मंत्रिमंडल विस्तार ने दिया विवादों को आधार
शायद विवाद नरेन्द्र मोदी की नियति के साथ जुड़ा हुआ है। सच कहें तो विवादों ने ही मोदी को मोदी बनाया है। उनके साथ जुड़े विवाद ना हुए होते तो मोदी भी वह मोदी नहीं बन पाते जो वे आज दिख रहे हैं। वैसे भी जिसका सोना-जागना, खाना-पीना और कहीं आना-जाना भी विवादों का सबब बन जाता हो उसकी सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार कैसे विवादों से अछूता रह सकता था। तभी तो विवादों की परछाईं ने इस दफा भी मोदी सरकार का साथ नहीं छोड़ा है। विवाद संगठन में भी दिख रहा है, सरकार में भी और सहयोगियों के बीच भी। सहयोगियों की बात करें तो इस मंत्रिमंडल विस्तार के साथ जुड़ी हुई शिवसेना की तमाम उम्मीदें सिरे से ध्वस्त हो गयीं। उसे पूछा तक नहीं गया। यहां तक कि उसे विस्तार की योजना के बारे में बताना भी मुनासिब नहीं समझा गया। जाहिर है कि अक्खड़ व बेलौस सियासी मिजाजवाली शिवसेना को मोदी सरकार का यह व्यवहार नागवार गुजरना ही था। तभी तो शिवसेना ने ना सिर्फ मंत्रिमंडल विस्तार के आयोजन में शिरकत करने से परहेज बरत लिया बल्कि उसने औपचारिक तौर पर यह धमकी देने से भी गुरेज नहीं किया है कि भाजपा के इस व्यवहार का बदला अवश्य लिया जाएगा और मुम्बई नगर निगम व महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनावों में उसकी जमकर खबर ली जाएगी। खैर, शिवसेना अकेली ऐसी सहयोगी नहीं है जिसके साथ ऐसा व्यवहार हुआ है बल्कि मंत्रिमंडल विस्तार के बारे में पूछा तो उस अपना दल से भी नहीं गया जिसके कोटे से अनुप्रिया पटेल को सरकार में शामिल कर लिया गया है। जाहिर है कि सरकार का यह व्यवहार अपना दल से जुड़े नेताओं को तो नागवार गुजरना ही था। वह भी तब जबकि पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने के कारण काफी पहले ही औपचारिक तौर पर अनुप्रिया को अपना दल से बाहर निकाला जा चुका है। ऐसे में अगर अपना दल की भावनाओं के प्रति बेपरवाही दिखाते हुए अनुप्रिया को सरकार में शामिल करने का फैसला हुआ है तो स्वाभाविक तौर पर इस पहलकदमी से विवाद तो होना ही है। खैर, विवादों की श्रृंखला अगर गठबंधन के सदस्यों तक ही सीमित रहती तो गनीमत थी, लेकिन इस दफा तो मोदी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार ने भाजपा संगठन व सरकार से जुड़े लोगों की भावनाओं को भी बुरी तरह आहत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हालांकि मंत्रिमंडल विस्तार का विशेषाधिकार प्रधानमंत्री के हाथों में ही सिमटे होने के कारण उनके फैसलों पर सीधे तौर पर उंगली उठाने की पहल तो नहीं हुई है लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि संगठन व सरकार में किसी को कोई तकलीफ या परेशानी नहीं हो रही है। मामला सिर्फ यह है कि दर्द की इंतहा तो दिख रही है लेकिन कराह को होठों तक आने या आंखों से छलकने की इजाजत नहीं दी जा रही है। वर्ना पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव रहते हुए अपने प्रभारवाले राज्यों में मनमाने तरीके से टिकट बांटने, संगठन के बजाय अपने हितों को ही पहली प्राथमिकता देने, दिल्ली में पार्टी की हार सुनिश्चित करने, मुख्यमंत्री पद की दावेदारी छोड़ने के एवज में राज्यसभा का टिकट मांगने, संगठन में गुटबाजी को बढ़ावा देने और पार्टी लाइन से अलग हटकर सस्ता प्रचार पाने के लिये अक्सर सियासी ड्रामेबाजी करने के आरोपी को अप्रत्याशित तरीके से मंत्री पद से नवाजे जाने के बाद पार्टी के उन तमाम वरिष्ठ व कनिष्ठ नेताओं की भावनाएं आहत होना स्वाभाविक ही है जिन्होंने पार्टी के लिये अपना सर्वस्व समर्पित करने में कभी कोताही नहीं बरती हो। तभी तो ऐसे विवादास्पद नेता को मंत्री बनाये जाने को जायज ठहराने की दलील पार्टी के किसी नेता की जुबान से नहीं निकल रही है। साथ ही इस बार के विस्तार में उन दो नामों को खास तौर से शामिल किये जाने को लेकर भी पार्टी के शीर्ष रणनीतिकारों की चैकड़ी के एक सदस्य को भारी तकलीफ पहुंचना स्वाभाविक है जो उन्हें फूटी आंख नहीं भाते हैं और उन दोनों के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी ने इस विस्तार के बहाने अपने उस वरिष्ठ केबिनेट सहयोगी की भावनाओं को आहत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है जिसे अब तक खून के आंसू रूलाने की कोशिश करनेवाले सुब्रमण्यम स्वामी को कभी औपचारिक तौर चेतावनी देना भी जरूरी नहीं समझा गया। लिहाजा इस मंत्रिमंडल विस्तार से उस विवादित मान्यता को मजबूती मिलना स्वाभाविक ही है जिसके तहत कहा जाता है कि स्वामी द्वारा जो कुछ भी किया जा रहा है वह अंदरखाने मोदी व अमित शाह की शह पर ही हो रहा है। इसी प्रकार विवाद इस बात भी पनपा है कि आखिर जिन मंत्रियों का कामकाज औसत से भी निचले दर्जे का रहा है उनका दूसरे विभागों में तबादला करने के बजाय उनकी जगह नयी नियुक्ति क्यों नहीं की गयी। साथ ही 75 वर्ष की आयु को आधार बनाकर मध्यप्रदेश सरकार की चलती हुई बस से उतारे गये बाबूलाल गौर व सरताज सिंह ने भी कलराज मिश्रा व नजमा हेप्तुल्लाह सरीखे बुजुर्गों को मंत्रिमंडल से नहीं हटाये जाने को निराशाजनक बताकर नये विवाद को जन्म दे दिया है। बहरहाल, बेशक हर नये विवाद ने मोदी की छवि को निखारने व चमकाने का ही काम किया हो लेकिन विवादों की दोधारी तलवार के साथ खिलवाड़ की आदत दूरगामी तौर पर नकारात्मक नतीजों का सबब भी बन सकती है। ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’ @ नवकांत ठाकुर # Navkant Thakur
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