शनिवार, 31 अक्टूबर 2015



‘दूसरे की फतह के लिये तीसरों का मोर्चा’

नवकांत ठाकुर
अपने फायदे के लिये कोई दूसरों से लड़े तो इसमें अनोखा क्या है। मजा तो तब है जब दूसरे के फायदे के लिये तीसरों के बीच जंग छिड़े। दूसरे के फायदे के लिये जब कोई तीसरा पक्ष मोर्चा खोलता है तो वह चर्चा का विषय बनता ही है। दूसरे के लिये किसी तीसरे द्वारा मोर्चा खोले जाने की कहानी कितनी दिलचस्प होती है इसका सहज अंदाजा रामायण की लोकप्रियता से लगाया जा सकता है जिसमें दूसरे की पत्नी के लिये तीसरे से लोहा लेनेवाले हनुमान, जटायु व सम्पाती सरीखे किरदारों की कहानी भी है और सुग्रीव को राजपाट दिलाने के लिये नाहक ही बालि का वध कर देनेवाले राम की भी गाथा है। यहां तक कि दूसरे के साथ हो रहे अन्याय के लिये अपने कुल खानदान का विनाश करा देने के पीछे विभीषण का इसमें कोई निजी स्वार्थ रहा हो ऐसी आशंका आज तक किसी ने भी नहीं जतायी है। ऐसा ही मामला महाभारत का भी है जिसमें दूसरे को उसका हक दिलाने के लिये तीसरे पक्ष के समूल नाश में अगर श्रीकृष्ण सहायक नहीं बनते तो शायद यह लड़ाई होती ही नहीं। कहने का तात्पर्य यह कि जब भी किसी दूसरे के हक में कोई तीसरा पक्ष मोर्चा खोलने की पहल करता है तो वह मामला लोगों की दिलचस्पी के केन्द्र में आ ही जाता है। तभी तो इन दिनों प्रियंका को कांग्रेस की बागडोर दिलाने के लिये एमएल फोतेदार द्वारा लिखी किताब ‘द चिनार लिव्स’ के सार्वजनिक होने का भी बेसब्री से इंतजार हो रहा है और राहुल गाधी को कांग्रेस की कमान दिलाने के लिये दिग्विजय सिंह द्वारा खोला गया मोर्चा भी दिलचस्पी का केन्द्र बना हुआ है। इसमें दिलचस्प बात यह है कि फोतेदार के दावे को सही मानते हुए कांग्रेस ने स्वर्गीय इंदिरा गांधी की इच्छा को पूरा करने के क्रम में प्रियंका को संगठन की बागडोर सौंप भी दी तो इससे बाकियों का भले जो भी नफा-नुकसान हो लेकिन फोतेदार को तो इससे कतई कोई फायदा नहीं होना है। वैसे भी फोतेदार की अब कोई फायदा लेने की उम्र भी नहीं बची है। काफी हद तक ऐसा ही मामला दिग्गी राजा का भी है जो राहुल को पार्टी की कमान दिलाने के लिये सांगठनिक व सार्वजनिक तौर लंबे समय से लगातार मोर्चा खोले हुए हैं। हालांकि उनका मोर्चा अब तक संगठन में राहुल के नाम पर सर्वसम्मति बनाने व राहुल विरोधियों को सामने आने के लिये उकसाने के अलावा ‘मैया’ पर ‘भैया’ को बड़ी जिम्मेवारी देने का दबाव बनाने में ही जुटा हुआ था। लेकिन जब से फोतेदार ने कांग्रेस के लिये राहुल को अस्वीकार्य करार देने के क्रम में राहुल के पक्ष में मोर्चा खोलनेवालों को सोनिया गांधी के चापलूस की संज्ञा से नवाजते हुए यह खुलासा किया है कि इंदिराजी प्रियंका में ही अपनी छवि देखती थीं और उन्हें ही परिवार की सियासी विरासत सौंपने के पक्ष में थीं, तब से दिग्विजय की बेचैनी बुरी तरह बढ़ गयी है। अब फोतेदार के जवाब में उन्होंने बेहद ही आक्रामक मोर्चा खोलते हुए यहां तक कह दिया है कि अध्यक्ष वही बनेगा जिसे सोनिया चाहेंगी। यानि ताजा तस्वीर के तहत अब राहुल और प्रियंका के पक्ष-प्रतिपक्ष में दिग्विजय और फोतेदार आमने-सामने आ गये हैं। वैसे भी पार्टी में ना तो राहुल के समर्थकों की कोई कमी है और ना ही प्रियंका में ही इंदिरा की छवि देखनेवालों की। लिहाजा ‘भाई-बहन’ के हित में मोर्चा खोलनेवाले तीसरों का टकराव आगे क्या स्वरूप लेगा यह कहना तो अभी मुश्किल है लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती है कि दूसरे के हित में जिन तीसरों ने मोर्चा खोलने की पहल की है उनको निजी तौर पर शायद ही कोई फायदा मिल सके। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि सियासत में अपने नुकसान की भरपाई करने के लिये दूसरे के कांधे पर बंदूक रखकर तीसरे को निशाना बनाने की परंपरा हमेशा से चली आ रही है। तभी तो भाजपा में भी जब यशवंत व शत्रुघ्न सरीखे लोगों को अपने नुकसान की भड़ास निकालनी होती है तो वे अपनी लड़ाई खुद लड़ने के बजाय लालकृष्ण आडवाणी सरीखे नेताओं के हित में पार्टी के मौजूदा निजाम पर चढ़ाई करने से भी परहेज नहीं बरतते हैं। यानि मामला यही दिखता है कि वे दूसरे के फायदे के लिये तीसरे से लड़ाई लड़ रहे हैं जिसमें उनका अपना कोई लोभ-लाभ नहीं छिपा है। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि ‘कौन रोता है किसी और की खातिर ऐ दोस्त, सबको अपनी ही किसी बात पर रोना आया।’ लिहाजा गहराई में उतर कर देखा जाये तो दूसरे के पक्ष में लड़नेवाले तीसरे भी अक्सर निष्पक्ष नहीं होते हैं। इस लड़ाई में उनका भी लोभ-लाभ छिपा ही रहता है। भले वह दिखे या ना दिखे। तभी तो प्रियंका के पक्ष में सोनिया के खिलाफ फोतेदार की वह टीस निकल रही है जिसके तहत मौजूदा दौर में उन्हें हाशिये पर रहने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है और दिग्विजय की वह चाहत भी सर्वविदित ही है जिसके तहत वे राहुल को आगे लाने की आड़ में अपनी छवि ‘किंग मेकर’ के तौर पर पुख्ता करना चाहते हैं। खैर, दूसरे के पक्ष में तीसरों की लड़ाई की कहानियों के उस पक्ष की अक्सर अनदेखी कर दी जाती है जिसमें लड़ाई का मुख्य किरदार अक्सर रामायण की सीता की मानिंद आखिरकार खुद को ठगा हुआ ही महसूस करता है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ 

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

‘काश जनता को दे सुनाई, सफाई और दुहाई’

नवकांत ठाकुर
अपने चरम की ओर अग्रसर हो रहे बिहार के चुनाव की ताजा तस्वीर का सबसे अनोखा पहलू है सफाई और दुहाई का। मान्यता यही है कि रक्षात्मक अवस्था को अंगीकार कर लेनेवाले खेमे से ही सफाई और दुहाई का स्वर सबसे अधिक मुखर होकर निकलता है। लेकिन बिहार में सफाई और दुहाई भी सबसे अधिक उसी भगवा खेमे से निकल रही है जो अति आक्रामक तेवर और कलेवर के साथ पूरे चुनाव अभियान में पिला हुआ है। एक ओर तो यह खेमा ऐसी अति आक्रामकता का परिचय दे रहा है कि बिहार में उसे जीत नसीब नहीं हुई तो मानो अनर्थ हो जाएगा। तभी तो इस खेमे के चारों घटक दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों ने अपने पूरे राष्ट्रीय संगठन, लाव-लश्कर व दल-बल के साथ पिछले एक महीने से पटना में ही अपना डेरा जमाया हुआ है और पूरा चुनाव निपटने तक वे सभी वहीं डटे रहनेवाले हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री से लेकर तमाम राजग शासित सूबों के मुख्यमंत्रियों को ही नहीं बल्कि केन्द्र सरकार के भी तमाम शीर्ष संचालकों व मंत्रियों से लेकर सांसदों को भी बिहार में पूरी तरह झोंक दिया गया है। रही सही कसर पूरी करने के लिये सिनेमाई सितारों को भी जमीन पर उतारने में कोताही नहीं बरती जा रही है। आलम यह है कि दिल्ली के सियासी गलियारों में सत्ता पक्ष इस कदर नदारद दिख रहा है मानों राष्ट्रीय राजनीति की ही नहीं बल्कि देश की राजनीतिक राजधानी की भी विस्तारित शाखा पटना में स्थापित हो गयी हो। भगवा खेमे की ओर से ऐसी आक्रामकता का मुजाहिरा किया जा रहा है कि तमाम सियासी गतिविधियां बिहार से शुरू होकर बिहार पर समाप्त हो जा रही हैं। बिहार ही ओढ़ना, बिहार ही बिछाना। बिहार ही सुनना, बिहार ही सुनाना। बिहार से बाहर कुछ दिख ही नहीं रहा। ऐसे में कायदे से तो विरोधी पक्ष की बोलती बंद हो जानी चाहिये थी। उसकी बातें नक्कारखाने में बजनेवाली तूती की मानिंद गुम होकर रह जानी चाहिये थी। उसकी बातों पर तो किसी का कान या ध्यान टिकना ही नहीं चाहिये था। लेकिन हो रहा है बिल्कुल उल्टा। सवाल उठा रहे हैं विरोधी और जवाब देने में गड़बड़ हो रही है भगवा खेमे को। पूरी ऊर्जा सफाई और दुहाई देने में ही खप जा रही है। हालांकि चुनाव अभियान की शुरूआत में तो राजग विरोधी महागठबंधन ही सफाई पेश करता दिख रहा था। लेकिन यह स्थिति तब तक थी जब तक आरोप-प्रत्यारोपों की जुबानी गेंदबाजी विकास और सुशासन के पिच पर हो रही थी। शुरूआती कुछ ओवरों के बाद जैसे ही पिच का मिजाज बदला और विकास व सुशासन की नमी सूखने के बाद मर्यादा की परत टूटते ही निजी आक्षेपों के अलावा जातिगत व सांप्रदायिक सियासत की धूल उड़नी आरंभ हुई वैसे ही सफाई व दुहाई की रक्षात्मक बैटिंग करके अपना विकेट बचाये रखना भगवा खेमे की मजबूरी बनती चली गयी। आखिरकार नौबत यहां तक आ पहुंची है कि महंगाई का मसला उठने पर भी सफाई आती है भगवा खेमे से कि नितीश सरकार की नीतियों के कारण ही दाल महंगी हुई है। दुहाई यह कि केन्द्र करे भी तो क्या करे। लेकिन लगे हाथों जब नहले पर दहले के तौर पर पूछ लिया जाता है कि बाकी सूबों में भी दाल महंगी क्यों है तो  समूचा भगवा खेमा सारा काम छोड़कर बस सफाई और दुहाई देने में जुट जाता है। मसला कुछ भी क्यों ना हो, सफाई और दुहाई भगवा खेमे से ही सुनाई देती है। आरक्षण पर संघ प्रमुख के बयान से उपजे विवाद पर सफाई, प्रधानमंत्री के डीएनएवाले बयान पर सफाई, केन्द्रीय मंत्री द्वारा दलित की तुलना कुत्ते से किये जाने के विवाद पर सफाई, सूबे में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित नहीं करने के मसले पर सफाई, पटना में प्रधानमंत्री व पार्टी अध्यक्ष की होर्डिंग हटाये जाने पर सफाई, प्रधानमंत्री की रैलियों में कटौती किये जाने पर सफाई, गौमांस के मसले पर अनवरत जारी बतकहियों पर सफाई, गैरमराठी भाषियों के प्रति महाराष्ट्र सरकार की नीतियों पर सफाई, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास करने के इल्जामों पर सफाई, भाजपाशासित राज्यों में मौजूद कमियों व खामियों पर सफाई, कालेधन के सवाल पर सफाई, हरित व गुलाबी क्रांति के बवाल पर सफाई। मौजूदा दौर की समस्याओं पर सफाई, अच्छे दिन के वायदों पर सफाई। सत्ता के संचालन की रीति पर सफाई, कथित विफल विदेशनीति पर सफाई। हर बात पर दुहाई, बात बात पर सफाई। अब तो हालत यह हो चली है कि भगवा खेमे से निकलनेवाली अधिकांश बातें दुहाई से आरंभ होकर सफाई पर ही समाप्त हो रही हैं। लेकिन मसला यह है कि अभी तो सूबे की महज एक तिहाई सीटों पर ही मतदान पूरा हुआ है, दो-तिहाई सीटों की अग्निपरीक्षा बाकी ही है। तीन चरणों का मतदान बाकी है। यानि अभी तो असली काम बाकी है। सीमांचल-मिथिलांचल में मोदी लहर की निष्क्रियता की चुनौती से निपटना है। दलित वोटों के अपने ठेकेदारों की अहम की लड़ाई को सुलटाना है। जनता को विरोधियों के खिलाफ भड़काना है। बिहार में परिवर्तन के लिये जनोन्माद पनपाना है। अपनी जरूरत जनता को जतानी है, विरोधियों की कमियां व खामियां लोगों को बतानी है। जाहिर है कि चुनाव अभियान के असली चरम का दौर अभी बाकी ही है। ऐसे में सफाई और दुहाई में उलझने के बजाय विरोधियों पर पूरी ऊर्जा के साथ चढ़ाई करने में बरती जा रही कोताही का नतीजा बेहद नकारात्मक भी साबित हो सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

‘पिता की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने की चुनौती’

नवकांत ठाकुर
पश्चिम चंपारण के रामनगर में जब कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और लालू यादव के लाडले तेजस्वी यादव ने मंच साझा किया तो एकबारगी बिहार विधानसभा चुनाव की बहुआयामी तस्वीर का वह पहलू नमूंदार हो गया जिसके तहत विरासत की सियासत को आगे ले जाते हुए पिता की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाने की चुनौती इन जैसे युवाओं के कांधे पर आ पड़ी है। हालांकि राजनीति में वंशवाद को बढ़ावा देना कितना उचित है या इसे कौन किस हद तक आगे बढ़ा रहा है इस मसले पर ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तर्ज पर जितना कहा या सुना जाये वह कम ही है। लिहाजा फिलहाल इस विषय को छेड़ने से परहेज बरतते हुए तटस्थ भाव से बिना कोई पूर्वाग्रह पाले अगर बिहार की मौजूदा चुनावी तस्वीर का अवलोकन किया जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह चुनाव सिर्फ सत्ता पर अधिपत्य स्थापित करने के लिये नहीं हो रहा है। इसके और भी कई आयाम हैं। कई और भी पहलू हैं। जिसमें एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस चुनाव के माध्यम से सूबे की सियासत में पीढि़यों का निर्णायक परिवर्तन भी होना है। खास तौर से बिहार की सियासत में अब तक शीर्ष पर काबिज रहे चेहरों ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित करने के लिये इस चुनाव को चुनने की जो पहल की है उसके नतीजे में इस बार की चुनावी जंग ने बेहद दिलचस्प रूख अख्तियार कर लिया है। सूबे की सत्ता पर तकरीबन डेढ़ दशक तक एकछत्र राज करनेवाले राजद सुप्रीमो लालू यादव से लेकर सूबे के सबसे ताकतवर दलित नेता व लोजपा के मुखिया रामविलास पासवान ही नहीं बल्कि सतह से शिखर का सफर तय करते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पर अपना कब्जा जमा चुके हम के संस्थापक जीतनराम मांझी ने भी इस बार के चुनाव में ही अपनी सियासी विरासत युवा पीढ़ी के हवाले करने की दिली ख्वाहिश का खुलकर मुजाहिरा करने में कोई संकोच नहीं किया है। इसके अलावा राष्ट्रीय राजनीति में खुद को स्थापित करते हुए परिवार की राजनीतिक विरासत को संभालने की अपनी दक्षता व सक्षमता को प्रमाणित करने लिये राहुल गांधी ने भी कहीं ना कहीं बिहार के मौजूदा चुनाव को ही चुनना बेहतर समझा है। हालांकि हकीकत यही है कि किसी भी चुनाव की तरह इस बार भी तकरीबन सभी राजनीतिक दलों में स्थापित नेताओं के भाई-भतीजों व बाल-बच्चों की बहार छायी हुई है लेकिन गौर से देखा जाये तो इस बार दिलचस्पी का केन्द्र सोनिया, लालू, पासवान व मांझी के बच्चे ही हैं जिनके सामने खुद को साबित व स्थापित करते हुए अपने वंश की विरासत में चार चांद लगाने की चुनौती भी है। इसमें पासवान के सांसद पुत्र चिराग ने लोकसभा चुनाव में ही पिता की छत्रछाया में रहते हुए अपनी पार्टी को सही दिशा देकर खुद को साबित व लोजपा को दोबारा स्थापित करने में कामयाबी हासिल कर ली है। वह चिराग का ही दबाव था जिसे स्वीकार करते हुए पासवान ने अपनी मृतप्राय हो चुकी पार्टी को राजग के साथ जोड़ा और नतीजन मोदी लहर पर सवार होकर सूबे की छह लोकसभा सीटों पर अप्रत्याशित जीत दर्ज कराने में कामयाबी हासिल की। लेकिन वह दौर हवा के रूख को भांपने का था जिसमें चिराग पूरी तरह सफल रहे। लेकिन इस बार चुनौती है आर पार की लड़ाई में सूबे की महज सोलह फीसदी सीटों पर लड़ते हुए सिरमौर बनने की। जाहिर है कि इस चुनौती को सफलतापूर्वक पार करने में अगर चिराग कामयाब हो गये तो ना सिर्फ लोजपा की बागडोर पूरी तरह उनके हाथों में आ जाएगी बल्कि पिता की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाते हुए खुद को साबित व स्थापित करने में भी वे निर्णायक सफलता हासिल कर लेंगे। इसी प्रकार राहुल गांधी ने इस बार भी पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेवारी उठाने से परहेज बरतते हुए जिस तरह से बिहार के चुनावी रण की कमान अपने हाथों में ली है उससे एक बात तो साफ है कि जब तक अपने दम पर वे कोई बड़ा जमीनी मोर्चा फतह नहीं कर लेते तब तक वे पार्टी को नेतृत्व देने के लिये आगे नहीं आना चाह रहे हैं। ये काफी हद तक ऐसा ही है जैसे लालू ने अपने तेजस्वी को जमीनी मोर्चा फतह करने के लिये अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर दिया है। अगर फतह हुई तो ना सिर्फ निर्विरोध तौर पर राजद उन्हें सहर्ष अपना मुखिया स्वीकार कर लेगी बल्कि सूबे में धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ की सरकार बनने की सूरत में उपमुख्यमंत्री पद पर उनकी ताजपोशी भी तय ही है। इसके अलावा लोगों की नजरें मांझी के बेटे संतोष सुमन पर भी टिकी हुई हैं जिन्हें बड़ी खामोशी के साथ इस बार सियासत में आगे बढ़ने का मौका मुहैया कराया गया है। जाहिर तौर पर मांझी ने अपना पूरा जीवन लगाकर अपनी जो राजनीतिक विरासत खड़ी की है उसे उम्र के चैथेपन में वे अपने उत्तराधिकारी के हवाले करना चाह ही रहे हैं। लेकिन मसला है कि पहले उनके बेटे को जनता की स्वीकार्यता मिले और उसी आधार पर पार्टी में उसके कद को विस्तार दिया जाये। यानि समग्रता में देखें तो इस बार दांव पर सिर्फ सूबे की सत्ता ही नहीं है, विरासत की सियासत को संभालने की दक्षता, सक्षमता व स्वीकार्यता साबित करने की चुनौती भी है जिसमें सफलता या असफलता का नतीजा निश्चित तौर पर बेहद दूरगामी व निर्णायक साबित होनेवाला है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’ 

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

‘भीड़ के सामने दांव पर इंसानियत’

नवकांत ठाकुर
‘भीड़ तमाशा करे या भीड़ तमाशायी हो, दांव पर हर हाल में इंसानियत ही होती है।’ वाकई भीड़ का मनोविज्ञान अलग ही होता है। कायदे से तो इंसानों की भीड़ के जुटान में इंसानियत की भावना का उफान दिखना चाहिये। लेकिन आम तौर पर ऐसा होता नहीं है। इंसान जब भीड़ का हिस्सा बन जाये तो अक्सर उसके भीतर का इंसान गायब हो जाता है। उस पर हावी हो जाता है हैवान जिसके वशीभूत होकर वह जो ना कर गुजरे वह कम। अगर ऐसा नहीं होता तो दादरी के बिसराड़ा गांव में महज एक अफवाह को सुनकर इकट्ठा हुई भीड़ अधेड़ पिता व उसके युवा पुत्र को इस धराधाम से रूखसत करने पर हर्गिज उतारू नहीं होती। गनीमत रही कि जिस्म का हर पुर्जा तुड़वा लेने के बाद भी पुत्र के जिस्मानी पिंजड़े ने प्राण-पखेरू को आजाद नहीं होने दिया। लेकिन पिता का जीवन भीड़ की बलि चढ़ गया। अब ऐसी भीड़ को इंसानों का जुटान कहें भी तो कैसे? शर्मनाक यह है कि जो लोग भीड़ का हिस्सा नहीं थे वे भी अब इस पूरे मामले को जाति, मजहब व खान-पान सरीखे मसलों से जोड़कर अपनी अंदरूनी पाशविकता का मुजाहिरा करने से पीछे नहीं हट रहे हैं। सतही तौर पर तो किसी को कोई सही लग सकता है और दूसरे को कोई और। लेकिन गहराई में झांकें तो भीड़ का तांडव समाप्त होने के बाद के पूरे घटनाक्रम में कोई ऐसा नहीं है जिसे दूध का धुला या पाक-साफ कहा जा सके। पीडि़त परिवार के लिये कुछ लोग हमदर्द बनकर खड़े हो गये हैं तो कुछ की हमदर्दी भीड़ के साथ जुड़ गयी है। दूसरी ओर जिस पुलिस प्रशासन पर भरोसा करके हमारा समाज चैन की नींद सोना चाहता है उसकी सोच-समझ का तो कहना ही क्या। उसकी पहली कोशिश तो पीडि़त पक्ष के भीतर व्याप्त हुई असुरक्षा की भावना को दूर करने की होनी चाहिये थी लेकिन उसने सबसे पहले यह मालूम करना निहायत आवश्यक समझा कि जिस अफवाह को सच मानकर भीड़ ने हैवानियत का तांडव किया उसके पीछे की सच्चाई क्या है। लिहाजा पुलिस ने पहला काम किया पीडि़त के खाने की जांच कराने का। वह तो गनीमत रही कि जिस भोजन को ग्रहण करने के इल्जाम में पीडि़त पक्ष को भीड़ का कोपभाजन बनना पड़ा वह बात जांच में सिरे से गलत पायी गयी। वर्ना अगर अफवाह सच साबित हो जाती तो पता नहीं पीडि़त पक्ष को ही अपराधी साबित करनेवालों का सैलाब भी आ सकता था। खैर, मसला यह है कि क्या किसी को केवल इस बात के लिये हलाक किया जा सकता है कि वह ऐसी चीज क्यों खा रहा है जो उसके मजहब में तो हलाल है लेकिन भीड़ का मजहब उसे हराम मान रहा है? क्या समाज में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का राज कायम होगा और गरीब की गाय कोई भी हांक ले जाये? फिर क्या जरूरत है कानून की या संविधान की। सरकार की या प्रशासन की। ऐसे में तो जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी दावेदारी। जहां जिस समुदाय की तादाद अधिक होगी वह किसी अन्य मजहब को माननेवालों पर भी अपनी सोच थोपने के लिये स्वतंत्र होगा। देश के किसी हिस्से में दुधारू मवेशी को काट कर खाना गुनाह माना जाएगा तो किसी अन्य हिस्से में मैला खानेवाले पशु को मारकर खानेवालों की खैर नहीं होगी। कहीं शाकाहारियों की भीड़ तांडव मचाएगी तो कहीं मांसाहारियों के दबाव में कंठी-माला का विसर्जन करना मजबूरी बन जाएगी। आखिर यह समाज किस दिशा में जा रहा है इसकी कभी तो फिक्र करनी ही होगी। क्या हम किसी को पीने-खाने, पहनने-ओढ़ने और अपने मजहब के मुताबिक आचरण करने की आजादी भी नहीं दे सकते। सवाल बहुत हैं लेकिन जवाब नदारद है। जवाब तो तब मिले जब कोई अपनी जवाबदेही लेना गवारा करे। यहां तो हर कोई एक-दूसरे को आरोपों व इल्जामों में लपेट कर खुद को पाक-साफ साबित करने में जुटा हुआ है। पुलिस की मानें तो अचानक उठी अफवाह के कारण शुरू हुई हैवानियत के लिये तो समूचा समाज जिम्मेवार है। प्रदेश सरकार की मानें तो पूरा किया धरा केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा का है जो समाज का माहौल बिगाड़कर अपनी राजनीति चमकाने में जुटी हुई है। भाजपा की मानें तो कानून व्यवस्था प्रदेश की सरकार के हाथों में है लिहाजा इस पूरे मामले की सीधी जिम्मेवारी उसकी ही है। इसके अलावा कांग्रेस व एएपी से लेकर बसपा व एमआईएम सरीखी तमाम तीसरी पार्टियां भाजपा व सपा को बराबर का दोषी मान रही हैं। उस पर तुर्रा ये कि पीडि़त पक्ष की मानें तो हमलावर जिस मजहब के थे उसी कौम के लोगों ने बचाने का भी काम किया, फिर किसे दोषी कहें और किसे बेगुनाह। यानि, हर किसी का एक बयान है और हर किसी की एक प्रतिक्रिया है। सबका अपना-अपना नजरिया है जिसमें केवल वही पाक-साफ व बेगुनाह है। लेकिन हकीकत यही है कि इस हैवानियत के हम्माम में सभी एक समान नंगे हैं और इंसानियत की हत्या में बराबर के भागीदार हैं। हर किसी को अपनी चिंता है। कोई अपना वोटवैंक बचाने में जुटा है तो कोई नयी जमीन तलाशने में। कोई अपनी नौकरी बचाने में जुटा है तो कोई अपना चेहरा। इस पूरी आपाधापी में जब कोई अपनी गलती मानना तो दूर बल्कि महसूस करना भी गवारा नहीं कर रहा हो तो ऐसे में खुद को कैसे तसल्ली दी जाये कि अब आगे से ऐसा नहीं होगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

‘मित्रता की मिठास में अविश्वास का जहर’

नवकांत ठाकुर
यूं तो हर रिश्ते की बुनियाद विश्वास पर ही टिकी होती है लेकिन मित्रता के मामले में विश्वास की भूमिका कुछ अधिक ही होती है। खून के रिश्तों में कितनी ही दुश्मनी क्यों ना हो जाये लेकिन रक्तसंबंधों में बदलाव नहीं हो सकता। जिसके साथ जो संबंध है वह हमेशा रहेगा ही। भले रिश्ते में मिठास रहे या खटास। लेकिन मित्रता का रिश्ता सिर्फ विश्वास पर ही टिका होता है। विश्वास जितना मजबूत होगा मित्रता भी उतनी ही अटूट होगी। विश्वास की बुनियाद हिलते ही यह रिश्ता सिरे से समाप्त हो जाता है। इन दिनों विश्वास का यही संकट दिख रहा है भारत और नेपाल की मित्रता में। कहने को तो दोनों अलग देश हैं लेकिन बेटी-रोटी का है। भारत से लगती नेपाल की 1700 किलोमीटर लंबी सरहद के दोनों ओर के बाशिंदों को आज तक शायद ही यह महसूस हुआ हो कि इस पार या उस पार में कोई अंतर है। वैसे भी नेपाल को दुनिया के साथ को जोड़ने की कड़ी भी भारत ही है। नेपाल को नमक-तेल से लेकर तमाम जरूरी सामानों की उपलब्धता भारत से ही होती है। भारत में सरकार किसी भी दल या गठबंधन की क्यों ना हो लेकिन नेपाल व नेपालियों को हमेशा हर मामले में अपने अटूट हिस्से सरीखा ही सम्मान व स्थान दिया गया। लेकिन लगता है कि हमारी इस मित्रता पर किसी की बुरी नजर पड़ गयी है। तभी तो नेपाल के संविधान निर्माताओं ने वहां कुछ ऐसी व्यवस्थाएं लागू करने की पहल कर दी है जिसके नतीजे में हर उस नेपाली के हक व अख्तियार में कटौती हो गयी है जिसने भारत के साथ रोटी-बेटी का राब्ता कायम किया हुआ है। हालांकि भारत ने आज तक ना तो कभी नेपाल की संप्रभुता या अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश की है और ना ही भारत की नीतियां ऐसा करने की इजाजत देती हैं। बल्कि भारत तो हमेशा ही नेपाल की एकता, अखंडता व संप्रभुता के रक्षक के तौर पर खड़ा रहा है। लेकिन मसला है कि जब भारत से बहू ब्याह कर लाने पर उसे अगर सात साल तक नागरिकता देने से भी नेपाल का नया संविधान इनकार कर रहा हो तो उसे बेहतरीन व्यवस्था बताकर उसका स्वागत कैसे किया जा सकता है। तभी तो भारत ने नेपाल की इस नयी पहल का सिर्फ संज्ञान लेते हुए इस पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से परहेज बरत लिया है। लेकिन भारत की यह चुप्पी भी नेपाल को सहन नहीं हो रही। वह इसे नकारात्मक समझ रहा है। अब उसे कौन समझाये कि उसके अंदरूनी मामलों को अच्छा या बुरा कहनेवाले हम होते ही कौन हैं। अगर उसने इस पर सलाह मांगी होती तो शायद परिस्थितियां ऐसी नहीं होती कि पूरे तराई इलाके में संविधान को जलाया जा रहा होता या तमाम मैदानी बाशिंदे आंदोलन पर उतारू होते। लेकिन नेपाल के नये संविधान के निर्माण में भारत की भूमिका सिर्फ इतनी ही है कि उसे लोकतांत्रिक व्यवस्था व एक लिखित संविधान लागू करने के लिये इस तरफ से हमेशा प्रोत्साहित किया जाता रहा है। खैर, नेपाल के नेताओं को पता नहीं मित्रता की मिठास का जायका बदलने के लिये चीन का कौन सा स्वाद रास आ गया है कि वे इन दिनों अपने दोनों बड़े पड़ोसियों के साथ बराबर का संतुलन साधने का राग आलापने लगे हैं। जाहिर तौर पर यह चीन की ही खुराफात है कि उसने नेपाल में यह भ्रम फैला दिया है कि नये संविधान का विरोध करने के लिये तराई के मधेसियों को भारत ही भड़का रहा है और मधेसी आंदोलन के कारण ठप्प पड़ी ट्रकों की आवाजाही वास्तव में भारत द्वारा की गयी आर्थिक नाकेबंदी का नतीजा है। भारत के प्रति फैलाये गये भ्रम का ही नतीजा है कि नेपाल में 42 भारतीय टीवी चैनलों का प्रसारण प्रतिबंधित कर दिया गया है और सिनेमाघरों में हिन्दी फिल्म दिखाने पर भी रोक लगायी जा रही है। इसके पीछे वजह बतायी जा रही है भारत की उस कथित नीति को जिससे नेपाल की एकता, अखंडता व संप्रभुता को खतरा उत्पन्न हो रहा है। अब इस बेसिर-पैर की गलतफहमी पर क्या कहा जा सकता है। लेकिन मसला है कि इस मामले में चुप भी नहीं बैठा जा सकता क्योंकि भारत व नेपाल के बीच गलतफहमी का बीज बोकर चीन अपनी जड़ें जमाने में जुट गया है। जाहिर है कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। ना सिर्फ भारत के लिये बल्कि इससे कहीं अधिक नेपाल के लिये जिसकी सत्ता का संचालन कर रहे नेताओं को चीन की चालबाजियां  या तो समझ नहीं आ रहीं या वे जानबूझकर नासमझी का ढ़ोंग कर रहे हैं। तभी तो वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हा को खुले तौर पर प्रधानमंत्री से यह अपील करनी पड़ी है कि वे नेपाल के मसले की अनदेखी ना करें और दोनों देशों के रिश्तों की प्रगाढ़ता में कमी आने से पहले ही नेपाल में व्याप्त भ्रम, गफलत व गलतफहमी को दूर करने की ठोस पहल करें। हालांकि नेपाल की नियति आज उसे जिस मोड़ पर ले आयी है उसके लिये पूरी तरह उसकी अपनी नीतियां ही जिम्मेवार हैं लेकिन कोई दुश्मन अगर हमारे सगे भाई को भड़का रहा हो और उसे गलत राह पर ले जा रहा हो तो अपने मासूम भाई को उसके हाल पर छोड़कर सिर्फ ‘तेल देखो और तेल की धार देखो’ की नीति पर अमल किये जाने को कैसे उचित कहा जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  

सोमवार, 28 सितंबर 2015

‘अनाड़ी का खेलना खेल का सत्यानाश’

नवकांत ठाकुर
‘अनाड़ी का खेलना खेल का सत्यानाश, पटरी हो खराब तो रेल का सत्यानाश, रहे अंधेरा रात भर तेल का सत्यानाश।’ यूं तो आनंद बख्शी साहब ने ये पंक्तियां वर्ष 1983 में आयी फिल्म ‘वो सात दिन’ के लिये लिखी थी लेकिन सियासी नजरिये से देखा जाये तो यह भाजपा के उन नेताओं की करतूतों का संभावित अंजाम बयान करती हुई नजर आती हैं जिनके अनाड़ीपन ने पार्टी के लिये भारी सिरदर्दी का सामान जुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। वाकई पार्टी का शीर्ष संचालक खेमा इन दिनों भारी परेशानी से गुजर रहा है। उसकी समझ में ही नहीं आ रहा है कि अपने उन बयान बहादुर नेताओं की नादानियों से कैसे निपटा जाये जिनकी बेसिर पैर की बातें लगातार मीडिया की सुर्खियां जुटा रही हैं। इन नेताओं की नादानियों से निपट पाने में नाकामी का ही नतीजा है कि पार्टी के चाणक्य कहे जानेवाले अरूण जेटली भी यह स्वीकार करने से गुरेज नहीं करते हैं कि भाजपा ही शायद इकलौती ऐसी पार्टी है जो हर रोज एक नया बेवकूफ पैदा करने की क्षमता रखती है। हालांकि यह शेर सर्वविदित है कि ‘बेवकूफों की कमी नहीं जमाने में, एक ढृूंढो हजार मिलते हैं।’ लेकिन इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि अपने बेवकूफों के कारण जितनी सिरदर्दी भाजपा को झेलनी पड़ती है उतनी शायद ही किसी अन्य पार्टी को झेलनी पड़ती हो। खुद को सबसे अधिक अनुुशासित पार्टी बतानेवालनी भाजपा की अंदरूनी हकीकत यही है कि सांगठनिक अनुशासन की जितनी धज्जियां यहां उड़ाई जाती हैं उसकी मिसाल शायद ही कहीं और देखने को मिले। मसलन बिहार विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर किसी भी दल के सांसद ने अपने शीर्ष नेतृत्व पर यह इल्जाम लगाने की जुर्रत नहीं की है कि उसने पैसे लेकर ऐसे लोगों को टिकट बेच दिया है जिनके लिये वोट मांगना भी बेशर्मी की इंतहा ही होगी। जाहिर तौर पर यह सीधे-सीधे अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा ही है क्योंकि भाजपा में टिकट वितरण का काम कोई एक व्यक्ति नहीं करता बल्कि इसके लिये संगठन के तमाम शीर्ष संचालकों की एक चुनाव समिति बनी हुई है जिसमें सर्वसम्मति बनने के बाद ही किसी को भी पार्टी का टिकट दिये जाने का फैसला होता है। ऐसे में भाजपा द्वारा पैसे लेकर समाज विरोधी तत्वों, बाहुबलियों व अपराधियों को टिकट दिये जाने का जो खुल्लम खुल्ला इल्जाम पार्टी के सांसद आरके सिंह ने लगाया है वह सीधे तौर पर पार्टी तमाम शीर्ष संचालकों की सैद्धांतिक नैतिकता व वैचारिक शुचिता को ही कठघरे में खड़ा करता हुआ दिखाई देता है। जाहिर तौर पर किसी अन्य दल में किसी ने ऐसा करने की जुर्रत की होती तो उसका अंजाम क्या होता इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन भाजपा में ऐसा करनेवाले को भी इतनी इज्जत बख्शी जा रही है कि उसे मनाने, समझाने व चुप करने के लिये पार्टी अध्यक्ष को खुद ही दंडवत होना पड़ रहा है। खैर, पार्टी के लिये सिरदर्दी बढ़ाने का काम करनेवाले आरके अकेले नेता नहीं हैं। ऐसा करनेवालों की तो पूरी जमात दिखाई पड़ रही है। एक ओर पार्टी के ही नेतृत्व में चल रही महाराष्ट्र की सरकार ने गैरमराठी भाषियों को आॅटो-टैक्सी चलाने के काम से वंचित करने की मुनादी पिटवा दी है तो दूसरी ओर मध्य प्रदेश से आवाज आयी है कि मुसलमानों को बकरीद में अपने संतानों की कुर्बानी देनी चाहिये। कोई नवरात्र में मांस की बिक्री को प्रतिबंधित करने की मांग कर रहा है तो किसी को पाकिस्तान के प्रति भारत सरकार की नीतियां नहीं भा रही हैं। किसी की नजर में शिक्षा व नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था खटक रही है तो कोई संस्कृति की दुहाई देकर अल्पसंख्यकों की आजादी पर अंकुश लगाने की बात कर रहा है। किसी की परेशानी टिकट वितरण को लेकर है तो कोई बिहार में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित नहीं किये जाने को लेकर बेचैन है। यहां तक कि नीतिगत व सैद्धांतिक मामलों में पार्टी की शीर्ष त्रिमूर्ति की मनमानी से संगठन का काफी बड़ा तबका बेहद नाराज दिखाई दे रहा है। टिकट वितरण में बाहरियों को तरजीह दिये जाने और लगभग 22 फीसदी निवर्तमान विधायकों को टिकट से वंचित कर दिये जाने के कारण संगठन में पनपे असंतोष ने भी शीर्ष नेतृत्व की सिरदर्दी में खासा इजाफा कर दिया है। उस पर तुर्रा यह कि पार्टी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन भी यह संकेत देने से नहीं हिचक रहे हैं कि पार्टी में कुछ गड़बडि़यां तो हो ही रही हैं। इन तमाम मसलों को समग्रता में देखते हुए बिहार चुनाव पर पड़नेवाले इसके असल की कल्पना की जाये तो निश्चित तौर पर पार्टी के शीर्ष संचालकों की नींद हराम होना स्वाभाविक ही है। लेकिन मसला यह है कि संगठन के भीतर से उठनेवाली ऐसी बातों की गूंज को रोकना भी आवश्यक ही है कि जिसके कारण पार्टी मर्यादा, शुचिता व इमानदारी पर संदेह का वातावरण बन रहा हो। सवाल यह नहीं है कि किसी को व्यक्तिगत विचारों का इजहार करने से रोकना कहां तक उचित है बल्कि जरूरत इस बात की है कि नादानी व बेवकूफी की बातें करके मीडिया की सुर्खियां बटोरनेवाले छपास रोग से ग्रस्त नेताओं को सांगठनिक अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाये। अन्यथा एक ही मसले पर अलग-अलग सुर सुनाई पड़ने के नतीजे में जमीनी स्तर पर पार्टी की विश्वसनीयता खतरे में पड़ सकती है जिसका नुकसान अंततोगत्वा संगठन की स्वीकार्यता पर पड़ना तय ही है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’

सोमवार, 21 सितंबर 2015

‘...... और काफिर ये समझता है कि मुसलमान हूं मैं’

नवकांत ठाकुर
‘जाहिदे तंग नजर ने मुझे काफिर जाना, और काफिर ये समझता है कि मुसलमान हूं मैं।’ वाकई इन दिनों आॅल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी की हालत ऐसी ही है। कल तक वे सियासी धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़े झंडाबरदार माने जाते थे। उनका समर्थन ही किसी के लिये भी धर्मनिरपेक्षता का प्रमाणपत्र हुआ करता था। उन्होंने भी हिन्दुत्ववादी ताकतों के खिलाफ जमकर जहर उगलने का कोई मौका कभी हाथ से जाने नहीं दिया। कांग्रेसनीत संप्रग के साथ उनकी करीबी हमेशा बरकरार रही और वे हर उस खेमे के साथ हमेशा जुड़े रहे जिसने भाजपा के विरोध में मोर्चा खोलने की पहल की हो। लेकिन कहते हैं कि वक्त बदलते देर नहीं लगती है। तभी तो आज आलम यह है कि उनकी निजी धर्मनिरपेक्षता ही खतरे में दिख रही है। हिन्दी पट्टी की कोई भी पार्टी यह मानने के लिये तैयार ही नहीं है कि ओवैसी धर्मनिरपेक्ष हैं या धर्मनिरपेक्षता की सियासत करते हैं। सबकी नजर में इन दिनों ये उतने ही सांप्रदायिक बन गये हैं जितनी बाबरी की शहादत के दिनों से लेकर गुजरात में हुए दंगे के दौरान ही नहीं बल्कि काफी हद तक हालिया दिनों तक भी भाजपा हुआ करती थी। हालांकि धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर मुसलमानों का सबसे बड़ा खैर-ख्वाह होने का दम भरनेवाले कई राजनीतिक दलों की नजर में भाजपा आज भी उतनी ही सांप्रदायिक है जितना इन दिनों ओवैसी को बताया जा रहा है। लेकिन इसे ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे का करिश्मा कहें या खाड़ी देश जाकर मोदी द्वारा मक्का मस्जिद में दर्ज करायी गयी मौजूदगी। इन दिनों भाजपा को जमीनी स्तर पर पहले जैसा कट्टर हिन्दुत्ववादी साबित कर पाना काफी मुश्किल हो चला है। हालांकि इसकी एक वजह लोजपा सरीखे ऐसे दलों का राजग के साथ जुड़ना भी है जिसने मुस्लिम मुख्यमंत्री की मांग पर अड़े रहकर बिहार की सत्ता को अपने हाथों में लेने का सुनहरा मौका गंवा दिया था। जम्मू कश्मीर में सत्ता के लिये पीडीपी को गले लगाने की पहल, आरएसएस द्वारा अल्पसंख्यकों के प्रति खुलकर किया जा रहा प्रेम प्रदर्शन अथवा केन्द्र की विभिन्न योजनाओं का अधिकतम लाभ मुस्लिम समुदाय को मुहैया कराने का प्रयास। वजह चाहे जो भी, लेकिन हकीकत यही है कि इन दिनों भाजपा को राजनीतिक अछूत बताना या उस पर मुस्लिम विरोधी होने का आरोप मढ़ना अब पहले की तरह कतई आसान नहीं रह गया है। साथ ही इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि मुसलमानों के मन में अर्से से समाया हुआ भाजपा का भय अब लगातार कमजोर पड़ता दिख रहा है। लिहाजा मुसलमानों को भाजपा का भय दिखाकर उन्हें अपने साथ जोड़े रखने की रणनीति की कामयाबी से राजनीतिक दलों का भरोसा काफी हद तक हिल चुका है। लेकिन एक सच यह भी है कि आज भी मुस्लिम मतदाताओं का भाजपा पर इतना भरोसा नहीं जमा है कि वे उसके पक्ष में मतदान करने की पहल कर सकें। यही वजह है कि इन दिनों धर्मनिरपेक्षतावादी दलों द्वारा प्रयोग के तौर पर अल्पसंख्यकों को विकल्पहीन करके उनका समर्थन हासिल करने की रणनीति अपनाने की पहल की गयी है। बिहार में धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे का गठन भी इसी प्रयोग के तहत हुआ है और यूपी में सपा-बसपा की एकजुटता का शगूफा भी इसी प्रयोग की नींव डालने के लिये छोड़ा गया था। लेकिन मसला यह है कि अल्पसंख्यकों को विकल्पहीन करके उनका समर्थन हासिल करने की रणनीति को जमीन पर आजमाने की पूरी योजना में ओवैसी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का फच्चर फंस गया है। सच तो यही है कि हिन्दी पट्टी के अल्पसंख्यक समुदाय का नेतृत्व पूरी तरह गैर-मुस्लिमों के हाथों में ही सिमटा हुआ है जिन्होंने बकौल ओवैसी, मुस्लिम समुदाय का केवल वोटबैंक के तौर पर ही इस्तेमाल किया है वर्ना अगर इस वर्ग के हित में जरा भी काम किया गया होता तो सामाजिक तौर पर आज भी इनकी इतनी बुरी गत नहीं बनी होती। यानि मुसलमानों के तमाम स्थापित मसीहाओं की नीति व नीयत के खिलाफ अब ओवैसी ने जंग छेड़ दी है। जाहिर है कि इस जंग का सीधा नुकसान उन धर्मनिरपेक्ष दलों को ही होगा जिन्होंने समाज के अन्य वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हुए मुसलमानों के समर्थन से अपनी सियासी साख कायम की हुई है। जबकि इसका फायदा सीधे तौर पर भगवा खेमे को ही मिलेगा जो मुस्लिम वोटबैंक के बिखराव को अपनी जीत की गारंटी मान रहा है। ऐसे में लालू यादव सरीखे मुसलमानों के मसीहा ने अब ओवैसी को भाजपा के बराबर का कट्टर सांप्रदायिक बताना आरंभ कर दिया है जिसकी तरक्की से देश में धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद कमजोर हो रही है। यहां तक कि कुछ धर्मनिरपेक्षतावादी तो ओवैसी को भाजपा का वोटकटवा एजेंट बताने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मानें तो ओवैसी सरीखा हिन्दूविरोधी नेता भाजपा के भले का कोई काम करेगा ऐसा सोचना भी मूर्खतापूर्ण ही है। यानि समग्रता में देखा जाये तो अब ओवैसी ना इधर के बचे हैं ना उधर के रहे हैं। हालांकि कल तक मुसलमानों के समर्थन को ही धर्मनिरपेक्षता की कसौटी माने जाने के कारण ओवैसी देश के सर्वश्रेष्ठ धर्मनिरपेक्ष नेता माने जा रहे थे लेकिन अब उनकी छवि हर किसी के लिये सियासी अछूत की बन गयी है। वैसे यह पहला मौका है जब मुसलमानों का मसीहा कहलानेवालों को एक स्थापित मुस्लिम नेता ही धर्मनिरपेक्षता के लिये खतरा दिख रहा है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

करवट बदल रही है बिहार की सियासत  

सहयोगियों के सब्र की कड़ी परीक्षा ले रही है भाजपा 

नवकांत ठाकुर

बिहार विधानसभा चुनाव के सियासी समीकरण में तब्दीलियों का सिलसिला लगातार जारी रहने के क्रम में धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे ने नये सिरे से अपनी जमीनी कमजोरियों को दूर करने की कोशिशें तेज कर दी हैं जबकि कागजी तौर पर मजबूत स्थिति में नजर आ रहे भाजपानीत राजग के राहों की कठिनाइयां दिनोंदिन बढ़ती दिख रही है। जदयू, राजद व कांग्रेस की तिकड़ीवाले धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे द्वारा यादव वोटबैंक में सेंध लगाने में जुटे राजद से निकाले जा चुके सीमांचल के कद्दावर सांसद पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी को चुनाव में हिस्सा नहीं लेने के लिये मनाने की कोशिश हो रही है। साथ ही मुस्लिम वोटबैंक की टूट को टालने के लिये असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे में शामिल होने के लिये सहमत करने का प्रयास भी किया जा रहा है। इसके अलावा जिन निवर्तमान विधायकों को राजग में टिकट नहीं मिल पा रहा है उनको भी अपने पाले में लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। दूसरी ओर भाजपानीत राजग के भीतर सतही तौर पर भले ही कोई बड़ी समस्या नहीं दिख रही हो लेकिन अंदरूनी हकीकत यही है कि चुनावी समीकरण को साधने की दिशा में उसकी समस्याएं लगातार बढ़ी दिख रही हैं। अव्वल तो सीटों के बंटवारे में राजग के तमाम घटक दलों का हित टकराने के कारण सहमति की राह तैयार करने में काफी मुश्किलें आ रही हैं और दूसरे अपनी जीत सुनिश्चित करने के बजाय सहयोगी दल की हार पक्की करने की प्रतिस्पर्धा राजग में बढ़ती ही जा रही है। 
दरअसल पिछले कुछ दिनों तक कागजी समीकरण में परंपरागत वोटों के बिखराव के कारण जिस धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ की हालत काफी पतली नजर आ रही थी उसने अपनी इस कमजोरी को दूर करने में पूरी ताकत झोंक दी है। हालांकि अभी साफ तौर पर उसे इसका कोई ठोस या स्पष्ट फायदा हासिल नहीं हो पाया है लेकिन यादव वोटबैंक में सेंध लगा रहे पप्पू यादव को किसी भी मोर्चे में पनाह नहीं मिलने के कारण अब उनकी पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़के फजीहत कराने के पक्ष में नहीं दिख रही है। दूसरी ओर सूबे की मुस्लिम बहुलतावाली 60 सीटों पर नजरें गड़ाए हुए ओवैसी को भी अगर ‘वोटकटवा’ व ‘भाजपा की अंदरूनी सहयोगी’ की नकारात्मक छवि से उबरना है तो उन्हें भी किसी ऐसे सशक्त सहयोगी की जरूरत होगी जिसके साथ जुड़कर सूबे की तीसरी ताकत के तौर पर वे खुद को स्थापित कर सकें। इसी जमीनी हकीकत को भांपते हुए पप्पू ने तो ओवैसी की ओर दोस्ती का हाथ आगे बढ़ा दिया है लेकिन अभी ओवैसी ही उहापोह की स्थिति में दिख रहे हैं। जाहिर है कि अगर पप्पू और ओवैसी का गठजोड़ हो गया तो धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे का पूरा गणित ही गड़बड़ा सकता है। इसी संभावना से बचने के लिये शीर्ष राजद नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने ओवैसी को धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे में शामिल होने का औपचारिक न्यौता दे दिया है जबकि सूत्रों के मुताबिक पप्पू को चुनाव से अलग रखने के लिये उनकी कांग्रेसी सांसद पत्नी रंजीता रंजन को लगाया जा चुका है। यानि व्यावहारिक रणनीतियों को अमल में लाते हुए अपनी कागजी कमजोरियों को दूर करने के लिये धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। दूसरी ओर भाजपानीत राजग में सतही तौर पर भले ही एकजुटता दिख रही हो लेकिन सूत्रों की मानें तो जीती हुई सीटों का बंटवारा नहीं करने की नीति के कारण राजग के सभी घटक दलों में भारी आक्रोश का माहौल दिख रहा है जिसका रालोसपा की ओर से इजहार भी हो गया है। साथ ही सूत्रों की मानें तो खुद को दलितों का सबसे बड़ा नेता साबित करने की जंग में ना तो लोजपा अपना वोट हम को हस्तांतरित करने के लिये तैयार है और ना ही हम अपने समर्थकों को लोजपा के पक्ष में वोट करने के लिये प्रेरित करना चाहता है। दूसरी ओर जीती हुई सीटों का बंटवारा नहीं करने की भाजपा की नीति से नाराज होकर उसके सहयोगी भी अपने प्रभावक्षेत्र का परंपरागत वोट किसी अन्य सहयोगी के उम्मीदवार को हस्तांतरित करने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। बहरहाल जहां एक ओर धर्मनिरपेक्ष महामोर्चा अपने उखड़े-बिखरे कील-कांटों को दुरूस्त करने में जुटा हुआ है वहीं राजग का खेमा आपस में ही एक-दूसरे के धुर्रे बिखेरने में लगा हुआ है। लिहाजा तेजी से आ रहे इन बदलावों के कारण बिहार का चुनावी समीकरण अब नयी करवट लेता हुआ दिख रहा है जो अंततोगत्वा निर्णायक भी साबित हो सकता है।  

सोमवार, 14 सितंबर 2015

‘खुदा जब हुस्न देता है, नजाकत आ ही जाती है’

नवकांत ठाकुर
कहते हैं कि ‘खुदा जब हुस्न देता है नजाकत आ ही जाती है।’ इसे अगर राजनीतिक नजरिये से देखें तो यह कहना भी गलत नहीं होगा कि ‘बस एक बार सत्ता मिल जाए तो सियासत आ ही जाती है।’ दरअसल सियासत केवल सत्ता हासिल करने के लिये ही नहीं बल्कि सत्ता को संभालने के लिये भी करनी पड़ती है और हमेशा से सत्ता को संभालने का मूलमंत्र रहा है ‘फूट डालो और राज करो।’ हालांकि सियासत की यह रणनीति सतही तौर पर तो उचित व नैतिक नहीं दिखती है लेकिन बुरी तरह उलझे हुए मामलों को सुलझाने व निपटाने के लिये कई दफा इसे अमल में लाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही उपलब्ध नहीं होता है। लिहाजा सत्ता की सिरदर्दियों से राहत पाने के लिये इस पर अमल करना आवश्यक हो जाता है। वैसे भी सत्ता में आने के बाद सियासत का यह हुनर सभी राजनीतिक दल सीख ही जाते हैं। अब तक तो यही देखा गया है कि ऊपरवाला जिसे सत्ता में बिठाता है उसे सियासत के इस हुनर से भी नवाज ही देता है। तभी तो इन दिनों केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार भी ‘फूट डालो और राज करो’ की रणनीति का सटीक इस्तेमाल करने के मामले में बेहद प्रवीण व सिद्धहस्त दिखाई पड़ रहे हैं। मिसाल के तौर पर गुजरात से उठी पटेल आरक्षण की आंधी को शांत करते हुए राजनीतिक क्षितिज पर अचानक धूमकेतु की मानिंद उभरे हार्दिक पटेल को नेपथ्य में भेजकर इस सिरदर्दी को सिरे से समाप्त करने से लेकर पूर्व सैनिकों के लिये एक समान पेंशन नीति लागू करने की दशकों पुरानी उलझन को सुलझाने तक के मामले में जिस खामोशी व खूबसूरती के साथ ‘फूट डालो और राज करो’ की रणनीति को अंजाम दिया गया है वह वाकई बेहद दिलचस्प है। इस रणनीति को अमल में लाते हुए हार्दिक पटेल की तो ऐसी हालत कर दी गयी है कि उनके द्वारा गठित संगठन ही अब उनको अपना नेता मानने के लिये तैयार नहीं दिख रहा है। खेल ऐसा हुआ कि पहले तो हार्दिक के भरोसेमंद सहयोगियों के काफी बड़े धड़े ने उनके नेतृत्व को मानने से इनकार करते हुए पाटीदार अमानत आंदोलन संगठन से रिश्ता तोड़कर अपनी अलग संस्था गठित कर ली और बाद में रही सही कसर संगठन के भीतर हार्दिक के खिलाफ उठी विद्रोह की लहर ने पूरी कर दी जिसके बाद संगठन की बागडोर छोड़ने की पेशकश करके हार्दिक लगातार हाशिये की ओर बढ़ने के लिये मजबूर हो गये हैं। हालांकि स्वाभाविक तौर पर हार्दिक को हाशिये पर भेजने के लिये अमल में लायी गयी इन तिकड़मों का सूत्रधार होने से भाजपा साफ इनकार कर रही है लेकिन हार्दिक के शुभचिंतकों का साफ तौर पर कहना है कि पटेल आरक्षण के आंदोलन की कमर तोड़ने व पटेल समुदाय को विभिन्न खेमों में बांट देने की पूरी साजिश को भाजपा ने ही अंजाम दिया है। वैसे भी उस सेक्स सीडी के सार्वजनिक होने के बाद हार्दिक की साख बुरी तरह प्रभावित हुई है जिसमें तीन युवक एक विदेशी काॅलगर्ल के साथ होटल में ऐश करते हुए दिख रहे हैं और चर्चा है कि उसमें हार्दिक भी शामिल हैं। खैर, ऐसा ही मामला ‘वन रैंक वन पेंशन’ के मसले को सुलझाने के क्रम में भी दिखा जिसमें एक बार तो सरकार यह मान गयी थी कि पेंशन का निर्धारण हर तीन साल के अंतराल में किया जाएगा लेकिन वह एक समान पेंशन नीति का लाभ स्वेच्छा से सेवानिवृति लेनेवाले पूर्व सैनिकों को नहीं देना चाहती थी। ऐसे में पूर्व सैनिकों के बीच फूट पड़ना लाजिमी ही था लिहाजा लंबी जिरह के बाद आखिरकार तय हुआ कि पेंशन का पुनरीक्षण पांच साल के अंतराल पर किया जाएगा और इसका लाभ स्वैच्छिक सेवानिवृति लेनेवालों को भी दिया जाएगा। इस फैसले की घोषणा के बाद पूर्वसैनिकों का संगठन अब दो-फाड़ दिख रहा है जिसमें काफी बड़ा धड़ा तो सरकार से संतुष्ट हो गया है जबकि कुछ लोग अभी तक आंदोलन पर डटे हुए हैं। वैसे भी इस आंदोलन में यह फूट नहीं पड़ती तो पूर्वसैनिक हर साल पेंशन का पुनरीक्षण किये जाने की मांग पर दशकों से डटे हुए थे जिसे स्वीकार करना किसी भी सरकार के लिये संभव नहीं हो पाया था। हालांकि फूट डालकर अपना उल्लू सीधा करने की रणनीति का मुजाहिरा पहले जदयू में जीतनराम मांझी को फोड़कर किया गया जिसके कारण धर्मनिरपेक्ष महामोर्चा को बिहार में महादलित मतदाताओं का समर्थन मिलना बेहद मुश्किल हो गया और बाद में मांझी को ही आगे करके राजग के सभी सहयोगियों को इस कदर लड़ा-भिड़ा दिया गया कि कल तक भाजपा से 141 सीटों की मांग कर रहे लोजपा, रालोसपा व हम अब जितना मिल जाये उसी में खुशी व्यक्त करने के लिये विवश हो गये हैं। इसी प्रकार लग तो यही रहा है कि भाजपा ने फूट डालने की कूटनीति अमल में लाकर ही संघ परिवार के अपने उन सहोदरों की चोंच पर भी ताला जड़ दिया है जो मूल वैचारिक सिद्धांतों से संगठन व सरकार के कथित स्खलन से आहत बताये जा रहे हैं। खैर, फूट डालकर राज करने की रणनीति की सटीकता व मारकता तो हमेशा से असंदिग्ध रही है लेकिन इसका प्रयोग करने के क्रम में यह बात अवश्य याद रखी जानी चाहिये कि हर क्षेत्र में सिर्फ इसी रणनीति पर निर्भरता के नतीजे में कहीं अपनी पूरी विश्वसनीयता ही संदिग्ध ना हो जाये। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    

शनिवार, 12 सितंबर 2015

सपा भाजपा की जुगलबंदी से बढ़ी सियासी सरगर्मी 

मुलायम से मोदी की हमदर्दी के मायनों की तलाश तेज  

नवकांत ठाकुर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में भले ही समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच छत्तीस का आंकड़ा हो और दोनों ही एक दूसरे की जड़ें खोदने व नुकसान पहुंचाने का कोई भी मौका छोड़ना कतई गवारा ना करते हों लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में इन दोनों दलों के दरमियान दिख रही सियासी जुगलबंदी के कारण राजनीतिक गलियारे के तापमान में लगातार इजाफा होता दिख रहा है। खास तौर से बिहार में सपा के धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे से अलग होकर नितीश कुमार के प्रति हमलावर रूख अख्तियार करने, संसद की कार्यवाही को बाधित करने के मामले में सपा द्वारा कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किये जाने, बिहार में जदयू, राजद व कांग्रेस की तिकड़ी द्वारा सपा को समुचित सम्मान नहीं दिये जाने के मामले को लेकर भाजपा द्वारा सपा के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन किये जाने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सार्वजनिक मंच से सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की तारीफ में कसीदा काढ़े जाने सरीखे घटनाक्रमों ने देश के राजनीतिक माहौल में भारी सरगर्मी पैदा कर दी है। हालांकि सपा व भाजपा की इस जुगलबंदी को लेकर जितने मुंह उतनी बातें सुनने को मिल रही हैं। कोई इसे केन्द्र के दबाव में सपा का समर्पण बता रहा है तो किसी की नजर में यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति दोनों दलों की एक समान सोच का नतीजा है। कुछ का मानना है कि मुलायम अपनी परंपरागत राजनीति ही अंजाम दे रहे हैं जिसका तात्कालिक फायदा भाजपा को मिल रहा है जबकि कुछ राजनीतिक पंडितों का यह भी मानना है कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस को अलग थलग करने की नीति के तहत ही भाजपा ने सपा के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व सहयोगात्मक रवैया अपनाया हुआ है। लेकिन इन तमाम कयासों व अटकलों के बीच कोई भी सियासी दल या राजनीतिक पंडित दावे से इन दोनों दलों की मौजूदा जुगलबंदी के पीछे का मकसद बता पाने में कतई सक्षम नहीं नहीं दिख रहा है। 
कायदे से देखा जाये तो सपा और भाजपा के बीच सार्वजनिक तौर पर दोस्ती का रिश्ता कायम होने की उम्मीद तो कतई नहीं की जा सकती है लेकिन पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रमों में जिस तरह से सपा की पहलकदमियों से भाजपा को फायदा मिलता दिख रहा है और भाजपा के सुर व स्वर भी सपा के प्रति बेहद नरम व सहानुभूतिपूर्ण दिख रहे हैं उससे इतना तो स्पष्ट है कि पर्दे के पीछे इन दोनों दलों के बीच कोई ना कोई खिचड़ी अवश्य पक रही है। तभी तो ना सिर्फ यूपी सरकार के कामकाज को लेकर शीर्ष भाजपाई नेताओं की ओर से जुबानी आलोचनाओं व तेवरों की तल्खी का बेहद अभाव दिख रहा है बल्कि औपचारिक तौर पर भी यूपी सरकार के प्रति सहयोगात्मक रूख का प्रदर्शन करने में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है। कानून व्यवस्था की लचर हालत के कारण लड़कियों द्वारा बीच में ही पढ़ाई छोड़े जाने की घटनाओं में वृद्धि को लेकर जब केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री से सवाल किया जाता है तो वे यूपी सरकार के खिलाफ एक शब्द भी बोलने से परहेज बरतते हुए सिर्फ यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि अगर ऐसा कोई मामला उनके संज्ञान में आया तो वे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से लड़कियों को सुरक्षा मुहैया कराने का अनुरोध अवश्य करेंगी। इसी प्रकार जब ऊर्जामंत्री पियूष गोयल से यूपी में बिजली की बदहाल व्यवस्था के बारे में पूछा जाता है तो उनका रटा-रटाया जवाब यही रहता है कि अगर प्रदेश सरकार चाहे तो सूबे के हर गांव-कस्बे को चैबीसों घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। गुहमंत्री राजनाथ सिंह को भी इन दिनों सूबे की कानून-व्यवस्था की स्थिति में कोई खामी नजर नहीं आ रही है। यहां तक कि प्रधानमंत्री खुद भी सपा सुप्रीमो की ओर से संसद में मिले सहयोग का गुणगान करते नहीं थक रहे हैं। इसके अलावा समूची भाजपा को इस बात का काफी मलाल है कि बिहार में जनता परिवार के घटक दलों ने सपा के सम्मान व स्वाभिमान को आहत करने की गुस्ताखी कैसे कर दी। जाहिर है कि भाजपा संगठन व केन्द्र सरकार के रवैये में सपा के प्रति दिख रही यह सहानुभूति बेवजह तो हो नहीं सकती और ऐसा भी नहीं हो सकता है कि सपा भी केन्द्र व बिहार की सियासत में बेवजह ही ऐसी पहलकदमियां करे जिसका सीधा लाभ भाजपा को ही मिलता हुआ दिखे। तभी तो रालोद का आरोप है कि सीबीआई की डर से सपा ने केन्द्र सरकार के सामने समर्पण किया हुआ है जबकि बसपा भी इन दोनों दलों के बीच अंदरूनी सांठगांठ होने का दावा करने से परहेज नहीं बरत रही है। यहां तक कि कांग्रेस भी मुलायम पर मतलबपरस्ती की राजनीति का आरोप लगाने में संकोच नहीं कर रही है जबकि जदयू को भी सपा की सियासी मंशा बेहद संदेहास्पद महसूस हो रही है।    

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

‘हवाबाजी व दगाबाजी बनाम हवालाबाजी की लफ्फाजी’

नवकांत ठाकुर
सियासी रंगमंच पर अक्सर अलग अलग वक्त में कुछ अलग अलग शब्दों का बड़ा शोर रहता है। मसलन लोकसभा चुनाव की सरगर्मियों के दौरान ‘अच्छे दिन’, ‘फेंक’ू और ‘पप्पू’ सरीखे शब्द हर तरफ छाये हुए थे। बाद में ‘चुनावी जुमला’ काफी चर्चा में रहा। अब इन दिनों ‘हवाबाजी’ और ‘दगाबाजी’ का बड़ा शोर है। इसमें एक ओर खड़ी दिख रही है केन्द्र की मोदी सरकार और दूसरी ओर खड़े हैं तमाम गैरभाजपाई दल। दोनों एक-दूसरे पर दनादन गोले दाग रहे हैं हवाबाजी और दगाबाजी के। कांग्रेस हो या सपा-बसपा, लालू हों या नितीश, ममता हों या केजरीवाल, या फिर ओवैसी या वामपंथी ही क्यों ना हों। सभी इस बात पर एकमत हैं कि मोदी सरकार पूरी तरह हवाबाजी पर ही टिकी हुई है। धरातल पर कुछ होता हुआ नहीं दिख रहा। तमाम चुनावी वायदे भुला दिये गये। ‘कहां तो वादा था चिरागां का हर घर के लिये, कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिये।’ ना कालाधन आया ना अच्छे दिन आए। उल्टे राह ऐसी पकड़ ली गयी है कि आम लोगों का जीना मुहाल है। दाल और प्याज भी गरीब को मयस्सर नहीं है। यानि विरोधियों के मुताबिक विकास व सुशासन की हवाबाजी करते हुए मोदी सरकार ने हर मामले में दगाबाजी ही की है। दूसरी ओर सत्तापक्ष की दलील है कि अपनी कमियां, खामियां, गलतियां व नाकामियां छिपाने के लिये विरोधी पक्ष सरकार पर निराधार प्रहार कर रहा है। इनके मुताबिक सियासी लाभ के लिये देश के साथ धोखेबाजी तो इनके विरोधी कर रहे हैं। कांग्रेस जीएसटी और भूमि अधिग्रहण विधेयक सरीखे विकासवादी सुधारात्मक पहलों पर अड़ंगा लगाकर देश को आगे बढ़ने से रोकना चाह रही है। क्षेत्रीय पार्टियां जनता को गुमराह करने के लिये बेमानी बयानों की हवाबाजी कर रही हैं। संसद को चलने नहीं दिया जा रहा। मंत्रियों को बदनाम करने के लिये कुतर्क गढ़े जा रहे हैं। थोक के भाव में शुरू की गयी जनहितकारी योजनाओं की अनदेखी की जा रही है और अपना पुराना पाप छिपाने के लिये सरकार से सौदेबाजी करने का प्रयास किया जा रहा है। यानि सत्ता पक्ष की नजर में दगाबाजी कर रहा है विपक्ष। खैर, दगाबाजी की शिकायत क्षेत्रीय दलों के बीच आपस में भी है। मसलन मुलायम सिंह यादव को शिकायत है कि लालू और नितीश की जोड़ी ने उनके साथ दगाबाजी की है। कहने को उन्हें जनता परिवार का मुखिया बना दिया गया लेकिन ना तो उन्हें समुचित सम्मान मिला और ना ही स्थान। बिहार की चुनावी रणनीति तय करने के क्रम में इनसे पूछा तक नहीं गया। ना ही एक भी सीट इनके लिये छोड़ी गयी। वह तो बाद में जब राकांपा ने महागठजोड़ से किनारा कर लिया तब उसके कोटे की तीन सीटों में लालू ने अपनी दो सीटें जोड़कर सपा को देने की घोषणा की। ऐसे में सपा प्रमुख को लगता है कि उनके साथ सिर्फ दगाबाजी ही नहीं हुई है बल्कि उन्हें सरासर अपमानित किया गया है। खैर, कहने को दगाबाजी व हवाबाजी का इल्जाम भले ही सभी एक दूसरे पर लगा रहे हों लेकिन इससे वास्तव में जमीनी छवि खराब हो रही है सत्तारूढ़ भगवा खेमे की। यानि अव्वल तो उसे किसी काम का श्रेय नहीं दिया जा रहा है, उल्टे उसकी योजनाओं में अड़ंगा डालने की पहल की जा रही है और साथ ही उसे ही दगाबाज भी बताया जा रहा है। हालांकि पहले तो विपक्ष के साथ समझौता करने का प्रयास भी किया गया ताकि कुछ काम आगे बढ़े। मसलन भूमि अधिग्रहण के मसले पर कदम वापस खींचने के पीछे सरकार को उम्मीद थी कि इससे जीएसटी को सदन से पारित कराने की राह आसान हो जाएगी। मगर हुआ इसका उल्टा। भूमि विधेयक पर सरकार के पीछे हटने से उत्साहित कांग्रेस ने अब जीएसटी में भी विरोध का फच्चर फंसा दिया है। नतीजन जीएसटी पारित कराने के लिये ‘होल्ड’ पर रखे गये संसद के मानसून सत्र का आखिरकार सत्रावसान करना ही बेहतर समझा गया। लेकिन इस नाकामी की टीस का ही नतीजा है कि अब प्रधानमंत्री ने हवाबाजी व दगाबाजी के जवाब में हवालेबाजी का जुमला उछाल दिया है। मोदी की मानें तो कालाधन के मामले में सरकार द्वारा बरती जा रही सख्ती के कारण हवालेबाजों में हड़कंप मचा हुआ है जिसके चलते वे हर मामले में सरकार की नीतियों का विरोध करने पर उतारू हो गये हैं। यानि मोदी का इशारा साफ है कि कालेधन के लपेटे में कांग्रेस भी आनेवाली है। लेकिन तथ्य यह भी है कि विदेशों में कालेधन का खाता रखनेवालों की सूची में कांग्रेस के शीर्ष परिवार का नाम शामिल बताकर लालकृष्ण आडवाणी बुरे फंस चुके हैं। बाद में उन्हें माफी भी मांगनी पड़ी थी और सूची में फेरबदल करके गांधी परिवार का नाम भी हटाना पड़ा था। हालांकि एक सच यह भी है कि उन दिनों भाजपा विपक्ष में थी। खैर अब ये उनका काम है कि अपनी कही बात को वे कैसे सत्यापित करेंगे या फिर इसे भी सियासी जुमलेबाजी बताकर कैसे अपनी बात से पीछे हटेंगे। लेकिन इन तमाम मामलों को समग्रता में देखा जाये तो यही समझ में आता है कि पहले हवाबाजी और दगाबाजी के बाद अब हवालेबाजी की इस लफ्फाजी के द्वारा हर कोई अपनी कमियों, खामियों व नाकामियों को ही छिपाने की कोशिश कर रहा है। इसमें जो जितना कामयाब हो जाये उसकी उतनी जय-जय। वर्ना जुमलेबाजी की पोल खुलने के बाद साख का संदिग्ध होना स्वाभाविक ही है। जैसी नजर वैसा नजरिया।  

सोमवार, 7 सितंबर 2015

‘आगाज के आईने में अंजाम की तस्वीर’

नवकांत ठाकुर
कहावत है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। या यूं कहें कि आगाज के वक्त दिखनेवाले लक्षणों से ही अंजाम का पता लग जाता है। तभी तो लंका पर चढ़ाई करने के लिये जब भगवान श्रीराम की सेना ने कूच किया तो उस पल का उल्लेख करते हुए तुलसीदास ने राम चरितमानस में लिखा है कि ‘जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई, अगसुन भगयु रावनहि सोई। यही वजह है कि किसी भी काम का सूत्रपात करते वक्त अपशगुनों को दूर रखने की परंपरा सदियों से हमारे समाज में चली आ रही है। लेकिन मसला है कि तमाम कोशिशों के बावजूद अगर एक भी शुभ लक्षण नहीं दिख रहा हो आखिर किया भी क्या जा सकता है। यही हालत हो गयी है बिहार के चुनाव में गैरभाजपाई महागठजोड़ की। हालांकि चुनाव की औपचारिक घोषणा होनी अभी बाकी है लेकिन तमाम राजनीतिक दलों ने अपनी चुनावी तैयारियों को काफी हद तक अंतिम रूप दे दिया है। ऐसे में अब जबकि चुनावी रणभेरी बजने की महज औपचारिकता ही बाकी है तो ऐसे वक्त में शुभ लक्षणों व अपशगुनों की ओर बरबस ही नजर खिंच जाना लाजिमी ही है। अब भले ही कोई इसे अंधविश्वास कहे लेकिन सच तो यही है धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ के लिये इन दिनों कुछ भी सही होता नहीं दिख रहा है। अव्वल तो ‘प्रथमे ग्रासे मक्षिका पातः’ की तर्ज पर जनता परिवार के सहोदरों का जुटान होने के साथ ही अलगाव की जो प्रक्रिया आरंभ हुई उसकी पूर्णाहुति समाजवादी पार्टी द्वारा निर्णायक तौर पर कर दिये जाने के मामले ने नितीश कुमार की अगुवाई में जारी चुनावी अभियान का उत्साह ही समाप्त कर दिया है। वैसे भी बिछड़े सभी बारी-बारी की तर्ज पर पहले जदयू से जीतनराम मांझी का और राजद से सीमांचल के दिग्गज नेता पप्पू यादव का अलग हो जाना, उसके बाद बेआबरू होकर एनसीपी का नितीश के कूचे से पलायन करना, जदयू से जमीनी नेताओं की भगदड़ शुरू होना, लालू के साथ नितीश की जुबानी जंग छिड़ना और अब आखिरकार सपा का भी जनता परिवार के गठन से मोहभंग होना यह बताने के लिये काफी है कि भाजपा विरोधी खेमे के ग्रह-नक्षत्र की चाल आरंभ से ही किस कदर वक्र दिख रही है। ऐसे में अगर चुनावी रैली में नितीश आपा खो रहे हैं तो यह उसी अपशगुन का नतीजा है जिसे शायद उन्होंने भी भांप लिया है। कहां तो सफर की शुरूआत भानुमति का कुनबा बनाने से हुई थी और अब आलम यह है कि महामोर्चे में गिनती के कुल तीन दल ही बच गये हैं। उसमें भी लालू के साथ कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के भावी तालमेल पर संशय के बादल ही छाये हुए हैं। नितीश ने वैसे भी लालू के साथ निर्धारित दूरी शुरू से ही कायम रखी हुई है। लेकिन मजबूरी तीनों की है कि अपने दम को तौलने का हौसला भी नहीं जुटा सकते। नितीश ने जब भी अपने दम पर चुनाव लड़ा तो उन्हें हमेशा मुंह की ही खानी पड़ी। लालू के ग्रहों की चाल लंबे समय से वक्री ही है। यहां तक कि अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद वे वैसे भी ग्यारह साल तक कोई चुनाव लड़ने के काबिल नहीं बचे हैं। ऐसे में अपने संगठन को जिंदा रखने के लिये जहर के हर घूंट को स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प ही नहीं है। रहा सवाल कांग्रेस का तो उसे भी अपनी ताकत का पूरा इल्म है वर्ना देश की सबसे बड़ी पार्टी की अध्यक्षा होने के बावजूद गांधी मैदान की रैली में सोनिया गांधी को लालू व नितीश के मुकाबले चैथे पायदान पर खड़े होने के विकल्प को सहर्ष स्वीकार नहीं करना पड़ता। खैर, कहने को कोई कुछ भी कहे लेकिन हकीकत यही है कि बिहार में धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ की नींव मजबूरी में ही पड़ी है। लेकिन मजबूरी में एकजुट होकर मजबूती की आस लगाने की नौबत सपा की तो कतई नहीं है। उसे वैसे भी पता है कि बिहार में उसकी जमीनी हैसियत वैसी ही है जैसी यूपी में नितीश की जदयू या लालू के राजद की। तभी तो आज जब रामगोपाल यादव ने गठजोड़ में पूछ नहीं होने व एहसान के तौर पर महज पांच सीटें मिलने की पीड़ा को वजह बताकर नितीश के खेमे से अलग होने का ऐलान किया तो उनके द्वारा बतायी गयी यह वजह किसी को हजम नहीं हुई। इस मामले में विरोधियों का वह ताना ही काफी हद तक सही लग रहा है कि डूबते जहाज में सफर करने के बजाय सपा ने अपने बाहुबल से तैर कर दरिया पार करने की राह पकड़ना ही बेहतर समझा है। वैसे भी जनता परिवार की पहली अग्निपरीक्षा में ही परास्त होने का जोखिम उठाने का नतीजा यूपी में कार्यकर्ताओं पर नकारात्मक असर डाल सकता था। लिहाजा सपा की मौजूदा पहलकदमी तो जायज भी है और स्वाभाविक भी। लेकिन नितीश के महामोर्चे में अपशगुन का सिलसिला थम ही नहीं रहा। परसों अनंत सिंह ने जदयू से पल्ला झाड़ा तो कल रघुनाथ झा राजद से अलग हो गये। जहाज से कूदने की कतार में अभी और भी हैं जो सिर्फ उचित मौके की तलाश में हैं। खैर, जंग के मैदान में उतरने के बाद शगुन-अपशगुन की परवाह नहीं करना ही बेहतर है लेकिन आवश्यक है कि इन संकेतों को समझकर अपनी रणनीतियां दुरूस्त कर ली जाए। वर्ना आगाज के संकेतों ने अंजाम की झलक दिखा ही दी है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   

बुधवार, 2 सितंबर 2015

‘डीएनए’ की तकरार को धार देने में जुटी भाजपा

नितीश को सूबे के स्वाभिमान का प्रतीक नहीं बनने देगी भाजपा

नवकांत ठाकुर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों एक चुनावी रैली में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार के ‘डीएनए’ पर सवाल उठाकर जिस सियासी तार को छेड़ दिया था उसी का नतीजा है कि गैरभाजपाइ खेमे ने इस मसले को बिहारी अस्मिता व स्वाभिमान से जोड़कर इसे बड़े चुनावी मुद्दे की शक्ल देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जाहिर है कि इस भावनात्मक मसले को तूफान बनता हुआ देखकर भाजपानीत एनडीए की परेशानी बढ़ना स्वाभाविक ही था लिहाजा अब तक समूचे भगवा खेमे ने इस मामले में अपनी ओर से चुप्पी साधे रखना ही बेहतर समझा था। लेकिन आज मोदी की भागलपुर में हुई रैली के साथ ही पहले चरण का चुनाव प्रचार अभियान समाप्त हो जाने के बाद इस पूरे अभियान की समीक्षा के लिये आयोजित हुई भाजपा के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की बैठक में तय किया गया है कि अगर विरोधियों ने डीएनए के मसले पर बहस की चुनौती पेश कर दी है तो इस पर पीछे हटने की कोशिश हर्गिज ना की जाये। यही वजह है कि अब भाजपा ने भी नये सिरे से डीएनए के विवाद को पुरजोर तरीके से तूल देने की शुरूआत कर दी है और पार्टी की कोशिश है कि इस मामले को आधार बनाकर खुद को सूबे के स्वाभिमान के प्रतीक के तौर पर स्थापित करने की नितीश की कोशिशों को हर्गिज कामयाब नहीं होने दिया जाये। साथ ही आज की बैठक में यह भी तय हुआ है कि पार्टी के सीधे निशाने पर नितीश को ही रखा जाये और उनके सियासी चरित्र को कठघरे में खड़ा करते हुए मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश की जाये कि नितीश वाकई धोखेबाजी के प्रतीक हैं और उनके इस राजनीतिक पहलू पर प्रहार करते हुए ही प्रधानमंत्री ने उनके डीएनए की शुचिता पर संदेह प्रकट किया था। 
राजधानी स्थित भाजपा मुख्यालय में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के अलावा केन्द्रीय मंत्रियों जेपी नड्डा व पियुष गोयल की मौजूदगी में पूरे दिन चली पार्टी के तमाम राष्ट्रीय पदाधिकारियों व प्रवक्ताओं की बैठक में मुख्य रूप से बिहार चुनाव के मसले पर ही चिंतन किया गया और पहले चरण के प्रचार अभियान की समीक्षा करने के साथ ही अगले हफ्ते से आरंभ होनेवाले दूसरे चरण के प्रचार अभियान की रूपरेखा को अंतिम रूप भी दिया गया। प्राप्त जानकारी के मुताबिक अब तक के प्रचार अभियान में जिस तरह से नितीश द्वारा राजद व कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने की पहल की गयी उस पर ही निशाना साधने की रणनीति में तब्दीली लाते हुए अब नितीश पर ही सीधा हमला करने का फैसला किया गया है। दरअसल लालू को जंगलराज का प्रतीक व कांग्रेस को भ्रष्टाचार की गंगोत्री के तौर पर प्रचारित करते हुए भाजपा अब तक मतदाताओं को यही बता रही थी इन दोनों के साथ रहकर नितीश बिहार में हर्गिज सुशासन स्थापित नहीं कर पाएंगे। जाहिर है कि इस तरह के प्रचार में सीधा निशाना लालू व कांग्रेस की ओर था जबकि नितीश के प्रति कोई ऐसी बड़ी बात सत्यापित नहीं हो पा रही थी जिससे जनता उन्हें सिरे से खारिज करने के लिये मजबूर हो जाये। इसी तकनीकी मसले पर विवेचना करने के बाद अब भाजपा ने सीधा नितीश को ही घेरने के लिये उसी डीएनए के मसले को हथियार बनाने का फैसला किया है जिसे भावनात्मक शक्ल देकर नितीश ने बिहार के स्वाभिमान के साथ जोड़ने की कोशिश की है। यही वजह है कि बैठक के बाद भाजपा के राष्ट्रीय सचिव श्रीकांत शर्मा ने नितीश पर सीधा हमला करते हुए उनके डीएनए में ही धोखेबाजी शामिल होने का आरोप लगाया है। श्रीकांत के मुताबिक नितीश का पूरा सियासी इतिहास ही धोखेबाजी से भरा हुआ है जिसके प्रति बिहार के लोगों को पूरी तरह जागरूक व सावधान करने में भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ेगी। श्रीकांत के मुताबिक पहले चरण के चुनाव प्रचार में मिली कामयाबियों से भाजपा पूरी तरह संतुष्ट है और अब अगले चरण में सूबे की सभी नौ कमिश्नरियों में जोरदार प्रचार अभियान चलाया जाएगा जिसकी कार्ययोजना को काफी हद तक अंतिम रूप दे दिया गया है।    

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

राजग में ‘हम किसी से कम नहीं’ की रार 

आज भी नहीं सुलझ सकी बिहार में सीट बंटवारे की गुत्थी

नवकांत ठाकुर

बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सीटों के बंटवारे को लेकर भाजपानीत राजग में जारी खींचतान का मसला लगातार उलझता दिख रहा है। जहां एक ओर भाजपा ने सूबे की कुल 243 सीटों में से कम से कम 180 सीटों पर अपनी दावेदारी बदस्तूर बरकरार रखी हुई है वहीं दूसरी ओर राजग के बाकी घटक दलों ने भी लगातार ‘हम किसी से कम नहीं’ का राग आलापना जारी रखा हुआ है। हालांकि इस विवाद का हल तलाशने की अनौपचारिक कोशिशों के तहत अपने सहयोगी दलों के साथ भाजपा की बातचीत काफी लंबे समय से जारी है लेकिन आज पहली दफा गठबंधन के सभी शीर्ष नेताओं की दिल्ली में हुई औपचारिक बैठक में भी इस मसले पर कोई आम राय नहीं बन सकी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के निवास पर आज दोपहर के भोजन पर हुई बैठक के बारे में जानकारी देते हुए लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने स्वीकार किया है कि सीट बंटवारे को लेकर राजग के घटक दलों की बातचीत में भले ही कोई आम सहमति नहीं बन पायी हो लेकिन सभी दल इस बात पर पूरी तरह एकमत हैं कि अव्वल तो इस बार के चुनाव में पूरा गठजोड़ एक टीम के तौर पर एकजुट होकर मैदान में उतरेगा और दूसरे सीटों के बंटवारे के मसले पर जल्दी ही आम सहमति कायम कर ली जाएगी। पासवान ने उम्मीद जतायी है कि सीटों के बंटवारे को लेकर राजग के घटक दलों की इसी सप्ताह दोबारा बैठक आयोजित की जाएगी जिसमें आम सहमति से इस मामले को पूरी तरह सुलझा लिया जाएगा। 
आज की बैठक के लब्बोलुआब पर नजर डालें तो तकरीबन साढ़े तीन घंटे की मगजमारी के बाद एक बात तो तय कर ली गयी है कि अब चुनाव से पहले सूबे में राजग का विस्तार नहीं किया जाएगा। सूत्रों की मानें तो भाजपा की इच्छा थी कि सीमांचल के इलाके में यादव वोटबैंक में सेंध लगाने के लिये राजग के बागी सांसद पप्पू यादव के साथ अंदरूनी तौर पर सांठगांठ कर ली जाये लेकिन आज की बैठक में पार्टी अपने सहयोगी दलों को इस रणनीति पर अमल करने के लिये सहमत नहीं कर सकी। रामविलास पासवान की लोजपा से लेकर उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा व जीतनराम मांझी की हम ने भी साफ शब्दों में भाजपा को बता दिया कि बिहार में राजग के चारों घटक दल ही आपस में तालमेल करके चुनाव लड़ें और इसके अलावा किसी भी अन्य दल या गठजोड़ के साथ कोई रिश्ता ना बनाया जाए। सहयोगियों की इस समवेत मांग को भाजपा ने भी स्वीकार कर लिया है लिहाजा अब यह तो साफ हो गया है कि बिहार में राजग की छतरी के नीचे इस दफा कुल चार पार्टियां ही दिखाई देंगी। लेकिन जिस मसले को लेकर आज की बैठक आयोजित की गयी थी उस पर कोई आम सहमति नहीं बन पाने के कारण इस बैठक को बेनतीजा करार देना ही बेहतर होगा। सूत्रों की मानें तो सीट बंटवारे को लेकर तमाम सहयोगी दल भाजपा पर इस बात का दबाव बनाने में जुटे हुए हैं कि जिस तरह पिछले विधानसभा चुनाव में उसने कुल 102 सीटों पर चुनाव लड़ा था और बाकी 141 सीटें अपनी तत्कालीन सहयोगी जदयू के लिये छोड़ दी थी उसी फार्मूले का इस बार भी अनुसरण किया जाये। जबकि भाजपा की कोशिश है कि इस बार वह कम से कम प्रदेश की 180 सीटों पर चुनाव लड़े ताकि अपने दम पर बहुमत का जुगाड़ किया जा सके। सूत्रों की मानें तो आज की बैठक में सहयोगियों की मांग पर भी विस्तार से बातचीत हुई और भाजपा की जिद पर भी। लेकिन कोई भी पक्ष आज कतई अपनी मांग से पीछे हटने के लिये सहमत नहीं हुआ जिसके कारण आम सहमति की कोई राह नहीं निकल सकी। हालांकि सूत्र बताते हैं कि ‘प्लान बी’ के तहत अगली बैठक के लिये भाजपा ने एक फार्मूला यह भी बनाया हुआ है कि वह खुद 160 सीटों पर चुनाव लड़े जबकि लोजपा को 40, रालोसपा को 25 और हम को 18 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिये सहमत किया जाये। लेकिन अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा के इस फार्मूले पर उसके बाकी सहयोगी दल सहमत होना गवारा करते हैं या फिर उसे किसी अन्य ‘प्लान सी’ के तहत कुछ और झुकने के लिये मजबूर होना पड़ता है। 


सोमवार, 31 अगस्त 2015

‘आर-पार की जंग में तिकड़मियों का हुड़दंग’

नवकांत ठाकुर
बिहार में इस बार कुर्सी की असली लड़ाई तो भाजपानीत राजग और धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ के बीच ही होनी है। दोनों पक्ष चाह भी यही रहे थे कि लड़ाई-आर पार की ही हो। तभी तो जहां एक ओर नितीश कुमार की अगुवायी में धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ की नींव डाली गयी वहीं भाजपा ने भी तमाम नितीश विरोधियों को अपने साथ जोड़ने में कोई कोताही नहीं बरती। लिहाजा तस्वीर ऐसी बन गयी जिसमें दोनों पक्ष ने सबके लिये अपने दरवाजे पूरी तरह खुले रखे थे जिस पर बकायदा इस आशय का बोर्ड भी टंगा हुआ था कि जिस किसी को भी विरोधी गठजोड़ के साथ जुड़ने में असहजता महसूस हो रही हो वह उनके खेमे में शामिल हो सकता है। इस खुले निमंत्रण का ही नतीजा था कि बिहार का पूरा चुनावी परिदृश्य आर-पार की लड़ाई का बन गया और किसी तीसरे तत्व की इसमें कोई प्रासंगिकता ही नहीं बची। हालांकि इस रणनीति के पीछे नितीश की सोच थी कि अव्वल तो सूबे के 16 फीसदी अल्पसंख्यक मतदताओं का एकजुट समर्थन उन्हें हासिल हो जाएगा और लगे हाथों लालू के 18 फीसदी यादव मतदताओं के आलावा उनकी अपनी जाति के दो फीसदी मतदाताओं का समर्थन भी उसमें जुड़ जाएगा। साथ ही कांग्रेस को साथ लेने से अगड़ी जातियों के बड़े वर्ग का समर्थन मिल जाएगा जिससे जीत सुनिश्चित हो जाएगी। दूसरी ओर भाजपा ने इसे आमने-सामने की लड़ाई बनाने की पहल यह सोच कर की थी कि सूबे के 16 फसदी सवर्णों के परंपरागत समर्थन के साथ अगर रामविलास पासवान व जीतनराम मांझी की पकड़वाले 24 फीसदी महादलित भी उसके साथ आकर जुड़ जाएंगे तो सूबे में अपनी जीत सुनिश्चित करने में उसे कोई परेशानी नहीं होगी। यानि हालिया दिनों तक दोनों ही पक्ष को आर-पार की लड़ाई में ही अपनी जीत सुनिश्चित नजर आ रही थी। लेकिन कहते हैं कि अगर इंसान की बनायी हुई योजना ही पूरी तरह साकार होने लग जाये तो कोई भगवान को मानेगा ही क्यों? खास तौर से सियासत तो वैसे भी भारी अनिश्चितता का खेल माना जाता है जिसमें अगले ही पल क्या घटित हो जाये इसके बारे में दावे से कोई कुछ नहीं कह सकता। तभी तो दोनों पक्ष की उम्मीदों के उलट सूबे के मौजूदा चुनावी माहौल की तस्वीर ऐसी बन गयी है जिसमें उन छोटे-मोटे दलों ने इनकी तमाम योजनाओं व चाहतों में पलीता लगाने की कोशिशें तेज कर दी हैं जिनका वैसे तो कोई खास राजनीतिक महत्व नहीं है लेकिन अलग-अलग सीटों पर अपनी छिटपुट पकड़ के दम पर ये किसी का भी खेल बिगाड़ने की कूवत अवश्य रखते हैं। चुंकि प्रदेश में सत्ता की दावेदारी कर रहे दोनों बड़े गठबंधनों की मजबूरियों को इन्होंने बेहतर भांप लिया है लिहाजा अब ये इस मौके का भरपूर फायदा उठाने के मकसद से ऐसा तिकड़मी हुड़दंग मचाने में जुट गये हैं जिससे सूबे का पूरा सियासी समीकरण बुरी तरह डगमगाता दिखने लगा है। हालांकि इन तीसरे तत्वों की हुड़दंग ने फिलहाल तो धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ की ही जान आफत में डाली हुई है जिसकी जीत की पूरी पटकथा इसी धुरी पर टिकी हुई थी कि ना तो सूबे के अल्पसंख्यक मतों में कोई सेंध लगेगी और ना ही यादव वोटबैंक को लालू से तोड़ पाना संभव हो सकता है। इस समीकरण में पहली सेंध तो राजद से अलग होकर अपना स्वतंत्र सियासी अस्तित्व तलाशने में जुटे सीमांचल केे कद्दावर सांसद पप्पू यादव ने ही लगा दी है जिनके आपराधिक इतिहास को याद करके भाजपा ने औपचारिक तौर पर इनसे दूरी बनाये रखना ही बेहतर समझा है। हालांकि अंदरूनी तौर पर लालू के यादव वोटबैंक में तोड़फोड़ करने के मकसद से पप्पू के पीछे भाजपा का वरदहस्त भी स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है लेकिन यह वैसी ही दोस्ती है जैसी अल्पसंख्यक वोटों को यथासंभव छिन्न-भिन्न करने के लिये असदुद्दीन ओबैसी की एमआईएम से भाजपा की सांठगांठ बतायी जा रही है। रही सही कसर राकांपा ने पूरी कर दी है जिसने महज तीन सीटें मिलने से नाराज होकर धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ से अलग होकर चुनाव लड़ने का मन बना लिया है। साथ ही जिस सपा के साथ जदयू व राजद विलय करने के लिये तैयार थे उसे एक भी सीट नहीं दिये जाने के नतीजे में यादव वोटबैंक में सेंध लगाने के लिये अब सपा भी कुछ सीटों पर दमदार प्रत्याशी खड़ा करने की पहल कर रही है। खैर, सतही तौर पर ये सिरदर्दियां तो धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ की हैं जिसकी काट के तौर पर भाजपा के परंपरागत वोटबैंक में सेंध लगाने के लिये नितीश के पक्ष में अपना समर्थन व्यक्त करने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी पहुंच गये हैं जिनकी तमाम एनजीओ के बीच लोकप्रियता व स्वीकार्यता सर्वविदित ही है। लगे हाथ गुजरात में पटेल आरक्षण का आंदोलन छेड़नेवाले हार्दिक पटेल ने भी नितीश को ‘अपना’ बताकर मोदी विरोधियों को एकजुट होने का संदेश दे दिया है जिसे भुनाने में नितीश शिद्दत से जुट गये हैं। हालांकि यह सूरतेहाल तो तब है जब धर्मनिरपेक्ष महागठजोड़ ने आपस में सीटों का बंटवारा करके अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। लेकिन अब अगर भगवाखेमे को समुचित, संतुलित व सर्वमान्य तरीके से सीटों का बंटवारा करने में कामयाबी नहीं मिली तो इसके घटक दलों की महत्वाकांक्षाओं का विस्फोट ऐसे तिकड़मी हुड़दंगियों की तादाद में इजाफा ही करेगा जो अपने दम पर रोटी सेंकने में भले सक्षम ना हों लेकिन दूसरे की पकी पकाई खिचड़ी में मिट्टी डालना बखूबी जानते हैं। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

भाजपा नेतृत्व के निशाने पर आए शत्रुघ्न 

बिहार चुनाव के बाद होगी अनुशासनात्मक कार्रवाई

नवकांत ठाकुर

संगठन व सरकार में सम्मानजनक स्थान नहीं मिलने की टीस का मुजाहिरा करते हुए शत्रुघ्न सिन्हा ने इन दिनों अपने बागी तेवरों व विवादास्पद बयानों से भाजपा के लिये जिस कदर असहज स्थिति उत्पन्न की हुई है इसके नतीजे में वे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सीधे निशाने पर आ गये हैं। हालांकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर फिलहाल उनके मामले में संयम बरतना ही बेहतर समझा है लिहाजा उनके किसी भी बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जा रही है। लेकिन पार्टी नेत्त्व ने साफ कर दिया है कि उनकी मौजूदा हरकतों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है और चुनाव समाप्त होने के फौरन बाद इन तमाम मसलों को लेकर उनके खिलाफ ठोस व कड़ी कार्रवाई करने में कतई कोताही नहीं बरती जाएगी। 
वास्तव में देखा जाये तो केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के कुछ ही अर्से के बाद से शत्रुघ्न ने अपने बागी तेवरों का मुजाहिरा करना आरंभ कर दिया था। इसी सिलसिले में उन्होंने पार्टी के हर उस नेता की तरफदारी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जिसने पार्टी लाईन के बाहर जाकर बयानबाजी की हो। मामला चाहे पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को संगठन व सरकार से अलग करके मार्गदर्शक बना दिये जाने का हो या फिर दरभंगा के सांसद कीर्ति आजाद द्वारा ललित मोदी विवाद में सुषमा स्वराज का नाम सामने आने के लिये पार्टी की आस्तीन में छिपे सांपों की ओर इशारा किये जाने का। हर मामले में शत्रुघ्न ने सार्वजनिक तौर पर पार्टी नेतृत्व के फैसलों के खिलाफ ही अपना विचार व्यक्त किया। यहां तक कि बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सरीखे भाजपा के धुर विरोधियों का भी दिल खोलकर गुणगान करने में उन्होंने कभी कोताही नहीं बरती। एक ओर भाजपा ने बिहार में लगातार नितीश के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है जबकि शत्रुघ्न सार्वजनिक तौर पर नितीश की तारीफ में कसीदे काढ़ते नहीं थक रहे हैं। भाजपा के किसी जमीनी कार्यक्रम में शिरकत करना भले ही वे जरूरी ना समझते हों लेकिन नितीश के हर बुलावे पर दौड़ते हुए चले जाना उनकी आदत में शुमार हो गया है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नितीश को विश्वासघाती डीएनए वाला नेता बताये जाने का पुरजोर विरोध करने में भी शत्रुघ्न ने कोई कसर नहीं छोड़ी। बताया जाता है कि शत्रुघ्न के इस मित्रवत व्यवहार से अभिभूत होकर उनके पिता के नाम पर पटना के एक अस्पताल का नामकरण करने के बाद अब नितीश ने आगामी चुनाव में उनकी पत्नी को अपनी पार्टी से टिकट देने का भी फैसला कर लिया है। जाहिर तौर पर शत्रुघ्न की इन तमाम हरकतों व नितीश के साथ जारी उनकी सियासी जुगलबंदी से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का नाराज होना स्वाभाविक ही है। लेकिन अब सीधे तौर पर पार्टी लाईन से बाहर जाते हुए उन्होंने जिस तरह से बिहार में चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी का नाम घोषित किये जाने की मांग करते हुए लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान को राजग की ओर से मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाये जाने का विचार व्यक्त कर दिया है उससे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सब्र की इंतहा हो गयी है। यही वजह है कि भाजपा के एक शीर्ष रणनीतिकार ने नाम नहीं छापे जाने की शर्त पर बेलाग लहजे में यह बताने में कोई कोताही नहीं बरती है कि पार्टी ने बिहार चुनाव से फारिग होने के फौरन बाद पहली फुर्सत में शत्रुघ्न को सबक सिखाने का पक्का मन बना लिया है। उन्होंने बताया कि इस समय शत्रुघ्न के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने का बिहार के चुनाव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका के मद्देनजर फिलहाल उनके बयानों व हरकतों की अनदेखी करने का ही फैसला किया गया है और उनकी किसी भी बात का किसी भी स्तर से कोई भी जवाब नहीं देने की रणनीति अपनायी गयी है। लेकिन चुनाव सम्पन्न होने के बाद उन्हें अपनी हर हरकत का समुचित जवाब व हिसाब देना ही होगा।  

सोमवार, 24 अगस्त 2015

               

‘नतीजा न निकला है, न निकालने की मंशा है!’

नवकांत ठाकुर

हरिवंश राय बच्चन लिखते हैं कि ‘इश्वर है-नहीं है, पर बहस है, नतीजा न निकला है, न निकालने की मंशा है, कम क्या बतरस है!’ वाकई कुछ मसलों का हल आज तक ना तो निकल सका है और ना निकालने की मंशा दिखाई गयी है। अलबत्ता बहस अवश्य चलती रहती है जिसमें बतरस से आगे बढ़कर बहस को निर्णायक मोड़ पर लाने की मंशा किसी की नहीं होती। वैसे भी अगर सभी अपनी सोच पर ही अड़े रहें, एक दूसरे की बात सुनना व समझना भी गवारा ना करें, परस्पर एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से जाने ना दें और अपनी सोच को ही सर्वोपरि मानते रहें तो किसी भी बहस या चर्चा का कोई सार्थक व सर्वसम्मत नतीजा निकलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। यही स्थिति भारत व पाकिस्तान के मामले में भी देखी जा रही है जिसमें दशकों से जारी मतभेद, खुंदक व रंजिश का हल तलाशने की कोशिशें तो लगातार होती रही हैं। लेकिन सवाल है इन कोशिशों के पीछे की इमानदारी का। हकीकत तो यही है कि दशकों से उलझे हुए आपसी रिश्ते के धागों को सुलझाने के लिये आवश्यक गंभीरता, शिद्दत व इमानदारी का आज भी काफी हद तक अभाव ही दिख रहा है। खास तौर से दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की वार्ता को लेकर इस दफा जमीनी स्तर पर जो भारी तमाशे का माहौल बना उसके पीछे पाकिस्तान की नापाक खुराफातें व चालबाजियां तो जिम्मेवार रही ही हैं, लेकिन कुछ हद तक हमारे हुक्मरानों की भी नीतियां व पहलकदमियां ऐसी रही जिससे अगर परहेज बरता जाता तो वार्ता की सफलता, सार्थकता व परिणामदायकता पर हर्गिज सवालिया निशान नहीं लगता। मसलन अगर पाकिस्तान ने परंपरागत तौर पर कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को इस बैठक से पूर्व विचार विमर्श के लिये बुला ही लिया तो इस पर हाय-तौबा मचाने के बजाय खामोशी के साथ वही रणनीति अपनायी जा सकती थी जिसका मुजाहिरा अंतिम समय में शब्बीर शाह को दिल्ली में दाखिल होते ही हिरासत में लेकर किया गया। वैसे भी सरहद पर जारी गोलाबारी का करारा जवाब तो हमारी ओर से दिया ही जा रहा है। साथ ही सरहद पार कर हमारी शांति भंग करने के प्रयासों को भी परवान नहीं चढ़ने दिया जा रहा है। विश्व बिरादरी के सामने भी पाकिस्तान को बेनकाब करने में हम पहले ही कामयाब हो चुके हैं और इस्लामिक देशों से लेकर अमेरिका सरीखे उसके तमाम हिमायतियों, संरक्षकों व दानदाताओं को एक-एक उससे लगातार दूर किया ही जा रहा है। ऐसे में पाकिस्तान की हर खुराफाती तिकड़म को नाकाम करते हुए हर स्तर पर उसे उसकी ही भाषा में ठोस, करारा व माकूल जवाब देकर जब उसकी खीझ, कसमसाहट व तिलमिलाहट का पूरे गरिमापूर्ण तरीके से भरपूर मजा लिया जा सकता था तो फिर बेवजह हाय तौबा मचाकर जमीनी स्तर पर भारी तूफान का सुत्रपात करने की जरूरत ही क्या थी। वह भी तब जब इस बैठक को अपनी ओर से निरस्त या स्थगित नहीं करने का सैद्धांतिक फैसला पहले ही लिया जा चुका था और गुरदासपुर में हुए आतंकी हमले में शामिल पाकिस्तानी हमलावर नवेद को जिंदा पकड़ने में कामयाबी हासिल हो चुकी है। ऐसे में तो पाकिस्तान द्वारा औपचारिक तौर पर ठोस गलती किये जाने का इंतजार करना ही सबसे बेहतर विकल्प हो सकता था। वैसे भी जब हम अलगाववादियों को पाकिस्तानी एनएसए से मुलाकात करने से रोकने में पूरी तरह सझम हैं तो फिर बेवहज पाकिस्तान को इस बावत औपचारिक ‘एडवायजरी’ भेजने और विदेश सचिव को आगे करके उसे चिढ़ाने-खिझाने व आईना दिखाए जाने की जरूरत ही क्या थी। यहां तक कि जब पूरे विवादों, अटकलों व कयासों को खारिज करते हुए पाकिस्तानी एनएसए ने सार्वजनिक तौर पर दोपहर के वक्त ही यह बता दिया कि वे ऊफा वार्ता में तय किये गये दायरे का अनुपालन करते हुए बिना किसी पूर्व शर्त के वार्ता करने के लिये तैयार हैं तो फिर शाम के वक्त हमारी विदेशमंत्री को ऐसी प्रेसवार्ता करने की जरूरत ही क्यों पड़ी जिसके नतीजे में पाकिस्तान को वार्ता से पीछे हटने का बहाना मिल गया। यानि जाहिर तौर पर भारत की ओर से इस वार्ता के मामले जो कूटनीतिक राह अख्तियार की गयी उसका मकसद तो यही समझा जा सकता है कि विश्व स्तर पर पाकिस्तान को बदनाम किया जाये और भारी तनाव के कारण वार्ता नहीं हो पाने का ठीकरा भी उसके सिर ही फोड़ दिया जाये। लेकिन सवाल है कि ऐसी मंशा के साथ बनाये गये दबाव के नतीजे में अगर पाकिस्तान को ऊफा वार्ता में तय किये गये दायरे में रहते हुए बिना शर्त बातचीत की टेबल पर आने के किये मजबूर भी कर दिया जाता तो इस बैठक से कोई सार्थक नतीजा सामने आने की क्या उम्मीद की जा सकती थी। वैसे भी यह तो पाकिस्तान को पहले से ही पता था कि यह वार्ता सिर्फ आतंकवाद पर चर्चा करने के लिये ही आयोजित की जा रही है। तभी तो पाकिस्तानी एनएसए ने यह स्वीकार करने से परहेज नहीं बरता कि इस बार के दिल्ली दौरे में वे भारतीय हुक्मरानों से यह जानकारी भी लेना चाहेंगे कि कश्मीर के मसले को सुलझाने के लिये किस स्तर का मैकेनिज्म बनाने की उनकी चाहत है। बहरहाल इन पूरे घटनाक्रमों को समग्रता में देखा जाये तो ‘शठे शठ्यम समाचरेत’ की मौजूदा रणनीति में थोड़ी तब्दीली लाते हुए अगर भविष्य में उद्दंड बालक के साथ सख्त व सकारात्मक शिक्षक सरीखा बर्ताव किया जाये तो ना सिर्फ यह भारत की गरिमा, प्रतिष्ठा व परंपरा के अनुरूप होगा बल्कि इसका परिणाम भी सुखद व सार्थक ही रहेगा। 

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

अपनी ओर से बातचीत का दरवाजा बंद नहीं करेगा भारत 

पाकिस्तान के मसले पर किसी भी दबाव के सामने नहीं झुकेगी सरकार

नवकांत ठाकुर

पाकिस्तान के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत से पहले भले ही पड़ोसी देश ने उकसावे की कूटनीति पर अमल करते हुए जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को नई दिल्ली स्थित अपने दूतावास में बातचीत के लिये आमंत्रित किया हो लेकिन इस मसले पर मच रहे चैतरफा हंगामे के बावजूद भारत सरकार ने इस मामले को अधिक तवज्जो देना मुनासिब नहीं समझा है। केन्द्र सरकार की ओर से साफ लहजे में यह संकेत दे दिया गया है कि ऊफा में हुई दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की बैठक में हुए समझौते के तहत दिल्ली में आयोजित हो रही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की इस बैठक को निरस्त या स्थगित करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि पाकिस्तान की ओर से भारत के खिलाफ जो भी शरारती व खुराफाती हरकतें की जा रही है उसका सटीक व करार जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। साथ ही सरकार की ओर से यह जताने में भी कोई कोताही नहीं बरती गयी है कि पाकिस्तान द्वारा अलगावावादियों के साथ गलबहियां किये जाने, सरहद पर संघर्ष विराम का उल्लंघन करके अशांति का माहौल बनाये जाने, सीमापार से आतंकियों की खेप भेजे जाने, सुरक्षा परिषद में कश्मीर के मसले को नये सिरे से उठाने का प्रयास किये जाने और पेशावर में हुए आतंकी हमले का दोष भारत के सिर मढ़ने की कोशिश किये जाने सरीखे मामलों को लेकर विपक्ष से लेकर सत्तापक्ष के भी कई शीर्ष नेताओं द्वारा फिलहाल बातचीत का दरवाजा बंद किये जाने का जो दबाव बनाने की कोशिश हो रही उसे अधिक तवज्जो देना कतई उचित नहीं होगा। 
वास्तव में देखा जाये तो पिछले दिनों गुरदासपुर में हुए आतंकी हमले में जिंदा पकड़े गये आतंकी नावेद के मामले ने पाकिस्तान को इस कदर बैकफुट पर ला दिया है कि फिलहाल वह भारत के साथ नजरें मिलाकर द्विपक्षीय बातचीत करने से बचने की कोशिशों में जुट गया है। इन्हीं कोशिशों के तहत उसने भारत को उकसाने की हरसंभव हरकतें शुरू कर दी हैं ताकि एक ओर उसे फिलहाल इस मामले की सफाई देने से बचने का अवसर मिल जाये और दूसरी ओर विश्व बिरादरी के सामने यह प्रचारित करने का भी मौका मिल जाये कि भारत ही बातचीत के माध्यम से विवादों का हल निकालने का इच्छुक नहीं है। लेकिन पाकिस्तान की इस नापाक नीयत को भारत भी अच्छी तरह समझ रहा है लिहाजा अपनी ओर से वार्ता पर विराम लगाने की पहल करने से परहेज बरतने की नीति अपनायी जा रही है। हालांकि पिछले साल भी इस्लामाबाद में होनेवाली विदेश सचिव स्तर की बातचीत से पूर्व पाकिस्तान ने ऐसी ही खुराफात को अंजाम देते हुए अपने दिल्ली दूतावास में जम्मू कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को आमंत्रित कर लिया था जिस पर मचे बवाल के बाद भारत सरकार को वार्ता को स्थगित करने का फैसला करना पड़ा था। लेकिन इस बार उस कूटनीतिक गलती को दुहराने के लिये सरकार कतई तैयार नहीं है। यही वजह है कि विदेश मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों से लेकर केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने भी बेलाग लहजे में यह जता दिया है राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की वार्ता पर विराम लगाना कतई उचित नहीं होगा। हालांकि पाकिस्तान की ताजा हरकतों का उल्लेख करते हुए विपक्षी दलों से लेकर पूर्व भाजपाई विदेशमंत्री यशवंत सिन्हा ने ही नहीं बल्कि शिवसेना सरीखे सरकार के घटक दलों व विहिप सरीखे भाजपा के सहोदर संगठनों ने भी आगामी 23-24 तारीख को नई दिल्ली में होनेवाली इस बातचीत को स्थगित किये जाने का भारी दबाव बनाया हुआ है। लेकिन सरकार का मानना है कि पिछले दिनों आतंकी नावेद को जिंदा पकड़ने में हासिल हुई कामयाबी के बाद इस समय कूटनीतिक स्तर पर भारत का पलड़ा काफी भारी हो गया है जिससे पाकिस्तान को शर्मसार करने व उसे सीधे रास्ते पर आने के लिये बाध्य करने का भारत को सुनहरा मौका मिल गया है। लिहाजा ऐसे समय में अपनी ओर से बातचीत का दरवाजा बंद करने के विकल्प पर विचार करना भी कतई सही नहीं होगा।  




बुधवार, 19 अगस्त 2015

‘नाव पर गाड़ी है या गाड़ी पर नाव......?’

नवकांत ठाकुर
इन दिनों यह पता करना बेहद मुश्किल हो गया है कि मीडिया का अनुसरण नेता कर रहे हैं या नेताओं का अनुसरण मीडिया। नाव पर गाड़ी है या गाड़ी पर नाव। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जब उनके गठबंधन के सहयोगी लालू यादव से जुड़े सवाल पर प्रतिक्रिया मांगी जाती है तो वे पूरे मामले से ही अनभिज्ञता जाहिर करते हुए बेहद भोलेपन के साथ यह दलील देते हैं कि जब तक मीडिया नहीं बताएगा तब तक वे किसी भी मामले के बारे में कैसे जान सकते हैं। यानि सुशासन बाबू के नाम से प्रसिद्ध नितीश को यह स्वीकार करने से कोई परहेज नहीं हैं कि उनकी सियासत मीडिया का अनुसरण करते हुए ही आगे बढ़ रही है। दूसरी ओर मीडिया से तो वैसे भी यही अपेक्षा की जाती है कि वह नेताओं का अनुसरण करते हुए ना सिर्फ उन पर बारीकी से नजर रखे बल्कि उनकी पूरी हकीकत बिना किसी लाग लपेट के ज्यों का त्यों सार्वजनिक कर दे। इस लिहाज से देखा जाये तो मीडिया का काम ही है नेताओं का अनुसरण करना। लेकिन नितीश सरीखे नेता जब अपनी सियासी गाड़ी को मीडिया के नाव पर लाद कर चुनावी भवसागर पार करने की मुहिम में जुट जाते हैं तो यह पता करना मुश्किल हो जाता है कि आखिर कौन किसकी सवारी कर रहा है या कौन किसका अनुसरण कर रहा है। खैर, मसला यह नहीं है कि कौन किसकी सवारी कर रहा है बल्कि सवाल तो यह है कि सवारी का सवार सही दिशा में आगे बढ़ रहा है या नहीं। अगर रास्ता सही मंजिल की ओर जा रहा हो तो सवार या सवारी का मसला गौण हो जाता है लेकिन जब मंजिल कहीं और हो और राहेगुजर किसी और ही दिशा की ओर ले जा रहा हो फिर तो सवार और सवारी का सवाल उठना लाजिमी ही है। इस कसौटी पर परखा जाये तो इन दिनों जहां एक ओर मीडिया का जमीन से जुड़ाव लगातार कमजोर होता दिख रहा है वहीं नेताओं की भी मीडिया पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है। नेताओं का जनता से सीधा जुड़ाव कमजोर पड़ने का ही नतीजा है कि जिस व्यापम घोटाले को तूल देकर संसद से सड़क तक कांग्रेस ने भारी कोहराम मचाया हुआ था उसी मसले की आंधी के बीच हुए मध्य प्रदेश के जिन दस स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम सामने आये हैं उनमें से उसे महज एक ही जीत नसीब हुई है। जबकि पहले इनमें से छह निकायों पर कांग्रेस का ही कब्जा था। जाहिर है कि अगर व्यापम की जमीन इस कदर बंजर साबित होने के बारे में कांग्रेस को पहले से अंदाजा होता तो वह हर्गिज इस मसले को राष्ट्रीय स्तर पर इतने जोर-शोर से तूल नहीं देती। इसी प्रकार भाजपा का भी जमीन से जुड़ाव कमजोर होने का ही नतीजा है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन के प्रस्ताव का जो प्रारूप इसने पेश किया उसके प्रति समूचे देश में भारी प्रतिक्रिया होने के बावजूद वह उसे मनचाहे स्वरूप में संसद से पारित कराने की जिद पर लगातार अड़ी रही। हालांकि विरोधियों, सहोदरों व साथियों द्वारा समाझाए जाने के बाद उसे समय रहते यह एहसास हो गया कि इस मामले में मनमानी का जमीनी स्तर पर भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। तभी तो जहां एक ओर सर्वसम्मति कायम करने की आड़ लेकर उसने विधेयक के प्रारूप में व्यापक बदलाव का फैसला कर लिया है वहीं दूसरी ओर इस पूरे मामले को बिहार विधानसभा चुनाव तक के लिये ठंडे बस्ते के हवाले करने से भी परहेज नहीं बरता गया है ताकि इसका चुनावी नुकसान झेलने से बचा जा सके। इन तमाम मसलों को समग्रता में देखा जाये तो ना तो राजनीतिक दलों व नेताओं ने इन दिनों किसी भी मसले के जमीनी असर का आंकलन करने की जहमत उठायी है और ना ही मीडिया ने जमीनी तौर पर मुआयना करके विवादास्पद मसलों के प्रति आम लोगों की भावना को सही तरीके से उजागर करना जरूरी समझा है। ऐसे में सियासी पार्टियों द्वारा जनभावना के विपरीत खड़ा किये गये तूफान को ही मीडिया भी हवा देती रही और जमीनी परिणाम के प्रति दोनों एक दूसरे पर ही निर्भर रहे। इसका खामियाजा कांग्रेस को मध्य प्रदेश में भुगतना पड़ा है जबकि भाजपा को भी भूमि विधेयक के मसले पर नीचा देखना पड़ा है। अब ऐसी ही हरकत बिहार में नितीश भी करते दिख रहे हैं। भाजपा की उड़ाई अफवाह को तूल देकर मीडिया ने लालू की छवि जंगलराज के महानायक की बना दी तो नितीश ने भी उनके साथ अपनी छवि को जोड़ने से परहेज बरत लिया। आलम यह है कि लालू के समर्थकों का वोट तो नितीश को चाहिये लेकिन लालू की छवि का लोड उठाने के लिये वे कतई तैयार नहीं हैं। नतीजन दोनों के रिश्तों का रायता अब सड़क पर फैलना शुरू हो गया है। खैर, अपेक्षित तो यही है कि नेता और मीडिया दोनों ही जमीनी जुड़ाव को लगातार मजबूत करके आगे बढ़ें और कोई भी एक दूसरे के झांसे में ना आए। लेकिन इन दिनों जिस तरह से जमीनी हकीकतों को नजरअंदाज करके दोनों की परस्पर एक दूसरे पर निर्भरता में लगातार इजाफा देखा जा रहा है उसका नकारात्मक परिणाम मीडिया की विश्वसनीयता पर तो पड़ ही रहा है परंतु असली खामियाजा तो नेताओं को ही झेलना पड़ेगा जिनका अस्तित्व ही हर चुनाव में दांव पर रहता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ 

सोमवार, 17 अगस्त 2015

‘दूल्हा बेकरार, बिचैलिये की पहल का इंतजार’

नवकांत ठाकुर
परंपरागत तौर पर होनेवाले शादी-ब्याह के मामलों में बिचैलियों की भूमिका किसी से छिपी हुई नहीं है। बिचैलिये ना हों तो ना लड़केवालों को मनचाही वधू मिल पाए और ना ही कन्यापक्ष को अपनी बिटिया के लिये सुयोग्य वर मिल पाए। ये बिचैलिये ही होते हैं जो वर-वधू पक्ष के बीच कड़ी की भूमिका निभाते हुए रिश्ते की बुनियाद तैयार करते हैं। खैर, बिचैलियों की भूमिका शादी-ब्याह के मामलों में जितनी महत्वपूर्ण होती है उससे जरा भी जीवन के बाकी क्षेत्रों में नहीं होती। चाहे मामला किसी वस्तु या सेवा की खरीद-फरोख्त का हो या किन्हीं दो पक्षों के बीच किसी भी मामले में सहमति की राह तैयार करने का। जाहिर है कि जब जीवन के हर क्षेत्र में बिचैलियों या मध्यस्थ की भूमिका इस कदर महत्वपूर्ण होती है तो फिर सियासत का क्षेत्र इससे अछूता कैसे रह सकता है। हकीकत तो यही है कि राजनीति के क्षेत्र में अगर बिचैलिये ना हों तो सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच कभी सकारात्मक तालमेल कायम ही ना हो। मिसाल के तौर पर इन दिनों ‘वस्तु व सेवाकर अधिनियम’ यानि जीएसटी को पूर्वनिर्धारित समयसीमा के भीतर लागू कराने के लिये बेकरार दिख रही केन्द्र सरकार की तमाम उम्मीदों पर पानी फेरने की हर मुमकिन कोशिश कर रही कांग्रेस के बीच जिस कदर तनातनी व आर-पार की लड़ाई का माहौल बना हुआ है उसके मद्देनजर इनके बीच द्विपक्षीय बातचीत से आमसहमति बनने की तो उम्मीद भी नहीं की जा सकती। वैसे अगर इन दोनों ने आपसी बातचीत का झरोखा भी खुला छोड़ा होता तो शायद सहमति की कोई राह निकल भी सकती थी। लेकिन हकीकत तो यह है कि ये दोनों एक-दूसरे के साथ सीधे मुंह बात करने के लिये भी तैयार नहीं दिख रहे हैं। अलबत्ता मीडिया के माध्यम से जो बातचीत हो भी रही है उससे आग पर पानी की बजाय पेट्रोल ही पड़ रहा है। लेकिन सियासी लड़ाई अपनी जगह है और साझा फायदे के मसले को आगे बढ़ाने की बात बिल्कुल ही अलहदा मसला है। खास तौर से जीएसटी का मामला ऐसा है जिससे दोनों को फायदा ही होना है। वित्तमंत्री अरूण जेटली के मुताबिक जीएसटी लागू होने का असली व प्रत्यक्ष लाभ राजस्व में इजाफे के तौर पर तमाम सूबों की सरकार को ही मिलेगा। तभी तो जीएसटी को तयशुदा समयसीमा के तहत अगले वित्तीय वर्ष से लागू कराने के लिये जितनी बेकरार केन्द्र सरकार है उससे कतई कम कुल दस सूबों में सत्तारूढ़ कांग्रेस भी नहीं है। तभी तो शीर्ष कांग्रेसी नेताओं की जमात भी यह बताने से नहीं हिचक रही है कि उनकी पार्टी जीएसटी के खिलाफ कतई नहीं है। यानि दोनों तरफ है आग बराबर लगी हुई। लेकिन समस्या है कि इनके कूटनीतिक रिश्तों पर इनकी आपसी सियासी रंजिश इस कदर हावी हो गयी है कि सकारात्मक व साझा मुनाफे के मसले पर भी बातचीत का झरोखा नहीं खुल पा रहा है। किसी मसले पर एक ईंच भी करीब आने के लिये दोनों में से कोई तैयार नहीं है। जाहिर तौर पर अब यह मसला तभी सुलझ सकता है जब इन दोनों के बीच कोई ऐसा तीसरा पक्ष बिचैलिये की भूमिका निभाने के लिये तैयार हो जिस पर दोनों को पूरा विश्वास हो और जिसकी निष्पक्षता पर उंगली ना उठायी जा सके। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस ने किसी को मध्यस्थ बनाने की पहल करना गवारा नहीं किया है क्योंकि उसकी सोच है कि चुंकि जीएसटी को पारित कराने की जिम्मेवारी सरकार की है लिहाजा मध्यस्थ के माध्यम से सहमति का फार्मूला उसकी ओर से ही पेश किया जाना चाहिये। इसमें राहत की बात यही है कि सरकार ने अपनी इस जिम्मेवारी को स्वीकार करते हुए सुयोग्य, सक्षम व निष्पक्ष बिचैलिये की तलाश काफी तेज कर दी है। हालांकि सरकार ने पिछले दिनों सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को इस काम पर लगाने की कोशिश अवश्य की थी जिसे मुलायम ने स्वीकार भी कर लिया था लेकिन उनकी निष्पक्षता पर कांग्रेस को भरोसा नहीं हुआ जिसके चलते उनको मध्यस्थ बनाकर पूरे मामले का हल निकालने की योजना परवान नहीं चढ़ पायी। खैर, सूत्रों की माने तो अब सरकार ने राकांपा सुप्रीमो शरद पवार को मध्यस्थ बनाने की कोशिशें काफी तेज कर दी हैं और भगवा खेमे को उम्मीद है कि पवार की निष्पक्षता पर कांग्रेस कतई सवाल नहीं उठाएगी। वैसे राकांपा संप्रग की घटक भी है और बिहार में कांग्रेस के साथ गठजोड़ करके चुनाव भी लड़ रही है। दूसरी ओर यह राकांपा ही थी जिसने भाजपा व शिवसेना के बीच भारी तनातनी के माहौल में अपनी ओर से बिन मांगे ही बिनाशर्त समर्थन देकर महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनवायी थी। साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस व भाजपा के बीच समानांतर दूरी कायम रखते हुए तमाम गैरकांग्रेसी विपक्ष को एक मंच पर लाकर तीसरे मोर्चे के गठन की पहल करके पवार ने अपने सियासी रसूख को भी इस कदर मजबूत कर लिया है कि उनकी मध्यस्थता में बनी सहमति की राह पर चलने से मुकरने का दुस्साहस ना तो कांगे्रस कर सकती है और ना ही भाजपा। यानि राष्ट्रीय सियासत में एक बार फिर से बिचैलिये की भूमिका ही निर्णायक साबित होनेवाली है लेकिन मसला यह है कि आपसी रिश्ते की मौजूदा संवादहीनता को बरकार रखने के नतीजे में अगर हर मसले पर इन दोनों को मध्यस्थ पर ही निर्भर होना पड़ा तो भविष्य में इन्हें इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’