सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

‘गधे ही गधे हैं, जहां पर भी देखो’

‘गधे ही गधे हैं, जहां पर भी देखो’


सही कहा गया है कि जहां ना पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। वर्ना दिवंगत हास्य कवि ओमप्रकाश आदित्य अपनी युवावस्था में ही इस सत्य का साक्षात्कार कतई नहीं कर सकते थे कि ‘इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं, जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं, गधे हंस रहे, आदमी रो रहा है, हिंदोस्तां में ये क्या हो रहा है, जवानी का आलम गधों के लिये है, ये दिल्ली ये पालम गधों के लिये है, धोड़ों को मिलती नहीं घास देखो, गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो, जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है, जो माइक पे चीखे वो असली गधा है, यहां आदमी की कहां कब बनी है, ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है।’ आदित्य साहब की इस कविता को कल तक लोग व्यंग्य-विनोद के तौर पर मजे लेकर सुना करते थे। लेकिन अब तस्वीर बदल गयी है। गधों को लेकर जिस कदर गंभीरता का माहौल बन रहा है उसी अनुपात में इस कविता पर भी गंभीर चिंतन की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जाने लगी है। गधों के प्रति गंभीरता का आलम यह है कि प्रधानमंत्री स्वयं ही सीना ठोंककर यह बता रहे हैं कि देश सेवा की प्रेरणा उन्हें गधों से ही मिली है। गधों को देख-देखकर ही वे कठिन परिश्रम करने में सक्षम हो पाए हैं। गधे की तरह देश की जिम्मेवारियों का बोझ उठाने का मौका मिलने को वे अपना सौभाग्य मानते हैं और पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक की जिम्मेवारी उठाने के लिये लगातार प्रयत्नशील दिखाई पड़ते हैं। अब भले ही दिग्विजय सिंह लाख यह कहें कि मोदी बिल्कुल गधे की तरह काम कर रहे हैं, अथवा ‘रेनकोट’ को गाली बताने वाली कांग्रेस भी औपचारिक तौर पर यह समझाए कि गधा शब्द किसी गाली का पर्याय नहीं है। लेकिन सदी के महानायक से गुजरात के गधों का प्रचार नहीं करने की अपील करके अखिलेश ने जिस गधा-गाथा के गायन-वाचन की शुरूआत कर दी है उसकी मारकता का दायरा लगातार बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। इस गधा-गाथा की गूंज गुजरात में भी सुनाई देने लगी है जहां पाटीदार आंदोलन के दम पर भाजपा की जड़ खोदने में जुटे हार्दिक पटेल ने प्रदेश के पाटीदारों का नेतृत्व करनेवाले 44 विधायकों को खुले तौर पर गधा करार दे दिया है। यानि गधा-गाथा के सियासी पारायण का श्रीगणेश अभी से गुजरात में भी हो गया है जहां इस साल के अंत में विधानसभा का चुनाव होना है। निश्चित तौर पर कांग्रेस द्वारा ऐसे दल के साथ गठबंधन किया जाना गुजरात के चुनाव में बड़ा मुद्दा बननेवाला है जिसने गुजरातियों को गधा बताया है। खैर, गुजरात के चुनाव में गधा-गाथा का कितना रंग जमेगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन उत्तर प्रदेश में तो इसका ऐसा चकाचक रंग दिख रहा है कि इसने जनहित के बाकी तमाम ज्वलंत मुद्दों को काफी पीछे छोड़ दिया है। आलम यह है कि तमाम सियासी पार्टियों की पूर्वनिर्धारित चुनावी रणनीति पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और यह चुनाव सिर्फ इस बात पर केन्द्रित हो गया है कि रोजाना थोक के भाव में उछाले जा रहे बेमानी मुद्दों को अपने साथ जोड़कर किस प्रकार जनता का सहयोग व सहानुभूति अर्जित किया जाये। इसमें किसी भी पार्टी की ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। सब पिले पड़े हैं एक दूसरे के पीछे। लेकिन बारीकी से निगाह डाली जाये तो विरोधियों को इस बेमानी बतकुच्चन की राह पर लाने का सेहरा तो मोदी-शाह की जोड़ी को ही जाता है। वर्ना सपा-कांग्रेस ने तो विकास के एजेंडे को ही आगे रखकर चुनाव अभियान की शुरूआत की थी। बसपा ने भी मायावती के पिछले कार्यकाल की याद दिलाते हुए सुदृढ़ कानून व्यवस्था देने का वादा किया था और यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया था कि अगली बार सरकार बनाने का मौका मिलने पर वे मूर्ति-स्मारक बनवाने की पिछली गलतियां हर्गिज नहीं दोहराएंगी। लेकिन अगर इस एजेंडे पर ही चुनाव केन्द्रित रहता तो भाजपा के लिये अपनी जगह बनाना बेहद मुश्किल था। पूरी लड़ाई बुआ-भतीजा के बीच ही सिमट कर रह जाती। भाजपा को तो कोई टके के भाव भी नहीं पूछता। लिहाजा अपनी जगह बनाने के लिये आवश्यक था कि विरोधियों को उन मसलों से डिगाया जाये जिसका संतुलन साधकर वे सत्ता में वापसी की कोशिशें कर रहे हैं। यही वजह रही कि शाह और मोदी की जोड़ी ने विरोधियों के मुद्दों को केन्द्र बनाकर ही उन्हें घेरा। जिस विकास को मुद्दा बनाया गया था उसकी असमानता को उजागर करके उसका खोखलापन अनावरित किया गया। विकास की धारा का सिर्फ एक वर्ग विशेष के दरवाजे पर जाकर अटक जाने को तूल देते ही वह हो गया जिसकी भाजपा को जरूरत थी। विकास की बातें पीछे छूट गयीं और केन्द्र में आ गया श्मशान और कब्रिस्तान का मुद्दा, सरकारी नियुक्ति में वर्ग विशेष को मिल रही तरजीह का मामला और सर्वसमाज की बेकदरी का मसला। जाहिर है कि जिस विकास की तस्वीर दिखाकर सत्ता में वापसी की संभावनाएं टटोली जा रही हों उसका गुब्बारा इस कदर फूटेगा तो कोई भी अपना आपा खो सकता है। तभी तो बौखलाहट में अखिलेश ने ऐसी बात कह दी कि पूरी चुनावी चर्चा के केन्द्र में गधे आ गए हैं। लेकिन गधा-गाथा के पारायण में अपनी समस्याओं का निवारण तलाशने वालों को यह नहीं भूलना चाहिये कि गधा सिर्फ बेड़ा पार नहीं करता बल्कि दुलत्ती मारकर पार-घाट भी पहुंचा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

‘खता किसी और की, सजा किसी और को’

‘खता किसी और की, सजा किसी और को’

पुरानी कहावत है कि ‘खेत खाय गधा और मार खाए जुलाहा।’ यह बात सियासत में जितनी सटीकता से लागू होती है उतनी अन्य क्षेत्रों में लागू नहीं होती। यानि सियासत में सिर्फ अपनी ही गलतियों का खामियाजा नहीं भुगतना पड़ता। कई बार ऐसे मामले भी सिरदर्दी का सबब बन जाते हैं  जिस खता को अंजाम देने के बारे में कभी सोचा भी ना गया हो। यही हुआ था बिहार विधानसभा के चुनाव में। कहां तो भाजपा ने ही आनुपातिक तौर पर सबसे अधिक दलित, पिछड़े व आदिवासी समाज के नेताओं को प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और मंत्री बनने का मौका दिया। देश में आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने के लिये कमंडल से पहले मंडल की लड़ाई में पुरजोर हिस्सेदारी की और ‘एकात्म मानव दर्शन’ व ‘अंत्योदय’ सरीखे सिद्धांतों को सियासत का आधार बनाया। लेकिन आरक्षण की स्थापित अवधारणा पर पुनर्विचार की जरूरत बताकर आरएसएस प्रमुख ने ऐसी गलती कर दी जिसका भाजपा को इतना जबर्दस्त खामियाजा भुगतना पड़ा कि उसे याद करके भाजपाई रणनीतिकार आज भी सिहर उठते हैं। बिहार चुनाव के ऐन पहले संघ प्रमुख की जुबान से निकली उस बात को विरोधी महागठबंधन ने इस कदर जमकर भुनाया कि भाजपा का पूरी तरह भट्ठा ही बैठ गया। जबकि हकीकत तो यह है कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू कराने की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभानेवाली भाजपा की केन्द्र या प्रदेशों की किसी सरकार ने आरक्षण व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने के बारे में कभी सोचना भी गवारा नहीं किया है। लेकिन बात चुंकि पार्टी की मातृ-संस्था कहे जानेवाले संघ के मुखिया ने कही थी तो इसे इस रूप में प्रचारित किया गया मानो भाजपा की सरकार बनते ही आरक्षण व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाएगा। जाहिर है कि संघ की उस गलती का भाजपा को खामियाजा तो भुगतना ही था। लेकिन मजाल है कि एक बार की गलती से संघियों ने कोई सीख ली हो। तभी तो मौजूदा पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले भी संघ परिवार के शीर्ष विचारकों में शुमार होनेवाले मनमोहन वैद्य ने उन्हीं बातों को दोहरा दिया जिसे बयां करके संघ प्रमुख बिहार चुनाव में पहले ही भाजपा का बंटाधार कर चुके हैं। हालांकि वैद्य के बयान की मारक क्षमता को देखते हुए ना सिर्फ संघ की ओर से औपचारिक तौर पर इसका खंडन किया गया बल्कि भाजपा ने भी उनके बयान से तत्काल ही दूरी बना ली और जल्दी ही वैद्य को भी सफाई देने के लिये सामने आना पड़ा। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने वैद्य के इन विचारों को संघ-भाजपा की अंदरूनी सोच साबित करने में रात-दिन एक कर दिया। अब इसका असर भी दिखने लगा है क्योंकि यूपी में जिस बसपा को सभी ने समाप्त मानना शुरू कर दिया था उसने अगर सत्ता के संघर्ष को त्रिकोणीय स्वरूप दे दिया है तो निश्चित तौर पर इसमें वैद्य के विचारों की भूमिका को कतई सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। हालांकि भाजपा को दूसरों की गलती का खामियाजा सिर्फ यूपी में ही नहीं भुगतना पड़ रहा है बल्कि इससे कहीं अधिक मार उसे पंजाब और उत्तराखंड में झेलनी पड़ रही है जहां उसने ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ा हुआ है जिनकी करनी का फल उसे ही भुगतना पड़ रहा है। पंजाब की बात करें तो वहां की सत्ता में भाजपा की भूमिका तो सिर्फ छोटे सहयोगी की ही थी। लेकिन अकालियों की करतूतों के कारण ऐसी भद पिटी है कि इस दफा राजग को तीसरे स्थान पर रहना पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। जाहिर है कि इसकी सबसे अधिक बदनामी केन्द्र की मोदी सरकार के अलावा भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को ही झेलनी पड़ेगी। कोई यह तो कहेगा नहीं कि अकालियों की सरकार गिर गयी। हर कोई इसे इसी रूप में प्रचारित करेगा कि भाजपा की पकड़ से पंजाब भी निकल गया। इसी प्रकार उत्तराखंड में आज अगर भाजपा को कांग्रेस की कथित ‘वन मैन आर्मी’ से कड़ी टक्कर झेलनी पड़ी है तो इसकी इकलौती वजह है कांग्रेस के उन सूरमाओं को संगठन में शामिल करना जिन्होंने लंबे अर्से तक कांग्रेस में रहकर ऐसे-ऐसे कारनामों को अंजाम दिया कि सूबे की जनता उन्हें कतई माफ करने के मूड में नहीं दिख रही है। खास तौर से जिस केदारनाथ आपदा के मामले को लेकर भाजपा ने प्रदेश की रावत सरकार का घेराव करने की रणनीति अपनाई थी उसके असली कर्ता-धर्ता तो वे माने जाते हैं जो उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और अब पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो गये हैं। हालांकि भाजपा ने उन्हें टिकट देने से तो परहेज बरत लिया लेकिन उनके बेटे को टिकट से वंचित करना संभव नहीं हो सका। इसके अलावा कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने जाने के बाद साढ़े चार साल तक सत्ता की मलाई का लुत्फ उठानेवाले एक दर्जन से भी अधिक विधायक इस दफा भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में दिखाई पड़ रहे हैं। इसीका नतीजा है कि वहां भाजपा से उन सवालों का भी जवाब मांगा जा रहा है जिस गुनाह से उसका दूर का भी वास्ता नहीं है। खैर, इस तरह के मामलों को समग्रता में देखने से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि एक बार के लिये दुश्मन की गलतियों का फायदा उठाने में भूल करके भी जीत उम्मीद की जा सकती है लेकिन हिमायतियों की गलतियों का खमियाजा भुगतने से बच पाना तो नामुमकिन ही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

‘पराई चुपड़ी पर टिकी ललचाई निगाहें’

‘पराई चुपड़ी पर टिकी ललचाई निगाहें’

बेशक बाबा फरीद कह गये हों कि ‘रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चुपड़ी ना ललचावे जी।’ लेकिन कोई माने तब ना। आज कल चिराग लेकर ढ़ूढ़ने से भी ऐसा कोई नहीं मिलता जो अपनी चुपड़ी से संतुष्ट हो। ऐसे में रूखी-सूखी से संतुष्ट हो जानेवाले को कौन तलाशे, क्यों तलाशे? आलम यह है कि सबकी निगाहें दूसरों की थाली पर ही टिकी हैं। जिनकी थाली में पहले से ही चुपड़ी पड़ी है वह भी दूसरों को रूखी-सूखी हजम नहीं होने देना चाहते और जिनके हिस्से में रूखी-सूखी आई है वे दूसरों की चुपड़ी में मिट्टी डालने की कोशिश कर रहे हैं। अपनी थाली से अधिक चिंता लोगों को पराई थाली की सता रही है। अपना खाना खराब हो तो हो, मगर दूसरे का जायका पहले बिगाड़ने में सभी जुटे हुए हैं। इसी का नतीजा है कि सबकी अपनी थाली लगातार बिगड़ती जा रही है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अपनी थाली बचाने के बजाय दूसरे की थाली का समीकरण समझने और उसके मुताबिक अपने मुनाफे का गुणा-भाग करने में ही सभी मशगूल दिख रहे हैं। इस उठापटक और खुराफाती खुरपेंच ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को बेहद दिलचस्प मोड़ पर ला दिया है। इन पांच चुनावी राज्यों में से दो में कांग्रेस, दो में राजग और एक में सपा की सरकार है। लिहाजा असली मुकाबला भले ही इन दलों के बीच ही दिख रहा हो लेकिन इन तीनों में ही अपनी थाली बचाने से ज्यादा दूसरे का जायका बिगाड़ने की ऐसी होड़ मची है कि अब तीसरी थाली पर ललचाई नजरें गड़ाने के अलावा इसके पास दूसरा कोई विकल्प ही बचा है। मिसाल के तौर पर यूपी की ही बात करें तो अपने परंपरागत वोटबैंक की चिंता में कोई दुबला नहीं हो रहा। सबको चिंता सता रही है उन वोटों की जो उन्हें किसी सूरत में हासिल नहीं हो सकती। तीसरी थाली के उन पकवानों की महक ने सबको मदहोश किया हुआ है और सबको उम्मीद है कि अगर तीसरी थाली थोड़ी सी वजनदार निकल आये तो उनका खाना खराब होने से बच जायेगा। भाजपा का पूरा समीकरण अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे और बहुसंख्यकों के ध्रुवीकरण पर टिका है जबकि सायकिल की हैंडिल पकड़ने का हाथ को मौका दिए जाने के पीछे अल्पसंख्यकों को एकजुट करने के अलावा सवर्ण वोटबैंक में सेंध लगाने की सोच ही छिपी हुई है। लेकिन एक तरफ भाजपा की रणनीति में ऐसा पेंच फंसा है कि ना तो किसी एक पक्ष में अल्पसंख्यकों की एकजुटता उसे अपने लिये फायदेमंद दिख रही है और ना ही ऐसा हुए बगैर बहुसंख्यकों का प्रतिक्रियात्मक ध्रुवीकरण होना संभव हो पा रहा है। लिहाजा उसकी थाली का जायका अब बसपा के समीकरण पर आधारित हो गया है। अगर बसपा ने अल्पसंख्यकों में ठीक-ठाक सेंध लगा ली तो ठीक वर्ना अगले पांच साल फिर हारे को हरिनाम का ही सहारा रहेगा। दूसरी ओर सपा भी सिर्फ अपने परंपरागत वोटबैंक के सहारे चुनावी नैया पार कर पाती तो हाथ का सहारा ही क्यों लेती? उसे बेहतर पता है कि रात में राहें रौशन करने के लिये सिर्फ चांद के भरोसे नहीं रहा जा सकता। लेकिन अपनी रौशनी उसे तभी राहें दिखा सकती हैं जब भाजपा के टाॅर्च की रौशनी को आंखों पर पड़ने से रोका जाये। वर्ना आंखें चुंधिया गईं तो दिन में भी दिखना मुश्किल हो सकता है। लिहाजा उसका जायका तभी सुधर सकता है जब भाजपा की थाली में बसपा का हाथी, सूंढ़ से धूल डालने में कामयाब हो सके। यानि सबका समीकरण दूसरों का खेल बिगड़ने पर ही आधारित दिख रहा है। लेकिन अपने दम पर दूसरे का खेल बिगाड़कर अपना खेल बनाने की हैसियत में कोई नहीं है। सबको तीसरे पक्ष से मजबूत हस्तक्षेप की दरकार है। यही हाल पंजाब और गोवा का भी है जहां तीसरी ताकत की निर्णायक भूमिका पर सभी ललचाई निगाहें गड़ाए हुए हैं। इन दोनों ही सूबों में आप उसी भूमिका में है जो यूपी में बसपा की है। यानि आप का प्रदर्शन ठीक-ठाक रहे तो ही अकाली-भाजपा की आस को आधार मिल पाएगा। हालांकि दोनों सूबों में मतदान समाप्त हो चुका है लेकिन अभी सीना ठोंककर कोई यह दावा नहीं कर सकता है कि वह अपने दम पर बहुमत की बाधा को पार करने वाला है अथवा उसने विरोधी पक्ष को किस स्तर पर पटखनी देने में कामयाबी पाई है। इसकी वजह भी साफ है कि अपनी थाली को सजाने-संवारने के बजाय सभी दूसरों का जायका बिगाड़ने में ही जुटे थे ऐसे में तीसरे की थाली से अपनी बिगड़ी की भरपाई करने के अलावा किसी के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। हालांकि मणिपुर और उत्तराखंड में सतही तौर पर स्थिति थोड़ी अलग अवश्य दिख रही है लेकिन गहराई से परखने पर वहां भी तीसरी थाली के प्रदर्शन से ही विजेता का चयन हो पाने की तस्वीर दिख रही है। बेशक यह तीसरी थाली अलग से नहीं सजी है बल्कि दो थालियों में हुई बंदरबांट के नतीजे में ही तीसरे का सृजन हुआ है। लेकिन अब यह तीसरी थाली मुख्य दोनों थालियों की जीत-हार तय करने की स्थिति में आ गई है। खैर, किसी और की चुपड़ी पर बाकियों की ललचाई निगाहें कितनी ही मजबूती से क्यों ना गड़ी हों लेकिन इस संभावना को कतई खारिज नहीं किया जा सकता है एक-दूसरे की थाली में मिट्टी डालने वालों को आखिर में तीसरी थाली ही गच्चा दे जाए। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 
 @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

‘सियासत से संवेदना की बेमानी उम्मीद’

‘सियासत से संवेदना की बेमानी उम्मीद’


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिये भाजपा की केन्द्रीय चुनाव समिति द्वारा किये गये टिकट वितरण ने ऐसी आग लगाई है जिसकी चपेट में आकर सूबे के अधिकांश भाजपाईयों की उम्मीदें स्वाहा हो गयी हैं। कहां तो उम्मीद जताई जा रही थी कि जिन जमीनी नेताओं ने लोकसभा की 80 में से 72 सीटों पर कमल खिलाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी उन्हें पुरस्कार के तौर पर विधानसभा का टिकट अवश्य मिलेगा और कहां तो हालत यह हो गयी है कि सूबे के कई जनपदों की तमाम सीटों पर उन लोगों को टिकट दे दिया गया है जो ना सिर्फ दूसरे दलों से आये हैं बल्कि लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा की हार सुनिश्चित कराने के लिये उन्होंने एड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ था। बात चाहे बस्ती, हरदोई व उन्नांव की करें अथवा बाराबंकी, फैजाबाद व अम्बेडकर नगर जनपद की। सूबे के हर इलाके की तस्वीर कमोबेस एक सी ही है। यहां तक कि प्रदेश का हृदय क्षेत्र कहे जानेवाले लखनऊ में भी जब कुल नौ में से सात सीटें उन लोगों को दे दी जाती हों जिनका पूरा राजनीतिक जीवन ही भाजपा को कोसते-गरियाते गुजरा है तो फिर बाकी इलाकों का तो कहना ही क्या। हालांकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि इस दफा टिकट वितरण का इकलौता पैमाना उम्मीदवार की जीत दर्ज कराने की संभावना को ही बनाया गया है। जिस सीट पर जिसके जीत की संभावना सबसे मजबूत नजर आयी उसे टिकट दे दिया गया। इसमें यह नहीं देखा गया है कि टिकट का दावेदार वैचारिक व सैद्धांतिक तौर पर पार्टी के कितने करीब या दूर रहा है। यानि पार्टी को तो सिर्फ जीत से मतलब है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि टिकट वितरण में 40 फीसदी से भी अधिक सीटें बाहरी लोगों को देने के कारण किस कार्यकर्ता की भावना आहत हुई है या किसकी संवेदना को सदमा पहुंचा है। कुल मिलाकर संगठन ने तो अपनी राह तय कर ली है और लगे हाथों पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने यह ऐलान भी कर दिया है कि घोषित उम्मीदवारों की सूची में फेरबदल की अब कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन अब असली परेशानी तो उस कार्यकर्ता को झेलनी है जिसे जमीन पर संगठन की जीत सुनिश्चित कराने के लिये मतदाताओं मनाना, समझाना व रिझाना है। उसकी समझ में खुद ही नहीं आ रहा कि आखिर ऐसा कैसे हो गया कि जिस जमीन को उसने दशकों की मेहनत से जोता-सींचा और अपने खून-पसीने की खाद से उपजाऊ बनाया वहां जब फसल काटने की बारी आई तो यह अधिकार उन लोगों को मिल गया जिन्होंने फसल का बीज ही नष्ट करने की कसम खाई हुई थी। जिनके साथ जमीनी संग्राम करते हुए कार्यकर्ताओं ने कमल खिलाने की लड़ाई लड़ी अब उनके लिये ही वोट मांगने मतदाताओं के पास वे जाएं भी तो किस मूंह से। अब तक जिनका विरोध किया उनका अचानक जयकारा लगाने के लिये भी तो 56 ईंच का ही सीना चाहिये। जमीन पर गद्दा बिछाकर हवा में गुलाटियां मारना और बात है। लेकिन सख्त-सपाट जमीन पर अचानक सिर के बल चलने की कलाकारी तो बिरलों को ही आती है। ऐसे में स्वाभाविक है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के फैसलों का विरोध तो होगा ही। वह हो भी रहा है। लखनऊ से लेकर इलाहाबाद तक और बनारस से लेकर दिल्ली तक। कार्यकर्ताओं की टोली कहीं भी अपने बड़े नेताओं के विरोध का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। लेकिन सवाल है कि सियासत से संवेदना की उम्मीद टूटने के कारण मुखर हो रहे इस विरोध के प्रति कितनी संवेदना दिखाई जाये। क्यों दिखाई जाये? सिर्फ इसलिये क्योंकि भाजपा ने कार्यकर्ताओं की संवेदना से ज्यादा जीत की संभावना को तरजीह दी है। यहां विचारणीय है कि सत्ता के बिना सिर्फ सूखी संवेदना के दम पर संगठन से कार्यकर्ताओं को क्या हासिल हो सकता है? संगठन अगर सत्ता में आने के बाद कार्यकर्ताओं की अनदेखी करे और अपने हिस्से की मलाई विरोधियों को मुहैया कराये तो इसका विरोध किया जाना चाहिये। लेकिन ऐसा होने का ना तो कोई कारण दिख रहा है और ना ही कोई परंपरा रही है। बल्कि पार्टी की जीत में ही कार्यकर्ताओं का हित निहित रहता है। इस बात को जो कार्यकर्ता नही समझना चाहे उसका तो भगवान भी भला नहीं कर सकते। भलाई इसी में है कि विरोधी को भी अपना बनाया जाये। इसमें तो किसी का भला नहीं है कि अपनों का ही विरोध किया जाये। जिसे पार्टी ने टिकट दिया है उसकी भी अब जिम्मेवारी है कि वह जमीनी कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझे और उनके साथ तालमेल बनाकर आगे बढ़े। साथ ही कार्यकर्ताओं की भी जिम्मेवारी है कि वे पार्टी द्वारा पेश किये गये प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित कराने में अपनी पूरी ताकत झोंक दें। वैसे भी सेना में किसे किस मोर्चे पर लगाया गया है यह बात मायने नहीं रखती। मायना होता है सेना की जीत का। जीती हुई राम की सेना का यथासंभव सहयोग करनेवाली गिलहरी से लेकर लंगूर-वानरों को भी आज तक स्नेह व सम्मान हासिल होता आ रहा है। वैसे भी जब भगवान कहे जानेवाले श्रीराम को भी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिये विरोधी पक्ष के विभिषण को अपने साथ जोड़ना पड़ा था तब आज की सियासत में अगर विरोधी खेमे टूटकर आने वालों को हर जगह सिर-आंखों पर बिठाया जा रहा है तो इसमें गलत ही क्या है? ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 23 जनवरी 2017

‘अब सियासत में राय बुजुर्गों से नहीं ली जाती’

‘अब सियासत में राय बुजुर्गों से नहीं ली जाती’


जवानी के दिनों में मुनव्वर राणा साहब ने भी यही लिखा था कि ‘इश्क में राय बुजुर्गों से नहीं ली जाती, आग बुझते हुए चूल्हों से नहीं ली जाती, इतना मोहताज न कर चश्मे-बसीरत मुझको, रोज इम्दाद चरागों से नहीं ली जाती।’ लिहाजा अगर आज के दौर में बुजुर्गों को हाशिए पर भी जगह मिलनी मुश्किल होती जा रही है तो इसके लिये उबलते जोशो-खूं वाली पीढ़ी को ही तो इकलौता दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कहीं ना कहीं गलतियां तो कई मोर्चों पर हुई हैं जिसका परिणाम इस संवेदनहीनता के तौर पर सामने आ रहा है। वर्ना सनातन सत्य की तरह समाज के हर तबके के बुजुर्गों की हालत एक जैसी कतई नहीं होती। लेकिन बुजुर्गों को अगर सबसे अधिक उपेक्षा किसी एक क्षेत्र में झेलनी पड़ रही है तो वह सियासत ही है। सियासत में तो बजुर्गों को इस लायक भी नहीं समझा जाता कि वक्त-बेवक्त उनकी खोज-खबर ले ली जाये। अगर हालचाल जानने की पहल भी की जाती है तो बकायदा मीडिया का काफिला साथ लेकर ताकि यह संदेश दिया जा सके कि बुजुर्गों का कितना ध्यान रखा जा रहा है। यानि खाट पर पड़े अंतिम घड़ियां गिन रहे बुजुर्ग का भी अपनी सियासत चमकाने के लिये तो इस्तेमाल किया जाता है लेकिन उनके चेहरे की चमक बढ़ाने का प्रयास करना किसी को गवारा नहीं होता। और इस मामले में हर सियासी दल का रिकार्ड काफी हद तक एक जैसा ही है। मिसाल के तौर पर जार्ज फर्नांडीज, अटल बिहारी वाजपेयी, जसवंत सिंह, जगन्नाथ मिश्र, वीएस अच्युतानंदन, कैलाश जोशी और प्रियरंजन दासमुंशी सरीखे जिन नेताओं की भारतीय राजनीति में कभी तूती बोलती थी वे आज कहां और किस हाल में हैं इसकी सुध लेना भी गवारा नहीं किया जा रहा है। खैर, ये तो ऐसे नाम हैं जिनके चाहनेवालों को सिर्फ इतने से ही सुकून मिल रहा है कि ये जीवित हैं और इनकी सांसें चल रही हैं। वर्ना अब ये लोग इस स्थिति में बचे ही नहीं हैं कि दोबारा अपने पैरों पर खड़े होकर सत्ता के गलियारों में चहलकदमी भी कर सकें। लेकिन सियासत ने तो उनको भी किनारे लगाने से गुरेज नहीं किया है जो ना सिर्फ स्वस्थ और सक्षम हैं बल्कि आज भी उनकी जुबान से फिसली हुई बातें मीडिया की सुर्खियों में छा जाने की क्षमता रखती है। इनके साथ ऐसा बर्ताव हो रहा है मानो इनका सक्षम होना ही बाकियों के लिये सिरदर्दी हो। तभी तो कभी लालकृष्ण आडवाणी को सार्वजनिक तौर पर अपने दर्द का इजहार करते हुए यह गुहार लगाने के लिये मजबूर होना पड़ता है कि मौजूदा माहौल को बर्दाश्त करने से बेहतर है कि संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया जाये। कभी मुलायम सिंह यादव को भावुक होकर यह अपील करनी पड़ती है कि उनके हाथ से सपा की बागडोर ना छीनी जाये। यहां तक कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके कद्दावर कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी को अगर उम्र के दसवें दशक में धुर विरोधी भाजपा के करीब जाने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है तो निश्चित तौर पर इसके पीछे कहीं ना कहीं उस उपेक्षा का ही दंश है जो उन्हें संगठन के भीतर झेलना पड़ रहा है। हालांकि अपनों से मिला दर्द तो ऐसा ही होता है जिसे चुपचाप सहने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं होता। तभी तो मार्गदर्शक के नाम पर मूकदर्शक बना दिये गये आडवाणी व डाॅ जोशी सरीखे नेताओं ने अब तक इस बात की भी शिकायत नहीं की है कि ढ़ाई साल पहले गठित किये गये मार्गदर्शक मंडल की आज तक एक भी औपचारिक बैठक क्यों नहीं बुलाई गई है। लेकिन तिवारी सरीखे जुझारू नेता की जिजिविषा को सलाम करना होगा कि आज भी वे अपनी बात जुबानी तौर पर कहने के बजाय ऐसा कुछ करके दिखा देते हैं कि बिना कहे ही उनकी बात से खलबली मच जाती है। तभी तो तिवारी का अमित शाह के निवास पर जाना ही ही इतनी बड़ी खबर बन गया कि उस पर औपचारिक तौर पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिये कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को भी मजबूर होना पड़ा। लेकिन तिवारी ने अपनी जुबान से फिर भी कुछ नहीं कहा। अलबत्ता उनकी संगठन में हो रही उपेक्षा को बयां किया उनके उस पुत्र ने जिसका भविष्य संवारने के लिये वे शाह के घर की चैखट पर पहुंचे थे। बताया गया कि जो तिवारी किसी समय यूपी व उत्तराखंड की सियासी धुरी हुआ करते थे, उन्हें आज की पीढी के नेता मांगने पर भी मिलने का वक्त देना गवारा नहीं कर रहे हैं। जाहिर है कि ऐसी फजीहत झेलने के बाद अगर तिवारी सरीखे नेता को संगठन का दामन छोड़ने के लिये विवश होना पड़ता है तो यह उनकी या उनके उम्र की तौहीन नहीं है बल्कि यह परिचायक है उस नैतिक स्खलन का जिसका मुजाहिरा इन दिनों हर तरफ खुलेआम किया जा रहा है। लेकिन बुजुर्गों के साथ ऐसा उपेक्षापूर्ण व्यवहार करनेवाले शायद यह भूल रहे हैं कि कल को उन्हें भी इस उम्र में आना है और तब उनके साथ ऐसा व्यवहार होगा तो वे कैसे इसे झेल पाएंगे। लिहाजा बलिया जनपद स्थित छब्बी गांव निवासी ओमप्रकाश यती के लिखे शेर में कुछ हेर-फेर करके आज यह याद रखने की जरूरत है कि ‘ये जंगल कट गये तो किसके साए में गुजर होगी, हमेशा इन बुजुर्गों को अपने साथ रहने दो।’ ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

बुधवार, 11 जनवरी 2017

कोई यूं बेवफा नहीं होता....

