गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

‘सवाल सारे गलत हैं, जवाब झूठे हैं’

मौजूदा दौर के जमीनी हालातों पर नजर डालें तो हर तरफ कमजोरियों का ही आलम है। खास तौर से अर्थव्यवस्था की कमजोरी तो जगजाहिर ही है। खेती-मजदूरी कमजोर, आयात-निर्यात कमजोर, उत्पादन-उपभोग कमजोर, मांग-आपूर्ति कमजोर, क्रेता-विक्रेता कमजोर। हर तरफ सिर्फ कमजोरी ही कमजोरी। उस पर तुर्रा यह कि कमजोरी दूर करने के लिये बनाए जा रहे नीतियों-नियमों के शिलाजीत, शतावरी, क्रौंच बीज, मूसली और अश्वगंधा सरीखे तमाम जड़ी-बूटियों का तगड़ा डोज भी मर्ज पर उल्टा ही असर कर रहा है। ज्यों-ज्यों दवा की खुराक बढ़ाई जा रही है त्यों-त्यों मरीज मरणासन्न होता जा रहा है। 

हालांकि इस कमजोरी की चपेट में तो फिलहाल समूचा संसार ही है। लिहाजा थोड़ी देर के लिये उस कमजोरी की तत्काल अनदेखी भी की जा सकती है। लेकिन देश में उससे भी कमजोर स्थिति में है विश्वास, यकीन, भरोसा, ट्रस्ट। यह ना तो विपक्ष को सरकार पर है, ना सरकार को विरोधियों पर और ना ही आवाम को निजाम पर। हर तरफ माहौल है तनातनी का, टकराव का और भारी अविश्वास का। सबकी अपनी ढ़फली है और अपना राग है। किसी की जुबान पर चैता है तो किसी के कंठ से फूट रहा फाग है। हर तरफ आग ही आग है। धुआँ-धुआँ है और हुआँ-हुआँ है। इस धुआँ-धुआँ सी धुंध और हुआँ-हुआँ के शोर में ना तो सही तस्वीर दिखाई पड़ रही है और ना ही सच्ची बात सुनाई पड़ रही है। 

मसला जन्म ले चुके संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) का हो, प्रसूति की प्रक्रिया से गुजर रहे राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का अथवा गर्भाधान के प्रयासों की संदिग्धता से जूझ रहे राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी (एनआरसी) का। तमाम मसलों को लेकर असमंजस, उहापोह और बेचैनी का माहौल है। इसी बीच किसी ने अफवाह उड़ा दी कि कौआ कान ले गया तो लोग अपना कान टटोलने के बजाय कौए को पकड़ने के लिये दौड़ पड़े। कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक के कुछ लोग कौए को पकड़ने के लिये दौड़ पड़े ताकि कान वापस पा सकें और कुछ लोग उनके पीछे इस प्रयास में दौड़े कि उन्हें कान कटने के अफवाहों की हकीकत से अवगत करा सकें। बाकी बचे लोग जो ना आगे दौड़े और ना पीछे, वे इस अफरातफरी, मारामारी और हिंसा-प्रतिहिंसा को देखकर हतप्रभ ठगे से रह गए। ना उन्हें कान का होश रहा ना कौए का। हालांकि बाद में सरकार के समझाने पर कान टाटोलने के बाद लोग कुछ हद तक आश्वस्त अवश्य हुए हैं लेकिन विपक्षी ताकतें उन्हें अब यह समझा रही हैं कि भले ही फिलहाल कान सुरक्षित हो लेकिन कौआ कुछ ऐसा लेकर अवश्य उड़ा है जिसके बिना कान के होने या ना होने का कोई मतलब ही नहीं है। 

एनआरसी और एनपीआर के मामले में फंसे पेंच को देखते हुए लोगों को भी अंदरखाने यह डर सता रहा है कि कुछ तो गड़बड़ अवश्य है। वर्ना पिछली बार जो एनपीआर तैयार किया गया उसमें सिर्फ 15 सवाल ही पूछे गए थे लेकिन इस बार 21 सवालों की सूची का जवाब मांगा जानेवाला है। सवाल भी ऐसे जिनका जवाब हासिल करने के बाद सरकार को अलग से एनआरसी कराने की शायद ही जरूरत महसूस हो। मसलन इस बार सबको अपने माता-पिता का सिर्फ नाम ही नहीं बताना होगा बल्कि उनके जन्म स्थान और जन्म की तारीख का भी खुलासा करना पड़ेगा। हालांकि फिलहाल उसका कागजी प्रमाण भले ही ना मांगा जा रहा हो लेकिन आगे चलकर दी गई जानकारी यदि गलत पायी गयी तो सरकार को झांसा देने का अंजाम क्या हो सकता है यह जानने के लिये शायद ही किसी को वकालत की ऊँची डिग्री की आवश्यकता हो। लेकिन एक तरफ ऐसी हकीकतें हैं तो दूसरी तरफ उसके बारे में विस्तार से बतानेवालों की अलग-अलग जुबान, लहजे और भाषाएं भी हैं जिनका आपस में कोई तालमेल ही नहीं है। विरोधी कह रहे हैं कि भारी जनविरोध से सचेत होकर सरकार अब एनआरसी को एनपीआर की शक्ल में ला रही है ताकि लोगों को धोखे में रखा जा सके जबकि सरकार की ओर से सफाई आई है कि अव्वल तो एनपीआर में पूछे जानेवाले सवालों को अंतिम रूप नहीं दिया गया है और दूसरे परंपरागत एनपीआर प्रक्रिया का एनआरसी से कोई लेना देना ही नहीं है। 

अब सवाल है कि किसको सही समझें और किसको गलत? जनसंख्या के आंकड़े जुटानेवालों को तो कथित तौर पर 21 सवालों की फेहरिश्त के मुताबिक प्रशिक्षण दिया गया है। लिहाजा उसी आधार पर एक बार फिर कौए की चोंच में कान की आशंका महसूस हो रही है। लेकिन सरकार उस फेहरिश्त को ही फिलहाल खारिज कर रही है ताकि लोगों को कान की यथास्थिति यथावत महसूस हो। इसमें यह समझना मुश्किल है कि कौन सच्चा है और कौन झूठा। सवाल उठा डिटेंशन सेंटर का, तो प्रधानमंत्री ने उसके अस्तित्व को ही नकार दिया। लेकिन उसकी मौजूदगी दिखा कर दोबारा पूछने पर कहा गया कि इसे हमने नहीं बनाया, सवाल पूछनेवाले ही बना चुके हैं। सवाल उठा एनआरसी का तो इस पर प्रधानमंत्री का सुर अलग है, गृहमंत्री का साज अलग है और विपक्ष की आवाज अलग। ऐसे तमाम सवालों और जवाबों के बीच कहीं कोई तालमेल या एक-सूत्रता ही नहीं है। शायद इन्हीं हालातों के मद्देनजर तहसीन मुनव्वर ने लिखा है कि- ‘सितारे सारे सभी माहताब झूठे हैं, जमीं के जितने भी हैं आफताब झूठे हैं, जो शाम होते ही घर-घर में पूछे जाते हैं, सवाल सारे गलत हैं जवाब झूठे हैं।’ 'जैसी नजर वैसा नजरिया।' #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

भावी ‘मर्ज’ के भय से उभरा मौजूदा ‘दर्द’

वर्ष 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए तमाम गैर-मुस्लिमों को शरणार्थी और मुसलमानों को घुसपैठिया करार देते हुए गैर-मुस्लिमों को नागरिकता से नवाजने के लिये बनाए गए संशोधित नागरिकता कानून को लेकर पूरा देश बुरी तरह उबल रहा है। कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक विरोध की आग धधकती दिखाई दे रही है। इस आग में घी का काम किया है इस कानून के खिलाफ हुए हिंसक प्रदर्शन के दौरान जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में घुसकर पुलिस द्वारा छात्रों पर बल प्रयोग किये जाने की घटना ने।
हालांकि छात्रों के साथ मारपीट के मामले को लेकर देश के 22 से भी अधिक विश्वविद्यालयों में सरकार विरोधी प्रदर्शन होने की बात तो गृहमंत्री अमित शाह भी स्वीकार कर रहे हैं लेकिन वे यह मानने के लिये तैयार नहीं हैं कि इससे सरकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी विरोध की कोई तस्वीर उभर रही है। उनकी तो दलील है कि अगर देश के तकरीबन ढ़ाई सौ सरकारी विश्वविद्यालयों में से सिर्फ 22 में सरकार के खिलाफ आवाज उठाई गई है तो इसे सामान्य विरोध के नजरिये से ही देखा जाना चाहिये और इस मसले को अधिक तूल नहीं दिया जाना चाहिये। साथ ही उनकी समझ में तो यह बात भी नहीं आ रही है कि आखिर संशोधित नागरिकता कानून को लेकर इतना बवाल क्यों कट रहा है। वह भी तब जबकि इस कानून की किसी भी धारा में किसी की भी नगारिकता समाप्त करने का कोई प्रावधान ही नहीं किया गया है। अलबत्ता यह कानून तो भारत के नागरिकों के लिये बनाया ही नहीं गया है बल्कि इसका मकसद तो तीन पड़ोसी मुल्कों से आए घुसपैठियों की दशकों पुरानी समस्या का इलाज करना और धार्मिक आधार पर इन देशों में प्रताड़ित व विलुप्त हो रहे सभी अल्पसंख्यकों को यहां की नागरिकता प्रदान करना है।
निश्चित तौर पर गृहमंत्री ही नहीं बल्कि उनसे जुड़े तमाम संगठनों, सैद्धांतिक सहोदरों और सियासी साथियों की नजर से देखने पर भी संशोधित नागरिकता कानून में ऐसी कोई बात राई-रत्ती भर भी दिखाई नहीं पड़ती है जिसको लेकर पूरा देश सुलग उठे। सभी विरोधी आपसी मतभेदों को भुलाकर एक स्वर से सरकार के खिलाफ सड़क पर हल्ला बोलने लगें। तमाम खासो-आम हाहाकार-चित्कार करे और पूरे शासन-प्रशासन को हर स्तर पर असहज स्थिति का सामना करना पड़े। लेकिन ऐसा हो तो रहा ही है। लिहाजा बड़ा सवाल है कि आखिर इस मामले को लेकर दर्द का ऐसा सैलाब सड़क पर क्यों और किस वजह से उमड़ रहा है? सतही तौर पर देखने से तो यह समझना वाकई बेहद मुश्किल है कि आखिर समूचे देश में मोदी सरकार के खिलाफ विरोध और विद्रोह की आग क्यों धधक रही है लेकिन गहराई से परखने पर ना सिर्फ पूरी तस्वीर स्पष्ट हो जाती है बल्कि तमाम विरोध प्रदर्शन भी जायज दिखाई पड़ते हैं।
दरअसल दर्द का जो सैलाब सड़क पर दिखाई पड़ रहा है उसकी असली वजह वह भावी मर्ज है जो निजाम की ओर से आवाम को दिये जाने का ऐलान संसद में गृहमंत्री ने सीना ठोंक कर किया है। वास्तव में आवाम की ओर से निजाम के खिलाफ ऐलाने जंग की दो बड़ी वजहें हैं। पहली तो संशोधित नागरिकता कानून लागू होने से देश के उन इलाकों में जमीनी स्तर पर होने वाला भाषाई, सांस्कृतिक व सियासी परिवर्तन है जिसका तात्कालिक खामियाजा और बोझ वहां के मौजूदा स्थानीय नागरिकों और उनकी भावी पीढ़ियों के सिर पर वज्रपात करेगा। साथ ही विरोध की दूसरी वजह है आगामी दिनों में तैयार होने वाले राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी में अपना नाम शामिल कराने के लिये आवश्यक कागजात व दस्तावेज नहीं दिखा पाने वाले देशवासियों के साथ इस नागरिकता कानून को आधार बनाकर होने वाले भेदभाव का डर।
अभी बीते दिनों असम में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश व निगरानी के तहत बनायी गयी एनआरसी की अंतिम सूची में 19 लाख से अधिक लोगों की घुसपैठिये के तौर पर पहचान हुई है। बताया जाता है कि इनमें से 12 लाख घुसपैठिये गैर-मुस्लिम हैं जिनको नए नागरिकता कानून के तहत यहां स्थानीय निवासियों की तरह रहने-बसने का अधिकार मिल जाएगा और बाकियों के लिये गुवाहाटी उच्च न्यायालय के निर्देश पर डिटेंशन सेंटर बनाया जा रहा है जहां उन्हें तमाम अधिक अधिकारों से वंचित करके सिर्फ जीने का हक ही दिया जाएगा। यही वजह है कि नागरिकता कानून का पहला व स्वाभाविक विरोध असम से ही सामने आया है जहां गैर-मुस्लिम विदेशी घुसपैठियों को वहां की नागरिकता मिल जाने के बाद असमिया संस्कार व संस्कृति का बंगालीकरण हो जाने की पूरी संभावना है। इसके अलावा जिन मुस्लिमों को तमाम अधिकारों से वंचित करके डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा उनमें भी बड़ी तादाद में ऐसे लोग शामिल हैं जिनके पुरखों ने भी कभी भारत के बाहर कदम नहीं रखा। यानी वे भारतीय होने का कागजी प्रमाण उपलब्ध नहीं करा पाने के कारण ही नागरिकता से वंचित किये जा रहे हैं।
असम के इस अनुभव के बाद अब पूरे देश में पहले नागरिकता कानून और उसके बाद एनआरसी को लागू करने के सरकार के ऐलान को लेकर भय, घबराहट, आशंका और आक्रोश का माहौल बनना स्वाभाविक ही है। वैसे भी सच तो यही है कि देश के करोड़ों गरीब, असहाय व बेघर-बेसहारा लोग जब अपने जिंदा होने का कागजी प्रमाण प्रस्तुत करने में भी असमर्थ हैं तब वे नागरिकता साबित करने के लिये आवश्यक दस्तावेज कैसे व कहां से लाकर दिखा पाएंगे। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ Navkant Thakur

गुरुवार, 24 जनवरी 2019

‘वक्ता ही हैं सभी, श्रोता कोई नहीं’

बचपन से ही हमें यह सिखाया जाता है कि अच्छा वक्ता बनने की अनिवार्य शर्त है कि पहले अच्छा श्रोता बना जाए। जो अच्छा श्रोता नहीं होगा वह अच्छा वक्ता भी नहीं बन सकता। लिहाजा बोलना कम और सुनना अधिक चाहिये। साथ ही जितना सुना गया उसे अधिक से अधिक गुनना, धुनना और बुनना चाहिये। उसके बाद वैचारिक व सैद्धांतिक बुनावट और कसावट के साथ जुबान से जो बातें निकलेंगी वही अच्छे वक्ता के तौर पर समाज में पहचान दिलाएंगी। यह तो हुई सैद्धांतिक बात। अब अगर व्यवहारिक तौर पर देखें तो माहौल ऐसा है जिसमें सुनने व समझने की ना तो फितरत बची है और ना ही आदत। बस बोलते जाना है। भले उन बातों में कोई तथ्य या प्रामाणिकता हो या ना हों। कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क सिर्फ इस बात से पड़ता हैं कि एक ही बात को कितनी बार दोहराया जा रहा है। इन दिनों देश की सियासत में इसी एकसूत्रीय रणनीति पर अमल हो रहा है। बात चाहे सत्तापक्ष की करें या विपक्ष की। सुनने, समझने, गुनने, धुनने और बुनने की लंबी प्रक्रिया के बाद ही कुछ बोलने की परंपरा अब बीते दिनों की बात बन कर रह गई है। लेकिन सवाल है कि बातों में तथ्य, सत्य, गंभीरता, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता तो तब आएगी जब किसी भी मामले पर बोलने से पहले इसके तमाम पहलुओं के बारे में सुनकर विश्लेषण व चिंतन-मनन करके कोई ठोस राय कायम की जाए। लेकिन अगर कोई बोलने की रौ में सुनना-समझना गवारा ही ना कर रहा हो तो उसकी वही हालत होती है जो इन दिनों कांग्रेस और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की दिख रही है। कायदे से देखें तो कांग्रेस ने आगामी चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा को घेरने के लिये जिन मुद्दों को मुख्य हथियार के तौर पर चुना है उसमें से एक भी औजार ऐसा नहीं है जो सत्य, तथ्य व प्रामाणिकता की धार व मजबूती से चमक-दमक रहा हो। कांग्रेस ने एक ओर राफेल के मुद्दे को आगे करके चैकीदार को चोर बताने की पहल की है तो दूसरी ओर ईवीएम की कमियां-खामियां गिना कर वह सरकारी तंत्र को बेईमान साबित करने पर तुली हुई है। इसके अलावा नोटबंदी के नुकसान गिनाकर वह आम लोगों की संवेदना बटोरना चाहती है तो जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स का नाम देकर सरकार को लुटेरी साबित करने में जुटी हुई है। साथ ही किसानों के लिये कर्जमाफी का वायदा करके वह जमीनी स्तर पर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में लगी है। ये पांच ही वह बड़े मुद्दे हैं जिसके पंच से कांग्रेस की कोशिश है भाजपा को धराशायी करने की। लेकिन इन पांचों मसलों को अलग-अलग टटोलें तो इनमें से एक भी मुद्दा तथ्य व सत्य से ढ़ला ठोस हथौड़ा नहीं है जिससे मोदी सरकार के ताबूत में कील ठोंकी जा सके बल्कि ये सभी मनगढ़ंत बातों की हवा से फूले हुए गुब्बारे ही हैं जो सांच के आंच को एक क्षण भी शायद ही बर्दाश्त कर पाएं। इन पांचों मसलों को सिलसिलेवार ढंग से परखें तो राफेल खरीद के मामले को ही नहीं बल्कि ईवीएम में गड़बड़ी के सवाल को भी पूरी तरह देखने, परखने और समझने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है। राफेल के मामले में कांग्रेस के तमाम सवालों का जवाब संसद में सरकार भी दे चुकी है और मामले से जुड़ी फ्रांस सरकार और दसौं कंपनी से लेकर रिलायंस तक की ओर से पूरे तथ्यों व प्रमाणों के साथ स्थिति स्पष्ट की जा चुकी है। ईवीएम को हैक करना अगर संभव होता तो चुनाव आयोग द्वारा हैक करने के लिये तीन दिन का वक्त दिये जाने का इन्होंने सदुपयोग कर लिया होता। रहा सवाल जीएसटी का तो अगर ये इतना ही खराब है तो जीएसटी लागू करने से लेकर जीएसटी काउंसिल तक में हर फैसला अब तक बहुमत के बजाय सर्वसम्मति से क्यों हुआ? कांग्रेस ने नीति-नियम के निर्धारण से किनारा अथवा विरोध क्यों नहीं किया? नोटबंदी इतनी गलत थी तो राहुल गांधी नोट बदलने के लिये कतार में लगने के बजाय सड़क पर संघर्ष के लिये क्यों नहीं उतरे। मामले को न्यायालय में खींचकर सरकार को शर्मिंदा क्यों नहीं किया? इसी प्रकार किसानों की कर्ज माफी की बात करना भी कांग्रेस के लिये ऐसा ही है जैसे सहेज कर रखने के बजाय अपने ही हाथों से फाड़ी गई चादर पर पैबंद लगाने की बात की जा रही हो। हालांकि ऐसा नहीं है कि बिना सोचे-समझे और सिर्फ बोलते चले जाने के लिये बोलना केवल कांग्रेस और राहुल का शगल है बल्कि ऐसी ही फितरत और आदत का मुजाहिरा सत्तारूढ़ भाजपा भी कर रही है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी। वर्ना जिस राम मंदिर मसले के विवाद को सुलझाने के लिये सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आड़ लेकर अध्यादेश लाने से बचने की कोशिश की जा रही है उसी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सबरीमला के मसले पर दिये गये फैसले को सार्वजनिक मंच से ललकारने व दुत्कारने का दुस्साहस कतई नहीं किया जाता। यहां तक कि अगस्ता खरीद घोटाले को चुनावी मुद्दा बनाने के लिये प्रधानमंत्री द्वारा मीडिया रिपोर्ट का हवाला नहीं दिया जाता जबकि इसका कथित राजदार क्रिश्चन मिशेल सरकार की पकड़ में आ चुका है। यानि बोलने से पहले सोचना और सोचने के लिये सुनना जब किसी को गवारा ही नहीं है तो उनकी बातों की कितनी गंभीरता, विश्वसनीयता व प्रामाणिकता रहेगी इसे आसानी से समझा जा सकता है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’     @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur 

शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

‘क्या बने बात जब कांग्रेस से बात बनाए ना बने’



बात बनने से पहले ही बिगड़ती हुई दिखे तो कैसा महसूस होता है यह कोई कांग्रेस से पूछे। कहां तो कोशिश थी सभी दलों को साथ जोड़कर महागठबंधन बनाने की ताकि आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा की राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत घेराबंदी की जा सके। लेकिन स्थिति यह है कि किसी भी सूबे में कांग्रेस के साथ कांधे से कांधा मिलाने के लिये कोई तैयार ही नहीं है। हालांकि सबको मालूम है कि चुनावी नतीजा भाजपा के खिलाफ आने के बाद भी अपना कद ऊंचा करने के लिये उसे कांग्रेस के कांधे पर ही चढ़ना होगा। लेकिन इस समय जबकि कांग्रेस को अपनी सियासी डोली को चुनावी सफर में आगे बढ़ाने के लिये क्षेत्रीय दलों के कांधे की जरूरत है तो एक के बाद एक सभी उससे कन्नी काटते दिख रहे हैं। अपने कांधे पर कांग्रेस का वजन उठाने के लिये कोई तैयार नहीं है। यूपी में तो बसपा, सपा व रालोद यानि बुआ, बबुआ और ताऊ की तिकड़ी ने पहले ही कांग्रेस से किनारा कर लिया। लेकिन चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी को भी तेलंगाना में कांग्रेस के साथ गठजोड़ करके चुनाव लड़ने का बेहद बुरा हश्र झेलने के बाद अब आंध्र प्रदेश में हाथ का साथ पकड़ने से परहेज बरतने में ही अपनी भलाई दिख रही है। यहां तक कि लोकसभा की महज सात सीटों वाले सूबे दिल्ली में सत्तारूढ़ अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी कांग्रेस की लाख कोशिशों के बावजूद उसके साथ जुड़ने के लिये तैयार नहीं है। जबकि इस गठबंधन में बाधक बन रहे अजय माकन का प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा भी हो गया और प्रदेश कांग्रेस की कमान 80 वर्षीया बुजुर्ग नेत्री शीला दीक्षित को भी सौंप दी गई ताकि आप के साथ संबंध कायम करने में कोई परेशानी ना हो। लेकिन केजरीवाल कांग्रेस को ऊंचा उठाने के लिये अपना कांधा लगाने को कतई तैयार नहीं हैं। आलम यह है कि कर्नाटक में कांग्रेस ने जिस जेडीएस की सरकार बनवाई वह भी बुरी तरह बिदकी हुई है। जेडीएस के शीर्ष नेता एचडी देवेगौड़ा तो काफी पहले ही यह बता चुके हैं कि कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन तार्किक नहीं है। लेकिन मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी जिस तरह कांग्रेसियों से दुखी होकर रो-गा रहे हैं कि उनकी स्थिति क्लर्क की बन कर रह गई है ऐसे में कौन सोच सकता है कि कांग्रेस को सियासी बेड़ा पार करने के लिये जेडीएस अपने कांधे पर सवार होने की इजाजत देगी। उधर ओडिशा में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की बीजू जनता दल तो पहले ही अपना सफर अपने दम पर तय करने का इरादा जता चुकी है जबकि छत्तीसगढ़ में भी अजीत जोगी विधानसभा की तरह लोकसभा चुनाव अपने दम पर ही लड़ने का इरादा जाहिर कर चुके हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इस डर से कांग्रेस को अपना कांधा मुहैया कराने के लिये तैयार नहीं है कि कहीं कल को वामदलों के साथ मिलकर वह उसके लिये खतरे का तूफान ना खड़ा कर दे जबकि केरल में वामदल कतई कांग्रेस को अपने करीब नहीं आने देना चाह रहे हैं। असम में भी स्थानीय दलों के साथ कांग्रेस का समझौता नहीं हो पा रहा है जबकि जम्मू-कश्मीर में एनसी और पीडीपी के बीच फंसी कांग्रेस तय ही नहीं कर पा रही है कि इधर जाए या उधर जाए। यानि समग्रता में देखें तो राष्ट्रीय स्तर पर तस्वीर ऐसी बन रही है कि लोकसभा के कुल 543 में से 269 सीटों के लिये सांसद चुननेवाले उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, असम, छत्तीसगढ़, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक, केरल, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और दिल्ली सरीखे ग्यारह सूबों में यह अभी से तय है कि कांग्रेस को चुनावी वैतरणी पार करने के लिये कोई मजबूत कांधा मयस्सर नहीं हो पाएगा। इन तमाम सूबों में चुनाव त्रिकोणीय होगा जिसमें सबसे बड़ी स्थानीय ताकत का सहयोग कांग्रेस को नहीं मिल पाएगा। दरअसल बीते दिनों हुए चुनाव के नतीजों ने यह उम्मीद प्रबल कर दी है कि इस बार जनमानस का बहुमत भाजपा के खिलाफ जाने वाला है। जबकि कांग्रेस ने बेशक आमने-सामने की लड़ाई में राजस्थान व मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक में भाजपा को शिकस्त देने में कामयाबी हासिल कर ली हो लेकिन उसकी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प के तौर पर स्वीकार्यता नहीं होने की बात से भी सभी वाकिफ हैं। हालांकि कांग्रेस को साथ लेकर गैर-भाजपाई गठजोड़ बनाने का लाभ भी सबको दिखाई पड़ रहा है लेकिन इसमें स्थानीय ताकतों को अपना हित सुरक्षित नजर नहीं आ रहा है। आखिर राजनीति है भी असीमित संभावनाओं को संभव कर दिखाने का खेल। उसमें भी माहौल इतना बेहतर है कि भाजपा सिमटती दिख रही है और कांग्रेस की स्वीकार्यता में कोई इजाफा नहीं दिख रहा। ऐसे में अगर तीसरी ताकतें कांग्रेस को ऊंचा उठाने के लिये अपना कांधा लगाने के बजाय अपने ही कद को ऊंचा करने की रणनीति बना रही हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। भले ही बाद में सत्ता के शिखर को छूने के लिये आवश्यक ऊंचाई हासिल कर पाना कांग्रेस के कांधे पर सवार हुए बिना संभव ना हो सके। लेकिन कांग्रेस को किनारे लगाकर त्रिकोणीय व बहुकोणीय टकराव में अपना फायदा देखनेवालों को यह नहीं भूलना चाहिये कि विरोधियों के ऐसे ही बिखराव ने बीते आम चुनाव में महज 32 फीसदी वोट पाने वाली भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा हासिल करा दिया था। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर 


मंगलवार, 8 जनवरी 2019

‘सामाजिक समस्याओं पर धार्मिक रंग चढ़ाने की सियासत’

सियासत सिर्फ मौजूदा समस्याओं पर ही नहीं होती बल्कि सियासत के लिये समस्याएं खड़ी भी की जाती हैं और उन पर मनचाहा रंग चढ़ा कर लोगों की भावनाओं को सुलगाया और भड़काया भी जाता है। खास तौर से धर्म, परंपरा व रीति-रिवाजों को सबसे अधिक अहमियत देने वाले भारतीय समाज में अपनी सियासी पकड़ मजबूत करने के लिये किसी भी मसले को जाति व धर्म की भावनाओं के साथ जोड़ने की कोशिशें यूं तो लगातार चलती रहती हैं लेकिन मौसम चुनाव का हो तो सामाजिक मसलों को मजहबी रंग देकर परवान चढ़ाने की होड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। इन दिनों ऐसी ही कोशिशें तीन तलाक के मसले पर भी हो रही है, गौ-हत्या के मामले में भी और सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर भी। इन तीनों मामलों में धर्म का पक्ष प्रबल दिखाने की कोशिश हर तरफ से की जा रही है। इसके पीछे रणनीति है कि मामला जब धार्मिक रंग लेगा तभी लोगों की भावनाएं उसके साथ गहराई से जुड़ेंगी और समाज में वैचारिक, सैद्धांतिक व व्यावहारिक स्तर पर ऐसा विभाजन हो पाएगा जिसका पूरा राजनीतिक लाभ लिया जा सके। यही वजह है कि ना तो राजनीति करनेवाले इन मसलों पर धार्मिक रंग चढ़ाने में कोई कसर छोड़ रहे हैं और ना ही राजनीति के कृपा प्रसाद से तृप्त होने की कामना रखनेवाले धर्म के धंधेबाज ही इन मामलों में राजनीतिक दृष्टिकोण को स्थापित करने में अपना सहयोग व समर्थन देने में गुरेज कर रहे हैं। जबकि वास्तव में देखा जाए तो ये तीनों मसले ऐसे हैं जो सीधे तौर पर सामाजिक कुरीतियों से जुड़े हैं। इनका कोई ठोस तार्किक धार्मिक आधार उपलब्ध ही नहीं है। इन्हें आधार मिल रहा है बेसिर-पैर की किंवदंतियों और कपोल-कल्पित कहानियों से जो किसी भी धर्म के स्थापित सिद्धांतों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। अगर तीन तलाक की व्यवस्था का कोई धार्मिक आधार उपलब्ध होता तो दुनिया के दो दर्जन से अधिक इस्लामिक देशों में दशकों पहले इस कुप्रथा पर दंडात्मक प्रतिबंध हर्गिज नहीं लगाया जाता। वास्तव में तीन तलाक का मामला धार्मिक मसला है ही नहीं। यह सामाजिक समस्या है। तभी तो इस कुप्रथा के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने ना सिर्फ इस व्यवस्था को महिलाओं के प्रति अन्याय करनेवाली कुरीति का नाम देते हुए इसे असंवैधानिक बताया बल्कि इस पर प्रतिबंध लगाने का उपाय करने के लिये केन्द्र सरकार को निर्देश भी दिया। यानि वास्तव में देखें तो महिला को विवाह व्यवस्था में बराबरी का हक देने के लिये ही तीन तलाक को दंडनीय बनाने के लिये केन्द्र सरकार द्वारा कानून लाने की कोशिश की जा रही है जिसे लोकसभा ने तो पारित कर दिया है लेकिन मामले को धर्म के चश्मे से देखनेवालों ने अपना वोट बैंक दुरूस्त करने के लिये इसे राज्यसभा में अटका-लटका दिया है। इसी प्रकार गौ-हत्या की बात करें तो अगर इस्लाम में यह इतना ही सबाब यानि पुण्य का काम होता तो इस्लामिक संगठनों व जानकारों की काफी बड़ी जमात इसके खिलाफ खड़ी ही नहीं होती और कहीं से भी इसे रोकने का कभी कोई फतवा ही सामने नहीं आता। इस काम को अंजाम देनेवाले बूचड़खानों में हिन्दुओं और मुसलमानों की हिस्सेदारी और भागीदारी को अलग करके नहीं देखा जा सकता। गौ-हत्या करनेवाले को सीधे तौर पर मुसलमानों का प्रतिनिधि मान लेना और इसके लिये पूरी कौम को जिम्मेवार ठहरा देना निहायत ही अनुचित है क्योंकि मुस्लिम समाज का बहुत बड़ा तबका ना सिर्फ गौ-हत्या व गौ-मांस के सेवन को निहायत ही गलत मानता है बल्कि उनमें से कई ऐसे हैं जो किसी भी हिन्दू से अधिक गौ-भक्त हैं और गौ-सेवा का काम कर रहे हैं। इसी प्रकार अगर सनातन धर्म की किसी भी मान्यता या परंपरा में गर्भधारण करने में सक्षम महिलाओं को अछूत मानने का कोई आधार होता तो इस धर्म के सर्वाेच्च केन्द्र माने जानेवाले ज्योतिर्लिंगों, शक्ति पीठों या चार धामों के गर्भगृह में भी महिलाओं के प्रवेश को लेकर अवश्य ही कोई अलग मान्यता, परंपरा या व्यवस्था होती। लेकिन सनातन धर्म के इन सर्वोच्च व सर्वमान्य केन्द्रों में महिलाओं को हर तरह से पुरूषों के बराबर ही दर्शन व पूजन का अधिकार हासिल है। ऐसी सूरत में यह समझ से परे है कि गर्भधारण करने में सक्षम आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर से दूर रखने के पीछे आखिर क्या धार्मिक, वैदिक अथवा तार्किक-प्रामाणिक आधार हो सकता है? कहने का तात्पर्य यह है कि मामला चाहे तीन तलाक का हो, गौ-हत्या का अथवा सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का। ये सभी समस्याएं वास्तव में सामाजिक हैं जिसमें गैरबराबरी, खुराफाती और बदमाशी से भरी हुई सोच छिपी हुई है जिसका प्रतिकार अवश्य किया जाना चाहिये। लेकिन मसला है कि आम लोगों की भावना से जुड़े इन मसलों का राजनीतिक लाभ तब तक नहीं मिल सकता जब तक इस पर धर्म का पक्का मुलम्मा ना चढ़ाया जाए और इन समस्याओं को धर्म विशेष के साथ मजबूती से जोड़ा ना जाए। यही वजह है कि धर्म के ठेकेदारों व धंधेबाजों ने राजनीतिक दलों की इस छुपी हुई मंशा को पूरा करने में अपना सहयोग देते हुए समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करने और इन मसलों को धार्मिक रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लिहाजा आवश्यक है कि लोग जागरूक हों और सही-गलत का फर्क समझें वर्ना अंधविश्वास और मासूमियत के दोहन का सिलसिला बदस्तूर चलता ही रहेगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

