सोमवार, 12 जून 2017

‘हजारों बंदिशें ऐसी कि हर बंदिश पे दम निकले’

‘हजारों बंदिशें ऐसी कि हर बंदिश पे दम निकले’

स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र नागरिक होने का सैद्धांतिक मतलब तो यही है कि हम कहीं भी, कभी भी, कुछ भी कहने या करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं बशर्ते इससे किसी दूसरे की स्वतंत्रता का हनन ना होता हो। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो आजादी उस जिम्मेवारी का ही दूसरा नाम है जिसके तहत दूसरों की खुशियों, इच्छाओं व अपेक्षाओं का जितना अधिक ध्यान रखा जाएगा उसी अनुपात में हमें भी इसका आनंद मिलता रहेगा। लेकिन मसला है कि इन दिनों हर किसी को एक दूसरे से कुछ ज्यादा ही परेशानी होने लगी है। हर बात पर परेशानी और कई दफा तो बिना बात के ही परेशानी। मसलन कौन क्या खा रहा है, इससे परेशानी। कौन कैसे रह रहा है, इससे परेशानी। कौन क्या बोल रहा है, इससे परेशानी। कौन क्या पहन रहा है, इससे परेशानी। कौन किस विचार या सिद्धांत को मान रहा है, इससे परेशानी। कौन कब, कैसे व किसकी पूजा-इबादत कर रहा है, इससे परेशानी। यहां तक कि कौन परेशान है, इससे परेशानी और कौन परेशान नहीं है, इससे भी परेशानी। यानि इन दिनों परेशानियों का कोई ओर-छोर ही नहीं दिख रहा है। इन तमाम परेशानियों ने समूचे देश को बुरी तरह परेशान कर रखा है। कोई किसी को किसी भी बात की रत्ती भर भी आजादी देने के पक्ष में नहीं दिख रहा है। चाहे आवाम हो या निजाम, सबकी ख्वाहिश ही नहीं बल्कि कोशिश भी यही है कि उसके मन-मुताबिक ही समूचा संसार संचालित हो। नतीजन तमाम तरह की बंदिशें इस हद तक थोपी जा रही हैं कि आज अगर चचा गालिब जिंदा होते तो निश्चित तौर पर ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले’ के बजाय यही कह रहे होते कि ‘हजारों बंदिशें ऐसी कि हर बंदिश पे दम निकले।’ आखिर कहते भी क्यों नहीं? जब बंदिश आयद करने की हद यहां तक पहुंच जाए कि गाय के दूध से रोजा इफ्तार करने की ताकीद करते हुए मांस खानेवाले की बोटी नोंच लेने की धमकी दी जाने लगे, अजान की आवाज से नींद में खलल पड़ने की दुहाई दी जाने लगे, तीसरे मुल्क में हो रहे भारत-पाक मैच को टीवी पर देखने से रोकने की कोशिश होने लगे और आजम खां सरीखे वरिष्ठ नेता महिलाओं को घर में कैद होकर रहने की सलाह देने लगें तो इन बंदिशों से छटपटाहट होना स्वाभाविक ही है। आलम यह है कि समूचे विश्व में बुर्के पर पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया चल रही है जबकि हमारे देश में अगर जायरा वसीम ‘दंगल’ सरीखी प्रेरणादायक फिल्म में एक मासूम बच्ची की भूमिका निभाती है तो उसे जान से मारने की धमकी मिलने लगती है। यहां तक कि अगर फातिमा शेख, दीपिका पादुकोण या प्रियंका चोपड़ा सरीखी महिलाएं अपने मनमुताबिक परिधान धारण करती हैं तो सोशल मीडिया पर तूफान आ जाता है। महाराष्ट्र में एक युवा अपनी प्रेयसी के कहने पर बीच सड़क पर घुटनों के बल बैठकर प्यार का इजहार करता है तो उसका इस हद तक विरोध होता है कि उसे अपना शहर छोड़कर भागने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ऐसे में सवाल है कि इन बंदिशों के बीच आजादी के मायने की तलाश कैसे की जाए। कैसे कहें कि हम आजाद मुल्क के आजाद बाशिंदे हैं जबकि अपनी मर्जी से किसी पार्टी को वोट देने के नतीजे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोगों को घर में घुसकर मारा-पीटा जाता हो। अपनी मर्जी से कोई बालिग जोड़ा अगर किसी बंद कमरे में एक-दूसरे के साथ कुछ वक्त बिताना चाहे तो उसे इसकी आजादी नहीं मिल पाती। जहां नाबालिगों की शादी कर देना आम बात हो लेकिन उसी समाज में बालिगों को अपनी मर्जी से शादी करने या साथ रहने की इजाजत हासिल ना हो। वहां आजादी का क्या मतलब है इस पर विचार तो करना ही पड़ेगा। विचार तो इस बात पर भी करना पड़ेगा कि कोई कैसे किसी को इस बात के लिए रोक-टोक सकता है कि वह क्या खाए और क्या पिए? कहीं शराब पर प्रतिबंध लगाकर महिला वोटरों को रिझाने की कोशिश हो रही है तो कहीं मांसाहारी खाने को प्रतिबंधित करने का प्रयास करके बहुसंख्यक मतदाताओं की सहानुभूति बटोरी जा रही है। कहीं दुर्गापूजा के बाद प्रतिमा का विसर्जन करने के लिए अदालत से आदेश पारित कराना पड़ रहा है तो कहीं मस्जिद से लाउडस्पीकर उतारने की मांग जोर पकड़ रही है। कोई संस्कृत को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने पर अड़ा है तो किसी को प्रादेशिक भाषा पर हिन्दी का बढ़ता प्रभाव बर्दाश्त नहीं हो रहा है। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि गंगा जमुनी सामन्जस्य के प्रति समाज का सरोकार लगातार समाप्त होता जा रहा है और एक ऐसी व्यवस्था को पनपाने का प्रयास हो रहा है जिसमें ताकतवर को यह हक हासिल हो कि वह कमजोर को अपने मनमुताबिक तरीके से जीवन-यापन करने के लिए मजबूर कर सके। बंदिशों की समस्या तब और विकराल हो जाती है जब खास सिद्धांत या विचार को माननेवालों की सत्ता भी अपनी ओर से बंदिशों में इजाफा करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। लेकिन भारत का स्वरूप और स्वभाव कभी ऐसा नहीं रहा है कि यहां के तमाम नागरिक किसी एक मत, पंथ, मजहब, सिद्धांत या विचार को स्वीकार कर लें लिहाजा विविधता में एकता की व्यवस्था को जितना दबाने की कोशिश होगी वह उतनी ही प्रखरता और मुखरता से उजागर होकर अवश्य सामने आएगी। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर #navkantthakur   

मंगलवार, 30 मई 2017

‘जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध’

‘जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध’

‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।’ यह रचना है राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की। जो बेशक बीते दशकों के कालखंड में तत्कालीन राजनीतिक व सामाजिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में लिखी गई थी। लेकिन इसकी प्रासंगिकता जितनी मौजूदा समय में दिख दे रही है उतनी शायद उस वक्त भी ना रही हो, जब यह कविता कागज पर अवतरित हुई थी। आज वाकई अपराध का भागी सिर्फ व्याघ्र नहीं दिख रहा। दरअसल व्याघ्र की तो प्रकृति प्रदत्त प्रवृत्ति ही है शिकार करके अपना भरण-पोषण करने की। लिहाजा बाघ-शेर तो शिकार करेंगे ही और राजनीति दल सियासत करेंगे ही। इसके लिए उन्हें यह कहना कि फलां मसले पर सियासत मत करो काफी हद तक ऐसा ही है जैसे बाघ-शेर को यह समझाया जाए कि वह अमुक जीव का शिकार ना करे। वास्तव में देखा जाए तो यह संभव ही नहीं है कि जन-जुड़ाव के मसले पर राजनीति ना हो। बल्कि जो मसला आम लोगों से जितना अधिक जुड़ा होगा उस पर राजनीति भी उतनी ही अधिक होगी। अलग-अलग पक्ष होंगे, सबके अलग विचार होंगे और सबका अलग नजरिया होगा। जिसे जिस नजर से देखना मुनाफे का सौदा महसूस होगा वह मसले को उसी नजर से देखेगा। लिहाजा किसी भी मामले को तूल देने की कोशिश करनेवाली पार्टी को इसके लिए कोसना तो बेकार ही है। वास्तव में कोसे जाने के हकदार और असली अपराधी तो वे हैं जो भले ही वोटों की राजनीति ना करते हों लेकिन सही को सही और गलत को गलत कहने की पहल तब करते हैं जब उन्हें अपना उल्लू सीधा होता हुआ नजर आए। वर्ना शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर धंसा कर वातावरण से अलग-विलग रहना ही बेहतर समझते हैं। ऐसे लोगों ने ही समाज को आज इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया जहां किसी भी मसले की वही तस्वीर दिखाई पड़ती है जो राजनीतिक पार्टियां दिखाना चाहती हैं। राजनीति से अलग हटकर कहीं कोई बात ना तो सुनाई पड़ रही है और ना ही दिखाई दे रही है। जबकि यह सबको भली-भांति मालूम है कि फूट डालकर राज करने की जुगत तलाशने का नाम ही राजनीति है। लिहाजा मामला कश्मीर में हो रही पत्थरबाजी का हो या रामपुर में दलित बेटी के साथ अल्पसंख्यक समुदाय के आवारा लड़कों द्वारा की गई सरे-राह बदसलूकी का। मामला कन्नूर में बीच सड़क पर गाय काटकर पैशाचिक तरीके से बीफ पार्टी आयोजित करने का हो या भारत की पीठ में कटार घोंपने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान की आवाम के साथ गलबहियां करने की मांग का। या फिर तीन तलाक का मसला ही क्यों ना हो। हर मामले में समाज का एक वर्ग कांग्रेस की अगुवाई वाले गैर-भाजपाई विपक्ष व इन्हें अपना खेवनहार समझनेवाले कथित अल्पसंख्यकवादी धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों के विचारों से प्रभावित है तो दूसरा वर्ग भाजपानीत राजग व इसके कथित राष्ट्रवादी समर्थक संगठनों के विचारों से। लिहाजा टकराव तो होना ही है। लेकिन इस टकराव को टालने और समाज को सही दिशा में आगे ले जाने की जिम्मेवारी समाज के जिस गैर-सियासी तबके पर है वह पूरी तरह खामोश है और खुद को तटस्थ दिखा रहा है। लेकिन अगर यह खामोशी और तटस्थता कश्मीर के पत्थरबाजों पर पैलेट गन का इस्तेमाल किए जाने या पत्थरबाजों की भीड़ के मुखिया को मानव ढ़ाल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने के मामले में भी कायम रहती तो इसे जायज माना जा सकता था। यही तटस्थता अगर बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा द्वारा गऊ रक्षा का मसला उठाए जाने पर भी कायम रहती तो कन्नूर की वारदात के बाद छाई मुर्दानी चुप्पी को वाजिब कहा जा सकता था। लेकिन यह कैसी तटस्थता है जो बंगाल में रामनवमी का जुलूस निकालने से रोकने, सरस्वती पूजा के आयोजन की इजाजत नहीं मिलने या दुर्गा पूजा के बाद प्रतिमा का विसर्जन करने से तीन दिनों तक रोके जाने के मामले में तो दिखाई पड़ती है लेकिन अगर सोनू निगम सरीखा कोई गायक अजान की आवाज से नींद में खलल पड़ने की बात कह देता है तो इस तटस्थता के सब्र का बांध टूट जाता है? यही वही तटस्थता है जिसे ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे- इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह’ के नारे में अभिव्यक्ति की आजादी दिखाई पड़ती है लेकिन श्मशान की तुलना कब्रिस्तान से किया जाना सांप्रदायिक महसूस होता है। जल्लीकट्टू का मामला इसे निरीह पशु पर अत्याचार का दिखाई पड़ता है लेकिन चैराहे पर गाय काटकर बीफ पार्टी आयोजित किए जाने के मामले पर इसे सांप सूंघ जाता है। यही वह तटस्थता है जो सावरकर को तो महान मानना स्वीकार नहीं करता है लेकिन अफजल गुरू का बचाव करने में अपनी शान समझता है। आज इस तटस्थता से रामपुर की बहन भी इंसाफ की गुहार लगा रही है और यूपी के मुख्यमंत्री भी इसे ललकार रहे हैं। लेकिन मुर्दानी खामोशी टूटने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही। कहीं से यह आवाज नहीं आ रही कि वाकई उन पाकिस्तानियों का पूरी तरह बहिष्कार किया जाए जो हमारे सैनिकों का सिर काटे जाने पर उफ तक नहीं करते। कोई गैर सियासी आवाज ना तो पत्थरबाजों के खिलाफ आ रही और ना तीन तलाक की पीड़िताओं के पक्ष में। ऐसे में कल को जब यह गैर-सियासी आवाज किसी अन्य मसले पर बुलंद होगी तो क्यों ना माना जाए कि वह तटस्थ नहीं है बल्कि अपने हितों का समीकरण साधने के लिए उठाई जा रही है। लिहाजा संभ्रांत बौद्धिकता का दिखावा करने वाला जो वर्ग अपनी सहूलियत के लिए समाज को संघर्ष व टकराव के दोराहे पर छोड़कर दूर से मजे ले रहा है उसे इस बात पर भी विचार कर लेना चाहिए कि वर्तमान भले ही उसकी किसी भूमिका की गवाही ना दे लेकिन इतिहास उसे निश्चित ही दोषी ठहराएगा और कतई माफ नहीं करेगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

बुधवार, 10 मई 2017

‘भाग्यं फलति सर्वदा, न विद्या न च पौरूषम्’

‘देने वाला जब भी देता, देता छप्पर फाड़ के...’

