व नेहरू-गांधी परिवार के सबसे विश्वासपात्र वकीलों में शुमार किये जानेवाले के. पराशरण का कार्यकाल पूरा होने के बाद उनके स्थान पर राज्यसभा के लिये मनोनीत किये जाने वाले नामों को देखकर तो यही लगता है कि इनको आगे लाने में ठोस सियासी समीकरणों के अलावा इस बात का भी खास ध्यान रखा गया है कि पूर्ववर्ती मनोनीत सांसदों की तरह ये निष्क्रिय ना रहें। हालांकि इन चारों के नामों पर अंतिम मुहर लागने से पहले यह विकल्प भी उपलब्ध था कि पिछली सरकार की तरह बड़े नामों व चमकदार चेहरों को आगे बढ़ाकर समाज के उच्च व अभिजात्य वर्ग की वाहवाही लूटी जा सके। बताया जाता है कि कुछ बड़े व स्वनाम धन्य लोगों को राज्यसभा के लिये मनोनीत करने पर विचार भी किया गया लेकिन आखिरकार यही तय हुआ कि ऐसे लोगों को संसद की सदस्यता दी जाये जो सदन की बैठकों में सक्रियता के साथ शामिल हों ताकि उनके अनुभव व ज्ञान का देश व समाज को लाभ मिले। साथ ही राजनीतिक व सैद्धांतिक समीकरणों का असर भी मनोनीत सांसदों की सूची पर स्पष्ट दिख रहा है क्योंकि जिन राज्यों में जिस तबके के बीच सत्तारूढ़ भाजपा को अपनी पैठ बढ़ानी व बनानी है उसका भी इन नामों के चयन में खास ध्यान रखा गया है। वास्तव में देखा जाये तो रेखा या सचिन जैसे बड़े व चमकदार नामों को संसद के लिये मनोनीत किये जाने से देश व समाज को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। अव्वल तो इन्होंने सदन की बैठकों में नाम मात्र के लिये ही उपस्थिति दर्ज कराई और दूसरे पूरे कार्यकाल के दौरान ये लोग काफी हद तक निष्क्रिय ही बने रहे। आंकड़े बताते हैं कि छह साल के कार्यकाल के दौरान रेखा की महज पांच फीसदी जबकि सचिन सिर्फ सात फीसदी ही सदन की बैठकों में उपस्थिति दर्ज हुई। इनके पास इतनी फुर्सत ही नहीं होती थी कि सांसद के तौर पर ये सदन की बैठक में शामिल हो सकें। वह भी तब जबकि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश व समाज के हित में सार्थक काम करने का मौका मुहैया कराते हुए संसद ने रेखा को वर्ष 2016 में फूड, कंज्यूमर अफेयर्स और पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन की समिति का और सचिन को भी उसी वर्ष इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से जुड़ी समिति का सदस्य भी बनाया लेकिन इस अवसर का उपयोग करने की भी उन्होंने कोई जरूरत महसूस नहीं की जिसके कारण समिति में उनके योगदान का कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा सांसद होने के नाते सरकार से सवाल पूछना और जनहित के विधेयक पेश करना भी उनकी जिम्मेवारी थी लेकिन रेखा ने तो दिखाने या गिनाने के लिये भी कभी कोई सवाल नहीं पूछा अलबत्ता सचिन ने जरूर पूरे छह साल में तकरीबन दो दर्जन सवाल पूछे। जाहिर है कि ऐसे में बड़े नामों व चमकदार चेहरों को सांसद के तौर पर मनोनीत करने से देश व समाज का कितना भला होता यह शायद ही किसी को अलग से बताने की जरूरत पड़े। उनके स्थान पर जिन लोगों को इस बार सरकार की सिफारिश व राष्ट्रपति की मंजूरी से राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया है उनसे यह उम्मीद करना कतई गलत नहीं होगा कि वे ना सिर्फ सदन में पूरी तरह अपनी सक्रियता दिखाएंगे बल्कि अपनी मुखर व प्रखर सोच व व्यक्तित्व का लाभ देश व समाज को भी पहुंचाएंगे। इस बार जिन चार नामों का चयन किया गया है उनमें यूपी के सोनभद्र जिले के रॉबर्ट्सगंज लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से तीन बार सांसद रहे रामशकल जाने-माने किसान नेता व दलित विचारक हैं जबकि राकेश सिन्हा राष्ट्रवादी विचारों को मीडिया के माध्यम से प्रखरता के साथ प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। इसी प्रकार महाराष्ट्र की सोनल मानसिंह ना सिर्फ मशहूर नृत्यांगना व पद्म विभूषण, पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हैं बल्कि मुखर-प्रखर वक्ता व विचारक के तौर पर भी जानी जाती हैं। इसी प्रकार ओडिशा के जाने-माने पाषाण-मूर्तिकार रघुनाथ महापात्रा के ज्ञान, दक्षता व लोकप्रियता को लेकर हर्गिज शक-सुबहा नहीं किया जा सकता है। यानि ये चारों नाम ऐसे हैं जिनसे संसद में व्यापक सक्रियता की उम्मीद करना कतई गलत नहीं होगा। साथ ही इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन चारों का चयन करने से सरकार को लेकर उस तबके के बीच सकारात्मक संदेश प्रसारित होगा जिसका सीधा राजनतिक लाभ भाजपा को ही मिलेगा। जहां एक ओर रामशकल को आगे लाकर यूपी के किसानों व दलितों का संसद के ऊपरी सदन में प्रतिनिधित्व दिखाया व बढ़ाया गया है वहीं भाजपा की मातृ संस्था आरएसएस के मुखर विचारक व कायस्थ समाज के बिहारी प्रतिनिधि के तौर पर राकेश सिन्हा को आगे किए जाने का राजनीतिक संदेश भी दूर तक जाना तय ही है। इसके अलावा सोनल मानसिंह का नाम महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल से लेकर दक्षिण भारत तक में मौजूद कला व संस्कृति में रूचि रखने वालों के बीच सकारात्मक संदेश देने वाला है जबकि महापात्रा की प्रसिद्धि ओडिसा में भाजपा के प्रति भावनात्मक जुड़ाव की राह तैयार करेगी। कुल मिलाकर इस बार बड़े के बजाय बेहतर नामों के चयन की जो पहल हुई है वह सियासी नजरिये से भी लाभदायक है और इनसे देश व समाज को भी भरपूर लाभ मिलने से कतई इनकार नहीं किया जा सकता। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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मंगलवार, 26 जून 2018
‘इतनी मासूम दुश्मनी पर दोस्ती कुर्बान’
दोस्ती वह होती है जो खुशी, सहारा व ताकत दे और आपसी हितों को सुरक्षित करे। जबकि दुश्मनी में तो दुखी करने, सहारा छीनने, कमजोर करने और नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जाती है। लेकिन जब दुश्मनी करने वाले एक दूसरे का नुकसान करने के बजाय परस्पर लाभ पहुंचाते दिखने लगें तो ऐसे रिश्ते की असलियत व हकीकत को लेकर जो असमंजस की स्थिति उत्पन्न होती है वही इन दिनों बीजेपी और पीडीपी के मौजूदा रिश्तों में भी दिख रही है। कहने को तो बीजेपी ने पीडीपी की महबूबा सरकार से समर्थन वापस ले लिया है और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अल्पमत में आने के बाद त्यागपत्र भी दे दिया है। गठबंधन टूटने के बाद दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला है और दोनों अपने पक्ष को सही बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। महबूबा सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान करते वक्त बीजेपी ने स्पष्ट शब्दों में आरोप लगाया कि सूबे में शांति और विकास के लिये बनाई गई गठबंधन की सरकार अपने मकसद को हासिल करने में नाकाम रही है नतीजन इस सरकार को आगे भी बरकरार रखने का कोई औचित्य नहीं था। दूसरी अरो शांति और विकास का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाने के बीजेपी के आरोप पर तो पीडीपी ने चुप्पी साध ली लेकिन पूरे मामले पर अपना पक्ष रखते हुए यह अवश्य कहा कि बीजेपी के साथ सहमति के आधार पर ही महबूबा ने सरकार चलाई लेकिन चुंकि उन्होंने सख्ती के बजाय वार्ता के माध्यम से शांति स्थापना का प्रयास किये जाने और धारा 370 को किसी भी हालत में नहीं हटाए जाने की बात पर जोर दिया इसी वजह से बीजेपी ने सरकार से समर्थन वापस लिया है। सरकार गिरने के बाद महबूबा ने अपनी उपलब्धियां भी गिनाईं कि उनके ही प्रयासों से बीजेपी ग्यारह हजार पत्थरबाज युवाओं पर से मुकदमा वापस लेने, रमजान के दौरान एकतरफा युद्धविराम घोषित करने और चाह कर भी जम्मू कश्मीर से 370 नहीं हटाने पर मजबूर हुई। हालांकि गठबंधन टूटने के बाद शुरूआती दौर में सामने आए दोनों पक्षों के बयानों से एक बार भी यह महसूस नहीं हुआ कि अचानक सरकार से समर्थन वापस लेने के बीजेपी के एकतरफा फैसले से पीडीपी को हताशा या निराशा हुई है अथवा महबूबा सरकार की जनविरोधी रीति-नीति से दुखी होकर बीजेपी ने यह कदम उठाया क्योंकि इसके अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा था। ना तो बीजेपी ने महबूबा सरकार की रीति-नीति की बखिया उधेड़ने की पहल की और ना ही पीडीपी ने बीजेपी पर राजनीतिक लाभ के लिये विश्वासघात करने का आरोप लगाया। यानि सतही तौर पर यही तस्वीर उभरी कि शांति और विकास का