‘कुछ तो मजबूरियां होंगी मेरे सरकार की’

‘कुछ मिट्टी की और कुछ कुम्हार की, कुछ तो मजबूरियां होंगी मेरे सरकार की।’ वाकई, ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, कोई यूं बेवफा नहीं होता।’ बेवफाई भी ऐसी अव्वल दर्जे की कि जिस बीज को खुद ही बोया, उगाया, सींचा और मौसम की मार व दुश्मनों के वार बचाते हुए फर्श से उठाकर अर्श की बुलंदी पर ला खड़ा किया, उसका ही समूल नाश करने पर आमादा हो जाया जाये। कायदे से तो उस पेड़ की घनी छांव में अपने बुढ़ापे की अंतिम घड़ियां शांति व सुकून के साथ गुजारने की इच्छा होनी चाहिये थी और कहां बूढ़ापे की थकी-मांदी हड्डियां लहराते हुए कुल्हाड़ी हाथ में लेकर हरे-भरे फलदार पेड़ को जमींदोज करने की कोशिशें की जा रही हैं। यह भी नहीं सोचा जा रहा कि अगर यह पेड़ नष्ट हो गया तो अंतिम वक्त में किसका सहारा बचेगा। हालांकि जिन लोगों को ना तो किसान के हितों की कोई परवाह है और ना ही पेड़ की बुलंदी से कोई फायदा मिलने की उम्मीद है, वे तो चाहेंगे ही कि किसान को समझा-बुझाकर उसके ही हाथों उसका पेड़ कटवा दिया जाये, ताकि कुछ नहीं तो लकड़ी का तमगा ही हासिल हो। लेकिन पता नहीं किसान की अक्ल पर कैसा पत्थर पड़ गया है कि जिस पेड़ को मौजूदा बुलंदी देने में उसने अपनी पूरी उम्र खपा दी, अब उसे ही जड़ से उखाड़ने की हर मुमकिन कोशिशों में जुटा दिख रहा है। निश्चित तौर पर ऐसा कदम उठानेवाला किसान या तो अपने भले-बुरे की चिंता छोड़कर सिर्फ वर्तमान की समस्या सुलझा लेना चाहता है या फिर वह चाहकर भी अपने मन की बात पर अमल नहीं कर पा रहा है। अपने महाजन की मनमानी बर्दाश्त, स्वीकार व अंगीकार करना उसकी मजबूरी बन चुकी है। उनकी बतायी राह पर चलने के अलावा उसके पास दूसरा विकल्प ही नहीं है। वर्ना वह ऐसा हर्गिज नहीं कहता कि पेड़ से उसे कोई परेशानी नहीं है बल्कि पेड़ से लिपटी हुई उस बेल ने उसे दुखी किया हुआ है जिससे खुद को अलग करने के लिये पेड़ कतई तैयार नहीं है। दूसरी ओर पेड़ भी यह बताने से नहीं हिचक रहा है कि उसका पालक-संरक्षक इन दिनों बड़ी साजिश का शिकार हो गया है और उसका महाजन उससे ऐसे काम करवाना चाहता है जिसका नुकसान पेड़ और किसान दोनों को उठाना पड़ेगा। इसी वजह से पेड़ ने भी अपने सुरक्षा कवच को मजबूती से कस लिया है ताकि किसान के कांधे पर रखे महाजन की कुल्हाड़ी से अपनी हिफाजत कर सके। आलम यह है कि किसान और पेड़ भले ही आमने-सामने दिख रहे हों लेकिन इनके बीच इस लड़ाई की कोई बड़ी वजह दिखाई नहीं पड़ रही है। वैसे भी किसान ने पूरी जिन्दगी जिस पेड़ को सींच-पाल कर बड़ा किया वह अब अपने दम पर किसान को बुढ़ापे में शांति-सुकून की छांव ही नहीं बल्कि अपने द्वारा उपार्जित मीठा फल भी ताउम्र खिलाने में कतई कोताही नहीं बरत सकता है। तुलनात्मक तौर पर भी देखा जाये तो इस किसान के मुकाबले काफी अधिक संसाधन संपन्न व सिंचित-उपजाऊ जमीन के मालिकों का बोया बीज ऐसा बिगड़ा कि वह ना तो छांव दे पाने के काबिल बन सका और ना ही फल दे पाने के। ऐसे में ऊसर-बंजर जमीन पर सीमित संसाधनों के बूते पर बोया गया बीज अगर व्यापक छायादार और फलदार हो गया है तो किसान के लिये यह भी कम बड़े गर्व की बात नहीं है। इसके बावजूद किसान है कि महाजन के चंगुल में फंसकर पेड़ को ही काटने पर आमादा है। दूसरी तरफ पेड़ भी उस बेल का मोह छोड़ने के लिये तैयार नहीं है जो उससे लिपटकर अपना अस्तित्व कायम रखते हुए उसे यह भरोसा दिलाने की हर-मुमकिन कोशिशों में है कि अगर कटने की नौबत आयी तो पहला वार उस पर होगा उसके बाद ही कुल्हाड़ी की धार पेड़ को छू पाएगी। यानि इतना तो स्पष्ट है कि किसान संचालित हो रहा है महाजन से और पेड़ को उम्मीदें हैं खुद से लिपटी बेल से। ऐसे में सवाल है कि आखिर किसान की ऐसी कौन सी मजबूरी है कि वह सब-कुछ जानते व समझते हुए भी महाजन से अपना पीछा नहीं छुड़ा पा रहा है। अगर समस्या सिर्फ बेल से होती और महाजन की इसमें कोई भूमिका नहीं होती तो पेड़ ने किसान के एक इशारे पर ही उस बेल से खुद को अलग कर लिया होता जिसे पेड़ और किसान के आपसी रिश्ते में बाधक बताने की कोशिश हो रही है। लेकिन पेड़ को लग रहा है कि बेल का तो बहाना है, वास्तव में वह ही महाजन का निशाना है। ऐसे में वह क्यों उस बेल को खुद से अलग करे जो कुल्हाड़ी का पहला वार खुद पर झेलने के लिये पहले से ही तैयार है। यानि पेड़ की नजर से देखें तो उसकी जान का ग्राहक किसान नहीं है, बल्कि उसके महाजन हैं। जबकि किसान का नजरिया पेड़ से लिपटी बेल के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त दिख रहा है। लिहाजा बेहतर यही होगा कि पेड़ व किसान एक हो जाएं और पेड़ खुद को बेल से व किसान खुद को अपने महाजन से अलग कर ले। साहिर लुधियानवी ने कहा भी है कि ‘तार्रूफ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर, ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा, वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।’ ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

‘सुलगती आंखों से छलकती नमी का निहितार्थ’

‘सुलगती आंखों से छलकती नमी का निहितार्थ’


सवाल है कि ‘आग-पानी के बीच छत्तीस का आंकड़ा है अगर, तो सुलगती आंखों में यह नमी क्यों है? कायदे से सुलगती आंखों से तो क्रोध और नफरत की चिंगारियां फूटनी चाहिये। सुर्ख निगाहों से लहू टपकना चाहिये। लेकिन हो रही है नमी की बरसात। वह भी जार-जार, लगातार। लिहाजा एक ही तस्वीर के इन विपरीत आयामों के बीच तालमेल बिठाना किसी के लिये भी दुश्वार हो सकता है। लेकिन मसला है कि दिल की बात अगर जुबां पर आ गयी तो उसका असर आत्मघाती भी हो सकता है। लिहाजा राजनीति में आग और पानी के बीच संतुलन बनाना आवश्यक भी है और मजबूरी भी। तभी तो इन दिनों देश के सियासी माहौल में दूध की धार तो नजर आ रही है लेकिन उसमें छिपा असली घी मौजूद होने के बावजूद विलुप्त है। बिल्कुल त्रिवेणी संगम की सरस्वती बन गयी वास्तविक सच्चाई। जबकि सच तो यह है कि सरस्वती की मौजूदगी ने ही तो संगम को त्रिवेणी का उच्चपद दिया है। लेकिन मसला है कि सरस्वती की मौजूदगी को सतह पर तलाशने के बजाय अक्सर गहराई में खोदाई शुरू कर दी जाती है। जबकि कायदे से त्रिवेणी के जल में से अगर किसी तकनीक के द्वारा गंगा-यमुना के अंश को अलग, विलग व पृथक कर दिया जाये तो शेष नीर निश्चित तौर पर सरस्वती का ही होगा। इसी प्रकार सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच मौजूद जनपक्ष को भी तभी समझा जा सकता है जब इन दोनों से अलग हटकर उसे देखने व तलाशने की कोशिश की जाये। इस लिहाजा से देखा जाये तो इन दिनों वास्तविक जनपक्ष पूरी तरह ओझल, गायब व नदारद दिख रहा है। हालांकि सत्तापक्ष और विपक्ष के द्वारा अपने नजरिये से जनपक्ष की मौजूदगी को दर्शाने की भरसक कोशिश हो रही है लेकिन इन दोनों पक्षों द्वारा जनपक्ष की जो तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है वह वास्तविकता से पूरी तरह अलग है। मसलन सरकार बता रही है कि नोटबंदी जनहित के लिये की गयी है जबकि विपक्ष का आरोप है कि नोटबंदी की आड़ में जनहित पर डाका डाला गया है और यह अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है। यानि एक ही काम के दो विपरीत कारण और परिणाम बताये जा रहे हैं। जबकि तीसरा वास्तविक जनपक्ष यह है कि पहले भी जनता ही परेशान थी और आज भी आवाम ही हलकान है। कतार में चोरों को दिखना चाहिये था लेकिन दिख रहे आम लोग। उस पर तुर्रा यह कि नकदी की कोई कमी नहीं है। लेकिन इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि अगर कमी नहीं है तो पर्याप्त मात्रा में मिल क्यों नहीं रही। खैर, नोटबंदी के बाद पनपी परेशानियां दूर होनी शुरू हो गयी हैं और मास-दो मास में समाप्त भी हो जाएंगी। लेकिन असली सवाल है कि नोटबंदी के मामले को लेकर जिस तरह की जंग छिड़ी हुई है उसमें आखिर सत्तापक्ष और विपक्ष ने जनपक्ष को क्यों हथियार बनाया हुआ है। अपनी बात क्यों नहीं कहते? क्यों नहीं बताते कि मोदी को महानता की दरकार है इसलिये पूरी व्यवस्था की दही को मथकर मट्ठा छान रहे हैं और घी अलग कर रहे हैं। जबकि यह घी पहले भी सेहत तंदुरूस्त रखने के ही काम आ रहा था। वर्ना आठ साल पहले की व्यापक वैश्विक मंदी के दौर में सकारात्मक विकास दर बरकरार रहना कैसे मुमकिन हो सकता था। लेकिन अब तक वह घी अंदरूनी तौर पर घुला हुआ था। सतही तौर पर नदारद था। लिहाजा सतह पर उसकी चमक नहीं दिख रही थी। अब उसे अलग करके परोसने की कवायद चल रही है। ताकि उसके चमक-दमक से विश्व जगत को चकित-चमत्कृत किया जा सके। दूसरी ओर विपक्षियों में खुद को सबसे बड़ा मोदी विरोधी साबित करने की होड़ चल रही है ताकि देश के उस 68 फीसदी वोट को अपने पक्ष में एकजुट किया जा सके जिसने मोदी लहर के बावजूद 2014 में भाजपा को अस्वीकार कर दिया था। उस वोट की दिशाहीनता के कारण सामने आये पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजे को पलटने के लिये उसे दिशा देने की कोशिशों में राहुल गांधी से लेकर ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ही नहीं बल्कि नीतीश कुमार भी पिले हुए हैं। चाहे इसके लिये नोटबंदी का विरोध करना पड़े या फिर सेना की कार्यप्रणाली पर सियासत करनी पड़े, इनका इकलौता मकसद है खुद को मोदी के सबसे तगड़े विरोधी के तौर पर प्रस्तुत करना। तभी तो जनता मस्त है लेकिन ये लोग जनहित की दुहाई देने में व्यस्त हैं। मोदी का विरोध करने के क्रम में जो नहीं बोलना था वह भी बोला जा रहा है क्योंकि इन्हें पता है कि अब जो भी चुनाव होगा वह उनके कार्यकाल की कमियों, खामियों व गलतियों को सामने रखकर नहीं बल्कि मोदी सरकार के कामकाज को लेकर होगा। तभी तो कांग्रेसनीत संप्रग के कार्यकाल में ही अडाणी समूह पर 72,632 करोड़ और अनिल अंबानी पर 132 हजार करोड़ बाकी रहने और 2004-05 से लेकर 2012-13 के बीच विभिन्न कंपनियों का 36.5 लाख करोड़ का कारपोरेट कर्ज माफ किये जाने के बावजूद मोदी सरकार को ही अडाणी-अंबानी व कारपोरेट क्षेत्र का पैरोकार बताया जा रहा है। लेकिन अपनी बात कोई नहीं कर रहा। खैर, सच तो यह है कि गंगा-यमुना में कितना ही उफान क्यों ना आ जाये लेकिन सरस्वती सरीखे विशुद्ध जनपक्ष की अविरण-निर्मल धार ही त्रिवेणी का वास्तविक स्वरूप पहले भी तय करती आयी है और आगे भी करती रहेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

‘....मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना’

‘....मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना’


उल्टे-सीधे वायदे करके सियासी जमात के लोग तो हमेशा से ही आम लोगों को उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं। लेकिन शायद यह पहला मौका है जब जनता को अपने मायावी सम्मोहक जाल में उलझानेवाले इन दिनों खुद ही उलझन में हैं। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि करें तो क्या करें। किस दिशा में आगे बढ़ें। धारा के साथ बहें या उसके विपरीत दिशा में तैरने की कोशिश करें। किसी को कुछ पता नहीं चल रहा। सभी पूरी ताकत से हाथ-पांव मारते हुए बहे जा रहे हैं, चले जा रहे हैं। कभी धारा के साथ तो कभी धारा के विपरीत। कभी इस दिशा तो कभी उस दिशा। इस उलझन में इनकी बुद्धि इस कदर भ्रमित हो गयी है कि जापान जाने के लिये चीन की राह पकड़ ले रहे हैं। हालांकि मुल्क के सियासी रहनुमाओं की इस दिशाहीनता का सीधा खामियाजा देश के जन सामान्य को अवश्य भुगतना पड़ रहा है लेकिन सिर्फ जनता ही है जिसके चेहरे पर सही दिशा में आगे बढ़ने की खुशी स्पष्ट दिख रही है। वर्ना बाकी सभी पर गफलत ही हावी है। मतिभ्रम की स्थिति में सिर्फ सत्तापक्ष और विपक्ष ही नहीं बल्कि न्यायपालिका और कार्यपालिका भी दिख रही है। तभी तो जनहित याचिका दायर करने का रिकार्ड कायम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे अश्विनी उपाध्याय से न्यायपालिका तंज कसते हुए पूछ रही है कि क्या उन्होंने इस काम को ही अपना पेशा बना लिया है? भाई, वकील का तो काम ही है याचिका दाखिल करके इंसाफ की मांग करना। इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह क्यों और किसके लिये याचिका दाखिल कर रहा है। लेकिन अदालत को चुभ गयी तो चुभ गयी। अब अदालती टिप्पणी की आलोचना तो की नहीं जा सकती। लेकिन इससे यह तो समझा ही जा सकता है कि अदालतें किस मानसिक अवस्था से गुजर रही हैं। आलम यह है कि सरकार को सिर्फ सालाना बजट बनाने की ही स्वतंत्रता मिली हुई है वर्ना बाकी हर काम में उसे अदालत का अड़ंगा झेलना पड़ रहा है और उसे अदालती सम्मति से ही कोई भी काम करने की छूट हासिल है। लेकिन अब जबकि नोटबंदी के मसले पर भी अदालत ने सरकार का हाथ-पांव बांधने की दिशा में कदम आगे बढ़ा दिया है तब किसी को भी ऐसा लगना स्वाभाविक ही है कि अब शायद देश की अर्थव्यवस्था का मनमुताबिक संचालन करने की स्वतंत्रता भी सरकार के पास ज्यादा दिनों तक ना बचे। ऐसा ही हाल बैंकों का है जिसे सरकार ने हर बचतखाता धारक को सप्ताह में 24 हजार रूपया निकासी की सुविधा देने का निर्देश दिया हुआ है। लेकिन बैंक में कहां, किसको और कितनी रकम मिल पा रही है इससे सभी वाकिफ हैं। नोटबंदी के बाद बैंककर्मियों ने शायद खुद को खुदा के समकक्ष समझ लिया था वर्ना आज यह नौबत नहीं आती कि सत्ताधारी दल को उनके कामकाज के प्रति सार्वजनिक तौर पर अफसोस का इजहार करने के लिये मजबूर होना पड़े। निश्चित तौर पर इसे व्यवस्था का मतिभ्रम ही माना जाएगा जिसके चक्कर में पड़कर उसने आम लोगों को घनचक्कर बनाकर अपना चक्कर चलाने की गुस्ताखी की। यही हालत विपक्ष की भी दिख रही है जिसे ना आगे की राह सूझ रही है और ना ही पीछे का दरवाजा दिख रहा है। विपक्ष के मतिभ्रम का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस राज्यसभा में उसे बहुमत हासिल है वहां उसने नोटबंदी के मसले पर साधारण नियम के तहत चर्चा स्वीकार कर ली लेकिन जिस लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर दावा करने लायक आंकड़ा भी उसके पास उपलब्ध नहीं हैं वहां उसने मतदान की व्यवस्थावाले नियम के तहत बहस कराने की ऐसी जिद पकड़ी कि संसद का पूरा शीतसत्र हंगामें की भेंट चढ़ गया। कांग्रेस अंत तक यह तय नहीं कर पायी कि उसे संसद में क्यों और कैसी भूमिका अख्तियार करनी है। नतीजन सत्र गुजर जाने के बाद भी कोई कांग्रेसी नेता दो-टूक शब्दों में यह बताने की स्थिति में नहीं दिख रहा है कि शीतसत्र का अंजाम लाभदायक रहा अथवा नुकसानदायक। सरकार भी मतिभ्रम की ऐसी ही स्थिति से दो-चार होती दिख रही है। इसने एक झटके में ही नोटबंदी का फैसला तो ले लिया लेकिन इसे लागू करने की ठोस राह पर आगे बढ़ने में वह नाकाम रही। तभी तो दैनिक आधार पर नियमों का निर्धारण भी हुआ और निस्तारण भी। कोई एक दिशा तय ही नहीं हुई है। तभी तो मान्यता सूची में शामिल देश के सभी 1761 राजनीतिक दलों को अपने खाते में पुराने नोट जमा कराने की छूट दे दी गयी है। जाहिर है कि इस छूट का लाभ सभी सात राष्ट्रीय, 48 क्षेत्रीय और 1706 जाने-अंजाने दलों को मिलनेवाला है। वह भी तब जबकि राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा अंजाम दी जा रही कालेधन को सफेद करने की कारस्तानी का स्टिंग आॅपरेशन भी सामने आ चुका है। मतिभ्रम का आलम यह है कि एक तरफ नकदी के संकट ने बैंकिंग व्यवस्था की साख को सवालों में ला दिया है और दूसरी तरफ छोटी बचत योजनाओं पर नाम मात्र ब्याज की परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है। खैर, ऐसी तमाम घटनाओं को समग्रता में देखने से इतना तो पता चल ही रहा है कि सामान्य परिस्थितियों में तो सिर्फ आवाम ही दिग्भ्रमित होती है लेकिन वक्त की चुनौतियां निजाम को भी दिग्भ्रमित करने की पूरी क्षमता रखती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  
@ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur  

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

अब हवाएं ही करेंगी रौशनी का फैसला....