‘फेडरल फ्रंट की दुधारी तलवार का राजनीतिक वार’

विज्ञान की नजर में निर्वात की परिकल्पना सैद्धांतिक ही है, व्यावहारिक कतई नहीं है। प्रकृति के किसी भी आयाम में निर्वात के लिये कोई स्थान नहीं है। बल्कि यूं कहें तो गलत नहीं होगा कि निर्वात की अवस्था ही अपने आप में अप्राकृतिक है। प्रकृति हमेशा इसके सख्त खिलाफ रहती है और इसके अस्तित्व को मिटाने के लिये हमेशा प्रयत्नशील रहती है। ऐसा प्रकृति के हर आयाम में दिखता है। प्रकृति की ही तरह राजनीति में भी निर्वात के लिये कहीं कोई जगह नहीं होती। सैद्धांतिक तौर पर भले ही निर्वात की अवस्था दिखाई पड़े लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह संभव ही नहीं है। खास तौर से तात्कालिक तौर पर तो कभी निर्वात यानि शून्यता की स्थिति बनती ही नहीं है। इसकी परिकल्पना को हमेशा दूरगामी तौर पर ही दिखाया-बताया जाता है। ठीक वैसे ही जैसे हालिया दिनों तक यह बताया जा रहा था कि मौजूदा वक्त में प्रधानमंत्री मोदी का कोई दूसरा विकल्प उभर कर सामने आ ही नहीं सकता। लेकिन कल तक दूर से दिखाई पड़नेवाली निर्वात, शून्यता अथवा विकल्पहीनता की परिकल्पना का आज की तारीख में कोई अस्तित्व ही महसूस नहीं हो रहा है। बल्कि अब तो यह चर्चा भी तेजी से जोर पकड़ रही है कि मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल भी पाएगा या नहीं? खास तौर से हालिया चुनावों में कांग्रेस को मिली संजीवनी से स्पष्ट हो गया कि भाजपा की राहें उतनी आसान नहीं रहनेवाली हैं जितना उसने भौकाल बनाया हुआ है। साथ ही इन चुनावों से यह भी साफ हो गया कि इस बार क्षेत्रीय दलों के उभार को रोक पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल होगा। इसमें भाजपा के लिये सबसे परेशानी की स्थिति वह होती जिसमें उसके तमाम विरोधी एक मंच पर एकत्र हो जाते। हालांकि इसकी कोशिशें बहुत हुईं लेकिन कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल सका। समाजवादियों के विलय की बात आई तो जिस सपा को अगुवा बनाने की कोशिश की गई उसने ही अपनी पहचान मिट जाने की चुनौती से डर कर किनारा कर लिया। उसके बाद संयुक्त मोर्चा बनाने की बात आई तो नेतृत्व के सवाल पर मामला बिगड़ गया। बाद में कांग्रेस ने अपनी अगुवाई में राष्ट्रव्यापी महागठजोड़ बनाने का प्रयास किया तो प्रधानमंत्री पद पर उसकी दावेदारी को स्वीकार्यता नहीं मिलने के कारण उसे अपने कदम पीछे खींचने पड़े। यहां तक कि क्षेत्रीय दलों का प्रदेश स्तरीय मोर्चा बनाने के ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू और शरद पवार के प्रयास भी सफल नहीं हो सके। यानि विपक्ष को एक मंच पर लाना तराजू पर मेढ़क तौलने सरीखा दुरूह काम ही बना रहा। लेकिन कहते हैं कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। लिहाजा भाजपा विरोधी वोटों का बंटवारा रोकने की राह अब स्पष्ट तौर पर निकलती दिखाई पड़ रही है और इसकी नींव रखी है तेलंगाना के मुख्यमंत्री व टीआरएस सुप्रीमो के चंद्रशेखर राव ने। दरअसल अब तक के तमाम प्रयास इस वजह से फलीभूत नहीं हो सके क्योंकि किसी एक दल की राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी हैसियत ही नहीं थी कि वह विपक्ष की धुरी बन सके। लिहाजा अब दो-स्तरीय घेरेबंदी का फार्मूला अमल में लाया जा रहा है और प्रयास हो रहा है कि जिन सूबों में कांग्रेस की स्थिति और उपस्थिति मजबूत है वहां कांग्रेस को साथ लेकर मोर्चाबंदी की जाये और जहां कांग्रेस को साथ लेने से कोई फायदा मिलने की उम्मीद नहीं है अथवा जिस सूबे की क्षेत्रीय ताकतें अपने इलाके में कांग्रेस को दोबारा पनपने व बढ़ने का मौका नहीं देना चाहती वह कांग्रेस व भाजपा से बराबर दूरी कायम करते हुए गठित होनेवाले फेडरल फ्रंट को अपना समर्थन दे। इस फेडरल फ्रंट के गठन की परिकल्पना को अमली जामा पहनाने के लिये ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ चंद्रशेखर राव की बातचीत का पहला चरण भी पूरा हो गया है। इसके अलावा सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ भी उनकी मुलाकात होनेवाली है जो अपने विधायक को मध्य प्रदेश में मंत्री नहीं बनाए जाने के कारण कांग्रेस से नाराज बताए जा रहे हैं। इस फ्रंट के घटक दलों में सभी अलग-अलग सूबों के क्षत्रप हैं लिहाजा चुनाव होने तक किसी की महत्वाकांक्षा आपस में नहीं टकराने वाली है। ना तो टीडीपी और सपा-बसपा के बीच सीट समझौते का कोई सवाल पैदा होता है और ना ही बीजेडी का तृणमूल कांग्रेस के साथ। यानि महत्वाकांक्षाओं के टकराव की फिलहाल कोई संभावना ही नहीं है। अलबत्ता इस फ्रंट के गठन से जमीनी स्तर पर यह संदेश तो जाएगा ही कि कांग्रेस और भाजपा के अलावा भी कोई तीसरा विकल्प है जिसके घटक दलों में कोई तनाव और विवाद नहीं है और वे सभी अलग-अलग सूबों में सफलता के साथ सरकार चला रहे हैं अथवा चला चुके हैं। निश्चित ही इस पहल से तीसरे विकल्प की मजबूती के प्रति मतदातओं को आश्वस्त किया जा सकेगा। हालांकि इस पूरे समीकरण में भाजपा इतनी ही उम्मीद पाल सकती है कि उसके विरोधी वोटों का बंटवारा हो जाए और त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति में उसे जीत की राह पर आगे निकलने का मौका मिल जाए। लेकिन इस संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता है कि भाजपा विरोधी वोटों का बंटवारा ही ना हो और जिस सीट पर कांग्रेसनीत महागठजोड़ और फेडरल फ्रंट में से जिसकी बढ़त बने उसके पक्ष में ही भाजपा विरोधी मतों का ध्रुवीकरण हो जाए। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया। @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

‘सत्ता-पक्ष और मुख्य-विपक्ष पर हावी होता तीसरा-पक्ष’

यूपी में कांग्रेस को किनारे धकेल कर बबुआ-बुआ और ताऊ की संयुक्त ताकत से सियासत की नई इबारत लिखने की हो रही कोशिश कतई अप्रत्याशित नहीं है। बहनजी ने तो काफी पहले ही अपने इरादों का इजहार कर दिया था कि वे इस बार केन्द्र में मजबूत नहीं बल्कि मजबूर सरकार बनवाने के पक्ष में हैं। काफी हद तक ऐसी ही चाहत अखिलेश यादव की सपा, शरद पवार की राकांपा, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी सरीखे ऐसे दलों की भी है जिन्होंने इस बार अपने हक में सत्ता का छींका टूटने की उम्मीद बांध रखी है। ये वो दल हैं जिनका प्रभाव क्षेत्र इतना विस्तृत है कि इनमें से हर कोई तीसरी सबसे बड़ी ताकत के तौर पर उभरने की पूरी काबलियत रखता है। लिहाजा इन सबके बीच इस बात पर तो पूरी तरह आम सहमति का माहौल है कि इस बार केन्द्र में संसद का स्वरूप त्रिशंकु रहे और जोड़-तोड़ व जुगाड़ के बिना कोई सरकार ना बना पाए। लेकिन मसला है कि त्रिशंकु जनादेश की सूरत में मजबूर सरकार तो तब बनेगी जब संसद में किसी दल को ना तो बहुमत हासिल होगा और ना ही उसकी स्थिति ऐसी होगी कि सिर्फ दो-तीन बड़े दलों के समर्थन से बहुमत के जादूई आंकड़े को हासिल कर ले। यानि देश की दोनों सबसे बड़ी पार्टियां भाजपा और कांग्रेस जब अधिकतम डेढ़ सौ सीटों के नीचे सिमटेंगी तभी तीसरी ताकतों की किस्मत से सत्ता का छींका टूटने की संभावना बन पाएगी। हालांकि भाजपा को कमजोर करने की कोशिश कर रहे भीतराघाती सहयोगियों की ओर से भी ऐसा प्रयास अवश्य किया जाएगा और पांच राज्यों का चुनावी नतीजा सामने आने के बाद इस संभावना को काफी बल मिला है कि अगर क्षेत्रीय ताकतें अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए भाजपा को फैलने और फलने-फूलने के लिये पर्याप्त सीटों पर लड़ने का मौका ना दें तो भगवा खेमा भी चुनाव के बाद जोड़-तोड़ और जुगाड़ के बिना दोबारा अपनी सरकार नहीं बना पाएगा। इसी संभावना को भुनाने के लिये अब रामविलास पासवान की लोजपा ने भी बिहार के अलावा यूपी-झारखंड में हिस्सेदारी के लिये त्यौरियां दिखानी शुरू कर दी हैं और शिवसेना की उम्मीदें और अपेक्षाएं भी कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। इसके अलावा अभी छोटे क्षेत्रीय दलों की मांगों का सामने आना और उस पर विचार होना तो बाकी ही है। यानि राजग के घटक दलों की कोशिश निश्चित ही यही रहेगी कि वे चुनाव लड़ने के लिये अधिकतम सीटें प्राप्त करें ताकि चुनाव के बाद भगवा खेमे की उन पर निर्भरता बढ़े जिससे संसदीय भागीदारी के अनुपात में सत्ता की मलाई में अधिकतम हिस्सेदारी सुनिश्चित की जा सके। दूसरी ओर विपक्षी खेमे में भी इस बात का पुरजोर प्रयास हो रहा है कि भाजपा के स्वाभाविक विकल्प के तौर पर कांग्रेस को कतई नहीं उभरने दिया जाये। इसी सोच के तहत कांग्रेस को किनारे लगाने की कोशिश यूपी में भी होती हुई दिखाई पड़ रही है और इसी रणनीति क तस्वीर तीन राज्यों में हुई कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की ताजपोशी के मंच पर भी दिखाई पड़ी। उस शपथ ग्रहण समारोह से केवल सपा और बसपा ने ही किनारा नहीं किया बल्कि पवार-ममता सरीखे विपक्ष के दिग्गज छत्रप भी नदारद रहे। दरअसल भाजपा से तीन राज्य छीनने में कामयाब रहनेवाली कांग्रेस अब उन विपक्षियों की आंखों में खटकने लगी है जो मजबूर सरकार गठित करने के ठोस दावेदार के तौर पर उभरने की उम्मीद पाले हुए हैं। इन चुनावों में यह तो स्पष्ट हो ही गया कि अगर कांग्रेस पूरे दम-खम से राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ विकल्प बनकर खड़ी हो जाए और क्षेत्रीय दलों का उसे पूरा सहयोग मिल जाए तो चुनावी नतीजों की तस्वीर में जादूई परिवर्तन होने की संभावना को कतई नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन इस समीकरण को सार्थक करना क्षेत्रीय दलों के लिहाज से लाभदायक नहीं है। उनको अधिकतम लाभ तो तब होगा जब भाजपा हार जाए लेकिन कांग्रेस जीत नहीं पाए। ऐसी तस्वीर तभी बन सकती है जब तीसरी व क्षेत्रीय ताकतें सूबाई स्तर पर या तो कांग्रेस को तभी अपने साथ जोड़ें जब वह न्यूनतम सीटों पर लड़ने के लिये सहमत हो वर्ना कांग्रेस और भाजपा से समानांतर दूरी बनाकर चुनाव लड़ना ही उनके लिये श्रेयस्कर होगा। चुंकि यूपी में कांग्रेस की मांग को पूरा करने के बाद सपा-बसपा के पास आपस में बांटने के लिये उतनी सीटें ही नहीं बचेंगी जितनी वे अपने दम पर भी आसानी से जीतने की क्षमता रखती हैं लिहाजा कांग्रेस को किनारे लगाकर आगे बढ़ना ही बुआ-बबुआ और ताऊ के लिये लाभदायक दिखाई पड़ रहा है। यही स्थिति बिहार में भी बन सकती है अगर लोजपा ने राजग से निकल कर महागठबंधन के साथ जुड़ने का मन बना लिया। वैसे भी कांग्रेस की कमजोरी यही है कि उसके पास यूपी, बंगाल, बिहार और झारखंड के ऐसे क्षेत्र में समाज के किसी भी वर्ग के बीच अपना ठोस जनाधार ही नहीं बचा है जहां से लोकसभा के कुल एक-तिहाई से अधिक सांसद जीत कर आते हैं। लोकसभा की एक-तिहाई सीटों का निर्वाचन करनेवाले बंगाल सहित दक्षिणी राज्यों में भाजपा की भी ऐसी ही ठोस जनाधार विहीनता स्थिति है। ऐसे में क्षेत्रीय दलों के उभार को रोकना और किसी बड़ी लहर के बिना होने वाले चुनाव में मजबूत सरकार के लिये जनादेश आ पाना तो नामुमकिन की हद तक मुश्किल ही है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर  #Navkant_Thakur    

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

‘बेढ़ंगी चाल’ ‘संदेहास्पद चरित्र’ और ‘तानाशाही चेहरे’ की हार

लोग मिर्च इसलिये खाते हैं ताकि कड़वी लगे और चीनी का इस्तेमाल मिठास के लिये किया जाता है। अगर मिर्च ही चीनी से अधिक मीठी हो जाए तो कोई चीनी क्यों खाएगा। ऐसी ही तस्वीर पांच राज्यों के चुनावी नतीजों में भी उभरी है जब भाजपा के चाल-चरित्र और कथनी-करनी में तारतम्यता नहीं दिखी तो मतदाताओं को मजबूरन भाजपा से किनारा करना पड़ा है। वास्तव में देखें तो भाजपा ने बीते साढ़े चार सालों में जरा भी एहसास नहीं कराया है कि यह वही पार्टी है जिसकी स्थापना मूल्य आधारित सिद्धांतवादी राजनीति के लिये ‘पार्टी विद डिफरेंस’ के रूप में की गई थी। हालांकि अपने पूरे कार्यकाल में मोदी-शाह की जोड़ी ने संगठन व सरकार को जिस तरह से संचालित किया है उसमें बेशक कई खूबियां होंगी लेकिन कई ऐसी खामियां भी रही हैं जिसे नजरअंदाज करना आम मतदाताओं के लिये भी मुश्किल हो गया। हालांकि सतही तौर पर देखा जाये तो पांच राज्यों के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े गए और उसके नतीजों के प्रत्यक्ष प्रभाव का दायरा भी सूबाई स्तर तक ही सीमित है लिहाजा इसे मोदी-शाह के कामकाज से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। लेकिन गहराई से परखें तो पांचों ही राज्यों के जनादेश की समग्र तस्वीर स्पष्ट तौर पर इशारा कर रही है कि मतदाताओं ने सिर्फ सूबाई स्तर पर ही भाजपा को खारिज नहीं किया है बल्कि केन्द्रीय नेतृत्व के प्रति भी जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति हुई है। वर्ना सभी राज्यों में भाजपा को एक साथ शिकस्त का सामना नहीं करना पड़ता। यह जनादेश दर्शाता है कि मतदाताओं को अच्छे दिनों की जो आस बंधाई गई थी उसके पूरा हो पाने की उम्मीद भी नहीं बची है। हालांकि अच्छे दिन आए जरूर लेकिन वह अंबानी, अडानी और रामदेव जैसे उद्योगपतियों के और भाजपा व संघ परिवार से जुड़े संगठनों के हिस्से में आए। आम जनता के हिस्से में तो नोटबंदी ही आई जिसमें कितनों के रोजगार गए, कितने ही लोगों को किस स्तर की विपत्ति झेलनी पड़ी और कितने छोटे व्यापारी व स्वरोजगारी तबाह-बर्बाद हो गए इसकी ना तो कभी सुध ली गई और ना ही उनके दुख-तकलीफ को सरकारी स्वीकार्यता मिली। जब आम लोगों ने पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा को सत्ता की बागडोर सौंपी थी तो इसके पीछे भरोसा था पार्टी के मूलभूत सिद्धांतों का। उम्मीद थी चाल-चरित्र, रीति-नीति और कथनी-करनी में एकरूपता की। विश्वास था संगठन के आंतरिक लोकतंत्र और अनुभवी व युवा नेतृत्व के सामंजस्य का। लेकिन बीते साढ़े चार सालों में ना तो भाजपा ने अपने मूल सैद्धांतिक मसलों को आगे बढ़ाने में रूचि दिखाई, ना कथनी और करनी में तालमेल दिखाई पड़ा और ना ही संगठन में सबको साथ लेकर चलना जरूरी समझा गया। अलबत्ता मुजाहिरा किया गया ‘बेढ़ंगी चाल’ ‘संदेहास्पद चरित्र’ और ‘तानाशाही चेहरे’ का जिसके नतीजे में आज का यह चुनावी नतीजा सामाने आया है। इस बात को कतई नकारा नहीं जा सकता है कि अगर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने अपनी विश्वसनीयता कायम रखी होती और हर स्तर पर तानाशाही प्रवृत्ति का परिचय नहीं दिया होता तो राजस्थान और मध्य प्रदेश में तस्वीर अलग दिखाई पड़ती जहां चुनावी नतीजों में किसी बड़े सत्ता विरोधी लहर का रूझान नहीं दिखा है। लेकिन जिस मनमाने तरीके से संगठन और सरकार का संचालन हो रहा है उसकी बानगी किसानों के आंदोलन के दौरान भी दिखाई पड़ी जिसमें कुल चार बार देश भर के किसानों ने दिल्ली में दस्तक देकर अपनी व्यथा-कथा सुनाने की कोशिश की लेकिन उनकी बात सुनना भी गवारा नहीं किया गया। बात तो उन छोटे दुकानदारों और खुदरा व्यापारियों की भी नहीं सुनी गई जो कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि भाजपा मल्टीनेशनल और आॅनलाइन कंपनियों के लिये मल्टीब्रांड खुदरा बाजार का दरवाजा खोल देगी। दलित उत्पीड़न कानून के मामले में तो सुप्रीम कोर्ट की बात भी नहीं सुनी गई। इसी प्रकार यह कल्पना से भी परे था कि भाजपा राममंदिर, धारा-370, समान नागरिक संहिता और गौ-हत्या सरीखे मूलभूत सैद्धांतिक मामलों की अनदेखी करती रहेगी। कथनी में भाजपा भव्य राममंदिर के पक्ष में है लेकिन करनी में वह अपनी ओर से कोई कदम उठाने के लिये तैयार नहीं है। कथनी में जम्मू कश्मीर को धारा 370 से मुक्त करने की बात की जाती है लेकिन करनी में उस पीडीपी से गठजोड़ करके सरकार बनाई जाती है जो सूबे के विशेषाधिकार से समझौता करने की सोच भी नहीं सकती। कथनी में गौ-रक्षा की कसमें खाई जाती हैं लेकिन करनी में तमाम ऐसे कदम उठाए जाते हैं ताकि पूर्वोत्तर से लेकर गोवा तक में गौ-मांस की निर्बाध आपूर्ति बदस्तूर जारी रहे। कथनी में राजग के सहयोगियों को साथ लेकर चलने की बात कही जाती है लेकिन करनी में वरिष्ठ जदयू नेता केसी त्यागी के मुताबिक एक बार भी राजग की औपचारिक बैठक आयोजित करने की जहमत नहीं उठाई जाती है। उस पर कोढ़ में खाज की कमी पूरी कर देती है राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल की जाने वाली मोदी की वह शब्दावली जो भारत के प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ही गिराती है। यानि समग्रता में देखें तो भाजपा से आम लोगों की जो उम्मीदें थी वह ना तो सैद्धांतिक तौर पर पूरी हो पाईं और ना ही व्यावहारिक तौर पर। लिहाजा जब सिर्फ सत्ता की राजनीति करने वालों में से ही किसी को चुनना है तो भाजपा में ही कौन से सुर्खाब के पंख लगे हैं, जिसका कांग्रेस में अभाव है? ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @नवकांत ठाकुर  #Navkant_Thakur

गुरुवार, 29 नवंबर 2018

‘उसे कहो कि वो फिर से मुकर न जाए कहीं’

भारत-पाकिस्तान के रिश्ते इन दिनों जिस मोड़ से गुजर रहे हैं उसे सुप्रसिद्ध कवि बल्ली सिंह चीमा के शब्दों में कहें तो- ‘करो न शोर परिन्दा है डर न जाए कहीं, जरा-सा जीव है हाथों में मर न जाए कहीं, वो फिर नए वादों के साथ उतरा है, उसे कहो कि वो फिर से मुकर न जाए कहीं।’ वाकई पाकिस्तान के साथ भारत का जो तजुर्बा रहा है उसमें यह डर लगना स्वाभाविक है कि गले लगने के बहाने कहीं एक बार फिर हमारी पीठ में खंजर ना घोंप दिया जाए। तभी दूध से जलता आ रहा भारत इस बार करतारपुर काॅरिडोर की कथित छाछ भी फूंक-फूक कर पी रहा है। बेशक पाकिस्तान की कोशिश है करतारपुर काॅरिडोर के मामले में गर्मजोशी दिखाकर भारत को एक बार फिर शीशे में उतार लिया जाए और तमाम गतिरोधों को दूर कर रिश्तों पर जमी बर्फ को पूरी तरह पिघला दिया जाए। लेकिन पाकिस्तान की पुरानी करतूतें ऐसी नहीं हैं कि उस पर केवल इस वजह से भरोसा कर लिया जाए क्योंकि उसने दोस्ती की राह पर एक कदम आगे बढ़ते हुए करतारपुर काॅरिडोर को खोलने की दशकों पुरानी हमारी मांग पूरी कर दी है। तभी तो जहां एक ओर सार्क देशों की बैठक में भाग लेने के लिये पाकिस्तान जाने से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से इनकार कर दिया गया है वहीं दूसरी ओर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने फिर दोहराया है कि आतंकवाद का सिलसिला जारी रहते हुए पाकिस्तान के साथ औपचारिक बातचीत करना संभव ही नहीं है। हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बिल्कुल सच कहा है कि दोनों मुल्क एटमी हथियारों से लैस है लिहाजा आपसी मसलों को हल करने के लिये जंग कोई विकल्प ही नहीं है बल्कि जंग के बारे में सोचना भी पागलपन ही है। लेकिन सवाल है कि आखिर ऐसी सोच रखता कौन है और उस दिशा में हमेशा पहलकदमी करने के लिये आतुर कौन रहता है? यह भारत की ओर से की गई पहलकदमियों का ही नतीजा रहा है कि अमन की आशा को पूरा करने के लिये कभी शिमला में समझौता होता है तो कभी शर्म-अल-शेख में। कभी समझौता एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई जाती है तो कभी कारवां-ए-अमन को आगे बढ़ाया जाता है। इसी कड़ी में अब करतारपुर काॅरिडोर को खोलने की दिशा में दोनों मुल्कों ने पहलकदमी की है। बेशक यह एक नई शुरूआत है, पाकिस्तान में नए निजाम द्वारा शासन की बागडोर संभाले जाने के बाद। लेकिन यह पहली बार नहीं है जब अमन की आशा जगाते हुए सरहद के दोनों तरफ के हुक्मरानों ने इस तरह की पहलकदमी की हो। ऐसी कोशिशें बार-बार और लगातार होती रही हैं। खास तौर से भारत की ओर से। भारत ने हमेशा ही पाकिस्तान को अमन और शांति की दिशा में आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया और बड़े भाई की हैसियत से तमाम पहलकदमियां भी कीं। लेकिन गिले-शिकवे भुलाकर गले लगने की पहलकदमियों के बदले में हर बार पाकिस्तान की ओर से भारत की पीठ में खंजर ही घोंपा गया। कभी संसद पर हमला कराया गया तो कभी कारगिल का युद्ध थोपा गया। कभी 26/11 के मुंबई हमलों की साजिश अंजाम दी गई तो कभी पठानकोट और उड़ी के सैन्य ठिकाने पर हमला हुआ। नतीजन अब स्थिति यह हो गई है कि करतारपुर साहिब काॅरिडोर खुलने के मौके पर भी भारत को एहतियातन कूटनीतिक सावधानी बरतने पर मजबूर होना पड़ रहा है। हालांकि ऐसा नहीं है कि करतारपुर काॅरिडोर खोलने को लेकर दोनों मुल्कों के बीच बनी सहमति से खुशी, उत्साह और उमंग में कोई कमी हो। बल्कि आजादी के बाद से ही इस काॅरिडोर को खोले जाने की जो मांग की जाती रही है उसके पूरा होने पर सियासतदानों से लेकर आम आवाम तक में काफी उत्साह और उमंग है। लेकिन इस उत्साह का अगर दिल खोलकर प्रदर्शन करने के प्रति संकोच दिखाया जा रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान की हरकतों का वह पुराना इतिहास ही है जिसके तहत सुलह की हर बोली का जवाब नफरत की गोली से मिलता आया है। तभी तो पाकिस्तान की ओर से की जा रही खुराफाती हरकतों के प्रति दुख, तकलीफ और आक्रोश के कारण ही इस काॅरिडोर के पाकिस्तान की ओर के हिस्से के शिलान्यास के कार्यक्रम में जाने से पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने भी परहेज बरता है और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी। यहां तक कि नवजोत सिंह सिद्धू भी निजी हैसियत से ही वहां गए हैं। वर्ना अगर पाकिस्तान ने वाकई अमन की राह पकड़ते हुए खुराफाती आतंकी गतिविधियों को संरक्षण देना और उसका संचालन करना बंद कर दिया होता तो कोई कारण नहीं था कि सरहद के इस तरफ के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इमरान खान होते और सरहद के उस तरफ के कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने नरेन्द्र मोदी खुद ही जाते। लेकिन कहते हैं कि चोर अगर चोरी करना छोड़ भी दे तो हेराफेरी करना नहीं छोड़ सकता। शायद तभी इमरान द्वारा काॅरिडोर का शिलान्यास किये जाने के समारोह में आतंकी सरगना हाफिज सईद का सहयोगी और खालिस्तान समर्थक गोपाल चावला भी मौजूद था और पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से हाथ मिलाता हुआ भी नजर आया। समारोह में चावला की मौजूदगी पाकिस्तान द्वारा रिश्तों में विश्वास की चोरी हो या उसकी फौज द्वारा की गई हेराफेरी, लेकिन इसे नजरअंदाज तो कतई नहीं किया जा सकता। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 15 नवंबर 2018

‘जहां से हैं उम्मीदें, वहीं हो रही भाजपा की फजीहत’

जहां से उम्मीदें पाल रखी हों वहीं अगर फजीहत झेलनी पड़ जाए तो किस कदर निराशा का वातावरण बनने लगता है इसका बखूबी अंदाजा इन दिनों भाजपा को हो रहा है। दरअसल आगामी लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करा कर सत्ता पर अपनी पकड़ बरकरार रखने की भाजपा की उम्मीदें इस बार पश्चिम बंगाल और ओडिशा के अलावा उन दक्षिणी सूबों पर टिकी हुई हैं जहां पिछले चुनाव में कथित मोदी लहर का कोई असर नहीं पड़ा था। हालांकि पूर्वोत्तर के विधानसभा चुनावों से लेकर ओडिशा व पश्चिम बंगाल तक में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराके भाजपा ने लोकसभा चुनाव में इन क्षेत्रों में बेहत प्रदर्शन की उम्मीदें कायम रखी हुई हैं लेकिन दक्षिणी राज्यों से भाजपा ने जितनी उम्मीदें पाली हुई हैं उसके पूरा हो पाने की संभावना लगातार कमजोर होती दिख रही है। दक्षिण भारत में भाजपा के लिये लिटमस टेस्ट कहे जाने वाले कर्नाटक में हुए लोकसभा के तीन और विधानसभा के दो सीटों के उपचुनाव का जो नतीजा सामने आया है उसने यह साफ कर दिया है तमाम कोशिशों के बावजूद दक्षिणी राज्यों के मतदाताओं का विश्वास जीतने में भाजपा कतई कामयाब नहीं हो पायी है। यह चुनाव ऐसे समय में हुआ है जब अगले साल के लोकसभा चुनाव का वक्त बेहद करीब है और तमाम पार्टियां केन्द्र की सत्ता पर कब्जा जमाने के लिये उतावलापन दिखा रही हैं। ऐसे समय में अगर लोकसभा की तीन में से अपनी जीती हुई केवल एक सीट पर ही बढ़त कायम रहे जबकि दो सीटों पर शिकस्त का सामना करना पड़े और विधानसभा की दोनों सीटें गंवानी पड़े तो समझा जा सकता है कि सूबे का माहौल किस कदर भाजपा के लिये बदस्तूर चुनौती बना हुआ है। हालांकि यह पहला उपचुनाव नहीं है जिसमें भाजपा को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो बल्कि वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के  बाद से अब तक देश भर में 30 लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए हैं जिनमें से भाजपा को केवल छह सीटें दोबारा जीतने में ही कामयाबी मिल पाई है। जबकि जिन 30 सीटों पर उपचुनाव हुए उनमें से कुल 16 भाजपा के कब्जेवाली थी और विपक्ष की जीती हुई केवल 14 सीटें ही थीं। लेकिन भाजपा को किसी भी उपचुनाव में विपक्ष के कब्जे वाली एक भी सीट जीतने में कामयाबी नहीं मिल सकी और उसने अपने कब्जे वाली दस सीटें भी गंवा दीं जिसके नतीजे में अब लोकसभा में उसकी सीटों का आंकड़ा 282 से घटकर 272 रह गया है। लेकिन अब तक हुए उपचुनावों का नतीजा सामने आने के बाद भाजपा को उम्मीद रहती थी कि स्थिति को सुधार लिया जाएगा जबकि अब स्थिति को सुधारने का वक्त बचा ही नहीं है। अब तो समय है जमीनी हकीकत को स्वीकार करते हुए स्थिति के मुताबिक ढ़लने और खुद को बदलने का ताकि संभावित नुकसान कम से कम किया जा सके। सच तो यह है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हिन्दी पट्टी के प्रदेशों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का रिकार्ड बना लिया था जिसके बाद अब आगामी चुनाव में इससे आगे बढ़ पाने की कोई राह ही नहीं बची है। बल्कि भाजपा को भी पता है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात सरीखे जिन पांच सूबों की सभी लोकसभा सीटों पर उसे पिछली बार सौ फीसदी सीटों पर जीत हासिल हुई थी और यूपी की अस्सी में से 73 सीटों पर उसने कामयाबी का झंडा गाड़ा था उस प्रदर्शन को दोहरा पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल है। ऐसे में उसकी निगाहें पूर्वोत्तर के अलावा दक्षिणी राज्यों पर ही टिकी हुई थीं और उत्तर व पश्चिमी राज्यों में संभावित नुकसान की भरपाई के लिये वह पूरब, पूर्वोत्तर और दक्षिण में ही अपने प्रदर्शन को सुधारने के अभियान में जुटी हुई थी। इसमें कर्नाटक का महत्व इसलिये भी बढ़ जाता है क्योंकि इसे दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है और दक्षिण में भाजपा की जीत का दरवाजा तभी खुल सकता है जब कर्नाटक में बेहतर प्रदर्शन की पक्की गारंटी हो जाए। लेकिन स्थिति यह है कि कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु की कुल 139 लोकसभा सीटों में से भाजपा को केवल कर्नाटक की 28 और आंध्र प्रदेश की 25 सीटों से ही कुछ आस है जबकि बाकी सूबों में उसका खाता ही खुल जाए तो बहुत बड़ी बात होगी। हालांकि आंध्र और कर्नाटक में भी भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रोकने के लिये कांग्रेस ने मजबूत घेराबंदी कर दी है जिससे बच बेहद मुश्किल होने वाला है। दूसरी ओर बिहार और यूपी की कुल 120 सीटों में से बिहार की 40 सीटों पर उसके लिये मुकाबला बेहद कड़ा रहना स्वाभाविक ही है जबकि यूपी में अगर विपक्षी दलों का महागठजोड़ कायम हो गया तो भाजपा को लेने के देने पड़ सकते हैं। यानि समग्रता में देखा जाये तो लोकसभा की 543 में से दक्षिण और यूपी-बिहार की कुल 259 सीटें अलग कर दें तो बाकी बची 284 सीटों पर ही भाजपा इस समय विपक्ष को टक्कर देने की स्थिति में है और उसमें भी अगर भाजपा की कमजोर स्थिति वाली ओडिशा, पश्चिम बंगाल, जम्मू कश्मीर और पंजाब सरीखे सूबों की सीटों को अलग कर दें तो ऐसी सीटें ही दो सौ से कम बचती हैं जहां से वाकई भाजपा अपनी जीत की बुनियाद रखने में सक्षम हो सकती है। लिहाजा अब केन्द्र में भाजपा की वापसी की संभावनाएं तभी बन सकती हैं जब अव्वल तो विपक्ष का गठजोड़ ना बने और दूसरे अपनी मजबूत उपस्थिति वाली सीटों पर वह जीत दर्ज कराने में कामयाब हो सके। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर  #Navkant_thakur

बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

‘साथियों को संतुष्ट करने की चुनौती इधर भी है, उधर भी’

क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं राष्ट्रीय दलों को किस कदर हैरान व परेशान करती रही हैं यह सर्व-विदित ही है। तभी तो मोदी-शाह की जुगल जोड़ी के राष्ट्रीय राजनीति में प्रादुर्भाव से पूर्व गठबंधन सरकारों के दौर में लालकृष्ण आडवाणी को एक जनसभा में औपचारिक तौर पर मतदाताओं से अपील करनी पड़ी थी कि वे भाजपा को वोट नहीं देना चाहें तो बेशक ना दें लेकिन किसी क्षेत्रीय पार्टी को वोट देने से बेहतर होगा कि वे कांग्रेस को अपना वोट दे दें। जाहिर तौर पर इस आह्वान के पीछे आडवाणी का वह दर्द ही छिपा हुआ था जो अटल युग में गठबंधन की सरकार चलाने के दौरान भाजपा को क्षेत्रीय दलों से मिला था। हालांकि अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाने वालों क्षेत्रीय दलों के समर्थन से ही मजबूती मिलती है लेकिन इसके एवज में जो कीमत चुकानी पड़ती है उसका दर्द ऐसा होता है कि सहा भी ना जाए और किसी से कहा भी ना जाए। इन दिनों ऐसा ही दर्द भाजपा को भी झेलना पड़ रहा है जिसने लोकसभा में हासिल पूर्ण बहुमत के ताव में बीते साढ़े चार सालों तक अपने समर्थक दलों को मनमर्जी से हाथ उठाकर जो भी दे दिया वे उससे ही संतुष्टि जताते रहे और सही मौके का इंतजार करते रहे। किसी ने उफ तक नहीं की और कोई ऐसी मांग भी सामने नहीं रखी जिससे वह भाजपा की नजरों में खटक जाए। लेकिन अब आगामी आम चुनावों की नजदीकियों को देखते हुए राजग के घटक दलों में असंतोष भी उभरने लगा है और उनकी महत्वाकांक्षाएं भी कुलाचें मारने लगी हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि भाजपा को अगर दोबारा सत्ता में आना है तो उसे इनको अपने साथ लेकर चलना ही होगा। लेकिन इन दलों के सामने ऐसी कोई विवशता नहीं है। सरकार भाजपा बनाये या कांग्रेस अथवा कोई अन्य मोर्चा। इनकी ख्वाहिश तो बस इतनी ही है कि जो भी सरकार बने वह मजबूर बने। तभी उसे मजबूती देने के एवज में इनकी दसों उंगलियां घी में होंगी और सिर कढ़ाही में। वर्ना अभी की तरह दया से हासिल खैरात पर ही निर्भर रहकर उन्हें पिछलग्गू बनकर चलना होगा और सरकार का जयकार करना होगा। खैर, अभी यह कहना तो जल्दबाजी होगी कि आगामी सरकार मजबूत बनेगी या मजबूर। लेकिन दोनों ही सूरतों के लिये अपनी मजबूती सुनिश्चित करने के मकसद से तमाम क्षेत्रीय दलों ने अभी से अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी सिलसिले में जिस तरह से बसपा ने कांग्रेस की बांह मरोड़ी हुई है उसी प्रकार राजग के घटक दलों ने भी भाजपा की सींग पकड़ कर उसे नाच नचाना शुरू कर दिया है। इन दलों का साफ तौर पर कहना है कि वे गठबंधन में तभी शामिल होंगे जब उनकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की जाएगी और सम्मानजनक संख्या में सीटें आवंटित की जाएंगी। यानि इन दलों का विकल्प खुला हुआ है कि जिधर अधिक मान-सम्मान मिलेगा और भविष्य सुनिश्चित दिखाई देगा उधर कूच करने में ये कतई देर नहीं लगाएंगे। इसके लिये दबाव बढ़ाने की शुरूआत जदयू ने की तो भाजपा ने उसे बिहार में अपने बराबर सीटें देने का वायदा करके उसे मना लिया। लेकिन जदयू से समझौता होने के बाद से रालोसपा और लोजपा फैल गए हैं। लोजपा ने ना सिर्फ अपनी जीती हुई तमाम सीटों पर दावा ठोंक दिया है बल्कि उसने अपने शीर्षतम नेता रामविलास पासवान के लिये भाजपा से राज्यसभा की सीट भी मांगी है। इसके अलावा कांग्रेस छोड़कर लोजपा में शामिल हुए मणिशंकर पांडेय के लिये पार्टी ने यूपी में भी हिस्सेदारी मांगी है। उधर रालोसपा ने भी साफ कर दिया है कि पिछली बार की तरह उसे बिहार की तीन लोकसभा सीटें नहीं दी गई तो वह गठबंधन से बाहर निकलने के विकल्पों पर भी विचार कर सकती है। भाजपा पर दबाव बढ़ाने के लिये रालोसपा ने मध्य प्रदेश की 66 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार भी उतार दिये हैं। बताया जाता है कि लोजपा और रालोसपा को लपकने के लिये राजद की अगुवाई वाला महागठबंधन भी जुगत बिठा रहा है और इन दोनों दलों को भाजपा द्वारा आवंटित की गई सीटों से अधिक सीटें देने का प्रलोभन भी दिया जा रहा है। दूसरी ओर यूपी में अपना दल हो या सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी। दोनों की ओर से भाजपा पर अधिकतम सीटों का पुरजोर दबाव है। इसी प्रकार शिवसेना भी भाजपा पर इस बात के लिये दबाव बनाए हुए है कि महाराष्ट्र में उसे अधिकतम सीटें आवंटित की जाएं और गुजरात, गोवा व मध्य प्रदेश में भी उसे हिस्सेदारी दी जाए। वर्ना आगामी चुनाव में अपनी खिचड़ी अलग पकाने का ऐलान तो पहले ही किया जा चुका है। ऐसी ही मांगें बाकी दलों की ओर से भी आगे की जा रही हैं और स्थिति यह है कि भाजपा के लिये राजग को पिछले चुनाव की शक्ल में बरकरार रख पाना भारी सिरदर्दी का सबब बनता जा रहा है। वैसे भी बिहार, पंजाब, दिल्ली और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों और यूपी के गोरखपुर व फूलपुर सरीखे गढ़ों के उपचुनावों ने यह तो बता ही दिया है कि ना तो मोदी की कोई राष्ट्रव्यापी लहर चलनेवाली है और ना ही भाजपा अपने दम पर अजेय हो सकती है। ऐसे में भाजपा की विवशता है सबको साथ लेकर चलने की और उसकी इस विवशता का अधिकतम दोहन करने से भला कोई क्यों पीछे रहे? ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

‘सवाल सीबीआई की आग में राख होती साख का’

वाकई गजब की आग दहक उठी है सीबीआई सरीखी ऐसी संस्था में जो स्वायत्त है, खुद-मुख्तार है। जिसकी स्वायत्तता को बरकरार रखने के इंतजाम कागजी तौर पर इतने ठोस हैं कि सरकार भी सीबीआई के मुखिया को ना तो अपनी मर्जी से पद से हटा सकती है और ना ही उसके दो वर्ष के तयशुदा कार्यकाल की सीमा में कोई फेरबदल कर सकती है। चुंकि सीबीआई के मुखिया की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं लिहाजा ये तीनों मिलकर ही इस संस्था में कोई फेरबदल कर सकते हैं। ऐसे किलानुमा स्वायत्तता की व्यवस्था के बाद अगर संस्था के दो शीर्षतम अधिकारी आपस में लड़ जाएं, दोनों एक-दूसरे को भ्रष्ट व रिश्वतखोर साबित करने में जुट जाएं और दोनों की यह लड़ाई अदालत की दहलीज तक पहुंच जाए तो मामले की असाधारण संगीनता का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। संस्था भी वह जो कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी हो। ऐसे में दांव पर सिर्फ उस संस्था की साख ही नहीं लगती बल्कि देश की प्रतिष्ठा और सरकार की प्रशासनिक क्षमता भी सवालों के घेरे में आ जाती है। लिहाजा जब सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने लंबे समय से जारी अपने शीतयुद्ध को सार्वजनिक तौर पर आर-पार की लड़ाई में तब्दील करने की पहलकदमी कर दी तो सरकार के लिये मूकदर्शक बन कर तमाशा देखते रहना नामुमकिन हो गया। हालांकि इन दोनों के बीच लंबे समय से जारी शीतयुद्ध की सरकार अंतिम वक्त तक अनदेखी ही करती रही। ना तो वर्मा द्वारा अस्थाना की पदोन्नति का विरोध किये जाने का गंभीरता से संज्ञान लिया गया और ना ही अस्थाना द्वारा वर्मा के खिलाफ की जाने वाली शिकायतों को कभी विशेष महत्व दिया गया। सरकार साक्षी भाव से तटस्थ और निष्पक्ष ही बनी रही। लेकिन बात जब एफआईआर दर्ज कराने और अस्थाना की गिरफ्तारी की संभावना तक पहुंच गई तब कुछ ऐसा बच ही नहीं गया जिसकी अनदेखी की जा सके। बात केवल इन दोनों की आपसी लड़ाई की नहीं बल्कि मामला सीबीआई की साख का हो गया जिस पर यह तोहमत लग रही थी कि अपराधियों से रिश्वत लेकर सीबीआई के शीर्ष अधिकारी जांच को बाधित करते हैं और मुजरिमों को राहत पहुंचाते हैं। ऐसे में यह मानना पड़ेगा कि सीमित विकल्पों के बावजूद सरकार ने जो प्रभावी कदम उठाए उससे बेहतर और कुछ भी नहीं हो सकता था। हालांकि इन दोनों की लड़ाई में कौन पीड़ित-प्रताड़ित है और कौन साजिशकर्ता मास्टरमाइंड इसका फैसला तो समुचित व निष्पक्ष जांच के बाद ही होगा। लेकिन फिलहाल सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी सीबीआई की साख को बरकरार रखना, संस्था के काम को प्रभावित होनेे से बचाना और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना। इन चुनौतियों से निपटने के लिये सरकार ने ना सिर्फ कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित की बल्कि दोनों के साथ एक-बराबर सलूक करते हुए पूरे मामले को निर्णायक परिणति तक पहुंचाने का प्रभावी इंतजाम भी कर दिया। सरकार ने लंबी छुट्टी पर भेजा तो दोनों को भेजा। एसआईटी से दोनों की बराबर जांच कराने की बात कही गई। दोनों के कार्यालय को एक बराबर तरीके से खंगाला गया और उसमें संस्था के किसी तीसरे को घुसने की इजाजत नहीं दी गई। सीबीआई की कमान भी नंबर तीन कहे जानेवाले नागेश्वर राव को सौंपी गयी जिन्होंने दोनों द्वारा नियुक्त किये गये उनके करीबी अधिकरियों का थोक के भाव में तबादला सुनिश्चित किया। यानि समग्रता में देखें तो विवश होकर सरकार द्वारा सीबीआई में किये गये हस्तक्षेप को किसी भी लिहाज से कतई पक्षपातपूर्ण नहीं कहा जा सकता है। ऐसे में बेहतर होता कि सरकार द्वारा विवशता में उठाए गए इस कदम का एहतराम और सम्मान किया जाता। लेकिन चुनावी वर्ष होने के कारण हर मामले का राजनीतिक पहलू उभारने और सरकार की शासन व प्रशासन क्षमता पर उंगली उठाकर अपनी राजनीति चमकाने का मौका भला कोई कैसे हाथ से जाने दे सकता है। तभी तो वर्मा को सीबीआई का निदेशक बनाये जाने का विरोध करनेवाले अब उन्हें लंबी छुट्टी पर भेजे जाने का भी विरोध कर रहे हैं। विरोध कभी इस स्तर का कि वर्मा के कांधे पर बंदूक रखकर सवोच्च न्यायालय से ऐसा कारतूस हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है जिससे सरकार की पगड़ी पर सीधा निशाना दागा जा सके। कांग्रेस तो एक कदम और आगे बढ़ गई और उसने सीबीआई की साख बचाने के लिये सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को असंवैधानिक व नियमों के खिलाफ बताते हुए पूरे मामले को राफेल सौदे से जोड़ दिया। जबकि यह सामान्य समझ की बात है कि आखिर राफेल खरीद के मामले से सीबीआई का क्या संबंध हो सकता है? सीबीआई को जब ना तो सरकार ने और ना ही अदालत ने राफेल सौदे की जांच के लिये अधिकृत किया है तो यह कहना वाकई मजाकिया ही है कि राफेल की जांच करने का प्रयास करने के कारण वर्मा पर सरकार का नजला गिरा है। खैर इश्क, जंग और सियासत में जो ना हो जाए वह कम है। वैसे अगर एक मिनट के लिये यह मान भी लिया जाए कि सरकार ने पूरे मामले में बहुत ही गलत किया है तो समस्या गिनाने वालों को कोई ऐसा समाधान भी बताना चाहिये ताकि सीबीआई की साख भी सलामत रहे, दोषियों की पहचान भी हो और निर्दोष को प्रताड़ना से भी बचाया जा सके? ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

‘नहीं होने का सवाल ही नहीं था अकबर का इस्तीफा’

इतिहास गवाह है कि किसी भी बड़े आंदोलन की शुरूआत के वक्त उसका उपहास ही होता है। लोग मजाक उड़ाते हैं, फब्तियां कसते हैं और कटाक्ष करते हैं। लेकिन इस शुरूआती प्रतिरोध को झेल कर आंदोलन आगे बढ़ जाए तो फिर उसकी अनदेखी की जाने लगती है। जब अनदेखी से भी आंदोलन की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता तो अनर्गल प्रलाप करके उसके नकारात्मक पहलुओं को जोर-शोर से उजागर करने का प्रयास किया जाता है। लेकिन इस आखिरी चुनौती से भी आंदोलन टूटता या डिगता नहीं है तो फिर धीरे-धीरे उसके पक्ष में जन-स्वीकार्यता का माहौल बनने लगता है। वही इतिहास महिलाओं के आंदोलन ‘मी-टू’ के साथ भी दोहराया गया है। पहले तो आंदोलन का भरपूर मजाक बनाया गया और पीड़िताओं के प्रति अशोभनीय टिप्पणियां की गईं। बाद में मी-टू के मामलों की अनदेखी भी की गई ताकि ये कहानियां आई-गई होकर समाप्त हो जाएं। यहां तक मामलों को सांप्रदायिक रंग देने और राजनीतिक तौर पर विभाजित करने की भी कोशिश हुई। लेकिन जब तमाम प्रतिरोधों को झेल कर भी पीड़िताएं अड़ी रहीं, डटी रहीं और पीछे नहीं हटीं तो अब उन्हें समाज से स्वीकृति, सहानुभूति और सहयोग भी मिलने लगा है। मी-टू को पहला समर्थन फिल्म इंडस्ट्री से मिला जहां उन लोगों को हाशिये पर धकेला जाने लगा है जिन पर महिलाओं का शोषण करने के आरोप लगे हैं। उसके बाद न्यूज इंडस्ट्री ने मी-टू पीड़िताओं के पक्ष में खड़े होने की पहल की। तमाम खबरिया संस्थानों में उन लोगों को लंबी छुट्टियों पर भेजा जा रहा है और नौकरी से बर्खास्त किया जा रहा है जिन पर महिलाओं ने छेड़छाड़, उत्पीड़न या यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। सामाजिक मूल्यों के प्रति अपनी नैतिक प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करने के क्रम में स्वतः स्फूर्त तरीके से पीड़ित महिलाओं के साथ हमदर्दी और सहबद्धता दिखाते हुए अब राजनीतिक दल भी मी-टू के मामलों को लेकर सजग हुए हैं और विपक्ष से लेकर सत्तापक्ष तक ने मामलों का संज्ञान लेते हुए ठोस कार्रवाई आरंभ कर दी है। इसी के नतीजे में पहले युवक कांग्रेस यानि एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोज खान से इस्तीफा लिया गया और अब केन्द्रीय विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर को अपने पद से त्याग पत्र देने के लिये विवश किया गया है। हालांकि इन दोनों मामलों को कांग्रेस और भाजपा के बीच नैतिकता की जंग में बढ़त लेने की प्रतिस्पर्धा के तौर पर नहीं देखा जा सकता। बल्कि सच तो यह है कि जिस दिन अकबर पर आरोप लगानेवाली महिलाएं सामने आ गईं उसी दिन भाजपा में रहते हुए अकबर के सार्वजनिक जीवन पर पूर्णविराम लग जाने की बात तय हो गयी। वैसे भी भाजपा का इतिहास रहा है कि महिलाओं के मामले में नाम आने के बाद किसी भी कद या पद के नेता पर कठोरतम कार्रवाई करने में हिचक नहीं दिखाई गई है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण संजय जोशी हैं जिनकी कथित सेक्स सीडी सामने आने के फौरन बाद उन्हें ना सिर्फ केन्द्रीय संगठन महामंत्री के पद से बल्कि पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी निष्कासित कर दिया गया। हालांकि बाद में इस बात का सबूत भी सामने आ गया कि जो सीडी संजय जोशी की बतायी जा रही थी उसमें दिख रहे महिला-पुरूष आपस में पति-पत्नी थे। लेकिन इसके बाद भी जोशी को मुख्यधारा की राजनीति में वापसी करने का मौका नहीं दिया गया। इसी प्रकार मेघालय के राज्यपाल के खिलाफ जब राजभवन की महिला कर्मचारियों ने प्रधानमंत्री कार्यालय में शिकायत भेजी तो तत्काल कार्रवाई करते हुए उन्हें पद से हटा दिया गया और अब शायद ही किसी को पता हो कि इन दिनों संघ और भाजपा की सेवा में अपना पूरा जीवन खपा देनेवाले वी. षणमुगनाथन कहां और किस हाल में निर्वासित एकाकी जीवन बिता रहे हैं। मध्यप्रदेश के वरिष्ठ नेता व वित्तमंत्री राघवजी पर जब यौन-उत्पीड़न करने का आरोप लगा तो उन्हें भी किनारे लगा दिया गया। ऐसा ही नाम तरूण विजय का भी है जिन पर शहला मसूद नामक महिला के साथ अंतरंग संबंध रखने का आरोप लगा तो उन्हें सक्रिय राजनीति से बाहर फेंक दिया गया। बताया तो यहां तक जाता है कि पार्टी के संगठन मंत्री राम माधव को केवल इसी वजह से राज्यसभा में नहीं भेजा गया क्योंकि उन पर कुछ आपत्तिजनक इल्जामों की अफवाह उड़ गयी थी। यूपी का सह-प्रभारी रहते हुए भाजपा को लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले रामेश्वर चैरसिया की कहानी भी कुछ इसी प्रकार की बतायी जाती है। यानि कहने का तात्पर्य यह कि अनैतिक संबंधों के आरोपों को लेकर भाजपा हमेशा ही संवेदनशील रही है और आरोपी नेताओं के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई करती रही है। भले ही आरोपी संगठन में सबसे ताकतवर ओहदे पर विराजमान संजय जोशी सरीखा राष्ट्रीय महामंत्री ही क्यों ना हो। ऐसे में जब कभी ना कभी विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर की करतूतों से आहत होने वाली बीसियों महिलाएं सामने आकर आरोप लगा रही थीं तब यह कल्पना से भी परे था कि भाजपा संगठन या मोदी सरकार में किसी भी स्तर पर  उनका बचाव किया जाएगा। वैसे भी जब सुषमा स्वराज और मेनका गांधी से लेकर से लेकर स्मृति ईरानी तक ने ही नहीं बल्कि आरएसएस में नंबर दो ही हैसियत रखनेवाले दत्तात्रेय होसबोले ने भी मी-टू मूवमेंट को खुल कर सराहने में कसर नहीं छोड़ी तब सिर्फ इंतजार ही बाकी था कि अकबर खुद पद छोड़ेंगे या धक्का देकर हटाए जाएंगे। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

‘देने में दिक्कत मगर लेने को लालायित’

कहते हैं कि समूचा संसार लेन-देन पर ही टिका हुआ है। ग्रंथों में पुनर्जन्म और कर्म-फल का जो सिद्धांत बताया गया है वह भी व्यवहारिक तौर पर लेन-देन से ही जुड़ा हुआ है। लिहाजा बात चाहे व्यक्ति की हो या प्रकृति की। लेन-देन में संतुलन बनाए रखना आवश्यक भी है, अपेक्षित भी और अनिवार्य भी। लेकिन प्रकृति के इस सनातन सत्य को झुठलाने में जुटे हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। वे सिर्फ लेना चाहते हैं, लेकिन बदले में कुछ देना उन्हें कतई गवारा नहीं होता। हालांकि यह इंसानी फितरत है कि जहां से उसे पाने की उम्मीद होती है वहां पूरी झोली खोलकर बैठ जाता है लेकिन जब देने की बारी आती है तो जेब में बटुआ इस बुरी तरह अटक जाता है कि निकाले नहीं निकलता। लेकिन फिर भी लोग कुछ पाने के लिये कुछ ना कुछ देते ही हैं। बेशक मन मसोसकर, पूरी तरह जांच परख कर और जमकर मोल-भाव करने के बाद ही सही। लेकिन केजरीवाल की रीत उल्टी है। उनकी नीति तो यही दिखाई पड़ती है कि अव्वल तो किसी को कुछ नहीं देना और जिससे कुछ पाना है उसे तो निश्चत ही कुछ भी नहीं देना। मिसाल के तौर पर केजरीवाल साहब अपनी आम आदमी पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर प्रसार करने के लिये बुरी तरह लालायित हैं। खास तौर से उत्तर प्रदेश पर उनकी पैनी नजरें गड़ी हुई हैं। हो भी क्यों ना। आखिर लोकसभा का चुनाव लड़ने वे भी तो पहुंचे ही थे वाराणसी। लेकिन उसमें मिली हार की टीस आज भी कहीं ना कहीं उनके दिल को कचोट रही होगी। तभी अब वे संभल कर काम कर रहे हैं। फिलहाल उनकी पार्टी की सक्रियता दिल्ली से सटे पश्चिमी यूपी के इलाकों में अधिक देखी जा रही है। इनकी दिली-ख्वाहिश है कि दिल्ली वालों की तरह इस इलाके के लोग भी इन्हें ही अपना नेता मानें और इनकी ही पार्टी के पक्ष में मतदान करें। लेकिन इसके बदले में वे यहां के लोगों को कुछ भी नहीं देना चाहते। यहां तक कि इन इलाकों के लोगों को पहले से ही दिल्ली में पढ़ाई और दवाई की जो सहूलियत मिली हुई उस पर भी इन्होंने अंकुश लगा दिया। बकायदा सरकारी आदेश जारी कर दिया गया कि दिल्ली सरकार के अस्पतालों में दिल्ली के मतदाताओं को ही इलाज में प्राथमिकता दी जाए और इसके अलावा किसी को भी मुफ्त जांच, दवा या भर्ती की सहूलियत ना दी जाए। चुंकि यह आदेश यूपी से सटे दिल्ली के कड़कड़डूमा इलाके में स्थित गुरू तेगबहादुर अस्पताल में भी लागू हुआ जिसकी सीधी मार पश्चिमी यूपी के लोगों पर ही पड़ी क्योंकि उनके पास दिल्ली का मतदाता पहचान पत्र नहीं होने के कारण पहले से चल रहा इलाज भी रोक दिया गया। खैर, गनीमत रही कि अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजधानी को मिनी इंडिया का नाम देते हुए यहां इस तरह के तुगलकी फरमानों को लागू करने से इनकार कर दिया है। लेकिन अदालत के इस इनकार के बावजूद केजरीवाल सरकार यूपी के लोगों को चिकित्सा की सहूलियत से वंचित करने के लिये अब सुप्रीम कोर्ट का रूख करने की बात कह रही है। यानि यूपी के लोगों से उन्हें अपेक्षाएं तो भरपूर हैं लेकिन स्वेच्छा से सुई के नोंक बराबर सहूलियत देना भी गवारा नहीं है। खैर, उनके इस कदम को दिल्ली वालों के हित में बताकर मामले के दूसरे पहलू को उजागर किया जा सकता है। लेकिन वह भी तब किया जा सकता था जब वे दिल्ली के लोगों को ही सरकारी खजाने से कुछ सहूलियत देना गवारा करते। इस लिहाज से देखें तो केजरीवाल की रीति-नीति की कलई तेल के खेल में पूरी तरह खुल गई है। दरअसल बीते दिनों दिल्ली, यूपी, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ की एक संयुक्त बैठक हुई जिसमें तय हुआ कि इन पांचो जगह डीजल-पेट्रोल की कीमतें एक समान की जाएंगी ताकि आम लोगों को राहत मिल सके। लेकिन जब केन्द्र सरकार ने डीजल-पेट्रोल की कीमतों में ढ़ाई रूपए की कटौती करते हुए राज्य सरकारों से भी ढ़ाई रूपये की कमी करने की गुजारिश की तो बाकी राज्यों ने तो लोगों को पांच रूपये प्रति लीटर की राहत दे दी लेकिन केजरीवाल सरकार ने अपनी ओर से लोगों को राहत देने के बजाय ऐसा शगूफा छोड़ दिया जिससे लगे कि वह आम लोगों को राहत दिलाने के लिये बुरी तरह परेशान है। केजरीवाल ने केन्द्र की ओर से की ढ़ाई रूपये की कटौती को नाकाफी बताते हुए मांग कर दी कि उसे कम से कम दस रूपये प्रति लीटर की कटौती करनी चाहिये। अपनी ओर से वैट में कटौती करने के बजाय वे चारों ओर ढ़ोल बजाते फिर रहे हैं कि केन्द्र ने लोगों को बेवकूफ बनाया है वर्ना अगर वाकई उसे लोगों की परवाह होती तो वह ढ़ाई के बजाय दस रूपये की कटौती करता। यानि देना कुछ नहीं और गाल बजाना जोर-शोर से। देने के नाम पर तो उनके हाथ तो दिल्ली के उन सफाई कर्मचारियों का वेतन भी आसानी से नहीं निकलता जिनकी पहचान यानि झाड़ू को इन्होंने अपनी पार्टी का चुनाव निशान बनाया हुआ है। नतीजन आए दिन यहां कूड़ा-कचरा उठानेवालों की हड़ताल होती रहती है और पूरी राजधानी सड़ांध मारते कूड़े का ढ़ेर दिखाई पड़ती है। लेकिन मसला है कि केजरीवाल को समझाए कौन? क्योंकि वह ऐसे समुदाय से आते हैं जो किसी को गाली देने से पहले भी सौ-बार सोचता है कि- देना क्यूं?  ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

‘भूमि परा कर गहत अकासा’ की स्थिति में बसपा


कहते हैं कि जिसके पास खोने के लिये कुछ नहीं होता उसके सामने पाने के लिये सारा जहान होता है। यही स्थिति है बसपा सुप्रीमो मायावती की। आखिर बचा ही क्या है उनके पास खोने के लिए? लोकसभा में पिछली बार ही बसपा का पूरी तरह सफाया हो गया था। इस बार सूबे की विधानसभा में भी हाथी की सवारी करके महज 19 विधायक ही जीत दर्ज कराने में कामयाब हो पाए हैं। सच पूछा जाए तो वर्ष 2007 के चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के दम पर 206 सीटें जीत कर सूबे में अपनी सरकार बनाने वाली बसपा का बेड़ा तो 2012 के विधानसभा चुनाव में ही गर्क हो गया जब उसे महज 80 सीटों पर ही जीत नसीब हुई और 126 सीटें उसके हाथों से फिसल गईं। लेकिन वहां से संभलने के बजाय बसपा का हाथी चुनावी दलदल में नीचे की ओर ही धंसता चला गया और इस बार के विधानसभा चुनाव में तो उसे सिर्फ 19 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। यानि अब बसपा के पास गंवाने के लिये कुछ नहीं बचा है। कुछ नहीं बचने का मतलब वाकई पल्ले में कुछ नहीं होना ही है क्योंकि अपने मौजूदा विधायकों की तादाद के दम पर बसपा राज्यसभा की एक भी सीट नहीं जीत सकती। लेकिन संसद या विधानसभा में सीटों की तादाद की बात अलग कर दें तो जमीन पर बसपा की स्थिति उतनी प्रतिकूल नहीं है। बीते लोकसभा चुनाव में बसपा ने भले ही एक भी सीट ना जीती हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर चार फीसदी से अधिक और यूपी में भी बीस फीसदी से अधिक वोट हासिल करके जनाधार के मामले में वह देश की तीसरी सबसे ताकतवर पार्टी के तौर पर सामने आई। इसी प्रकार यूपी विधानसभा के लिये पिछले साल हुए चुनाव में भी बसपा के खाते में सवा बाईस फीसदी वोट आए। यानि इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद बसपा का परंपरागत वोटबैंक लगातार उसके साथ पूरी तरह जुड़ा हुआ है लिहाजा पार्टी को शून्य या समाप्त मान लेना कतई उचित नहीं होगा। ऐसे में बसपा के पास दो विकल्प हैं। या तो वह महा-गठजोड़ में शामिल होकर अपनी वापसी के लिये सुरक्षित राह अपनाए जिसमें सीमित तादाद में सीटों पर लड़ने के बावजूद उसके पास सम्मानजनक संख्या में सीटें जीतने की संभावना बन सकती है। लेकिन इस विकल्प पर अमल करने के नतीजे में उसे केन्द्र की राजनीति में अग्रिम मोर्चे पर आने का लोभ-मोह छोड़ना होगा और कांग्रेस का हाथ मजबूत करने में सहभागी बनना होगा। लेकिन दूसरा विकल्प यह है कि बसपा ‘तूफानों से आंख मिलाए, सैलाबों पर वार करे, मल्लाहों का चक्कर छोड़े, तैर कर दरिया पार करे।’ फिलहाल बसपा ने दूसरे विकल्प को आजमाने की ही राह पकड़ी है ताकि अपने बाजुओं की ताकत को तौलने और जमीनी स्तर पर बह रही हवाओं की दशा-दिशा का ठोस आकलन करने के बाद ही लोकसभा चुनाव के लिये निर्णायक रणनीति बनाई जाए। इसी वजह से पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसने कांग्रेस से किनारा करके अपनी अलग राह पकड़ी है। खास तौर से उसे संभावना टटोलनी है मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जहां उसने तीसरी ताकत के तौर पर उभरने का लक्ष्य निर्धारित किया है। अब तमाम संभावनाएं इस बात पर टिकी हैं कि जमीनी स्तर पर भाजपा की मजबूती यथावत बरकरार है अथवा मतदाता विकल्प की तलाश में हैं। अगर विकल्प की तलाश के प्रति मतदाताओं का रूझान सामने आया तो कांग्रेस और भाजपा के साथ समानांतर दूरी कायम करके चलना ही बसपा के लिये मुनासिब होगा। वैसे भी मतदाताओं द्वारा विकल्प की तलाश किया जाना तीसरी ताकतों के लिये बेहद शुभ संकेत होगा क्योंकि इससे लोकसभा चुनाव में खंडित जनादेश आने की संभावना प्रबल हो जाएगी। हालांकि बसपा इकलौती पार्टी नहीं है जो खंडित जनादेश का सपना देख रही है और केन्द्र में मजबूर सरकार बनने की दुआ कर रही है। बल्कि एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों से लेकर टीडीपी तक की ख्वाहिश यही है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेसनीत संप्रग और भाजपानीत राजग में से जो भी आगे निकले उसका सफर अधिकतम डेढ़-सौ से दौ-सौ सीटों के बीच ही ठहर जाए। ऐसी सूरत में तीसरी ताकतों को आगे आने का सुनहरा मौका मिलेगा और उसमें भी जिसकी जितनी संख्या भारी होगी उसकी उतनी ही प्रबल दावेदारी होगी सत्ता की मलाई में अधिकतम हिस्सेदारी की। इसी सोच के तहत कांग्रेस और भाजपा से अलग हटकर कई धाराएं अपनी दिशा तलाश रही हैं जिसमें मायावती से लेकर ममता बनर्जी और शरद पवार का नाम मुख्य रूप से शामिल है। चुंकि मायावती के पास फिलहाल खोने के लिये कुछ भी नहीं बचा है लिहाजा अगर वह ‘भूमि परा कर गहत अकासा’ यानि जमीन से उठकर पूरे आसमान को पकड़ने का प्रयास कर रही है तो इसमें कुछ भी गलत या अस्वाभाविक नहीं है। वैसे भी मौजूदा राजनीतिक हालातों में बसपा के पास दोबारा सोशल इंजीनियरिंग की उस रणनीति को आजमाने का मौका है जिसके दम पर उसने पिछले दशक में यूपी में अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। अगर यह रणनीति कामयाब रही तो तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने का बसपा के पास इस बार बेहतरीन मौका है जिसे सिर्फ अपने अस्तित्व पर आए तात्कालिक खतरे से डर कर गंवाना किसी भी लिहाज से कतई उचित नहीं होगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

‘जो अनैतिक है वह असंवैधानिक क्यों नहीं?’

तमाम जटिलताओं से अलग हटकर अब तक कानून और संविधान को समझने का एक तरीका यह भी था कि तटस्थता, निष्पक्षता और निरपेक्षता के साथ अपने दिल पर हाथ रख खुद से पूछा जाये कि क्या सही है और क्या गलत। दिल से जो आवाज आएगी वही न्यायसम्मत होगा और जो न्यायसम्मत होगा वह निश्चित ही कानून व संविधानसम्मत भी होगा। लेकिन बीते कुछ दिनों में सर्वोच्च न्यायालय के जो फैसले आए हैं उसने दिल की आवाज को गलत बताने का काम किया है। बात चाहे धारा 377 में बदलाव की करें या आधार विधेयक को मनी बिल के तौर पर पारित कराने की प्रक्रिया को संविधान के साथ धोखा बताये जाने की अथवा एडल्ट्री यानि व्यभिचार को अपराध करार देने वाली धारा 497 को असंवैधानिक करार देकर खारिज करने की। बल्कि पदोन्नति में आरक्षण व्यवस्था को लागू करने का रास्ता साफ किए जाने की बात ही क्यों ना हो। ऐसे तमाम मामलों में जो फैसले आए हैं उससे समाज का काफी बड़ा वर्ग कतई सहमत या संतुष्ट नहीं दिख रहा है। समझना मुश्किल है अगर आरक्षण व्यवस्था के दायरे का विस्तार करते हुए इसे पदोन्नति में भी लागू किया जाएगा तो उस अवधारणा का क्या होगा जिसके तहत कहा जाता रहा है कि शोषित, पीड़ित व दमित वर्ग को मुख्यधारा में आगे आने का मौका देने के लिये इस व्यवस्था को लागू किया था। समाज में हाशिये पर खड़े वर्ग को आगे लाने के लिये पढ़ाई-लिखाई और रोजगार के नियमों, अपेक्षाओं व अहर्ताओं में ढ़ील देने की बात तो समझ में आती है। लेकिन नौकरी पा जाने वालों को नियमानुसार या तय समय के बाद स्वाभाविक तौर पर मिलनेवाली पदोन्नति के मानदंडों में भी ढ़ील दिये जाने के पीछे आखिर क्या सोच हो सकती है यह समाज के काफी बड़े वर्ग की समझ से परे है। समझ से परे यह भी है कि आधार पर फैसला देने वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ में शामिल न्यायमूर्ति डीवाई चन्द्रचूड़ ने अलग से डिसेंट लिखते हुए यह कैसे कह दिया कि आधार विधेयक को लोकसभा में धन विधेयक के रूप में पारित करना संविधान के साथ धोखे के समान है लिहाजा यह निरस्त किये जाने के लायक है। यह तो सरासर लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार, योग्यता और निष्पक्षता पर उंगली उठाने वाली बात हुई क्योंकि यह निर्णय करने का अधिकार पूरी तरह लोकसभा अध्यक्ष का ही होता है कि कौन सा विधेयक मनी-बिल के तौर पर प्रस्तुत किया जाएगा। जब लोकसभा अध्यक्ष ने आधार विधेयक को मनी बिल के तौर पर सदन में प्रस्तुत किये जाने का फैसला दे दिया तो उसके खिलाफ कुछ भी कहने का अधिकार किसी को नहीं हो सकता है। भले ही वह किसी भी पद या कद का व्यक्ति क्यों ना हो। लेकिन सर्वोच्च सम्मान की चाहत रखने वाले मी-लाॅर्ड अन्य संवैधानिक पदों की गरिमा का समुचित सम्मान क्यों नहीं करते यह वाकई समझ से परे है। समझ से परे तो यह भी है कि धारा 377 में बदलाव करते हुए समलिंगियों को यौन संबंध स्थापित करने की औपचारिक रूप से इजाजत दिये जाने के बाद अब पति-पत्नी को कहीं भी और किसी के साथ भी स्वच्छंद तरीके से शारीरिक संबंध बनाने की इजाजत देने के पीछे आखिर क्या मानसिकता हो सकती है। धारा 497 को असंवैधानिक बता कर खारिज कर दिये जाने के बाद अब आखिर क्या मतलब रह जाएगा विवाह व्यवस्था का? इस फैसले के बाद कानूनी, संवैधानिक या विधिक तौर पर व्यभिचार की आखिर क्या परिभाषा होगी? बेशक खुलते-बदलते वक्त की बेलगाम बयार के अनुकूल खड़े दिखने के लिये स्थापित सिद्धांतों में बदलाव करते हुए इस तरह के फैसले को एकबारगी सही भी माना जा सकता है लेकिन जब व्यवहार व परंपरा के प्रतिकूल सिद्धांत गढ़े जाएंगे तो उसे आदर्श व अनुकरणीय कैसे माना जाएगा। इन फैसलों को पूरी तरह अमल में लाये जाने के बाद समाज की कैसी तस्वीर सामने आएगी इस पर विचार करना भी अगर जरूरी नहीं समझा गया है तो निश्चित ही भावी दुष्परिणामों के लिये किसी अन्य को दोष देना कतई सही नहीं होगा। अब नयी व्यवस्था के तहत जब यौन शुचिता का कोई मायने-मतलब ही नहीं रहा गया है तो इसके परिणाम स्वरूप पैदा होने वाली पीढ़ियां किन संस्कारों में ढ़लेंगी और कैसा भारत गढ़ेंगी इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। पश्चिम के खुले समाज में भी जब सर्वशक्तिमान अमेरिकी राष्ट्रपतियों की भी हिम्मत नहीं होती कि वे अपने विवाहेत्तर संबंधों को स्वीकार कर सकें तो इसका सीधा अर्थ यही है कि पश्चिमी समाज भी यौन शुचिता की अपेक्षा करता है। लेकिन संस्कार, मर्यादा व परंपरा की संस्कृति को आत्मसात करने वाले भारतीय समाज को एक झटके में यौन अराजकता की बेलगाम राहों पर धकेल देना और अपने परंपराओं, मूल्यों, संस्कारों और मर्यादाओं को पुरातन सोच का प्रतीक बताकर उससे पल्ला झाड़ लेना वाकई समाज के काफी बड़े वर्ग की समझ में फिलहाल तो कतई नहीं आ सकता। वर्जनाओं को तोड़ने की होड़ अब अगर परिवार व समाज को छिन्न-भिन्न करते हुए भारतीयता के मूल्यों को तार-तार करने की ओर बढ़ चले तो कोई आश्चर्य, विस्मय या अचंभे की बात नहीं होगी। अपेक्षित था कि मी-लाॅर्ड इस तथ्य की अनदेखी नहीं करते कि अपनी परंपराओं, मर्यादाओं, संस्कारों और सनातन संस्कृति के दम पर ही हम गर्व से समूचे विश्व को यह बताते हैं- यूनानो-मिश्र-रोमां सब मिट गए जहां से, बाकी मगर है अब तक नामो-निशां हमारा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शनिवार, 22 सितंबर 2018

‘श्रेय की सियासत में दफन होती सिद्धू की सिद्धि’

स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी अक्सर कहा करते थे कि- ‘छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।’ वाकई इतिहास के पन्नों में सुनहरे हर्फों में बड़ा नाम दर्ज कराने के लिये मन का बड़ा होना भी उतना ही आवश्यक है जितना कर्मों का बड़ा होना। लेकिन बड़ा काम करने के बाद छोटे मन का प्रदर्शन करते हुए श्रेय हासिल करने की होड़ में शामिल होने का नतीजा क्या होता है यह पंजाब सरकार के कांग्रेसी मंत्री व पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को देखकर आसानी से समझा जा सकता है। बीते दिनों उन्होंने काम तो बहुत बड़ा किया था। उन्होंने इमरान खान को पाकिस्तान का वजीर-ए-आजम चुने जाने पर बधाई देने के बहाने परोक्ष तौर पर दोनों मुल्कों के बीच की उस डोर को नए सिरे से जोड़ने की पहल की जिसे जोड़ने के अलावा दोनों मुल्कों के पास कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है। उन्हें यह मौका दिया केन्द्र की मोदी सरकार ने और उन्होंने भी अपनी पार्टी के नेताओं की नाराजगी की परवाह किए बगैर इस बड़े काम को पूरा करने की दिशा में पूरे आत्मविश्वास के साथ पहल की। दरअसल पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री के तौर पर अपने शपथ ग्रहण का साक्षी बनने के लिये इमरान ने तीन भारतीय क्रिकेटर दोस्तों को बुलाया जिनमे कपिल देव और सुनील गावस्कर के अलावा सिद्धू का नाम शामिल था। गावस्कर ने तो विनम्रता से अपनी विवशता दर्शाते हुए बता दिया कि व्यावसायिक व्यस्तताओं के कारण वे शपथ ग्रहण का साक्षी नहीं बन पाएंगे। लेकिन सरकार से अनुमति मिलने पर ही पाकिस्तान जाने की बात सिद्धू ने भी कही और कपिल ने भी। इसके बाद सिद्धू के जाने और कपिल के नहीं जा पाने से यह साफ हो गया कि सरकार ने बेहद सधे व सटीक तरीके से कूटनीतिक कदम आगे बढ़ाया है। वैसे भी अगर सरकार चाहती तो सिद्धू की यात्रा को आसानी से रोक सकती थी। लेकिन विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने सिद्धू को तोते की तरह रटाकर व समझा-बुझाकर इन नसीहतों के साथ पाकिस्तान भेजा कि अव्वल तो वे वहां अति-उत्साह नहीं दिखाएंगे और दूसरे ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे देश व देशवासियों की भावना आहत हो। साथ ही उन्हें सुषमा ने हमेशा यह बाद अपने दिमाग में रखने की हिदायत दी कि उन्हें लौटकर भारत ही आना है क्योंकि यही उनका अपना देश है। वैसे भी सिद्धू को इस्लामाबाद भेजने के लिये चुनना बेहतरीन कूटनीतिक पहल थी क्योंकि वे ना सिर्फ विपक्षी खेमे के धारदार व आक्रामक नेता हैं बल्कि उनकी वाक्पटुता की पाकिस्तानी निजाम से लेकर वहां की आवाम भी कायल है। सिद्धू ने भी वहां जाकर शांति का झरोखा खोलने के अभियान में सिद्धि हासिल करके यह दर्शा दिया कि उन पर भरोसा किया जाना बिल्कुल सही था। हालांकि शपथ ग्रहण के कार्यक्रम में पाकिस्तानी कब्जेवाले कश्मीर के राष्ट्रपति मसूद खान की बगल वाली कुर्सी पर सिद्धू बैठने और पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के गले लगने को लेकर कांग्रेसनीत विपक्ष से लेकर भाजपानीत सत्तापक्ष तक ने उनकी काफी आलोचना की लेकिन तटस्थता व निष्पक्षता से देखा जाये तो वे पूरी गर्मजोशी के साथ वहां गए और गरिमापूर्ण ढ़ंग से वापस भी आए। वहां जाकर उन्होंने वही बातें कीं जिसकी शांति व अमन की आशा में पाकिस्तान दौरे पर गए किसी भी सच्चे भारतीय से अपेक्षा की जा सकती है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी की उसी नीति को आगे बढ़ाया कि दोस्त बदले सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं बदल सकते। उनकी यात्रा का हासिल यह रहा कि अव्वल तो पाकिस्तान की ओर से बातचीत की पेशकश हुई और दूसरे दुनिया को दिखाने के लिये पाकिस्तान ने घोषणा की कि गुरूनानक देख के 500वें प्रकाश पर्व के मौके पर उस करतारपुर बाॅर्डर को भारतीय श्रद्धालुओं के लिये खोल दिया जाएगा जिसे बंटवारे और आजादी के बाद से ही उसने बंद किया हुआ है। हालांकि भारत सरकार ने कूटनीतिक तौर पर पाकिस्तान को औकात में लाने के लिये उसकी किसी बात को तवज्जो नहीं देने की ही नीति अपनाई हुई है और प्रयास हो रहा है कि उसे इतना झुकाने के बाद ही इस तरफ से उसकी किसी पहल का समुचित जवाब दिया जब वह सिर्फ बोली में बात करे और गोली की जुबान से तौबा कर ले। लेकिन करतारपुर काॅरीडोर खुलने संभावना को भुनाने के लिये सिद्धू ने जो हरकत की है वह वाकई बेहद दुर्भाग्यपूर्ण व शर्मनाक है। पूरे किये-धरे का राजनीतिक लाभ लेने और भारत की ओर से पाक पर बनाए गए दबाव के साथ खिलवाड़ करने के क्रम में सिद्धू ने कैसी बचकानी हरकत की है उसे से इसी से समझा जा सकता है कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री व कांग्रेस के राज्यसभा सांसद एमएस गिल ने सुषमा स्वराज से मुलाकात का समय मांगा जबकि मिलने के लिये गिल के पीछे-पीछे सिद्धू भी पहुंच गए। साथ ही सिद्धू अपने साथ एक फोटोग्राफर को भी ले गये थे ताकि बाद में दुनिया को बता सकें कि उनके कहने पर ही भारत सरकार पाक के साथ संबंध सुधारने और करतारपुर साहेब का दरवाजा खुलवाने की पहल कर रही है। सिद्धू को समझना चाहिये कि विदेश नीति का मसला दलगत राजनीति से बहुत ऊपर होता है और यह दो देशों के बीच हितों के संतुलन पर टिका होता है जिसमें भारतीय नागरिक होने के नाते उनका फर्ज बिना किसी लोभ-लाभ के सिर्फ भारत का हित सुरक्षित करना है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

‘कनविन्स के बजाय कन्फ्यूज करने का काॅन्फिडेन्स’

वकालत के पेशे में अक्सर यह देखा जाता है कि किसी भी मुकदमे की पैरवी करते वक्त वकीलों की कोशिश रहती है कि तथ्यों, दलीलों, साक्ष्यों, सबूतों व अपनी बातों से जज को कनविन्स कर लिया जाये। लेकिन अगर साक्ष्य व सबूत पर्याप्त ना हों और मुकदमा कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा हो तो ऐसे में वकील पुरजोर कोशिश करता है कि पूरे मामले को लेकर जज को इस कदर कन्फ्यूज कर दिया जाये कि वह उलझ कर रह जाए और सही फैसले तक पहुंच ही ना सके। इन दिनों भाजपा भी इसी रणनीति पर अमल करती नजर आ रही है। आगामी चुनावों के मद्देनजर उसने जनता जनार्दन को कन्फ्यूज करने की ऐसी रणनीति पर अमल आरंभ कर दिया है जिससे यह समझना बेहद मुश्किल है कि आखिर उसकी नीति क्या है और नीयत क्या है। हालांकि दावे से यह कहना बेहद मुश्किल है कि वाकई जनता को कन्फ्यूज किया जा रहा है अथवा पार्टी ही कन्फ्यूजन की स्थिति में है। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता था कि एक तरफ शपथ तो राष्ट्रवाद के डंडे में विकास का झंडा लगाकर ‘सबका साथ सबका विकास’ की ली जा रही हो और दूसरी ओर विकास से जुड़े मसलों पर चुप्पी साध ली जाए। राष्ट्रवाद को भी इस अंदाज में आगे बढ़ाया जाए जिससे समाज में सांप्रदायिक विभाजन की नींव मजबूत होती हुई दिखाई पड़े। राष्ट्रवाद की आड़ में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ताना-बाना बुनने की कोशिश के तहत ही तो राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानि एनआरसी के मसले को राष्ट्रीय स्तर पर तूल देते हुए एक तरफ खुले शब्दों में ऐलान किया जाता है कि भाजपा की सरकार एक भी रोहिंग्या अथवा बांग्लादेशी को भारत में घुसपैठ करने की छूट नहीं देगी लेकिन लगे हाथों यह बताने से भी परहेज नहीं बरता जाता है कि दुनिया के किसी भी देश से आने वाले हिन्दू, इसाई, बौद्ध, जैन, सिख व पारसी (गैर-मुस्लिम) समाज के लोगों को शरणार्थी के तौर पर स्वीकार करने में कतई संकोच नहीं किया जाएगा। जाहिर है कि इस तरह की बात करके समाज को हिन्दू और मुसलमान के बीच की खाई में गिराने का ही प्रयास किया जा रहा है। वर्ना घुसपैठियों को संप्रदाय के चश्मे से देखने-दिखाने की जरूरत ही क्या है? देश की समस्या यह नहीं है कि किस संप्रदाय के लोग हमारे देश में अवैध घुसपैठिये हैं अथवा किस धर्म को माननेवाले शरणार्थी हैं। देश की मौजूदा समस्या है डाॅलर के मुकाबले रूपये की गिरती सेहत, पेट्रोलियम पदार्थों के आसमान छूते दाम और वोटबैंक की राजनीति के लिये अपनाई गई तुष्टिकरण की राह के कारण आंदोलित सवर्ण समाज का तीखा आक्रोश व असंतोष। लेकिन केन्द्र से लेकर देश के 19 राज्यों में प्रत्यक्ष और जम्मू-कश्मीर सरीखे सूबों में परोक्ष तौर पर शासन कर रही भाजपा इन जमीनी मसलों को चिमटे से भी छूने की जहमत नहीं उठा रही है। अलबत्ता पूरा जोर इस बात पर है कि एनआरसी के मसले को किसी भी तरह से मुख्यधारा की चर्चा के केन्द्र में ला दिया जाए। जाहिर है कि सांप्रदायिक मसलों को चर्चा में लाकर असली मसलों से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश के तहत ही ऐसा किया जा रहा है। इसी प्रकार कहने को तो भाजपा अपनी सोच सकारात्मक व विकास परक बताती है और तमाम मंचों से यही अपील करती है कि राजनीतिक बहस को विकास व सुशासन पर ही केन्द्रित रखा जाये लेकिन व्यवहार में इस पर अमल करने को लेकर पार्टी कहीं से भी आश्वस्त नहीं दिखती है। वर्ना विपक्ष के महागठबंधन को लेकर ऐसी बेचैनी का आलम नहीं दिखता कि भाजपा की मातृसंस्था यानि आरएसएस के मुखिया को वैचारिक व सैद्धांतिक विरोधियों की तुलना कुत्ते से करने के लिये मजबूर होना पड़े। यानि संघ से लेकर भाजपा संगठन और मोदी सरकार तक में बेचैनी का माहौल भी है और सिद्धांत व व्यवहार में संतुलन की तलाश भी हो रही है। लेकिन सवाल है कि जब नीति और नीयत सिर्फ सत्ता पर अपनी पकड़ बरकरार रखने तक ही सीमित हो जाये तब सिद्धांतों की याद दिलाना बेमानी और मजाकिया ही होगा। अगर सत्ता केन्द्रित नीति ना होती तो जनता से जुड़ाव इतना कमजोर कैसे हो सकता था कि जन-मन को मथ रहे मसलों को चिमटे से छूने की भी जरूरत ना समझी जाए। व्यवहार में अगर कुछ कर पाना संभव ना भी हो तो सैद्धांतिक बातें करके लोगों को सांत्वना दी ही जा सकती है। गुड़ ना दे सको तो गुड़ जैसी बातें ही कहो। लेकिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी से लेकर विभिन्न स्तरों की बैठकों के बारे में दी जा रही जानकारियों के मुताबिक ना तो रोजगार के मसले पर कहीं कोई चर्चा हो रही है और ना ही डीजल-पेट्रोल की महंगाई को थामने पर विचार करने की जहमत उठाई जा रही है। अलबत्ता रणनीति बन रही है चुनाव जीतने की और इसके लिये लक्ष्य तय किया गया है 51 फीसदी वोटों पर कब्जे का। इसके लिये तुष्टिकरण पिछड़ों का भी किया जा रहा है और दलितों व आदिवासियों का भी। बहुसंख्यकों व गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को रिझाने के लिये शरणार्थियों का मसला भी चमकाया जा रहा है। ऐसे में अगर सवर्णों, मुसलमानों और कुछ अन्य जातियों को चिढ़ाना-खिझाना भी पड़े तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन सवाल है कि जब सिद्धांत और व्यवहार में असंतुलन व दिखावे की स्थिति प्रबल रहेगी तो संगठन व सरकार से जनता का जुड़ाव क्यों, कैसे व कब तक कायम रह पाएगा। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

‘नुकसान की तस्वीर में फायदे का रंग’

राजनीति में कोई भी नुकसान ऐसा नहीं होता जिसमें कोई ना कोई फायदा ना छिपा हो और कोई फायदा ऐसा नहीं होता जिसमें किसी नुकसान का बीज ना छिपा हो। बल्कि नफा-नुकसान के बीच की डगर से ही सियासत का सफर तय होता है। लिहाजा कोशिश यही की जाती है कि कोई कदम उठाने से पूर्व इस बात का अच्छी तरह आकलन कर लिया जाए कि उससे न्यूनतम नुकसान और अधिकतम फायदा हासिल हो। लेकिन सामाजिक न्याय के झंडे को मजबूती से लहराने और कमंडल को किनारे रखकर मंडल की माला पहनने की कोशिश में भाजपा को इन दिनों जिस कदर अपने परंपरागत मतदाताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है उसकी पार्टी ने शायद ही कभी कल्पना भी की हो। हालांकि संसद के हालिया गुजरे सत्र के आखिरी दिनों में ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देना और अनुसूचित जाति व जनजाति उत्पीड़न निवारक अधिनियम को दोबारा से मजबूत किया जाना भाजपा की नजर में सामाजिक न्याय के क्षेत्र में ऐसा ऐतिहासिक कदम था कि उसे ‘अगस्त क्रांति’ का नाम देने से भी परहेज नहीं बरता गया। पूरे देश में अगस्त क्रांति यात्रा निकाली गई और जमीनी स्तर तक लोगों को यह बताने का प्रयास किया गया कि पिछड़ों, दलितों व आदिवासियों के हितों की रक्षा करने के लिये मोदी सरकार किस कदर अडिग व कृतसंकल्पित है। लेकिन ओबीसी और एससी-एसटी के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के इन प्रयासों से समाज का वह सवर्ण तबका बुरी तरह बिदक गया जिसका मानना है कि उसके ही समर्थन से दो सांसदों वाली भाजपा को पूर्ण बहुमत तक की यात्रा करने में सफलता मिली है। नतीजन सवर्णों का आक्रोश सड़क पर दिख रहा है। कहीं भाजपा के मुख्यमंत्री पर जूता-पत्थर फेंका जा रहा है तो कहीं मंत्रियों-सांसदों को काले झंडे दिखाए जा रहे हैं। पूरे देश में सवर्णों का आक्रोश उबाल मार रहा है। हालांकि भाजपा को इस बात का अंदेशा पहले से था कि दलितों व पिछड़ों का तुष्टिकरण करने की कोशिश में उसे सवर्णों की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। लेकिन उसकी विवशता थी कि दलितों को गैर-भाजपाई ध्रुवीकरण का हिस्सा बनने से रोकने के लिये एससी-एसटी एक्ट के उन प्रावधानों को दोबारा पूर्ववत बहाल करे जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने कानून का दुरूपयोग रोकने की नीयत से शिथिल कर दिया था। कानून को शिथिल किये जाने के बाद से जिस कदर देश भर में दलितों पर हमलों के मामले सामने आ रहे थे और पूरा दलित समाज मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलित, आक्रोशित व एकजुट होता दिख रहा था उससे भाजपा के हाथ-पांव फूले हुए थे कि अगर एकजुट दलितों ने गैर-भाजपावाद का झंडा थाम लिया और राष्ट्रीय स्तर पर मीम-भीम एका की परिकल्पना साकार हो गयी तो उस आंधी में अपना वजूद बरकरार रख पाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल हो जाएगा। वैसे भी पूरा विपक्ष ही नहीं बल्कि सत्तापक्ष के कई साथी व सहयोगी भी आरक्षण के मसले को लेकर भाजपा व मोदी-सरकार की नीति व नीयत पर उंगली उठाने में कसर नहीं छोड़ रहे थे। मोदी सरकार की छवि को दलित विरोधी के तौर पर दर्शाने का पुरजोर प्रयास किया जा रहा था। यही वजह रही कि मोदी सरकार ने दलितों की आवाज को संसद की स्वीकृति दिला दी और एससी-एसटी एक्ट को पुराने स्वरूप में बरकरार कर दिया। लेकिन इससे भाजपा को दलितों का कितना समर्थन मिल पाएगा इसके बारे में तो पक्के तौर पर तो कोई कुछ नहीं कह सकता अलबत्ता अब सवर्णों ने अवश्य पार्टी की नींद उड़ा दी है। यही वजह है कि अब पूरा भगवा खेमा इस मामले को लेकर दो-फाड़ दिख रहा है। पार्टी का एक बड़ा तबका इस मसले को इसी सप्ताहांत राजधानी स्थित अम्बेडकर भवन में आयोजित होने जा रही दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पूरी मजबूती से उठाने का संकेत दे रहा है। यहां तक कि वरिष्ठतम भाजपाई नेताओं में शुमार होनेवाले कलराज मिश्र ने तो सार्वजनिक तौर पर जता-बता दिया है कि सवर्णों के खिलाफ होने वाले दलित कानून के दुरूपयोग के मामलों से निपटने के लिये ठोस इंतजाम किये जाने की जरूरत है। लेकिन इस सबके बीच भाजपा के शीर्ष संचालकों की टोली ने मंगलवार की शाम को जब इस पूरे मसले को लेकर अलग से चिंतन-विवेचन किया तो उसमें यही तय हुआ कि एससी-एसटी के मामले को लेकर जारी विवाद को अलग-अलग स्तर पर सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ा जाये। मसलन दलितों के हितों को सर्वोपरि रखने का जो प्रयास किया गया है उसको लेकर दलित समाज के बीच जागरूकता बढ़ाने के अभियान को बदस्तूर जारी रखा जाये। दूसरी ओर सवर्ण समाज को यह बताया जाये कि आखिर किन मजबूरियों के कारण सरकार को इस दिशा में पहलकदमी करनी पड़ी है और क्यों ऐसा करना सभी राजनीतिक दलों के लिये भी आवश्यक हो गया था। साथ ही सवर्ण समाज को यह बताने का भी प्रयास किया जाएगा कि मोदी सरकार ने एससी-एसटी एक्ट में अपनी ओर से कुछ भी नया नहीं जोड़ा है बल्कि पुराने कानून को ही यथावत बहाल कर दिया है। खैर, इस सबसे सवर्ण समाज का आक्रोश कितना शांत होगा और सवर्णों की नाराजगी किस हद तक चुनावी नतीजों में फलित होगी यह तो वक्त आने पर ही पता चलेगा लेकिन इस पूरे विवाद और खास तौर से सवर्णों के मुखर आक्रोश ने भाजपा को दलित विरोधी बताने के प्रयासों को तो पूरी तरह पलीता लगा ही दिया है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur

शनिवार, 1 सितंबर 2018

‘तेल के खेल की तह से निकलता निदान’

महंगाई का मसला हमारे देश में सियासी तौर पर हमेशा से ही इतना संवेदनशील रहा है कि कभी प्याज की बढ़ी कीमतों के कारण सरकार बदल गई तो कभी अनाज या दलहन के अभाव ने सत्ताधारियों की साख चैपट कर दी। इस बार आग लगी है पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में। आलम यह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद डीजल-पेट्रोल की कीमतें सुरसा की तरह अपना विस्तार करती दिख रही हैं। नतीजन इस मसले पर सरकार को घेरने के लिये राजनीति भी हो रही है और आम लोग भी त्राहिमाम् करते दिख रहे है। हालांकि डीजल-पेट्रोल को जीएसटी के दायरे में लाकर और इस पर से करों का बोझ कम करके लोगों को फौरी राहत अवश्य दी जा सकती है। लेकिन चुंकि यह समस्या देश की अंदरूनी नीतियों के कारण खड़ी नहीं हुई है लिहाजा घरेलू जुगाड़ से इस समस्या के समाधान का प्रयास दूरगामी तौर पर कतई कारगर साबित नहीं हो सकता। सच तो यह है कि पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों की समस्या विश्व व्यवस्था की ओर से भारत पर थोपी व लादी गई है जिसके सामने घुटने टेकने का मतलब होगा विकास व तरक्की की गति से समझौता करना। हालांकि कच्चे तेल की आपूर्ति करनेवाले देशों के संगठन ओपेक के समक्ष भारत लगातार गुहार-मनुहार करता रहा है कि वे अपने रवैये में सुधार लाएं और मुनाफे के लिये मनमानी नीतियों पर अमल ना करें। लेकिन ओपेक देशों द्वारा मुनाफे के लिये कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती का सिलसिला लगातार जारी है। दरअसल दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देश आपूर्ति पर नियंत्रण बना कर मनमुताबिक कीमतें तय करने के मकसद से ही वर्ष 1960 में ओपेक का मंच बनाकर एकजुट हुए थे। लेकिन 1998 में कच्चे तेल की कीमतें सर्वकालिक न्यूनतम स्तर यानि 10 डाॅलर प्रति बैरल पर आ गईं तब वर्ष 2000 में ओपेक ने तय किया कि कच्चे तेल की कीमत 22 डॉलर से नीचे जाने पर उत्पादन में कटौती की जाएगी और 28 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर आने के बाद ही उत्पादन बढ़ाया जाएगा। हालांकि बाद के सालों में कच्चे तेल की कीमतें न्यूनतम स्तर पर ही रहीं और आपूर्ति की तुलना में निरंकुश उत्पादन की होड़ लगी रही। नतीजन तमाम तेल उत्पादक देशों का घाटा बढ़ने लगा और आखिरकार ओपेक के अलावा अन्य तेल उत्पादक देशों ने भी ओपेक प्लस के नाम से एक मंच बना कर वर्ष 2017 से उत्पादन में 18 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती करने संबंधी एक समझौता कर लिया। नतीजन कच्चे तेल की कीमतें 27 डॉलर से बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। इस बीच हाल के कुछ महीनों में वेनेजुएला, लीबिया और अंगोला ने तेल आपूर्ति में लगभग 28 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती की है। साथ ही वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था के जमींदोज होने और ईरान पर अमेरिका द्वारा प्रतिबंध लगा दिये जाने के बाद तेल के खेल में चारों तरफ आग ही आग की स्थिति दिख रही है। हालांकि भारत द्वारा दूरगामी तौर पर मांग में कमी करने की चेतावनी और ऊर्जा आवश्यकताओं के लिये अपनी आत्मनिर्भरता बढ़ाने का संकेत दिये जाने के बाद बीते दिनों ओपेक ने कच्चे तेल का उत्पादन एक लाख बैरल प्रतिदिन बढ़ाने का निर्णय अवश्य किया है। लेकिन इससे ना तो समस्या का स्थाई समाधान संभव है और ना ही भविष्य के प्रति निश्चिंत हुआ जा सकता है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नाले के गैस से चूल्हा जलाने की कहानी सुनाना वास्तव में ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में तकनीक की आवश्यकता की ओर इशारा है और इस ओर प्रधानमंत्री की नजरें गड़ी होने का सीधा मतलब है कि अब भारत की पहली प्राथमिकता ऊर्जा के लिये विदेशों पर निर्भरता की विवशता से निजात पाना है। बीते सप्ताह बायोफ्यूल से विमान उड़ाकर बॉम्बार्डियर क्यू-400 द्वारा 20 सवारियों के साथ देहरादून से राजधानी दिल्ली के बीच के स्वर्णिम सफर के सपने को साकार किया जाना भी उसी सिलसिले की कड़ी है। दरअसल अब बेहद आवश्यक हो गया है कि हम वैकल्कि ऊर्जा श्रोतों पर गंभीरता से ध्यान दें और पेट्रोलियम पर अपनी निर्भरता को यथासंभव कम करें। इसके लिये इसी साल नैशनल पॉलिसी फॉर बायोफ्यूल भी तैयार की गई है जिसके मुताबिक अगले चार सालों में एथेनॉल के उत्पाद को तीन गुना तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा बायोफ्यूल, बायोगैस व सौर ऊर्जा पर भी ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है और घरेलू संसाधनों से ऊर्जा जरूरतें पूरी करने की कोशिश की जा रही है। वैकल्पिक अक्षय ऊर्जा को लेकर भारत की जो नीति है उसके तहत वर्ष 2025 तक प्रतिदिन के तेल की खपत में 10 लाख बैरल की भारी कमी आएगी। इसके लिये इलेक्ट्रोनिक व गैर-पेट्रोलियम चालित वाहनों को टोल टैक्स से छूट देने की योजना भी बन रही है और नीति आयोग सरकार को यह सलाह भी दे रहा है कि ऐसे वाहनों की खरीद पर डेढ़ लाख तक की सब्सिडी भी मुहैया कराई जाए ताकि आम लोगों को वैकल्कि ईंधन का इस्तेमाल बढ़ाने के लिये प्रेरित किया जा सके। जाहिर है कि वैकल्पिक ईंधन का काफी बड़ा श्रोत खेतों में उपजेगा जिससे निश्चित ही भारत के किसानों को सीधा लाभ होगा और प्रदूषण के स्तर में भी कमी आएगी। साथ ही तेल का आयात करने में खर्च होनेवाली विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी और ऊर्जा में आत्मनिर्भरता से सशक्त भारत की तस्वीर उभर कर सामने आएगी। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #Navkant_Thakur