लक्ष्य पूरा नहीं होने के कारण बीजेपी ने खुद को महबूबा सरकार से अलग किया है और सूबे में राज्यपाल शासन लागू करके सख्ती से आतंकवाद को कुचलने का फैसला किया है क्योंकि महबूबा के मुख्यमंत्री रहते सुरक्षाबलों को एक सीमा से अधिक छूट देना संभव नहीं हो पा रहा था। लेकिन गहराई से परखने पर ऐसा लगता है कि दोनों दलों ने परस्पर लाभ के लिये आपसी सहमति से सरकार बनाई भी थी और आपसी रजामंदी से ही सरकार गिराई भी है। तभी तो दोनों ओर से ऐसे ही बयान सामने आए हैं जिससे कश्मीर घाटी में पीडीपी के पक्ष में विश्वास और सहानुभूति की लहर पैदा हो और सूबे के जम्मू व लद्दाख क्षेत्र सहित देश के बाकी हिस्सों में भाजपा पर लोगों का यकीन बढ़े। वैसे भी कश्मीर घाटी में भाजपा का कोई जनाधार नहीं है जबकि घाटी के बाहर पीडीपी का कोई ‘नाम लेवा पानी देवा’ नहीं है। लिहाजा दोनों दलों के बीच आई दूरी के बावजूद अगर दोनों पक्ष ऐसे ही आरोप लगा रहे हैं और ऐसे ही तथ्य सामने ला रहे हैं जिससे अपने प्रभाव वाले इलाकों में दोनों उसका लाभ उठा सकें तो जाहिर है कि इसे दुश्मनी की नजाकत, मासूमियत और शराफत के नजरिये से ही देखा जाएगा। लेकिन सवाल है कि अगर यह दुश्मनी का स्वरूप है तो फिर आखिर दोस्ती किसे कहते हैं? वैसे दुश्मनी इतनी प्यारी-न्यारी हो तो दोस्ती की जरूरत भी क्या है। तभी तो अपने जम्मू दौरे में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी महबूबा पर उतना ही आरोप लगाया जो घाटी में पीडीपी के लिये फायदेमंद हो और बाकी जगह बीजेपी को उसका लाभ मिले। अगर अमित शाह ने विकास की रकम भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने या गबन-हजम कियेे जाने का आरोप लगाया होता तो पीडीपी की छवि खराब होती। लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि महबूबा सरकार ने सिर्फ कश्मीर घाटी के विकास पर ध्यान दिया और जम्मू व लद्दाख क्षेत्र के साथ सौतेला व्यवहार किया जिसके चलते सूबे के समग्र विकास का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया। जाहिर है कि जब दुश्मनी होने के बाद भी बीजेपी यह प्रमाणपत्र दे रही है कि सूबे के बाकी हिस्सों को छोड़कर महबूबा सरकार ने सिर्फ घाटी के हित में काम किया तो इससे घाटी में महबूबा के प्रति लोगों के स्नेह व विश्वास में वृद्धि होना स्वाभाविक ही है। खैर, तीन साल तक दोस्ती का फायदा उठाने के बाद अब दुश्मनी करके एक-दूसरे को लाभ दिलाने का प्रयास किस हद तक सफल होगा यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन जनता को मूर्ख समझने वाले चतुर-सुजान को यह नहीं भूलना चाहिये कि- खैर खून खांसी खुशी वैर प्रीत मद्यपान, रहिमन दाबे ना दबे जानत सकल जहान। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया। @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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बुधवार, 6 जून 2018
‘‘डरे हुए हैं डराने वाले...’’
अक्सर यह देखा गया है कि जो दूसरों को डराने की कोशिश करता है वह भीतर से खुद ही डरा हुआ होता है। जो डरा हुआ नहीं होगा उसे दूसरे को डराने की जरूरत ही क्या है। लिहाजा अगर कोई किसी को डराने की कोशिश करता हुआ दिखाई दे तो आंखें मूंद कर यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि अपने डर को छिपाने के लिये ही दूसरे को डराने का प्रयास किया जा रहा है। डर के इसी मनोविज्ञान के कारण आक्रमण को ही बचाव के सबसे कारगर हथियार के तौर पर मान्यता मिली हुई है। लिहाजा सत्य को समझने व परखने के लिये आवश्यक है कि सतह पर चल रही गतिविधियों को यथा रूप में स्वीकार करने के बजाय गहराई में उतर कर मामले की असली वजह को जाना जाये और उसके बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जाये। देश की मौजूदा राजनीतिक गतिविधियों को अगर इस नजरिये से देखें तो सतह की तस्वीर राजग की सेहत व एकजुटता के लिहाज से बेहद ही खराब दिखाई पड़ रही है। आलम यह है कि राजग के मौजूदा स्वरूप में निर्णायक भूमिका निभा रहे दलों ने इन दिनों भाजपा को धमकाने-डराने का अभियान सरीखा छेड़ दिया है। शिवसेना ताल ठोंक कर अकेले दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है जबकि जदयू ने भी भाजपा की रीति-नीति से अलग रूख प्रदर्शित करना आरंभ कर दिया है। यूपी में ओमप्रकाश राजभर के सुर भी असहमति दर्शा रहे हैं और रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा भी अंदरूनी तौर पर भाजपा से भरे बैठे हैं। लेकिन सवाल है कि आखिर यह सब हो क्यों रहा है। कहने को भले ही शिवसेना मोदी सरकार पर मतदाताओं से किये गये वायदे तोड़ने और मूल वैचारिक सिद्धांतों को छोड़ने का आरोप लगा रही हो जबकि जदयू द्वारा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने का राग आलापा जा रहा हो लेकिन गहराई से परखा जाये तो यह सब दिखावा अपने डर को छिपाने के लिये ही किया जा रहा है। ऐसी ही आड़ लेकर बीते दिनों टीडीपी भी राजग से अलग हुई थी। वह भी तब जबकि टीडीपी की मांग के अनुरूप आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का कागजी सर्टीफिकेट भले ही नहीं दिया गया लेकिन जहां तक विशेष राज्य के तौर पर योजनाओं की सौगात देने की बात है तो उसमें केन्द्र ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इसके बावजूद अगर टीडीपी ने राजग से अलग होने का फैसला किया तो इसकी मुख्य वजह स्थानीय राजनीति में अपनी ढ़ीली पड़ती पकड़ और अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच अस्वीकार्यता का डर ही था। यही हाल महाराष्ट्र में शिवसेना का है जो आज भी यह स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं है कि अब उसकी औकात इतनी बड़ी नहीं बची है कि वह सूबे में सबसे अधिक सीटों पर दावा कर सके या प्रदेश में राजग की कमान अपने हाथों में रख सके। यही वजह है कि उसने सीटों पर तालमेल नहीं होने के कारण ही महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव भी भाजपा से अलग होकर लड़ा था और अब लोकसभा चुनाव भी अपने दम पर लड़ने की बात कह रही है। हालांकि आज भी शिवसेना को कहीं ना कहीं यह उम्मीद है कि दबाव में आने पर भाजपा उसका वर्चस्व अवश्य स्वीकार कर लेगी और महाराष्ट्र की राजनीति में उसे बड़े भाई के तौर पर दोबारा स्वीकार करके उसे अपने से अधिक सीटें अवश्य देगी। इसी उम्मीद में उसने आज तक राजग का दामन नहीं छोड़ा है और प्रदेश से लेकर केन्द्र तक में वह भाजपा के साथ सत्ता में साझेदारी कर रही है। भाजपा भी यही उम्मीद जता रही है कि चुनाव से पहले शिवसेना को साथ मिल कर चुनाव लड़ने के लिये अवश्य मना लिया जाएगा। ऐसे में स्पष्ट है कि शिवसेना द्वारा भाजपा को उकसाने और धमकाने की जो कोशिशें हो रही हैं उसकी असली वजह प्रदेश की राजनीति में कमजोर पड़ने का डर ही है। इसी प्रकार बिहार में राजग के मौजूदा स्वरूप में अपनी भूमिका सुनिश्चित करने के लिये ही नीतीश कुमार भी भाजपा के खिलाफ सख्त तेवर दिखा रहे हैं वर्ना व्यावहारिक या सैद्धांतिक तौर पर जदयू का राजग से कोई मतभेद नहीं है। दरअसल बीते लोकसभा चुनाव में जब महागठबंधन में शामिल होकर जदयू ने राजग के खिलाफ चुनाव लड़ा तब राजग को बिहार की कुल 40 में से 31 सीटें मिली थीं जिसमें भाजपा को 22, पासवान की लोजपा को छह और कुशवाहा की आरएलएसपी को तीन सीटों पर जीत मिली थी। ऐसे में जदयू को डर सता रहा है कि इस बार राजग में उसके लिये शेष नौ सीटें ही बचेंगी जिस पर पिछली बार राजग को हार का सामना करना पड़ा था। यही हाल रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा का भी है जिन्हें डर है कि जदयू के लिये उन्हें अपनी जीती हुई सीटों की कुर्बानी देनी पड़ सकती है। हालांकि भाजपा स्पष्ट कर चुकी है कि सीटों का तालमेल करने के दौरान सहयोगियों को कतई बलि का बकरा नहीं बनाया जाएगा और जीत के समीकरण की जरूरत के मुताबिक वह भी अपनी जीती हुई सीटों का मोह छोड़ने में कतई संकोच नहीं करेगी। लेकिन इस स्पष्टीकरण से उसके सहयोगियों का डर दूर नहीं हो पा रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अपने डर को छिपाए रखकर उसका इलाज करने के लिये भाजपा को डराने की रणनीति का क्या नतीजा निकलता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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रविवार, 20 मई 2018
‘आखिरकार बेबसी का सबब बन गयी बेसब्री’
कर्नाटक में जितना स्वाभाविक भाजपा की सरकार का बनना था उतना ही स्वाभाविक इसका बहुमत परीक्षण में असफल होना भी था। जब प्रदेश के चुनाव का नतीजा आया तो त्रिशंकु विधानसभा के लिये मिले खंडित जनादेश में बहुमत के लिये आवश्यक 112 सीटें तो किसी को नहीं मिल सकीं लेकिन कुल 104 सीटें जीत कर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर अवश्य उभरी। दूसरी ओर कांग्रेस को पिछली बार मिली 122 सीटों के मुकाबले इस बार सिर्फ 78 सीटों पर ही सिमट कर रह जाने के लिये मजबूर होना पड़ा जबकि बसपा-जेडीएस गठजोड़ 38 सीटों के साथ तीसरी ताकत के रूप में उभरा। हालांकि अपनी हार का गम गलत करने और भाजपा की जीत का जायका बिगाड़ने के लिये कांग्रेस ने चुनावी नतीजा सामने आने तत्काल बाद ही जेडीएस को बिना शर्त समर्थन का ऐलान करते हुए बहुमत के आंकड़े की स्पष्ट तस्वीर दिखा दी। लेकिन अव्वल को कांग्रेस ने कूटनीतिक ख़ुराफ़ात करके भाजपा को रोकने की कोशिश की थी और दूसरे भाजपा ही सबसे बड़ी ताकत के तौर पर सामने आई थी लिहाजा राज्यपाल वजूभाई वाला ने स्वाभाविक तौर पर भाजपा के सरकार गठन के दावे को स्वीकार कर लिया और बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाते हुए उन्हें विश्वासमत हासिल करने के लिये पंद्रह दिनों की मोहलत दे दी। यानि कहने का तात्पर्य यह कि ना तो राज्यपाल ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री नियुक्त करके कोई गलती की और ना ही भाजपा ने सरकार बनाने का दावा करके कोई अनैतिक काम किया। लेकिन एक तरफ तो भाजपा के पास बहुमत का आंकड़ा उपलब्ध नहीं था और दूसरे कांग्रेस द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इंसाफ की गुहार लगाये जाने के बाद विश्वासमत हासिल करने के लिये मिली पंद्रह दिनों की मोहलत महज तीन दिनों में सिमट गई लिहाजा येदियुरप्पा की अल्पमत सरकार का विश्वासमत के दौरान गिरना भी स्वाभाविक ही था। ऐसे में यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि चुनाव परिणाम सामने आने के बाद कर्नाटक में जो राजनतिक घटनाक्रम दिखा है वह बेहद स्वाभाविक भी है और सहज भी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक नजरिये से देखा जाये तो यह सीधे तौर पर भाजपा की हार है और कांग्रेस की जीत। भाजपा जीती हुई बाजी हार गयी है और कांग्रेस ने हारे हुए गढ़ पर अपनी जीत का झंडा लहराने में कामयाबी हासिल कर ली है। निश्चित तौर पर कांग्रेस ने भाजपा की हलक में हाथ डालकर जीत के निवाले पर कब्जा जमाया है। लिहाजा कांग्रेस के लिये यह जीत बेहद खास भी है और यादगार भी। कांग्रेस को पूरा हक है कि वह इस जीत का खुलकर जश्न मनाए और जेडीएस के साथ मिलकर या तो साझेदारी की सरकार बनाए या फिर अपने समर्थन से उसकी सरकार बनवाए। लेकिन भाजपा के नजरिये से देखा जाये तो उसके लिये निश्चित तौर पर यह आत्मचिंतन का मसला है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों? जब बहुमत का आंकड़ा उसके पास उपलब्ध ही नहीं था और कांग्रेस ने जेडीएस को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान करते हुए तुरूप का इक्का फेंक दिया तो उस बाजी में उलझने की बेसब्री क्यों दिखाई गई। कांग्रेस का समर्थन मिल जाने के बाद जब जेडीएस के पास बहुमत का आंकड़ा स्पष्ट दिखाई पड़ गया तो फिर राज्यपाल के पास जाकर सरकार बनाने का दावा करने की जल्दबाजी करने के बजाय पहले बहुमत का आंकड़ा जुटाने की कोशिश क्यों नहीं की गई। साथ ही सवाल तो यह भी उठेगा ही कि आखिर राज्यपाल ने विश्वासमत हासिल करने के लिये येदियुरप्पा को पंद्रह दिनों की मोहलत देने की ऐतिहासिक दरियादिली क्यों दिखाई जो सुप्रीम कोर्ट को भी हजम नहीं हुई और उसे इस अवधि को कम करने के लिये विवश होना पड़ा। खैर, अब इन तमाम मसलों पर चिंतन करने और गलतियों पर माथा पीटने के लिये भाजपा की कर्नाटक इकाई के पास पर्याप्त समय है। लेकिन पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को इस पूरे प्रकरण से जो नुकसान पहुंचा है उसकी भरपाई तो नामुमकिन ही है। सच तो यह है कि चुनावी नतीजों में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने और बहुमत के लिये आवश्यक आंकड़े से महज सात सीटें ही कम होने के बावजूद भाजपा को जिस कदर भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है उसकी मुख्य तौर पर तीन वजहें रही हैं। अव्वल तो लगातार जीत के सिलसिले को कर्नाटक में भी जारी रखने का भारी दबाव पार्टी ने अपने ऊपर ओढ़ लिया जिसके कारण उसे विकल्पहीनता की स्थिति का सामना करना पड़ा और दूसरे गोवा की ही तर्ज पर आनन-फानन में सरकार बनाकर विरोधियों को लाजवाब कर देने की बेसब्री भरी नीति पर कर्नाटक में भी अमल करना उसके लिये आत्मघाती साबित हुआ। इस सबके अलावा तीसरी सबसे बड़ी गलती प्रशासनिक स्तर पर हुई जिसमें विश्वासमत के लिये 15 दिनों के मोहलत को स्वीकार करने के बजाय इसे अधिकतम एक सप्ताह की समय सीमा में समेट दिया जाता तो सुप्रीम कोर्ट को भी इसमें दखल देने की जरूरत महसूस नहीं होती और इस बीच में आसानी से बहुमत जुटाने के लिये उपलब्ध विकल्पों को टाटोला जा सकता था। लेकिन कहावत है कि ‘जाके प्रभु दारूण दुख देहीं, वाकी मति पहिले हरि लेहीं।’ यही भाजपा के साथ भी हुआ है वर्ना पार्टी का वह शीर्ष नेतृत्व एक साथ इतनी आत्मघाती गलतियां कतई नहीं कर सकता था जो प्रतिकूल परिस्थितियों में जीत हासिल करने का चैम्पियन माना जाता हो। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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गुरुवार, 17 मई 2018
‘तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय’
कर्नाटक में जितना नाटक चुनाव से पहले हुआ, उतना ही चुनाव के दौरान हुआ और उससे भी अधिक चुनाव के बाद। दरअसल वहां का चुनावी नतीजा ही ऐसा है जिसमें हारा कोई नहीं है। सभी जीते ही हैं। सीटों की तादाद के लिहाज से भाजपा को जीत मिली है क्योंकि उसके खाते में सबसे अधिक 104 सीटें आई हैं। वोट के हिसाब से कांग्रेस जीती है क्योंकि उसे भाजपा के मुकाबले 1.8 फीसदी वोट अधिक मिले हैं। भाजपा को सूबे के 36.2 फीसदी मतदाताओं ने अपना वोट दिया है जबकि कांग्रेस की झोली में 38 फीसदी वोट हैं। इसके अलावा जीती तो वह जेडीएस भी है जिसने भाजपा और कांग्रेस के बीच हुई जोरदार कांटे की टक्कर में भी ना सिर्फ पूरी मजबूती के साथ अपना अस्तित्व कायम रखा है बल्कि कुल 37 सीटों पर कब्जा जमाते हुए दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को बहुमत के आंकड़े से काफी पीछे ही रोक दिया है। यानि समग्रता में देखा जाये तो यह जनादेश ‘तुम्हारी भी जय-जय और हमारी भी जय-जय’ का ही है। पूरा मामला ‘ना तुम जीते ना हम हारे’ टाइप का होकर रह गया है। वैसे भी जब किसी एक को पूरी जीत मिल ही नहीं पाई है तो दूसरा उसकी जीत और अपनी हार को स्वीकार क्यों करे? ऐसे में जब कोई हार स्वीकार करने के लिये विवश ही नहीं है तो फिर यह घमासान होना तो स्वाभाविक ही है कि आखिर सरकार किसकी बने। मतदान होने तक तो तीनों ही पार्टियां एक दूसरे को हराने और निपटाने में ही जी-जान से पिली हुई थीं लेकिन जनादेश सामने आने के बाद की परिस्थितियों में तस्वीर पलट गई है। अब भाजपा का दावा है कि सरकार बनाने का पहला मौका उसे ही मिलना चाहिये क्योंकि सबसे बड़े दल के तौर पर उभरने में उसे ही सफलता मिली है और बहुमत के आंकड़े के सबसे करीब तक पहुंचने में उसे ही कामयाबी मिली है। लेकिन कांग्रेस का तर्क है कि अगर जनता ने भाजपा को सत्ता के संचालन का जनादेश दिया होता उसे अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिल गया होता। लेकिन ऐसा तो हुआ नहीं है। बहुमत के आंकड़े से तो वह भी आठ पायदान नीचे है। ऐसे में मौजूदा विधानसभा में भाजपा के बजाय उसे सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिये जिसे बहुमत के लिये आवश्यक तादाद में नवनिर्वाचित विधायक अपना समर्थन दें। इस लिहाज से कांग्रेस ने भाजपा की जीत का जायका बिगाड़ते हुए जेडीएस को अपना समर्थन दे दिया है जिसके नतीजे में इन दोनों दलों की संयुक्त ताकत बहुमत के आंकड़े