‘रहिमन विपदा हूं भली, जो थोरे दिन होय’ 

रहीम ने थोड़े दिनों के लिये आये उन कठिन व मुश्किल परिस्थितियों को इस लिहाज से बेहतर बताया है कि वे आती तो सीमित समय के लिये हैं लेकिन असीमित लोगों की भीड़ में शामिल दोस्तों और दुश्मनों की सटीक पहचान करा दे जाती है। वाकई विपदा के वक्त सिर्फ विरोधी ही अपना हिसाब चुकता करने का प्रयास नहीं करते बल्कि दोस्तों की भीड़ में शामिल दुश्मन भी अपना बदला लेने के लिये सक्रिय हो जाते हैं। फिलहाल ऐसी ही परिस्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी घिरते दिख रहे हैं जिसमें विरोधियों की चैतरफा घेरेबंदी के बीच अब उन अपनों ने भी उन पर प्रहार करने का जुगाड़ तलाशना शुरू कर दिया है जो अब तक उनके प्रभाव के सामने विरोध करने के मौके का अभाव झेल रहे थे। हालांकि जिन कठिन परिस्थितियों का मोदी को सामना करना है उसका वक्त भी उन्होंने ही मुकर्रर किया है, जमीन भी उन्होंने ही तैयार की है और वार के लिये हथियार का चयन भी उन्होंने ही किया है। लिहाजा अब जबकि जंग छिड़ने में सिर्फ पंद्रह दिन का वक्त बच गया है तब इसका सामना तो उन्हें करना ही होगा। वापसी का कोई रास्ता छोड़ना तो वैसे भी उनकी फितरत में नहीं है। लिहाजा टक्कर तो होगी। हिसाब तो मांगा ही जाएगा। आखिर पचास दिन में परिस्थितियां पूर्ववत कर देने का वायदा भी तो उन्होंने ही किया था। हर भारतीय के खाते में पंद्रह लाख रूपया आने की बात को भले ही चुनावी जुमला बताकर पल्ला झाड़ लिया गया हो। लेकिन इस दफा तो बचने की वह राह भी नहीं है क्योंकि पचास दिन में परिस्थितियां पूर्ववत करने की बात वे लगातार करते आ रहे हैं। उनके इस दावे ने ही सियासी टकराव की ऐसी जमीन तैयार कर दी है जिस पर खड़े होकर विरोधियों के हमले का सामना करने के अलावा अब उनके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा है। हालांकि लंबी-चैड़ी आंकड़ेबाजी में उलझने के बजाय सीधे-सादे शब्दों में समझा जाये तो नोटबंदी के कारण जितनी धनराशि को प्रचलन से बाहर किया गया था उसमें से तकरीबन दो-तिहाई बैंकों में जमा कराया जा चुका है और जितनी धनराशि से देश की पूरी अर्थव्यवस्था संचालित हो रही थी उसका आधा हिस्सा नये नोटों की शक्ल में लोगों को लौटाया जा चुका है। यानि पचास दिन में परिस्थितियां पूर्ववत करने के वायदे का आधा हिस्सा तो पूरा हो चुका है। लिहाजा प्रधानमंत्री की नजर से देखें तो ग्लास आधा भरा जा चुका है जबकि वायदा पूरा करने के लिये मांगे गये वक्त का दो-तिहाई हिस्सा गुजर जाने के बावजूद विरोधियों के नजरिये से ग्लास अभी तक आधा खाली ही है। दूसरी ओर जिस रफ्तार से काम चल रहा है उसे देखते हुए यह उम्मीद करना ही बेकार है कि अगले 15 दिनों में उतना काम पूरा कर लिया जाएगा जितना बीते 35 दिनों में किया जा चुका है। यानि मोदी की नजर और विरोधियों के नजरिये के बीच भीषण संघर्ष तो तय ही है। इसके लिये विरोधियों ने पूरी तैयारी भी कर रखी है। मोदी की वायदाखिलाफी के खिलाफ यूपी में चैतरफा चढ़ाई होनेवाली है तो बिहार में लालू के लाल भी कमाल कर दिखाने के लिये लालायित हैं। पश्चिम बंगाल में ममता के मुरीदों की टोली सड़क पर उतरेगी तो दिल्ली में आप के जनाबों की फौज पूरा हिसाब मांगेगी। कांग्रेस ने तो इसे अब तक का सबसे बड़ा घोटाला बताना अभी से शुरू कर दिया है। जाहिर है कि पचास दिन पूरा होने के बाद उसके विरोध का जलवा-जलाल देखने लायक होगा। इसके अलावा और भी कई छोटे मियां व बड़े मियां हैं जिनके तेवरों की तान पूरा आसमान सिर पर उठाने का अक्सर ऐलान करती रहती हैं। यानि समग्रता में देखें तो विरोधियों के हौसले पूरी तरह बुलंद हैं क्योंकि अब मामला सिर्फ नोटबंदी का नहीं है। बात उस बात की है जो बातों ही बातों में कह तो दी गयी है लेकिन उसके तय वक्त पर पूरा हो पाने की बात बनती नहीं दिख रही। हालांकि विरोधियों के एकजुट हमले का सामना मोदी पहले भी करते रहे हैं और इस बार भी कर ही लेंगे। लेकिन असली दर्द तो अपनों की ओर से दिये जाने की संभावना है जो मौके की ताक में पहले से ही बैठे हुए हैं। बताया जाता है कि ना सिर्फ मार्गदर्शकों का मंडल कुपित होकर कमंडल उठाने के लिये तैयार बैठा है बल्कि मौजूदा केबिनेट के उन रत्नों की लालिमा भी लगातार बढ़ती जा रही है जिन्हें लत्ते में लपेटकर किनारे लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी थी। यानि इम्तहान लेने की तैयारी में अपने भी हैं और बेगाने भी। इसमें बेगानों के लिये वक्त तो मोदी ने खुद ही मुकर्रर कर दिया है जबकि सगे-संबंधियों को संगठन की ओर से राष्ट्रीय कार्यकारिणी की शक्ल में मौका और मंच मुहैया कराया जा रहा है। बेगाने हिसाब मांगेंगे 28 से और अपनों को हिसाब देना होगा आठ को। दोनों के बीच फासला दस दिनों का रहेगा। लिहाजा इन दस दिनों के सीमित समय में ही अपने-परायों की पूरी पहचान हो जानी है। आक्रमण के पहले चरण की सफलता ही तय करेगी अंदरूनी हमले की आक्रामकता। टकराव आधा खाली बनाम आधा भरे का होना है जिसके बारे में फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि ‘अब हवाएं ही करेंगी रौशनी का फैसला, जिस दिये में जान होगी वह जला रह जायेगा।’ जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # NAVKANT THAKUR

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

'और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा '

और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा 


‘और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।’ लेकिन यह बात उस आशिक को कैसे समझायी जाये जिसने इश्क के जुनून की आग में जिस्म ही नहीं बल्कि रूह भी झोंक देने का इरादा कर लिया हो। जरूरी नहीं है कि इश्क सिर्फ किसी हाड़-मांस की महबूबा से ही हो। जुनूनी चाहत किसी और लक्ष्य को हासिल करने की भी हो सकती है। मिसाल के तौर पर इन दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से देश की अर्थव्यवस्था को साफ-सुथरा और सुदृढ़ बनाने के लिये जुनूनी तरीके से अपने जिस्मो-जां सहित रूह तक को झोंक दिया वह बेशक महबूब वतन से उनके बेइंतहा मोहब्बत को ही दर्शाता है। लेकिन इश्क की राह पर आगे बढ़ने के क्रम में जिस तरह से बाकी मसलों, तथ्यों व जरूरतों की अनदेखी की गई है उसे कैसे सही कहा जा सकता है। इन राहों पर बदइंतजामी की बदनामियों से जुड़ी कहानियां अगर लगातार जोर पकड़ती दिख रही हैं तो इसकी सबसे बड़ी वजह वह जुनूनी जिद ही है जिसको पूरा करने के जोश में अगर होश की डोर को भी पकड़े रहने की पहल की गयी होती तो आज तस्वीर दूसरी होती। लेकिन जिस तरह से पूरा देश अव्यवस्था व अस्त-व्यस्तता के दौर से गुजर रहा है उसकी बड़ी जिम्मेवारी तो मोदी साहब की बनती है। वे कैसे इस जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ सकते हैं कि उन्होंने परिणाम की परवाह किये बिना ही निश्चित को छोड़कर अनिश्चित की ओर कदम आगे बढ़ाने की कोशिश की है। मसलन ऐसे देश के लिये कैशलेस व्यवस्था को लागू करने का सपना देखना कैसे सही माना जा सकता है जहां की 26 फीसदी आबादी के लिये आज भी काला अक्षर भैंस बराबर ही है। इसका मतलब तो यही हुआ कि एक-चैथाई से भी अधिक तादादवाली निरक्षर आबादी के हितों की उन्हें कोई परवाह नहीं है। इसके अलावा इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिये था कि जिन 76 फीसदी लोगों तक शिक्षा का उजाला पहुंच चुका है उनमें कितनों की आर्थिक हैसियत ऐसी है कि वे हर महीने अपने मोबाइल में कम से कम 150 रूपये का डाटा पैक डलवा सकते हैं। क्योंकि इसके बिना तो ई-वाॅलेट की परिकल्पना साकार हो ही नहीं सकती। आज भी देश के अधिकांश इलाकों में 8 से 10 घंटे की बिजली कटौती होना बेहद ही सामान्य बात है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को इंटरनेट के प्लेटफाॅर्म से संचालित करने में आम लोगों को ही नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है इसकी शायद उन लोगों ने कल्पना भी नहीं की होगी जिन्होंने देश को कैशलेस व्यवस्था की ओर ले जाने की सलाह दी है। खैर, कैशलेस व्यवस्था का विचार तो अभी सैद्धांतिक तौर पर ही अपनाया गया है और माना जा सकता है कि नकदी की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने में पेश आ रही परेशानियों के तात्कालिक हल के तौर पर इस विचार को आगे बढ़ाया जा रहा है जिसका दूरगामी परिणाम बेहद ही लाभदायक साबित हो सकता है। लेकिन मसला है कि आखिर ऐसी मजबूरी और लाचारी की स्थिति पैदा ही क्यों होने दी गयी। आखिर इसकी जिम्मेवारी कौन लेगा? बिना किसी पूर्व तैयारी या इंतजाम के ही देश की अर्थव्यवस्था से 86 फीसदी नकदी को अचानक ही चलन से बाहर कर देने का फैसला भले ही कालाधन, भ्रष्टाचार और नकली नोट की समस्या से एक साथ ही निजात हासिल करने के लिये लिया गया हो लेकिन इस फैसले को लागू करने की जो कीमत देश के आम लोगों को चुकानी पड़ रही है वह वाकई बहुत बड़ी है। सच तो यह है कि बैंकिंग व्यवस्था का विकास और संसाधनों का विस्तार किये बिना ही इतना बड़ा कदम उठाने की जल्दबाजी के कारण ही आज लोगों को इतनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। भला यह भी कोई बात हुई। खाते में पैसा है लेकिन निकाल नहीं सकते। अपना ही पैसा किसी और के खाते में डाल नहीं सकते। अपनी खून-पसीने की कमाई को मनमुताबिक खर्च नहीं कर सकते। यह तो इंतहा है अव्यवस्था की। वह भी तब जबकि नोटबंदी का ऐलान हुए एक महीना होने को आया। उस पर कोढ़ में खाज यह कि बाजार ने सरकार की मार का बदला उपभोक्ताओं से लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कभी नमक की किल्लत बताकर डेढ़ सौ रूपये की दर से बेचा जाता है तो कभी उत्पादन में कमी की दलील देकर सामान की कीमतें बढ़ा-चढ़ाकर वसूली जाती हैं। खास तौर से खाद्य पदार्थों की कीमतों में जिस कदर लगातार तेजी का माहौल है वह वाकई हैरान-परेशान करनेवाला है। आटा-चीनी व चावल से लेकर तेल-बेसन और अदरक-लहसुन तक की खुदरा कीमतों में पिछले महज एक माह में 25 से 40 फीसदी तक का इजाफा दर्ज किया जा चुका है। यानि एक तरफ लोगों को बैंक की लंबी कतारों में लगने के बावजूद नकदी नहीं मिल पा रही और दूसरी ओर बाजार के बिचैलिये उसका खून चूसने पर आमादा हैं। लेकिन निजाम नोटबंदी से जुड़ी नीतियां बनाने में मस्त है, आवाम चैतरफा मार झेलते हुए पस्त है और देश की पूरी आर्थिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त है। लिहाजा किसी को इतनी फुर्सत ही नहीं है कि वह बाकी मसलों की ओर झांकने की भी जहमत उठाये। अब कौन, किसको, कैसे और क्यों बताये कि और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

सहमति से हो रहा असहमति का दिखावा!

सहमति से हो रहा असहमति का दिखावा! 


नोटबंदी को लेकर संसद से सड़क तक जारी सियासी महासंग्राम की तस्वीर को गौर से जांचा-परखा जाये तो स्पष्ट हो जाता है कि तमाम सियासी दलों की ‘निगाहें कहीं और हैं, निशाना कहीं और।’ मामला अगर नोटबंदी के मुद्दे को लेकर सामान्य व स्वाभाविक मतभेद का होता तो इसे दूर किया भी जा सकता था। लेकिन सच पूछा जाये तो अंदरूनी तौर पर पूरा मामला कतई ऐसा नहीं है जैसा दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। बेशक सतही तौर पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आपसी मतभेद इस कदर प्रबल दिखाई पड़ रहा है कि दोनों बातचीत के लिये मिल-बैठना भी गवारा नहीं कर रहे हैं। मगर गहराई में उतर कर देखने से पूरे मामले की तस्वीर बिल्कुल इसके उलट दिखाई पड़ती है। सच तो यह है कि नोटबंदी के पूरे प्रकरण में मतभेद का कोई ऐसा मसला ही नहीं है जिसके कारण संसद की कार्रवाई को लगातार बाधित किया जाये और सड़क पर एकजुट होकर सरकार के खिलाफ हल्ला-बोल किया जाये। मतभेद की तस्वीर ना तो उन मामलों में दिख रही है जिसके तहत सरकार की सोच को विपक्ष जायज बता रहा है और ना ही उन मामलों में जिसके तहत नोटबंदी के तौर-तरीकों व अव्यवस्थाओं पर उंगली उठाई जा रही है। यहां तक कि मतभेद का मसला तो यह भी नहीं है जिसके तहत पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने नोटबंदी के नतीजे में देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार मंद पड़ने और जीडीपी में गिरावट आने की बात कही है। इन तमाम मसलों पर जो बातें विपक्ष कह रहा है वही सोच सरकार की भी है। विपक्ष की ओर से भी यही बताया जा रहा है कि कालेधन और भ्रष्टाचार की कमर तोड़ी जानी चाहिये और सरकार ने भी इसी सोच के तहत एक ही झटके में एक हजार और पांच सौ के नोट को चलन से बाहर करने का कदम उठाया है। इसी प्रकार नोटबंदी के बाद आम लोगों को भुगतनी पड़ रही परेशानियों से अगर विपक्ष का कलेजा फट रहा है तो सरकार भी इसको लेकर कतई कम चिंतित नहीं है। प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री सहित सत्तापक्ष का पूरा कुनबा इस हकीकत को बेहिचक स्वीकार कर रहा है कि नोटबंदी के फैसले को लागू करने के क्रम में आम लोगों को काफी परेशानी उठानी पड़ रही है। तभी तो सरकार का हर विभाग लगातार दैनिक आधार पर जमीनी स्थितियों की सिर्फ समीक्षा ही नहीं कर रहा बल्कि नीति-नियमों में जरूरत के मुताबिक लगातार तब्दीली भी की जा रही है। इसके अलावा सरकार को भी पता है कि जब देश की अर्थव्यवस्था को संचालित करनेवाली नकदी के 87 फीसदी हिस्से को अचानक ही चलन से बाहर कर दिया जाएगा तो तात्कालिक तौर पर अर्थव्यवस्था की गाति में कमी आयेगी ही। लिहाजा इस मसले को भी सत्तापक्ष और विपक्ष के मौजूदा मतभेद की वजह नहीं माना जा सकता। खैर, अगर पूरा विवाद सिर्फ नीति-नीयत को लेकर सैद्धांतिक व वैचारिक मतभेद का होता तो आम सहमति बनाने और परस्पर अपनी बात समझने-समझाने की कोशिशें भी दिखाई पड़तीं। लेकिन आलम यह है कि सत्ता पक्ष के वरिष्ठ रणनीतिकारों द्वारा बुलाई गई अनौपचारिक बैठक का भी विपक्षी दलों द्वारा यह कहकर बहिष्कार कर दिया जाता है कि फिलहाल वे किसी समझौता वार्ता में हिस्सा लेने के लिये तैयार नहीं हैं। अब ऐसी सूरत में कथित मतभेद दूर हो भी तो कैसे? यानि बात स्पष्ट है कि मतभेद दूर करके सहमति की राह पर आगे बढ़ने के लिये फिलहाल कोई भी पक्ष तैयार नहीं है। दूसरी ओर सरकार भी मौजूदा गतिरोध के जारी रहने में ही अपनी भलाई देख रही है। इसकी वजह भी स्पष्ट है कि बातचीत के टेबुल पर आने से पहले देश की आर्थिक अस्त-व्यस्तता और अव्यवस्था को पटरी पर ले आया जाये ताकि विपक्ष के तीर का जवाब देने में अपना तूणीर भी सक्षम हो सके। इसके अलावा विपक्ष को भी पता है कि वक्त बीतने के साथ जब नोट बदलने का काम पूरा हो जाएगा तो नोटबंदी के कारण लोगों को झेलनी पड़ रही परेशानी भी समाप्त हो जाएगी और जल्दी ही लोग मौजूदा दुख-दर्द को भी भुला देंगे। ऐसी सूरत में जब दर्द ही समाप्त हो जाएगा तो मरहम का ख्वाहिशमंद ही कौन बचेगा। लिहाजा कष्ट व परेशानियों के मौजूदा सैलाब में अपनी सियासी नाव उतारने के बजाय सुलह-समझौते की राह अपनाकर विपक्षी दल भी सरकार को सियासी बढ़त लेने का मौका नहीं देना चाह रहे हैं। तभी तो नोटबंदी से जुड़े किसी भी मसले पर कोई बड़ा नीतिगत मतभेद या भारी सैद्धांतिक असहमति नहीं होने के बावजूद विपक्षी ताकतें जन आक्रोश को उभारने और उसे अपने मनमाफिक दिशा देने का पुरजोर प्रयास कर रही हैं। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट की ही तरह सरकार को भी इस मामले में जन आक्रोश भड़कने की आशंका महसूस हो रही है। तभी तो नोटबंदी के मामले को देशहित व राष्ट्रवाद से जोड़कर लोगों को सब्र के साथ इस समस्या के समाधान की राह पर डटे रहने के लिये प्रेरित किया जा रहा है। यानि समग्रता में देखा जाये तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच भीषण टकराव की जो तस्वीर दिख रही है उसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। अलबत्ता हकीकत यह है कि इस तूफान का सियासी इस्तेमाल करने के लिये मतभेद का दिखावा किया जा रहा है ताकि बदलाव के दौर में भी अपने हिस्से की जमीन पर कब्जा बरकरार रह सके। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 21 नवंबर 2016

‘सियासी सामंजस्य पर भारी नेतृत्व की दावेदारी’

‘सियासी सामंजस्य पर भारी नेतृत्व की दावेदारी’

नोटबंदी के बाद देश में पैदा हुए राजनीतिक हालातों को सतही तौर पर देखा जाये तो आम लोगों को भुगतनी पड़ रही परेशानियों की आड़ लेकर केन्द्र की मोदी सरकार पर चैतरफा सियासी वार का सिलसिला लगातार जारी है। तमाम विरोधियों ने संसद से लेकर सड़क तक भारी कोहराम मचाया हुआ है। कोई नोटबंदी का फैसला वापस लिये जाने की मांग कर रहा है तो कोई इसे लागू करने की मियाद बढ़ाने की वकालत कर रहा है। कोई इस पूरे खेल में भारी घोटाले की बात कह कर संयुक्त संसदीय समिति से इसकी जांच कराने की अपील कर रहा है तो कोई इसकी तुलना उरी में हुए आतंकी हमले से करते हुए आक्रोश जता रहा है कि जितने जवान उरी में शहीद हुए उससे दोगुनी तादाद में आम लोगों को सरकार के इस फैसले के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी है। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो विपक्षी दलों को मोदी सरकार का यह फैसला कतई रास नहीं आया है लिहाजा वे खुलकर इसकी मुखालपत करने से भी नहीं हिचक रहे हैं। यहां तक कि सरकार के भीतर भी असंतोष का भाव स्पष्ट दिख रहा है लेकिन गनीमत है कि सत्ता के साझीदारों ने भावी राजनीतिक लाभ के लोभ में अपनी जुबान बंद रखना ही बेहतर समझा है। हालांकि शिवसेना को अपवाद के तौर पर अवश्य गिना जा सकता है जो केन्द्र से लेकर महाराष्ट्र तक की सत्ता में साझेदारी के बावजूद खुल कर सरकार के फैसले का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। यानि पीड़ित सभी हैं। बिलबिलाहट हर तरफ है। लेकिन पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सैद्धांतिक तौर पर सरकार के फैसले का पुरजोर विरोध करनेवाली पार्टियां एकजुट होकर अपनी बात रखने के प्रति जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर सरकार के इस फैसले के खिलाफ विपक्षी खेमे को लामबंद करने का प्रयास कांग्रेस से लेकर तृणमूल कांग्रेस ने भी किया लेकिन ना तो तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी की अगुवाई में सरकार की मुखालफत करने के लिये सहमति बन पायी और ना ही कांग्रेस को आगे रहने का मौका देने के प्रस्ताव पर आम सहमति की मुहर लग सकी। ममता ने बीती को बिसार कर वामदलों को भी अपने साथ जुड़ने का आग्रह किया लेकिन वामपंथियों को यह प्रस्ताव रास नहीं आया। हालांकि अप्रत्याशित तौर पर शिवसेना ने अवश्य ममता की अगुवाई में राष्ट्रपति भवन तक हुए विरोध मार्च में हिस्सेदारी की लेकिन उसके पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं था। कांग्रेस उसे वैसे भी अपने साथ जोड़ना गवारा नहीं कर सकती और बाकी कोई अन्य ऐसा खेमा अस्तित्व में ही नहीं आया था जिसने सरकार के खिलाफ खुलकर मैदान में उतरने की रणनीति अमल में लायी हो। काफी हद तक शिवसेना सरीखी हालत ही दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की भी रही जिसका एकसूत्रीय एजेंडा प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ मुखर दिखना ही रहता है। लेकिन कांग्रेस के साथ समानांतर दूरी बनाये रखना भी उसके लिये आवश्यक है वर्ना मोदी के खिलाफ बनारस में लोकसभा चुनाव लड़के अरविंद केजरीवाल ने जिन सियासी संभावनाओं का बीजारोपण किया था उसका भविष्य में कुछ परिणाम दे पाने की उम्मीद भी समाप्त हो जाएगी। साथ ही अगामी विधानसभा चुनावों का समीकरण भी विपक्षी एकता की राह में बाधक के तौर पर ही सामने आया है क्योंकि कांग्रेस के नवगठित खेमे से अगर सपा-बसपा ने दूरी बनाये रखी है तो इसकी काफी बड़ी वजह यूपी की जमीनी लड़ाई भी है। यानि विपक्षी खेमे के पूरे गुणा-भाग पर समग्रता पूर्वक निगाह डाली जाये तो इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता है कि चुनावी तकाजों ने सैद्धांतिक सियासी एकता की राह में नेतृत्व को लेकर गतिरोध उत्पन्न कर दिया है और कोई भी दल आसानी से किसी अन्य का नेतृत्व स्वीकार करने के लिये कतई तैयार नहीं दिख रहा है। हालांकि सैद्धांतिक तौर पर इस बात से सभी सहमत हैं कि भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत महागठजोड़ की जरूरत है क्योंकि विरोधी वोटों के बिखराव के कारण ही महज 32 फीसदी वोट पाने के बावजूद पिछले लोकसभा चुनाव में अपने दम पर पूर्ण बहुमत अर्जित करने में भाजपा को कामयाबी मिल गयी थी। लेकिन मसला नेतृत्व को लेकर अटक रहा है। पिछली दफा समाजवादी कुनबे को इकट्ठा करके सपा ने नये गठजोड़ का बीजारोपण भी किया तो बाकियों की महत्वाकांक्षा की तपिश ने उस बीज का ही नाश कर दिया। अब एक बार फिर कांग्रेस ने गैर-भाजपाई गठजोड़ की धुरी के तौर पर खुद को प्रस्तुत किया तो वामदलों सहित गिनती गिनाने के लिये कुल ग्यारह दलों ने उसकी बैठक में शिरकत अवश्य की लेकिन संसद की दहलीज के भीतर आते-आते ‘बिछड़े सभी बारी-बारी’ की स्थिति बन गयी। वहीं नये गठजोड़ के संभावित नेतृत्वकर्ताओं की सूची के कई बड़े नामों ने नोटबंदी के मसले को अपनी संभावना मजबूत करने के हथियार के तौर पर आजमाने से परहेज बरतते हुए सरकार के कदम का समर्थन करना ही मुनासिब समझा। यानि नेतृत्व के अभाव ने सियासी सामंजस्य का माहौल बनने ही नहीं दिया जिसके नतीजे में नोटबंदी के हथियार का वार अब सरकार का बाल बांका करने में भी बेकार साबित होता ही दिख रहा है। लेकिन कहते हैं कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। लिहाजा गैर-भाजपाई गठजोड़ की आवश्यकता के लिये किसी सर्वमान्य नेतृत्वकर्ता के आविष्कार की संभावना बदस्तूर बरकरार है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur 

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

‘सबको अपनी ही किसी बात पर रोना आया’

‘सबको अपनी ही किसी बात पर रोना आया’

वाकई ‘कौन रोता है किसी और की खातिर ऐ दोस्त, सबको अपनी ही किसी बात पर रोना आया।’ मौजूदा सियासी माहौल में यह बात सोलह आना सच साबित होती दिख रही है। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता था कि देश की अर्थव्यवस्था को ही नहीं बल्कि आंतरिक व बाहरी शांति-सुरक्षा से लेकर सामाजिक संरचना तक को खोखला कर रहे कालेधन व नकली नोट से निजात दिलाने की कोशिशों का इस कदर पुरजोर विरोध होता। विरोध करनेवालों की कतार पर निगाह डाले तो परस्पर धुर विरोधी माने जानेवाले भी आपस में ‘साथी हाथ बढ़ाना’ की गुहार लगाते दिखाई पड़ रहे हैं। हर मसले पर एक दूसरे की राह काटनेवाले आज एक ही लीक पर एकजुट होते और परस्पर सहयोग व सहारे का आदान-प्रदान करते नजर आ रहे हैं। कुछ गठजोड़ सार्वजनिक तौर पर तैयार हो रहे हैं तो कुछ पर्दे के पीछे। सबके बीच तारतम्यता भी है और तालमेल भी। जमीन पर भले ही टकराव हो लेकिन मुद्दे की बात पर कोई मतभेद नहीं है। और मुद्दा है पैसा। वह पैसा जिसे मोदी सरकार ने एक ही झटके में कूड़ा बना दिया है। समझ नहीं आ रहा कि इसे कहां गाड़ें, कहां जलाएं या कहां ले जाएं। चुनाव सिर पर है। बिन पैसे के चुनावी बारात निकले भी तो कैसे। दूल्हा तैयार है मगर बाराती खिसक रहे हैं। बिन गुड़ के मक्खी भला टिके भी तो कैसे। और गुड़ पर तो तेजाब पड़ गया है। अब यह तेजाबी गुड़ न तो खाने लायक बचा है और ना ही खिलाने लायक। लिहाजा सबका बौखलाना स्वाभाविक ही है। हालांकि इस बौखलाहट से अंदरूनी तौर पर उस पार्टी के लोग भी अछूते नहीं हैं जिसकी अगुवाई में चल रही सरकार ने नोटबंदी का कारनामा कर दिखाया है। लेकिन उनकी मजबूरी है कि वे इसका विरोध भी नहीं कर सकते। तभी तो इस मसले को चुनावी मुद्दे के तौर पर भुनाने के लिये तो भगवा ब्रिगेड बुरी तरह बेताब है लेकिन शीर्ष नेतृत्व के इशारों को अनसुना करते हुए जमीनी स्तर पर सरकार के प्रति दिख रहे खीझ व रोष को कम करने का कोई ठोस प्रयास नहीं किया जा रहा है। यानि दुखी सब हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई कह रहा है और कोई चुपचाप सह लेना ही बेहतर समझ रहा है। वर्ना अगर ये राजनीतिक दल इतने ही पाक-साफ होते तो खुद को सूचना के अधिकार के दायरे में लाए जाने के प्रस्ताव का विरोध ही क्यों करते। देश के किसी भी दल ने अगर इस प्रस्ताव को स्वीकार करके पारदर्शिता का मुजाहिरा करने की हिम्मत नहीं दिखाई तो इसका सीधा मतलब तो यही है कि कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है। लेकिन विडंबना देखिये कि पर्दा तो यूं ही पड़ा रहा गया और राज भीतर ही खाक हो गया। अब क्या छिपाना और किससे छिपाना। कम्बख्त ने कुछ रहने ही नहीं दिया जिस पर पर्दा डालने की जरूरत पड़े। तभी तो अब सभी अपने ही हाथों अपना पर्दा हटाकर सामने आने लगे हैं। खुल कर यह मांग की जाने लगी है कि कुछ मोहलत दे दी जाये। लेकिन अभी तक किसी ने अपने लिये मोहलत मांगने की जहमत नहीं उठायी है। सब आड़ ले रहे हैं आम आदमी की। गरीब, किसान, मजदूर और महिलाओं की। लेकिन गरीब और मजदूर के पास कभी कुछ रहा ही नहीं है जिसके लिये उसे मोहलत की दरकार हो। किसान पहले ही से इस सारे पचड़े की पकड़ से आजाद रहा है। रहा सवाल महिलाओं का तो उनके रीते-सूने खाते में पहली बार तो बहार की दस्तक सुनाई पड़ी है लिहाजा वे भला क्यों परेशान हों। यानि आड़ भी उसकी ली जा रही है जिसे इसकी दरकार ही नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त की स्थिति है। अगर वास्तव में किसी की आड़ लेनी थी तो उसकी ली जानी चाहिये थी जिसे वास्तव में इससे तगड़ी चोट पड़ी है। लेकिन उसकी आड़ लें तो रही-सही जनसंवेदना भी जाती रहेगी। लेकिन दिल है कि मानता नहीं टाईप की टीस-खीझ उतारना भी तो जरूरी है। लिहाजा सब रो रहे हैं उस आम आदमी के लिये जो एटीएम की कतार में धक्का-मुक्की करने के लिये मजबूर होने के बावजूद खुश है। वैसे भी अपने यहां तो यही परंपरा रही है कि अपने दुख से कोई दुखी नहीं होता बशर्ते बाकी लोग भी उसकी ही तरह दुखी और परेशान हों। अधिकांश लोगों को दुख होता है पड़ोसी की खुशी देखकर। यही हालत सियासी दलों की भी है। बहनजी ने तो खुल्ले में कह भी दिया है कि सरकार ने अपना बंदोबस्त तो पहले ही कर लिया और बाकियों को झटके में हलाल कर दिया है। अब यह बात तो वैसे भी किसी के भी हलक से नीचे नहीं उतर सकती कि अपने लिये बचाव का इंतजाम किये बगैर ही कोई ऐसा बम फोड़ सकता है जिसमें सबके साथ उसका हित भी स्वाहा हो जाये। लिहाजा बम फोड़नेवाले से सबका जलना-कुढ़ना स्वाभाविक ही है। इसी जलन-कुढ़न ने वह मंच तैयार कर दिया है जिस पर सब एकजुट हो रहे हैं। खैर, बम फोड़नेवाले के वजूद पर इस धमाके का कितना असर हुआ है यह तो सही वक्त पर ही पता चलेगा लेकिन बाकियों ने अपने फफोले को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की जो कोशिश की है उससे उनकी सादगी, शुचिता, इमानदारी और पारदर्शिता पर लोगों को चटखारे लेने का मौका तो मिल ही गया है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

