सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

‘बेकरारी तुझे ऐ अखिलेश कभी ऐसी तो न थी’

’ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार?‘


मुगलिया सल्तनत के आखिरी सुल्तान कहे जानेवाले बहादुर शाह जफर के अंदाज में आज वाकई उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हर कोई यह जानना चाह रहा है कि ‘ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार, बेकरारी तुझे ऐ अखिलेश कभी ऐसी तो न थी।’ वास्तव में देखा जाये तो इन दिनों अखिलेश बड़े बेकरार और बेसब्र दिख रहे हैं। यह बेकरारी उनकी बातों से भी झलक रही है और उनकी हरकतों से भी। जिस सौम्य, सरल व सहज अंदाज के कारण वे भीड़ में अलग दिखते रहे हैं वह कहीं दब-छिप सा गया है। उसकी जगह ले ली है खीझ, परेशानी और बेकरारी ने। कहां तो वे सब्र का समुंदर मालूम पड़ते थे जबकि आज उनके सब्र का बांध बुरी तरह जर्जर और कमजोर होकर टूटता दिख रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो बचपन में अपना नामकरण खुद करने की दलील देकर एकला चलो की राह अपनाने घुड़की देने की कोशिश वे कतई नहीं करते। इस तरह की बातें करके वे अपनी बेसब्री का ही मुजाहिरा कर रहे हैं। कहीं ना कहीं उनके सब्र व संयम का बांध टूटता दिख रहा है। वे उसी जाल में उलझते हुए दिखाई दे रहे हैं जिसमें उनके विरोधी उन्हें लपेटना चाहते हैं। उनके विरोधियों की तो कोशिश ही यही है कि वे अपना आपा खोकर ऊल-जुलूल बकना शुरू कर दें। ताकि मुलायम सिंह का उन पर जो भरोसा है वह मिट्टी में मिल जाये और उन्हें अपने लिये किसी नये उत्तराधिकारी की तलाश करना आवश्यक महसूस होने लगे। ऐसे में कसौटी पर है अखिलेश का संयम। वास्तव में देखा जाये तो अभी वक्त का तकाजा यही है कि उन्हें अपनी कथनी और करनी में भरपूर संयम का प्रदर्शन करना चाहिये। उनके बात या व्यवहार से कहीं से भी यह नहीं झलकना चाहिये कि वे संगठन, सरकार या परिवार के किसी सदस्य से रत्ती भर भी नाराज हैं। उनकी बातों से मुलायम के प्रति अटूट विश्वास झलकना चाहिये और मुलायम की हर बात को उन्हें आदेश के तौर पर स्वीकार व अंगीकार करना चाहिये। ठीक ऐसे ही जैसे उनके चाचा शिवपाल यादव लगातार करते हुए दिखते आ रहे हैं। आखिर शिवपाल ने सपा में अपनी हैसियत मजबूत करने के लिये मुलायम के विश्वास का ही तो सहारा लिया है। वर्ना उनकी क्या हैसियत थी कि वे मुलायम द्वारा घोषित उत्तराधिकारी की अपने दम पर जड़ खोदने की सोच भी सकें। लेकिन आज वे ऐसा सिर्फ सोच ही नहीं रहे बल्कि उसे कार्यरूप देते हुए भी दिखाई पड़ रहे हैं तो इसकी इकलौती वजह है अखिलेश और मुलायम के बीच आयी वैचारिक व सैद्धांतिक दूरी। हालांकि इस बात पर अलग से बहस हो सकती है कि यह दूरी अखिलेश की कथनी व करनी के कारण आयी है या फिर इसकी पटकथा किसी और ने लिखी है। कहा तो यह भी जाता है कि इस सबके पीछे सपा के संचालक परिवार की सबसे मजबूत मानी जानेवाली महिला सदस्य ने ही निर्णायक भूमिका निभायी है और उन्होंने मुलायम को अपने शीशे में उतार कर अखिलेश से उन्हें दूर कर दिया है। साथ ही इस दूरी को हवा देकर अपना सियासी समीकरण साधने के दोषी शिवपाल सरीखे अंदरूनी भी बताये जाते हैं और अमर सिंह सरीखे बाहरी भी। लेकिन इन कही-सुनी बातों से इस हकीकत को हर्गिज झुठलाया नहीं जा सकता है कि आखिरकार कहीं ना कहीं अखिलेश भी इस दूरी, संबंधों में पनपी कटुता व आपसी अविश्वास के लिये कम दोषी नहीं हैं। पिछले चुनाव में सपा को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद मुलायम ने तो अखिलेश को अपना उत्तराधिकारी बनाकर मुख्यमंत्री पद की कुर्सी सौंप ही दी थी। लिहाजा बाद में बाप-बेटे के बीच जो दूरी बनी उसके लिये मुलायम को जिम्मेवार ठहराना कतई उचित नहीं होगा। साथ ही अगर मुलायम इसके लिये जिम्मेवार नहीं हैं तो जाहिर तौर पर उनके करीबियों व अन्य विश्वासपात्रों पर भी इसका दोष नहीं मढ़ा जा सकता है। ऐसे में सीधे तौर पर मौजूदा हालातों के लिये दोषी अखिलेश ही दिखाई पड़ते हैं जिन्होंने कई फैसले मनमाने तरीके से किये जो मुलायम को नागवार गुजरे। अगर उन्होंने मुलायम को विश्वास में लेकर फैसले किये होते तो ना तो उन्हें दोबारा गायत्री प्रजापति को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिये मजबूर होना पड़ता और ना ही प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से हाथ धोना पड़ता। आज नौबत यहां तक आ पहुंची है कि मुलायम उन्हें सपा का चुनावी चेहरा बनाने के लिये भी तैयार नहीं हैं। उन्होंने खुलकर बता दिया है कि आगामी चुनाव में किसी को भी चुनावी चेहरा नहीं बनाया जाएगा और चुनाव के बाद विधायक दल की बैठक में आम सहमति के आधार पर ही नये मुख्यमंत्री का चयन किया जाएगा। यानि बात बिल्कुल साफ है कि कहीं ना कहीं अखिलेश के प्रति मुलायम का भरोसा कमजोर अवश्य पड़ा है। बेशक इसकी डोर आज भी टूटी नहीं है जिसके कारण परिवार में पनपी असहजता को वे सार्वजनिक तौर पर खारिज करते हुए ही दिख रहे हैं लेकिन अगर अखिलेश ने हालात की गंभीरता को समझते हुए स्थिति को संभालने की पहल नहीं की तो सियासी डगर पर उनकी राहें लगातार दुश्वार होती जाएंगी। लिहाजा अपेक्षित है कि वे सब्र व संयम का परिचय देते हुए मुलायम को विश्वास में लेकर ही आगे बढ़ें। अगर मुलायम के बताये मार्ग का आंखें मूंद कर अनुसरण किया जाये तो भविष्य सुरक्षित भी रहेगा और सुनिश्चित भी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

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