के लिये आवश्यक आंकड़े से अधिक ही बैठती है। यानि एक ओर भाजपा ने भी सरकार बनाने के लिये कमर कस ली है और दूसरी ओर भाजपा के विजय रथ का पहिया पंचर करने के लिये कांग्रेस ने भी जेडीएस को बिना शर्त अपना समर्थन दे दिया है। दोनों ने राजभवन जाकर अपना दावा भी पेश कर दिया है और दोनों को इंतजार है सरकार बनाने के लिये राजभवन से बुलावे का। यानि गेंद चली गई है राज्यपाल वजूभाई वाला के हाथों में। उन्हें ही फैसला करना है कि किसे सरकार बनाने के लिये आमंत्रित किया जाये। निश्चित तौर पर राज्यपाल का फैसला ही अंतिम होगा जिसे चाहे-अनचाहे सबको स्वीकार भी करना ही होगा। लेकिन इस बीच बड़ा सवाल है कि आखिर इस जनादेश को निष्पक्षता व तटस्टस्था से किस रूप में समझा जा जाए। हालांकि इस बात में तो कोई शक ही नहीं है कि त्रिशंकु विधानसभा का जनादेश ऐसी ही सूरत में सामने आता है जब आम मतदाता भी विकल्प चुनने को लेकर किसी आम राय पर नहीं पहुंच पाते। उनके बीच भी असमंजस व द्वन्द्व की स्थिति रहती है। लेकिन तमाम उहापोह और असमंजस के बीच भी त्रिशंकु विधानसभा के लिए आए इस खंडित जनादेश के मायने बेहद ही स्पष्ट हैं। जनादेश को गहराई से परखा जाए तो इसका सबसे स्पष्ट मतलब यही है कि कांग्रेस को जनता ने सिरे से खारिज कर दिया है और उसे लगातार दूसरी बार सत्ता की बागडोर अपने हाथों में लेने का मौका नहीं दिया है। तभी तो सत्ता की दौड़ में उसे भाजपा से काफी नीचे के पायदान पर खड़ा होने के लिये विवश होना पड़ा है। हालांकि कांग्रेस ने चुपचाप इस जनादेश को शिरोधार्य कर लिया है। तभी तो पूरा नतीजा सामने आने से पहले ही सिद्धारमैया ने अपना त्यागपत्र राज्यपाल को सौंप दिया और कांग्रेस नेतृत्व ने भी पार्टी की सरकार बनाने की कवायदें शुरू करने से परहेज बरत लिया। वैसे यह कांग्रेस को भी बेहतर पता है कि उसके विकल्प के तौर पर जनता ने भाजपा को ही चुना है और जेडीएस को भी तीसरे पायदान पर रखते हुए स्पष्ट तौर पर विपक्ष में बैठने का ही निर्देश दिया है। यानि बहुमत के आंकड़े से दूर रह कर भी यह चुनाव भाजपा के लिये जीत की खुशखबरी लेकर ही आयी है। लेकिन सवाल है कि जब किसी एक दल या चुनाव-पूर्व गठबंधन को अपने दम पर पूर्ण बहुमत का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है तो आखिर सरकार बनेगी कैसे? तभी तो कांग्रेस ने भाजपा को रोकने के लिये जेडीएस को समर्थन देने का दांव चल दिया है। यानि कर्नाटक का जो नाटक अभी सड़क पर चल रहा है वह राज्यपाल द्वारा किसी एक पक्ष को सरकार बनाने का निमंत्रण दिये जाने के बाद विधानसभा के भीतर बहुमत साबित होने तक बदस्तूर जारी रहेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’
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सोमवार, 7 मई 2018
‘दुश्मनी ने दोस्ती का सिलसिला रहने दिया’
मुनव्वर राणा लिखते हैं कि- ‘हमारी दोस्ती से दुश्मनी शरमाई रहती है, हम अकबर हैं हमारे दिल में जोधाबाई रहती है, गिले-शिकवे जरूरी हैं अगर सच्ची मोहब्बत है, जहां पानी बहुत गहरा हो थोड़ी काई रहती है।’ वाकई जहां दोस्ती का रिश्ता काफी गहरा हो वहां आप-जनाब के लहजे में तो कतई बातचीत नहीं होती। लिहाजा कोई अगर किसी को यथोचित सम्मान नहीं दे रहा हो और उसके सामने ही उसे गालियां बक रहा हो तो यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिये कि उनके रिश्तों में कोई खटास है या अंदरूनी तौर पर वे एक-दूसरे को नापसंद करते हैं। बल्कि इस बात के आसार काफी अधिक हो सकते हैं कि उनका रिश्ता इस कदर मजबूत है कि गालियों के अलावा अंतरंगता दिखाने की कोई दूसरी राह उन्हें सूझ ही नहीं रही है। अंतरंगता की इस उलटबांसी को सामाजिक ताने-बाने में साले-बहनोई या देवर-साली के रिश्तों में भी देखा जा सकता है और अरसे से बिछड़े दो दोस्तों की मुलाकात के वक्त भी इस तथ्य को परखा जा सकता है। दूसरे नजरिये से देखें तो जिस्म पर चाकू चलानेवाला हमेशा दुश्मन ही नहीं होता है। बल्कि चिकित्सक भी मर्ज का जड़ से इलाज करने के लिए चाकू से ही जिस्म की चीड़-फाड़ करता है। लिहाजा अगर कोई किसी के जिस्म पर चाकू चला रहा हो तो आंखें मूंद कर यह कतई नहीं मान लेना चाहिये कि वह उसका दुश्मन ही है। हो सकता है कि वह उसका चिकित्सक हो जो उसे उसकी बीमारी से निजात दिलाने के लिए उसके जिस्म को चाकू से काट-कुरेद रहा हो। सियासी समीकरणों के नजरिये से ऐसा ही मामला सामने आया है मध्य प्रदेश में जहां सतही तौर पर देखने से यही समझ में आ रहा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने आगामी विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चैहान को पार्टी का चेहरा नहीं बनाए जाने का संकेत देकर शिवराज की उम्मीदों, अरमानों व अपेक्षाओं की गला काट कर हत्या कर दी है। लेकिन गहराई से परखाने पर पूरी तस्वीर का दूसरा ही रंग दिखाई पड़ रहा है। सच पूछा जाए तो शाह ने शिवराज को चेहरा बनाने से इनकार करके उन्हें ऐसा अभयदान दे दिया है जिसमें जीत का सेहरा तो स्वाभाविक तौर पर उनके नेतृत्व में वर्ष 2005 के नवंबर माह से लगातार सूबे की सेवा कर रही सरकार के सिर ही बंधेगा लेकिन अगर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा जो इसकी रत्ती भर की जवाबदेही भी शिवराज की नहीं होगी। इसके अलावा पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं होने के कारण ना तो शिवराज को व्यक्तिगत तौर पर पार्टी की नैया पार लगाने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा और ना ही पार्टी को सांगठनिक व सतही स्तर पर जारी सत्ता विरोधी लहर से जूझने के लिये मजबूर होना पड़ेगा। इसके अलावा शिवराज के विरोधियों के पास भी अब यह बहाना नहीं बचेगा कि वे भाजपा को तो जीत दिलाना चाहते थे लेकिन शिवराज को लाभ दिलाना उन्हें गवारा नहीं हो रहा था। यानि शाह ने शिवराज के चेहरे को तात्कालिक तौर पर मुख्यमंत्री पद की दौड़ से अलग करके एक ही तीर से कई निशाने साध लिये हैं। वैसे भी इतिहास गवाह है कि भाजपा ने जिसको भी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ा है उसकी अपनी सीट ही खतरे में आ जाती रही है। बात चाहे हिमाचल प्रदेश में प्रेम कुमार धूमल की करें या झारखंड में अर्जुन मुंडा की। दोनों ही सूबों में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को तो बहुमत हासिल हो गया लेकिन पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने वाले धूमल और मुंडा अपना चुनाव हार गये। कहा तो यही जाता है कि धूमल और मुंडा को विरोधियों ने नहीं हराया। उन्हें उन अपनों ने ही हरा दिया जो मुख्यमंत्री पद पर उनकी दावेदारी को पचा नहीं पा रहे थे। जाहिर है कि अगर मध्य प्रदेश में शिवराज को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करने की पहल की जाती तो उनका हाल भी मुंडा या धूमल जैसा होने से कतई इनकार नहीं किया जा सकता था। लेकिन उनके चेहरे को आगे करने से इनकार करके शाह ने शिवराज का यह संकट भी समाप्त कर दिया है और उनके विरोधियों के लिये सकारात्मक राजनीति की राह पर आगे बढ़ने की चुनौती पेश कर दी है। यानि अब अगर किसी ने भी संगठन के हितों के आड़े आने की गलती की तो वह शिवराज का नहीं बल्कि सीधे तौर पर भाजपा का ही दुश्मन माना जाएगा। जाहिर है कि इतनी बड़ी गलती करने की जुर्रत तो भाजपा का कोई नेता नहीं कर सकता। लिहाजा पार्टी में सांगठनिक स्तर पर जारी गुटबाजी का शाह ने एक ही झटके में जो तोड़ निकाला है वह भी काबिले तारीफ ही कहा जाएगा। लेकिन इस सबसे अलग हटकर भी देखा जाए तो शाह ने औपचारिक तौर पर भले ही यह संकेत दिया हो कि पार्टी की ओर से इस बार शिवराज को औपचारिक तौर पर मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा लेकिन उन्होंने शिवराज के हितों के उलट एक बात भी नहीं कही है। यानि आगामी चुनाव में पार्टी की ओर से दोबारा जनादेश मांगने की पूरी रणनीति शिवराज के कार्यकाल में हुए काम काज पर ही टिकी होगी। ऐसे में पार्टी को बहुमत हासिल होने की स्थिति में शिवराज को मुख्यमंत्री बनाने से परहेज बरतने का कोई कारण ही नहीं रहेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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मंगलवार, 17 अप्रैल 2018
‘अपनों को दुत्कार कर परायों से प्यार’
राजनीति में आडवाणी शब्द अब संज्ञा से बढ़कर विशेषण हो गया है। यह विशेषण विभिन्न दलों के नेताओं के साथ भी जुड़ रहा है और कई सामाजिक संगठनों के संचालकों के साथ भी। सबसे ताजा आडवाणी बने हैं डाॅ प्रवीण तोगडिया, जिन्हें दूध में गिरी हुई मक्खी की तरह विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष के पक्ष से धक्के मार कर हटाया गया है। इसी प्रकार कांग्रेस ने भी जनार्दन द्विवेदी को संगठन महासचिव के पद से हटाकर आडवाणी ही बना दिया है। कहा तो यह जा रहा है कि शीघ्र ही कांग्रेस में आडवाणियों की फौज दिखाई देगी। जदयू ने शरद यादव को आडवाणी बना दिया है। लेकिन सबसे कम उम्र के स्वघोषित आडवाणी तो कुमार विश्वास ही हैं जिनसे आम आदमी पार्टी ने राजस्थान के संयोजक की जिम्मेवारी भी छीन ली है। हालांकि विश्वास के साथ यह व्यवहार होना तो तब ही तय हो गया था जब उन पर अरविंद केजरीवाल को किनारे करने के लिए पार्टी में बगावत का माहौल खड़ा करने का इल्जाम लगा था। वैसे भी सेना द्वारा पाकिस्तान में की गई सर्जिकल स्ट्राइक को सही करार देते हुए इसका सबूत मांगे जाने को गलत बताने के बाद से ही विश्वास पार्टी आलाकमान का भरोसा खो चुके थे और संगठन में विघटन के बीजारोपण का इल्जाम सामने आने के बाद उन्हें प्रबल दावेदारी के बावजूद राज्यसभा के टिकट से वंचित कर दिया गया था। बताया जाता है कि आप सुप्रीमो केजरीवाल ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि वे उन्हें मारेंगे जरूर लेकिन शहीद नहीं बनने देंगे। ऐसा ही हुआ भी है। पहले उन्हें राज्यसभा के टिकट से वंचित किया गया और अब राजस्थान का प्रभार छीन कर उन्हें केजरीवाल ने राजनीतिक तौर पर मार भी डाला है और शहादत का संतोष भी मयस्सर नहीं होने दिया है। लेकिन इसके लिए जिन तर्कों और दलीलों की आड़ ली गई है वह ना सिर्फ हास्यास्पद बल्कि अविश्वसनीय भी है। आप की ओर से कहा गया है कि इस साल के अंत में होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनाव को लेकर कतई जोखिम नहीं लिया जा सकता। पार्टी के मुताबिक अपनी व्यस्तताओं के कारण विश्वास राजस्थान में अपेक्षित वक्त नहीं दे पा रहे थे जिससे आप के हितों को नुकसान पहुंच रहा था। हालांकि पार्टी कुछ भी कहे लेकिन सच तो यह है कि राज्यसभा के टिकट से वंचित किए जाने और राजनीति की मुख्यधारा से हाशिये पर धकेले जाने के बाद अपनी निष्ठा और समर्पण को साबित करने के लिए विश्वास ने खुद को पूरी तरह राजस्थान में झोंक दिया था। खैर, सच पूछा जाए तो केजरीवाल ने विश्वास को अपना वही रंग दिखाया है जिसका स्वाद अन्ना हजारे पहले ही चख चुके हैं। अन्ना को चकमा देकर उनके सामाजिक आंदोलन का राजनतिकरण करने के बाद उन्होंने ना सिर्फ भूषण पिता-पुत्र, प्रो. आनंद कुमार व योगेन्द्र यादव सरीखे पार्टी के शीर्ष संस्थापकों को बेइज्जत करके संगठन से निकाला बल्कि अमानुल्ला खान को निलंबित और कपिल मिश्रा को निष्कासित करके स्पष्ट तौर पर जता दिया कि वे जिस पार्टी का संचालन कर रहे हैं उसका नाम भले ही एएपी यानि ‘आम आदमी पार्टी’ हो लेकिन उसकी रीति-नीति एएपी यानि ‘अरविंद अकेला पार्टी’ की ही रहेगी। जो भी उनके वर्चस्व को चुनौती देने की हिमाकत या अपनी मर्जी से एक कदम भी आगे बढ़ने की जुर्रत करेगा उसके लिए पार्टी में कोई जगह नहीं होगी। आप में रह कर सही बात को सही और गलत को गलत कहने का अंजाम क्या होता है उसके भुक्तभोगी विधायक देविंदर सहरावत भी हैं जिन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस कारण निलंबित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने पार्टी की पंजाब इकाई के नेताओं पर टिकट के बदले महिलाओं के शोषण का आरोप लगाया था। इसी प्रकार का व्यवहार पंजाब में पार्टी को खड़ा करनेवाले सुच्चा सिंह के साथ भी हुआ जिन्हें प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान ही सूबे के संयोजक पद से हटा दिया गया। यानि समग्रता में देखा जाए तो केजरीवाल ने हर किसी का सिर्फ इस्तेमाल ही किया और जब बदले में कुछ देने की नौबत आई तो उसे संगठन से बाहर खदेड़ दिया। अब स्थिति यह है कि पार्टी में ऐसे लोग गिने-चुने ही बचे हैं जो शून्य से शिखर के सफर में शुरू से केजरीवाल के साथ रहे हों। लेकिन यह तय है कि अब तक जिस तरह से केजरीवाल अपने बराबर बैठने वालों को एक के बाद एक करके किनारे लगाते आए हैं उसी तर्ज पर उनका अगला बड़ा शिकार भी जल्दी ही सामने आ जाएगा। सच पूछा जाए तो काम निकाल लेने के बाद किसी को भी दूध में पड़ी हुई मक्खी की तरह उठाकर बाहर फेंक देने की कला में केजरीवाल वाकई सिद्धहस्त हो चुके हैं। खैर, अब तक तो उनकी यह कार्यशैली लगातार सफल ही साबित होती आ रही है और उन्हें इसका कोई नुकसान नहीं झेलना पड़ा है। लेकिन केजरीवाल ने अपनों को अपमानित और प्रताड़ित करने की जो राह पकड़ी हुई है उससे भले अभी तक उनका निजी तौर पर कोई बड़ा नुकसान ना हुआ हो लेकिन इसने किसी अन्य आंदोलन से बदलाव की बयार बह पाने की उम्मीदों को अवश्य ही चकनाचूर कर दिया है। अब जब भी कोई नया आंदोलन अस्तित्व में आएगा तो उसे सबसे पहले केजरीवाल द्वारा गढ़ी गई ऐसी छवि से चुनौती मिलेगी जिसके कारण आम लोग अब शायद ही किसी नए-नवेले पर भरोसा कर पाएं। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
गुरुवार, 5 अप्रैल 2018
‘सतह पर आने के बाद जड़ों की तलाश’
जिस दरख्त को वक्त की आंधी ने अर्श से फर्श पर पटक दिया हो उसके पास दो ही विकल्प बचते हैं। या तो वह दोबारा हिम्मत, ऊर्जा और जोश को एकत्र कर दोबारा खड़े होने के लिए कमर कसे या फिर जड़ों को कमजोर करनेवाली कमियां, खामियां और बीमारियां दुरूस्त करे ताकि मजबूत जड़ों के सहारे आसमान छूने के सफर की मजबूत शुरूआत की जा सके। इस लिहाज से देखें तो भारतीय राजनीति में कांग्रेस को इतना बुरा वक्त पहले कभी नहीं देखना पड़ा जैसा मौजूदा दौर में भुगतना पड़ रहा है। दशकों तक पूरे देश की पंचायतों, स्थानीय निकायों व प्रदेशों से लेकर पार्लियामेंट तक में जिस कांग्रेस की तूती बोलती थी उसकी अधोगति का आलम यह है कि इस समय उसकी झोली में सिर्फ तीन राज्य (पंजाब, कर्नाटक व मिजोरम) और एक केन्द्र शासित प्रदेश पुदुचेरी ही शेष है। प्रादेशिक स्तर पर गौर करें तो देश के सबसे ताकतवर सियासी सूबे उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कांग्रेस के पास इतने विधायक भी नहीं हैं कि एक अदद राज्यसभा की सीट पर पार्टी अपना कब्जा जमा सके। पंजाब को छोड़ दें तो पूरे उत्तर व मध्य भारत में कांग्रेस का सफाया हो चुका है और दक्षिण में भी उसकी हालत महज उपस्थिति दर्ज कराने भर की ही बची है जबकि मिजोरम पर शासन के नाते नाम भर को पूर्वोत्तर में कांग्रेस का एक पांव जमा हुआ है। अलबत्ता देश के पश्चिमी सूबों में सत्ता से बेदखल होने के बावजूद मजबूत विपक्ष के नाते पार्टी ने गिनाने भर को अपनी मजबूत पकड़ अवश्य बरकरार रखी हुई है। यानि समग्रता में देखें तो पार्टी ऐसी स्थिति में पहुंच चुकी है जहां से अगर वह नहीं संभल पायी तो कांग्रेस का नाम सिर्फ किताबों में ही सिमट कर रह जाएगा। यही वजह है कि कर्नाटक के चुनाव को लेकर कांग्रेस भी जान और मान रही है कि यह उसके अस्तित्व की लड़ाई है। लेकिन कहते हैं कि राजनीति असीमित संभावनाओं को संभव कर दिखाने का ऐसा खेल है जिसमें किसी भी संभावना को किसी भी वक्त कतई खारिज नहीं किया जा सकता है। इसी आस और उम्मीद से कांग्रेस ने भी एक नयी शुरूआत करके अगले साल होने जा रहे लोकसभा चुनाव के महासंग्राम में एक बार फिर विजय पताका लहराने के लिए कमर कसना शुरू कर दिया है। हालांकि पार्टी की जो मौजूदा दुर्दशा दिख रही है काफी हद तक वैसे ही जनविरोध का सामना इसे तब भी करना पड़ा था जब आपातकाल के बाद के दौर में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को मतदाताओं ने खारिज कर दिया था। लेकिन उस दौर में प्रादेशिक स्तर पर मौजूद विश्वसनीयता व मजबूती की बदौलत कांग्रेस अपने बुरे वक्त से बहुत ही जल्दी उबर गई थी। लेकिन इस बार जो बुरा वक्त आया उसमें पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को संभलने के लिए प्रदेशिक स्तर से भी सहायता नहीं मिल पाई और केन्द्र में पार्टी के हाथों से सत्ता फिसलने के बाद जमीनी स्तर पर पर भी पार्टी की कमर टूट गई। लेकिन अब इतिहास से सीख लेते हुए कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से खड़े होने के लिए प्रादेशिक समीकरणों को साधने को प्राथमिकता देने की राह पकड़ी है। दरअसल प्रादेशिक स्तर पर पार्टी के बिखरने की सबसे बड़ी वजह अंदरूनी गुटबाजी और चरण-वंदन की परंपरा रही जिसके कारण नए नेतृत्व को उभरने का मौका नहीं मिल सका और पुराने नेतृत्व की खो चुकी धार व फीकी पड़ चुकी चमक का खामियाजा संगठन को शिकस्त के रूप में भुगतना पड़ा। ऐसा ही राजस्थान में भी हुआ और मध्य प्रदेश में भी। छत्तीसगढ़, हिमाचल, उत्तराखंड और महाराष्ट्र से लेकर कर्नाटक तक में पार्टी की पतली हालत की वजह कमोबेश एक जैसी ही रही। लेकिन राहुल गांधी द्वारा प्रादेशिक स्तर पर संगठन की समस्यों को सुलझाने और विभिन्न गुटों का तुष्टीकरण करने बजाय सबको किसी एक का नेतृत्व स्वीकारने के लिए मनाने-समझाने का ही नतीजा रहा कि पंजाब में पार्टी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने में सफलता मिल सकी और गुजरात में भी भाजपा को सौ सीटों के भीतर सिमटने के लिए विवश होना पड़ा। गुजरात और पंजाब में कामयाबी के बाद अब अन्य प्रदेशों में भी पार्टी को इसी तरीके से दोबारा अपने पांव पर खड़ा करने की कोशिश शुरू हो गई है। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने संगठन महामंत्री के पद पर जनार्दन द्विवेदी के स्थान पर अशोक गहलोत की नियुक्ति की है ताकि केन्द्रीय संगठन को प्रादेशिक भावना के अनुरूप गढ़ा जाए और प्रदेश इकाई के मतभेदों को दूर करके एक सशक्त, मजबूत, भरोसेमंद और युवा स्थानीय चेहरे को सर्वसम्मति से आगे बढ़ाने की राह आसान हो सके। यही फार्मूला जल्दी ही उत्तर प्रदेश में भी आजमाया जाएगा और मध्य प्रदेश में भी। दरअसल बीते दिनों दिल्ली में हुए कांग्रेस महाधिवेशन में मुख्य मंच को पूरे वक्त खाली रखकर केन्द्रीय नेतृत्व को भी प्रादेशिक नेतृत्व के साथ पंक्तिबद्ध करके बिठाकर स्पष्ट संकेत दे दिया गया है कि पार्टी दिल्ली के दिशा-निर्देशों से संचालित नहीं होगी बल्कि जमीन से उठनेवाली हवा ही पार्टी की दशा-दिशा और रीति-नीति तय करेगी। ऐसे में स्वाभाविक है कि जब केन्द्र में प्रदेश की भावना का ध्यान रखा जाएगा तो स्वाभाविक तौर पर प्रदेश से पार्टी के लिए शुभ समाचार ही समाने आएगा और सत्ता का सूखा समाप्त होने की संभावना बनते देर नहीं लगेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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शनिवार, 31 मार्च 2018
‘सुस्त कदम रास्ते और तेज कदम राहें’
‘सुस्त कदम रास्ते और तेज कदम राहें’
भाजपा के शिखर पुरूष कहे जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्तियां हैं कि- ‘दांव पर सब कुछ लगा है रूक नहीं सकते, टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।’ वाकई वाजपेयी की भाजपा, नरेन्द्र मोदी के मौजूदा दौर में ऐसे मोड़ पर आ गई है जहां से आगे बढ़ने का रास्ता सुस्त और वापसी की राहें बेहद तेज नजर आ रही हैं। बेशक पूर्वोत्तर का चुनाव परिणाम आने के बाद तक पार्टी को अजेय माना जाने लगा था लेकिन उसके कुछ ही दिनों सामने आए फूलपुर और गोरखपुर के चुनाव परिणामों ने पूरी तस्वीर बदल कर रख दी। भाजपा की इस हार ने तमाम गैर-भाजपाई दलों को यह भरोसा दिला कि जब गोरखपुर में भाजपा को हराया जा सकता है तो ऐसी कोई भी सीट नहीं है जहां उसे शिकस्त ना दी जा सके। सिर्फ जरूरत है गैर-भाजपाई वोटों का बिखराव रोकने की और ऐसा माहौल बनाने की जिससे मतदाताओं को आश्वस्त किया जा सके कि अगर उन्होंने भाजपा के खिलाफ वोट दिया तो वह बेकार नहीं जाएगा। इसी उत्साह का नतीजा है कि कांग्रेस की ओर से भी गैर-भाजपाई दलों की गोलबंदी का प्रयास जारी है और ममता बनर्जी व शरद पवार सरीखे नेतागण भी इस काम में जुट गए हैं। कई स्तरों पर यह प्रयास आरंभ हो गया है कि एक मजबूत मोर्चा बनाकर प्रादेशिक स्तर पर घेराबंदी करके भाजपा को धूल चटाई जा सके। दूसरी ओर भाजपा के भीतर भी अंदरूनी तौर पर कुछ ऐसे खेमे सक्रिय होते हुए दिख रहे हैं जिनमें गोरखपुर के चुनावी नतीजों से आशाओं व उम्मीदों का नए सिरे से संचार हुआ है और उनका मानना है कि अगर पार्टी को आगामी चुनाव में बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने में कामयाबी नहीं मिल सकी तो प्रधानमंत्री पद के लिए उनके नाम की लाॅटरी लग सकती है। हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव में भी मोदी को प्रधानमंत्री पद उम्मीदवार घोषित कराने के पीछे भी इन खेमों का आकलन यही था कि ऐसा करने से पार्टी को अधिकतम दो सौ सीटें मिल जाएंगी और बाद में मोदी के नाम पर अन्य दलों से समर्थन नहीं मिलने पर उनका प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो जाएगा। लेकिन मोदी से मेहनत करा कर सत्ता की मलाई पर कब्जा जमाने की सोच रखनेवालों की उम्मीदों पर मतदाताओं ने पानी फेर दिया और भाजपा के खाते में आवश्यकता से दस सीटें अधिक ही आ गईं। नतीजन पिछले चार साल से मोदी का निष्कंटक राज जारी है और उम्मीदों की आस में मोदी का नाम आगे करनेवालों के पास बेहतर परिस्थिति का इंतजार करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। लेकिन सूत्र बताते हैं कि इनकी उम्मीदें एक बार फिर जग रही हैं और गोरखपुर के चुनावी नतीजों के बाद इन खेमों के नेताओं को यह यकीन होने लगा है कि उनका जो सपना 2014 में पूरा नहीं हो पाया वह इस बार अवश्य पूरा हो जाएगा। यही वजह है कि उनकी नजरें इस समीकरण पर टिक गई हैं कि अगर बाहर से समर्थन जुटाने की जरूरत पड़े तो ‘प्रदेश अभिमान’ के नाम पर अपने गृह राज्य की सभी पार्टियों के सांसदों का समर्थन हासिल किया जा सके। इसके अलावा अन्य दलों के साथ भी अपना अंदरूनी तालमेल मजबूत करने की कोशिशें जारी हैं ताकि मौके पर बहुमत साबित करने में कोई दिक्कत ना आए। यानि पार्टी के असंतुष्ट तबके में उम्मीदों के आॅक्सीजन का संचार आरंभ होता दिखने लगा है। इसके अलावा बीते दिनों हुए राज्यसभा के टिकटों के बंटवारे को लेकर भी एक बड़े तबके में नाराजगी का माहौल है। पहले आडवाणी को ठेंगा दिखाना और अब राज्यसभा भेजने के मामले में सशक्त दावेदारों को किनारे किया जाना भाजपा के मौजूदा निजाम के प्रति रोष, असंतोष व असहमति का सबब बन रहा है। रही सही कसर निर्णय प्रक्रिया में कथित मनमानी ने पूरी कर दी है। हालांकि भले ही अभी शीर्ष नेतृत्व के भय से असंतोष के ज्वालामुखी का लावा फूटकर ना बह रहा हो लेकिन आगामी दिनों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में मिलने वाली एक भी हार बड़े विस्फोट के साथ इस लावे के बहने का रास्ता खोल सकती है। अगर पार्टी के मौजूदा निजाम यानि मोदी और अमित शाह की जोड़ी की बात करें तो उनके लिए चुनौती है कि एक तरफ अगले आम चुनाव की तारीख की उल्टी गिनती शुरू होने वाली है और दूसरी तरफ कर्नाटक की चुनावी परीक्षा का सामना करने के अलावा साल के आखिर में राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ जैसे अपने दुर्ग को भी ढ़हने से बचाना है। हालांकि इस जोड़ी ने तमाम प्रतिकूलताओं जूझते हुए केन्द्र के साथ ही 21 राज्यों में प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर सत्ता हासिल करके पार्टी को देश के 68 फीसदी भू-भाग पर राजनीतिक कब्जा दिलाया है। सदस्यों की तादाद के लिहाज से विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में भाजपा का नाम दर्ज कराया है। यहां तक कि बकौल अमित शाह आज भाजपा के पास जो अपना मुख्यालय है वह भी विश्व के किसी भी राजनीतिक दल के मुख्यालय के मुकाबले कहीं अधिक भव्य, दिव्य व विस्तृत है। यानि हर लिहाज से इन्होंने भाजपा कोे ऐसी ऊंचाई पर ला दिया है जो किसी सपने के सच होने जैसा है। लेकिन यह भी सच है कि मौजूदा चुनौती से निपटने पर ही सफलता की गाथा का अगला अध्याय आरंभ होगा वर्ना बोरिया-बिस्तर गोल करने का मौका तलाशने वालों की चांदी होती देर नहीं लगेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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गुरुवार, 22 मार्च 2018
‘पांव तले के तिनके से आंखों में घनेरी पीड़’
‘पांव तले के तिनके से आंखों में घनेरी पीड़’
मौजूदा सियासी दौर में सत्तारूढ़ भाजपा के दो शीर्षतम संचालकों यानि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह से बेहतर संत कबीर की इस सीख का अनुभव शायद ही किसी को होगा कि- ‘‘तिनका कबहु न निन्दिये, जो पांवन तर होय, कबहुं उड़ी आंखिन पड़े, तो पीड़ घनेरी होय।’’ तिनका-तिनका जोड़कर केन्द्र से लेकर 22 राज्यों में सत्ता का घोंसला बनाने में भी ये कामयाबी हासिल कर चुके हैं और प्रतिकूल सियासी समीकरणों की आंधी में उसी घोंसले के तिनके इनके लिये भारी पीड़ का सबब भी बन रहे हैं। हालांकि घोंसले के तिनकों की ढ़ीली पड़ रही पकड़ को दोबारा मजबूती से गूंथने के प्रयासों के तहत सोहेलदेव-भासपा को अपने साथ जुड़े रहने के लिए मनाने में फिलहाल उन्हें कामयाबी मिल गयी है लेकिन जो तिनके बिखर चुके हैं उन्हें दोबारा गूंथने की राह नहीं मिल रही और जो दायें-बायें देखकर खिसकने की तैयारी में हैं उनको अपने साथ जोड़े रखने की बेहद कठिन चुनौती भी सिर पर खड़ी है। दरअसल तिनके और घोंसले की पूरी कहानी वर्ष 2014 के आम चुनावों से शुरू हुई जिसे सतही तौर पर ‘मोदी मैजिक’ का नाम दे दिया गया। जबकि वास्तव में वह सामूहिक लड़ाई की जीत थी जिसका चेहरा मोदी को बनाया गया था। हालांकि राजस्थान, गुजरात व मध्य प्रदेश सरीखे सूबों में हुई सीधी लड़ाई में कांग्रेस के विरूद्ध भड़की जनाक्रोश की आग में मोदी मैजिक का करिश्मा अवश्य चल निकला। लेकिन बिहार, महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश सरीखे सूबों में क्षेत्रीय दलों को अपने साथ जोड़कर ही भाजपा ने तिनका-तिनका एकत्र करते हुए कामयाबी की इबारत लिखी। उस चुनाव में तिनकों की अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि केरल व तमिलनाडु सरीखे जिन सूबों में सीधी लड़ाई कांग्रेस से नहीं थी और बड़े क्षेत्रीय दलों को साधने में भी भाजपा को कामयाबी नहीं मिल सकी वहां मोदी मैजिक बेअसर रहा। यानि समग्रता में देखें तो 2014 का जनादेश सिर्फ मोदी के नाम पर नहीं मिला था बल्कि इसमें निर्णायक भूमिका निभाई थी कांग्रेस को सत्ता से खदेड़ने की जनभावना ने और इसमें भाजपा को मदद मिली थी उन स्थानीय व क्षेत्रीय ताकतों से जो अपने दम पर अपना खेल बनाने की ताकत भले ना रखते हों लेकिन किसी दूसरे का खेल बिगाड़ने की जिनमें बखूबी क्षमता है। हालांकि 2014 के चुनाव परिणामों ने राजनीतिक पंडितों को भी इस कदर चमत्कृत कर दिया कि वे पूरी जीत को मोदी मैजिक का नाम देकर स्थानीय ताकतों को इसके श्रेय में हिस्सेदारी देने में कंजूसी कर गए। लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को हकीकत की पूरी जानकारी थी और इसी वजह से अपने दम पर पूर्ण बहुमत के लिए आवश्यक आंकड़े से दस सीटें अधिक जीतने के बावजूद मोदी सरकार में राजग के उन तमाम घटक दलों को यथोचित हिस्सेदारी दी गई जिन्होंने पर्दे पर मुख्य भूमिका भले ना निभाई हो लेकिन गैर-कांग्रेसवाद की लहर को मोदी मैजिक में तब्दील करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। साथ ही 2014 के चुनाव को नजीर मानकर भाजपा के नए निजाम ने प्रादेशिक स्तर पर स्थानीय व छोटे-छोटे दलों को अपने साथ जोड़ना आरंभ कर दिया और इसका नतीजा यह रहा कि विधानसभा के चुनावों में एक के बाद एक भाजपा सफलता के झंडे गाड़ती चली गई। जिन सूबों में सही तरीके से चुनावी गठजोड़ नहीं हो सका और जहां सीधी लड़ाई कांग्रेस से नहीं थी वहां भाजपा को शिकस्त का सामना भी करना पड़ा और बिहार, दिल्ली व जम्मू कश्मीर सरीखे सूबे के मतदाताओं ने स्थानीय विकल्प को ही तरजीह देना बेहतर समझा। लेकिन इससे सबक लेकर भाजपा ने पूरे देश में तमाम गैर-कांग्रेसी सियासी ताकतों को अपने साथ जोड़ने का अभियान छेड़ दिया। तमाम सिद्धांतों व पूर्वाग्रहों से किनारा करते हुए बिहार में नीतीश कुमार को और जम्मू-कश्मीर में पीडीपी को राजग के साथ जोड़ा गया। पूर्वोत्तर में भी ऐसे-ऐसे दलों को अपने साथ जोड़ा गया जिन्हें सैद्धांतिक व वैचारिक तौर पर अब तक चिमटे से छूना भी गवारा नहीं किया जा रहा था। तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक के साथ पींगें बढ़ाई गईं और गोवा में सरकार बनाने के लिए छोटे सहयोगी दलों की जिद का मान रखने के लिए मनोहर पर्रिकर मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया। यानि भाजपा को जीत का मंत्र मिल गया था और उसकी साधना करके पार्टी ने अभूतपूर्व कामयाबी भी अर्जित की। लेकिन जिस मंत्र का मर्म पार्टी के शीर्ष दोनों रणनीतिकार बेहतर समझ रहे थे उसके बारे में पार्टी का प्रादेशिक नेतृत्व काफी हद तक आज भी अनजान ही है। नतीजन प्रादेशिक स्तर पर यथोचित सम्मान नहीं मिलने से अब राजग के घोंसले की एकजुटता प्रभावित होने लगी है। बिहार में जीतनराम मांझी ने राजग से किनारा किया है तो आंध्र प्रदेश में टीडीपी ने अलग राह पकड़ ली है। महाराष्ट्र में स्वाभिमानी शेतकारी संगठन कांग्रेसनीत संप्रग के साथ जुड़ रहा है जबकि शिवसेना ने अगला लोकसभा चुनाव अपने दम पर लड़ने की पहले ही घोषणा कर दी है। यूपी में भी अपना दल का बड़ा खेमा राजग से अलग हो चुका है और बिहार में लोजपा-जदयू की एक अलग खिचड़ी पक रही है। रालोसपा भी राजग में अपना भविष्य सुरक्षित नहीं समझ रहा। यानि तिनका तिनका जोड़कर जिस नीड़ का निर्माण हुआ उसके बिखरने की भूमिका बनने लगी है। ऐसे में घोंसले के तिनकों की आपसी कसावट में वृद्धि नहीं की गई तो चुनावी वर्ष में भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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शुक्रवार, 9 मार्च 2018
‘दो-दो काटे शून्य, साथ मिले तो बाईस’
‘दो-दो काटे शून्य, साथ मिले तो बाईस’
राजनीति का गणित अलग ही होता है। हर नए समीकरण के साथ इसके परिणाम का आंकड़ा घटता-बढ़ता रहता है। सामान्य गणितीय समीकरण में तो दो और दो हमेशा चार ही होता है। लेकिन राजनीति के आंकड़े इस हद तक अप्रत्याशित होते हैं कि दो और दो को आंखें मूंद कर कतई चार नहीं माना जा सकता। वह शून्य भी हो सकता है, तीन भी, पांच भी और बाईस भी। कई बार जोड़ने के लिए रखे गए दो और दो परस्पर एक दूसरे को काट कर शून्य भी बना देते हैं और कई बार दो और दो एक साथ मिलकर बाईस भी बन जाते हैं। हालांकि कोई भी सियासी गठजोड़ अक्सर दो और दो मिलकर बाईस बनने की उम्मीदों के साथ ही किया जाता है। लेकिन यूपी का राजनीतिक समीकरण जहां एक ओर भाजपा और अपना दल के गठजोड़ को लोकसभा चुनाव में आंकड़ों का ताज पहना देता है वहीं विधानसभा के चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठजोड़ को सियासी शून्य की ओर धकेल देता है। इसलिये किसी भी गठजोड़ के भविष्य को लेकर निर्णायक तौर पर तो पहले से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन दो स्वतंत्र दलों के मिलन पर होने वाले रासायनिक समीकरण को पुरानी प्रक्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के आधार पर परखकर उसके भावी प्रदर्शन का मोटा-मोटी खाका तो खींचा ही जा सकता है। इस लिहाज से देखा जाए तो गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट के लिए होने जा रहे उपचुनाव में बसपा ने सपा को अपना जो प्रायोगित समर्थन दिया है उसका अंजाम वैसा ही होने की उम्मीद अधिक दिख रही है जैसा विधानसभा के चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठजोड़ का हुआ था। एक जैसा नतीजा आने की संभावना के पीछे इसकी वजहें भी एक जैसी ही हैं। मसलन जमीनी स्तर पर शीर्ष सपा नेता मुलायम सिंह यादव की पहचान गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति के चैम्पियन की थी। लेकिन भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए सपा ने उसी कांग्रेस का हाथ थाम लिया जिसके खिलाफ उसके कार्यकर्ता दशकों से संघर्ष करते आए थे। नतीजन इस बेमेल गठजोड़ का नतीजा यह हुआ कि सपा और कांग्रेस के मतदाताओं ने अपने शीर्ष नेतृत्व के फैसले से निराश होकर भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो जाना ही बेहतर समझा। परिणाम यह हुआ कि सपा सैंतालीस पर और कांग्रेस महज सात सीटों पर सिमट कर रह गई। अब लोकसभा उपचुनाव में भी परिस्थितियां वैसी ही दिख रही हैं। सपा और बसपा के बीच वर्ष 1995 से ही शीर्ष स्तर पर संवादहीनता, कटुता और जमीनी स्तर पर सीधी दुश्मनी का माहौल रहा है। ऐसे में अब अगर बसपा सुप्रीमो ने कथित सौदेबाजी के तहत एक राज्यसभा सीट के एवज में दो लोकसभा सीट पर समर्थन की बात कही है तो इसे जमीनी स्तर पर कार्यरूप देने के लिए दोनों दलों के उन मतदाताओं को एक मंच पर आना होगा जिनके लिए दशकों पुरानी रंजिश को एक झटके में भुला पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो सकता है। ऐसे में अगर अपने शीर्ष नेतृत्व के निर्देश से निराश होकर मतदाताओं का काफी बड़ा वर्ग भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो जाए तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं कहा जाएगा। इसके अलावा सपा और कांग्रेस के एक मंच पर आने से उनका अवसरवादी चेहरा ही सामने आया था जिसे विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने स्वीकार नहीं किया। उसी प्रकार बसपा भी कल तक हर मामले में जिस सपा को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी उसके समर्थन में अचानक बहनजी का खुलकर मैदान में आ जाना मतदाताओं को किस हद तक स्वीकार्य होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। रहा सवाल जातीय समीकरण का तो इसमें भी सपा और बसपा का गठजोड़ उसी प्रकार बेमेल दिख रहा है जिस प्रकार सपा और कांग्रेस की दोस्ती बेमेल साबित हुई थी। इस उपचुनाव में सपा के परंपरागत यादव और मुस्लिम मतदाता को मजबूती देने के लिए अपने दलित वोट को उसके साथ जोड़ने की बहनजी की कवायद का यह परिणाम भी सामने आ सकता है कि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के खिलाफ हिन्दू वोटर लामबंद हो जाएं। ऐसे में अगर चुनाव ने स्वाभाविक तौर पर सांप्रदायिक रंग पकड़ा तो बहनजी का दलित और सपा का यादव वोटबैंक किस हद तक उनके साथ जुड़ा रह पाएगा यह कहना भी मुश्किल है। वैसे भी बहनजी के परंपरागत मतदाताओं से अब तक सपा के दोनों परंपरागत समर्थक वर्ग की कभी नहीं बनी। जब भी कहीं सांप्रदायिक मामले सामने आए तो जमीनी टकराव अक्सर दलितों और मुस्लिमों के बीच ही हुआ है। जमीनी स्तर पर उनके बीच इतनी गहरी और चैड़ी खाई बनी हुई है जिसे अचानक किए गए एक फैसले से पूरी तरह पाट पाना कतई संभव नहीं हो सकता है। ऐसे में बहनजी ने भाजपा के बढ़ते प्रसार व जनाधार को देखते हुए अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए सायकिल की सावारी के विकल्प को प्रायोगिक तौर पर आजमाने की जो पहलकदमी की है उसकी राहें फिलहाल तो कतई आसान नहीं दिख रही हैं। लेकिन सियासत खेल ही है असीमित संभावनाओं का। लिहाजा चुनावी नतीजा सामने आने से पहले निर्णायक तौर पर किसी नतीजे पर पहुंच जाना उचित नहीं होगा। इसलिए बेहतर यही होगा कि इस गठजोड़ के प्रदर्शन का इंतजार कर लिया जाए ताकि मतदाताओं के मूड का भी पता चल सके और आगामी दिनों के संभावित समीकरणों की तस्वीर भी साफ हो जाए। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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सोमवार, 26 फ़रवरी 2018
अनवरत हो रहा विकास... मगर किसका?
अनवरत हो रहा विकास... मगर किसका?
देश को अंग्रेजों से आजादी मिले 71 साल होने को आए। तब से लेकर अब तक देश का लगातार विकास ही हो रहा है। तमाम सरकारें विकास में अपना योगदान देती आ रही हैं। इसका नतीजा भी दिख रहा है कि आज हमारा देश दुनियां की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि छठे नंबर पर आने के लिए हमने उस ब्रिटेन को जीडीपी की दौड़ में पीछे छोड़ा है जिसने हमें दो सौ साल तक अपना गुलाम बनाकर रखा। इसके अलावा अंतरिक्ष में हम मंगल तक पहुंच चुके हैं। जमीन पर भी पूरी दुनिया में किसी की मजाल नहीं है कि हमें अलग करके विश्व राजनीति के किसी समीकरण की कल्पना भी कर ले। हर क्षेत्र में विकास की तमाम ऊंचाइयां लांघते हुए वाकई हमारा देश विकासशील से विकसित होने की ओर छलांग लगा चुका है। लेकिन विकास की इस अनवरत यात्रा की राहों में हम इतने मशगूल हो गए हैं कि अब यह पता नहीं चल पा रहा कि आखिर इस राह की मंजिल कहां है और इसका मकसद क्या है। अगर सिर्फ कागजों में दिखाने के लिए विकास हो रहा है तब तो कहने या सुनने के लिए कुछ रह ही नहीं जाता है। क्योंकि देश के आम लोगों के लिए तो इस विकास यात्रा का आज भी कोई खास मायने या मतलब नहीं दिख रहा है। अलबत्ता भारत की मौजूदा तस्वीर उस रेल की तरह दिख रही है जिसमें आम आदमी जनरल डिब्बों में घास-भूसे की तरह ठुंसकर सफर करता है और खास आदमी अत्याधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस पूरे डब्बे के आकार के सैलून कोच में अकेले सफर का आनंद लेता है। कोई दूसरा झांक भी नहीं सकता उसके कोच में। ट्रेन में पहले, दूसरे व तीसरे दर्जे के वातानुकूलिक डिब्बे भी रहते हैं और स्लीपर क्लास भी होता है। लेकिन आम आदमी का जीवन जनरल से स्लीपर की औकात बनाने में बीत जाता है और स्लीपर वाला तीसरे दर्जे के वातानुकूलित डिब्बे में जाने की जद्दोजहद में जुटा रहता है। अलबत्ता ट्रेन की हालत हर दिन ऐसी ही दिखती है जैसे आम आदमी को घुसने या लटकने भर की इजाजत देकर उसने बहुत बड़ा एहसान कर दिया हो। तभी तो एक ओर दुनिया के 119 देशों में भुखमरी की स्थिति के बारे में आयी रिपोर्ट में भारत को शर्मनाक ढ़ंग से 100वें पायदान पर खड़ा होना पड़ा है। भुखमरी सूचकांक में हमसे बेहतर स्थिति में नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश हैं। यह स्थिति तब है जबकि फोर्ब्स की हालिया सूची के मुताबिक विश्व के शीर्ष 10 धनवानों में सबसे ज्यादा भारत के ही लोग हैं। विकास के असंतुलन का आलम यह है कि एक ओर अंतरिक्ष को भेदकर मंगल पर ठिकाना बनाने की योजना बन रही है जबकि दूसरी ओर केरल में एक नीम-पागल आदिवासी युवक को पढ़े-लिखे सभ्य समाज के लोग सिर्फ इसलिये पीट-पीटकर मार डालते हैं क्योंकि उसने पेट की आग बुझाने के लिए एक किलो चावल चुराने का गुनाह कर दिया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विकास की अंधी दौड़ का मकसद क्या है? इसका निर्णायक मुकाम कहां है? अगर विकास का मकसद सबको पेट भर भोजन मुहैया कराना होता तो देश में भूख से मौतें नहीं हो रही होतीं। केरल में आदिवासी युवक को महज एक किलो चावल के पीछे अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती। झारखंड में मां की गोद में सिर रखकर ‘भात-भात’ रटते हुए मासूम संतान को तड़पकर मरना नहीं पड़ता। यानि लोगों का पेट भरने के लिए तो नहीं हो रहा है यह विकास। यह विकास लोगों को तन ढ़ांपने का कपड़ा या सिर छिपाने की छत देने के लिए भी नहीं हो रहा है। अगर ऐसा होता तो दिल्ली की सड़कों पर ही सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ऐसे डेढ़ लाख लोगों का बसेरा नहीं होता जिनके पास कुछ भी नहीं है। इस कुछ भी नहीं होने का मतलब वाकई कुछ भी नहीं होना ही है। जब देश की राजधानी में यह स्थिति है तो बाकी इलाकों की व्यथा-कथा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। यानि गुजरात में जो नारा दिया गया कि विकास पागल हो गया है वह कतई गलत नहीं था। पागल उसको ही तो कहते हैं जिसे पता ही नहीं कि वह क्या कर रहा है और क्यों कर रहा है। खैर, अगर यह भी मान लें कि 70 सालों से अनवरत होता आ रहा विकास देश और देशवासियों की खुशहाली के लिए है तब तो खुशहाली को ही विकास का पैमाना बनाना चाहिए था। जैसा कि भूटान ने बनाया हुआ है। वह जीडीपी के बजाए खुशहाली से अपनी तरक्की को नापता है। भूटान के लिए आम लोगों की खुशहाली मायने रखती है। भले इसके लिए जीडीपी के आंकड़ों को गर्त में ही क्यों ना पहुंचाना पड़े। इसका नतीजा यह है कि वहां के लोग खुश हैं। उन्हें किसी वैश्विक दौड़ या होड़ की परवाह नहीं है। वहां संतुष्टि और खुशहाली के साथ आवश्यक व अनवरत विकास भी हो रहा है। इसके उलट हमारे यहां जो विकास हो रहा है उसमें ना तो सबके लिए रोटी, कपड़ा व मकान की उपलब्धता सुनिश्चित हो रही है और ना ही पढ़ाई, दवाई और कमाई का सबको जुगाड़ मिल पा रहा है। यानि खुशहाली की कौन कहे यहां तो बुनियादी मसले ही हल नहीं हो पा रहे हैं। फिर किसका विकास, कैसा विकास, किस लिए विकास। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur
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