सोमवार, 12 जून 2017

‘हजारों बंदिशें ऐसी कि हर बंदिश पे दम निकले’

‘हजारों बंदिशें ऐसी कि हर बंदिश पे दम निकले’

स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र नागरिक होने का सैद्धांतिक मतलब तो यही है कि हम कहीं भी, कभी भी, कुछ भी कहने या करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं बशर्ते इससे किसी दूसरे की स्वतंत्रता का हनन ना होता हो। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो आजादी उस जिम्मेवारी का ही दूसरा नाम है जिसके तहत दूसरों की खुशियों, इच्छाओं व अपेक्षाओं का जितना अधिक ध्यान रखा जाएगा उसी अनुपात में हमें भी इसका आनंद मिलता रहेगा। लेकिन मसला है कि इन दिनों हर किसी को एक दूसरे से कुछ ज्यादा ही परेशानी होने लगी है। हर बात पर परेशानी और कई दफा तो बिना बात के ही परेशानी। मसलन कौन क्या खा रहा है, इससे परेशानी। कौन कैसे रह रहा है, इससे परेशानी। कौन क्या बोल रहा है, इससे परेशानी। कौन क्या पहन रहा है, इससे परेशानी। कौन किस विचार या सिद्धांत को मान रहा है, इससे परेशानी। कौन कब, कैसे व किसकी पूजा-इबादत कर रहा है, इससे परेशानी। यहां तक कि कौन परेशान है, इससे परेशानी और कौन परेशान नहीं है, इससे भी परेशानी। यानि इन दिनों परेशानियों का कोई ओर-छोर ही नहीं दिख रहा है। इन तमाम परेशानियों ने समूचे देश को बुरी तरह परेशान कर रखा है। कोई किसी को किसी भी बात की रत्ती भर भी आजादी देने के पक्ष में नहीं दिख रहा है। चाहे आवाम हो या निजाम, सबकी ख्वाहिश ही नहीं बल्कि कोशिश भी यही है कि उसके मन-मुताबिक ही समूचा संसार संचालित हो। नतीजन तमाम तरह की बंदिशें इस हद तक थोपी जा रही हैं कि आज अगर चचा गालिब जिंदा होते तो निश्चित तौर पर ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले’ के बजाय यही कह रहे होते कि ‘हजारों बंदिशें ऐसी कि हर बंदिश पे दम निकले।’ आखिर कहते भी क्यों नहीं? जब बंदिश आयद करने की हद यहां तक पहुंच जाए कि गाय के दूध से रोजा इफ्तार करने की ताकीद करते हुए मांस खानेवाले की बोटी नोंच लेने की धमकी दी जाने लगे, अजान की आवाज से नींद में खलल पड़ने की दुहाई दी जाने लगे, तीसरे मुल्क में हो रहे भारत-पाक मैच को टीवी पर देखने से रोकने की कोशिश होने लगे और आजम खां सरीखे वरिष्ठ नेता महिलाओं को घर में कैद होकर रहने की सलाह देने लगें तो इन बंदिशों से छटपटाहट होना स्वाभाविक ही है। आलम यह है कि समूचे विश्व में बुर्के पर पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया चल रही है जबकि हमारे देश में अगर जायरा वसीम ‘दंगल’ सरीखी प्रेरणादायक फिल्म में एक मासूम बच्ची की भूमिका निभाती है तो उसे जान से मारने की धमकी मिलने लगती है। यहां तक कि अगर फातिमा शेख, दीपिका पादुकोण या प्रियंका चोपड़ा सरीखी महिलाएं अपने मनमुताबिक परिधान धारण करती हैं तो सोशल मीडिया पर तूफान आ जाता है। महाराष्ट्र में एक युवा अपनी प्रेयसी के कहने पर बीच सड़क पर घुटनों के बल बैठकर प्यार का इजहार करता है तो उसका इस हद तक विरोध होता है कि उसे अपना शहर छोड़कर भागने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ऐसे में सवाल है कि इन बंदिशों के बीच आजादी के मायने की तलाश कैसे की जाए। कैसे कहें कि हम आजाद मुल्क के आजाद बाशिंदे हैं जबकि अपनी मर्जी से किसी पार्टी को वोट देने के नतीजे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोगों को घर में घुसकर मारा-पीटा जाता हो। अपनी मर्जी से कोई बालिग जोड़ा अगर किसी बंद कमरे में एक-दूसरे के साथ कुछ वक्त बिताना चाहे तो उसे इसकी आजादी नहीं मिल पाती। जहां नाबालिगों की शादी कर देना आम बात हो लेकिन उसी समाज में बालिगों को अपनी मर्जी से शादी करने या साथ रहने की इजाजत हासिल ना हो। वहां आजादी का क्या मतलब है इस पर विचार तो करना ही पड़ेगा। विचार तो इस बात पर भी करना पड़ेगा कि कोई कैसे किसी को इस बात के लिए रोक-टोक सकता है कि वह क्या खाए और क्या पिए? कहीं शराब पर प्रतिबंध लगाकर महिला वोटरों को रिझाने की कोशिश हो रही है तो कहीं मांसाहारी खाने को प्रतिबंधित करने का प्रयास करके बहुसंख्यक मतदाताओं की सहानुभूति बटोरी जा रही है। कहीं दुर्गापूजा के बाद प्रतिमा का विसर्जन करने के लिए अदालत से आदेश पारित कराना पड़ रहा है तो कहीं मस्जिद से लाउडस्पीकर उतारने की मांग जोर पकड़ रही है। कोई संस्कृत को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने पर अड़ा है तो किसी को प्रादेशिक भाषा पर हिन्दी का बढ़ता प्रभाव बर्दाश्त नहीं हो रहा है। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि गंगा जमुनी सामन्जस्य के प्रति समाज का सरोकार लगातार समाप्त होता जा रहा है और एक ऐसी व्यवस्था को पनपाने का प्रयास हो रहा है जिसमें ताकतवर को यह हक हासिल हो कि वह कमजोर को अपने मनमुताबिक तरीके से जीवन-यापन करने के लिए मजबूर कर सके। बंदिशों की समस्या तब और विकराल हो जाती है जब खास सिद्धांत या विचार को माननेवालों की सत्ता भी अपनी ओर से बंदिशों में इजाफा करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। लेकिन भारत का स्वरूप और स्वभाव कभी ऐसा नहीं रहा है कि यहां के तमाम नागरिक किसी एक मत, पंथ, मजहब, सिद्धांत या विचार को स्वीकार कर लें लिहाजा विविधता में एकता की व्यवस्था को जितना दबाने की कोशिश होगी वह उतनी ही प्रखरता और मुखरता से उजागर होकर अवश्य सामने आएगी। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर #navkantthakur   

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