‘जबरा मारे भी और रोने भी ना दे’
मोदी सरकार ने कालेधन की समानांतर अर्थव्यवस्था के खिलाफ जो सर्जिकल स्ट्राइक की है उसकी आंधी में जिनकी बिछी-बिछाई बिसात तिनके की तरह उड़ रही हो उन्हें इसका दुख-दर्द होना तो स्वाभाविक ही है। लेकिन दिल में दर्द और नजरों में नमी के बावजूद वे ना तो अपना दर्द बयान कर पा रहे हैं और ना ही इसका कोई इलाज तलाश पा रहे हैं। उस पर कोढ़ में खाज की बात यह है कि उन्हें इस सर्जिकल स्ट्राइक की तारीफ भी करनी पड़ रही है। इसे देशहित में उठाया गया बेहतरीन कदम भी बताना पड़ रहा है। ऐसे वक्त में रहीम की यह सीख ही उनके काम आ रही है कि ‘रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय, सुनि अठिलइहें लोग सब, बांटि न लइहें कोय।’ लेकिन मसला है कि अगर जख्म को मवाद की शक्ल में पिघलकर बह निकलने की राह ना मिले तो वह जानलेवा कैंसर में तब्दील हो जाता है। मगर इस मामले में यह सरकार इतनी संवेदनहीन है कि मारने के बाद रोने की इजाजत भी नहीं देती। खास तौर से इस सरकार का मुखिया इतना क्रूर और बेरहम है कि इसने मारने के बाद छटपटाने का भी मौका नहीं दिया। मार खाने का भी उत्सव मनाने के लिये मजबूर कर दिया है। मंगलगान गाना पड़ रहा है। जैसे सरहद पार करके देश में आतंक मचाने के मकसद से घुसपैठ करने की फिराक में बैठे आतंकियों को आधी रात के बाद हलाक करने की रणनीति अपनाई गयी थी उसी तर्ज पर कालेधन के दम पर देश में समानांतर अर्थव्यवस्था संचालित करनेवालों के खिलाफ तब सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया गया जब सारे बैंक बंद हो चुके थे। ना माल-मत्ता संभालने का मौका मिल सका ना खुद को संभालने का। अचानक ही घोषणा कर दी गयी पांच सौ और हजार के नोटों को चलन से बाहर करने की। जिस समानांतर व्यवस्था को खड़ा करने में पिछले कई दशकों में कई परिवारों की पीढ़ियां खप गयीं, जोंक की तरह समाज से माल-असबाब चूसकर पूरा साम्राज्य खड़ा किया गया, विश्व ग्राम व्यवस्था के चप्पे-चप्पे तक जिसकी पैठ बनायी गयी और भारत सरकार के सालाना बजट से भी अधिक का अर्थतंत्र कायम किया गया उसे एक झटके में ध्वस्त करने से पहले एक बार बताना भी जरूरी नहीं समझा गया तो इसे संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ना कहें तो और क्या कहें। एक बार के लिये संभलने का तो मौका दिया होता। कुछ नहीं तो कम से कम काले कारनामों पर सफेदी पोतने की गुंजाइश ही छोड़ दी जाती। लेकिन हालत यह कर दी गयी है कि अब पुराने नोट को बदलने के लिये बैंक लेकर जाने का मतलब है ‘आ बैल मुझे मार’ का न्यौता देना। आखिर बताया भी कैसे जाये कि कितने प्रत्याशियों से ढ़ाई-तीन सौ करोड़ की रकम लेकर उन्हें विधानसभा का टिकट दिया गया है। किन-किन घोटालों से कितने लाख जमा किये गये हैं। कितनों को चूना लगाया गया है। ये सब बातें बतायें भी तो कैसे। और अगर ना बतायें तो पूरी रकम में अपने ही हाथों आग लगाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा है। पुराने नोटों का बंडल कूड़ा होते हुए देखकर कितना दुख हो रहा होगा उसको, जिसने लाखों की रकम सुविधा शुल्क के तौर पर प्रदान करने के एवज में सरकारी नौकरी या टेंडर हासिल किया था और अब उस लागत की सूद के साथ वसूली के लिये खून-पसीना एक कर रहा था। उसके दुख की तो सीमा ही नहीं है जिसने जमीन-आसमान ही नहीं बल्कि ईमान-भगवान को भी बेचकर अपनी भावी पीढ़ियों का कल्याण करने की राह अपनाई थी लेकिन अब उसकी सारी मेहनत एक झटके में ही मिट्टी में मिल गयी है। आखिर कुछ तो रहम कर लिया होता इन बेगैरत-बेइमानों पर। लेकिन नहीं, एक ही रट लगायी हुई है कि ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा। इस क्रूर कदम ने उन विरोधियों का तो बेड़ा ही गर्क कर दिया गया है जो कम से कम कालेधन के सवाल पर चीख-पुकार मचाके अपना गला साफ कर लिया करते थे। अब वे बोलें भी तो क्या बोलें। भ्रष्टाचार के जिस जाल में पूर्ववर्ती फंस गये थे उसमें इन्हें फांसना फिलहाल नामुमकिन की हद तक मुश्किल है। गलती कोई ऐसी कर नहीं रहे जिसकी हाय-तौबा मचायी जाये। यानि अब तक वोट लेने का मौका नहीं दे रहे थे और अब बटोरे हुए नोट भी लूट लिये। ऐसे में विरोधी अगर इस निजाम को तानाशाह बता रहे हैं तो इसमें गलत ही क्या है? किसी पर कोई रहम नहीं किया गया। मीडिया को भी भनक नहीं लगने दी। कहने को तो पूरा फैसला केबिनेट से लेकर भाजपा अध्यक्ष और रिजर्व बैंक के गवर्नर को भी विश्वास में लेकर किया गया है लेकिन हवा कहीं से भी नहीं निकल सकी। वर्ना कुछ तो बचाव का इंतजाम कर लिया जाता। हालांकि पहले का दौर होता तो रातोंरात थोक में सोना खरीदकर सोने चले जाते। लेकिन अब वहां भी एक्साईज ड्यूटी लगा दी गयी है। लिहाजा सोना भी उतना ही खरीदा जा सकता है जितनी रकम दुकानदार हजम कर सके। शायद बुजुर्गों ने ठीक ही बताया है कि धन का तीन ही अंजाम होता है, भोग, दान और नाश। जितने दिन भोग लिखा था, भोग लिया। अब या तो दिल बड़ा-कड़ा करके जीरो बैलेंसवाली जनधन योजना के खाताधारकों को थोड़ी-थोड़ी रकम दान कर दी जाये वर्ना इसका नाश तो तय ही है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
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