‘जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध’
नवकांत ठाकुर
वाकई इन दिनों देश के हालात ऐसे दिख रहे हैं मानो किसी को इस बात की फिक्र ही नहीं है कि उसकी किस हरकत का क्या नतीजा निकलेगा। हर कोई खुद में ही मगन है। हर किसी की नजर में समूचा संसार उससे ही शुरू होकर उस पर ही समाप्त हो जा रहा है। लिहाजा अपने इस संसार में कोई किसी ऐसे को बर्दाश्त करने के लिये तैयार नहीं है जिससे उसकी सोच अलग हो या जिसकी सोच उसकी समझ से बाहर हो। हर कोई अपने डंडे से ही समाज को हांकने के प्रयास में जुटा है। ना कोई किसी की सुनने के लिये तैयार है ना समझने के लिये। हर तरफ ‘असहिष्णुता’ का ही बोलबाला है। लेखक, इतिहासकार और वैज्ञानिक अपना सम्मान लौटा रहे हैं, यह कहकर कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है। इस सम्मान वापसी अभियान ने देश के बुद्धिजीवी वर्ग को दो-फाड़ कर दिया है। सियासत तो पहले से ही दो फाड़ है जिसमें एक पक्ष मौजूदा केन्द्र सरकार के साथ है और दूसरा खिलाफ। जो खिलाफ हैं वे इस कदर खिलाफत कर रहे हैं कि ना तो संसद को चलने देना उन्हें गवारा है और ना ही सरकार के किसी काम में सहयोग करना। हालांकि सरकार को सहयोग तो वे भी नहीं कर रहे हैं जिनसे इसकी उम्मीद की जाती है। तभी तो अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ‘मूडीज’ को औपचारिक तौर पर यह बताने के लिये मजबूर होना पड़ा है अगर केन्द्र सरकार ने अपने खुराफाती साथियों व सहोदरों की हरकतों पर अंकुश नहीं लगाया तो वैश्विक स्तर पर भारत की विश्वसनीयता खतरे में पड़ सकती है। दूसरी ओर सत्तापक्ष को भी विरोधी सुर सुनना गवारा नहीं है। उसकी नजर में जो उसके समर्थक हैं वे ही राष्ट्रवादी हैं, बाकी तमाम पाकिस्तान परस्त। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय भी अगर संसद द्वारा पारित कानून को संविधान की मूल भावना के खिलाफ करार देते हुए उसे निरस्त करने की पहल करे तो सत्तापक्ष की नजर में सुप्रीम कोर्ट की सोच भी ना सिर्फ संदिग्ध बल्कि अस्वीकार्यता की हद तक गलत हो जाती है। खैर, असहिष्णुता का आलम यह है कि समाज का कोई भी तबका इससे अछूता नहीं दिख रहा है। मसलन गौमांस के मामले को लेकर जो विवाद चल रहा है उसमें जहां जिसकी लाठी मजबूत है वहां वह अपनी मनमानी करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। कर्नाटक व केरल में सार्वजनिक तौर पर गौमांस की दावत आयोजित हो रही है तो हिन्दी-पट्टी में गौवंश के मृत शरीर को ठिकाने लगाने के लिये सड़क मार्ग से कहीं बाहर ले जाने में भी जान जोखिम में आ रही है। इसी प्रकार ना तो पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष को बीसीसीआई के दफ्तर में घुसने की इजाजत दी जा रही है और ना ही पाकिस्तानी कलाकारों को मुंबई में अपनी कला का प्रदर्शन करने की। भाषायी स्तर पर असहिष्णुता का आलम यह है कि समूचे संसार में भारत का नाम रौशन करनेवाली मैरीकाॅम के जीवन पर बनी फिल्म को उनके गृह प्रदेश मणिपुर में सिर्फ इसलिये प्रदर्शन की इजाजत नहीं मिल पाती है क्योंकि यह फिल्म हिन्दी भाषा में बनी है। यहां तक कि जब केन्द्रीय गृह मंत्रालय सरकारी कामकाज में हिन्दी को बढ़ावा देने की बात कहता है तो विभिन्न प्रदेशों से उठनेवाले विरोध के सुरों के सामने उसे घुटना टेकने के लिये मजबूर होना पड़ जाता है। असहिष्णुता की चपेट में आने से पहनावा भी नहीं बच पाया है। कहीं महिलाओं को जींस व शाॅट्स पहनने की इजाजत नहीं मिल रही है तो कहीं साड़ी-धोती व कुर्ते-पायजामे पर आपत्ति हो रही है। इसी प्रकार सांप्रदायिक स्तर पर असहिष्णुता का आलम यह है कि अगर गौमांस के कथित विवाद में घर में घुसकर किसी की हत्या कर जाती है तो मौके का मुआयना करने पहुचे केन्द्रीय नेताओं की जुबान से पीडि़त पक्ष के प्रति सांत्वना का एक शब्द भी नहीं निकलता है बल्कि किताबी ज्ञान बघारने के क्रम में वे स्थानीय प्रशासन को चेतावनी भरे लहजे में यह बताने से बाज नहीं आते हैं कि इस मामले में वास्तविक दोषी के अलावा किसी अन्य को छेड़ने की भी गुस्ताखी नहीं होनी चाहिये। इसी प्रकार किसी को मूर्ति विसर्जन के कारण गंगा मैली होती नजर आती है तो किसी को बकरीद के कारण। यहां तक कि कोई जम्मू कश्मीर में गौहत्या प्रतिबंधित किये जाने के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में गुहार लगा रहा है तो कोई दीवाली में पटाखा फोड़े जाने के खिलाफ फरियाद कर रहा है। खैर, इस तरह के तमाम मामलों को समग्रता में देखा जाये तो ये सभी विवाद ना तो नये हैं और ना ही अनोखे। फर्क सिर्फ यह है कि पहले विवादित मसलों पर दो-टूक, कट्टर व आक्रामक रूख का मुजाहिरा करनेवाले आटे में नमक के बराबर ही हुआ करते थे जबकि आम जनमानस की सोच विविधता में एकता की भावना का परिचय देनेवाली सहिष्णुता, सामंजस्य व संतुलन की रहती थी। लेकिन इन दिनों स्थिति पूरी तरह उलट हो चली है और आटे की तादादवाले नमक बराबर बच गये हैं। लेकिन तादाद में कमी का कतई यह मतलब नहीं है कि इस हालात को सुधारने व अपने हिस्से के हिन्दुस्तान को अपने तरीके से बचाने व संवारने से उन्हें बचने का मौका मिल गया है। अलबत्ता रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में कहें तो, ‘समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।’ ‘जैसी नजर वैसा नजरिया।’
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