‘जबरा मारे भी और रोने भी ना दे’

‘जबरा मारे भी और रोने भी ना दे’


मोदी सरकार ने कालेधन की समानांतर अर्थव्यवस्था के खिलाफ जो सर्जिकल स्ट्राइक की है उसकी आंधी में जिनकी बिछी-बिछाई बिसात तिनके की तरह उड़ रही हो उन्हें इसका दुख-दर्द होना तो स्वाभाविक ही है। लेकिन दिल में दर्द और नजरों में नमी के बावजूद वे ना तो अपना दर्द बयान कर पा रहे हैं और ना ही इसका कोई इलाज तलाश पा रहे हैं। उस पर कोढ़ में खाज की बात यह है कि उन्हें इस सर्जिकल स्ट्राइक की तारीफ भी करनी पड़ रही है। इसे देशहित में उठाया गया बेहतरीन कदम भी बताना पड़ रहा है। ऐसे वक्त में रहीम की यह सीख ही उनके काम आ रही है कि ‘रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय, सुनि अठिलइहें लोग सब, बांटि न लइहें कोय।’ लेकिन मसला है कि अगर जख्म को मवाद की शक्ल में पिघलकर बह निकलने की राह ना मिले तो वह जानलेवा कैंसर में तब्दील हो जाता है। मगर इस मामले में यह सरकार इतनी संवेदनहीन है कि मारने के बाद रोने की इजाजत भी नहीं देती। खास तौर से इस सरकार का मुखिया इतना क्रूर और बेरहम है कि इसने मारने के बाद छटपटाने का भी मौका नहीं दिया। मार खाने का भी उत्सव मनाने के लिये मजबूर कर दिया है। मंगलगान गाना पड़ रहा है। जैसे सरहद पार करके देश में आतंक मचाने के मकसद से घुसपैठ करने की फिराक में बैठे आतंकियों को आधी रात के बाद हलाक करने की रणनीति अपनाई गयी थी उसी तर्ज पर कालेधन के दम पर देश में समानांतर अर्थव्यवस्था संचालित करनेवालों के खिलाफ तब सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया गया जब सारे बैंक बंद हो चुके थे। ना माल-मत्ता संभालने का मौका मिल सका ना खुद को संभालने का। अचानक ही घोषणा कर दी गयी पांच सौ और हजार के नोटों को चलन से बाहर करने की। जिस समानांतर व्यवस्था को खड़ा करने में पिछले कई दशकों में कई परिवारों की पीढ़ियां खप गयीं, जोंक की तरह समाज से माल-असबाब चूसकर पूरा साम्राज्य खड़ा किया गया, विश्व ग्राम व्यवस्था के चप्पे-चप्पे तक जिसकी पैठ बनायी गयी और भारत सरकार के सालाना बजट से भी अधिक का अर्थतंत्र कायम किया गया उसे एक झटके में ध्वस्त करने से पहले एक बार बताना भी जरूरी नहीं समझा गया तो इसे संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ना कहें तो और क्या कहें। एक बार के लिये संभलने का तो मौका दिया होता। कुछ नहीं तो कम से कम काले कारनामों पर सफेदी पोतने की गुंजाइश ही छोड़ दी जाती। लेकिन हालत यह कर दी गयी है कि अब पुराने नोट को बदलने के लिये बैंक लेकर जाने का मतलब है ‘आ बैल मुझे मार’ का न्यौता देना। आखिर बताया भी कैसे जाये कि कितने प्रत्याशियों से ढ़ाई-तीन सौ करोड़ की रकम लेकर उन्हें विधानसभा का टिकट दिया गया है। किन-किन घोटालों से कितने लाख जमा किये गये हैं। कितनों को चूना लगाया गया है। ये सब बातें बतायें भी तो कैसे। और अगर ना बतायें तो पूरी रकम में अपने ही हाथों आग लगाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा है। पुराने नोटों का बंडल कूड़ा होते हुए देखकर कितना दुख हो रहा होगा उसको, जिसने लाखों की रकम सुविधा शुल्क के तौर पर प्रदान करने के एवज में सरकारी नौकरी या टेंडर हासिल किया था और अब उस लागत की सूद के साथ वसूली के लिये खून-पसीना एक कर रहा था। उसके दुख की तो सीमा ही नहीं है जिसने जमीन-आसमान ही नहीं बल्कि ईमान-भगवान को भी बेचकर अपनी भावी पीढ़ियों का कल्याण करने की राह अपनाई थी लेकिन अब उसकी सारी मेहनत एक झटके में ही मिट्टी में मिल गयी है। आखिर कुछ तो रहम कर लिया होता इन बेगैरत-बेइमानों पर। लेकिन नहीं, एक ही रट लगायी हुई है कि ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा। इस क्रूर कदम ने उन विरोधियों का तो बेड़ा ही गर्क कर दिया गया है जो कम से कम कालेधन के सवाल पर चीख-पुकार मचाके अपना गला साफ कर लिया करते थे। अब वे बोलें भी तो क्या बोलें। भ्रष्टाचार के जिस जाल में पूर्ववर्ती फंस गये थे उसमें इन्हें फांसना फिलहाल नामुमकिन की हद तक मुश्किल है। गलती कोई ऐसी कर नहीं रहे जिसकी हाय-तौबा मचायी जाये। यानि अब तक वोट लेने का मौका नहीं दे रहे थे और अब बटोरे हुए नोट भी लूट लिये। ऐसे में विरोधी अगर इस निजाम को तानाशाह बता रहे हैं तो इसमें गलत ही क्या है? किसी पर कोई रहम नहीं किया गया। मीडिया को भी भनक नहीं लगने दी। कहने को तो पूरा फैसला केबिनेट से लेकर भाजपा अध्यक्ष और रिजर्व बैंक के गवर्नर को भी विश्वास में लेकर किया गया है लेकिन हवा कहीं से भी नहीं निकल सकी। वर्ना कुछ तो बचाव का इंतजाम कर लिया जाता। हालांकि पहले का दौर होता तो रातोंरात थोक में सोना खरीदकर सोने चले जाते। लेकिन अब वहां भी एक्साईज ड्यूटी लगा दी गयी है। लिहाजा सोना भी उतना ही खरीदा जा सकता है जितनी रकम दुकानदार हजम कर सके। शायद बुजुर्गों ने ठीक ही बताया है कि धन का तीन ही अंजाम होता है, भोग, दान और नाश। जितने दिन भोग लिखा था, भोग लिया। अब या तो दिल बड़ा-कड़ा करके जीरो बैलेंसवाली जनधन योजना के खाताधारकों को थोड़ी-थोड़ी रकम दान कर दी जाये वर्ना इसका नाश तो तय ही है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

‘होइहि सोइ जो मुलायम रचि राखा’

‘होइहि सोइ जो मुलायम रचि राखा’ 


गीता का ज्ञान यही बताता है कि जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह बहुत अच्छा है और जो होनेवाला है वह सबसे अच्छा होगा। इस लिहाज से देखें तो समाजवादी पार्टी में जो हो रहा है वह भी बहुत अच्छा है और जो होनेवाला है वह सबसे अच्छा होगा। हालांकि तत्व की बातें आम तौर पर तत्काल समझ में नहीं आतीं। तभी तो सपा के भीतर जारी संग्राम का पूरा मामला अंधों के हाथी सरीखा बना हुआ है। लेकिन जिसने पूरा तत्व समझ लिया वह निर्विकार है, शांत है। जाहिर है कि पूरे मामले के असली तत्व को समझना तो उसके लिये ही संभव है जो वास्तव में इस समूचे बवाल का ना सिर्फ सूत्रधार हो बल्कि पूरा मामला उसकी लिखी हुई पटकथा के अनुसार ही संचालित हो रहा हो। इस नजरिये से देखें तो सिर्फ सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ही इकलौते ऐसे शख्स हैं जिन्होंने इस पूरे महाभारत में अब तक अपना आपा नहीं खोया है। हालांकि वे गुस्से का इजहार भी कर रहे हैं, शिवपाल को संरक्षण देने की बात स्वीकार भी कर रहे हैं, अखिलेश की सरकार को अंगीकार भी कर रहे हैं, विरोधियों के हर वार को बेकार भी कर रहे हैं, साथियों का सत्कार भी कर रहे हैं, आस्तीन के सांपों पर प्रहार भी कर रहे हैं और सबकुछ धुंआधार कर रहे हैं। लेकिन वे उतना ही कर रहे हैं जितना मुनासिब है, अपेक्षित है, उचित है। वास्तव में देखा जाये तो एक कुशल, दक्ष व सक्षम सर्जन की तरह दत्तचित्त होकर वे सपा में मौजूद उस फोड़े की सर्जरी कर रहे हैं जिसका फूटना तय था। फर्क सिर्फ इतना है कि वह अपने आप तब फूटता जब मुलायम का होना भी नहीं होने के बराबर हो चुका होता और उसका फूटना सियासी तौर पर सपा के लिये निश्चित तौर पर विभाजक व जानलेवा ही साबित होता। लेकिन मुलायम ने ना सिर्फ उस फोड़े को समय रहते पहचाना है बल्कि अपनी सक्षम मौजूदगी में अपने ही हाथों उसका इलाज कर देना बेहतर समझा है। चुंकि फोड़ा सपा के संचालक परिवार की गर्भनाल से जुड़ा हुआ था लिहाजा सर्जरी भी शांत चित्त व सधे हाथों से ही संभव थी और इस मामले में मुलायम का तो कोई सानी ही नहीं है। यानि वे जो कुछ भी कर रहे हैं, पूरे सोच विचार के साथ कर रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता और वे भावावेश में बह जाते तो उनके लिये अखिलेश और शिवपाल में से किसी एक को संगठन व सरकार से बाहर निकालना कौन सा मुश्किल काम था। लेकिन वे दोनों को झेल रहे हैं, पूरी तरह बर्दाश्त कर रहे हैं। मंच पर शिवपाल ने मुख्यमंत्री से माइक छीनकर उन्हें झूठा कहा तब भी मुलायम ने आपा नहीं खोया। अखिलेश ने चुनाव प्रचार के लिये एकला चलो की राह अपनायी तब भी मुलायम शांत रहे। रामगोपाल से लेकर अमर सिंह तक ने जो चिल्ल-पों मचायी उसका भी उन पर कोई असर नहीं हुआ और अब भी वे परिवार और पार्टी की एकजुटता के प्रति पूरी तरह आश्वस्त दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने पिता होने के नाते बेटे का जमकर कान मरोड़ा लेकिन मुख्यमंत्री पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने की पहल नहीं की। वे मुलायम ही तो थे जिन्होंने इस सर्जरी की औपचारिक शुरूआत करते हुए अंसारी बंधुओं के लिये पार्टी का दरवाजा खुलवाया और अखिलेश को हटाकर शिवपाल को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। मौजूदा टकराव की शुरूआत वहीं से तो हुई थी। उसके बाद जो कुछ भी घटा उसमें अब तक किसका घाटा हुआ है और कौन विजेता बनकर उभरा है इस बात को समझ लिया जाये तो पूरे मामले का असली तत्व आसानी से समझा जा सकता है। अब तक की पूरी सर्जरी ने किसी को ‘हीरो’ बना दिया है तो किसी को ‘विलेन’। कोई ‘जोकर’ साबित हुआ है तो कोई ‘चोकर’। सिर्फ मुलायम ही हैं जिनकी छवि पर इस सबका कोई असर नहीं हुआ है। वे पहले भी सर्वमान्य थे और आज भी हैं। चुंकि फोड़ा गर्भनाल से जुड़ा था लिहाजा सर्जरी भी काफी बड़ी हुई है। गहराई से हुई है। ढ़ेर सारा विषाक्त मवाद भी निकला है और दमघोंटू बदबू भी फैली है। नतीजन सपा का कुछ कमजोर व अस्वस्थ दिखना स्वाभाविक ही है। लेकिन इलाज इतना सटीक व कारगर हुआ है कि अब भविष्य में फोड़ा फूटने की संभावना ही समाप्त हो गयी है। अब इस सर्जरी का घाव भरने के बाद सपा का स्वरूप बिल्कुल वैसा ही होगा जैसा सोचकर मुलायम ने साढ़े चार साल पहले अखिलेश को अपनी सियासी विरासत का उत्तराधिकारी बनाया था। साथ ही इस सर्जरी में उतनी ही काट-छांट हुई है जितना बेहद आवश्यक था। जो थोड़ी बहुत विसंगतियां और अनुत्तरित प्रश्न जान बूझकर छोड़ दिये गये हैं उनका जवाब स्वस्थ होने के बाद सपा खुद ही तलाश लेगी। इसके लिये उसे ज्यादा मशक्कत भी नहीं करनी पड़ेगी। इसके अलावा सर्जरी के लिये समय भी ऐसा चुना गया जब सर्जिकल स्ट्राइक के धमाके ने कान सुन्न कर दिया था लिहाजा उस आवाज से पार पाने के लिये बड़ी सर्जरी से पनपनेवाली कराह व चीख-पुकार की आवश्यकता भी थी। अब सर्जरी भी हो गयी है और घाव पर टांके की प्रक्रिया भी जारी है। लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि इसका घाव भरने में कितना वक्त लगता है और पार्टी को तात्कालिक तौर पर इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

’मन-मन भावे, मूड़ हिलावे‘

’मन-मन भावे, मूड़ हिलावे‘


किसी के भी चाल-चरित्र व स्वभाव के बारे में जितनी सही व पूरी जानकारी उसके धुर विरोधी के पास होती है उतनी किसी और के पास हो ही नहीं सकती। तभी तो भाजपा को अगर सबसे सही तरीके से किसी ने जाना, समझा और पहचाना है, तो वे हैं सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव। खास तौर से ‘मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना’ का दिखावा करके मतदाताओं व विरोधियों को भ्रम व असमंजस में डालने के भाजपा के जिस चरित्र के प्रति मुलायम लगातार सबको आगाह करते रहे हैं उसी का मुजाहिरा किया है भाजपा की मौजूदा कूटनीति ने। यूपी विधानसभा के चुनाव में पार्टी एक हाथ में राष्ट्रवाद के झंडे और दूसरे में विकास के एजेंडे का तो सार्वजनिक तौर पर मुजाहिरा कर रही है। लेकिन राष्ट्रवादी झंडे के भीतर सांप्रदायिक मसलों का डंडा घुसेड़ने की अपनी कोशिशों को खुलकर स्वीकार करना उसे कतई गवारा नहीं हो रहा है। शायद यही भाजपा का असली स्वभाव जिसके तहत इसके तमाम नेता अधिकांश मसलों पर कभी एक सुर में बोलना गवारा नहीं करते। दूर से सुननेवालों को ऐसा लगता है मानो पार्टी के भीतर सैद्धांतिक व वैचारिक स्तर पर भारी टकराव चल रहा है। लेकिन नजदीक से देखने पर तस्वीर बदली हुई दिखती है। इसमें मजेदार तथ्य यह है कि पार्टी में सबकी राहें बेशक अलग दिखती हों लेकिन उनकी मंजिल एक ही रहती है। अब जहां लक्ष्य को लेकर कोई मतभेद या विरोधाभास ना हो वहां राहों का भेद कोई मायने नहीं रखता। लिहाजा इनका आपसी टकराव व विरोध भी अक्सर दिखावे का ही रहता है। परस्पर मतभेद तो दिखता है लेकिन उसमें मनभेद नहीं होता। मन मिला हुआ ही रहता है। दरअसल संगठनिक स्तर पर होनेवाली इस नूराकुश्ती का मकसद सिर्फ सियासी माहौल में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करना ही रहता है। और कुछ भी नहीं। इस भ्रम के शिकार सिर्फ मतदाता ही नहीं होते बल्कि कई दफा विरोधी भी हो जाते हैं। वे समझ ही नहीं पाते कि भाजपा के किस नेता की बात का विरोध करें और किसके बयान की अनदेखी। भ्रम के इसी कुहासे में फंसकर विरोधियों की गाड़ी अक्सर डी-रेल हो जाती है और भाजपा मैदान मार ले जाती है। ऐसा ही माहौल भाजपा ने एक बार फिर बनाने का प्रयास किया है। खास तौर से यूपी विधानसभा के चुनाव को सांप्रदायिक रंग देने के मामले को लेकर। जितने मुंह उतनी बातें। सुब्रमण्यम स्वामी तो राम मंदिर निर्माण की तारीख का भी ऐलान कर चुके हैं। जबकि राजनाथ सिंह ने औपचारिक तौर पर सरकार की विवशता का इजहार करते हुए पहले ही कह दिया है कि चुंकि राज्यसभा में मोदी सरकार को बहुमत हासिल नहीं है लिहाजा संसद से कानून बनाकर मंदिर का निर्माण कर पाना फिलहाल संभव ही नहीं है। दूसरी ओर यूपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य से लेकर उमा भारती तक खम ठोंकते हुए यह कहने से परहेज नहीं बरत रहे हैं कि मंदिर तो मोदी सरकार के कार्यकाल में ही बनेगा। यानि हर किसी की जुबान पर मंदिर का नाम तो है लेकिन सुर अलग-अलग है। विनय कटियार तल्ख सुर में लाॅलीपाॅप की कड़वाहट बयान करते हैं तो महेश शर्मा कहते हैं कि जो किया जा सकता है वह तो कम से कम कर लिया जाये। इस सबसे अलग भाजपा का राष्ट्रीय संगठन मंदिर मसले को आस्था का विषय बताने से तो नहीं हिचक रहा लेकिन लगे हाथों यह समझाने से भी चुक रहा है कि यूपी में मंदिर को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जायेगा बल्कि पार्टी विकास और सुशासन के एजेंडे पर ही चुनाव लड़ेगी। पार्टी का साफ मत है कि मंदिर बनना तो चाहिये लेकिन इसके लिये मनामानी नहीं होनी चाहिये। या तो आम सहमति के आधार पर मंदिर निर्माण हो या फिर अदालत के आदेश पर। अब आम सहमति तो बनने से रही। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा किये गये विवादित जमीन के बंटवारे के दो हिन्दू लाभार्थियों के बीच अब तक सहमति नहीं बन पायी है तो तीसरे मुस्लिम पक्षकार के साथ सहमति बने भी तो कैसे? रहा सवाल अदालत के आदेश से मंदिर निर्माण का, तो इस राह के रोड़े फिलहाल समाप्त होते नहीं दिख रहे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला सामने आये तकरीबन दो साल का वक्त गुजर जाने के बावजूद आज तक इस मामले की फाइल सर्वोच्च न्यायालय की आलमारी में धूल ही फांक रही है। अब तक इसकी सुनवाई के लिये पीठ का गठन भी नहीं हो पाया है। पता नहीं कब पीठ का गठन होगा, कब सुनवाई होगी और कब इसका फैसला आएगा। यानि पूरा मामला अभी बदस्तूर अटका-लटका ही रहनेवाला है। इस हकीकत को जानते हुए भी अगर मंदिर मसले की लहर उठाने का प्रयास हो रहा है और कटियार की तल्खी, सरकार की नरमी और संगठन की गर्मी दिख रही है तो इसमें किसी का किसी से कोई विरोधाभास नहीं है। अंदर से सब मिले हुए ही हैं। बस ऊपर से एक दूसरे से असहमत होने का दिखावा किया जा रहा है। ताकि समाज की कट्टरवादी धारा पर भी पकड़ बनी रहे और मध्यममार्गी धारा पर भी। इसके अलावा छोड़-पकड़ की इस खींचतान में विरोधियों को भी उलझाये रखा जाये ताकि वे किसी एक बयान को पकड़कर आगे ना ले जा पायें। अब ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘चित भी मेरी पट भी मेरी’ की जो दोधारी तलवार भाजपा भांज रही है उसकी चपेट इसके विरोधी आते हैं या पार्टी खुद ही लहुलुहान होती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

‘बेकरारी तुझे ऐ अखिलेश कभी ऐसी तो न थी’

’ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार?‘


मुगलिया सल्तनत के आखिरी सुल्तान कहे जानेवाले बहादुर शाह जफर के अंदाज में आज वाकई उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हर कोई यह जानना चाह रहा है कि ‘ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार, बेकरारी तुझे ऐ अखिलेश कभी ऐसी तो न थी।’ वास्तव में देखा जाये तो इन दिनों अखिलेश बड़े बेकरार और बेसब्र दिख रहे हैं। यह बेकरारी उनकी बातों से भी झलक रही है और उनकी हरकतों से भी। जिस सौम्य, सरल व सहज अंदाज के कारण वे भीड़ में अलग दिखते रहे हैं वह कहीं दब-छिप सा गया है। उसकी जगह ले ली है खीझ, परेशानी और बेकरारी ने। कहां तो वे सब्र का समुंदर मालूम पड़ते थे जबकि आज उनके सब्र का बांध बुरी तरह जर्जर और कमजोर होकर टूटता दिख रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो बचपन में अपना नामकरण खुद करने की दलील देकर एकला चलो की राह अपनाने घुड़की देने की कोशिश वे कतई नहीं करते। इस तरह की बातें करके वे अपनी बेसब्री का ही मुजाहिरा कर रहे हैं। कहीं ना कहीं उनके सब्र व संयम का बांध टूटता दिख रहा है। वे उसी जाल में उलझते हुए दिखाई दे रहे हैं जिसमें उनके विरोधी उन्हें लपेटना चाहते हैं। उनके विरोधियों की तो कोशिश ही यही है कि वे अपना आपा खोकर ऊल-जुलूल बकना शुरू कर दें। ताकि मुलायम सिंह का उन पर जो भरोसा है वह मिट्टी में मिल जाये और उन्हें अपने लिये किसी नये उत्तराधिकारी की तलाश करना आवश्यक महसूस होने लगे। ऐसे में कसौटी पर है अखिलेश का संयम। वास्तव में देखा जाये तो अभी वक्त का तकाजा यही है कि उन्हें अपनी कथनी और करनी में भरपूर संयम का प्रदर्शन करना चाहिये। उनके बात या व्यवहार से कहीं से भी यह नहीं झलकना चाहिये कि वे संगठन, सरकार या परिवार के किसी सदस्य से रत्ती भर भी नाराज हैं। उनकी बातों से मुलायम के प्रति अटूट विश्वास झलकना चाहिये और मुलायम की हर बात को उन्हें आदेश के तौर पर स्वीकार व अंगीकार करना चाहिये। ठीक ऐसे ही जैसे उनके चाचा शिवपाल यादव लगातार करते हुए दिखते आ रहे हैं। आखिर शिवपाल ने सपा में अपनी हैसियत मजबूत करने के लिये मुलायम के विश्वास का ही तो सहारा लिया है। वर्ना उनकी क्या हैसियत थी कि वे मुलायम द्वारा घोषित उत्तराधिकारी की अपने दम पर जड़ खोदने की सोच भी सकें। लेकिन आज वे ऐसा सिर्फ सोच ही नहीं रहे बल्कि उसे कार्यरूप देते हुए भी दिखाई पड़ रहे हैं तो इसकी इकलौती वजह है अखिलेश और मुलायम के बीच आयी वैचारिक व सैद्धांतिक दूरी। हालांकि इस बात पर अलग से बहस हो सकती है कि यह दूरी अखिलेश की कथनी व करनी के कारण आयी है या फिर इसकी पटकथा किसी और ने लिखी है। कहा तो यह भी जाता है कि इस सबके पीछे सपा के संचालक परिवार की सबसे मजबूत मानी जानेवाली महिला सदस्य ने ही निर्णायक भूमिका निभायी है और उन्होंने मुलायम को अपने शीशे में उतार कर अखिलेश से उन्हें दूर कर दिया है। साथ ही इस दूरी को हवा देकर अपना सियासी समीकरण साधने के दोषी शिवपाल सरीखे अंदरूनी भी बताये जाते हैं और अमर सिंह सरीखे बाहरी भी। लेकिन इन कही-सुनी बातों से इस हकीकत को हर्गिज झुठलाया नहीं जा सकता है कि आखिरकार कहीं ना कहीं अखिलेश भी इस दूरी, संबंधों में पनपी कटुता व आपसी अविश्वास के लिये कम दोषी नहीं हैं। पिछले चुनाव में सपा को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद मुलायम ने तो अखिलेश को अपना उत्तराधिकारी बनाकर मुख्यमंत्री पद की कुर्सी सौंप ही दी थी। लिहाजा बाद में बाप-बेटे के बीच जो दूरी बनी उसके लिये मुलायम को जिम्मेवार ठहराना कतई उचित नहीं होगा। साथ ही अगर मुलायम इसके लिये जिम्मेवार नहीं हैं तो जाहिर तौर पर उनके करीबियों व अन्य विश्वासपात्रों पर भी इसका दोष नहीं मढ़ा जा सकता है। ऐसे में सीधे तौर पर मौजूदा हालातों के लिये दोषी अखिलेश ही दिखाई पड़ते हैं जिन्होंने कई फैसले मनमाने तरीके से किये जो मुलायम को नागवार गुजरे। अगर उन्होंने मुलायम को विश्वास में लेकर फैसले किये होते तो ना तो उन्हें दोबारा गायत्री प्रजापति को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिये मजबूर होना पड़ता और ना ही प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से हाथ धोना पड़ता। आज नौबत यहां तक आ पहुंची है कि मुलायम उन्हें सपा का चुनावी चेहरा बनाने के लिये भी तैयार नहीं हैं। उन्होंने खुलकर बता दिया है कि आगामी चुनाव में किसी को भी चुनावी चेहरा नहीं बनाया जाएगा और चुनाव के बाद विधायक दल की बैठक में आम सहमति के आधार पर ही नये मुख्यमंत्री का चयन किया जाएगा। यानि बात बिल्कुल साफ है कि कहीं ना कहीं अखिलेश के प्रति मुलायम का भरोसा कमजोर अवश्य पड़ा है। बेशक इसकी डोर आज भी टूटी नहीं है जिसके कारण परिवार में पनपी असहजता को वे सार्वजनिक तौर पर खारिज करते हुए ही दिख रहे हैं लेकिन अगर अखिलेश ने हालात की गंभीरता को समझते हुए स्थिति को संभालने की पहल नहीं की तो सियासी डगर पर उनकी राहें लगातार दुश्वार होती जाएंगी। लिहाजा अपेक्षित है कि वे सब्र व संयम का परिचय देते हुए मुलायम को विश्वास में लेकर ही आगे बढ़ें। अगर मुलायम के बताये मार्ग का आंखें मूंद कर अनुसरण किया जाये तो भविष्य सुरक्षित भी रहेगा और सुनिश्चित भी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

‘बात निकली है तो अब दूर तलक जाएगी’

‘बात निकली है तो अब दूर तलक जाएगी’


वाकई दशकों से अनसुना ही तो किया जा रहा था पड़ोसी की उस बात को जो वह हमें सुनाता आ रहा था। उसने अपनी बात सुनाने के लिये क्या-क्या नहीं किया। कभी गालियां दी, कभी हिंसक हुआ। कभी गुदगुदाया भी, कभी तमतमाया भी। सिर्फ इसलिये ताकि उसकी बात सुनी जाये। लेकिन वह बात जिसका कोई मायने-मतलब ही नहीं है। आखिर ऐसी बातों को अनसुना ना करते तो और क्या करते। लेकिन वह नहीं माना। उसकी गुस्ताखियां लगातार बढ़ती गयीं। इस तरफ की खामोशी को उसने कमजोरी समझ ली। उसका हौसला लगातार बुलंद होता गया। लेकिन बर्दाश्त की भी एक हद होती है। और जब वह हद आ गयी, तो हो गया वह, जिसकी हमारे पड़ोसी ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। उसे ऐसी जगह पर ऐसा जख्म दे दिया गया जिसे ना तो वह सह सकता है और ना ही किसी से कह सकता है। कहे भी तो क्या कहे, किससे कहे। तभी तो जख्मों से छलनी होने के बावजूद वह मानने के लिये तैयार ही नहीं है कि उसके किस हिस्से पर कैसा वार हुआ है। कुछ समय के लिये अगर मान भी लिया जाये कि उसके खिलाफ कोई वार नहीं किया गया है तो आखिर यह छटपटाहट और बिलबिलाहट क्यों है? क्यों भारत के तमाम टीवी चैनलों को प्रतिबंधित किया गया है? नवाज शरीफ ने आखिर किस बात की निंदा की है? क्यों लश्कर का मुखिया बिलबिलाहट में जहर उगलता और बदला लिये जाने की धमकी देता घूम रहा है? जब कुछ हुआ ही नहीं है तो किसका बदला, कैसा बदला? यानि वह हुआ तो जरूर है जिसे स्वीकार करने का साहस हमारे पड़ोसी मुल्क में है ही नहीं। आखिर वह दुनियां के सामने यह स्वीकार भी कैसे कर सकता है कि उसके कब्जेवाली जमीन पर आतंकी गतिविधियां संचालित हो रही थीं जिसे भारत ने विध्वंसक कार्रवाई करते ध्वस्त कर दिया है। साथ ही वह अपनी आवाम के सामने यह भी कबूल नहीं कर सकता कि उसके कब्जेवाली जमीन पर चहलकदमी करते हुए पड़ोसी मुल्क की फौज ने बड़े आराम और इत्मिनान के साथ सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दे दिया और उसकी तमाम रक्षा व्यवस्था को इसकी भनक भी नहीं लग सकी। परमाणु और मिसाइलों की तमाम धौंस का बेअसर रहना भी वह स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन वह स्वीकार करे या ना करे, इतना तो तय है कि पलटवार करने का प्रयास जरूर करेगा। तैयारियां इधर भी पूरी हैं। बस इंतजार है कि वह कुछ करे तो सही। जवाब ऐसा मिलेगा कि सिर्फ इतिहास ही नहीं बदलेगा, पूरा भूगोल बदल जाएगा। वैसे भी पहले पठानकोट और उसके बाद उड़ी में कराए गये आतंकी हमले का करारा जवाब देने के क्रम में अंजाम दिये सर्जिकल स्ट्राइक से ही भारत के सीने में सुलग रही बदले की आग कतई शांत नहीं पड़ सकती है। अभी तो सिर्फ ताजा घाव पर मरहम लगा है, नासूर बन चुके पुराने जख्मों का हिसाब-किताब तो बाकी ही है। यह तो आतंक के खिलाफ सीधी कार्रवाई की महज एक शुरूआत भर है। पाक की ओर से थोपे गये छद्म युद्ध के खिलाफ इसे भारत के पहले औपचारिक प्रतिवाद के तौर पर देखा जाना ही उचित होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो आतंक के खिलाफ लंबे समय से जारी लड़ाई का यह छोटा सा पड़ाव मात्र है। सच तो यह है कि बेशक अपनी ओर से आर-पार का युद्ध छेड़ने की पहल करने के विकल्प को आजमाने से परहेज बरतने की नीति बदस्तूर जारी रहनेवाली है लेकिन पाकिस्तान को जंग से भी अधिक जहरीला दर्द देने की राह पर भारत लगातार आगे बढ़ता रहेगा। खैर, सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देने के अलावा पड़ोसी मुल्क को विश्व बिरादरी में अलग-थलग करने का पड़ाव भी अब पूरी तरह पार होने की कगार पर ही है। अमेरिका द्वारा पाक को औकात में रहने का निर्देश दिया जाना, संयुक्त राष्ट्र द्वारा नवाज शरीफ की तमाम दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया जाना, सार्क देशों द्वारा पाक का पूरी तरह बहिष्कार किया जाना, रूस द्वारा पाक सेना के साथ पूर्वनिर्धारित युद्धाभ्यास स्थगित किया जाना और चीन द्वारा पाक में जारी आतंकी गतिविधियों के खिलाफ मुखर होना यह बताने के लिये काफी है कि विश्व बिरादरी में पाक किस कदर अकेला पड़ता जा रहा है। लेकिन लड़ाई अभी बहुत लंबी है। मौजूदा पड़ावों को ही पर्याप्त मानकर शांत बैठ जाने का मतलब होगा सांप को चोटिल करके छोड़ देना। अभी तो उसे महज कुछ ही जख्म दिये गये हैं। फन कुचलना तो अभी बाकी है। जिस जंग का उसने आगाज किया उसे अंजाम तक तो पहुंचाना ही है। इसके लिये रणनीति भी तैयार है। अब जहां एक ओर आर्थिक नुकसान पहुंचाने के लिये उसे एकतरफा तौर पर दिया गया मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा उससे वापस लिया जाना है वहीं मित्र देशों को इस बात के लिये सहमत करना है कि वे भी उसके साथ अपना आर्थिक रिश्ता पूरी तरह खत्म ना भी करें तो अधिकतम कम अवश्य कर लें। साथ ही सिंधु सरीखी नदियों के पानी से उसे महरूम करने की ठोस योजना पर भी जल्दी ही अमल आरंभ होनेवाला है। जाहिर तौर पर ऐसे तमाम विकल्पों अमल करना तब तक जारी रखा जाना चाहिये जब तक पाक प्रायोजित आतंकवाद का समूल नाश नहीं हो जाता है और गुलाम कश्मीर की सरजमीं पर निर्णायक तौर पर भारतीय तिरंगा लहराने में कामयाबी नहीं मिल जाती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शनिवार, 17 सितंबर 2016

‘रफू की ताकीद करनेवाले, कहां-कहां अब रफू करेंगे’

‘रफू की ताकीद करनेवाले, कहां-कहां अब रफू करेंगे’


सूबे में सत्तारूढ़ सपा की अंदरूनी हालत ऐसी ही दिख रही है जिसके बारे में कहा गया है कि ‘रफू की ताकीद करनेवाले कहां-कहां अब रफू करेंगे, लिबासे-हस्ती का हाल ये है, जगह-जगह से मसक रहा है।’ वाकई सपा की लगातार यत्र-तत्र-सर्वत्र मसकती दिख रही लिबासे-हस्ती को संभालने की कोशिश करनेवालों के लिये सबसे बड़ी चुनौती यही है कि आखिर रफू का काम शुरू कहां से किया जाये। हालत यह है कि एक सिरा पकड़ो तो दूसरा फिसल जाता है। एक को मनाओ तो दूसरा रूठ जाता है। वास्तव में प्रदेश ही नहीं बल्कि समूचा देश इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि सूबे में सत्तारूढ़ सपा के भीतर जो संग्राम छिड़ा हुआ है वह ना तो इतनी जल्दी समाप्त होनेवाला है और ना ही दबाने से दबनेवाला है। गनीमत है कि नेताजी की धुरी के प्रति सबकी आस्था बदस्तूर कायम है लिहाजा वे ठोक कर यह कहने का हौसला दिखा रहे हैं कि उनके रहते पार्टी में फूट नहीं हो सकती। हालांकि बेशक सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने पार्टी में जारी महासंग्रम पर काबू पाने के लिये खुद ही मोर्चा संभाल लिया है और सुलह के फार्मूले पर सहमति बनाने का प्रयास जोरों पर जारी है। लेकिन सूबे की आवाम से लेकर आला निजाम तक को यह बेहतर मालूम है कि चुनाव के मद्देनजर टकराव की लपटें सतही तौर पर फिलहाल बुझ भी जाएं मगर इसके भीतर सुलग रहा ज्वालामुखी निर्णायक तौर पर कभी ना कभी फूटेगा जरूर। और जब यह फूटेगा तो इसका लावा निश्चित तौर पर सपा की एकजुटता को अपने साथ बहा ले जाएगा। इस हकीकत से बाखबर होने के बावजूद जिस तरह से मामले की गहराई से सर्जरी करके पूरे मवाद व सड़े-गले हिस्से को काटकर निकालने के बजाए महज मरहम-पट्टी करके इस विषैले जख्म को दबाने-छिपाने की कोशिश की जा रही है वह निश्चित तौर पर आत्मघाती ही मानी जाएगी। वास्तव में देखा जाये तो सपा की ओर से पूरे विवाद की जो वजहें गिनायी जा रही हैं वह सतही तौर पर भले ही सटीक मालूम पड़ती हों लेकिन गहराई से परखने पर वह नकली ही दिखाई पड़ती है। पर्देदारी की लाख कोशिशों के बावजूद सपा का शीर्ष नेतृत्व इस हकीकत को दबा या छिपा नहीं सकता कि संगठन में जारी महासंग्राम की असली वजह ना तो अखिलेश को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाया जाना है, ना शिवपाल से महत्वपूर्ण मंत्रालय छीना जाना और ना ही गायत्री प्रजापति सरीखे मंत्रियों को सरकार से रूखसत किया जाना। यहां तक कि केबिनेट सचिव के पद पर बदलाव किये जाने या आला नौकरशाहों को ताश के पत्तों की तरह फेंटे जाने को भी इस महासंग्राम की वजह मानना बेवकूफी ही होगी। वास्तव में ये सभी घटनाक्रम महज परिणाम है जिसका कारण है संगठन पर वर्चस्व की वह लड़ाई जो सत्ता से लेकर संगठन तक पर पूर्ण एकाधिकार कायम करने के लिये छिड़ी हुई है। इस जंग की पटकथा तभी से लिखी जा रही है जब से शिवपाल ने संगठन में जमीनी स्तर तक अपनी मजबूत पैठ बनानी शुरू कर दी थी जबकि मुलायम ने पुत्रमोह में संगठन व सरकार की कमान अखिलेश को सौंपने का फैसला किया था। जाहिर तौर पर हर खासो-आम की यही ख्वाहिश होती है कि उसका उत्तराधिकारी उसका अपना बेटा ही हो। बेटे को दरकिनार कर किसी अन्य को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने की तो किसी से अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। लिहाजा यही काम मुलायम ने भी किया तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं था। उन्होंने अपने खून-पसीने से जिस सपा संगठन को खड़ा किया उसकी बागडोर वे अपने बेटे के हाथों में सौंपना चाह रहे हैं तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन सपा को सत्ता के शीर्ष पर लाकर खड़ा करने में उनके अन्य बंधु-बांधवों ने जो योगदान किया है उसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती। आज भी संगठन में जमीनी स्तर पर शिवपाल का जो प्रभाव है उसे झुठलाया नहीं जा सकता। ऐसे में अपने लिये पूरे मेहनताने की उनकी मांग को भी खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन एक तरफ जोतने के एवज में पूरा खेत हथियाने की उनकी कोशिश और दूसरी ओर जोतने-बोने की जहमत उठाए बगैर खड़ी फसल को अपने खलिहान में लाने की अखिलेश की जिद के बीच जारी टकराव वास्तव में ऐसा ही है जैसे गाय को पाले-खिलाए कोई और, उसकी मलाई खाए कोई और। यह लंबे समय तक तो चल नहीं सकता। तभी तो अब गाय को पालने-खिलानेवाले और उसकी दूध-मलाई पर कब्जा जमानेवाले के बीच बुरी तरह ठन गयी है। ऐसे में परेशान है उस गाय का मालिक जो पकी उम्र और थके शरीर के साथ ना तो गाय की पूरी सेवा व हिफाजत करने में सक्षम है और ना ही अपनी कमजोर हाजमे के कारण इसकी दूध-मलाई से कोई वास्ता रखना चाहता है। बल्कि उसकी कोशिश है कि गाय की रस्सी अपने बेटे के हाथों में थमा दे ताकि वह उसे पाले भी और दुहे भी। लेकिन मसला है कि बेटे के घास से गाय का पूरा पेट नहीं भर सकता जिसके नतीजे में दूध-मलाई का संकट उत्पन्न होना तय है। ऐसे में अब देखना दिलचस्प होगा कि पूरा परिवार मिलजुल कर गाय की सेवा करते हुए मिल बांटकर दूध-मलाई खाना पसंद करता है या फिर आपसी झगड़े में गाय का दूध सुखाकर उसके साथ खुद को भी तबाह-बर्बाद कर लेता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

दलित-मुस्लिम एका की काल्पनिक परिकल्पना

दलित-मुस्लिम समीकरण के अफसाने की हकीकत


भारत की राजनीति में दो धाराएं ऐसी हैं जो ना तो कभी सूखी हैं और ना कभी सूख सकती हैं। एक दलित सरोकार की धारा और दूसरी धर्मनिरपेक्षता की आड़ में बहनेवाली मुस्लिम तुष्टिकरण की धारा। इन दोनों धाराओं के अविरल-निर्मल प्रवाह की वजह है देश की आबादी में इनकी वह हिस्सेदारी जो सियासी नजरिये से काफी हद तक निर्णायक दिखाई पड़ती है। तभी तो इन्हें अपने साथ जोड़ने या इनके साथ पूरी शिद्दत से जुड़ने के लिये तमाम राजनीतिक पार्टियां हमेशा लालायित रहती हैं। अल्पसंख्यकवाद के नाम पर होनेवाली मुस्लिम सरोकार की सियासी धारा पर निगाह डालें तो भाजपा व शिवसेना सरीखे कुछ गिने-चुने राजनीतिक दलों को छोड़कर बाकी तमाम राजनीतिक पार्टियों के बीच हमेशा ही खुद को अल्पसंख्यकों का सबसे तगड़ा अलंबरदार साबित करने की होड़ चलती रही है। केन्द्र में भाजपा के समर्थन से चल रही वीपी सिंह की सरकार को दांव पर लगाकर लालू यादव द्वारा बिहार में लालकृष्ण आडवाणी के रामरथ का अश्वमेघ रोक कर उन्हें गिरफ्तार कराने की बात हो या मुलायम सिंह यादव द्वारा अयोध्या में निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलवाने का मामला हो। इसके पीछे सीधे तौर पर अल्पसंख्यकों का भरोसा जीतने की सोच ही थी। यहां तक कि अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति के तहत ही राजीव गांधी की सरकार ने शाह बानो के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने के लिये संसद से ‘मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार) संरक्षण अधिनियम पारित कराया जबकि मुस्लिम वोटबैंक में कांग्रेस की हिस्सेदारी पुख्ता करने के लिये प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए डाॅ मनमोहन सिंह ने औपचारिक तौर पर यह एलान कर दिया कि देश के तमाम संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का ही है। इसी प्रकार संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना करते हुए सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था करने के लिये विधानसभा से कानून पारित कराये जाने के मामले हों या गौ-हत्या पर लगी बंदिशों को कमजोर करने की वकालत किये जाने की बात हो। हर मामले में सीधे तौर पर अल्पसंख्यकों का दिल जीतने की सोच ही छिपी रहती है। आखिर संसदीय लोकतांत्रिक शासन प्रणालीवाले मुल्क हिदुस्तान में जहां मुसलमानों की कुल आबादी तकरीबन 14 फीसदी से भी अधिक हो और उसमें भी पांच राज्यों में 26.6 फीसदी से लेकर 92.2 फीसदी, सात राज्यों में 11.5 फीसदी से लेकर 19.3 फीसदी और आठ राज्यों में आठ से साढ़े दस फीसदी के बीच मुसलमानों की आबादी हो वहां अल्पसंख्यकवाद की राजनीति का बोलबाला दिखना स्वाभाविक ही है। दूसरी ओर दलित सरोकार की सियासी धारा के अनवरत प्रवाह की वजह भी आबादी में राष्ट्रीय स्तर पर इनकी 16 फीसदी की हिस्सेदारी ही है। साथ ही संसद और विधानसभाओं में इन्हें 15 फीसदी आरक्षण भी हासिल है। ऐसे में दलित सरोकार की सियासी धारा में डूबने-उतराने और सराबोर होने का सुख भला कौन नहीं उठाना चाहेगा। आंकड़ों की नजर से सैद्धांतिक तौर पर देखा जाये तो इन दोनों धाराओं का संगम सियासत के सर्वोच्च शिखर को भी अपने में समाहित कर लेने में पूरी तरह सक्षम है। तभी तो बहुसंख्यकवाद की राजनीतिक राह पर चलते हुए महज 32 फीसदी वोटों के दम पर केन्द्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब रहनेवाली भाजपा को पटखनी देने के लिये जितने भी समीकरण टटोले जा रहे हैं उनमें दलित-मुस्लिम धारा का संगम ही सबसे गहरा व विस्तृत दिखाई पड़ रहा है। बाकी, गैर-भाजपावाद के बिहार में सफलतापूर्वक आजमाए जा चुके बेहद मजबूत सैद्धांतिक समीकरण को अन्य सूबों में व्यावहारिक जमीन ही मयस्सर नहीं हो पा रही है जबकि कांग्रेस व वामपंथियों का जो खूंटा कभी सियासी ध्रुवीकरण का केन्द्र हुआ करता था वह मौजूदा हालातों में मजबूत कहारों के कांधे का सहारा लिये बिना खड़े हो पाने की स्थिति में भी नहीं दिख रहा है। ऐसे में ले-देकर समीकरण बचता है दलित व अल्पसंख्यक धारा के सम्मिलन का, जिसमें कागजी व सैद्धांतिक तौर पर तो सत्ता के शिखर से भाजपा को बहा ले जाने की क्षमता स्पष्ट दिख रही है। तभी तो कुछ दिनों से गौ-हत्या व दलित उत्पीड़न के मामलों का परस्पर घालमेल करके ऐसा वातावरण बनाने की चैतरफा कोशिशें जोरों पर जारी हैं जिससे भावनात्मक तौर पर दलितों व अल्पसंख्यकों को करीब लाया जा सके और इन्हें केन्द्र की भाजपानीत राजग सरकार के खिलाफ एकजुट किया जा सके। इसके लिये कभी गुजरात में दलित-मुस्लिम रैली का आयोजन हो रहा है तो कभी जेएनयू में इस सिद्धांत पर व्याख्यान कराया जा रहा है। तस्वीर ऐसी उकेरी जा रही है मानो दलितों व मुस्लिमों के बीच कोई अलगाव-टकराव हो ही ना बल्कि बहुसंख्यकों व खास तौर से सवर्णों के खिलाफ इनका सबकुछ साझा ही हो। लेकिन सियासी समीकरण साधने के लिये इन दोनों धाराओं का संगम कराने का प्रयास कर रही ताकतों ने अव्वल तो 16 फीसदी आबादीवाले अनुसूचित जातियों के उस समूह को एकजुट दलित समझ लिया है जिनके बीच व्यावहारिक धरातर पर कई स्तरों पर परस्पर कट्टर छूआछूत का माहौल आज भी स्पष्ट देखा जा सकता है और दूसरे सामाजिक स्तर पर होनेवाले सांप्रदायिक टकराव के उन वास्तविक किरदारों की भी अनदेखी की जा रही है जिनके बीच कागजी तौर पर ही मजबूत एकजुटता की कल्पना संभव है वर्ना हकीकत में तो आपसी खून-खराबे का इनका लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में सवर्णों से बिदका हुआ वर्ग भले ही कागजी तौर पर अल्पसंख्यकों के साथ जुड़ने के लिये तैयार दिख रहा हो लेकिन इनके बीच सांप्रदायिक स्तर पर जुड़ाव का कोई साझा आधार तैयार हो पाने की तो उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। यानि अव्वल तो तमाम अनुसूचित जातियों का दलित मंच पर एकजुट हो पाना ही नामुमकिन की हद तक मुश्किल है और दूसरे तमाम दलितों को हर गली-कूचे व कस्बे-मोहल्ले में उन मुस्लिमों के साथ एकजुट करना भी नामुमकिन सरीखा ही है जिनके बीच तमाम सांप्रदायिक दंगों व हिंसक टकरावों में स्थानीय स्तर पर परस्पर घर-द्वार जलाने-उजाड़ने, माल-असबाब से लेकर आबरू-इज्जत लूटने-छीनने और एक-दूसरे के सखा-संतानों को मारने-काटने व अपंग-अपाहिज बनाने का इतिहास सदियों से लिखा जा रहा है। यहां तक कि तमाम कोशिशों व जद्दोजहद के बाद अगर इन दोनों धाराओं को समेट-बटोरकर न्यूनतम साझा सरोकारों के आधार पर इनका संगम करा भी दिया जाता है तो विरोधी पक्ष की ओर से फेंकी गयी संप्रदायवाद की जलती हुई तीली की मामूली सी चिंगारी भी इन्हें ऐन मौके पर परस्पर इतनी दूर लाकर खड़ा कर सकती है जिसके बारे में कल्पना करने से भी सिहरन पैदा हो जाती है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर दलित-मुस्लिम धारा का संगम कराने के सियासी प्रयासों पर तो यही कहा जा सकता है कि ‘हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन, दिल बहलाने के लिये गालिब ये खयाल अच्छा है।’ @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur