सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

’मन-मन भावे, मूड़ हिलावे‘

’मन-मन भावे, मूड़ हिलावे‘


किसी के भी चाल-चरित्र व स्वभाव के बारे में जितनी सही व पूरी जानकारी उसके धुर विरोधी के पास होती है उतनी किसी और के पास हो ही नहीं सकती। तभी तो भाजपा को अगर सबसे सही तरीके से किसी ने जाना, समझा और पहचाना है, तो वे हैं सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव। खास तौर से ‘मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना’ का दिखावा करके मतदाताओं व विरोधियों को भ्रम व असमंजस में डालने के भाजपा के जिस चरित्र के प्रति मुलायम लगातार सबको आगाह करते रहे हैं उसी का मुजाहिरा किया है भाजपा की मौजूदा कूटनीति ने। यूपी विधानसभा के चुनाव में पार्टी एक हाथ में राष्ट्रवाद के झंडे और दूसरे में विकास के एजेंडे का तो सार्वजनिक तौर पर मुजाहिरा कर रही है। लेकिन राष्ट्रवादी झंडे के भीतर सांप्रदायिक मसलों का डंडा घुसेड़ने की अपनी कोशिशों को खुलकर स्वीकार करना उसे कतई गवारा नहीं हो रहा है। शायद यही भाजपा का असली स्वभाव जिसके तहत इसके तमाम नेता अधिकांश मसलों पर कभी एक सुर में बोलना गवारा नहीं करते। दूर से सुननेवालों को ऐसा लगता है मानो पार्टी के भीतर सैद्धांतिक व वैचारिक स्तर पर भारी टकराव चल रहा है। लेकिन नजदीक से देखने पर तस्वीर बदली हुई दिखती है। इसमें मजेदार तथ्य यह है कि पार्टी में सबकी राहें बेशक अलग दिखती हों लेकिन उनकी मंजिल एक ही रहती है। अब जहां लक्ष्य को लेकर कोई मतभेद या विरोधाभास ना हो वहां राहों का भेद कोई मायने नहीं रखता। लिहाजा इनका आपसी टकराव व विरोध भी अक्सर दिखावे का ही रहता है। परस्पर मतभेद तो दिखता है लेकिन उसमें मनभेद नहीं होता। मन मिला हुआ ही रहता है। दरअसल संगठनिक स्तर पर होनेवाली इस नूराकुश्ती का मकसद सिर्फ सियासी माहौल में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करना ही रहता है। और कुछ भी नहीं। इस भ्रम के शिकार सिर्फ मतदाता ही नहीं होते बल्कि कई दफा विरोधी भी हो जाते हैं। वे समझ ही नहीं पाते कि भाजपा के किस नेता की बात का विरोध करें और किसके बयान की अनदेखी। भ्रम के इसी कुहासे में फंसकर विरोधियों की गाड़ी अक्सर डी-रेल हो जाती है और भाजपा मैदान मार ले जाती है। ऐसा ही माहौल भाजपा ने एक बार फिर बनाने का प्रयास किया है। खास तौर से यूपी विधानसभा के चुनाव को सांप्रदायिक रंग देने के मामले को लेकर। जितने मुंह उतनी बातें। सुब्रमण्यम स्वामी तो राम मंदिर निर्माण की तारीख का भी ऐलान कर चुके हैं। जबकि राजनाथ सिंह ने औपचारिक तौर पर सरकार की विवशता का इजहार करते हुए पहले ही कह दिया है कि चुंकि राज्यसभा में मोदी सरकार को बहुमत हासिल नहीं है लिहाजा संसद से कानून बनाकर मंदिर का निर्माण कर पाना फिलहाल संभव ही नहीं है। दूसरी ओर यूपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य से लेकर उमा भारती तक खम ठोंकते हुए यह कहने से परहेज नहीं बरत रहे हैं कि मंदिर तो मोदी सरकार के कार्यकाल में ही बनेगा। यानि हर किसी की जुबान पर मंदिर का नाम तो है लेकिन सुर अलग-अलग है। विनय कटियार तल्ख सुर में लाॅलीपाॅप की कड़वाहट बयान करते हैं तो महेश शर्मा कहते हैं कि जो किया जा सकता है वह तो कम से कम कर लिया जाये। इस सबसे अलग भाजपा का राष्ट्रीय संगठन मंदिर मसले को आस्था का विषय बताने से तो नहीं हिचक रहा लेकिन लगे हाथों यह समझाने से भी चुक रहा है कि यूपी में मंदिर को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जायेगा बल्कि पार्टी विकास और सुशासन के एजेंडे पर ही चुनाव लड़ेगी। पार्टी का साफ मत है कि मंदिर बनना तो चाहिये लेकिन इसके लिये मनामानी नहीं होनी चाहिये। या तो आम सहमति के आधार पर मंदिर निर्माण हो या फिर अदालत के आदेश पर। अब आम सहमति तो बनने से रही। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा किये गये विवादित जमीन के बंटवारे के दो हिन्दू लाभार्थियों के बीच अब तक सहमति नहीं बन पायी है तो तीसरे मुस्लिम पक्षकार के साथ सहमति बने भी तो कैसे? रहा सवाल अदालत के आदेश से मंदिर निर्माण का, तो इस राह के रोड़े फिलहाल समाप्त होते नहीं दिख रहे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला सामने आये तकरीबन दो साल का वक्त गुजर जाने के बावजूद आज तक इस मामले की फाइल सर्वोच्च न्यायालय की आलमारी में धूल ही फांक रही है। अब तक इसकी सुनवाई के लिये पीठ का गठन भी नहीं हो पाया है। पता नहीं कब पीठ का गठन होगा, कब सुनवाई होगी और कब इसका फैसला आएगा। यानि पूरा मामला अभी बदस्तूर अटका-लटका ही रहनेवाला है। इस हकीकत को जानते हुए भी अगर मंदिर मसले की लहर उठाने का प्रयास हो रहा है और कटियार की तल्खी, सरकार की नरमी और संगठन की गर्मी दिख रही है तो इसमें किसी का किसी से कोई विरोधाभास नहीं है। अंदर से सब मिले हुए ही हैं। बस ऊपर से एक दूसरे से असहमत होने का दिखावा किया जा रहा है। ताकि समाज की कट्टरवादी धारा पर भी पकड़ बनी रहे और मध्यममार्गी धारा पर भी। इसके अलावा छोड़-पकड़ की इस खींचतान में विरोधियों को भी उलझाये रखा जाये ताकि वे किसी एक बयान को पकड़कर आगे ना ले जा पायें। अब ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘चित भी मेरी पट भी मेरी’ की जो दोधारी तलवार भाजपा भांज रही है उसकी चपेट इसके विरोधी आते हैं या पार्टी खुद ही लहुलुहान होती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

‘बेकरारी तुझे ऐ अखिलेश कभी ऐसी तो न थी’

’ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार?‘


मुगलिया सल्तनत के आखिरी सुल्तान कहे जानेवाले बहादुर शाह जफर के अंदाज में आज वाकई उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से हर कोई यह जानना चाह रहा है कि ‘ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार, बेकरारी तुझे ऐ अखिलेश कभी ऐसी तो न थी।’ वास्तव में देखा जाये तो इन दिनों अखिलेश बड़े बेकरार और बेसब्र दिख रहे हैं। यह बेकरारी उनकी बातों से भी झलक रही है और उनकी हरकतों से भी। जिस सौम्य, सरल व सहज अंदाज के कारण वे भीड़ में अलग दिखते रहे हैं वह कहीं दब-छिप सा गया है। उसकी जगह ले ली है खीझ, परेशानी और बेकरारी ने। कहां तो वे सब्र का समुंदर मालूम पड़ते थे जबकि आज उनके सब्र का बांध बुरी तरह जर्जर और कमजोर होकर टूटता दिख रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो बचपन में अपना नामकरण खुद करने की दलील देकर एकला चलो की राह अपनाने घुड़की देने की कोशिश वे कतई नहीं करते। इस तरह की बातें करके वे अपनी बेसब्री का ही मुजाहिरा कर रहे हैं। कहीं ना कहीं उनके सब्र व संयम का बांध टूटता दिख रहा है। वे उसी जाल में उलझते हुए दिखाई दे रहे हैं जिसमें उनके विरोधी उन्हें लपेटना चाहते हैं। उनके विरोधियों की तो कोशिश ही यही है कि वे अपना आपा खोकर ऊल-जुलूल बकना शुरू कर दें। ताकि मुलायम सिंह का उन पर जो भरोसा है वह मिट्टी में मिल जाये और उन्हें अपने लिये किसी नये उत्तराधिकारी की तलाश करना आवश्यक महसूस होने लगे। ऐसे में कसौटी पर है अखिलेश का संयम। वास्तव में देखा जाये तो अभी वक्त का तकाजा यही है कि उन्हें अपनी कथनी और करनी में भरपूर संयम का प्रदर्शन करना चाहिये। उनके बात या व्यवहार से कहीं से भी यह नहीं झलकना चाहिये कि वे संगठन, सरकार या परिवार के किसी सदस्य से रत्ती भर भी नाराज हैं। उनकी बातों से मुलायम के प्रति अटूट विश्वास झलकना चाहिये और मुलायम की हर बात को उन्हें आदेश के तौर पर स्वीकार व अंगीकार करना चाहिये। ठीक ऐसे ही जैसे उनके चाचा शिवपाल यादव लगातार करते हुए दिखते आ रहे हैं। आखिर शिवपाल ने सपा में अपनी हैसियत मजबूत करने के लिये मुलायम के विश्वास का ही तो सहारा लिया है। वर्ना उनकी क्या हैसियत थी कि वे मुलायम द्वारा घोषित उत्तराधिकारी की अपने दम पर जड़ खोदने की सोच भी सकें। लेकिन आज वे ऐसा सिर्फ सोच ही नहीं रहे बल्कि उसे कार्यरूप देते हुए भी दिखाई पड़ रहे हैं तो इसकी इकलौती वजह है अखिलेश और मुलायम के बीच आयी वैचारिक व सैद्धांतिक दूरी। हालांकि इस बात पर अलग से बहस हो सकती है कि यह दूरी अखिलेश की कथनी व करनी के कारण आयी है या फिर इसकी पटकथा किसी और ने लिखी है। कहा तो यह भी जाता है कि इस सबके पीछे सपा के संचालक परिवार की सबसे मजबूत मानी जानेवाली महिला सदस्य ने ही निर्णायक भूमिका निभायी है और उन्होंने मुलायम को अपने शीशे में उतार कर अखिलेश से उन्हें दूर कर दिया है। साथ ही इस दूरी को हवा देकर अपना सियासी समीकरण साधने के दोषी शिवपाल सरीखे अंदरूनी भी बताये जाते हैं और अमर सिंह सरीखे बाहरी भी। लेकिन इन कही-सुनी बातों से इस हकीकत को हर्गिज झुठलाया नहीं जा सकता है कि आखिरकार कहीं ना कहीं अखिलेश भी इस दूरी, संबंधों में पनपी कटुता व आपसी अविश्वास के लिये कम दोषी नहीं हैं। पिछले चुनाव में सपा को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद मुलायम ने तो अखिलेश को अपना उत्तराधिकारी बनाकर मुख्यमंत्री पद की कुर्सी सौंप ही दी थी। लिहाजा बाद में बाप-बेटे के बीच जो दूरी बनी उसके लिये मुलायम को जिम्मेवार ठहराना कतई उचित नहीं होगा। साथ ही अगर मुलायम इसके लिये जिम्मेवार नहीं हैं तो जाहिर तौर पर उनके करीबियों व अन्य विश्वासपात्रों पर भी इसका दोष नहीं मढ़ा जा सकता है। ऐसे में सीधे तौर पर मौजूदा हालातों के लिये दोषी अखिलेश ही दिखाई पड़ते हैं जिन्होंने कई फैसले मनमाने तरीके से किये जो मुलायम को नागवार गुजरे। अगर उन्होंने मुलायम को विश्वास में लेकर फैसले किये होते तो ना तो उन्हें दोबारा गायत्री प्रजापति को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिये मजबूर होना पड़ता और ना ही प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से हाथ धोना पड़ता। आज नौबत यहां तक आ पहुंची है कि मुलायम उन्हें सपा का चुनावी चेहरा बनाने के लिये भी तैयार नहीं हैं। उन्होंने खुलकर बता दिया है कि आगामी चुनाव में किसी को भी चुनावी चेहरा नहीं बनाया जाएगा और चुनाव के बाद विधायक दल की बैठक में आम सहमति के आधार पर ही नये मुख्यमंत्री का चयन किया जाएगा। यानि बात बिल्कुल साफ है कि कहीं ना कहीं अखिलेश के प्रति मुलायम का भरोसा कमजोर अवश्य पड़ा है। बेशक इसकी डोर आज भी टूटी नहीं है जिसके कारण परिवार में पनपी असहजता को वे सार्वजनिक तौर पर खारिज करते हुए ही दिख रहे हैं लेकिन अगर अखिलेश ने हालात की गंभीरता को समझते हुए स्थिति को संभालने की पहल नहीं की तो सियासी डगर पर उनकी राहें लगातार दुश्वार होती जाएंगी। लिहाजा अपेक्षित है कि वे सब्र व संयम का परिचय देते हुए मुलायम को विश्वास में लेकर ही आगे बढ़ें। अगर मुलायम के बताये मार्ग का आंखें मूंद कर अनुसरण किया जाये तो भविष्य सुरक्षित भी रहेगा और सुनिश्चित भी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

‘बात निकली है तो अब दूर तलक जाएगी’

‘बात निकली है तो अब दूर तलक जाएगी’


वाकई दशकों से अनसुना ही तो किया जा रहा था पड़ोसी की उस बात को जो वह हमें सुनाता आ रहा था। उसने अपनी बात सुनाने के लिये क्या-क्या नहीं किया। कभी गालियां दी, कभी हिंसक हुआ। कभी गुदगुदाया भी, कभी तमतमाया भी। सिर्फ इसलिये ताकि उसकी बात सुनी जाये। लेकिन वह बात जिसका कोई मायने-मतलब ही नहीं है। आखिर ऐसी बातों को अनसुना ना करते तो और क्या करते। लेकिन वह नहीं माना। उसकी गुस्ताखियां लगातार बढ़ती गयीं। इस तरफ की खामोशी को उसने कमजोरी समझ ली। उसका हौसला लगातार बुलंद होता गया। लेकिन बर्दाश्त की भी एक हद होती है। और जब वह हद आ गयी, तो हो गया वह, जिसकी हमारे पड़ोसी ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। उसे ऐसी जगह पर ऐसा जख्म दे दिया गया जिसे ना तो वह सह सकता है और ना ही किसी से कह सकता है। कहे भी तो क्या कहे, किससे कहे। तभी तो जख्मों से छलनी होने के बावजूद वह मानने के लिये तैयार ही नहीं है कि उसके किस हिस्से पर कैसा वार हुआ है। कुछ समय के लिये अगर मान भी लिया जाये कि उसके खिलाफ कोई वार नहीं किया गया है तो आखिर यह छटपटाहट और बिलबिलाहट क्यों है? क्यों भारत के तमाम टीवी चैनलों को प्रतिबंधित किया गया है? नवाज शरीफ ने आखिर किस बात की निंदा की है? क्यों लश्कर का मुखिया बिलबिलाहट में जहर उगलता और बदला लिये जाने की धमकी देता घूम रहा है? जब कुछ हुआ ही नहीं है तो किसका बदला, कैसा बदला? यानि वह हुआ तो जरूर है जिसे स्वीकार करने का साहस हमारे पड़ोसी मुल्क में है ही नहीं। आखिर वह दुनियां के सामने यह स्वीकार भी कैसे कर सकता है कि उसके कब्जेवाली जमीन पर आतंकी गतिविधियां संचालित हो रही थीं जिसे भारत ने विध्वंसक कार्रवाई करते ध्वस्त कर दिया है। साथ ही वह अपनी आवाम के सामने यह भी कबूल नहीं कर सकता कि उसके कब्जेवाली जमीन पर चहलकदमी करते हुए पड़ोसी मुल्क की फौज ने बड़े आराम और इत्मिनान के साथ सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दे दिया और उसकी तमाम रक्षा व्यवस्था को इसकी भनक भी नहीं लग सकी। परमाणु और मिसाइलों की तमाम धौंस का बेअसर रहना भी वह स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन वह स्वीकार करे या ना करे, इतना तो तय है कि पलटवार करने का प्रयास जरूर करेगा। तैयारियां इधर भी पूरी हैं। बस इंतजार है कि वह कुछ करे तो सही। जवाब ऐसा मिलेगा कि सिर्फ इतिहास ही नहीं बदलेगा, पूरा भूगोल बदल जाएगा। वैसे भी पहले पठानकोट और उसके बाद उड़ी में कराए गये आतंकी हमले का करारा जवाब देने के क्रम में अंजाम दिये सर्जिकल स्ट्राइक से ही भारत के सीने में सुलग रही बदले की आग कतई शांत नहीं पड़ सकती है। अभी तो सिर्फ ताजा घाव पर मरहम लगा है, नासूर बन चुके पुराने जख्मों का हिसाब-किताब तो बाकी ही है। यह तो आतंक के खिलाफ सीधी कार्रवाई की महज एक शुरूआत भर है। पाक की ओर से थोपे गये छद्म युद्ध के खिलाफ इसे भारत के पहले औपचारिक प्रतिवाद के तौर पर देखा जाना ही उचित होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो आतंक के खिलाफ लंबे समय से जारी लड़ाई का यह छोटा सा पड़ाव मात्र है। सच तो यह है कि बेशक अपनी ओर से आर-पार का युद्ध छेड़ने की पहल करने के विकल्प को आजमाने से परहेज बरतने की नीति बदस्तूर जारी रहनेवाली है लेकिन पाकिस्तान को जंग से भी अधिक जहरीला दर्द देने की राह पर भारत लगातार आगे बढ़ता रहेगा। खैर, सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देने के अलावा पड़ोसी मुल्क को विश्व बिरादरी में अलग-थलग करने का पड़ाव भी अब पूरी तरह पार होने की कगार पर ही है। अमेरिका द्वारा पाक को औकात में रहने का निर्देश दिया जाना, संयुक्त राष्ट्र द्वारा नवाज शरीफ की तमाम दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया जाना, सार्क देशों द्वारा पाक का पूरी तरह बहिष्कार किया जाना, रूस द्वारा पाक सेना के साथ पूर्वनिर्धारित युद्धाभ्यास स्थगित किया जाना और चीन द्वारा पाक में जारी आतंकी गतिविधियों के खिलाफ मुखर होना यह बताने के लिये काफी है कि विश्व बिरादरी में पाक किस कदर अकेला पड़ता जा रहा है। लेकिन लड़ाई अभी बहुत लंबी है। मौजूदा पड़ावों को ही पर्याप्त मानकर शांत बैठ जाने का मतलब होगा सांप को चोटिल करके छोड़ देना। अभी तो उसे महज कुछ ही जख्म दिये गये हैं। फन कुचलना तो अभी बाकी है। जिस जंग का उसने आगाज किया उसे अंजाम तक तो पहुंचाना ही है। इसके लिये रणनीति भी तैयार है। अब जहां एक ओर आर्थिक नुकसान पहुंचाने के लिये उसे एकतरफा तौर पर दिया गया मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा उससे वापस लिया जाना है वहीं मित्र देशों को इस बात के लिये सहमत करना है कि वे भी उसके साथ अपना आर्थिक रिश्ता पूरी तरह खत्म ना भी करें तो अधिकतम कम अवश्य कर लें। साथ ही सिंधु सरीखी नदियों के पानी से उसे महरूम करने की ठोस योजना पर भी जल्दी ही अमल आरंभ होनेवाला है। जाहिर तौर पर ऐसे तमाम विकल्पों अमल करना तब तक जारी रखा जाना चाहिये जब तक पाक प्रायोजित आतंकवाद का समूल नाश नहीं हो जाता है और गुलाम कश्मीर की सरजमीं पर निर्णायक तौर पर भारतीय तिरंगा लहराने में कामयाबी नहीं मिल जाती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शनिवार, 17 सितंबर 2016

‘रफू की ताकीद करनेवाले, कहां-कहां अब रफू करेंगे’

‘रफू की ताकीद करनेवाले, कहां-कहां अब रफू करेंगे’


सूबे में सत्तारूढ़ सपा की अंदरूनी हालत ऐसी ही दिख रही है जिसके बारे में कहा गया है कि ‘रफू की ताकीद करनेवाले कहां-कहां अब रफू करेंगे, लिबासे-हस्ती का हाल ये है, जगह-जगह से मसक रहा है।’ वाकई सपा की लगातार यत्र-तत्र-सर्वत्र मसकती दिख रही लिबासे-हस्ती को संभालने की कोशिश करनेवालों के लिये सबसे बड़ी चुनौती यही है कि आखिर रफू का काम शुरू कहां से किया जाये। हालत यह है कि एक सिरा पकड़ो तो दूसरा फिसल जाता है। एक को मनाओ तो दूसरा रूठ जाता है। वास्तव में प्रदेश ही नहीं बल्कि समूचा देश इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि सूबे में सत्तारूढ़ सपा के भीतर जो संग्राम छिड़ा हुआ है वह ना तो इतनी जल्दी समाप्त होनेवाला है और ना ही दबाने से दबनेवाला है। गनीमत है कि नेताजी की धुरी के प्रति सबकी आस्था बदस्तूर कायम है लिहाजा वे ठोक कर यह कहने का हौसला दिखा रहे हैं कि उनके रहते पार्टी में फूट नहीं हो सकती। हालांकि बेशक सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने पार्टी में जारी महासंग्रम पर काबू पाने के लिये खुद ही मोर्चा संभाल लिया है और सुलह के फार्मूले पर सहमति बनाने का प्रयास जोरों पर जारी है। लेकिन सूबे की आवाम से लेकर आला निजाम तक को यह बेहतर मालूम है कि चुनाव के मद्देनजर टकराव की लपटें सतही तौर पर फिलहाल बुझ भी जाएं मगर इसके भीतर सुलग रहा ज्वालामुखी निर्णायक तौर पर कभी ना कभी फूटेगा जरूर। और जब यह फूटेगा तो इसका लावा निश्चित तौर पर सपा की एकजुटता को अपने साथ बहा ले जाएगा। इस हकीकत से बाखबर होने के बावजूद जिस तरह से मामले की गहराई से सर्जरी करके पूरे मवाद व सड़े-गले हिस्से को काटकर निकालने के बजाए महज मरहम-पट्टी करके इस विषैले जख्म को दबाने-छिपाने की कोशिश की जा रही है वह निश्चित तौर पर आत्मघाती ही मानी जाएगी। वास्तव में देखा जाये तो सपा की ओर से पूरे विवाद की जो वजहें गिनायी जा रही हैं वह सतही तौर पर भले ही सटीक मालूम पड़ती हों लेकिन गहराई से परखने पर वह नकली ही दिखाई पड़ती है। पर्देदारी की लाख कोशिशों के बावजूद सपा का शीर्ष नेतृत्व इस हकीकत को दबा या छिपा नहीं सकता कि संगठन में जारी महासंग्राम की असली वजह ना तो अखिलेश को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाया जाना है, ना शिवपाल से महत्वपूर्ण मंत्रालय छीना जाना और ना ही गायत्री प्रजापति सरीखे मंत्रियों को सरकार से रूखसत किया जाना। यहां तक कि केबिनेट सचिव के पद पर बदलाव किये जाने या आला नौकरशाहों को ताश के पत्तों की तरह फेंटे जाने को भी इस महासंग्राम की वजह मानना बेवकूफी ही होगी। वास्तव में ये सभी घटनाक्रम महज परिणाम है जिसका कारण है संगठन पर वर्चस्व की वह लड़ाई जो सत्ता से लेकर संगठन तक पर पूर्ण एकाधिकार कायम करने के लिये छिड़ी हुई है। इस जंग की पटकथा तभी से लिखी जा रही है जब से शिवपाल ने संगठन में जमीनी स्तर तक अपनी मजबूत पैठ बनानी शुरू कर दी थी जबकि मुलायम ने पुत्रमोह में संगठन व सरकार की कमान अखिलेश को सौंपने का फैसला किया था। जाहिर तौर पर हर खासो-आम की यही ख्वाहिश होती है कि उसका उत्तराधिकारी उसका अपना बेटा ही हो। बेटे को दरकिनार कर किसी अन्य को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने की तो किसी से अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। लिहाजा यही काम मुलायम ने भी किया तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं था। उन्होंने अपने खून-पसीने से जिस सपा संगठन को खड़ा किया उसकी बागडोर वे अपने बेटे के हाथों में सौंपना चाह रहे हैं तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन सपा को सत्ता के शीर्ष पर लाकर खड़ा करने में उनके अन्य बंधु-बांधवों ने जो योगदान किया है उसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती। आज भी संगठन में जमीनी स्तर पर शिवपाल का जो प्रभाव है उसे झुठलाया नहीं जा सकता। ऐसे में अपने लिये पूरे मेहनताने की उनकी मांग को भी खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन एक तरफ जोतने के एवज में पूरा खेत हथियाने की उनकी कोशिश और दूसरी ओर जोतने-बोने की जहमत उठाए बगैर खड़ी फसल को अपने खलिहान में लाने की अखिलेश की जिद के बीच जारी टकराव वास्तव में ऐसा ही है जैसे गाय को पाले-खिलाए कोई और, उसकी मलाई खाए कोई और। यह लंबे समय तक तो चल नहीं सकता। तभी तो अब गाय को पालने-खिलानेवाले और उसकी दूध-मलाई पर कब्जा जमानेवाले के बीच बुरी तरह ठन गयी है। ऐसे में परेशान है उस गाय का मालिक जो पकी उम्र और थके शरीर के साथ ना तो गाय की पूरी सेवा व हिफाजत करने में सक्षम है और ना ही अपनी कमजोर हाजमे के कारण इसकी दूध-मलाई से कोई वास्ता रखना चाहता है। बल्कि उसकी कोशिश है कि गाय की रस्सी अपने बेटे के हाथों में थमा दे ताकि वह उसे पाले भी और दुहे भी। लेकिन मसला है कि बेटे के घास से गाय का पूरा पेट नहीं भर सकता जिसके नतीजे में दूध-मलाई का संकट उत्पन्न होना तय है। ऐसे में अब देखना दिलचस्प होगा कि पूरा परिवार मिलजुल कर गाय की सेवा करते हुए मिल बांटकर दूध-मलाई खाना पसंद करता है या फिर आपसी झगड़े में गाय का दूध सुखाकर उसके साथ खुद को भी तबाह-बर्बाद कर लेता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

दलित-मुस्लिम एका की काल्पनिक परिकल्पना

दलित-मुस्लिम समीकरण के अफसाने की हकीकत


भारत की राजनीति में दो धाराएं ऐसी हैं जो ना तो कभी सूखी हैं और ना कभी सूख सकती हैं। एक दलित सरोकार की धारा और दूसरी धर्मनिरपेक्षता की आड़ में बहनेवाली मुस्लिम तुष्टिकरण की धारा। इन दोनों धाराओं के अविरल-निर्मल प्रवाह की वजह है देश की आबादी में इनकी वह हिस्सेदारी जो सियासी नजरिये से काफी हद तक निर्णायक दिखाई पड़ती है। तभी तो इन्हें अपने साथ जोड़ने या इनके साथ पूरी शिद्दत से जुड़ने के लिये तमाम राजनीतिक पार्टियां हमेशा लालायित रहती हैं। अल्पसंख्यकवाद के नाम पर होनेवाली मुस्लिम सरोकार की सियासी धारा पर निगाह डालें तो भाजपा व शिवसेना सरीखे कुछ गिने-चुने राजनीतिक दलों को छोड़कर बाकी तमाम राजनीतिक पार्टियों के बीच हमेशा ही खुद को अल्पसंख्यकों का सबसे तगड़ा अलंबरदार साबित करने की होड़ चलती रही है। केन्द्र में भाजपा के समर्थन से चल रही वीपी सिंह की सरकार को दांव पर लगाकर लालू यादव द्वारा बिहार में लालकृष्ण आडवाणी के रामरथ का अश्वमेघ रोक कर उन्हें गिरफ्तार कराने की बात हो या मुलायम सिंह यादव द्वारा अयोध्या में निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलवाने का मामला हो। इसके पीछे सीधे तौर पर अल्पसंख्यकों का भरोसा जीतने की सोच ही थी। यहां तक कि अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति के तहत ही राजीव गांधी की सरकार ने शाह बानो के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने के लिये संसद से ‘मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार) संरक्षण अधिनियम पारित कराया जबकि मुस्लिम वोटबैंक में कांग्रेस की हिस्सेदारी पुख्ता करने के लिये प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए डाॅ मनमोहन सिंह ने औपचारिक तौर पर यह एलान कर दिया कि देश के तमाम संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का ही है। इसी प्रकार संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना करते हुए सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था करने के लिये विधानसभा से कानून पारित कराये जाने के मामले हों या गौ-हत्या पर लगी बंदिशों को कमजोर करने की वकालत किये जाने की बात हो। हर मामले में सीधे तौर पर अल्पसंख्यकों का दिल जीतने की सोच ही छिपी रहती है। आखिर संसदीय लोकतांत्रिक शासन प्रणालीवाले मुल्क हिदुस्तान में जहां मुसलमानों की कुल आबादी तकरीबन 14 फीसदी से भी अधिक हो और उसमें भी पांच राज्यों में 26.6 फीसदी से लेकर 92.2 फीसदी, सात राज्यों में 11.5 फीसदी से लेकर 19.3 फीसदी और आठ राज्यों में आठ से साढ़े दस फीसदी के बीच मुसलमानों की आबादी हो वहां अल्पसंख्यकवाद की राजनीति का बोलबाला दिखना स्वाभाविक ही है। दूसरी ओर दलित सरोकार की सियासी धारा के अनवरत प्रवाह की वजह भी आबादी में राष्ट्रीय स्तर पर इनकी 16 फीसदी की हिस्सेदारी ही है। साथ ही संसद और विधानसभाओं में इन्हें 15 फीसदी आरक्षण भी हासिल है। ऐसे में दलित सरोकार की सियासी धारा में डूबने-उतराने और सराबोर होने का सुख भला कौन नहीं उठाना चाहेगा। आंकड़ों की नजर से सैद्धांतिक तौर पर देखा जाये तो इन दोनों धाराओं का संगम सियासत के सर्वोच्च शिखर को भी अपने में समाहित कर लेने में पूरी तरह सक्षम है। तभी तो बहुसंख्यकवाद की राजनीतिक राह पर चलते हुए महज 32 फीसदी वोटों के दम पर केन्द्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब रहनेवाली भाजपा को पटखनी देने के लिये जितने भी समीकरण टटोले जा रहे हैं उनमें दलित-मुस्लिम धारा का संगम ही सबसे गहरा व विस्तृत दिखाई पड़ रहा है। बाकी, गैर-भाजपावाद के बिहार में सफलतापूर्वक आजमाए जा चुके बेहद मजबूत सैद्धांतिक समीकरण को अन्य सूबों में व्यावहारिक जमीन ही मयस्सर नहीं हो पा रही है जबकि कांग्रेस व वामपंथियों का जो खूंटा कभी सियासी ध्रुवीकरण का केन्द्र हुआ करता था वह मौजूदा हालातों में मजबूत कहारों के कांधे का सहारा लिये बिना खड़े हो पाने की स्थिति में भी नहीं दिख रहा है। ऐसे में ले-देकर समीकरण बचता है दलित व अल्पसंख्यक धारा के सम्मिलन का, जिसमें कागजी व सैद्धांतिक तौर पर तो सत्ता के शिखर से भाजपा को बहा ले जाने की क्षमता स्पष्ट दिख रही है। तभी तो कुछ दिनों से गौ-हत्या व दलित उत्पीड़न के मामलों का परस्पर घालमेल करके ऐसा वातावरण बनाने की चैतरफा कोशिशें जोरों पर जारी हैं जिससे भावनात्मक तौर पर दलितों व अल्पसंख्यकों को करीब लाया जा सके और इन्हें केन्द्र की भाजपानीत राजग सरकार के खिलाफ एकजुट किया जा सके। इसके लिये कभी गुजरात में दलित-मुस्लिम रैली का आयोजन हो रहा है तो कभी जेएनयू में इस सिद्धांत पर व्याख्यान कराया जा रहा है। तस्वीर ऐसी उकेरी जा रही है मानो दलितों व मुस्लिमों के बीच कोई अलगाव-टकराव हो ही ना बल्कि बहुसंख्यकों व खास तौर से सवर्णों के खिलाफ इनका सबकुछ साझा ही हो। लेकिन सियासी समीकरण साधने के लिये इन दोनों धाराओं का संगम कराने का प्रयास कर रही ताकतों ने अव्वल तो 16 फीसदी आबादीवाले अनुसूचित जातियों के उस समूह को एकजुट दलित समझ लिया है जिनके बीच व्यावहारिक धरातर पर कई स्तरों पर परस्पर कट्टर छूआछूत का माहौल आज भी स्पष्ट देखा जा सकता है और दूसरे सामाजिक स्तर पर होनेवाले सांप्रदायिक टकराव के उन वास्तविक किरदारों की भी अनदेखी की जा रही है जिनके बीच कागजी तौर पर ही मजबूत एकजुटता की कल्पना संभव है वर्ना हकीकत में तो आपसी खून-खराबे का इनका लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में सवर्णों से बिदका हुआ वर्ग भले ही कागजी तौर पर अल्पसंख्यकों के साथ जुड़ने के लिये तैयार दिख रहा हो लेकिन इनके बीच सांप्रदायिक स्तर पर जुड़ाव का कोई साझा आधार तैयार हो पाने की तो उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। यानि अव्वल तो तमाम अनुसूचित जातियों का दलित मंच पर एकजुट हो पाना ही नामुमकिन की हद तक मुश्किल है और दूसरे तमाम दलितों को हर गली-कूचे व कस्बे-मोहल्ले में उन मुस्लिमों के साथ एकजुट करना भी नामुमकिन सरीखा ही है जिनके बीच तमाम सांप्रदायिक दंगों व हिंसक टकरावों में स्थानीय स्तर पर परस्पर घर-द्वार जलाने-उजाड़ने, माल-असबाब से लेकर आबरू-इज्जत लूटने-छीनने और एक-दूसरे के सखा-संतानों को मारने-काटने व अपंग-अपाहिज बनाने का इतिहास सदियों से लिखा जा रहा है। यहां तक कि तमाम कोशिशों व जद्दोजहद के बाद अगर इन दोनों धाराओं को समेट-बटोरकर न्यूनतम साझा सरोकारों के आधार पर इनका संगम करा भी दिया जाता है तो विरोधी पक्ष की ओर से फेंकी गयी संप्रदायवाद की जलती हुई तीली की मामूली सी चिंगारी भी इन्हें ऐन मौके पर परस्पर इतनी दूर लाकर खड़ा कर सकती है जिसके बारे में कल्पना करने से भी सिहरन पैदा हो जाती है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर दलित-मुस्लिम धारा का संगम कराने के सियासी प्रयासों पर तो यही कहा जा सकता है कि ‘हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन, दिल बहलाने के लिये गालिब ये खयाल अच्छा है।’ @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

सोमवार, 22 अगस्त 2016

चीन की चतुराई से बचने में भलाई

चीन की चतुराई से बचने में भलाई


चीन वाकई बेहद चतुर-चालाक ही नहीं बल्कि कुटिल भी है। साथ ही हर चतुर-चालाक की तरह वह भी दूसरों को बेवकूफ ही समझता है। लेकिन भारत को बेवकूफ समझने की गलती अब उसे बेहद महंगी पड़ती दिख रही है। तभी तो भारत के साथ संबंधों को संभालने और संवारने के लिए उसने अपनी कोशिशें तेज कर दी हैं। इसी सिलसिले में उसने औपचारिक तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर मसले पर भारत-पाक के बीच जारी विवाद में हस्तक्षेप करने या किसी एक के पक्ष-विपक्ष में खड़े होने का उसका कोई इरादा नहीं है। साथ ही चीनी विदेशमंत्री वांग यी ने अपनी हालिया दिल्ली यात्रा के दौरान परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता के मसले पर भविष्य में नरमी बरते जाने का संकेत देने में भी कोई कोताही नहीं बरती है। यानि भारत के साथ विश्वास बहाली के लिये चीन ने कूटनीतिक कवायदें काफी तेज कर दी हैं। लेकिन मसला है इमानदारी का है जिससे दूर-दूर तक चीन का कभी कोई नाता रहा ही नहीं है। उसके लिए सर्वोपरि है अपना हित। इसके लिए वह कभी भी झुक सकता है, और तन सकता है। उसने भारत की तरफ नए सिरे से दोस्ती का हाथ बढ़ाने की जो पहल की है वह भी उसकी इसी कूटनीति का हिस्सा है। लेकिन मसला है भरोसे का। हालांकि विदेशनीति में भरोसा नाम की कोई चीज होती नहीं है। लेकिन दीर्घकालिक ना सही, तात्कालिक भरोसा तो करना ही पड़ता है। इस लिहाज से भी देखें तो चीन कतई भरोसे के काबिल नहीं है। अभी हाल ही में एनएसजी की सदस्यता के मामले में उसने जिस तरह से भारतीय हितों पर कुठाराघात किया है उसे भुलाया नहीं जा सकता। साथ ही उसकी ललचाई नजरें हमारे पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर उत्तराखंड तक लगातार मंडराती रहती हैं। यहां तक कि गुलाम कश्मीर के काफी बड़े हिस्से पर उसका ही कब्जा है। इसके अलावा पाकिस्तान के साथ समझौता करके वह समुद्री सीमा पर भी हमारे खिलाफ साजिशें रच रहा है। उसे न तो हमारे सामरिक हितों की परवाह है, ना राष्ट्रीय हितों की, ना सामाजिक हितों की और ना आर्थिक हितों की। हमारे बाजार को उसने नकली और सस्ते सामानों का डंपिंग ग्राउंड बना कर रख दिया है। ऐसे में जरूरत है चीन के प्रति एक ठोस और कठोर नीति अमल में लाने की। आज उसकी बिलबिलाहट सिर्फ इस बात को लेकर है कि दक्षिण चीन सागर में भारत के हस्तक्षेप ने उसके हितों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। वास्तव में दक्षिण चीन सागर पर उसके कब्जे को विश्व बिरादरी ने भी नकार दिया है और अवैध माना है। कायदे से देखें तो दक्षिण चीन सागर 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ ऐसा विस्तृत अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्र है जो सिंगापुर से लेकर ताइवान सहित विभिन्न देशों को छूता है। इतने बड़े जलमार्ग पर अकेले चीन का कब्जा आखिर किसी को कैसे मंजूर हो सकता है। उस पर तुर्रा यह कि दक्षिण चीन सागर में स्थित जिन नौ तेल के कुओं की वह नीलामी करने में जुटा है उसमें से दो ऐसे हैं जिस पर ताइवान के साथ भारत का समझौता पहले ही हो चुका है। लिहाजा अमेरिका की अगुवाई में वहां हुए युद्धाभ्यास में भारत की शिरकत स्वाभाविक ही थी जिससे चीन बुरी तरह भन्नाया हुआ है।  दरअसल कहां तो उसने पाकिस्तान और उत्तर कोरिया से लेकर खाड़ी व अफ्रीकी देशों तक को अपने पाले में करके विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति बनने का सपना देखा था। लेकिन अब हर मोर्चे पर भारत उसके सपनों के आड़े आने लगा है। एक तरफ भारत ने नए सिरे से उस गुलाम कश्मीर पर अपना दावा प्रस्तुत कर दिया है जहां चीन का भी कब्जा है और दूसरी तरफ अमेरिका और खाड़ी देशों से लेकर ताइवान, सिंगापुर और जापान तक के साथ प्रगाढ़ मित्रता की शुरुआत कर दी है। नतीजन विश्व बिरादरी में चीन बुरी तरह अलग-थलग पड़ता जा रहा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि वह भारत को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेगा। हालांकि भारत को भी चीन के साथ मित्रता की उतनी ही आवश्यकता है जितनी किसी अन्य पड़ोसी देश के साथ। लेकिन सवाल है कि आखिर यह मित्रता किस कीमत पर होगी। एक तरफ वह सरहद पर उत्पात मचाता रहे, गुलाम कश्मीर में दखल बरकरार रखे, पाकिस्तान को हर मुमकिन मदद मुहैया कराए, हमारे पड़ोसी मित्रों को हमसे तोड़ने की कोशिशों में जुटा रहे और दूसरी तरफ हमसे मित्रता की उम्मीद भी रखे। ऐसा कैसे संभव हो सकता है? लिहाजा आवश्यकता है कि पहले सामरिक हितों को सुरक्षित करने की दिशा में कदम उठाया जाए और द्विपक्षीय विवाद के कांटों को जड़ से उखाड़ने की पहल की जाये। इसके लिए चीन को सख्त लहजे में बताना होगा कि सरहद पर शांति रहेगी तो ही आपसी संबंधों में विश्वास बहाली संभव है। वरना वह अपने रास्ते और हम अपने रास्ते। इस सख्ती को दर्शाए बिना अगर चीन के साथ मित्रता की नई इबारत लिखने की कोशिश की गई तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा। भारत के साथ मित्रता के लिए चीन को पहले सही राह पकड़नी होगी और आत्मानुशासन की अहमियत को समझना होगा। वैसे भी चीन सरीखे मतलबी मुल्क के साथ कोई भी राब्ता कायम करने से पहले सौ बार सोचने की जरूरत है क्योंकि उसके इतिहास और उसकी फितरत को देखते हुए तो उस पर कतई भरोसा नहीं किया जा सकता। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर #NavkantThakur

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

जहां सुमति तहां संपति नाना....

जहां सुमति तहां संपति नाना....


गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लिखा है कि ‘सुमति कुमति सबके उर रहहीं, नाथ पुरान निगम अस कहहीं, जहां सुमति तहां संपति नाना, जहां कुमति तहां विपति निदाना।’ वाकई सुमति और कुमति तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन अगर कुमति हावी हो जाये तो बनता हुआ काम भी बिगड़ जाता है जबकि सुमति के सहारे बिगड़े हुए काम को भी आसानी से सफल किया जा सकता है। तभी तो जब तक देशहित पर दलगत राजनीति हावी रही तब तक संसद से लेकर सड़क तक बवाल कटता रहा। लेकिन सुमति का साम्राज्य स्थापित होते ही गाड़ी पटरी पर लौट आई। भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से निर्विरोध फैसले लेने की ऐसी ताकत का मुजाहिरा किया कि समूचा विश्व चमत्कृत हो उठा। अमेरिका सरीखे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को भी औपचारिक तौर पर इसकी सराहना करनी पड़ी। हालांकि अमेरिका ने तो सिर्फ जीएसटी के सर्वसम्मति से पारित होने पर ही भारत की सराहना की है जबकि हकीकत तो यह है कि इस मानसून सत्र में भारतीय संसद ने उन तमाम मसलों पर एकमतता व सर्वसम्मति का मुजाहिरा किया है जिसके बारे में माना जा रहा था कि जब भी ये मसले सदन में उठेंगे तो सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच भारी तकरार व टकराव का माहौल दिखेगा। लेकिन देश के तमाम राजनीतिक दलों ने एक बार फिर दुनियां को यह बता दिया है कि मिल बैठकर, एक दूसरे की बात समझ कर और सच को स्वीकार करके साथ मिलकर आगे बढ़ने का नाम ही लोकतंत्र है। हालांकि लोकतंत्र में विचार-प्रचार और संवाद-विवाद की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। लेकिन सच यही है कि व्यवस्था सिर्फ सत्ता से नहीं चलती। व्यवस्था चलती है सर्वसम्मति से, सबको साथ लेकर। किसी भी मामले में सर्वसम्मति बनाकर ही आगे बढ़ने के सिद्धांत को इस दफा सरकार ने भी व्यावहारिक तौर पर अपनाया और इसमें विपक्ष ने भी पूरा सहयोग किया। इसीका नतीजा रहा कि लोकसभा में तकरीबन 110 फीसदी काम हुआ जबकि राज्यसभा में भी लगभग 99 फीसदी कार्य पूरा हुआ। सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष के बीच स्वस्थ तालमेल का ही नतीजा रहा कि लोकसभा से 15 बिल पारित हुए जबकि राज्यसभा से पारित होने वाले विधेयकों की संख्या 14 रही। इसके अलावा चर्चाएं भी हुई और ध्यानाकर्षण प्रस्तावों पर भी बहस हुई। महंगाई पर चर्चा हुई, दलित उत्पीड़न पर चर्चा हुई और जम्मू कश्मीर की मौजूदा स्थिति को लेकर भी चर्चा हुई। हर मसले पर आम सहमति का माहौल ही नहीं बना बल्कि सर्वसम्मति से प्रस्ताव भी पारित किया गया। चर्चा के नाम पर खर्चा-पानी लेकर चढ़-बैठने से विपक्ष ने भी परहेज बरता और सत्तापक्ष की ओर से भी हेकड़ी या मनमानी का मुजाहिरा नहीं किया गया। नतीजन पिछले कई सालों से जो संसद जंग का मैदान बनी हुई थी वह इस दफा सर्वसम्मति के माहौल में सुचारु तरीके से अपने काम को अंजाम देती हुई दिखी। जिस जीएसटी विधेयक को लेकर पिछले एक दशक से वैचारिक व सैद्धांतिक टकराव चल रहा था वह संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पारित हुआ और इसके विरोध में एक भी वोट नहीं पड़ा। यहां तक कि दलितों पर हो रहे अत्याचार के मामले को लेकर हुई चर्चा के बारे में भी संभावित टकराव को लेकर जितने भी कयास लगाए जा रहे थे वे सभी गलत साबित हुए और ना सिर्फ इस पर संसद में स्वस्थ चर्चा हुई बल्कि सर्वसम्मति के साथ प्रस्ताव पारित करके सदन ने बेहद सख्त लहजे में सभी सूबों को स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि दलितों की रक्षा और सुरक्षा से कतई समझौता नहीं किया जाना चाहिये। सर्वसम्मति का ऐसा ही माहौल महंगाई पर हुई चर्चा के दौरान भी दिखा। सरकार ने स्वीकार किया कि दाल सहित कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि अवश्य हुई है लेकिन इसे थामने के लिए वह प्रयत्नशील है। सरकार के आश्वासन पर विपक्ष ने भी भरोसा जताया और इस मामले में भी संसद में पूरी आम सहमति का माहौल देखा गया। इसी प्रकार जम्मू कश्मीर के मौजूदा हालातों को लेकर हुई चर्चा में भी पूरी तरह आम सहमति देखी गई और सहमति भी ऐसी कि घरेलू राजनीति में एक दूसरे के कट्टर विरोधी माने जानेवाले सपा के रामगोपाल यादव ने जब पाकिस्तान से सिर्फ गुलाम कश्मीर के मसले पर ही वार्ता किये जाने की बात कही तो राजनीतिक पंडितों ने यहां तक कह दिया कि सपा ने भाजपा की लाइन पकड़ ली है। लेकिन सच तो यह है कि किसी ने किसी की लाइन नहीं पकड़ी है। सबकी अपनी-अपनी लाइन है और किसी की भी लाइन देश के हितों के खिलाफ नहीं हो सकती। यानि बात जब देश की आती है तो भारतीयता की भावना कितनी प्रबल हो जाती है यही दिखाया है हमारी संसद ने और हमारे सांसदों ने। वैसे भी बात जब देश के आन, बान, शान, विकास, सुरक्षा व अखंडता की हो तब अपेक्षित है कि संसद से ऐसा ही सुर निकले जैसा मौजूदा सत्र में निकला है। लिहाजा संसद में इस तरह के माहौल की खुले दिल से सराहना करने में कतई कोताही नहीं बरती जानी चाहिए और आगे भी प्रयत्नशील रहना चाहिए कि संसद देश के विकास में रोड़े अटकाती हुई ना दिखे बल्कि विकास में अपना योगदान करती हुई दिखे। वैसे भी घरेलू राजनीति अपनी जगह है, सत्ता की खींचतान और सैद्धांतिक विरोधाभास अपनी जगह। लेकिन इसे देशहित पर हावी होने की इजाजत तो कतई नहीं दी जा सकती। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

सोमवार, 18 जुलाई 2016

‘मेहनत किसी और की मुनाफा किसी और का’

‘मेहनत किसी और की मुनाफा किसी और का’


सैद्धांतिक तौर पर भले ही यह न्यायोचित ना हो लेकिन व्यावहारिक तौर पर अक्सर ऐसा ही होता है कि मेहनत करे कोई और मुनाफा कूटे कोई और। जीवन का शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र हो जहां मेहनत करनेवाले को मजदूरी के अलावा मुनाफा भी नसीब होता हो। वर्ना आर्थिक तौर पर यह होता है कि खून-पसीना एक करके फसल उगानेवाले किसान को लागत की वसूली के भी लाले पड़े रहते हैं जबकि बाजार के बिचैलियों की तिजोरी में हमेशा मुनाफे की बहार ही दिखती है। सामाजिक तौर पर भी मां का दूध व बाप का खून पीकर जवान होनेवाले फलदार पौधे को कंद-मूल सहित स्वजातीय गैर-गोत्रीय को दान कर दिये जाने की ही परंपरा है। धार्मिक परंपरा में भी यजमान की पूरे साल की कमाई का मोटा हिस्सा कर्मकांड, धार्मिक आयोजनों व दान-दक्षिणा के नाम पर पंडे-पुरोहितों की ही भेंट चढ़ जाता है। यहां तक कि राजनीति में भी अक्सर यही देखा जाता है कि मेहनत किसी और की रहती है जबकि मुनाफा किसी अन्य के हिस्से में चला जाता है। यह सिर्फ अंदरूनी तौर पर सियासी संगठनों के भीतर ही नहीं होता बल्कि बहुदलीय चुनावी प्रतिस्पर्धा में भी अक्सर ऐसा ही होता है। तभी तो उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में बहनजी की सरकार को जनता की अदालत के कठघरे में खड़ा करने का काम तो सपा के अलावा भाजपा व कांग्रेस ने भी पूरी शिद्दत के साथ किया था लेकिन जब चुनावी नतीजा आया तो सत्ता के मुनाफे की मलाई में ना तो हाथ डल सका और ना ही फूल। पूरे मुनाफे से लकदक हो गयी वह सायकिल जिसके तमाम कल-पुर्जों के बीच अब तक पूरा तालमेल नहीं बन पाने के कारण बकौल अखिलेश यादव कभी यह पांच सूबेदारों की सरकार कही जाती है तो कभी साढ़े तीन मुख्यमंत्रियों की। इस बार भी यूपी की राजनीति में औरों की मेहनत का मुनाफा किसी और के खाते में जाने के आसार ही प्रबल दिख रहे हैं। हालांकि मेहनत तो सभी जी-जान से कर रहे हैं और चैथे पायदान पर खड़ी बतायी जा रही कांग्रेस ने भी जिस तरह से चुनावी समर में जोरदार शंखनाद किया है उसके मद्देनजर वह भी अपनी संभावनाएं कतई समाप्त नहीं मान रही है। लेकिन अब तक सामने आए समीकरणों की पड़ताल करने से जो तस्वीर उभर रही है उसमें ना सिर्फ कांग्रेस की मेहनत का फायदा भी सपा को ही मिलने की संभावना दिख रही है बल्कि बसपा व भाजपा के बीच भी एक-दूसरे की फसल पर कब्जा जमाने की लड़ाई ही छिड़ी नजर आ रही है। वास्तव में देखा जाये तो भले ही अब तक बहुकोणीय मुकाबले में सपा की सायकिल सबसे तेज गति से आगे बढ़ती दिख रही हो लेकिन भाजपा के कमल की सुगंध भी काफी तेजी से फैलती दिख रही थी और बसपा का हाथी भी अटकते-भटकते व लड़खड़ाते हुए अपनी लय में आने की कोशिशों में जुटा नजर आ रहा था। यानि तस्वीर ऐसी बन रही थी कि बसपा व भाजपा की जी-तोड़ मेहनत का एकमुश्त मुनाफा इन दोनों में से किसी एक के खाते में आनेवाला था जो सपा को सीधी टक्कर देकर आगे निकल सकता था। लेकिन अब कांग्रेस ने जो कूटनीति आजमाई है उससे समाजवादी खेमे में अगर आशाओं का नया संचार होता दिख रहा है तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता है। वास्तव में देखा जाये शीला दीक्षित का चेहरा और राज बब्बर की ऊर्जा को आगे करके कांग्रेस ने उन सपा विरोधी वोटों में बड़ी सेंध लगाने के लिये कमर कस ली है जिसे पूरी तरह अपने पक्ष में एकजुट करने के लिये बसपा व भाजपा ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ है। अब अगर विकास व सुशासन के एजेंडे पर भी चुनाव होता है तो अखिलेश का विकल्प तलाशनेवालों की जमात मायावती के अलावा शीला सरीखे ऐसे सख्त व सफल प्रशासक के बीच अवश्य विभाजित होगी जिन्होंने पंद्रह साल के शासनकाल में दिल्ली का कायापलट करके रख दिया। इसी प्रकार अगर चुनाव में जातीय लहर हावी हुई तो सूबे के जिस ब्राह्मण मतदाताओं के समर्थन से पहले बहनजी ने सोशल इंजीनियरिंग की क्रांति की थी और बाद में सपा भी दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब तक पहुंची थी उस वोटबैंक को अगर दशकों बाद अपने समाज का मुख्यमंत्री चुनने का विकल्प मिल रहा है तो स्वाभाविक तौर पर उसकी संवेदना व सद्भावना कांग्रेस से ही जुड़ेगी और ऐसे में ब्राह्मण मतदाताओं की काफी बड़ी जमात अगर कांग्रेस की झोली में अपना वोट डाल दे तो इसे कतई अस्वाभाविक नहीं माना जाएगा। साथ ही सूबे के उन अल्पसंख्यकों को भी गुलामनबी आजाद, राज बब्बर व इमरान मसूद की तिकड़ी कांग्रेस के पक्ष में लाने की पूरी क्षमता रखती है जो सपा से बिदकने के बाद विकल्प की तलाश में हैं। यानि समग्रता में देखें तो सतही तौर पर कांग्रेस की पूरी मेहनत अपने खोये जनाधार को दोबारा हासिल करने और अपने वजूद को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की दिशा में नजर आ रही हो लेकिन इसकी उसे कितनी मजदूरी मिल पाएगी इसके बारे में अभी से ठोस अंदाजा लगा पाना तो बेहद मुश्किल है। लेकिन सत्ताविरोधी वोटों को छिन्न-भिन्न करते हुए इसके काफी बड़े हिस्से पर अपना कब्जा जमाने के लिये की जा रही कांग्रेस की पूरी कसरत का असली मुनाफा सीधे तौर पर सपा को मिलने की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’    @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

मंत्रिमंडल विस्तार ने दिया विवादों को आधार

मंत्रिमंडल विस्तार ने दिया विवादों को आधार

शायद विवाद नरेन्द्र मोदी की नियति के साथ जुड़ा हुआ है। सच कहें तो विवादों ने ही मोदी को मोदी बनाया है। उनके साथ जुड़े विवाद ना हुए होते तो मोदी भी वह मोदी नहीं बन पाते जो वे आज दिख रहे हैं। वैसे भी जिसका सोना-जागना, खाना-पीना और कहीं आना-जाना भी विवादों का सबब बन जाता हो उसकी सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार कैसे विवादों से अछूता रह सकता था। तभी तो विवादों की परछाईं ने इस दफा भी मोदी सरकार का साथ नहीं छोड़ा है। विवाद संगठन में भी दिख रहा है, सरकार में भी और सहयोगियों के बीच भी। सहयोगियों की बात करें तो इस मंत्रिमंडल विस्तार के साथ जुड़ी हुई शिवसेना की तमाम उम्मीदें सिरे से ध्वस्त हो गयीं। उसे पूछा तक नहीं गया। यहां तक कि उसे विस्तार की योजना के बारे में बताना भी मुनासिब नहीं समझा गया। जाहिर है कि अक्खड़ व बेलौस सियासी मिजाजवाली शिवसेना को मोदी सरकार का यह व्यवहार नागवार गुजरना ही था। तभी तो शिवसेना ने ना सिर्फ मंत्रिमंडल विस्तार के आयोजन में शिरकत करने से परहेज बरत लिया बल्कि उसने औपचारिक तौर पर यह धमकी देने से भी गुरेज नहीं किया है कि भाजपा के इस व्यवहार का बदला अवश्य लिया जाएगा और मुम्बई नगर निगम व महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनावों में उसकी जमकर खबर ली जाएगी। खैर, शिवसेना अकेली ऐसी सहयोगी नहीं है जिसके साथ ऐसा व्यवहार हुआ है बल्कि मंत्रिमंडल विस्तार के बारे में पूछा तो उस अपना दल से भी नहीं गया जिसके कोटे से अनुप्रिया पटेल को सरकार में शामिल कर लिया गया है। जाहिर है कि सरकार का यह व्यवहार अपना दल से जुड़े नेताओं को तो नागवार गुजरना ही था। वह भी तब जबकि पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने के कारण काफी पहले ही औपचारिक तौर पर अनुप्रिया को अपना दल से बाहर निकाला जा चुका है। ऐसे में अगर अपना दल की भावनाओं के प्रति बेपरवाही दिखाते हुए अनुप्रिया को सरकार में शामिल करने का फैसला हुआ है तो स्वाभाविक तौर पर इस पहलकदमी से विवाद तो होना ही है। खैर, विवादों की श्रृंखला अगर गठबंधन के सदस्यों तक ही सीमित रहती तो गनीमत थी, लेकिन इस दफा तो मोदी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार ने भाजपा संगठन व सरकार से जुड़े लोगों की भावनाओं को भी बुरी तरह आहत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हालांकि मंत्रिमंडल विस्तार का विशेषाधिकार प्रधानमंत्री के हाथों में ही सिमटे होने के कारण उनके फैसलों पर सीधे तौर पर उंगली उठाने की पहल तो नहीं हुई है लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि संगठन व सरकार में किसी को कोई तकलीफ या परेशानी नहीं हो रही है। मामला सिर्फ यह है कि दर्द की इंतहा तो दिख रही है लेकिन कराह को होठों तक आने या आंखों से छलकने की इजाजत नहीं दी जा रही है। वर्ना पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव रहते हुए अपने प्रभारवाले राज्यों में मनमाने तरीके से टिकट बांटने, संगठन के बजाय अपने हितों को ही पहली प्राथमिकता देने, दिल्ली में पार्टी की हार सुनिश्चित करने, मुख्यमंत्री पद की दावेदारी छोड़ने के एवज में राज्यसभा का टिकट मांगने, संगठन में गुटबाजी को बढ़ावा देने और पार्टी लाइन से अलग हटकर सस्ता प्रचार पाने के लिये अक्सर सियासी ड्रामेबाजी करने के आरोपी को अप्रत्याशित तरीके से मंत्री पद से नवाजे जाने के बाद पार्टी के उन तमाम वरिष्ठ व कनिष्ठ नेताओं की भावनाएं आहत होना स्वाभाविक ही है जिन्होंने पार्टी के लिये अपना सर्वस्व समर्पित करने में कभी कोताही नहीं बरती हो। तभी तो ऐसे विवादास्पद नेता को मंत्री बनाये जाने को जायज ठहराने की दलील पार्टी के किसी नेता की जुबान से नहीं निकल रही है। साथ ही इस बार के विस्तार में उन दो नामों को खास तौर से शामिल किये जाने को लेकर भी पार्टी के शीर्ष रणनीतिकारों की चैकड़ी के एक सदस्य को भारी तकलीफ पहुंचना स्वाभाविक है जो उन्हें फूटी आंख नहीं भाते हैं और उन दोनों के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी ने इस विस्तार के बहाने अपने उस वरिष्ठ केबिनेट सहयोगी की भावनाओं को आहत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है जिसे अब तक खून के आंसू रूलाने की कोशिश करनेवाले सुब्रमण्यम स्वामी को कभी औपचारिक तौर चेतावनी देना भी जरूरी नहीं समझा गया। लिहाजा इस मंत्रिमंडल विस्तार से उस विवादित मान्यता को मजबूती मिलना स्वाभाविक ही है जिसके तहत कहा जाता है कि स्वामी द्वारा जो कुछ भी किया जा रहा है वह अंदरखाने मोदी व अमित शाह की शह पर ही हो रहा है। इसी प्रकार विवाद इस बात भी पनपा है कि आखिर जिन मंत्रियों का कामकाज औसत से भी निचले दर्जे का रहा है उनका दूसरे विभागों में तबादला करने के बजाय उनकी जगह नयी नियुक्ति क्यों नहीं की गयी। साथ ही 75 वर्ष की आयु को आधार बनाकर मध्यप्रदेश सरकार की चलती हुई बस से उतारे गये बाबूलाल गौर व सरताज सिंह ने भी कलराज मिश्रा व नजमा हेप्तुल्लाह सरीखे बुजुर्गों को मंत्रिमंडल से नहीं हटाये जाने को निराशाजनक बताकर नये विवाद को जन्म दे दिया है। बहरहाल, बेशक हर नये विवाद ने मोदी की छवि को निखारने व चमकाने का ही काम किया हो लेकिन विवादों की दोधारी तलवार के साथ खिलवाड़ की आदत दूरगामी तौर पर नकारात्मक नतीजों का सबब भी बन सकती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

'होगा वही जो मंजूरे मुलायम होगा....... इति सिद्धम'

‘सौ सुनार की एक लुहार की’   


यूपी की राजनीति पर गौर करें तो महज एक पखवाड़े के भीतर ही तमाम स्थापित समीकरणों में जो नाटकीय परिवर्तन दिख रहा है वह वाकई बेहद दिलचस्प है। सूबे की सियासत ने इस तेजी से करवट ली है कि ना सिर्फ भाजपा को अपनी राह बदलने के लिये मजबूर होना पड़ा है बल्कि कांग्रेस को भी तुरूप के उस अंतिम इक्के को दांव पर लगाने के लिये मजबूर होना पड़ा है जिसकी विफलता के बाद पार्टी के पास कुछ नहीं बचेगा। इसके अलावा सत्तारूढ़ सपा की बात करें तो इस खेमे में भी कल तक जिनकी तूती बोलती थी वे आज लाख कोशिशों के बावजूद भी अपनी हताशा, निराशा व बौखलाहट नहीं छिपा पा रहे हैं। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो सूबे का पूरा सियासी समीकरण ही शीर्षासन की अवस्था में आ गया है। क्या सपा, क्या भाजपा, क्या बसपा और क्या कांग्रेस। हर खेमा हतप्रभ है, हर तरफ कसमसाहट है। लेकिन इस सबका जो सूत्रधार है वह शांत है, खामोश है। वह तो यह स्वीकार करने के लिये भी तैयार नहीं है कि उसने एक झटके में वह कर दिखाया है जो पिछले साढ़े चार साल से नहीं हो सका। यानि साढ़े चार साल से चल रही सियासी सुनारों की अनवरत ठुकठुकी पर लुहारी हथौड़े की ऐसी चोट पड़ी है जिसने बड़ी जतन व मेहनत से गढ़े गये तमाम समीकरणों को एक झटके में ही पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर के रख दिया है। तमाम स्थापित समीकरणों की शक्ल ही बदल गयी है, पहचानने लायक भी कुछ नहीं बचा है। साढ़े चार साल की अनवरत मेहनत से यह मान्यता स्थापित की गयी थी कि सूबे की सरकार का पूरा नियंत्रण शिवपाल यादव और आजम खान के हाथों में है जबकि अखिलेश यादव महज मुखौटे की भूमिका में हैं और मुलायम सिंह यादव नेपथ्य में जा चुके हैं। लेकिन यह पूरा समीकरण एक झटके में इस कदर उलट-पुलट हो गया है कि शिवपाल को मंच पर अगली पांत में बैठने के लिये भी मनाना पड़ रहा है जबकि आजम कब अपना आपा खोकर आंय-बांय बोलने लग जाएं इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। अब तो नमाजियों पर भी भड़क जाते हैं। उन्हें इफ्तारी का कायदा सिखाने लगते हैं। दूसरी ओर अखिलेश को भी अब मुखौटा नहीं कहा जा सकता है बल्कि अब वे संगठन व सरकार के ऐसे सशक्त संचालनकर्ता बन कर सामने आये हैं जो कमियों व खामियों को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता, भले ही वे गलतियां उनके पिता को विश्वास में लेकर ही क्यों ना अंजाम दी गयी हों। साथ ही मुलायम एक बार फिर सपा के सिरमौर की छवि को मजबूत करते हुए ऐसे महानायक के तौर पर सामने आ गये हैं जिनकी मर्जी के बिना संगठन व सरकार में कोई पत्ता भी नहीं खड़क सकता। अब ना तो अखिलेश पर जंगलराज व गुंडाराज को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जा सकता है और ना ही सूबे की सरकार पर यादव परिवार के हावी होने की दुहाई दी जा सकती है। यानि एक झटके में ही संगठन व सरकार की छवि का ऐसा काया कल्प हो गया है जिसकी कल तक सपने में भी कोई कल्पना नहीं कर सकता था। यह सब किया है मुलायम के उस लुहारी दांव ने जिसकी कोई काट ही नहीं है। और इसके लिये नेताजी ने ना तो पाताल तोड़ा और ना ही आसमान नोंचा। उन्होंने किया सिर्फ यह कि अंसारी बंधुओं के संगठन में सम्मिलन का प्रस्ताव खारिज कर दिया, अमर सिंह को दिल के साथ ही दल में भी जगह देते हुए संसद के उच्च सदन में दाखिल करा दिया और बलराम सिंह यादव की महज पांच दिनों के भीतर ही सरकार में वापसी करा दी। इन तीन फैसलों ने पूरे परिवेश को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। सपा में अमर की आमद के साथ ही आजम का अस्तित्व खुदमुख्तार से बदलकर पैरोकार का भी नहीं बचा। अंसारी की अगवानी कर रहे शिवपाल की संगठन व सरकार की सर्वेसर्वा की स्वीकार्यता समाप्त हो गयी जबकि इससे अखिलेश को मुखौटे की छवि से उबरकर सत्य व शुचिता को सर्वोपरि माननेवाले सशक्त नेतृत्वकर्ता के तौर पर उभरने में कामयाबी मिल गयी। साथ ही गुंडाराज को बढ़ावा देने का आरोप भी धुल गया और परिवार के दबाव में फैसले लेने की बात भी सिरे से समाप्त हो गयी। लगे हाथों बलराम की पद-प्रतिष्ठा बहाली से यह भी प्रमाणित हो गया कि संगठन व सरकार में किसी की मनमानी नहीं चल सकती, अखिलेश की भी नहीं। अलबत्ता होगा वही जो मंजूरे मुलायम होगा। इति सिद्धम। अब इस बदले माहौल में बदलना तो सबको पड़ेगा। तभी तो कल तक प्रशांत किशोर की मांग के बावजूद प्रियंका को यूपी में आगे करने की बात सुनना भी गवारा नहीं करनेवाले गांधी परिवार को अब अपनी तूणीर के इस आखिरी वाण को भी आजमाने के लिये मजबूर होना पड़ा है और भाजपा को छठी के दूध की तरह समान नागरिक संहिता व अयोध्या सरीखे उन भूले-बिसरे मसलों को भी आगे करने पर विवश होना पड़ा है जिसे हालिया दिनों तक राष्ट्रीय कार्यकारिणी में औपचारिकता के नाते भी याद नहीं किया जा रहा था। खैर, तीन फटाफट फैसलों के एक दांव से ही सिरदर्दी का सबब बने तमाम समीकरणों को सिरे से ध्वस्त कर देनेवाले मुलायम को यह तो स्वीकार करना ही होगा कि उन्होंने दुरूस्त काम करने में कुछ देरी अवश्य कर दी है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

बुधवार, 29 जून 2016

कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगे.....

कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगे.....   


‘कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगे, मेरे ही लोग मुझे संगसार करने लगे, कोई इशारा दिलासा न कोई वादा मगर, जब आई शाम मेरा इंतजार करने लगे।’ कायदे से देखें तो वसीम बरेलवी की यह गजल इन दिनों स्वामी प्रसाद मौर्य की वास्तविक हालत को बयान करती हुई महसूस होती है। वाकई इनके बारे में कही-सुनी बहुत सी बातें अफवाहों व अटकलों की शक्ल में सियासी महफिलों में तैरती फिरती हैं। लेकिन ना तो इन्होंने अब तक खुलकर कुछ कहा है और ना ही इनके लिये किसी ने अपना दरवाजा बंद किया है। अलबत्ता भले ही इन्होंने किसी से कोई वादा ना किया हो लेकिन इनके इंतजार में सभी पलक पांवड़े बिछाए दिख रहे हैं। सतही तौर पर देखने से तो यही लगता है कि बसपा छोड़ने के बाद मौर्य के सामने विकल्पों का पूरा आसमान अपनी बांहें फैलाए खड़ा है। ये जिधर का भी रूख करें इनके लिये उधर ही तोरणद्वार व  वंदनवार सजाये जाने की पूरी तैयारी है। हर कोई लालायित है इन्हें गले लगाने के लिये। इनके इंतजार में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी पलकें बिछाये खड़े हैं और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी इनकी राहों में बांहें फैलाये हुए हैं। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो हर रास्ता इनके ही इंतजार में दिख रहा है। अब इन्हें ही तय करना है कि किधर जाना है। लिहाजा विकल्पों की बहुलता के कारण कायदे से तो इनका अगला कदम बेहद आसान होना चाहिये था। लेकिन गहराई से देखें तो पूरा माहौल उतना खुशनुमा कतई नहीं है जितना सतह पर दिख रहा है। बल्कि हकीकत तो यह है कि विकल्पों की बहुलता ने ही इनकी राहें बुरी तरह दुश्वार कर दी हैं। तभी तो इन्होंने सबसे पहला काम किया विकल्पों को सीमित करने का। इसी क्रम में सबसे पहले इन्होंने सपा की ओर जानेवाले रास्ते का दरवाजा खुद ही बंद कर लिया। इन्होंने सपा से अपनी दूरी दिखाने के लिये उसपर तीखा हमला बोल दिया। कहा कि सपा के विषय में उनकी राय नहीं बदली है। वह उसे गुण्डों और माफियाओं की पार्टी ही मानते हैं और मुलायम सिंह यादव के परिवारवाद के विरोधी वे पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। शायद यह तल्खी दिखाना मौर्य की मजबूरी भी रही होगी क्योंकि जो व्यक्ति बसपा में कई वर्षों तक मायावती के बाद नम्बर दो की हैसियत में रहा हो, उसके लिए अचानक ही सपा में शामिल हो जाना अव्यावहारिक और असहजतापूर्ण हो सकता है। इस तथ्य को सपा नेता समझ नहीं सके अन्यथा वह जल्दबाजी न दिखाते। ना आजम खान आनन-फानन में मौर्य को सपा में शामिल होने का न्यौता देकर चट मंगनी और पट ब्याह कराने की कोशिश करते और ना ही मौर्य को गठजोड़ की संभावनाएं टटोलने से पहले ही अलगाव का एलान करने के लिये मजबूर होना पड़ता। खैर, जो हो गया वह बदल तो नहीं सकता। अलबत्ता उसके असर को तो भुगतना ही होगा। अब इसका नतीजा यह हुआ है कि फिलहाल सपा की ओर खुलनेवाला दरवाजा मौर्य के लिये बंद हो गया है और अपनी ओर से मौर्य ने ही उस पर सांकल चढ़ा दी है जबकि दरवाजे के दूसरी तरफ शिवपाल यादव टेक लगाकर खड़े हो गये हैं ताकि वह दरवाजा खुल ही ना सके। हालांकि इन्होंने अपनी ओर से भले ही सपा की ओर खुलनेवाले दरवाजे पर कुंडी चढ़ा दी हो लेकिन सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के साथ इनके पुराने रिश्तों की दुहाई देते हुए अखिलेश यादव ने आज भी इनके लिये रास्तों में फूल बरसाना जारी रखा हुआ है। लेकिन सवाल है कि विपक्ष के नेता पद से हटते ही सत्तापक्ष का दामन थाम लेने का मतदाताओं का जो असर पड़ेगा उससे इनकी विश्वसनीयता तो सवालों के घेरे में आ ही जाएगी। ऐसे में अब फिलहाल मौर्य के सामने अपनी अलग पार्टी बनाने के अलावा भाजपा में शामिल होने का ही विकल्प बचा है। बसपा में इनकी वापसी अब नामुमकिन है और कांग्रेस में तो फिलहाल शायद ही कोई महत्वाकांक्षी नेता शामिल होना पसंद करे। लेकिन मसला है कि अपनी अलग पार्टी बनाने के विकल्प में भी बहुत जोखिम है क्योंकि अगर जनता ने नकार दिया तो सियासत में अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। यानि सुरक्षित विकल्प तो इनके सामने अब भाजपा का ही है लेकिन मसला है कि पिछले चुनाव में बसपा से आये बाबूसिंह कुशवाहा को महज चैबीस घंटे के लिये संगठन में शामिल कराने का बेहद बुरा खामियाजा भुगत चुकी भाजपा में इस दफा मौर्य के मसले पर पहले आम सहमति तो बने। तभी तो भाजपा में दबी जुबान से मौर्य के बारे में बातें तो कई तरह की हो रही हैं लेकिन खुलकर कोई कुछ नहीं कह रहा। वैसे यदि जातीय समीकरण की बात करें तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद भी मौर्य समाज से ही आते हैं जिनकी छवि पूरी तरह बेदाग है। जबकि मायावती सरकार के कार्यकाल में स्वामी प्रसाद भी भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे थे। लिहाजा भाजपा भी इन्हें अपने संगठन में शामिल करने से पहले सौ-बार सोचेगी और उसके बाद ही कोई अंतिम फैसला लेगी। बहरहाल मौजूदा हालातों में मौर्य के बारे में अभी सिर्फ अटकलें ही लगायी जा सकती हैं। लेकिन सवाल है कि अगर अटकलों का दौर ही चलता रहा और ये समय रहते अपने लिये कोई ठौर-ठिकाना तलाशने में कामयाब नहीं हो सके तो चुनावी तपिश का मौसम इनके सियासी सफर की बड़ी रूकावट भी बन सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर #Navkant Thakur

बुधवार, 22 जून 2016

सियासी ‘साॅल्यूशन’ के लिये ‘कन्फ्यूजन’ की कूटनीति

सियासी ‘साॅल्यूशन’ के लिये ‘कन्फ्यूजन’ की कूटनीति  

वकालत के पेशे का सबसे प्रचलित पैंतरा है ‘कन्फ्यूजन’। बचाव पक्ष के वकील को जब लगने लगता है कि सबूतों व गवाहों के मकड़जाल से अपने मुवक्किल को बचा पाना मुश्किल हो सकता है और आरोपी को निर्दोष मानने के लिये जज को सहमत कर पाना संभव नहीं है तो वह अपने तर्कों व दलीलों के दम पर अदालत को कन्फ्यूज करने में ही अपनी पूरी ताकत झोंक देता है ताकि आरोपी को संदेह का लाभ दिलाया जा सके। वकीलों द्वारा अदालत में अपनाये जानेवाले इस पैंतरे का इन दिनों सियासत में भी काफी बोलबाला दिख रहा है। जिसे देखिये वही मतदाताओं को कन्फ्यूज यानि भ्रमित करने में जुटा हुआ है। खास तौर से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर तमाम पार्टियां इसी जुगत में दिख रही हैं कि विरोधी पक्ष के प्रति मतदाताओं के बीच भ्रम व संशय का माहौल बना दिया जाये। तभी तो भाजपा यह प्रचारित कर रही है कि सपा व बसपा के बीच अंदरूनी सांठगांठ है जबकि बसपा का कहना है कि सपा और भाजपा आपस में मिले हुए हैं। उधर सपा के मुताबिक चुंकि बसपा और भाजपा के बीच पहले भी गठजोड़ हो चुका है लिहाजा आगे चलकर भी वे दोनों एकसाथ आने में संकोच नहीं करेंगे जबकि कांग्रेस अभी से मानकर चल रही है कि उसे सूबे की सियासत से बाहर रखने के लिये सपा, भाजपा और बसपा के बीच अंदरखाने परस्पर सहमति बनी हुई है और इसी के नतीजे में ना तो सपा उसके साथ गठजोड़ करने के लिये सहमत हो रही है और ना ही बसपा। यानि सभी दलों का जोर यही साबित करने पर है कि कौन किसके साथ मिला हुआ है और किसकी किसके साथ अंदरूनी सांठगांठ है। जाहिर है कि यह चुनावी पैंतरा मतदाताओं को भ्रमित करने के लिये ही अपनाया जा रहा है जिसमें वास्तविक सच्चाई भले ना हो लेकिन उसका काल्पनिक भौकाल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। इन दिनों यूपी की तमाम सुर्खियां मतदाताओं को भ्रमित करनेवाली ही दिख रही हैं। मसलन कैराना के मामले को ही लें तो भाजपा के मुताबिक वहां की हालत ठीक वैसी ही है जैसी नब्बे के दशक में कश्मीर की थी। जबकि सूबे में सत्तारूढ़ सपा का कहना है कि कैराना के मामले को सियासी लाभ के लिये बेवजह ही बखेड़े का सबब बनाया जा रहा है जबकि हकीकत में वहां स्थानीय स्तर पर कोई समस्या ही नहीं है। सपा के मुताबिक वहां पूरी तरह रामराज का माहौल है जबकि भाजपा उसे जंगलराज का प्रतीक साबित करने में जुटी हुई है। अब किसकी बात में कितना दूध और किसकी दलीलों में कितना पानी मिला हुआ है यह पता करने के चक्कर में सूबे के उन मतदाताओं का मिजाज घनचक्कर होना तो लाजिमी ही है जिन्होंने कल तक कैराना का नाम भी नहीं सुना था। खैर मतदाताओं का मिजाज तो इस बात को लेकर उखड़ना भी स्वाभाविक है कि कहने को तो सपा और भाजपा दोनों ने यही प्रण किया हुआ है कि इस बार का चुनावी मुद्दा विकास व सुशासन पर ही केन्द्रित रखा जाएगा लेकिन दोनों ही ओर से सांप्रदायिक व जातिगत ध्रुवीकरण की कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। कभी एक तरफ के कुछ नेता ‘रामलला हम आएंगे, दिसंबर में मंदिर बनाएंगे’ का नारा बुलंद कर रहे हैं तो दूसरी तरफ घोषित अपराधियों को संगठन में शामिल करके अल्पसंख्यक वोटों की एकजुटता सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है। चुनाव के बाद भाजपा और बसपा के एकसाथ आने की संभावना जताकर अल्पसंख्यकों को डराने की कूटनीति आजमायी जा रही है तो इसके जवाब में अपना वजूद बचाने के लिये बहुसंख्यकों को एकजुट होने का महत्व समझाया जा रहा है। अब इस बेमानी बहस से गूंज रहे चुनावी नक्कारखाने में विकास व सुशासन की तूती कहां गुम होती जा रही है यह किसी को पता नहीं चल पा रहा है। ऐसे में चुनावी मुद्दों व वायदों के आधार पर पार्टियों को परखनेवाले मतदताओं का भ्रमित होना लाजिमी ही है। इसी प्रकार जब सूबे की सरकार कह रही है कि पिछले साल के बाढ़-सुखाड़ का पैसा उसे अब तक केन्द्र से नहीं मिला है जबकि प्रधानमंत्री सार्वजनिक सभा में आरोप लगा रहे हैं कि केन्द्र से मिलनेवाली सालाना एक लाख करोड़ की रकम प्रदेश सरकार की तिकड़मी योजनाओं में उलझकर फाइलों में ही गायब हो जा रही है तो ऐसे में मतदाताओं का भ्रमित होना तो स्वाभाविक ही है। यहां तक कि मतदाताओं को कन्फ्यूज करने की कूटनीति अपनाने में वह कांग्रेस भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है जिसके लिये इस चुनाव को अस्तित्व की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है। तभी तो कभी उसके नेता यह शगूफा छोड़ते हैं कि सूबे में राहुल के बजाय प्रियंका को आगे रखा जाएगा तो कभी यह सुर्रा छोड़ दिया जाता है कि वरूण गांधी को कांग्रेस में शामिल कराके उनकी अगुवाई में चुनाव लड़ा जा सकता है। अब इस तरह की ऊटपटांग बातें करके मतदाताओं को भ्रमित करने की कोशिशों में जुटे राजनीतिक दलों को कौन समझाए की इन हवाई बातों से अखबारों की सुर्खियां तो बटोरी जा सकती है मगर इससे वोट मिलना मुश्किल ही है। वैसे भी मतदाता मासूम भले ही हो वह मूर्ख कतई नहीं है वर्ना देश में जड़े जमा चुकी त्रिशंकु सदन की अवधारणा को अफसानों में ही अपना अस्तित्व तलाशने के विवश नहीं होना पड़ता। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर

मंगलवार, 14 जून 2016

‘दर्दे दिल का दिमाग से इलाज’

‘दर्दे दिल का दिमाग से इलाज’ 

अकेली धरती ही गोल नहीं है। गोल तो राजनीति भी है। जिस तरह सूरज किसी भी तरफ से धरती पर प्रकाश क्यों ना डाले, उसके पीछे के हिस्से में अंधेरा ही रहता है। ठीक उसी प्रकार सियासत पर भी जिधर से निगाह डाली जाये उसके दूसरी तरफ की कहानी को समझना नामुमकिन ही रहता है। एक ही निगाह और नजरिये से राजनीति को हर्गिज नहीं समझा जा सकता। विभिन्न बिखरी हुई फुटकर घटनाओं को जोड़ना पड़ता है, तमाम पहलू टटोलने पड़ते हैं। कारण व परिणामों का समीकरण समझना पड़ता है। तब कहीं जाकर सियासत की असली रामकहानी समझ में आती है। इसमें भी तमाम जद्दोजहद, मगजमारी व पातालतोड़ मेहनत के बाद भी अंदर की बात का पक्के तौर पर पता चल पाने की कोई गारंटी भी नहीं होने के कारण फुटकर तौर पर तो तमाम सियासी घटनाएं सामने आती रहती हैं लेकिन उसके अंदर की असली वजह आम तौर पर सामने नहीं आ पाती है। मिसाल के तौर पर बिहार के मोकामा में प्रशासन द्वारा करायी गयी थोक के भाव में नीलगायों की हत्या के जिस मामले को लेकर केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर व केन्द्रीय महिला एवं बाल विकासमंत्री मेनका गांधी के बीच बुरी तरह ठनी हुई है उस मामले पर चटखारे तो सभी ले रहे हैं लेकिन उसकी तह तक जाने और इसके कारणों को तलाशने की ना तो कोशिश हो रही है और ना ही उसे जानने के प्रति खास दिलचस्पी का माहौल दिख रहा है। अलबत्ता सतही तौर पर पूरा मामला ऐसा दिख रहा है जैसे नीलगाय की हत्या किये जाने को लेकर मेनका बुरी तरह द्रवित हैं जबकि जावड़ेकर को इस जीव हत्या का कोई अफसोस नहीं है। यानि पूरा मामला महज नीलगाय पर ही आकर सिमट गया है। इसी वजह से बहस भी जीवहत्या को सरकारी इजाजत मिलने तक ही सीमित दिख रही है। जबकि हकीकत यह है कि यह पूरा मामला ‘राम जनम के हेतु अनेका, परम विचित्र एक तें एका’ सरीखा है जिसकी कई परतें हैं और कई हकीकतें हैं। अभी कुछ ही दिन पहले संसद भवन को राष्ट्रपति भवन से सीधे जोड़नेवाले देश के सबसे चाक-चैबंद चैराहे पर एक नीलगाय तफरीह करती हुई दिखी। उसने चैराहे के चारों तरफ जमकर चैकड़ी भरी और तमाम मीडिया के कैमरों ने उस घटना को बड़ी खबर के तौर पर प्रकाशित व प्रसारित किया। हालांकि बाद में वन विभाग ने उसे अपने कब्जे में लेकर जंगल की राह अवश्य दिखा दी लेकिन यह आज तक पता नहीं चल पाया है कि वह नीलगाय कब, कैसे व कहां से आयी थी। लेकिन इस घटना ने समूचे देश को यह अच्छे से बता दिया कि नीलगाय कोई गाय नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो नीलगाय के वहां आने अथवा भेजे जाने का अगर यही मकसद था कि सबको यह अच्छे से बता दिया जाये कि नीलगाय वास्तव में कोई गाय नहीं होती है जिसे माता का दर्ज देकर सियासत में पूजनीय बनाया जाये तो जाहिर तौर पर यह मकसद तो पूरा हो ही गया। उसके कुछ दिनों बाद खबर आती है कि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की स्वीकृति से बिहार के स्थानीय प्रशासन ने थोक के भाव में नीलगायों का शिकार करवाया है। यह खबर सामान्य तौर पर सामने आती तो यही माना जाता कि किसानों को राहत पहुंचाने के लिये प्रशासन ने ऐसा किया है। ना खास चर्चा होती ना बहस। लेकिन मसले को तूल दे दिया मेनका ने, यह कहकर कि जावड़ेकर ने सूबे की सरकार पर दबाव बनाकर ऐसा कराया है। साथ ही ऐसा ही दबाव वे अलग-अलग सूबों में बंदर, हाथी व मोर को मरवाने के लिये भी बनाये हुए हैं। यानि मेनका ने तस्वीर को ऐसी शक्ल देने की कोशिश की मानों जावड़ेकर का काम केवल जानवरों को मरवाने तक ही सीमित है। चुंकि मामला मोदी सरकार के दो मंत्रियों के बीच टकराव का था लिहाजा खबर बड़ी बन गयी। इसमें किसी ने भी यह टटोलने की जहमत नहीं उठायी कि कुछ सूबों में इन जानवरों की भारी वंशवृद्धि के कारण वहां के स्थानीय लोगों व खासकर किसानों का जिस तरह से जीना मुहाल हो गया है उसका समाधान करने के लिये अगर इनकी संख्या को कुछ हद तक सीमित करने की कोशिश भी की जाती है तो इसे गुनाह कैसे माना जा सकता है। लेकिन मेनका हत्थे से उखड़ी हुई थी लिहाजा तस्वीर का जो पहलू वे दिखा रही थी वही लोग देख रहे थे। उसके आगे या पीछे की हकीकत जानने व समझने की ठोस कोशिश ही नहीं हुई। लेकिन भाजपा की अगुवाईवाली सरकार के फैसले के खिलाफ जब मेनका आग उगल रही थी तभी पता चला कि उनके सांसद पुत्र वरूण गांधी को पार्टी ने यूपी में चादर से बाहर पैर फैलाने से सख्ती के साथ मना किया है और खुद को पूरे सूबे के जननेता के तौर पर प्रचारित करने से परहेज बरतने का निर्देश दिया है। अब वरूण के प्रति पार्टी की इस सख्ती के बाद नीलगाय के मसले पर मेनका के तल्ख तेवरों की जो कहानी सामने आयी है उसे समग्रता में देखें तो पूरे मामले के कारण व परिणाम को आसानी से समझा जा सकता है। खैर, सियासत में दिल के दर्द का दिमाग से इलाज करने की कोशिशें तो चलती ही रहती हैं। लेकिन सवाल है कि जब तक मर्ज का पूरा मवाद बाहर नहीं आएगा तब तक फोड़े तो अलग-अलग जगह निकलते ही रहेंगे। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur 

शुक्रवार, 10 जून 2016

‘बिनु भय स्वार्थ नहिं प्रीति की रीति’

सरपट भगदड़ की होड़


गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है कि ‘सुर नर मुनि सब कै यह रीती, स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।’ साथ ही उन्होंने यह भी बताया है कि ‘भय बिनु होय न प्रीति।’ यानि प्रीति, मित्रता या एकजुटता के लिये आवश्यक है कि परस्पर स्वार्थ भी हो और भय भी। दोनों हो तो सर्वोत्तम अथवा कम से कम कोई एक तो हो। लेकिन जहां दोनों का ही अभाव हो वहां कैसे टिकेगी मित्रता और कैसे दिखेगी एकजुटता। वहां तो टकराव होगा, टूट होगी और बिखराव होगा। ठीक वैसे ही जैसा कांग्रेस में शुरू होता दिख रहा है। कभी अरूणाचल के विधायक बगावत कर रहे हैं तो कभी उत्तराखंड के। कभी त्रिपुरा के विधायक दल में फूट पड़ती है तो कभी मणिपुर के विधायक दल की एकता दरकती है। कभी छत्तीसगढ़ में जोगी परिवार पार्टी से अपना नाता तोड़ता दिख रहा है तो कभी महाराष्ट्र में गुरूदास कामथ सरीखे शीर्ष छत्रप संगठन को अलविदा कहते दिख रहे हैं। यह सिर्फ सूबाई स्तर पर ही नहीं हो रहा बल्कि केन्द्रीय स्तर पर भी असंतुष्टों की कतार लगातार लंबी होती दिख रही है और इस बात की संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की एक भी मनमानी पहल अब पार्टी में भारी विस्फोट का सबब बन सकती है। गनीमत है कि इस विस्फोटक परिस्थिति से पार्टी का शीर्ष नेतृत्व यानि गांधी परिवार भी अच्छी तरह परिचित है। तभी तो हर शिकस्त के बाद सर्जरी की बात तो होती है लेकिन यह बात महज बतकही बनकर रह जाती है। आखिर सर्जरी करें तो कैसे? राहुल को आगे लाये तो बुजुर्ग नाराज। प्रियंका को आगे लाये तो अब तक की सारी मेहनत पानी में। सोनिया को ही बरकरार रखते हुए राहुल को हाशिये पर भेजें तो भविष्य अंधकारमय। इसके अलावा अन्य कोई विकल्प ही नहीं है जिस पर विचार भी किया जा सके। ऐसे में आखिर करें तो क्या करें? यही वजह है कि कहने-सुनने में तो हमेशा ही कई हवा-हवाई बातें आती रहती हैं, लेकिन वास्तविकता में जो जैसे चल रहा है उसे यथावत चलने दिया जा रहा है। इसमें मसला है कि चल तो सब कुछ रहा है, मगर उल्टी दिशा में। बढ़ना था आसमान की ओर जबकि जा रहे हैं पाताल की गर्त में। संगठन के सिमटने की रफ्तार दिन दूनी रात चौगुनी होती जा रही है। कहीं से कोई सहारा मिलता नहीं दिख रहा। पार्टी की पकड़ देश के महज पांच फीसदी भू-भाग पर सिमट कर रह गयी है। ऐसे में स्वाभाविक है कि शीर्ष नेतृत्व का भय आखिर किसी को हो भी तो क्यों। यानि भय के आधार पर फिलहाल पार्टी में एकजुटता की उम्मीद करना व्यर्थ ही है। अब बचा स्वार्थ का आधार। तो इस पहलू को टटोलें तो जिसकी उम्मीदें कायम हैं वह टिका हुआ है पार्टी में और जिसकी उम्मीदों पर पूर्णविराम लग रहा है वह अपना रास्ता अलग कर ले रहा है। छत्तीसगढ़ में अगर जोगी परिवार ने पार्टी को अलविदा कहने की पहलकदमी की है तो उसकी साफ सी वजह है कि पार्टी ने अमित जोगी को पहले ही बाहर का दरवाजा दिखा दिया था जबकि अजीत जोगी को भी पार्टी से बाहर निकालने की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। यानि जोगी परिवार समझ गया कि अब हाथ का साथ पकड़े रहने से उसका कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं होनेवाला। तो वे चल पड़े अपने रास्ते। इसी प्रकार उत्तराखंड में भी जब विजय बहुगुणा को राज्यसभा की सीट नहीं मिली और सूबे की सत्ता से भी उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका गया तो उन्होंने भी तमाम संगी-साथियों के साथ पार्टी का दामन छोड़कर अपनी राहें अलग कर लेना ही बेहतर समझा। यही सिलसिला महाराष्ट्र में भी दिख रहा है जहां राज्यसभा की सीट पर गुरूदास कामथ की दावेदारी की अनदेखी करते हुए उनके धुर विरोधी माने जानेवाले पी चिदंबरम को उच्च सदन का टिकट दे दिया गया। साथ ही संगठन में भी उनकी कोई पूछ नहीं रही और रही सही कसर राहुल के युवा प्रेम में आगे बढ़ाये जा रहे संजय निरूपम की बातों व हरकतों ने पूरी कर दी। लिहाजा अब कामथ भले ही पार्टी छोड़ने के अपने फैसले के पीछे हजारों दलीलें गिना रहे हों लेकिन सच तो यही है कि संगठन से स्वार्थपूर्ति का हर दरवाजा बंद हो जाने के बाद उनके पास यह कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा। ऐसी ही नौबत दिख रही है उत्तर-पूर्वी सूबों में भी जहां भाजपा के बढ़ते कदमों और कांग्रेस के समाप्त होते जनाधार ने पार्टी से स्वार्थसिद्ध होने की संभावनाएं बेहद क्षीण कर दी हैं। इसी का नतीजा है कि उधर भी पार्टी में भारी भगदड़ का माहौल दिख रहा है और अब त्रिपुरा और अरूणाचल में भी असम की स्याही से नया इतिहास लिखे जाने की संभावना प्रबल दिख रही है। इन समस्याओं से निजात पाने का उपाय तलाशने के लिये राहुल भले ही मार्गदर्शक मंडल बनाने की बात कह रहे हों लेकिन जिसे भी मार्गदर्शक बनाया जाएगा उसके भविष्य पर तो ताला ही लगेगा। ऐसे में वह पार्टी में कब तक टिकेगा इसकी कल्पना की जा सकती है। लिहाजा जरूरत है शीर्ष स्तर पर सर्जरी की और भविष्य की चुनौतियों के मद्देनजर ठोस पहलकदमी की। वर्ना भगदड़ के सिलसिले की यह शुरूआत पार्टी को कहां ले जाएगी यह शायद ही किसी को अलग से बताने की जरूरत हो। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शनिवार, 4 जून 2016

झूठ बोला है तो कायम भी रहो उस पर.....

‘आदमी को साहब-ए-किरदार होना चाहिये’ 


जफर इकबाल साहब का कहना है कि ‘खामोशी अच्छी नहीं इनकार होना चाहिये, ये तमाशा अब सर-ए-बाजार होना चाहिये, झूठ बोला है तो कायम भी रहो उस पर जफर, आदमी को साहब-ए-किरदार होना चाहिये।’ यानि अव्वल तो झूठ बोलना ही गुनाह है और दूसरे अगर यह गुनाह हो भी जाये तो झूठ बोलने के बाद जरूरी है कि उस पर कायम भी रहा जाये। लेकिन मसला है कि जब आज की तारीख में सच पर कायम रहनेवाले लोग चिराग लेकर ढूंढ़ने से भी नहीं मिलते तब झूठ पर कायम रहनेवालों को कहां से ढ़ूंढ़ कर लाया जाये। खास तौर से सियासत के बारे में तो वैसे भी कहा जाता है कि यहां कोई किसी बात पर लंबे समय तक कायम नहीं रहता। यहां तो ‘जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी कीजे’ का ही चलन है। यही वजह है कि मौके की नजाकत व सियासी जरूरतों को देखते हुए यहां कब कौन अचानक अपनी कही हुई बात से पलट जाये इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। जाहिर है कि इसके लिये अलग से किसी घटना की मिसाल देने की कोई जरूरत ही नहीं है क्योंकि सियासत में होनेवाली रोजमर्रा की इन घटनाओं के प्रति लोग इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि अब लोग भी यह याद रखना जरूरी नहीं समझते कि कब किसने क्या कहा था। तभी तो सभी यही मानकर चलते हैं कि लोगों की याददाश्त बड़ी छोटी होती है और कोई नया गुल खिलते ही पिछले तमाशे को सिरे से भुला दिया जाता है। लोगों की इसी आदत का फायदा तमाम राजनीतिक पार्टियां भी जमकर उठाती हैं और केन्द्र व सूबों की सरकारें भी। वर्ना ऐसा कैसे हो सकता था कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें धरातल पर आ जाने के बावजूद पेट्रोल व डीजल की खुदरा कीमतों में अधिक कमी नहीं कर पाने की मजबूरी गिनाने के क्रम में सरकार की ओर से जो दलीलें पेश की जा रही थीं उसे भी आम लोगों ने सच मान लिया और अब कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बाद पेट्रोल व डीजल की कीमतों में की जा रही लगातार वृद्धि को जायज ठहराने की दलीलों को भी आंखें मूंद कर सच मान लिया जा रहा है। जबकि दोनों दलीलें सैद्धांतिक तौर पर एक दूसरे के बिल्कुल ही विपरीत हैं। मौजूदा हालातों की बात करें तो केन्द्र सरकार के तरफदार आंकड़ों के हवाले से लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि चुंकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जनवरी माह के मुकाबले 70 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है लिहाजा पेट्रोल-डीजल व रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि करना सरकार की मजबूरी हो गयी है। लेकिन इस तर्क को अगर सही माना जाये तो जब पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के कार्यकाल में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 160 से 170 डॉलर प्रति बैरल की दर से कच्चा तेल मिल रहा था उस दौरान पेट्रोल की खुदरा कीमतों का 80 रूपये प्रतिलीटर की कीमत को भी पार कर जाना तो समझ में आता है। लेकिन इन दलीलों के तहत तो जब राजग की मौजूदा सरकार के कार्यभार संभालते ही कच्चे तेल की कीमत 20 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे आ गयी तब इसका फायदा आम लोगों को हाथोंहाथ मिल जाना चाहिये था, जोकि नहीं मिला। मोदी सरकार के कार्यकाल में जब 20 से 30 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर कच्चा तेल मिल रहा था तब तो यह बताया जाने लगा कि चुंकि कच्चे तेल का सौदा पहले ही तय हो जाता है लिहाजा पुरानी कीमतों के आधार पर ही पेट्रोल व डीजल की खुदरा कीमत तय करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। लेकिन अब जबकि कच्चे तेल की कीमतें हाल ही में महज 50 डॉलर पर ही पहुंची है तब अचानक ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफा कर दिये जाने की वजह क्या है? या तो सरकार का यह तर्क लागू होना चाहिये कि कच्चे तेल का सौदा पहले ही हो चुका है। फिर तो पहले की सस्ती दरों पर ही आज पेट्रोल-डीजल मिलना चाहिये। या फिर पेट्रोलियम कंपनियों की यह दलील हमेशा अमल में लायी जाये कि अंराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी तो घरेलू बाजार पर भी इसका सीधा व स्पष्ट असर पड़ेगा ही। लेकिन यह दोनों ही बातें लागू करने के लिये सरकार तैयार नहीं है। उसे तो जब जिससे फायदा दिखता है तब उस तर्क को आगे कर देती है। अब इसका तो स्पष्ट मतलब यही हुआ कि आंकड़ों की बाजीगरी में लोगों को उलझाकर सरकार की मंशा सिर्फ अपने खजाने को भरने की है ताकि बजट घाटे को पूरा किया जाये और विकास की योजनाओं को गति देने के लिये धन की कमी ना होने पाए। हालांकि इस सोच को भी सिरे से गलत नहीं कहा जा सकता है लेकिन इसमें सरकार को संतुलन तो रखना ही पड़ेगा। आखिर जनता पर किस हद तक बोझ डाला जाये इस पर विचार तो करना ही पड़ेगा। मसला सिर्फ पेट्रोल-डीजल का नहीं है। सवाल है इनकी कीमतों में वृद्धि के कारण महंगी होनेवाली ढ़ुलाई का, जिसका असर पूरे बाजार पर पड़ेगा। ऐसे में आवश्यकता है बजटीय आवश्यकताओं और आम लोगों के हितों के बीच संतुलन बिठाने की। वर्ना जिन आम लोगों के हित की चिंता करते हुए देश के विकास की गाड़ी को रफ्तार दी जा रही है वही गाड़ी आम लोगों के हितों को कुचलते हुए ना आगे बढ़ जाये। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर 

सोमवार, 30 मई 2016

मांग-आपूर्ति के चक्कर में बाजार व्यवस्था घनचक्कर

अर्थशास्त्र के चक्कर पर भारी बिचौलियों का फच्चर 


अर्थशास्त्र का सिद्धांत बताता है कि अगर आपूर्ति यथावत रहे तो मांग बढ़ने से कीमतें बढ़ती हैं जबकि मांग घटने से कीमत घट जाती है। इसी प्रकार मांग यथावत रहने की स्थिति में आपूर्ति बढ़ने से कीमतें घटने लगती हैं जबकि आपूर्ति में कमी होने पर कीमतें बढ़ने लगती हैं। यानि बाजार में कीमत का निर्धारण मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन के आधार पर ही होता है। हालांकि इस सिद्धांत के कुछ अपवादों को भी अर्थशास्त्र में स्वीकार किया जाता है। लेकिन मसला है कि इन दिनों बाजार का पूरा अर्थशास्त्र ही बदला हुआ है। अब तो बाजार में कीमतों का निर्धारण अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर नहीं बल्कि बिचौलियों की मनमर्जी पर आधारित दिख रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो एक ओर समूचे देश के खुदरा बाजार में प्याज की कीमत पिछले कई महीनों से औसतन बीस रूपये प्रतिकिलो की दर पर टिके रहने के बावजूद महाराष्ट्र के किसान को ढ़ुलाई व मंडी का शुल्क अदा करने के बाद 952 किलो प्याज बेचने के एवज में सिर्फ एक रूपये के सिक्के की बचत नहीं होती जिस पर इन दिनों ठेंगे का निशान छपा रहता है। जाहिर है कि यह अर्थशास्त्र किसी के भी दिमाग की दही जमा सकता है। अब जिस किसान को फसल की लागत मिलने की बात तो दूर रही सिर्फ खेत से मंडी तक अपनी उपज को पहुंचाने व मंडी की पर्ची कटवाने के बाद लगभग एक टन फसल के बदले सिर्फ एक रूपये का मुनाफा मिल रहा हो उसके दिमाग में अगर आत्महत्या कर लेने की बात दस्तक देने लगे तो इसे कैसे अस्वाभाविक कहा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि यह नौबत महाराष्ट्र के प्याज उत्पादकों को ही झेलनी पड़ रही है बल्कि यही हाल समूचे देश के किसानों का है जो मंडी में बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर अपनी फसल बेचने के लिये मजबूर हैं। किसान आलू पैदा करे या टमाटर, गन्ना उगाए या फल-फूल उपजाये। सबकी व्यथा एक जैसी ही है। इसमें किसी वस्तु का दाम अधिक तेजी से बढ़ जाने पर सरकार अगर हरकत में भी आती है तो जमाखोरों पर छापेमारी के अलावा आयात में इजाफा करने के परंपरागत तौर-तरीकों पर अमल शुरू कर देती है। लेकिन कभी यह कोशिश नहीं होती कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिले और उपभोक्ताओं को सही कीमत पर बाजार में सामान उपलब्ध हो सके। पिछले साल संसद की कैंटीन में अचानक पहुंचकर भोजन करने के बाद जब प्रधानमंत्री ने खाने के बिल की पर्ची पर आह्लादित भाव से ‘अन्नदाता सुखी भव’ लिखकर अपना उद्गार व्यक्त किया तो ऐसा लगा कि अब अन्नदाता के दिन बहुरने वाले हैं। लेकिन साल पूरा होने के बाद जब आंकड़े सामने आये तो पता चला कि आजादी के बाद वर्ष 2015 में पहली दफा रोजाना औसतन 52 किसानों ने आत्महत्या की। यानि ‘अन्नदाता सुखी भव’ की बात मौजूदा सरकार के कार्यकाल में भी कहने-सुनने की ही बात बनकर रह गयी है। क्योंकि इस सरकार ने जिस साल सत्ता संभाली तब औसतन 42 किसानों को आत्महत्या की राह पकड़नी पड़ी थी जबकि पिछले साल यह आंकड़ा रोजाना 52 आत्महत्याओं तक पहुंच गया। आलम यह है कि किसान को मंडी में महज डेढ़ से दो रूपये प्रति किलो की दर से आलू, प्याज व टमाटर खरीदनेवाले भी बड़ी मुश्किल से मिल रहे हैं जबकि उपभोक्ताओं को इसकी कीमत औसतन बीस रूपये की दर से चुकानी पड़ रही है। ऐसे में सवाल है कि आखिर बीच का 18 रूपया कहां जा रहा है। जाहिर तौर पर यह उन बिचौलियों की तिजोरी में जमा हो रहा है जो प्याज को खेत से किचेन तक का सफर तय कराते हैं। ऐसे में किसान का यथावत बदहाल रहना स्वाभाविक ही है। लिहाजा आवश्यकता है कि बाजार में कीमतों के निर्धारण व नियंत्रण पर भी सरकार व प्रशासन की नजर हो। सिर्फ मांग व आपूर्ति के बीच संतुलन के भरोसे बाजार को छोड़े रखने से ना तो अन्नदाता किसानों को न्याय मिल सकता है और ना ही उपभोक्ताओं को। लेकिन मसला है कि अब तक तीन लाख से अधिक किसानों द्वारा आत्महत्या कर लिये जाने के बावजूद अगर सरकार की योजनाएं क्रॉप-ड्रॉप के बीच संतुलन बनाने और यूरिया पर नीम चढ़ाने तक ही सीमित रहेंगी तो अन्नदाता कैसे सुखी हो पाएगा। चुनावी दिनों में सपना दिखाया गया था कि वैल्यू एडीशन के द्वारा खेती को लाभप्रद बनाया जाएगा लेकिन इस दिशा में कोई बड़ी पहल होती दिख तो नहीं रही है। साथ ही ना तो भंडारण व्यवस्था का विस्तार व सुदृढ़ीकरण होता दिख रहा है और ना ही फसल के न्यूनतम मूल्य निर्धारण व्यवस्था में कोई सुधार हो पाया है। सिर्फ फसल बीमा योजना लाने, आपदा राहत का विस्तार करने, ई-मंडी का सपना दिखाने और मृदा स्वास्थ्य कार्ड तैयार करने से तो अन्नदाता का भला होने से रहा। उसका भला तो तब होगा जब उसे उपज की पूरी लागत के अलावा कुछ मुनाफा भी मिले। यानि बाजार की असली बीमारी का इलाज किये बिना इस अव्यस्था से निजात पाने की कल्पना भी बेकार ही है। लिहाजा आवश्यकता है कि अन्नदाता किसानों और उपभोक्ता के बीच कीमतों का अनुपात निर्धारित किया जाये और बिचौलियों व बाजार की अन्य ताकतों को लागत के मुकाबले एक निश्चित अनुपात में ही मुनाफा कमाने की छूट रहे। वर्ना मांग व आपूर्ति के चक्कर में पड़कर पूरी बाजार व्यवस्था यथावत घनचक्कर बनी रहेगी। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शुक्रवार, 27 मई 2016

सियासत में सकारात्मकता की जरूरत

‘धैर्य व धर्म के प्रदर्शन की जरूरत’

किसी भी इंसान की प्रकृति व प्रवृति की सही परख तभी संभव है जब वह बुरी तरह परेशानियों में घिरा हो। परेशानी व समस्याओं में उलझा इंसान अधिक देर तक बनावटी व्यवहार नहीं कर सकता। तभी तो कहा भी गया है कि ‘आपतकाल परखिये चारी, धीरज धर्म मित्र और नारी।’ यानि धैर्य व धर्म की वास्तविक कसौटी परेशानियां व विपत्तियां ही होती हैं और जीवन में सफलता के लिये तो शिरडी के सांई ने भी श्रद्धा व सबुरी का ही संदेश दिया है। परेशानी छोटी हो बड़ी अथवा तात्कालिक हो या दीर्घकालिक, वह इंसान की परख करा ही देती है। मसलन छोटी सी ठेस लगने पर अचानक जुबान से निकलनेवाले अल्फाज से ही यह जाना जा सकता है कि इंसान किस प्रवृति व प्रकृति का है। क्योंकि ठेस लगते ही कराह के साथ किसी की जुबान से मोटी सी गाली निकलती है जबकि किसी की जुबान पर माता-पिता या परमात्मा का नाम आ जाता है। ऐसे में छोटी सी ठेस लगने पर मोटी सी गाली उगलनेवाले इंसान को नियति किस ओर ले जाएगी यह शायद ही किसी को अलग से बताने की जरूरत हो। लिहाजा अगर इस बात का आकलन करना हो कि मौजूदा वक्त में बुरी तरह उलझन, परेशानी व विपत्ति के मकड़जाल में फंसा हुआ इंसान आगामी दिनों में किस हद तक सफलता हासिल कर पाएगा तो निगाह इस बात पर दौड़ानी चाहिये कि उसकी मौजूदा सोच सकारात्मक है या नहीं। यही बात राजनीति में भी लागू होती है। यहां भी सफलता के लिये सकारात्मक सोच व समुचित व्यवहार निहायत ही आवश्यक है। नकारात्मक राजनीति के सहारे अव्वल तो सफलता हासिल ही नहीं हो सकती और किस्मत से हो भी जाये तो इसे लंबे समय तक कायम रख पाना तो नामुमकिन ही है। तभी तो आम तौर पर यह देखा जाता है कि चुनावी जनादेश अक्सर उसके पक्ष में ही आता है जिसने विकास व सुधार की सकारात्मक बातों पर ही अपने चुनाव अभियान को केन्द्रित रखा हो। यही लोकसभा चुनाव में हुआ था और यही तमाम विधानसभा चुनावों में हुआ है। यहां तक कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के जिस जनादेश को सतही तौर पर नकारात्मक राजनीति की जीत के नजरिये से देखा जाता है उसकी भी गहराई से पड़ताल करें तो यही नजर आता है कि सूबे के मतदाताओं ने जनोन्मुख, पारदर्शी व भ्रष्टाचारमुक्त शासन के वायदे पर भरोसा जताया है। कहने का तात्पर्य है कि राजनीति में सकारात्मक नीति व नीयत के साथ ही सकारात्मक परिणाम हासिल किया जा सकता है। वर्ना नकारात्मक राजनीति का खामियाजा कितना बुरा हो सकता है यह कांग्रेस के मौजूदा हालत खुद ही बयान कर रहे हैं। लेकिन या तो कांग्रेस के रणनीतिकारों को सकारात्मक राजनीति का महत्व समझ में नहीं आ रहा है या फिर वे इसकी अनदेखी करना ही बेहतर समझ रहे हैं। तभी तो लगातार व सिलसिलेवार चुनावी शिकस्त के बावजूद वे इससे सबक लेकर अपनी सियासी सोच में तब्दीली लाना गवारा नहीं कर रहे हैं। मसला चाहे आतंकवाद को सांप्रदायिक रंग देने का हो या फिर विपक्षी दल की हैसियत से देशहित व जनहित में रचनात्मक भूमिका निभाने की हो। हर मामले में या तो नकारात्मकता हावी है या फिर असमंजस की स्थिति। तभी तो बाटला हाऊस मुठभेड़ को जायज व फर्जी बताये जाने को लेकर तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल के साथ दिग्विजय सिंह सरीखे नेताओं की टोली आपस में ही जूतम-पैजार में उलझी हुई है जबकि पार्टी असमंजस की स्थिति में है। वह किसी भी पक्ष को ना तो सही बता पा रही है और ना ही किसी पक्ष से पल्ला झाड़ पा रही है। वह भी तब जबकि मौका ए वारदात से फरार होने के बाद दहशतगर्दी का पर्याय माने जानेवाले संगठन आईएस में शामिल हो चुके दो आतंकियों का वह वीडियो भी सामने आ चुका है जिसमें वे बाटला मामले में संलिप्तता स्वीकार करते हुए हिन्दुस्तान से इसका बदला लेने की कसम खाते दिख रहे हैं। ऐसे में तो अब इस मुठभेड़ को लेकर उठनेवाले सवाल बंद ही हो जाने चाहिये थे लेकिन अगर ऐसा होता नहीं दिख रहा है तो इसे हठधर्मिता व नकारात्मकता की राजनीति का ही नाम दिया जा सकता है। इसी प्रकार केन्द्र की मोदी सरकार को एक ओर हर मोर्चे पर नाकाम बताना और दूसरी ओर संसद में रत्तीभर सहयोग करना भी गवारा नहीं करना तो यही दर्शाता है कि कांग्रेस की मौजूदा सियासी सोच कतई सकारात्मक नहीं है। वर्ना वह कम से कम उस जीएसटी को तो हर्गिज नहीं लटकाती जिसका प्रारूप उसकी ही सरकार ने तैयार किया था। आज भी मोदी सरकार की जिन योजनाओं का श्रेय लेने के लिये कांग्रेस उसे अपनी परिकल्पना बता रही है, उसमें भी उसे यह तो मानना ही पड़ेगा कि मौजूदा सरकार ने सकारात्मक सोच के साथ ही उन योजनाओं को आगे बढ़ाया है। वर्ना मनरेगा घोटालों की भेंट चढ़ रहा था जबकि आधार को संवैधानिक जमीन ही उपलब्ध नहीं कराया गया था। खैर, सरकार की कमियों व खामियों की ओर लोगों का ध्यान खींचना तो विपक्ष से अपेक्षित ही है लेकिन इसमें सोच की सकारात्मकता निहायत ही आवश्यक है। सकारात्मक सोच, नीति व नीयत के साथ ही लोगों का विश्वास व सहानुभूति अर्जित कर पाना संभव हो सकता है। वर्ना नकारात्मक सोच का परिणाम तो विध्वंसात्मक ही होता है। लिहाजा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को पार्टी के बेहतर भविष्य के लिये अपनी मौजूदा नीतियों पर पुनर्विचार तो करना ही होगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

गुरुवार, 26 मई 2016

‘विरासत की सियासत में काबिलियत की जरूरत’

‘विरासत की सियासत में काबिलियत की जरूरत’


‘पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भले ही अलग-अलग पार्टियों की जीत हुई हो लेकिन हार तो हर जगह कांग्रेस की ही हुई है।’ यह कहते हुए फूले नहीं समा रहे हैं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह। अब शाह की यह बात कांग्रेस को भले ही जले पर नमक सरीखी जलन व चुभन दे रही हो लेकिन बात में दम तो है ही। कायदे से देखा जाये तो मौजूदा हार को स्वीकार करते हुए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने एक बार की हार से दुनियां समाप्त नहीं होने की जो दलील दी है इसके अलावा वे कह भी क्या सकती हैं? पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं को यह दिलासा दिया जाना भी स्वाभाविक है कि आनेवाला भविष्य कांग्रेस का ही है और जल्दी ही पार्टी की जीत का सिलसिला फिर शुरू हो जाएगा। लेकिन मसला है कि अगर हार के कारणों पर विचार करते हुए मौजूदा चुनौतियों व जरूरतों के प्रति बदस्तूर शुतुमुर्गी रवैया अपनाने का सिलसिला जारी रखा जाएगा तो पार्टी की गाड़ी जीत की पटरी पर लौटेगी कैसे? इसके लिये आवश्यकता तो है अपनी कमजोरियों को पहचानने और उसमें सुधार लाने की। लेकिन इस दिशा में गंभीरता से विचार करने से यथावत परहेज बरते जाने का मतलब तो यही है कि बीमारी का एहसास तो सबको है लेकिन उसे स्वीकार करके उसमें सुधार करने की हिम्मत किसी में नहीं है। खास तौर से कट्टर कांग्रेसियों की जमात भले इस सच को स्वीकार करने की जहमत नहीं उठा रही हो लेकिन हकीकत यही है कि कांग्रेस में जब से राहुल गांधी का युग आरंभ हुआ है तब से पार्टी की सफलता का ग्राफ लगातार ढ़लान पर ही लुढ़कता जा रहा है। यहां तक कि पिछले दो सालों में हुए ग्यारह राज्यों के विधानसभा चुनावों में अपने कब्जेवाले छह राज्य कांग्रेस को गंवाने पड़े हैं और फिलहाल इसके पास कर्नाटक के अलावा कुछ गिने-चुने पर्वतीय सूबे ही बचे हुए हैं। खैर, इस सच को तो कतई नहीं झुठलाया जा सकता है कि विरासत में सियासत की सर्वोच्च कुर्सी तो मिल सकती है लेकिन उसकी हिफाजत करने की काबिलियत किसी को भी विरासत में नहीं मिलती है। वह तो खुद के अनुभव से ही आती है। लिहाजा अनुभवों से सबक लेने की जरूरत कांग्रेस में अगर किसी को है तो सिर्फ राहुल गांधी को ही है। क्योंकि सोनिया की सियासी काबिलियत तो जगजाहिर है। ये वही सोनिया हैं जिन्होंने नब्बे के दशक में डूबने के कगार पर खड़ी कांग्रेस की कमान संभालने के बाद अपनी योग्यता, क्षमता व कुशलता के दम पर ना सिर्फ केन्द्र में लगातार दस सालों तक संप्रग की सरकार चलवायी बल्कि देश के सत्रह राज्यों में पार्टी को शानदार सफलता दिलायी। इसी प्रकार कांग्रेस के शीर्ष रणनीतिकारों में शुमार होनेवाले पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने भी अपनी योग्यता व क्षमता साबित करने की चुनौती नहीं है क्योंकि ये उन्हीं नेताओं की जमात है जो इंदिरा व राजीव से लेकर सोनिया तक जमाने में भी कांग्रेस का परचम लहराने में निर्णायक भूमिका निभाती रही है। जबकि राहुल की बात करें तो उनके सामने चुनौती है खुद को साबित करने की। क्योंकि अब सवाल उनके चाल-चलन से लेकर आचरण तक पर भी उठने लगे हैं। डूसू अध्यक्ष व कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव रह चुकीं अलका लांबा को यह कहते हुए कांग्रेस का हाथ छोड़कर एएपी का झाड़ू थामना पड़ा कि दो वर्षों में राहुल ने एक बार भी उन्हें मुलाकात का समय नहीं दिया। ऐसा ही इल्जाम असम में भाजपा की जीत के नायक रहे हेमंत विश्वशर्मा भी लगा रहे हैं कि कांग्रेस में रहते हुए सूबे की समस्याओं को लेकर जब वे राहुल से मिलने गये तो पूरी बैठक के दौरान राहुल लगातार अपने कुत्ते के साथ ही खेलते रहे। हेमंत के मुताबिक पार्टी के जमीनी नेताओं व कार्यकर्ताओं के साथ राहुल का व्यवहार ऐसा रहता है जैसा किसी घमंडी मालिक का अपने निरीह नौकर के साथ होता है। इसी प्रकार उत्तराखंड के बागी कांग्रेसी विधायकों का भी कहना है कि अगर राहुल ने उन्हें मिल-बैठकर मसले को सुलझाने को मौका दिया होता तो उन्हें पार्टी छोड़ने के लिये हर्गिज मजबूर नहीं होना पड़ता। हालांकि ऐसी बातें वे लोग कर रहे हैं जो पार्टी छोड़कर जा चुके हैं। लेकिन इससे अलग भी देखें तो राहुल जब चाहे बिना किसी को बताये छुट्टी मनाने के लिये अज्ञात स्थान पर चले जाते हैं। संसद में भी उनकी भूमिका युवराज सरीखी ही रहती है, मतदाताओं के प्रतिनिधि की छवि उनमें शायद ही किसी को कभी दिखी हो। तभी तो शशि थरूर को भी संकेतों में यह कहना पड़ा है कि ‘पार्ट टाईम पॉलिटिक्स’ करके मौजूदा चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता बल्कि पांच साल तक लगातार जमीन पर पसीना बहाने के बाद ही चुनावी सफलता का प्रतिफल पाने की कल्पना की जा सकती है। बहरहाल, सच तो यही है कि आज भले ही पार्टी के भीतर से कोई मुखर होकर राहुल के चाल, चलन व आचरण में बदलाव की जरूरत पर एक शब्द भी नहीं बोल रहा हो लेकिन समय की मांग तो यही है कि उन्हें खुद में बदलाव लाना ही होगा। विरासत की सियासत को वे जिस आसान, सहज व मनमाने ढंग से संचालित करने की कोशिश कर रहे हैं उसमें उन्हें तब्दीली लानी ही होगी वर्ना कांग्रेस की दुर्गति का सिलसिला अभी और भी आगे तक जारी रहने की संभावना को कतई नकारा नहीं जा सकता है। ‘जैसी नजर, वैसा नजरिया।’  @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

मंगलवार, 17 मई 2016

‘बेरंग आतंक पर चढ़ा सियासी रंग’

‘बेरंग आतंक पर चढ़ा सियासी रंग’


कहने को तो सभी कहते हैं कि आतंक का कोई रंग नहीं होता। लेकिन आतंक को खास रंग से जोड़ने की सियासत भी समानांतर ही चलती रहती है। लिहाजा आतंक के प्रति इस दोहरेपन को लेकर किसी के भी मन में उलझन होना स्वाभाविक ही है। लेकिन दिलचस्प बात है कि उलझन कहीं नहीं है। ना उस तरफ ना इस तरफ और ना ही दोनों के बीच की निरपेक्ष धारा में। हर तरफ स्थिति पूरी तरह स्पष्ट है। अगर ऐसा नहीं होता तो एक खास सियासी धारा के अनुगामियों द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से इस सवाल को तूल ही नहीं दिया जाता कि हर आतंकी वारदात में निराकार के उपासकों का खास रंग ही शामिल क्यों दिखायी देता है और इसके जवाब में साकार के सनातन उपासकों का रंग भी आतंक पर चढ़ाने की कोशिश हर्गिज नहीं की जाती। ना तो मालेगांव धमाके के बाद शरद पवार द्वारा मामले की जांच को हिन्दूवादी संगठनों की ओर मोड़ने की औपचारिक गुजारिश की जाती और ना ही अलग से भगवा आतंकवाद शब्द गढ़े जाने की जरूरत पड़ती। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हुआ। क्योंकि दूसरे पक्ष की भावनाओं को सहलाकर अपनी सियासी जरूरतें पूरी करनी थीं। भले इसके नतीजे में पाकिस्तान को समझौता ब्लास्ट व मालेगांव ब्लास्ट की दुहाई देकर यह राग आलापने का मौका मिल गया हो कि भारत में होनेवाली आतंकी वारदातों से उसका कभी कोई लेना-देना रहा ही नहीं है। इन्हें तो सिर्फ सियासी रोटियां सेंकने के लिये ज्वलंत मसलों की दहकती आग चाहिये। भले ही वह आग आतंक की भट्ठी से ही क्यों ना निकल रही हो। हालांकि इसके लिये किसी एक पक्ष को ही दोषी मान लेना कतई सही नहीं होगा बल्कि इस हम्माम में सभी एक बराबर ही अनावरित हैं। वैसे भी बात जब वोट बैंक की हो तो कौन इस मौके का छोड़ना चाहेगा। तभी तो समाज में फूट डालने की इस हद तक कोशिशें हुई कि ना सिर्फ आतंक को अलग-अलग रंग के चश्मे से दिखाने का प्रयास हुआ बल्कि फौज में भी रंग के आधार पर रंगरूटों की गिनती करने की कोशिश की गयी और कारगिल के शहीदों की सूची जारी करके नये सिरे से समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास भी हुआ। वास्तव में इस सबके पीछे सोच यही रही कि समाज को बांटो और अपना सिक्का चलाओ। लेकिन वोटबैंक की इस सियासत ने ना सिर्फ देश का हित खतरे में डाला है बल्कि हमारी उन संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी उंगली उठ रही है जिन पर किसी भी मामले की जांच करके हकीकत को सतह पर लाने की जिम्मेवारी है। सीबीआई को तो सर्वोच्च न्यायालय पहले ही सरकारी तोता करार दे चुकी है लेकिन अब एनआईए भी इस मामले में कहीं से भी अलग नहीं दिख रही। तभी तो एनआईए पर पहले भी आरोप लगे कि उसने आतंकी वारदातों में भगवा रंग की संलिप्तता पुख्ता करने के लिये नकली गवाह खड़े करने व एकपक्षीय साक्ष्य जुटाने की पहल की थी और आज खुद एनआईए ही यह स्वीकार कर रही है कि कर्नल पुरोहित के घर से बरामद आरडीएक्स जांच एजेंसी ने ही प्लांट किया था। यहां तक कि कर्नाटक एफएसएस के निदेशक रह चुके बीएम मोहन भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि अगर सिमी के आतंकियों पर किये गये नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग व लाई डिटेक्टर टेस्ट को आधार बनाकर एनआईए ने अपनी जांच आगे बढ़ाई होती तो समझौता एक्सप्रेस व मालेगांव में हुए धमाकों की अलग की तस्वीर सामने आती। मोहन का दावा है कि सिमी के तीन आतंकियों ने ना सिर्फ इन आतंकी वारदातों में अपनी भूमिका कबूल की थी बल्कि यह भी बताया था कि लंदन में रहनेवाले राहिल नाम के पाकिस्तानी मूल के शख्स ने इन धमाकों की फंडिंग की थी और सिमी से जुड़े सफदर नागौरी ने इस पूरी साजिश की पटकथा तैयार की थी। यानि सिमी के आतंकियों का नार्को, ब्रेन मैपिंग व लाई डिटेक्टर टेस्ट करनेवाले मोहन की बातों से इतना तो साफ है कि एनआईए की कोशिश असली गुनहगारों को सामने लाने की रही ही नहीं। बल्कि उसने मनचाहे लोगों को पहले दबोचा और बाद में उन पर पूरे मामले में संलिप्तता सुनिश्चित करने के लिये साक्ष्य व सबूत तलाशने की पाताल-तोड़ कोशिशें की। इसमें असली गुनहगारों के खिलाफ सामने आये साक्ष्य व सबूतों को भी इस मकसद से रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया कि कहीं उनके सामने आने से उन लोगों को बच निकलने का मौका ना मिल जाये जिन्हें उसने पूरे मामले में फ्रेम किया है। खैर, निजाम बदलने के बाद अब नये सिरे से मामले भी खुल रहे हैं और नयी मानसिकता के साथ कानून भी अपना काम कर रहा है जिसके बारे में सरकार कह रही है कि अब जांच पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से हो रही है जबकि विरोधियों का मानना है कि भगवा रंग को आतंक के कलंक से बचाने के लिये समझौता व मालेगांव धमाके के दोषियों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। यानि एनआईए की निष्पक्षता को ना तो पिछली सरकार के कार्यकाल में सर्व-स्वीकार्यता मिली और ना ही अब मिल रही है। खैर, जब एक बार कोई बात निकल आती है तो उसका दूर तक जाना तो स्वाभाविक ही है लेकिन पकड़ से बाहर निकल चुकी बात से देश की छवि को पहुंचे आघात और सामाजिक सौहार्द्र व भाईचारे को हुए नुकसान की भरपायी का प्रयास तो करना ही होगा। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’   @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur

शुक्रवार, 13 मई 2016

पानी गये ना ऊबरे, मोती मानुष चून

‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून’


‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून, पानी गये ना ऊबरे, मोती मानुष चून।’ रहीम का यह दोहा सबने पढ़ा भी है और गुना भी है। लेकिन शायद हमारे राजनीतिज्ञों ने इसे सिर्फ पढ़ा है, इसका अर्थ व महत्व समझा नहीं है। अगर समझा होता तो आज राजनीति में पानी बचा होता, इस कदर सूख नहीं जाता। अब तो ऐसा लगता है मानो सबकी आंख का पानी मर चुका है, सूख चुका है। वर्ना कम से कम ऐसी तस्वीर तो कतई नहीं दिखती कि जब देश की एक तिहाई आबादी भयावह सूखे का सामना कर रही हो, बूंद-बूंद पानी के लिये हाहाकार मचा हो तब हमारे माननीय नेतागण एकजुट होकर लोगों को इस भीषण संकट से उबारने का प्रयास करने के बजाय मौजूदा परिस्थियों का भी सियासी दोहन करने में जुटे हुए हों। आपस में श्रेय लूटने की लड़ाई लड़ रहे हों। हालांकि सियासत की इस मौजूदा तस्वीर का एक अलग पहलू यह भी है कि जब हर चीज पर सियासत हो सकती है, हर बात पर ही नहीं बल्कि बेबात भी राजनीति हो सकती है, तो फिर पानी ही इससे अछूती क्यों रहे। वैसे भी स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे भयावह सूखे के मौजूदा दौर में तो मौका भी है, मौसम भी है और दस्तूर भी। फिर पानी पर सियासत तो होनी ही है और हो भी रही है। हो भी क्यों ना। आखिर जानलेवा सूखे की मार झेल रही देश की एक-तिहाई आबादी का मसला जो ठहरा। इतने बड़े वोट बैंक को कौन नहीं रिझाना चाहेगा। भले इसके लिये ठोस राहत योजना या दूरगामी परियोजना का पूरी तरह अभाव ही क्यों ना हो। दिखाना तो सभी यही चाहेंगे कि सूखा प्रभावितों की मदद में वे जी-जान से व प्राण-पण से जुटे हुए हैं। तभी तो केन्द्र सरकार और राज्यों के बीच इस मसले पर श्रेय बटोरने को लेकर भारी खींचतान का माहौल दिख रहा है। लेकिन इसका सबसे दुखद पहलू यह है कि सूखा प्रभावितों को मिल-जुलकर राहत पहुंचाने के अभियान में जुटने के बजाय केन्द्र और राज्य एक दूसरे की टांग खींचने व एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं। खास तौर से अगर उत्तर प्रदेश के साथ इस मसले पर जारी केन्द्र के शीतयुद्ध की बात करें तो दोनों ही यह साबित करने में जुटे हुए हैं कि उनका काम तो काम है, दूसरे का दिखावा। तभी पहले तो यूपी सरकार को सूखा राहत के मोर्चे पर विफल दिखाने में ना तो सत्ता पक्ष से प्रभावित मीडिया के एक खास वर्ग ने कोई कसर छोड़ी और ना ही केन्द्र ने कभी यह स्वीकार किया कि सूबे में सूखा राहत की दिशा में कोई सराहनीय काम हो रहा है। जबकि हकीकत यह है कि सूबे की सरकार अपने सीमित संसाधनों के सहारे ही ना सिर्फ सूखा प्रभावित इलाकों में लोगों को राहत पहुंचाने के काम में पूरी ताकत से जुटी हुई है बल्कि लोगों को भोजन-पानी से लेकर पशुओं के लिये चारा उपलब्ध कराने का भी हरमुमकिन प्रयास किया जा रहा है। सूखे के कारण रोजी-रोटी की भारी किल्लत का सामना कर रहे परिवारों के बीच राहत पैकेट के रूप में शुरूआती तीस दिनों के लिये आटा, आलू, दाल, तेल व देशी घी से लेकर मिल्क पाउडर भी वितरित किया जा रहा है। इसके अलावा अन्त्योदय लाभार्थी परिवारों को अगले 30 दिनों के लिए भी राहत पैकेट मुहैया कराने का निर्णय प्रदेश सरकार पहले ही कर चुकी है। साथ ही पिछले साल हुई ओलावृष्टि के बाद इस समय भयानक सूखे का सामना कर रहे किसानों को राहत देने के लिए प्रभावित 73 जिलों के 107 लाख किसानों के बीच 4493 करोड़ रुपया बांटा जा चुका है जबकि पिछले साल भी सूखे की मार झेलनेवाले 21 जनपदों के प्रभावितों के बीच 1006.03 करोड़ रुपये की धनराशि बांटने का काम युद्धस्तर पर जारी है। यहां तक कि अपनी क्षमता के मुताबिक प्रदेश सरकार वाटर एटीएम भी लगवा रही है और टैंकरों से पानी की आपूर्ति भी कर रही है। इसके बावजूद प्रदेश सरकार की तारीफ करना किसी को गवारा नहीं है। अलबत्ता सूबे की समस्याओं को लेकर हलकान दिख रही है वह भाजपा जिसके नेतृत्व में चल रही केन्द्र की सरकार ने अब तक पिछले साल के सूखे के मद का 1123.47 करोड़ व ओलावृष्टि के मद का 4741.55 करोड़ रूपया प्रदेश सरकार को आवंटित ही नहीं किया है। यानि मदद के नाम पर केन्द्र से प्रदेश को मिला है तो सिर्फ आश्वासन और लफ्फाजी। उस पर तुर्रा यह कि बुंदेलखंड में पानी पहुंचाने के लिये केन्द्र ने ट्रेन भेज दिया। वह भी खाली टैंकर के साथ। जाहिर है कि प्रदेश सरकार इस दिखावे की मदद को बैरंग वापस नहीं लौटाती तो और क्या करती। कायदे से अगर केन्द्र को कुछ करना ही है तो वह इस साल के सूखा राहत का पैसा हाथोंहाथ नहीं दे सकती तो कम से कम पिछले साल के बकाये का ही पूरा भुगतान कर दे। साथ ही जब प्रदेश सरकार दावा कर रही है कि बुंदेलखंड के जलाशयों में पर्याप्त पानी उपलब्ध है तो उसके वितरण के लिये टैंकरों का समुचित इंतजाम कर दे। प्रदेश तो अपनी क्षमता के मुताबिक जुटा ही हुआ है लेकिन कुछ जिम्मेवारी तो केन्द्र की भी है। जिसे पूरी इमानदारी से निभाने में अगर कोताही बरती गयी तो अगले साल होनेवाले सूबे के विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur