सपा भाजपा की जुगलबंदी से बढ़ी सियासी सरगर्मी
मुलायम से मोदी की हमदर्दी के मायनों की तलाश तेज
नवकांत ठाकुर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में भले ही समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच छत्तीस का आंकड़ा हो और दोनों ही एक दूसरे की जड़ें खोदने व नुकसान पहुंचाने का कोई भी मौका छोड़ना कतई गवारा ना करते हों लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में इन दोनों दलों के दरमियान दिख रही सियासी जुगलबंदी के कारण राजनीतिक गलियारे के तापमान में लगातार इजाफा होता दिख रहा है। खास तौर से बिहार में सपा के धर्मनिरपेक्ष महामोर्चे से अलग होकर नितीश कुमार के प्रति हमलावर रूख अख्तियार करने, संसद की कार्यवाही को बाधित करने के मामले में सपा द्वारा कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किये जाने, बिहार में जदयू, राजद व कांग्रेस की तिकड़ी द्वारा सपा को समुचित सम्मान नहीं दिये जाने के मामले को लेकर भाजपा द्वारा सपा के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन किये जाने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सार्वजनिक मंच से सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की तारीफ में कसीदा काढ़े जाने सरीखे घटनाक्रमों ने देश के राजनीतिक माहौल में भारी सरगर्मी पैदा कर दी है। हालांकि सपा व भाजपा की इस जुगलबंदी को लेकर जितने मुंह उतनी बातें सुनने को मिल रही हैं। कोई इसे केन्द्र के दबाव में सपा का समर्पण बता रहा है तो किसी की नजर में यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति दोनों दलों की एक समान सोच का नतीजा है। कुछ का मानना है कि मुलायम अपनी परंपरागत राजनीति ही अंजाम दे रहे हैं जिसका तात्कालिक फायदा भाजपा को मिल रहा है जबकि कुछ राजनीतिक पंडितों का यह भी मानना है कि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस को अलग थलग करने की नीति के तहत ही भाजपा ने सपा के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व सहयोगात्मक रवैया अपनाया हुआ है। लेकिन इन तमाम कयासों व अटकलों के बीच कोई भी सियासी दल या राजनीतिक पंडित दावे से इन दोनों दलों की मौजूदा जुगलबंदी के पीछे का मकसद बता पाने में कतई सक्षम नहीं नहीं दिख रहा है।
कायदे से देखा जाये तो सपा और भाजपा के बीच सार्वजनिक तौर पर दोस्ती का रिश्ता कायम होने की उम्मीद तो कतई नहीं की जा सकती है लेकिन पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रमों में जिस तरह से सपा की पहलकदमियों से भाजपा को फायदा मिलता दिख रहा है और भाजपा के सुर व स्वर भी सपा के प्रति बेहद नरम व सहानुभूतिपूर्ण दिख रहे हैं उससे इतना तो स्पष्ट है कि पर्दे के पीछे इन दोनों दलों के बीच कोई ना कोई खिचड़ी अवश्य पक रही है। तभी तो ना सिर्फ यूपी सरकार के कामकाज को लेकर शीर्ष भाजपाई नेताओं की ओर से जुबानी आलोचनाओं व तेवरों की तल्खी का बेहद अभाव दिख रहा है बल्कि औपचारिक तौर पर भी यूपी सरकार के प्रति सहयोगात्मक रूख का प्रदर्शन करने में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है। कानून व्यवस्था की लचर हालत के कारण लड़कियों द्वारा बीच में ही पढ़ाई छोड़े जाने की घटनाओं में वृद्धि को लेकर जब केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री से सवाल किया जाता है तो वे यूपी सरकार के खिलाफ एक शब्द भी बोलने से परहेज बरतते हुए सिर्फ यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि अगर ऐसा कोई मामला उनके संज्ञान में आया तो वे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से लड़कियों को सुरक्षा मुहैया कराने का अनुरोध अवश्य करेंगी। इसी प्रकार जब ऊर्जामंत्री पियूष गोयल से यूपी में बिजली की बदहाल व्यवस्था के बारे में पूछा जाता है तो उनका रटा-रटाया जवाब यही रहता है कि अगर प्रदेश सरकार चाहे तो सूबे के हर गांव-कस्बे को चैबीसों घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। गुहमंत्री राजनाथ सिंह को भी इन दिनों सूबे की कानून-व्यवस्था की स्थिति में कोई खामी नजर नहीं आ रही है। यहां तक कि प्रधानमंत्री खुद भी सपा सुप्रीमो की ओर से संसद में मिले सहयोग का गुणगान करते नहीं थक रहे हैं। इसके अलावा समूची भाजपा को इस बात का काफी मलाल है कि बिहार में जनता परिवार के घटक दलों ने सपा के सम्मान व स्वाभिमान को आहत करने की गुस्ताखी कैसे कर दी। जाहिर है कि भाजपा संगठन व केन्द्र सरकार के रवैये में सपा के प्रति दिख रही यह सहानुभूति बेवजह तो हो नहीं सकती और ऐसा भी नहीं हो सकता है कि सपा भी केन्द्र व बिहार की सियासत में बेवजह ही ऐसी पहलकदमियां करे जिसका सीधा लाभ भाजपा को ही मिलता हुआ दिखे। तभी तो रालोद का आरोप है कि सीबीआई की डर से सपा ने केन्द्र सरकार के सामने समर्पण किया हुआ है जबकि बसपा भी इन दोनों दलों के बीच अंदरूनी सांठगांठ होने का दावा करने से परहेज नहीं बरत रही है। यहां तक कि कांग्रेस भी मुलायम पर मतलबपरस्ती की राजनीति का आरोप लगाने में संकोच नहीं कर रही है जबकि जदयू को भी सपा की सियासी मंशा बेहद संदेहास्पद महसूस हो रही है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें