बुधवार, 10 मई 2017

‘भाग्यं फलति सर्वदा, न विद्या न च पौरूषम्’

‘देने वाला जब भी देता, देता छप्पर फाड़ के...’

वाकई किस्मत से बढ़के कुछ भी नहीं है। तभी तो कहा गया है कि ‘भाग्यं फलति सर्वदा, न विद्या न च पौरूषम्।’ किस्मत मेहरबान हो तो परिस्थितियां किस कदर अनुकूल होती चली जाती हैं इसे भाजपा को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। भाजपा पर किस्मत किस कदर मेहरबान है यह शायद ही किसी को अलग से समझाने या बताने की जरूरत पड़े। वर्ष 2014 के बाद से सामने आए तमाम चुनावी नतीजे इसकी मुनादी खुद ही कर रहे हैं। लेकिन मजाल है कि भाजपा के नेतागण इसका जरा सा भी श्रेय किस्मत को दे दें। वे तो मतदाताओं के समर्थन, अपनी सरकारों के प्रदर्शन और कार्यकर्ताओं के समर्पण को ही इसका पूरा श्रेय देते हैं। लेकिन यह किस्मत ही तो है कि जहां भी भाजपा हाथ डालती है वहां बंजर में बगीचा गुलजार हो जाता है। सूखे में भी कमल खिल जाता है। यह किस्मत का करिश्मा ही तो है कि इन दिनों भाजपा के भक्त दिन दूनी और रात चैगुनी तरक्की कर रहे हैं जबकि विरोधियों का बुरी तरह बंटाधार हो रहा है। हालांकि इस पर अलग से बहस हो सकती है कि विरोधी खेमेे में मची उठापटक, भगदड़ और हड़कंप में भाजपा के स्लीपर सेल की क्या भूमिका रही है लेकिन इस बात से तो कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन दिनों भाजपा की किस्मत इतनी बुलंद चल रही है कि जो भी उसकी ओर बुरी नजर डालने की जुर्रत करता है उसके बुरे दिन शुरू हो जाते हैं। चाहे उत्तर प्रदेश की सपा-बसपा हो या बिहार का धर्मनिरपेक्ष गठबंधन, पूर्वी भारत की भद्रजनों की पार्टी हो या दिल्ली की आम आदमी पार्टी, या फिर दक्षिण के द्रविड़ दल ही क्यों ना हों। भाजपा के तमाम विरोधियों की हालत तकरीबन एक जैसी ही है। वे अपनी अंदरूनी समस्याओं को सुलझाने में ही इस कदर व्यस्त हैं कि उन्हें भाजपा के अश्वमेघ के घोड़े की मनमानी व मनचाही सरपट दौड़-भाग को रोकने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाने की फुर्सत ही नहीं मिल रही है। कहां तो पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से ही इस बात पर मगजमारी शुरू हो गयी थी कि महज 32 फीसदी वोटों की बदौलत लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल करके अपने दम पर सरकार बनाने में कामयाब रहनेवाली भाजपा के विरोध में पड़े 68 फीसदी वोटों को कोई एकजुट मंच मुहैया करा दिया जाए तो उसे चुनाव मैदान में आसानी से चारों खाने चित किया जा सकता है। लेकिन यह कागजी समीकरण आज तक कागजों पर ही सिमटा हुआ है और बिहार विधानसभा चुनाव में हुए महागठबंधन के प्रयोग को मिली सफलता को अपवाद के तौर पर अलग कर दिया जाए तो कहीं भी दोबारा वैसी एकजुटता कायम करने में गैर-भाजपाईयों को अब तक कामयाबी नहीं मिल पाई है। यहां तक कि बंगाल के चुनाव में कांग्रेस-वाम गठजोड़ में शामिल होना तृणमूल को रास नहीं आया तो यूपी के चुनाव में सपा-कांग्रेस के साथ तालमेल बिठाने से बहनजी ने ही इनकार कर दिया। अब बहनजी भी माथा पीट रही हैं और तृणमूल सुप्रीमो ममता दीदी भी वाम-कांग्रेस के साथ सियासी कदमताल करने के प्रति उत्सुक दिख रही हैं। लेकिन यह भाजपा की किस्मत ही है कि उसके तमाम विरोधी अंदरूनी मारकाट से इस कदर लहुलुहान हो रहे हैं कि उन्हें निजी समस्याओं को परे हटाकर सामूहिक मसलों का समाधान करने की दिशा में कदम बढ़ाने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है। यूपी में एक तरफ यादव परिवार अपने ही अंतर्कलह में उलझकर यह तय नहीं कर पा रहा है कि आगामी चुनावों में किस पर भरोसा किया जाए या किससे सावधान रहा जाए, तो दूसरी तरफ बहनजी के लिए न सिर्फ अपनी सियासी विरासत को बचाए रखने की चुनौती है बल्कि विरासत के वारिस को बचाने की समस्या ने भी उन्हें बुरी तरह उलझाया हुआ है। दूसरी ओर बिहार में लालू व उनके लाल ने ऐसा कमाल किया हुआ है कि जदयू को अपनी पूरी ताकत राजद का रसूख और अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखने में ही झोंकनी पड़ रही है। ओडिशा में नवीन पटनायक के लिए अपने संगठन को संभाले रखना ही मुश्किल हो रहा है जबकि तमिलनाडु में अम्मा के गुजर जाने के बाद अब करूणानिधि की सांसों की डोर पर ही द्रविड़ राजनीति की बागडोर टिकी हुई है। पूर्वी भारत में अपने वजूद को बचाए रखने की चुनौती का सामना कर रहे वाममोर्चे की हालत बुजुर्गों की चैपाल सरीखी हो गयी है जहां नई पीढ़ी झांकने की भी जहमत नहीं उठाना चाहती। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता था कि दिल्ली की तकरीबन डेढ़ करोड़ की आबादी में से वाम दलों के हिस्से में महज कुल 53 वोट ही आएं। इस सबसे अलग आम आदमी पार्टी के तौर पर वैकल्पिक राजनीति की जो उम्मीद जगी थी उसका झाड़ू तिनका-तिनका बिखर रहा है और अपने ही चिराग उसका घर जलाने पर आमादा दिख रहे हैं। यानि किस्मत की मेहरबानी से भाजपा की दसों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाही में है। हालांकि इस सब के बीच यह सत्य भी अकाट्य ही है कि किस्मत भी उस पर ही मेहरबान होती है जो पूरी तत्परता, तल्लीनता व समर्पण के साथ लक्ष्य को हासिल करने का प्रयत्न करता है। वर्ना हाथ पर हाथ रखकर सिर्फ किस्मत के भरोसे बैठे रहनेवाले को ना तो आज तक कुछ मिला है और ना कभी कुछ मिल सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर #NavkantThakur   

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