वाकई किस्मत से बढ़के कुछ भी नहीं है। तभी तो कहा गया है कि ‘भाग्यं फलति सर्वदा, न विद्या न च पौरूषम्।’ किस्मत मेहरबान हो तो परिस्थितियां किस कदर अनुकूल होती चली जाती हैं इसे भाजपा को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। भाजपा पर किस्मत किस कदर मेहरबान है यह शायद ही किसी को अलग से समझाने या बताने की जरूरत पड़े। वर्ष 2014 के बाद से सामने आए तमाम चुनावी नतीजे इसकी मुनादी खुद ही कर रहे हैं। लेकिन मजाल है कि भाजपा के नेतागण इसका जरा सा भी श्रेय किस्मत को दे दें। वे तो मतदाताओं के समर्थन, अपनी सरकारों के प्रदर्शन और कार्यकर्ताओं के समर्पण को ही इसका पूरा श्रेय देते हैं। लेकिन यह किस्मत ही तो है कि जहां भी भाजपा हाथ डालती है वहां बंजर में बगीचा गुलजार हो जाता है। सूखे में भी कमल खिल जाता है। यह किस्मत का करिश्मा ही तो है कि इन दिनों भाजपा के भक्त दिन दूनी और रात चैगुनी तरक्की कर रहे हैं जबकि विरोधियों का बुरी तरह बंटाधार हो रहा है। हालांकि इस पर अलग से बहस हो सकती है कि विरोधी खेमेे में मची उठापटक, भगदड़ और हड़कंप में भाजपा के स्लीपर सेल की क्या भूमिका रही है लेकिन इस बात से तो कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन दिनों भाजपा की किस्मत इतनी बुलंद चल रही है कि जो भी उसकी ओर बुरी नजर डालने की जुर्रत करता है उसके बुरे दिन शुरू हो जाते हैं। चाहे उत्तर प्रदेश की सपा-बसपा हो या बिहार का धर्मनिरपेक्ष गठबंधन, पूर्वी भारत की भद्रजनों की पार्टी हो या दिल्ली की आम आदमी पार्टी, या फिर दक्षिण के द्रविड़ दल ही क्यों ना हों। भाजपा के तमाम विरोधियों की हालत तकरीबन एक जैसी ही है। वे अपनी अंदरूनी समस्याओं को सुलझाने में ही इस कदर व्यस्त हैं कि उन्हें भाजपा के अश्वमेघ के घोड़े की मनमानी व मनचाही सरपट दौड़-भाग को रोकने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाने की फुर्सत ही नहीं मिल रही है। कहां तो पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से ही इस बात पर मगजमारी शुरू हो गयी थी कि महज 32 फीसदी वोटों की बदौलत लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल करके अपने दम पर सरकार बनाने में कामयाब रहनेवाली भाजपा के विरोध में पड़े 68 फीसदी वोटों को कोई एकजुट मंच मुहैया करा दिया जाए तो उसे चुनाव मैदान में आसानी से चारों खाने चित किया जा सकता है। लेकिन यह कागजी समीकरण आज तक कागजों पर ही सिमटा हुआ है और बिहार विधानसभा चुनाव में हुए महागठबंधन के प्रयोग को मिली सफलता को अपवाद के तौर पर अलग कर दिया जाए तो कहीं भी दोबारा वैसी एकजुटता कायम करने में गैर-भाजपाईयों को अब तक कामयाबी नहीं मिल पाई है। यहां तक कि बंगाल के चुनाव में कांग्रेस-वाम गठजोड़ में शामिल होना तृणमूल को रास नहीं आया तो यूपी के चुनाव में सपा-कांग्रेस के साथ तालमेल बिठाने से बहनजी ने ही इनकार कर दिया। अब बहनजी भी माथा पीट रही हैं और तृणमूल सुप्रीमो ममता दीदी भी वाम-कांग्रेस के साथ सियासी कदमताल करने के प्रति उत्सुक दिख रही हैं। लेकिन यह भाजपा की किस्मत ही है कि उसके तमाम विरोधी अंदरूनी मारकाट से इस कदर लहुलुहान हो रहे हैं कि उन्हें निजी समस्याओं को परे हटाकर सामूहिक मसलों का समाधान करने की दिशा में कदम बढ़ाने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है। यूपी में एक तरफ यादव परिवार अपने ही अंतर्कलह में उलझकर यह तय नहीं कर पा रहा है कि आगामी चुनावों में किस पर भरोसा किया जाए या किससे सावधान रहा जाए, तो दूसरी तरफ बहनजी के लिए न सिर्फ अपनी सियासी विरासत को बचाए रखने की चुनौती है बल्कि विरासत के वारिस को बचाने की समस्या ने भी उन्हें बुरी तरह उलझाया हुआ है। दूसरी ओर बिहार में लालू व उनके लाल ने ऐसा कमाल किया हुआ है कि जदयू को अपनी पूरी ताकत राजद का रसूख और अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखने में ही झोंकनी पड़ रही है। ओडिशा में नवीन पटनायक के लिए अपने संगठन को संभाले रखना ही मुश्किल हो रहा है जबकि तमिलनाडु में अम्मा के गुजर जाने के बाद अब करूणानिधि की सांसों की डोर पर ही द्रविड़ राजनीति की बागडोर टिकी हुई है। पूर्वी भारत में अपने वजूद को बचाए रखने की चुनौती का सामना कर रहे वाममोर्चे की हालत बुजुर्गों की चैपाल सरीखी हो गयी है जहां नई पीढ़ी झांकने की भी जहमत नहीं उठाना चाहती। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता था कि दिल्ली की तकरीबन डेढ़ करोड़ की आबादी में से वाम दलों के हिस्से में महज कुल 53 वोट ही आएं। इस सबसे अलग आम आदमी पार्टी के तौर पर वैकल्पिक राजनीति की जो उम्मीद जगी थी उसका झाड़ू तिनका-तिनका बिखर रहा है और अपने ही चिराग उसका घर जलाने पर आमादा दिख रहे हैं। यानि किस्मत की मेहरबानी से भाजपा की दसों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाही में है। हालांकि इस सब के बीच यह सत्य भी अकाट्य ही है कि किस्मत भी उस पर ही मेहरबान होती है जो पूरी तत्परता, तल्लीनता व समर्पण के साथ लक्ष्य को हासिल करने का प्रयत्न करता है। वर्ना हाथ पर हाथ रखकर सिर्फ किस्मत के भरोसे बैठे रहनेवाले को ना तो आज तक कुछ मिला है और ना कभी कुछ मिल सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur   

मंगलवार, 2 मई 2017

‘फिर ये एहसान कि हम छोड़ के जाते भी नहीं’

‘फिर ये एहसान कि हम छोड़ के जाते भी नहीं’


‘जिनको मतलब नहीं रहता वे सताते भी नहीं, जान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं, मुंतजिर हैं दमे-रूखसत कि ये मर जाए तो जाएं, फिर ये एहसान कि हम छोड़ के जाते भी नहीं।’ इन चंद पंक्तियांे को मौजूदा सियासी हालातों के साथ जोड़कर देखें तो ऐसा लगता है मानो दाग देहलवी साहब ने अपनी लेखनी से उन बुजुर्गों की अंदरूनी फितरत ही बताई है जो ना खुद सुकून से जीने के ख्वाहिशमंद हैं और ना दूसरों को चैन से जीने देना चाहते हैं। उनकी नजर में दुनियां की पूरी व्यवस्था के केन्द्र में वे ही हैं और जो वे सोचते हैं सिर्फ वही सही है, बाकी सब गलत। अपनी सोच-समझ से अलग वे ना तो कुछ सुनने-समझने की जहमत उठाना गवारा करते हैं और ना किसी भी सूरत में यह मानने के लिए राजी होते हैं कि उनकी बात नहीं मानने वाला भी सही हो सकता है। मिसाल के तौर पर अन्ना हजारे को ही देखें तो पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से लेकर दिल्ली नगर निगम का चुनाव परिणाम सामने आने तक उन्होंने अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को जिस तरह से लगातार अपने सीधे निशाने पर रखा है उससे निश्चित तौर पर खुद को ‘दूसरा गांधी’ बताने के उनके दावे का खोखलापन की जाहिर हुआ है। माना कि अरविंद ने जन-लोकपाल आंदोलन के मंच को राजनीति के लिए अपना आधार बनाने के क्रम में अन्ना की सौ फीसदी सहमति लेना जरूरी नहीं समझा, लेकिन इस तथ्य को भी तो भुलाया नहीं जा सकता है कि जन-लोकपाल आंदोलन के वास्तविक सूत्रधार अरविंद ही थे और उन्होंने ही आंदोलन को प्रभावी बनाने के लिए इसकी मशाल अन्ना के हाथों में सौंपी थी। यानि अन्ना को जिस अरविंद ने अपने आंदोलन के नेतृत्व की बागडोर सौंपी उस पर अगर अन्ना यह इल्जाम लगा रहे हैं कि उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए उनके आंदोलन का मंच ‘हाईजैक’ कर लिया तो इससे अधिक हास्यास्पद बात कोई दूसरी नहीं हो सकती। वास्तव में अन्ना ने तो खुद ही अपने आप को इस्तेमाल करने का मौका अरविंद को उपलब्ध कराया और जब तक अरविंद की राह से वे सहमत रहे तब तक उनका साथ बना रहा लेकिन जब अरविंद ने आंदोलन को सियासत का माध्यम बना लिया तो वे उससे अलग हो गए। यानि अरविंद के फैसले से असहमत होकर जब अन्ना ने उस मंच से खुद को अलग कर लिया तब उन्हें अरविंद के मामलों से कोई मतलब भी नहीं रखना चाहिए था। लेकिन ऐसा ना करके अन्ना ने अरविंद के जले पर नमक छिड़कने का कोई भी मौका आज तक अपने हाथों ने जाने नहीं दिया है। नतीजन अगर केजरीवाल के सबसे करीबी सहयोगी मनीष सिसोदिया का सब्र कथित तौर पर जवाब दे गया और उन्होंने अन्ना को धोखेबाज से लेकर भाजपा का एजेंट तक बतानेवाले ट्वीट को रि-ट्वीट कर दिया तो इसके लिए उन्हें कतई गलत नहीं कहा जा सकता है। हालांकि सियासी नफा-नुकसान को तौलने के बाद मनीष ने अपना एकाउंट हैक कर लिए जाने की दलील देते हुए अन्ना की शान में कतई गुस्ताखी नहीं करने का संकल्प भी दोहराया है लेकिन सच यही है कि जिस तरह से लगातार अन्ना ने केजरीवाल की छवि खराब करने और उन्हें धोखेबाज, लालची व तानाशाह साबित करने का प्रयास जारी रखा है उसके मद्देनजर अगर केजरीवाल का कोई समर्थक अन्ना पर निशाना साधे तो इसकी जिम्मेवारी निश्चित तौर पर अन्ना की ही मानी जाएगी। वास्तव में देखा जाए तो अक्सर समाज में इस बात की बड़ी चर्चा होती है कि बुजुर्गों को वह सम्मान और स्थान नहीं मिल पा रहा है जिसके वह हकदार हैं। हालांकि यह चर्चा कोई नई नहीं है बल्कि पीढ़ियों के बीच मतभेद व टकराव का सिलसिला सनातन काल से बदस्तूर जारी है जिसमें बुजुर्गों को सही और नयी पीढ़ी को गलत ठहराने की परंपरा भी लगातार चलती आ रही है। लेकिन सवाल है कि ऐसे बुजुर्गों को गलत क्यों ना कहा जाए जो नई पीढ़ी की सोच के साथ तालमेल बिठाते हुए उसके अनुरूप ढ़लने की कोशिश करने के बजाय अपनी पुरानी सोच के हिसाब से मौजूदा दौर को हांकने की कोशिशों में जुटे रहते हैं। खुद के हितों को सर्वोपरि मनवाने की जिद छोड़कर अगर अन्ना ने केजरीवाल को कल्पना के अनुरूप उड़ान भरने की छूट देते हुए सफलता का आशिर्वाद दिया होता तो उन्हें दिल्ली सरकार की ओर से निश्चित तौर पर वैसा ही स्थान व सम्मान मिलता जैसा पंडित नेहरू की सरकार ने महात्मा गांधी को दिया था। लेकिन जब केजरीवाल के लिए अन्ना गांधी नहीं बन पाए तो स्वाभाविक तौर पर अन्ना के लिए केजरीवाल भी नेहरू नहीं बन सकते। ऐसा ही मामला लालकृष्ण आडवाणी के साथ भी देखा जा रहा है जो नरेन्द्र मोदी के लिए गांधी नहीं बन पाए नतीजन उनकी हालत भी अन्ना से बेहतर होने की उम्मीद करना व्यर्थ ही है। हालांकि मुलायम सिंह यादव अवश्य अखिलेश यादव के लिए शुरूआती दौर में गांधी बनकर सामने आए लेकिन बाद में उन्होंने भी वही राह पकड़ ली जो अन्ना ने पकड़ी हुई है। नतीजन पुत्र होने के नाते अखिलेश के ना चाहते हुए भी उनकी हालत अन्ना जैसी हो ही गयी है। यानि समग्रता में देखें तो नई पीढ़ी नाहक ही पहले भी बदनाम थी और आज भी है, जबकि अपनी दुर्गति व बेकद्री की पूरी जिम्मेवारी अन्ना सरीखे बुजुर्गों की ही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

‘परिणाम के कारणों को टटोलने की जरूरत’

‘परिणाम के कारणों को टटोलने की जरूरत’

बिना किसी कारण के कोई परिणाम सामने नहीं आता और हर परिणाम के पीछे कोई ना कोई कारण अवश्य छिपा होता है। यह और बात है कि अक्सर परिणाम के पीछे छिपे असली कारण को स्वीकार करने की हिम्मत बहुत कम लोग ही दिखा पाते हैं। मिसाल के तौर पर दिल्ली के तीनों नगर निगम के चुनावों का जो नतीजा सामने आया है उसके असली कारण को स्वीकार करने के बजाय आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से लेकर जमीनी कार्यकर्ताओं की टोली अलग सुर में अपनी रामायण बांच रही हो लेकिन आम दिल्लीवासियों को इसमें कुछ भी अप्रत्याशित, अस्वाभाविक या अनपेक्षित नहीं लगा है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर आम आदमी पार्टी को वाकई इस परिणाम का असली कारण समझ में नहीं आ रहा है तो इससे एक बात तो स्पष्ट है कि उसका जमीन से जुड़ाव नहीं रह गया है। निश्चित तौर पर यह संवादहीनता की स्थिति ही कही जाएगी जिसमें ना तो लोगों की बातें पार्टी समझ पा रही है और ना ही पार्टी की बातें लोगों की समझ में आ रही है। नतीजन लोगों को लग रहा है कि पार्टी की नजर में उनकी सोच और संवेदना की कोई अहमियत नहीं है लिहाजा स्वाभाविक तौर पर दिल्लीवालों ने पार्टी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। वर्ना ऐसा भी नहीं है कि इस पार्टी की सरकार ने दो साल में कोई काम ही ना किया हो। ‘बिजली का बिल हाफ और पानी का बिल माफ’ करने का चुनावी वायदा इसने पहले ही पूरा कर दिया है। मोहल्ला क्लीनिक के कारण स्वास्थ्य व चिकित्सा सुविधाओं में आए क्रांतिकारी परिवर्तन की यशगाथा कई विकसित देशों की मीडिया भी गा रही है। इसके अलावा पेयजल की आपूर्ति का दायरा बढ़ाने से लेकर जगह-जगह मुफ्त पेयजल की मशीनें भी लगाई गई हैं। भले ही मुफ्त वाई-फाई उपलब्ध कराने के चुनावी वायदे को पूरा करने और सार्वजनिक परिवहन की बिगड़ती स्थिति को सुधारने की दिशा में ‘बातें भरपूर और काम नदारद’ की हो लेकिन सरकारी स्कूलों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। यानि समग्रता में देखें तो बेशक प्रचंड बहुमत के साथ जुड़ी हुई भारी जन-अपेक्षाओं को पूरा करने में सरकार को कामयाबी नहीं मिली हो लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सत्ता संभालने के बाद सरकार ने कोई काम ही नहीं किया है। जाहिर है कि अभी अपने वायदों को पूरा करने के लिए केजरीवाल सरकार के पास तीन साल का वक्त बाकी है और उम्मीद की जा सकती है कि काम-काज की मौजूदा रीति-नीति आगे भी जारी रहेगी और नित नए क्षेत्रों में लोगों को राहत मुहैया कराने में भी सरकार कतई कोताही नहीं बरतेगी। लेकिन मसला है कि इन तमाम हकीकतों के बावजूद अगर तीनों ही निगमों में पार्टी को काफी बड़े अंतर से दूसरे नंबर पर रहने के लिए मजबूर होना पड़ा है और वह भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में भी कहीं दिखाई नहीं पड़ी है तो इसकी कोई तो वजह अवश्य होगी। जरूरी नहीं है कि किसी एक वजह से ही जनता ने केजरीवाल के नेतृत्व को नकारने की पहल की है बल्कि इसकी कई वजहें अवश्य हैं जिसके कारण ‘काम का दाम’ इस सरकार को नहीं मिल पाया है। वाकई कहीं ना कहीं यह सरकार जमीन से कट सी गई है और आम लोगों की सरकार देने का जो वायदा किया गया था उसे पूरा करने के बजाय सरकार के शीर्ष संचालकों ने इस तरह की कार्यशैली अपनाई जिससे तानाशाही का आभास होने लगा। पहले तो संगठन में जिस तरह से प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव सरीखे संस्थापक सदस्यों को बुरी तरह बेआबरू करके दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका गया उससे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आप की बेपरवाही का ही संदेश गया। उसके बाद अपने कार्यक्षेत्र के दायरे को बढ़ाने के लिए केन्द्र सरकार व उपराज्यपाल के साथ रोजाना की लड़ाई ठाने जाने से यही संदेश गया कि इन्हें जो जिम्मेवारी मिली है उसे पूरा करने से बचने का बहाना तलाशा जा रहा है। रही-सही कसर ऊटपटांग बयानबाजी ने निकाल दी और जनभागीदारी की नीति का विसर्जन करके सरकार ने खुद को एक ऐसी कोठरी में बंद कर लिया जहां तक लोगों की सीधी नजर पहुंच ही नहीं पा रही थी। जो पैसा दिल्ली के विकास पर खर्च होना चाहिए था उसे पार्टी के प्रचार पर खर्च किया जाना, जनता से जुड़ने की हर राह को अपनी ओर से बंद कर लेना, सत्ता संचालन की नीतियों का निर्धारण करने के क्रम में वैधानिक व्यवस्थाओं की अनदेखी करना, संवाद के बजाय विवाद खड़ा करके अपनी बात लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करना, पार्टी का विस्तार करने के लिए दिल्लीवासियों का दिल तोड़कर अन्य सूबों में अपनी पूरी ताकत झोंकना, नियुक्ति व स्थानांतरण की प्रक्रिया में मनमाने फैसले करते हुए पारदर्शिता व संवैधानिकता की अपेक्षाओं को अंगूठा दिखाना और अपनी ही कही बात से आपियों का बार-बार पलटना दिल्लीवासियों को इस कदर नागवार गुजरा कि उन्हें ठगे जाने का एहसास हो चला। नतीजन जनता द्वारा पार्टी को नकारा जाना तो पहले ही तय हो चुका था और इसकी झलक राजौरी गार्डन विधानसभा के उपचुनाव में ही दिख गयी थी। खैर, सियासत में कोई हार या जीत अंतिम नहीं होती और असीमित संभावनाओं का खेल ही राजनीति है। लिहाजा आवश्यकता है अपनी कमियों, खामियों व गलतियों को पहचान कर उनमें सुधार लाने की ताकि भविष्य को बेहतर किया जा सके। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant Thakur

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

‘मौजूदा परिणामों पर भविष्य की परिकल्पना’

‘मौजूदा परिणामों पर भविष्य की परिकल्पना’


मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य काफी हद तक गीता के उस ज्ञान की तरह दिखाई दे रहा है जिसमें कृष्ण ने अर्जुन के समक्ष विकल्प प्रस्तुत करते हुए कहा था कि युद्ध का परिणाम तो पहले से ही तय है लेकिन यह उस पर निर्भर है कि वह युद्ध में हिस्सेदारी करके श्रेय का सेहरा अपने सिर पर बांधना पसंद करता है अथवा रण से भागकर अपयश का भागी बनना बेहतर समझता है। इन दिनों ऐसा ही माहौल दिखाई दे रहा है आगामी दिनों में होने जा रहे राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर जिसका अंतिम परिणाम हालिया दिनों में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पहले ही तय कर दिया है। लेकिन परिणाम तय हो जाने के बावजूद लड़ाई में हिस्सेदारी करके इन तात्कालिक परिणामों का दूरगामी फायदा उठाने का विकल्प सभी पक्षों के समक्ष स्पष्ट तौर पर खुला हुआ है। इसका दिलचस्प पहलू यह है कि तयशुदा परिणामों की बेहतर समझ होने के बावजूद ना तो सत्ता पक्ष ने इस चुनाव को अपना निर्णायक साध्य समझने की गफलत पाली है और ना ही विपक्ष ने भविष्य का लक्ष्य साधने के लिए इसे साधन के तौर पर इस्तेमाल करने से परहेज बरतना उचित समझा है। बल्कि दोनों ही खेमे इस अवसर का उपयोग करते हुए नए सिरे से सियासी ध्रुवीकरण की कोशिशों में जुटे दिख रहे हैं। जहां एक ओर भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आगे करके 33 दलों को एक मंच पर लाकर केन्द्र सरकार की मजबूती का मुजाहिरा किया है वहीं दूसरी ओर साझा मसलों पर सहमति कायम करके कांग्रेस ने भी 13 दलों की एकजुटता का प्रदर्शन करने में कोई कोताही नहीं बरती है। कहने को तो भाजपा ने अपने सहयोगी व समर्थक दलों को इसलिए रात्रि भोज पर आमंत्रित किया ताकि सरकार के तीन साल के कामकाज के बारे में साथियों की राय जानी जाए जबकि कांग्रेस ने राष्ट्रपति से मोदी सरकार की तानाशाही की शिकायत करने के बहाने विरोधी एकता का सार्वजनिक तौर पर मुजाहिरा किया। हालांकि किसी भी पक्ष ने अब तक यह बताने की जहमत नहीं उठाई है कि अचानक ऐसी कौन सी परिस्थितियां उत्पन्न हो गयीं कि तीन साल तक साथियों व सहयोगियों से निर्धारित दूरी बनाकर चलने के बाद अचानक सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की क्या जरूरत पड़ गयी। लेकिन कोई कहे ना कहे, पर सच तो यही है कि अब दोनों ही पक्षों को इस बात का बेहतर एहसास हो चला है कि दो साल बाद होने वाले आम चुनावों में अगर अपनी स्थिति मजबूत करनी है तो इसके लिए अधिक से अधिक दलों को अपने साथ जोड़ना ही होगा। इसके लिए अभी राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति चुनाव के रूप में मौका भी है और दस्तूर भी। जिसका लाभ उठाकर अपनी शक्ति व सामथ्र्य में इजाफा करने की बेहतर शुरूआत की जा सकती है। यही वजह है कि राष्ट्रपति चुनाव अब सिर्फ बेहतर प्रथम नागरिक के चयन की प्रक्रिया तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। बल्कि इस मौके को भुनाते हुए सत्ता पक्ष भी अधिक से अधिक दलों को अपने नजदीक खींचने की कोशिश करेगा और संयुक्त विपक्ष की ओर से भी किसी ऐसे चेहरे को आगे किया जाएगा जिसके समर्थन में अधिकतम दलों को एक मंच पर लाया जा सके। यानि इतना तो तय है कि इस बार राष्ट्रपति का चयन सर्वसम्मति से हर्गिज नहीं होने जा रहा। वह भी तब जबकि सबको मालूम है कि भाजपा अपने बलबूते पर ही मनचाहे प्रत्याशी को राष्ट्रपति बनवाने की पूरी क्षमता रखती है। आज की तारीख में 13 सूबों में भाजपा का प्रत्यक्ष शासन है जबकि चार राज्यों में उसके समर्थन से सहयोगी दलों की सरकार चल रही है। लिहाजा भाजपा का मकसद सिर्फ मनचाहे प्रत्याशी को राष्ट्रपति बनवाने तक ही सीमित होता तो उसे 33 दलों को अपने साथ दिखाने के लिए रात्रि भोज का आयोजन करने की कोई जरूरत ही नहीं थी। इसी प्रकार विपक्ष के प्रत्याशी की सुनिश्चित हार स्पष्ट दिखाई पड़ने के बावजूद कांग्रेस की ओर से यह रणनीति नहीं अपनाई जाती कि सत्ता पक्ष की ओर से घोषित किए जाने वाले प्रत्याशी के खिलाफ संयुक्त विपक्ष का कोई उम्मदवार अवश्य खड़ा किया जाए। अगर कांग्रेस की मंशा सिर्फ देश को बेहतर राष्ट्रपति दिलाने की होती तो उसने यह विकल्प खुला रखा होता कि अगर सरकार ने उसके मनमाफिक व्यक्ति को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया तो वह उसका समर्थन भी कर सकती है। लेकिन कांग्रेस ने भी सरकार की ओर से घोषित किए जाने वाले प्रत्याशी का निश्चित तौर पर विरोध करने की रणनीति अपनाई है और सरकार का संचालन करनेवाली भाजपा ने भी साफ संकेत दे दिया है कि वह तमाम सहयोगियों से सहमति लेकर ही किसी को इस पद के लिए आगे करेगी। यानि राष्ट्रपति पद के चुनाव में आंकड़ों के आधार पर अभी से नतीजा निश्चित दिखाई पड़ने के बावजूद अगर टकराव की स्थिति बन रही है तो उसके पीछे सीधी राजनीति यही है कि ‘राष्ट्रपति चुनाव तो महज बहाना है, 2019 के आम चुनाव पर निशाना है।’ ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रपति चुनाव के बहाने गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति को अधिकतम ऊंचाई तक ले जाने के लिए कांग्रेस को मुख्यधारा की सियासत में अलग-थलग करने की भाजपा की कोशिशें सफल होती हैं या फिर हारी हुई लड़ाई को आधार बनाकर भावी जीत की राह पर आगे बढ़ने में कांग्रेस को कामयाबी मिलती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @Navkant Thakur

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

‘मसलों की महक पर हावी मसालों की मादकता’

‘मसलों की महक पर हावी मसालों की मादकता’


बाजारू बावर्चीखाने केे पकवानों को सेहत के लिये नुकसानदेह बताए जाने की सबसे बड़ी वजह है पाव भर की मुर्गी को सवा किलो मसाले में पकाया जाना। स्वाभाविक है कि ऐसे खाने में सिर्फ मसाले का ही जायका मिलेगा। मुर्गी की महक तो गायब ही हो जाएगी। इन दिनों यही हो रहा है देश के सियासी बावर्चीखाने में। असली मसलों पर बेमानी मसाले की इतनी मोटी परत चढ़ाई जा रही है कि मसले नजर ही नहीं आ रहे और मसाले मैदान मार रहे हैं। नतीजन बहस का नतीजा सिफर रहना स्वाभाविक ही है। मिसाल के तौर पर शिवसेना के सांसद रविन्द्र गायकवाड़ के साथ हुए एयर इंडिया के विवाद में गायकवाड़ की गलती यही थी कि वे खुद पर काबू नहीं रख पाए और उन्होंने गुस्से में आकर चप्पल चला दिया। वर्ना एयर इंडिया ने जिस तरह से इन दिनों मनमानी की मिसाल कायम की हुई है उसकी सर्वसम्मति से संसद में निंदा होनी तय ही थी बशर्ते गायकवाड़ ने चप्पल चलाने के बजाय इस मसले को संसद में उठाया होता। एयर इंडिया की कार्यप्रणाली का एक नमूना पिछले पखवाड़े लोकसभा अध्यक्षा का बैगेज गायब हो जाने के मामले में भी दिखाई दिया जिसमें एयर इंडिया ने ना तो बुक किए गए बैगेज के सुरक्षा की जिम्मेवारी स्वीकारी, ना सीसीटीवी की फुटेज खंगालने की जहमत उठाई और ना ही बैगेज को उठा ले जाने वाले के खिलाफ कोई एक्शन लेना जरूरी समझा। गायकवाड़ के मामले में पचास हजार से अधिक की रकम का बिजनेस क्लास का टिकट देकर एयर इंडिया ने उन्हें ऐसे विमान में बैठा दिया जिसमें सिर्फ उस इकोनोमी क्लास की सीटें की उपलब्ध थीं जिसे पूर्ववर्ती कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के रसूखदार मंत्री शशि थरूर ‘कैटल क्लास’ करार दे चुके हैं। एयर इंडिया की इस मनमानी का विरोध करने के नतीजे में सार्वजनिक तौर पर अपशब्द व अपमान सहन करना उनसे संभव नहीं हो पाया और वे गुस्से में चप्पल चला बैठे। इसके बाद एयर इंडिया की मनमानी के मसले पर चप्पल का मसाला इस कदर हावी हुआ कि आखिरकार गायकवाड़ को लिखित माफी मांग कर एक ऐसे मामले का पटाक्षेप कराना पड़ा जिसमें वास्तविक पीड़ित वे खुद ही थे। मसलों की महक पर मसाले की मादकता हावी हो जाने के ऐसे तमाम मामले इन दिनों खुली आंखों से स्पष्ट देखे जा सकते हैं। मसलन अलवर में कथित गौ-रक्षकों की पिटाई से हुई गौ-तस्कर की मौत के मामले में भी असली मसला गौ-हत्या पर लगे प्रतिबंध को प्रभावी तौर पर लागू करने में प्रशासन को हासिल हो रही विफलता का ही है। लेकिन यह मुद्दा बहुसंख्यकों की गुंडागर्दी के कारण हुई अल्पसंख्यक की मौत का बनकर रह गया है और पूरी बहस से गौ-हत्या पर रोक के लिए बने कानून की विफलता सिरे से नदारद है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में अवैध बूचड़खानों पर कराई गई तालाबंदी के मामले में भी लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को पहुंच रहे नुकसान का असली मसला बहस से बाहर है और इस पूरे मामले को ऐसे मनगढ़ंत मसालों में गर्क कर दिया गया है मानो यूपी की योगी सरकार लोगों के खान-पान, रहन-सहन और परिधान-परंपरा को मनमाने तरीके से नियंत्रित करना चाहती है। ऐसी ही तस्वीर यूपी में एंटी रोमियो दस्ते की तैनाती के मामले में भी देखी जा रही है जिसमें बहन-बेटियों की पीड़ा और तकलीफ से जुड़े असली मसले की अनदेखी करते हुए बहस छेड़ दी गई इस दस्ते के नामकरण को लेकर। मामले में मसाले का इस हद प्रयोग किया गया कि आवारा व सड़कछाप मनचलों की तुलना भगवान कृष्ण द्वारा बचपन में की गई उन शरारतों के साथ कर दी गई जिसे उन्होंने 12 वर्ष की उम्र के बाद कभी अंजाम नहीं दिया। योगी सरकार के फैसले का मजाक उड़ाते हुए यहां तक कहा गया कि पहले सुरक्षा के लिए बहन-बेटियां भाई को साथ लेकर घर से निकलती थीं और अब भाईयों को अपनी रक्षा के लिए बहनों के साथ निकलना पड़ रहा है। ये तमाम कुतर्क सिर्फ इसलिए ताकि असली मसले पर बहस ना छिड़ सके। इसी प्रकार तीन तलाक की कुरीति के कारण महिलाओं को झेलनी पड़ रही यातना के मसले को दबाने के लिए कभी समान नागरिक संहिता का विघटनकारी मसाला इस्तेमाल किया जा रहा है तो कभी पर्सनल लाॅ और शरियत की सांप्रदायिक बहस छेड़ी जा रही है। मसलों को मसाले में डुबो दिए जाने के कारण ना तो उस आम उपभोक्ता का दर्द सामने आ रहा जिसे 45 रूपये की दर से चीनी खरीदनी पड़ रही है और ना ही उन गन्ना किसानों के भुगतान की समस्या बहस के केन्द्र में आ पा रही है जिन्हें उनका हक दिलाने के लिए योगी सरकार को मैदान में कूदना पड़ा है। अलबत्ता मसले पर मसाले को हावी करके सरकार के उस फैसले को आलोचना के केन्द्र में लाने की कोशिश की जा रही है जिसके तहत मोदी सरकार ने चीनी की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करके उसकी कीमतों को काबू में रखने के मकसद से 50 लाख टन चीनी के शुल्क मुक्त आयात को हरी झंडी दिखाई है। ऐसे तमाम मामलों को समग्रता में टाटोलने पर चुटकी भर मसले में मुट्ठी भर मसालों का बेहिसाब इस्तेमाल किए जाने की जो तस्वीर सामने आ रही है उससे मसलों का हल कतई नहीं निकल सकता। अलबत्ता इफरात में मसालों का इस्तेमाल करने वाली सियासत को हजम करना लोगों के लिए अवश्य तकलीफदेह होता जा रहा है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 20 मार्च 2017

महज संयोग नहीं है यूपी में योगी का योग

महज संयोग नहीं है यूपी में योगी का योग


अंतिम समय तक मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर दिखाई दे रहे अजय सिंह नेगी अर्थात योगी आदित्यनाथ का नाम निर्णायक मौके पर धूमकेतु की तरह चमकना और सूबे की सियासत उनकी मुट्ठी में आ जाना महज सामान्य संयोग नहीं है। तमाम बड़े चेहरों व नामों को दरकिनार करते हुए अगर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने योगी पर अपना भरोसा दिखाया है तो इसकी सबसे बड़ी वजह है अपने वायदों को पूरा करने के प्रति मतदाताओं को आश्वस्त करना और विरोधियों की भावी रणनीतियों का पहल से ही जवाब तैयार कर लना। मुख्य रूप से 25 महीने बाद होनेवाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने योगी को यूपी के मोर्चे पर तैनात करके ऐसा जाल बिछा दिया जिसमें उलझने से बचने में विरोधियों को दांतों तले पसीना आ जाए। साथ ही अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की जिस नीति के तहत ना सिर्फ सपा-कांग्रेस की जोड़ी ने बल्कि बसपा ने भी भाजपा के समक्ष हालिया चुनाव में चुनौती पेश की थी उसके खिलाफ बढ़-चढ़कर मतदान करते हुए अगर सूबे की जनता ने भाजपा को दो-तिहाई से भी अधिक सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ कुर्सी पर बिठाने का फैसला किया तो इसका सीधा मतलब यही है कि जनता को भाजपा से योगी सरीखे मुख्यमंत्री की ही अपेक्षा थी। योगी की व्यक्तिगत छवि ठीक वैसी ही है जैसा वायदा करके भाजपा ने यूपी के मतदाताओं को भरोसे में लिया है। मसलन अवैध बूचड़खानों को रातोंरात बंद करने का जो वायदा भाजपा ने किया है उसके पूरा होने का भरोसा देना योगी की छवि के बूते की ही बात है क्योंकि उनकी सुबह ही गायों को अपने हाथों से चारा खिलाने के साथ होती है। इसी प्रकार अवैध कब्जे वाली जमीनों को दबंगों से छीनकर उसे उसके असली हकदारों को वापस लौटाने का भाजपा ने जो चुनावी वायदा किया था उसके पूरा होने का भरोसा भी योगी की छवि दिला रही है क्योंकि बकायदा जनता दरबार लगाकर पूर्वांचल के वंचितों, शोषितों व पीड़ितों को जायज हक दिलाने व दबंगों को औकात में रहने के लिए मजबूर करने को लेकर योगी पहले से ही विख्यात हैं। इसी प्रकार सांसद के तौर पर स्थानीय प्रशासन को अपने मनमुताबिक काम करने के लिये मजबूती से मजबूर करनेवाले योगी के बारे में यह धारणा भी बनी हुई है कि नौकरशाहों के मायाजाल में वे कतई नहीं फंस सकते बल्कि नौकरशाही को इनके मनमुताबिक काम करना ही पड़ेगा। स्थापित छवि के मुताबिक योगी पर ना किसी की धौंस चल सकती है और ना ही दबाव काम आ सकता है। इनकी छवि के साथ इमानदारी की चमक भी पहले से जुड़ी हुई है लिहाजा इस पर विश्वास नहीं करने का कोई कारण नहीं है कि उनके कार्यकाल में कोई भी योजना भ्रष्टाचार की भेंट हर्गिज नहीं चढ़ेगी। यानि समग्रता में देखा जाये तो हवा का रूख पहचानने का दावा करनेवालों ने भले ही योगी को मुख्यमंत्री पद का प्रमुख दावेदार मानने से इनकार कर दिया हो लेकिन भाजपा ने चुनाव के दौरान अपना जो संकल्प पत्र प्रस्तुत किया था उसके सबसे करीब अगर सूबे के किसी की भाजपाई नेता की छवि दिखाई देती है तो वे योगी आदित्यनाथ ही हैं। चाहे प्रदेश को वंशवाद, परिवारवाद या तुष्टिकरण के चंगुल से बाहर निकालने की कसौटी पर परखें अथवा बहुसंख्यक मतदाताओं को लुभाने के लिए किये गये सांकेतिक वायदों को आधार बनाकर जांचें। हर नजरिये से योगी ही प्रधानमंत्री मोदी के वायदों को पूरा करने की सबसे मजबूत स्थिति में दिखाई पड़ते हैं। लिहाजा इतना तो स्पष्ट है कि यूपी के साथ योगी का जो योग हुआ है वह पहले से ही सोची समझी रणनीति का हिस्सा है ना कि उस कथित दबाव का नतीजा है जो योगी के समर्थकों ने पार्टी नेतृत्व पर बनाने की कोशिश की थी। इसके अलावा योगी को आगे करने की सबसे बड़ी वजह है भावी राजनीतिक चुनौतियों का मजबूती से सामना करने के लिये अभी से निर्णायक पहल कर लेना। क्योंकि माना यही जा रहा है कि दो साल बाद होनेवाले लोकसभा के चुनाव में तमाम गैर-भाजपाई दलों का एक मंच पर आना तय ही है। ऐसे में स्वाभाविक है कि राजनीति होगी ध्रुवीकरण की और अगर अल्पसंख्यकों को अपने साथ जोड़ने के लिए बाकी दल परस्पर गठबंधन करेंगे तो स्वाभाविक तौर पर बहुसंख्यकवाद की राजनीति को धार देने के अलावा भाजपा के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचेगा। इस लिहाज से भी देखें तो भाजपा के लिये योगी से अधिक मुफीद चेहरा दूसरा कोई नहीं हो सकता है जिसकी स्वीकार्यता गोरखपुर से लेकर गाजियाबाद तक हो। हालांकि विधायक दल का नेता चुने जाने के फौरन बाद अपने पहले संबोधन में योगी ने साफ कर दिया है वे ‘सबका साथ सबका विकास’ की नीति पर चलते हुए प्रदेश को विकास की राह पर आगे ले जाने के लिये पूरी तरह कृतसंकल्प हैं और अपनी कट्टर हिन्दूवादी छवि को उन्होंने फिलहाल पीछे धकेल देना ही बेहतर समझा है। इसकी वजह भी बिल्कुल साफ है कि चुंकि इस दफा अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के काफी बड़े वर्ग ने तीन तलाक के मसले पर भाजपा की नीति से प्रभावित होकर उसे अपना समर्थन दिया है लिहाजा वह अपनी तरफ से कट्टर हिन्दुत्ववादी राह अपनाने की पहल हर्गिज नहीं करेगी। लेकिन ‘अतिशय रगड़ करे जो कोई, अनल प्रगट चंदन से होई’ की नौबत से निपटने में योगी का मुकाबला प्रदेश भाजपा का कोई दूसरा नेता कतई नहीं कर सकता। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

मंगलवार, 7 मार्च 2017

संभावित खिचड़ी में रायते का जायका

संभावित खिचड़ी में रायते का जायका


खेल चल रहा है खुल्लम-खुल्ला। सब खेल रहे हैं। नेता खेल रहे हैं जनता के साथ और जनता खेल रही है नेताओं के साथ। मामला इस कदर गड्डमगड टाईप का हो गया है कि किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा कि कौन किसके साथ खेल-खेल रहा है। हर किसी को अपनी ही पौ-बारह होती दिखाई पड़ रही है। तभी तो सब जोश में हैं। जोश भी ऐसा कि इसमें होश के लिए कोई जगह ही नहीं बची है। चैतरफा शंखनाद से आसमान गुंजायमान है। तुरही बज रही है, ढ़ोल-नगारे बज रहे हैं। उसकी धुन पर नेता भी मदमस्त हैं और जनता भी। हर तरफ रंग ही रंग है, उमंग ही उमंग है। ‘को बड़-छोट कहत अपराधू’ की स्थिति है। आखिर हो भी क्यों ना। जब एक ही दिन और एक ही इलाके में आयोजित वजीरे-आजम के जनता दर्शन से लेकर यूपी के लड़कों की पगडंडी मार्च तक ही नहीं बल्कि तने-तंबू की छांव में आयोजित बहनजी की चैपाल तक में जनसैलाब का ऐसा उफान दिखाई दे कि तुलनात्मक तौर पर किसी एक आयोजन को सफलतम और बाकियों को दोयम साबित करने में बड़े-बड़ों के पसीने छूटने लगें तो फिर कागजी समीकरणों का ध्वस्तीकरण होना स्वाभाविक ही है। तभी तो सूबे की मौजूदा स्थिति को तयशुदा व परंपरागत फार्मूले के खांचे में फिट करते हुए शब्दों के सांचे में ढ़ालकर किसी निर्णायक स्वरूप में प्रस्तुत कर पाना उतना ही मुश्किल हो गया है जितना त्रिदेवों की तिकड़ी में से किसी एक को सर्वसम्मति से सर्वोत्तम बताना। ऐसे में सत्ता का वरण करने के लिये सात फेरों में हो रहे सप्तपदी चुनाव की अंतिम परिक्रमा संपन्न होने तक सबका जुनून सातवें आसमान पर होने को कैसे अस्वाभाविक कहा जा सकता है। उस पर तुर्रा यह कि महीना भी फागुन का है जिसमें सामान्य व हर तरह से ठीक-ठीक आदमी की मनोदशा बिल्कुल वैसी ही रहती है जैसी कार्तिक में कुत्ते, अगहन में भैंसे और चुनाव में नेताओं की होती है। यानि फागुन ने चढ़ा दिया है नीम को करेले पर। चुनाव के कारण नेता और फागुन के कारण मतदाता एक बराबर हो गए हैं। लिहाजा ना नेताओं की बात को लेकर जनता में ठोस खेमेबाजी या निर्णायक गोलबंदी हो रही है और ना ही किसी ठोस मुद्दे को लेकर नेताओं में आपसी उखाड़-पछाड़ का माहौल दिख रहा है। हर कोई अपना अलग ही सुर-ताल सुनाने में पिला है। जनता भी किसी एक की तान पर थिरकने के बजाय अपनी ढ़फली पर अपना राग आलाप रही है। हालांकि नेताओं का सुर-ताल जनता को भी आह्लादित कर रहा है और जनता के आलाप से नेता भी आशान्वित हो रहे हैं। सब मस्त हैं अपनी मस्ती में। फिजा में घुल रहे सियासी रंगों से जनता भी खुलकर खेल रही है। वह भगवा के साथ भी उतने ही प्यार से लिपट रही है जितना लाल, हरे व नीले से। इस चुनावी फागुन में जनता इस कदर होलियाई हुई है कि सियासी हुल्लड़-हुड़दंग में यह परखना बेहद मुश्किल हो रहा है कि वह किससे अंदरूनी तौर पर बिदक रही है और किसके साथ अंतरंगता के साथ चिपक रही है। नतीजन सबका दावा यही है कि इस दफा विरोधियों के अरमानों की होली जलेगी और जीत के रंग की होली तो उनकी ही मनेगी। दावा करें भी क्यों ना। वह भी तब जबकि ऐसे दावों की हवा निकालने का अचूक तर्क हर तरफ से पूरी तरह नदारद हो। तभी तो जो किसी जमात से जुड़े हैं वे तो अपने खेमे की जीत सुनिश्चित बता रहे हैं लेकिन तटस्थ व निष्पक्ष विचारों के सूरमाओं का आकलन है कि अंत में मामला खिचड़ी भी हो सकता है। खिचड़ी का यह शगूफा काफी तेजी से फैल भी रहा है। तभी तो साहेब ने भरी सभा में यह कह दिया कि जिनकी अपनी दाल नहीं गल पा रही वे चुनावी चूल्हे पर खिचड़ी पकाने में जुट गए हैं ताकि किसी और को अपनी दाल गलाने में कामयाबी ना मिल सके। वैसे भी समग्रता में देखा जाए तो हवा का रूख किसी एक के पक्ष में होने की संभावना को स्वीकार कर लेने से पूरा विश्लेषण ही रसहीन हो जाएगा। यही वजह है कि चैपाल की चर्चाओं में हवा दी जा रही है खिचड़ी की संभावना को। इस संभावना में बहुत रस भी है और चटपटा स्वाद भी। तभी तो खिचड़ी की संभावना जताने वाले अब यह भी बताने लगे हैं कि इस फागुन में किस पर किसका रंग चढ़ेगा। इस चर्चा का चकल्लस सिर्फ भगवा को लाल-हरे से दूर रख रहा है। वर्ना जितनी अटकलें नीले के भगवा से मिलने की लगाई जा रही हैं उतनी ही तिरंगे की छांव में सशक्त व सुनिश्चित भविष्य का निर्माण करने के लिए लाल-हरे के साथ नीले के जुड़ने की भी व्यक्त की जा रही हैं। लेकिन एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि अब तक जब भी किसी ने नीले को अपनाया है तो उसके हिस्से में कालिख ही आई है। जब भी कभी रंगों के घाल-मेल की परिस्थिति उत्पन्न हुई है तो इसमें वर्चस्व नीले का ही रहा है। लिहाजा खिचड़ी की सूरत में नीला रंग अपनाकर रंगा सियार बनने के अलावा शायद ही कोई दूसरा विकल्प दिखाई पड़े। खैर, किस पर किसका रंग चढ़ेगा, किसका रंग जमेगा या किसका रंग उतरेगा यह शनिवार को पता चलेगा, लेकिन इतना तय है कि अगर खिचड़ी की नौबत आई तो जमकर रायता भी फैलेगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

बुधवार, 1 मार्च 2017

‘भावी परिणामों पर टिकीं असीमित संभावनाएं’

‘भावी परिणामों पर टिकीं असीमित संभावनाएं’


चुनावी राजनीति के तहत होनेवाले सियासी खेल में संभावनाओं का अकाल कभी नहीं होता है। हर चुनाव के बाद नई तस्वीर उभरती है और नया सियासी समीकरण बनता है। स्वाभाविक है कि नए संतुलन की तलाश में सियासी समीकरण का चक्र इस बार भी घूमेगा। तभी तो आगामी ग्यारह मार्च को पांच राज्यों के चुनावों का नतीजा सामने आने के बाद ना सिर्फ राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलावों की उम्मीद जताई जा रही है बल्कि केन्द्र की मोदी सरकार के केबिनेट में भी व्यापक फेरबदल की सुगबुगाहट साफ महसूस की जा रही है। हालांकि इन बदलावों के लिये अपेक्षित नतीजे की भी दरकार है। तभी तो अभी कोई अपने पत्ते नहीं खोलना चाहता। खोले भी क्यों? बंद मुट्ठी लाख की, खुल गयी तो खाक की। फिलहाल हर तरफ से यथास्थिति बरकरार रखने का ही प्रयास किया जा रहा है। लेकिन ताड़नेवाले भी कयामत की नजर रखते हैं। लाख छिपाने के बावजूद छिप नहीं पा रहा कि एक तरफ दिल्ली की राजनीति में एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाने के बावजूद पंजाब का गुणा-भाग दुरूस्त करने के लिये कांग्रेस और एएपी के बीच अघोषित युद्ध विराम हो गया है जबकि दूसरी ओर महाराष्ट्र में शिवसेना भी बीएमसी के मेयर पद पर दावेदारी के मामले को लेकर जारी विचार-विमर्श प्रक्रिया को यथासंभव लंबा खींचने में जुटी है। इसके अलावा मोदी केबिनेट में संभावित बदलावों को लेकर भी राजधानी के सियासी गलियारे में तमाम अटकलों का बाजार गर्म है और कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर चुनाव परिणाम अपेक्षा के अनुकूल रहे तो शीर्ष केबिनेट मंत्रियों की जिम्मेवारियों में बड़े बदलाव की तस्वीर शीघ्र ही दिखाई पड़ सकती है। वास्तव में इन तमाम कयासों व अटकलों को चुनाव परिणाम के बाद की स्थितियों से जोड़ कर देखा जा रहा है और माना जा रहा है कि इन परिणामों के मुताबिक सत्ता का समीकरण नयी करवट ले सकता है। मसलन पंजाब के मामले में भले ही भाजपा-अकाली गठबंधन के नेताओं ने भी यह मान लिया है कि वहां बादल सरकार की वापसी नहीं होने जा रही है लेकिन इस बात का दावा करने की स्थिति में भी कोई नहीं है कि सूबे में किसी एक पार्टी को ही पूर्ण बहुमत हासिल हो जाएगा। ऐसे में अगर त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर बनी तो धर्मनिरपेक्षता की अलख जगाते हुए कांग्रेस और एएपी के बीच भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिये समझौता हो सकता है और इसका प्रभाव निश्चित तौर पर दिल्ली महानगरपालिका के आगामी चुनावों पर भी पड़ेगा। हालांकि कांग्रेस और एएपी को सत्ता में साझेदारी करने का मौका गोवा में भी मिल सकता है बशर्ते वहां भाजपा को बहुमत ना मिल सके। जाहिर है कि इन दोनों दलों को अगर किसी भी सूबे में भाजपा के खिलाफ एक मंच पर आने का मौका मिला तो इस गठजोड़ का विस्तार गुजरात में भी होना तय ही है जहां इस साल के आखिरी दिनों में विधानसभा का चुनाव होना है। इसके अलावा अगर पांच राज्यों के इस चुनाव में कांग्रेस को किन्हीं दो-तीन सूबों में उल्लेखनीय कामयाबी मिल गयी तो इसे मोदी सरकार की खिसकती जमीन का ही परिचायक माना जाएगा और ऐसे में भाजपा से बुरी तरह खार खाई हुई शिवसेना को भी कांग्रेस से हाथ मिलाने का आत्मविश्वास हासिल हो सकता है। वैसे भी राहुल गांधी के नेतृत्व को नकार कर राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने साफ जता दिया है कि कांग्रेस के साथ उनका पुराना याराना दोबारा कायम नहीं पाएगा। इसी प्रकार शिवसेना ने भी भाजपा से अलग होने की पटकथा लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लिहाजा भाजपा विरोध के वैचारिक धरातल पर इनके बीच आपसी समझौता होने की संभावना को कतई खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन शर्त यह है कि कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि वह राष्ट्रीय राजनीति में दोबारा वापसी करने की राह पर आगे बढ़ रही है। जाहिर है कि महाराष्ट्र का संभावित समीकरण यूपी के नतीजों का ही इंतजार कर रहा है जहां अगर कांग्रेस के साथ सपा का बेड़ा पार हो गया तो शिवसेना भी कांग्रेस के साथ जुड़ने में हर्गिज देरी नहीं करेगी। इसके अलावा इन चुनाव परिणामों के बाद मोदी सरकार के केबिनेट का स्वरूप भी बदल सकता है। खास तौर से गोवा वापसी के लिये अपनी हार्दिक तड़प दिखा चुके मनोहर पर्रिकर को दोबारा मुख्यमंत्री बनाकर वापस भेजे जाने और रक्षा मंत्रालय की जिम्मेवारी एक बार फिर अरूण जेटली के कांधों पर आने की अटकलें काफी जोर-शोर से लगायी जा रही हैं। ऐसे में वित्त विभाग का कामकाज पियूष गोयल को सौंपे जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। साथ ही दूर की कौड़ी के तौर पर गाहे-बगाहे यह बात भी उछल रही है कि यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का मौका मिलने पर राजनाथ सिंह को प्रदेश की राजनीति में वापस भेजने का मौका गंवाना भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को शायद ही मंजूर हो। यानि इतना तो साफ है कि इन चुनावों का जितना प्रभाव प्रदेशिक राजनीति पर पड़ेगा उससे रत्ती भर भी कम केन्द्र की राजनीति प्रभावित नहीं होगी। लेकिन ये तमाम समीकरण फिलहाल कयासों और अटकलों पर ही आधारित हैं क्योंकि हर संभावित बदलाव के साथ यही जुड़ा हुआ है कि अगर यह होगा तो वह होगा। लिहाजा जो भी होगा वह चुनाव परिणाम की तस्वीर से ही तय होगा। वर्ना सियासत में होने को तो कुछ भी हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

‘गधे ही गधे हैं, जहां पर भी देखो’

‘गधे ही गधे हैं, जहां पर भी देखो’


सही कहा गया है कि जहां ना पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। वर्ना दिवंगत हास्य कवि ओमप्रकाश आदित्य अपनी युवावस्था में ही इस सत्य का साक्षात्कार कतई नहीं कर सकते थे कि ‘इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं, जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं, गधे हंस रहे, आदमी रो रहा है, हिंदोस्तां में ये क्या हो रहा है, जवानी का आलम गधों के लिये है, ये दिल्ली ये पालम गधों के लिये है, धोड़ों को मिलती नहीं घास देखो, गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश देखो, जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है, जो माइक पे चीखे वो असली गधा है, यहां आदमी की कहां कब बनी है, ये दुनियां गधों के लिये ही बनी है।’ आदित्य साहब की इस कविता को कल तक लोग व्यंग्य-विनोद के तौर पर मजे लेकर सुना करते थे। लेकिन अब तस्वीर बदल गयी है। गधों को लेकर जिस कदर गंभीरता का माहौल बन रहा है उसी अनुपात में इस कविता पर भी गंभीर चिंतन की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जाने लगी है। गधों के प्रति गंभीरता का आलम यह है कि प्रधानमंत्री स्वयं ही सीना ठोंककर यह बता रहे हैं कि देश सेवा की प्रेरणा उन्हें गधों से ही मिली है। गधों को देख-देखकर ही वे कठिन परिश्रम करने में सक्षम हो पाए हैं। गधे की तरह देश की जिम्मेवारियों का बोझ उठाने का मौका मिलने को वे अपना सौभाग्य मानते हैं और पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक की जिम्मेवारी उठाने के लिये लगातार प्रयत्नशील दिखाई पड़ते हैं। अब भले ही दिग्विजय सिंह लाख यह कहें कि मोदी बिल्कुल गधे की तरह काम कर रहे हैं, अथवा ‘रेनकोट’ को गाली बताने वाली कांग्रेस भी औपचारिक तौर पर यह समझाए कि गधा शब्द किसी गाली का पर्याय नहीं है। लेकिन सदी के महानायक से गुजरात के गधों का प्रचार नहीं करने की अपील करके अखिलेश ने जिस गधा-गाथा के गायन-वाचन की शुरूआत कर दी है उसकी मारकता का दायरा लगातार बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। इस गधा-गाथा की गूंज गुजरात में भी सुनाई देने लगी है जहां पाटीदार आंदोलन के दम पर भाजपा की जड़ खोदने में जुटे हार्दिक पटेल ने प्रदेश के पाटीदारों का नेतृत्व करनेवाले 44 विधायकों को खुले तौर पर गधा करार दे दिया है। यानि गधा-गाथा के सियासी पारायण का श्रीगणेश अभी से गुजरात में भी हो गया है जहां इस साल के अंत में विधानसभा का चुनाव होना है। निश्चित तौर पर कांग्रेस द्वारा ऐसे दल के साथ गठबंधन किया जाना गुजरात के चुनाव में बड़ा मुद्दा बननेवाला है जिसने गुजरातियों को गधा बताया है। खैर, गुजरात के चुनाव में गधा-गाथा का कितना रंग जमेगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन उत्तर प्रदेश में तो इसका ऐसा चकाचक रंग दिख रहा है कि इसने जनहित के बाकी तमाम ज्वलंत मुद्दों को काफी पीछे छोड़ दिया है। आलम यह है कि तमाम सियासी पार्टियों की पूर्वनिर्धारित चुनावी रणनीति पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और यह चुनाव सिर्फ इस बात पर केन्द्रित हो गया है कि रोजाना थोक के भाव में उछाले जा रहे बेमानी मुद्दों को अपने साथ जोड़कर किस प्रकार जनता का सहयोग व सहानुभूति अर्जित किया जाये। इसमें किसी भी पार्टी की ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। सब पिले पड़े हैं एक दूसरे के पीछे। लेकिन बारीकी से निगाह डाली जाये तो विरोधियों को इस बेमानी बतकुच्चन की राह पर लाने का सेहरा तो मोदी-शाह की जोड़ी को ही जाता है। वर्ना सपा-कांग्रेस ने तो विकास के एजेंडे को ही आगे रखकर चुनाव अभियान की शुरूआत की थी। बसपा ने भी मायावती के पिछले कार्यकाल की याद दिलाते हुए सुदृढ़ कानून व्यवस्था देने का वादा किया था और यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया था कि अगली बार सरकार बनाने का मौका मिलने पर वे मूर्ति-स्मारक बनवाने की पिछली गलतियां हर्गिज नहीं दोहराएंगी। लेकिन अगर इस एजेंडे पर ही चुनाव केन्द्रित रहता तो भाजपा के लिये अपनी जगह बनाना बेहद मुश्किल था। पूरी लड़ाई बुआ-भतीजा के बीच ही सिमट कर रह जाती। भाजपा को तो कोई टके के भाव भी नहीं पूछता। लिहाजा अपनी जगह बनाने के लिये आवश्यक था कि विरोधियों को उन मसलों से डिगाया जाये जिसका संतुलन साधकर वे सत्ता में वापसी की कोशिशें कर रहे हैं। यही वजह रही कि शाह और मोदी की जोड़ी ने विरोधियों के मुद्दों को केन्द्र बनाकर ही उन्हें घेरा। जिस विकास को मुद्दा बनाया गया था उसकी असमानता को उजागर करके उसका खोखलापन अनावरित किया गया। विकास की धारा का सिर्फ एक वर्ग विशेष के दरवाजे पर जाकर अटक जाने को तूल देते ही वह हो गया जिसकी भाजपा को जरूरत थी। विकास की बातें पीछे छूट गयीं और केन्द्र में आ गया श्मशान और कब्रिस्तान का मुद्दा, सरकारी नियुक्ति में वर्ग विशेष को मिल रही तरजीह का मामला और सर्वसमाज की बेकदरी का मसला। जाहिर है कि जिस विकास की तस्वीर दिखाकर सत्ता में वापसी की संभावनाएं टटोली जा रही हों उसका गुब्बारा इस कदर फूटेगा तो कोई भी अपना आपा खो सकता है। तभी तो बौखलाहट में अखिलेश ने ऐसी बात कह दी कि पूरी चुनावी चर्चा के केन्द्र में गधे आ गए हैं। लेकिन गधा-गाथा के पारायण में अपनी समस्याओं का निवारण तलाशने वालों को यह नहीं भूलना चाहिये कि गधा सिर्फ बेड़ा पार नहीं करता बल्कि दुलत्ती मारकर पार-घाट भी पहुंचा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

‘खता किसी और की, सजा किसी और को’

‘खता किसी और की, सजा किसी और को’

पुरानी कहावत है कि ‘खेत खाय गधा और मार खाए जुलाहा।’ यह बात सियासत में जितनी सटीकता से लागू होती है उतनी अन्य क्षेत्रों में लागू नहीं होती। यानि सियासत में सिर्फ अपनी ही गलतियों का खामियाजा नहीं भुगतना पड़ता। कई बार ऐसे मामले भी सिरदर्दी का सबब बन जाते हैं  जिस खता को अंजाम देने के बारे में कभी सोचा भी ना गया हो। यही हुआ था बिहार विधानसभा के चुनाव में। कहां तो भाजपा ने ही आनुपातिक तौर पर सबसे अधिक दलित, पिछड़े व आदिवासी समाज के नेताओं को प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और मंत्री बनने का मौका दिया। देश में आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने के लिये कमंडल से पहले मंडल की लड़ाई में पुरजोर हिस्सेदारी की और ‘एकात्म मानव दर्शन’ व ‘अंत्योदय’ सरीखे सिद्धांतों को सियासत का आधार बनाया। लेकिन आरक्षण की स्थापित अवधारणा पर पुनर्विचार की जरूरत बताकर आरएसएस प्रमुख ने ऐसी गलती कर दी जिसका भाजपा को इतना जबर्दस्त खामियाजा भुगतना पड़ा कि उसे याद करके भाजपाई रणनीतिकार आज भी सिहर उठते हैं। बिहार चुनाव के ऐन पहले संघ प्रमुख की जुबान से निकली उस बात को विरोधी महागठबंधन ने इस कदर जमकर भुनाया कि भाजपा का पूरी तरह भट्ठा ही बैठ गया। जबकि हकीकत तो यह है कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू कराने की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभानेवाली भाजपा की केन्द्र या प्रदेशों की किसी सरकार ने आरक्षण व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ करने के बारे में कभी सोचना भी गवारा नहीं किया है। लेकिन बात चुंकि पार्टी की मातृ-संस्था कहे जानेवाले संघ के मुखिया ने कही थी तो इसे इस रूप में प्रचारित किया गया मानो भाजपा की सरकार बनते ही आरक्षण व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाएगा। जाहिर है कि संघ की उस गलती का भाजपा को खामियाजा तो भुगतना ही था। लेकिन मजाल है कि एक बार की गलती से संघियों ने कोई सीख ली हो। तभी तो मौजूदा पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले भी संघ परिवार के शीर्ष विचारकों में शुमार होनेवाले मनमोहन वैद्य ने उन्हीं बातों को दोहरा दिया जिसे बयां करके संघ प्रमुख बिहार चुनाव में पहले ही भाजपा का बंटाधार कर चुके हैं। हालांकि वैद्य के बयान की मारक क्षमता को देखते हुए ना सिर्फ संघ की ओर से औपचारिक तौर पर इसका खंडन किया गया बल्कि भाजपा ने भी उनके बयान से तत्काल ही दूरी बना ली और जल्दी ही वैद्य को भी सफाई देने के लिये सामने आना पड़ा। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने वैद्य के इन विचारों को संघ-भाजपा की अंदरूनी सोच साबित करने में रात-दिन एक कर दिया। अब इसका असर भी दिखने लगा है क्योंकि यूपी में जिस बसपा को सभी ने समाप्त मानना शुरू कर दिया था उसने अगर सत्ता के संघर्ष को त्रिकोणीय स्वरूप दे दिया है तो निश्चित तौर पर इसमें वैद्य के विचारों की भूमिका को कतई सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। हालांकि भाजपा को दूसरों की गलती का खामियाजा सिर्फ यूपी में ही नहीं भुगतना पड़ रहा है बल्कि इससे कहीं अधिक मार उसे पंजाब और उत्तराखंड में झेलनी पड़ रही है जहां उसने ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ा हुआ है जिनकी करनी का फल उसे ही भुगतना पड़ रहा है। पंजाब की बात करें तो वहां की सत्ता में भाजपा की भूमिका तो सिर्फ छोटे सहयोगी की ही थी। लेकिन अकालियों की करतूतों के कारण ऐसी भद पिटी है कि इस दफा राजग को तीसरे स्थान पर रहना पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। जाहिर है कि इसकी सबसे अधिक बदनामी केन्द्र की मोदी सरकार के अलावा भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को ही झेलनी पड़ेगी। कोई यह तो कहेगा नहीं कि अकालियों की सरकार गिर गयी। हर कोई इसे इसी रूप में प्रचारित करेगा कि भाजपा की पकड़ से पंजाब भी निकल गया। इसी प्रकार उत्तराखंड में आज अगर भाजपा को कांग्रेस की कथित ‘वन मैन आर्मी’ से कड़ी टक्कर झेलनी पड़ी है तो इसकी इकलौती वजह है कांग्रेस के उन सूरमाओं को संगठन में शामिल करना जिन्होंने लंबे अर्से तक कांग्रेस में रहकर ऐसे-ऐसे कारनामों को अंजाम दिया कि सूबे की जनता उन्हें कतई माफ करने के मूड में नहीं दिख रही है। खास तौर से जिस केदारनाथ आपदा के मामले को लेकर भाजपा ने प्रदेश की रावत सरकार का घेराव करने की रणनीति अपनाई थी उसके असली कर्ता-धर्ता तो वे माने जाते हैं जो उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और अब पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो गये हैं। हालांकि भाजपा ने उन्हें टिकट देने से तो परहेज बरत लिया लेकिन उनके बेटे को टिकट से वंचित करना संभव नहीं हो सका। इसके अलावा कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने जाने के बाद साढ़े चार साल तक सत्ता की मलाई का लुत्फ उठानेवाले एक दर्जन से भी अधिक विधायक इस दफा भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में दिखाई पड़ रहे हैं। इसीका नतीजा है कि वहां भाजपा से उन सवालों का भी जवाब मांगा जा रहा है जिस गुनाह से उसका दूर का भी वास्ता नहीं है। खैर, इस तरह के मामलों को समग्रता में देखने से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि एक बार के लिये दुश्मन की गलतियों का फायदा उठाने में भूल करके भी जीत उम्मीद की जा सकती है लेकिन हिमायतियों की गलतियों का खमियाजा भुगतने से बच पाना तो नामुमकिन ही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

‘पराई चुपड़ी पर टिकी ललचाई निगाहें’

‘पराई चुपड़ी पर टिकी ललचाई निगाहें’

बेशक बाबा फरीद कह गये हों कि ‘रूखी सूखी खाय के ठंडा पानी पी, देख पराई चुपड़ी ना ललचावे जी।’ लेकिन कोई माने तब ना। आज कल चिराग लेकर ढ़ूढ़ने से भी ऐसा कोई नहीं मिलता जो अपनी चुपड़ी से संतुष्ट हो। ऐसे में रूखी-सूखी से संतुष्ट हो जानेवाले को कौन तलाशे, क्यों तलाशे? आलम यह है कि सबकी निगाहें दूसरों की थाली पर ही टिकी हैं। जिनकी थाली में पहले से ही चुपड़ी पड़ी है वह भी दूसरों को रूखी-सूखी हजम नहीं होने देना चाहते और जिनके हिस्से में रूखी-सूखी आई है वे दूसरों की चुपड़ी में मिट्टी डालने की कोशिश कर रहे हैं। अपनी थाली से अधिक चिंता लोगों को पराई थाली की सता रही है। अपना खाना खराब हो तो हो, मगर दूसरे का जायका पहले बिगाड़ने में सभी जुटे हुए हैं। इसी का नतीजा है कि सबकी अपनी थाली लगातार बिगड़ती जा रही है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अपनी थाली बचाने के बजाय दूसरे की थाली का समीकरण समझने और उसके मुताबिक अपने मुनाफे का गुणा-भाग करने में ही सभी मशगूल दिख रहे हैं। इस उठापटक और खुराफाती खुरपेंच ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को बेहद दिलचस्प मोड़ पर ला दिया है। इन पांच चुनावी राज्यों में से दो में कांग्रेस, दो में राजग और एक में सपा की सरकार है। लिहाजा असली मुकाबला भले ही इन दलों के बीच ही दिख रहा हो लेकिन इन तीनों में ही अपनी थाली बचाने से ज्यादा दूसरे का जायका बिगाड़ने की ऐसी होड़ मची है कि अब तीसरी थाली पर ललचाई नजरें गड़ाने के अलावा इसके पास दूसरा कोई विकल्प ही बचा है। मिसाल के तौर पर यूपी की ही बात करें तो अपने परंपरागत वोटबैंक की चिंता में कोई दुबला नहीं हो रहा। सबको चिंता सता रही है उन वोटों की जो उन्हें किसी सूरत में हासिल नहीं हो सकती। तीसरी थाली के उन पकवानों की महक ने सबको मदहोश किया हुआ है और सबको उम्मीद है कि अगर तीसरी थाली थोड़ी सी वजनदार निकल आये तो उनका खाना खराब होने से बच जायेगा। भाजपा का पूरा समीकरण अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे और बहुसंख्यकों के ध्रुवीकरण पर टिका है जबकि सायकिल की हैंडिल पकड़ने का हाथ को मौका दिए जाने के पीछे अल्पसंख्यकों को एकजुट करने के अलावा सवर्ण वोटबैंक में सेंध लगाने की सोच ही छिपी हुई है। लेकिन एक तरफ भाजपा की रणनीति में ऐसा पेंच फंसा है कि ना तो किसी एक पक्ष में अल्पसंख्यकों की एकजुटता उसे अपने लिये फायदेमंद दिख रही है और ना ही ऐसा हुए बगैर बहुसंख्यकों का प्रतिक्रियात्मक ध्रुवीकरण होना संभव हो पा रहा है। लिहाजा उसकी थाली का जायका अब बसपा के समीकरण पर आधारित हो गया है। अगर बसपा ने अल्पसंख्यकों में ठीक-ठाक सेंध लगा ली तो ठीक वर्ना अगले पांच साल फिर हारे को हरिनाम का ही सहारा रहेगा। दूसरी ओर सपा भी सिर्फ अपने परंपरागत वोटबैंक के सहारे चुनावी नैया पार कर पाती तो हाथ का सहारा ही क्यों लेती? उसे बेहतर पता है कि रात में राहें रौशन करने के लिये सिर्फ चांद के भरोसे नहीं रहा जा सकता। लेकिन अपनी रौशनी उसे तभी राहें दिखा सकती हैं जब भाजपा के टाॅर्च की रौशनी को आंखों पर पड़ने से रोका जाये। वर्ना आंखें चुंधिया गईं तो दिन में भी दिखना मुश्किल हो सकता है। लिहाजा उसका जायका तभी सुधर सकता है जब भाजपा की थाली में बसपा का हाथी, सूंढ़ से धूल डालने में कामयाब हो सके। यानि सबका समीकरण दूसरों का खेल बिगड़ने पर ही आधारित दिख रहा है। लेकिन अपने दम पर दूसरे का खेल बिगाड़कर अपना खेल बनाने की हैसियत में कोई नहीं है। सबको तीसरे पक्ष से मजबूत हस्तक्षेप की दरकार है। यही हाल पंजाब और गोवा का भी है जहां तीसरी ताकत की निर्णायक भूमिका पर सभी ललचाई निगाहें गड़ाए हुए हैं। इन दोनों ही सूबों में आप उसी भूमिका में है जो यूपी में बसपा की है। यानि आप का प्रदर्शन ठीक-ठाक रहे तो ही अकाली-भाजपा की आस को आधार मिल पाएगा। हालांकि दोनों सूबों में मतदान समाप्त हो चुका है लेकिन अभी सीना ठोंककर कोई यह दावा नहीं कर सकता है कि वह अपने दम पर बहुमत की बाधा को पार करने वाला है अथवा उसने विरोधी पक्ष को किस स्तर पर पटखनी देने में कामयाबी पाई है। इसकी वजह भी साफ है कि अपनी थाली को सजाने-संवारने के बजाय सभी दूसरों का जायका बिगाड़ने में ही जुटे थे ऐसे में तीसरे की थाली से अपनी बिगड़ी की भरपाई करने के अलावा किसी के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। हालांकि मणिपुर और उत्तराखंड में सतही तौर पर स्थिति थोड़ी अलग अवश्य दिख रही है लेकिन गहराई से परखने पर वहां भी तीसरी थाली के प्रदर्शन से ही विजेता का चयन हो पाने की तस्वीर दिख रही है। बेशक यह तीसरी थाली अलग से नहीं सजी है बल्कि दो थालियों में हुई बंदरबांट के नतीजे में ही तीसरे का सृजन हुआ है। लेकिन अब यह तीसरी थाली मुख्य दोनों थालियों की जीत-हार तय करने की स्थिति में आ गई है। खैर, किसी और की चुपड़ी पर बाकियों की ललचाई निगाहें कितनी ही मजबूती से क्यों ना गड़ी हों लेकिन इस संभावना को कतई खारिज नहीं किया जा सकता है एक-दूसरे की थाली में मिट्टी डालने वालों को आखिर में तीसरी थाली ही गच्चा दे जाए। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 
 @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

‘सियासत से संवेदना की बेमानी उम्मीद’

‘सियासत से संवेदना की बेमानी उम्मीद’


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिये भाजपा की केन्द्रीय चुनाव समिति द्वारा किये गये टिकट वितरण ने ऐसी आग लगाई है जिसकी चपेट में आकर सूबे के अधिकांश भाजपाईयों की उम्मीदें स्वाहा हो गयी हैं। कहां तो उम्मीद जताई जा रही थी कि जिन जमीनी नेताओं ने लोकसभा की 80 में से 72 सीटों पर कमल खिलाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी उन्हें पुरस्कार के तौर पर विधानसभा का टिकट अवश्य मिलेगा और कहां तो हालत यह हो गयी है कि सूबे के कई जनपदों की तमाम सीटों पर उन लोगों को टिकट दे दिया गया है जो ना सिर्फ दूसरे दलों से आये हैं बल्कि लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा की हार सुनिश्चित कराने के लिये उन्होंने एड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ था। बात चाहे बस्ती, हरदोई व उन्नांव की करें अथवा बाराबंकी, फैजाबाद व अम्बेडकर नगर जनपद की। सूबे के हर इलाके की तस्वीर कमोबेस एक सी ही है। यहां तक कि प्रदेश का हृदय क्षेत्र कहे जानेवाले लखनऊ में भी जब कुल नौ में से सात सीटें उन लोगों को दे दी जाती हों जिनका पूरा राजनीतिक जीवन ही भाजपा को कोसते-गरियाते गुजरा है तो फिर बाकी इलाकों का तो कहना ही क्या। हालांकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि इस दफा टिकट वितरण का इकलौता पैमाना उम्मीदवार की जीत दर्ज कराने की संभावना को ही बनाया गया है। जिस सीट पर जिसके जीत की संभावना सबसे मजबूत नजर आयी उसे टिकट दे दिया गया। इसमें यह नहीं देखा गया है कि टिकट का दावेदार वैचारिक व सैद्धांतिक तौर पर पार्टी के कितने करीब या दूर रहा है। यानि पार्टी को तो सिर्फ जीत से मतलब है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि टिकट वितरण में 40 फीसदी से भी अधिक सीटें बाहरी लोगों को देने के कारण किस कार्यकर्ता की भावना आहत हुई है या किसकी संवेदना को सदमा पहुंचा है। कुल मिलाकर संगठन ने तो अपनी राह तय कर ली है और लगे हाथों पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने यह ऐलान भी कर दिया है कि घोषित उम्मीदवारों की सूची में फेरबदल की अब कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन अब असली परेशानी तो उस कार्यकर्ता को झेलनी है जिसे जमीन पर संगठन की जीत सुनिश्चित कराने के लिये मतदाताओं मनाना, समझाना व रिझाना है। उसकी समझ में खुद ही नहीं आ रहा कि आखिर ऐसा कैसे हो गया कि जिस जमीन को उसने दशकों की मेहनत से जोता-सींचा और अपने खून-पसीने की खाद से उपजाऊ बनाया वहां जब फसल काटने की बारी आई तो यह अधिकार उन लोगों को मिल गया जिन्होंने फसल का बीज ही नष्ट करने की कसम खाई हुई थी। जिनके साथ जमीनी संग्राम करते हुए कार्यकर्ताओं ने कमल खिलाने की लड़ाई लड़ी अब उनके लिये ही वोट मांगने मतदाताओं के पास वे जाएं भी तो किस मूंह से। अब तक जिनका विरोध किया उनका अचानक जयकारा लगाने के लिये भी तो 56 ईंच का ही सीना चाहिये। जमीन पर गद्दा बिछाकर हवा में गुलाटियां मारना और बात है। लेकिन सख्त-सपाट जमीन पर अचानक सिर के बल चलने की कलाकारी तो बिरलों को ही आती है। ऐसे में स्वाभाविक है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के फैसलों का विरोध तो होगा ही। वह हो भी रहा है। लखनऊ से लेकर इलाहाबाद तक और बनारस से लेकर दिल्ली तक। कार्यकर्ताओं की टोली कहीं भी अपने बड़े नेताओं के विरोध का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। लेकिन सवाल है कि सियासत से संवेदना की उम्मीद टूटने के कारण मुखर हो रहे इस विरोध के प्रति कितनी संवेदना दिखाई जाये। क्यों दिखाई जाये? सिर्फ इसलिये क्योंकि भाजपा ने कार्यकर्ताओं की संवेदना से ज्यादा जीत की संभावना को तरजीह दी है। यहां विचारणीय है कि सत्ता के बिना सिर्फ सूखी संवेदना के दम पर संगठन से कार्यकर्ताओं को क्या हासिल हो सकता है? संगठन अगर सत्ता में आने के बाद कार्यकर्ताओं की अनदेखी करे और अपने हिस्से की मलाई विरोधियों को मुहैया कराये तो इसका विरोध किया जाना चाहिये। लेकिन ऐसा होने का ना तो कोई कारण दिख रहा है और ना ही कोई परंपरा रही है। बल्कि पार्टी की जीत में ही कार्यकर्ताओं का हित निहित रहता है। इस बात को जो कार्यकर्ता नही समझना चाहे उसका तो भगवान भी भला नहीं कर सकते। भलाई इसी में है कि विरोधी को भी अपना बनाया जाये। इसमें तो किसी का भला नहीं है कि अपनों का ही विरोध किया जाये। जिसे पार्टी ने टिकट दिया है उसकी भी अब जिम्मेवारी है कि वह जमीनी कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझे और उनके साथ तालमेल बनाकर आगे बढ़े। साथ ही कार्यकर्ताओं की भी जिम्मेवारी है कि वे पार्टी द्वारा पेश किये गये प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित कराने में अपनी पूरी ताकत झोंक दें। वैसे भी सेना में किसे किस मोर्चे पर लगाया गया है यह बात मायने नहीं रखती। मायना होता है सेना की जीत का। जीती हुई राम की सेना का यथासंभव सहयोग करनेवाली गिलहरी से लेकर लंगूर-वानरों को भी आज तक स्नेह व सम्मान हासिल होता आ रहा है। वैसे भी जब भगवान कहे जानेवाले श्रीराम को भी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिये विरोधी पक्ष के विभिषण को अपने साथ जोड़ना पड़ा था तब आज की सियासत में अगर विरोधी खेमे टूटकर आने वालों को हर जगह सिर-आंखों पर बिठाया जा रहा है तो इसमें गलत ही क्या है? ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 23 जनवरी 2017

‘अब सियासत में राय बुजुर्गों से नहीं ली जाती’

‘अब सियासत में राय बुजुर्गों से नहीं ली जाती’


जवानी के दिनों में मुनव्वर राणा साहब ने भी यही लिखा था कि ‘इश्क में राय बुजुर्गों से नहीं ली जाती, आग बुझते हुए चूल्हों से नहीं ली जाती, इतना मोहताज न कर चश्मे-बसीरत मुझको, रोज इम्दाद चरागों से नहीं ली जाती।’ लिहाजा अगर आज के दौर में बुजुर्गों को हाशिए पर भी जगह मिलनी मुश्किल होती जा रही है तो इसके लिये उबलते जोशो-खूं वाली पीढ़ी को ही तो इकलौता दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कहीं ना कहीं गलतियां तो कई मोर्चों पर हुई हैं जिसका परिणाम इस संवेदनहीनता के तौर पर सामने आ रहा है। वर्ना सनातन सत्य की तरह समाज के हर तबके के बुजुर्गों की हालत एक जैसी कतई नहीं होती। लेकिन बुजुर्गों को अगर सबसे अधिक उपेक्षा किसी एक क्षेत्र में झेलनी पड़ रही है तो वह सियासत ही है। सियासत में तो बजुर्गों को इस लायक भी नहीं समझा जाता कि वक्त-बेवक्त उनकी खोज-खबर ले ली जाये। अगर हालचाल जानने की पहल भी की जाती है तो बकायदा मीडिया का काफिला साथ लेकर ताकि यह संदेश दिया जा सके कि बुजुर्गों का कितना ध्यान रखा जा रहा है। यानि खाट पर पड़े अंतिम घड़ियां गिन रहे बुजुर्ग का भी अपनी सियासत चमकाने के लिये तो इस्तेमाल किया जाता है लेकिन उनके चेहरे की चमक बढ़ाने का प्रयास करना किसी को गवारा नहीं होता। और इस मामले में हर सियासी दल का रिकार्ड काफी हद तक एक जैसा ही है। मिसाल के तौर पर जार्ज फर्नांडीज, अटल बिहारी वाजपेयी, जसवंत सिंह, जगन्नाथ मिश्र, वीएस अच्युतानंदन, कैलाश जोशी और प्रियरंजन दासमुंशी सरीखे जिन नेताओं की भारतीय राजनीति में कभी तूती बोलती थी वे आज कहां और किस हाल में हैं इसकी सुध लेना भी गवारा नहीं किया जा रहा है। खैर, ये तो ऐसे नाम हैं जिनके चाहनेवालों को सिर्फ इतने से ही सुकून मिल रहा है कि ये जीवित हैं और इनकी सांसें चल रही हैं। वर्ना अब ये लोग इस स्थिति में बचे ही नहीं हैं कि दोबारा अपने पैरों पर खड़े होकर सत्ता के गलियारों में चहलकदमी भी कर सकें। लेकिन सियासत ने तो उनको भी किनारे लगाने से गुरेज नहीं किया है जो ना सिर्फ स्वस्थ और सक्षम हैं बल्कि आज भी उनकी जुबान से फिसली हुई बातें मीडिया की सुर्खियों में छा जाने की क्षमता रखती है। इनके साथ ऐसा बर्ताव हो रहा है मानो इनका सक्षम होना ही बाकियों के लिये सिरदर्दी हो। तभी तो कभी लालकृष्ण आडवाणी को सार्वजनिक तौर पर अपने दर्द का इजहार करते हुए यह गुहार लगाने के लिये मजबूर होना पड़ता है कि मौजूदा माहौल को बर्दाश्त करने से बेहतर है कि संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया जाये। कभी मुलायम सिंह यादव को भावुक होकर यह अपील करनी पड़ती है कि उनके हाथ से सपा की बागडोर ना छीनी जाये। यहां तक कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके कद्दावर कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी को अगर उम्र के दसवें दशक में धुर विरोधी भाजपा के करीब जाने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है तो निश्चित तौर पर इसके पीछे कहीं ना कहीं उस उपेक्षा का ही दंश है जो उन्हें संगठन के भीतर झेलना पड़ रहा है। हालांकि अपनों से मिला दर्द तो ऐसा ही होता है जिसे चुपचाप सहने के अलावा दूसरा कोई विकल्प ही नहीं होता। तभी तो मार्गदर्शक के नाम पर मूकदर्शक बना दिये गये आडवाणी व डाॅ जोशी सरीखे नेताओं ने अब तक इस बात की भी शिकायत नहीं की है कि ढ़ाई साल पहले गठित किये गये मार्गदर्शक मंडल की आज तक एक भी औपचारिक बैठक क्यों नहीं बुलाई गई है। लेकिन तिवारी सरीखे जुझारू नेता की जिजिविषा को सलाम करना होगा कि आज भी वे अपनी बात जुबानी तौर पर कहने के बजाय ऐसा कुछ करके दिखा देते हैं कि बिना कहे ही उनकी बात से खलबली मच जाती है। तभी तो तिवारी का अमित शाह के निवास पर जाना ही ही इतनी बड़ी खबर बन गया कि उस पर औपचारिक तौर पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिये कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को भी मजबूर होना पड़ा। लेकिन तिवारी ने अपनी जुबान से फिर भी कुछ नहीं कहा। अलबत्ता उनकी संगठन में हो रही उपेक्षा को बयां किया उनके उस पुत्र ने जिसका भविष्य संवारने के लिये वे शाह के घर की चैखट पर पहुंचे थे। बताया गया कि जो तिवारी किसी समय यूपी व उत्तराखंड की सियासी धुरी हुआ करते थे, उन्हें आज की पीढी के नेता मांगने पर भी मिलने का वक्त देना गवारा नहीं कर रहे हैं। जाहिर है कि ऐसी फजीहत झेलने के बाद अगर तिवारी सरीखे नेता को संगठन का दामन छोड़ने के लिये विवश होना पड़ता है तो यह उनकी या उनके उम्र की तौहीन नहीं है बल्कि यह परिचायक है उस नैतिक स्खलन का जिसका मुजाहिरा इन दिनों हर तरफ खुलेआम किया जा रहा है। लेकिन बुजुर्गों के साथ ऐसा उपेक्षापूर्ण व्यवहार करनेवाले शायद यह भूल रहे हैं कि कल को उन्हें भी इस उम्र में आना है और तब उनके साथ ऐसा व्यवहार होगा तो वे कैसे इसे झेल पाएंगे। लिहाजा बलिया जनपद स्थित छब्बी गांव निवासी ओमप्रकाश यती के लिखे शेर में कुछ हेर-फेर करके आज यह याद रखने की जरूरत है कि ‘ये जंगल कट गये तो किसके साए में गुजर होगी, हमेशा इन बुजुर्गों को अपने साथ रहने दो।’ ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

बुधवार, 11 जनवरी 2017

कोई यूं बेवफा नहीं होता....

‘कुछ तो मजबूरियां होंगी मेरे सरकार की’

‘कुछ मिट्टी की और कुछ कुम्हार की, कुछ तो मजबूरियां होंगी मेरे सरकार की।’ वाकई, ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, कोई यूं बेवफा नहीं होता।’ बेवफाई भी ऐसी अव्वल दर्जे की कि जिस बीज को खुद ही बोया, उगाया, सींचा और मौसम की मार व दुश्मनों के वार बचाते हुए फर्श से उठाकर अर्श की बुलंदी पर ला खड़ा किया, उसका ही समूल नाश करने पर आमादा हो जाया जाये। कायदे से तो उस पेड़ की घनी छांव में अपने बुढ़ापे की अंतिम घड़ियां शांति व सुकून के साथ गुजारने की इच्छा होनी चाहिये थी और कहां बूढ़ापे की थकी-मांदी हड्डियां लहराते हुए कुल्हाड़ी हाथ में लेकर हरे-भरे फलदार पेड़ को जमींदोज करने की कोशिशें की जा रही हैं। यह भी नहीं सोचा जा रहा कि अगर यह पेड़ नष्ट हो गया तो अंतिम वक्त में किसका सहारा बचेगा। हालांकि जिन लोगों को ना तो किसान के हितों की कोई परवाह है और ना ही पेड़ की बुलंदी से कोई फायदा मिलने की उम्मीद है, वे तो चाहेंगे ही कि किसान को समझा-बुझाकर उसके ही हाथों उसका पेड़ कटवा दिया जाये, ताकि कुछ नहीं तो लकड़ी का तमगा ही हासिल हो। लेकिन पता नहीं किसान की अक्ल पर कैसा पत्थर पड़ गया है कि जिस पेड़ को मौजूदा बुलंदी देने में उसने अपनी पूरी उम्र खपा दी, अब उसे ही जड़ से उखाड़ने की हर मुमकिन कोशिशों में जुटा दिख रहा है। निश्चित तौर पर ऐसा कदम उठानेवाला किसान या तो अपने भले-बुरे की चिंता छोड़कर सिर्फ वर्तमान की समस्या सुलझा लेना चाहता है या फिर वह चाहकर भी अपने मन की बात पर अमल नहीं कर पा रहा है। अपने महाजन की मनमानी बर्दाश्त, स्वीकार व अंगीकार करना उसकी मजबूरी बन चुकी है। उनकी बतायी राह पर चलने के अलावा उसके पास दूसरा विकल्प ही नहीं है। वर्ना वह ऐसा हर्गिज नहीं कहता कि पेड़ से उसे कोई परेशानी नहीं है बल्कि पेड़ से लिपटी हुई उस बेल ने उसे दुखी किया हुआ है जिससे खुद को अलग करने के लिये पेड़ कतई तैयार नहीं है। दूसरी ओर पेड़ भी यह बताने से नहीं हिचक रहा है कि उसका पालक-संरक्षक इन दिनों बड़ी साजिश का शिकार हो गया है और उसका महाजन उससे ऐसे काम करवाना चाहता है जिसका नुकसान पेड़ और किसान दोनों को उठाना पड़ेगा। इसी वजह से पेड़ ने भी अपने सुरक्षा कवच को मजबूती से कस लिया है ताकि किसान के कांधे पर रखे महाजन की कुल्हाड़ी से अपनी हिफाजत कर सके। आलम यह है कि किसान और पेड़ भले ही आमने-सामने दिख रहे हों लेकिन इनके बीच इस लड़ाई की कोई बड़ी वजह दिखाई नहीं पड़ रही है। वैसे भी किसान ने पूरी जिन्दगी जिस पेड़ को सींच-पाल कर बड़ा किया वह अब अपने दम पर किसान को बुढ़ापे में शांति-सुकून की छांव ही नहीं बल्कि अपने द्वारा उपार्जित मीठा फल भी ताउम्र खिलाने में कतई कोताही नहीं बरत सकता है। तुलनात्मक तौर पर भी देखा जाये तो इस किसान के मुकाबले काफी अधिक संसाधन संपन्न व सिंचित-उपजाऊ जमीन के मालिकों का बोया बीज ऐसा बिगड़ा कि वह ना तो छांव दे पाने के काबिल बन सका और ना ही फल दे पाने के। ऐसे में ऊसर-बंजर जमीन पर सीमित संसाधनों के बूते पर बोया गया बीज अगर व्यापक छायादार और फलदार हो गया है तो किसान के लिये यह भी कम बड़े गर्व की बात नहीं है। इसके बावजूद किसान है कि महाजन के चंगुल में फंसकर पेड़ को ही काटने पर आमादा है। दूसरी तरफ पेड़ भी उस बेल का मोह छोड़ने के लिये तैयार नहीं है जो उससे लिपटकर अपना अस्तित्व कायम रखते हुए उसे यह भरोसा दिलाने की हर-मुमकिन कोशिशों में है कि अगर कटने की नौबत आयी तो पहला वार उस पर होगा उसके बाद ही कुल्हाड़ी की धार पेड़ को छू पाएगी। यानि इतना तो स्पष्ट है कि किसान संचालित हो रहा है महाजन से और पेड़ को उम्मीदें हैं खुद से लिपटी बेल से। ऐसे में सवाल है कि आखिर किसान की ऐसी कौन सी मजबूरी है कि वह सब-कुछ जानते व समझते हुए भी महाजन से अपना पीछा नहीं छुड़ा पा रहा है। अगर समस्या सिर्फ बेल से होती और महाजन की इसमें कोई भूमिका नहीं होती तो पेड़ ने किसान के एक इशारे पर ही उस बेल से खुद को अलग कर लिया होता जिसे पेड़ और किसान के आपसी रिश्ते में बाधक बताने की कोशिश हो रही है। लेकिन पेड़ को लग रहा है कि बेल का तो बहाना है, वास्तव में वह ही महाजन का निशाना है। ऐसे में वह क्यों उस बेल को खुद से अलग करे जो कुल्हाड़ी का पहला वार खुद पर झेलने के लिये पहले से ही तैयार है। यानि पेड़ की नजर से देखें तो उसकी जान का ग्राहक किसान नहीं है, बल्कि उसके महाजन हैं। जबकि किसान का नजरिया पेड़ से लिपटी बेल के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त दिख रहा है। लिहाजा बेहतर यही होगा कि पेड़ व किसान एक हो जाएं और पेड़ खुद को बेल से व किसान खुद को अपने महाजन से अलग कर ले। साहिर लुधियानवी ने कहा भी है कि ‘तार्रूफ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर, ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा, वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।’ ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

‘सुलगती आंखों से छलकती नमी का निहितार्थ’

‘सुलगती आंखों से छलकती नमी का निहितार्थ’


सवाल है कि ‘आग-पानी के बीच छत्तीस का आंकड़ा है अगर, तो सुलगती आंखों में यह नमी क्यों है? कायदे से सुलगती आंखों से तो क्रोध और नफरत की चिंगारियां फूटनी चाहिये। सुर्ख निगाहों से लहू टपकना चाहिये। लेकिन हो रही है नमी की बरसात। वह भी जार-जार, लगातार। लिहाजा एक ही तस्वीर के इन विपरीत आयामों के बीच तालमेल बिठाना किसी के लिये भी दुश्वार हो सकता है। लेकिन मसला है कि दिल की बात अगर जुबां पर आ गयी तो उसका असर आत्मघाती भी हो सकता है। लिहाजा राजनीति में आग और पानी के बीच संतुलन बनाना आवश्यक भी है और मजबूरी भी। तभी तो इन दिनों देश के सियासी माहौल में दूध की धार तो नजर आ रही है लेकिन उसमें छिपा असली घी मौजूद होने के बावजूद विलुप्त है। बिल्कुल त्रिवेणी संगम की सरस्वती बन गयी वास्तविक सच्चाई। जबकि सच तो यह है कि सरस्वती की मौजूदगी ने ही तो संगम को त्रिवेणी का उच्चपद दिया है। लेकिन मसला है कि सरस्वती की मौजूदगी को सतह पर तलाशने के बजाय अक्सर गहराई में खोदाई शुरू कर दी जाती है। जबकि कायदे से त्रिवेणी के जल में से अगर किसी तकनीक के द्वारा गंगा-यमुना के अंश को अलग, विलग व पृथक कर दिया जाये तो शेष नीर निश्चित तौर पर सरस्वती का ही होगा। इसी प्रकार सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच मौजूद जनपक्ष को भी तभी समझा जा सकता है जब इन दोनों से अलग हटकर उसे देखने व तलाशने की कोशिश की जाये। इस लिहाजा से देखा जाये तो इन दिनों वास्तविक जनपक्ष पूरी तरह ओझल, गायब व नदारद दिख रहा है। हालांकि सत्तापक्ष और विपक्ष के द्वारा अपने नजरिये से जनपक्ष की मौजूदगी को दर्शाने की भरसक कोशिश हो रही है लेकिन इन दोनों पक्षों द्वारा जनपक्ष की जो तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है वह वास्तविकता से पूरी तरह अलग है। मसलन सरकार बता रही है कि नोटबंदी जनहित के लिये की गयी है जबकि विपक्ष का आरोप है कि नोटबंदी की आड़ में जनहित पर डाका डाला गया है और यह अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है। यानि एक ही काम के दो विपरीत कारण और परिणाम बताये जा रहे हैं। जबकि तीसरा वास्तविक जनपक्ष यह है कि पहले भी जनता ही परेशान थी और आज भी आवाम ही हलकान है। कतार में चोरों को दिखना चाहिये था लेकिन दिख रहे आम लोग। उस पर तुर्रा यह कि नकदी की कोई कमी नहीं है। लेकिन इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि अगर कमी नहीं है तो पर्याप्त मात्रा में मिल क्यों नहीं रही। खैर, नोटबंदी के बाद पनपी परेशानियां दूर होनी शुरू हो गयी हैं और मास-दो मास में समाप्त भी हो जाएंगी। लेकिन असली सवाल है कि नोटबंदी के मामले को लेकर जिस तरह की जंग छिड़ी हुई है उसमें आखिर सत्तापक्ष और विपक्ष ने जनपक्ष को क्यों हथियार बनाया हुआ है। अपनी बात क्यों नहीं कहते? क्यों नहीं बताते कि मोदी को महानता की दरकार है इसलिये पूरी व्यवस्था की दही को मथकर मट्ठा छान रहे हैं और घी अलग कर रहे हैं। जबकि यह घी पहले भी सेहत तंदुरूस्त रखने के ही काम आ रहा था। वर्ना आठ साल पहले की व्यापक वैश्विक मंदी के दौर में सकारात्मक विकास दर बरकरार रहना कैसे मुमकिन हो सकता था। लेकिन अब तक वह घी अंदरूनी तौर पर घुला हुआ था। सतही तौर पर नदारद था। लिहाजा सतह पर उसकी चमक नहीं दिख रही थी। अब उसे अलग करके परोसने की कवायद चल रही है। ताकि उसके चमक-दमक से विश्व जगत को चकित-चमत्कृत किया जा सके। दूसरी ओर विपक्षियों में खुद को सबसे बड़ा मोदी विरोधी साबित करने की होड़ चल रही है ताकि देश के उस 68 फीसदी वोट को अपने पक्ष में एकजुट किया जा सके जिसने मोदी लहर के बावजूद 2014 में भाजपा को अस्वीकार कर दिया था। उस वोट की दिशाहीनता के कारण सामने आये पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजे को पलटने के लिये उसे दिशा देने की कोशिशों में राहुल गांधी से लेकर ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ही नहीं बल्कि नीतीश कुमार भी पिले हुए हैं। चाहे इसके लिये नोटबंदी का विरोध करना पड़े या फिर सेना की कार्यप्रणाली पर सियासत करनी पड़े, इनका इकलौता मकसद है खुद को मोदी के सबसे तगड़े विरोधी के तौर पर प्रस्तुत करना। तभी तो जनता मस्त है लेकिन ये लोग जनहित की दुहाई देने में व्यस्त हैं। मोदी का विरोध करने के क्रम में जो नहीं बोलना था वह भी बोला जा रहा है क्योंकि इन्हें पता है कि अब जो भी चुनाव होगा वह उनके कार्यकाल की कमियों, खामियों व गलतियों को सामने रखकर नहीं बल्कि मोदी सरकार के कामकाज को लेकर होगा। तभी तो कांग्रेसनीत संप्रग के कार्यकाल में ही अडाणी समूह पर 72,632 करोड़ और अनिल अंबानी पर 132 हजार करोड़ बाकी रहने और 2004-05 से लेकर 2012-13 के बीच विभिन्न कंपनियों का 36.5 लाख करोड़ का कारपोरेट कर्ज माफ किये जाने के बावजूद मोदी सरकार को ही अडाणी-अंबानी व कारपोरेट क्षेत्र का पैरोकार बताया जा रहा है। लेकिन अपनी बात कोई नहीं कर रहा। खैर, सच तो यह है कि गंगा-यमुना में कितना ही उफान क्यों ना आ जाये लेकिन सरस्वती सरीखे विशुद्ध जनपक्ष की अविरण-निर्मल धार ही त्रिवेणी का वास्तविक स्वरूप पहले भी तय करती आयी है और आगे भी करती रहेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

‘....मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना’

‘....मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना’


उल्टे-सीधे वायदे करके सियासी जमात के लोग तो हमेशा से ही आम लोगों को उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं। लेकिन शायद यह पहला मौका है जब जनता को अपने मायावी सम्मोहक जाल में उलझानेवाले इन दिनों खुद ही उलझन में हैं। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि करें तो क्या करें। किस दिशा में आगे बढ़ें। धारा के साथ बहें या उसके विपरीत दिशा में तैरने की कोशिश करें। किसी को कुछ पता नहीं चल रहा। सभी पूरी ताकत से हाथ-पांव मारते हुए बहे जा रहे हैं, चले जा रहे हैं। कभी धारा के साथ तो कभी धारा के विपरीत। कभी इस दिशा तो कभी उस दिशा। इस उलझन में इनकी बुद्धि इस कदर भ्रमित हो गयी है कि जापान जाने के लिये चीन की राह पकड़ ले रहे हैं। हालांकि मुल्क के सियासी रहनुमाओं की इस दिशाहीनता का सीधा खामियाजा देश के जन सामान्य को अवश्य भुगतना पड़ रहा है लेकिन सिर्फ जनता ही है जिसके चेहरे पर सही दिशा में आगे बढ़ने की खुशी स्पष्ट दिख रही है। वर्ना बाकी सभी पर गफलत ही हावी है। मतिभ्रम की स्थिति में सिर्फ सत्तापक्ष और विपक्ष ही नहीं बल्कि न्यायपालिका और कार्यपालिका भी दिख रही है। तभी तो जनहित याचिका दायर करने का रिकार्ड कायम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे अश्विनी उपाध्याय से न्यायपालिका तंज कसते हुए पूछ रही है कि क्या उन्होंने इस काम को ही अपना पेशा बना लिया है? भाई, वकील का तो काम ही है याचिका दाखिल करके इंसाफ की मांग करना। इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह क्यों और किसके लिये याचिका दाखिल कर रहा है। लेकिन अदालत को चुभ गयी तो चुभ गयी। अब अदालती टिप्पणी की आलोचना तो की नहीं जा सकती। लेकिन इससे यह तो समझा ही जा सकता है कि अदालतें किस मानसिक अवस्था से गुजर रही हैं। आलम यह है कि सरकार को सिर्फ सालाना बजट बनाने की ही स्वतंत्रता मिली हुई है वर्ना बाकी हर काम में उसे अदालत का अड़ंगा झेलना पड़ रहा है और उसे अदालती सम्मति से ही कोई भी काम करने की छूट हासिल है। लेकिन अब जबकि नोटबंदी के मसले पर भी अदालत ने सरकार का हाथ-पांव बांधने की दिशा में कदम आगे बढ़ा दिया है तब किसी को भी ऐसा लगना स्वाभाविक ही है कि अब शायद देश की अर्थव्यवस्था का मनमुताबिक संचालन करने की स्वतंत्रता भी सरकार के पास ज्यादा दिनों तक ना बचे। ऐसा ही हाल बैंकों का है जिसे सरकार ने हर बचतखाता धारक को सप्ताह में 24 हजार रूपया निकासी की सुविधा देने का निर्देश दिया हुआ है। लेकिन बैंक में कहां, किसको और कितनी रकम मिल पा रही है इससे सभी वाकिफ हैं। नोटबंदी के बाद बैंककर्मियों ने शायद खुद को खुदा के समकक्ष समझ लिया था वर्ना आज यह नौबत नहीं आती कि सत्ताधारी दल को उनके कामकाज के प्रति सार्वजनिक तौर पर अफसोस का इजहार करने के लिये मजबूर होना पड़े। निश्चित तौर पर इसे व्यवस्था का मतिभ्रम ही माना जाएगा जिसके चक्कर में पड़कर उसने आम लोगों को घनचक्कर बनाकर अपना चक्कर चलाने की गुस्ताखी की। यही हालत विपक्ष की भी दिख रही है जिसे ना आगे की राह सूझ रही है और ना ही पीछे का दरवाजा दिख रहा है। विपक्ष के मतिभ्रम का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस राज्यसभा में उसे बहुमत हासिल है वहां उसने नोटबंदी के मसले पर साधारण नियम के तहत चर्चा स्वीकार कर ली लेकिन जिस लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर दावा करने लायक आंकड़ा भी उसके पास उपलब्ध नहीं हैं वहां उसने मतदान की व्यवस्थावाले नियम के तहत बहस कराने की ऐसी जिद पकड़ी कि संसद का पूरा शीतसत्र हंगामें की भेंट चढ़ गया। कांग्रेस अंत तक यह तय नहीं कर पायी कि उसे संसद में क्यों और कैसी भूमिका अख्तियार करनी है। नतीजन सत्र गुजर जाने के बाद भी कोई कांग्रेसी नेता दो-टूक शब्दों में यह बताने की स्थिति में नहीं दिख रहा है कि शीतसत्र का अंजाम लाभदायक रहा अथवा नुकसानदायक। सरकार भी मतिभ्रम की ऐसी ही स्थिति से दो-चार होती दिख रही है। इसने एक झटके में ही नोटबंदी का फैसला तो ले लिया लेकिन इसे लागू करने की ठोस राह पर आगे बढ़ने में वह नाकाम रही। तभी तो दैनिक आधार पर नियमों का निर्धारण भी हुआ और निस्तारण भी। कोई एक दिशा तय ही नहीं हुई है। तभी तो मान्यता सूची में शामिल देश के सभी 1761 राजनीतिक दलों को अपने खाते में पुराने नोट जमा कराने की छूट दे दी गयी है। जाहिर है कि इस छूट का लाभ सभी सात राष्ट्रीय, 48 क्षेत्रीय और 1706 जाने-अंजाने दलों को मिलनेवाला है। वह भी तब जबकि राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा अंजाम दी जा रही कालेधन को सफेद करने की कारस्तानी का स्टिंग आॅपरेशन भी सामने आ चुका है। मतिभ्रम का आलम यह है कि एक तरफ नकदी के संकट ने बैंकिंग व्यवस्था की साख को सवालों में ला दिया है और दूसरी तरफ छोटी बचत योजनाओं पर नाम मात्र ब्याज की परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है। खैर, ऐसी तमाम घटनाओं को समग्रता में देखने से इतना तो पता चल ही रहा है कि सामान्य परिस्थितियों में तो सिर्फ आवाम ही दिग्भ्रमित होती है लेकिन वक्त की चुनौतियां निजाम को भी दिग्भ्रमित करने की पूरी क्षमता रखती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  
@ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur  

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

अब हवाएं ही करेंगी रौशनी का फैसला....

‘रहिमन विपदा हूं भली, जो थोरे दिन होय’ 

रहीम ने थोड़े दिनों के लिये आये उन कठिन व मुश्किल परिस्थितियों को इस लिहाज से बेहतर बताया है कि वे आती तो सीमित समय के लिये हैं लेकिन असीमित लोगों की भीड़ में शामिल दोस्तों और दुश्मनों की सटीक पहचान करा दे जाती है। वाकई विपदा के वक्त सिर्फ विरोधी ही अपना हिसाब चुकता करने का प्रयास नहीं करते बल्कि दोस्तों की भीड़ में शामिल दुश्मन भी अपना बदला लेने के लिये सक्रिय हो जाते हैं। फिलहाल ऐसी ही परिस्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी घिरते दिख रहे हैं जिसमें विरोधियों की चैतरफा घेरेबंदी के बीच अब उन अपनों ने भी उन पर प्रहार करने का जुगाड़ तलाशना शुरू कर दिया है जो अब तक उनके प्रभाव के सामने विरोध करने के मौके का अभाव झेल रहे थे। हालांकि जिन कठिन परिस्थितियों का मोदी को सामना करना है उसका वक्त भी उन्होंने ही मुकर्रर किया है, जमीन भी उन्होंने ही तैयार की है और वार के लिये हथियार का चयन भी उन्होंने ही किया है। लिहाजा अब जबकि जंग छिड़ने में सिर्फ पंद्रह दिन का वक्त बच गया है तब इसका सामना तो उन्हें करना ही होगा। वापसी का कोई रास्ता छोड़ना तो वैसे भी उनकी फितरत में नहीं है। लिहाजा टक्कर तो होगी। हिसाब तो मांगा ही जाएगा। आखिर पचास दिन में परिस्थितियां पूर्ववत कर देने का वायदा भी तो उन्होंने ही किया था। हर भारतीय के खाते में पंद्रह लाख रूपया आने की बात को भले ही चुनावी जुमला बताकर पल्ला झाड़ लिया गया हो। लेकिन इस दफा तो बचने की वह राह भी नहीं है क्योंकि पचास दिन में परिस्थितियां पूर्ववत करने की बात वे लगातार करते आ रहे हैं। उनके इस दावे ने ही सियासी टकराव की ऐसी जमीन तैयार कर दी है जिस पर खड़े होकर विरोधियों के हमले का सामना करने के अलावा अब उनके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा है। हालांकि लंबी-चैड़ी आंकड़ेबाजी में उलझने के बजाय सीधे-सादे शब्दों में समझा जाये तो नोटबंदी के कारण जितनी धनराशि को प्रचलन से बाहर किया गया था उसमें से तकरीबन दो-तिहाई बैंकों में जमा कराया जा चुका है और जितनी धनराशि से देश की पूरी अर्थव्यवस्था संचालित हो रही थी उसका आधा हिस्सा नये नोटों की शक्ल में लोगों को लौटाया जा चुका है। यानि पचास दिन में परिस्थितियां पूर्ववत करने के वायदे का आधा हिस्सा तो पूरा हो चुका है। लिहाजा प्रधानमंत्री की नजर से देखें तो ग्लास आधा भरा जा चुका है जबकि वायदा पूरा करने के लिये मांगे गये वक्त का दो-तिहाई हिस्सा गुजर जाने के बावजूद विरोधियों के नजरिये से ग्लास अभी तक आधा खाली ही है। दूसरी ओर जिस रफ्तार से काम चल रहा है उसे देखते हुए यह उम्मीद करना ही बेकार है कि अगले 15 दिनों में उतना काम पूरा कर लिया जाएगा जितना बीते 35 दिनों में किया जा चुका है। यानि मोदी की नजर और विरोधियों के नजरिये के बीच भीषण संघर्ष तो तय ही है। इसके लिये विरोधियों ने पूरी तैयारी भी कर रखी है। मोदी की वायदाखिलाफी के खिलाफ यूपी में चैतरफा चढ़ाई होनेवाली है तो बिहार में लालू के लाल भी कमाल कर दिखाने के लिये लालायित हैं। पश्चिम बंगाल में ममता के मुरीदों की टोली सड़क पर उतरेगी तो दिल्ली में आप के जनाबों की फौज पूरा हिसाब मांगेगी। कांग्रेस ने तो इसे अब तक का सबसे बड़ा घोटाला बताना अभी से शुरू कर दिया है। जाहिर है कि पचास दिन पूरा होने के बाद उसके विरोध का जलवा-जलाल देखने लायक होगा। इसके अलावा और भी कई छोटे मियां व बड़े मियां हैं जिनके तेवरों की तान पूरा आसमान सिर पर उठाने का अक्सर ऐलान करती रहती हैं। यानि समग्रता में देखें तो विरोधियों के हौसले पूरी तरह बुलंद हैं क्योंकि अब मामला सिर्फ नोटबंदी का नहीं है। बात उस बात की है जो बातों ही बातों में कह तो दी गयी है लेकिन उसके तय वक्त पर पूरा हो पाने की बात बनती नहीं दिख रही। हालांकि विरोधियों के एकजुट हमले का सामना मोदी पहले भी करते रहे हैं और इस बार भी कर ही लेंगे। लेकिन असली दर्द तो अपनों की ओर से दिये जाने की संभावना है जो मौके की ताक में पहले से ही बैठे हुए हैं। बताया जाता है कि ना सिर्फ मार्गदर्शकों का मंडल कुपित होकर कमंडल उठाने के लिये तैयार बैठा है बल्कि मौजूदा केबिनेट के उन रत्नों की लालिमा भी लगातार बढ़ती जा रही है जिन्हें लत्ते में लपेटकर किनारे लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी थी। यानि इम्तहान लेने की तैयारी में अपने भी हैं और बेगाने भी। इसमें बेगानों के लिये वक्त तो मोदी ने खुद ही मुकर्रर कर दिया है जबकि सगे-संबंधियों को संगठन की ओर से राष्ट्रीय कार्यकारिणी की शक्ल में मौका और मंच मुहैया कराया जा रहा है। बेगाने हिसाब मांगेंगे 28 से और अपनों को हिसाब देना होगा आठ को। दोनों के बीच फासला दस दिनों का रहेगा। लिहाजा इन दस दिनों के सीमित समय में ही अपने-परायों की पूरी पहचान हो जानी है। आक्रमण के पहले चरण की सफलता ही तय करेगी अंदरूनी हमले की आक्रामकता। टकराव आधा खाली बनाम आधा भरे का होना है जिसके बारे में फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि ‘अब हवाएं ही करेंगी रौशनी का फैसला, जिस दिये में जान होगी वह जला रह जायेगा।’ जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # NAVKANT THAKUR

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

'और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा '

और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा 


‘और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।’ लेकिन यह बात उस आशिक को कैसे समझायी जाये जिसने इश्क के जुनून की आग में जिस्म ही नहीं बल्कि रूह भी झोंक देने का इरादा कर लिया हो। जरूरी नहीं है कि इश्क सिर्फ किसी हाड़-मांस की महबूबा से ही हो। जुनूनी चाहत किसी और लक्ष्य को हासिल करने की भी हो सकती है। मिसाल के तौर पर इन दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से देश की अर्थव्यवस्था को साफ-सुथरा और सुदृढ़ बनाने के लिये जुनूनी तरीके से अपने जिस्मो-जां सहित रूह तक को झोंक दिया वह बेशक महबूब वतन से उनके बेइंतहा मोहब्बत को ही दर्शाता है। लेकिन इश्क की राह पर आगे बढ़ने के क्रम में जिस तरह से बाकी मसलों, तथ्यों व जरूरतों की अनदेखी की गई है उसे कैसे सही कहा जा सकता है। इन राहों पर बदइंतजामी की बदनामियों से जुड़ी कहानियां अगर लगातार जोर पकड़ती दिख रही हैं तो इसकी सबसे बड़ी वजह वह जुनूनी जिद ही है जिसको पूरा करने के जोश में अगर होश की डोर को भी पकड़े रहने की पहल की गयी होती तो आज तस्वीर दूसरी होती। लेकिन जिस तरह से पूरा देश अव्यवस्था व अस्त-व्यस्तता के दौर से गुजर रहा है उसकी बड़ी जिम्मेवारी तो मोदी साहब की बनती है। वे कैसे इस जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ सकते हैं कि उन्होंने परिणाम की परवाह किये बिना ही निश्चित को छोड़कर अनिश्चित की ओर कदम आगे बढ़ाने की कोशिश की है। मसलन ऐसे देश के लिये कैशलेस व्यवस्था को लागू करने का सपना देखना कैसे सही माना जा सकता है जहां की 26 फीसदी आबादी के लिये आज भी काला अक्षर भैंस बराबर ही है। इसका मतलब तो यही हुआ कि एक-चैथाई से भी अधिक तादादवाली निरक्षर आबादी के हितों की उन्हें कोई परवाह नहीं है। इसके अलावा इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिये था कि जिन 76 फीसदी लोगों तक शिक्षा का उजाला पहुंच चुका है उनमें कितनों की आर्थिक हैसियत ऐसी है कि वे हर महीने अपने मोबाइल में कम से कम 150 रूपये का डाटा पैक डलवा सकते हैं। क्योंकि इसके बिना तो ई-वाॅलेट की परिकल्पना साकार हो ही नहीं सकती। आज भी देश के अधिकांश इलाकों में 8 से 10 घंटे की बिजली कटौती होना बेहद ही सामान्य बात है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को इंटरनेट के प्लेटफाॅर्म से संचालित करने में आम लोगों को ही नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है इसकी शायद उन लोगों ने कल्पना भी नहीं की होगी जिन्होंने देश को कैशलेस व्यवस्था की ओर ले जाने की सलाह दी है। खैर, कैशलेस व्यवस्था का विचार तो अभी सैद्धांतिक तौर पर ही अपनाया गया है और माना जा सकता है कि नकदी की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने में पेश आ रही परेशानियों के तात्कालिक हल के तौर पर इस विचार को आगे बढ़ाया जा रहा है जिसका दूरगामी परिणाम बेहद ही लाभदायक साबित हो सकता है। लेकिन मसला है कि आखिर ऐसी मजबूरी और लाचारी की स्थिति पैदा ही क्यों होने दी गयी। आखिर इसकी जिम्मेवारी कौन लेगा? बिना किसी पूर्व तैयारी या इंतजाम के ही देश की अर्थव्यवस्था से 86 फीसदी नकदी को अचानक ही चलन से बाहर कर देने का फैसला भले ही कालाधन, भ्रष्टाचार और नकली नोट की समस्या से एक साथ ही निजात हासिल करने के लिये लिया गया हो लेकिन इस फैसले को लागू करने की जो कीमत देश के आम लोगों को चुकानी पड़ रही है वह वाकई बहुत बड़ी है। सच तो यह है कि बैंकिंग व्यवस्था का विकास और संसाधनों का विस्तार किये बिना ही इतना बड़ा कदम उठाने की जल्दबाजी के कारण ही आज लोगों को इतनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। भला यह भी कोई बात हुई। खाते में पैसा है लेकिन निकाल नहीं सकते। अपना ही पैसा किसी और के खाते में डाल नहीं सकते। अपनी खून-पसीने की कमाई को मनमुताबिक खर्च नहीं कर सकते। यह तो इंतहा है अव्यवस्था की। वह भी तब जबकि नोटबंदी का ऐलान हुए एक महीना होने को आया। उस पर कोढ़ में खाज यह कि बाजार ने सरकार की मार का बदला उपभोक्ताओं से लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कभी नमक की किल्लत बताकर डेढ़ सौ रूपये की दर से बेचा जाता है तो कभी उत्पादन में कमी की दलील देकर सामान की कीमतें बढ़ा-चढ़ाकर वसूली जाती हैं। खास तौर से खाद्य पदार्थों की कीमतों में जिस कदर लगातार तेजी का माहौल है वह वाकई हैरान-परेशान करनेवाला है। आटा-चीनी व चावल से लेकर तेल-बेसन और अदरक-लहसुन तक की खुदरा कीमतों में पिछले महज एक माह में 25 से 40 फीसदी तक का इजाफा दर्ज किया जा चुका है। यानि एक तरफ लोगों को बैंक की लंबी कतारों में लगने के बावजूद नकदी नहीं मिल पा रही और दूसरी ओर बाजार के बिचैलिये उसका खून चूसने पर आमादा हैं। लेकिन निजाम नोटबंदी से जुड़ी नीतियां बनाने में मस्त है, आवाम चैतरफा मार झेलते हुए पस्त है और देश की पूरी आर्थिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त है। लिहाजा किसी को इतनी फुर्सत ही नहीं है कि वह बाकी मसलों की ओर झांकने की भी जहमत उठाये। अब कौन, किसको, कैसे और क्यों बताये कि और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur